Friday, November 7, 2025

ॐ श्री सतनाम साक्षी

सतनाम 

सिंधु घाटी सभ्यता में भी सतनाम हैं.इसके अनेक चीजें साक्ष्य सदृश्य उपलब्ध हैं. सदियों से जमींदोज चीजें बाहर आ जायेंगे यदि वहाँ की लिपि को पढ़ सके.

  ज्ञात इतिहास में श्रमण संस्कृति के संवाहक एवं सत्य के अनवेशक तथागत बुद्ध ने गहन तपस्या और  उत्कट साधना से प्रकृति के रहस्य  को उजागर किया. व्यक्ति एवं समाज कल्याण के लिए बौद्ध धम्म का प्रवर्तन करके, सत्य सनातन सतनाम को ही प्रतिष्ठित किया.
उसके पश्चात् भंते गण सिद्ध  साधु नाथ पाद संत जिसमें आनंद महामोदग्लयायन, सरहपाद, इंद्रभूति, 84 सिद्ध, गोरखनाथ मत्स्येन्द्रनाथ, रैदास कबीर नानक गुरु घासीदास जैसे संतो गुरुओं ने अलग अलग जगहों एवं परिस्थितियों मे  सतनाम का सुमरन एवं लोकाचरण कर आत्मिक एवं आध्यात्मिक शक्ति से उसी आदि अजर अमर सतनाम धर्म के अंतर्गत अपने अपने मतों,पंथों का प्रवर्तन किया.इसकी एक सुदीर्घ ऐतिहासिक  निर्गुण उपासना में  प्रत्यक्ष सतनाम परम्परा हैं.इसी को ही "एतो धम्मों संनतनो " कह बुद्ध ने सनातन संस्कृति की नींव रखी.
   तो दूसरी ओर हमारे  मैथिलॉजिकल पौराणिक परम्परा मे भी सतनाम की यश गान हैं. उन्ही की अनुसंधान करते वेद उपनिषद पुराण रामायण  श्रीमद भागवत आदि हमारे धार्मिक ही नहीं दार्शनिक  एवं साहित्यिक धरोहर हैं.इनमें ईश्वर की परिकल्पना करके उनके सगुण स्वरुप अवतार एवं लीलालो द्वारा जनमानस को सत्यचारण करते सतनाम को मानने की  अप्रत्यक्ष संदेश समादृत हैं. जिसके अंतर्गत शैव शाक्त वैष्णव की परंपरा हैं.
   इन दोनों धाराओ एवं कृषि वृत्ति से भारतीय संस्कृति का विकास हुआ है.
भगवान शंकर द्वारा माता पार्वती को सतनाम अमर कथा श्रवण कराने की प्रसंग हो या राजा हरीशचंद्र द्वारा सतनाम की मार्ग का अनुशरण का प्रेरक वृतांत हो या फिर भगवान विष्णु का  सत्यनारायण कथा हो जो घर घर मांगलिक अनुष्ठान की तरह आयोजित होते हैं.
राम की संघर्ष और अपेक्षित सफलता न मिल पाने की संदेश त्रिजटा से सुनकर बेबस और व्यथित सीता का रुदन अत्यंत कारुणिक हैं...और जब कोई सहारा न हो तो एक "सतनाम "तो हैं! जिसे स्मृत कर मन हल्का कर सकते हैं, आत्मबल भर सकते हैं।
"सत्यनाम नाम करु हरु मम सोका"
इस तरह  सतनाम की बातें उनके अनुगमन कर मानव जीवन को सुखमय बनाने की  महत्वपूर्ण सूत्र समाहित हैं।

भारतवर्ष के कण कण मे सतनाम समाहित हैं. सिंधु घाटी सभ्यता की प्राचीनतम धर्म आधात्म से लेकर अर्वाचीन ज्ञान विज्ञान के केंद्र में सतनाम परिव्याप्त हैं. 
 उत्तर हिमालय मे सतनाम साधना के  उतुंग शिखर हैं तो दक्षिण मे हिन्द महासागर की गहराई मे वह विद्यमान हैं.
 सागर तट रामेश्वरम में स्थापित सतनाम साक्षी द्वार इसी सतनाम केंद्रित धर्म संस्कृति की सनातन विशेषता को प्रदर्शित कर रहा हैं.

डॉ अनिल भतपहरी / 9617777514

C-11, ऊँजियार सदन सेंट जोसेफ टाउन  अमलीडीह, रायपुर छत्तीसगढ़

Monday, November 3, 2025

महात्मा गाँधी के अभिनंदन पत्र 1933

#daqument 

महात्मा गाँधी का अभिनंदन पत्र 1933 

"चार लाख सतनामी अन्य साधारण सवर्ण हिंदुओं से श्रेष्ठ सदाचरण जीवन व्यतीत कर रहे हैं।"
 महात्मा गाँधी जी को राजिम नवापारा कमेटी द्वारा 19-11-1933 को प्रदान किए गए अभिनंदन पत्र की टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। तभी तो हमलोग बचपन से सुनते रहे हैं कि कुछेक जहरिया सतनामी (कट्टरपंथी)हाट बाजार के केवटिन चना मुर्रा और रउत ,गहिरा के हाथों होटल के चाय पानी तक नहीं पीते। झोले में लोटे/गिलास पकड़ कर यात्रा करते और तालाब नदी नाले के पानी पीते थे। तब कुआं आदि भी बहुधा कम ही था।

 मेहराई का कार्य मेहर मोची का हैं जो पौनी जाति हैं और सतनामियों से बिल्कुल अलग हैं। हालांकि सतनामियों में अनेक जातियों की तरह वह भी सम्मिलित हुए और अपना पूर्व पेशा मान्यता का परित्याग कर दिए। पर जो सम्मिलित नहीं हुए वे लोग आज भी पारंपरिक पेशा करते हैं और वे लोग पांच पौनी में शामिल हर मेहर मोची का गांव आजीविका हेतु बटा हैं। जैसे नाई धोबी राउत ब्राह्मण के गांव आजीविका हेतु हैं।

कृषक जाति कुर्मी तेली सतनामी अघरिया लोधी राठौर हैं इनमें बड़ी जोत कुर्मी तेली और सतनामी के पास मैदानी क्षेत्र में हैं। वनांचल में आदिवासी हैं जो उत्तर में सरगुजा  उरांव, कोरवा बैगा भैना, राठिया आदि है। दक्षिण बस्तर में गोड़ कवर बिझवार माडिया मुरिया भतरा धुर्वा इत्यादि हैं।

ज्ञात हो कि भारत में सर्व प्रथम 1915 में गौरक्षा आंदोलन सतनामियों ने महंत नयन दास महिलांग एवं गुरु गोसाई ने बलौदाबाजार से आरम्भ किया और ब्रिटिश सरकार द्वारा संचालित बूचड़ खाना को सफलतापूर्वक लंबे संघर्ष के बाद बंद करवाए। पं सुंदरलाल शर्मा को पं मिलऊदास सतनामी ने ही सतनाम पंथ की आधारभूत जानकारी दी फलस्वरूप 1907 में वे सतनामी पुराण की सृजन किया। दोनो समवयस्क एवं कौंदकेरा और चमसुर राजिम क्षेत्र के प्रमुख स्वतंत्रता सग्राम सेनानी  महान हुतात्मा हैं ।
    समाज प्रमुखों द्वारा 1921 में सतनामी आश्रम की स्थापना गंज मंडी में कृषकों से एक बोरा धान में एक कटोरी बरार लेकर संचालित किए गए। यह भी सामाजिक जागरूकता की दिशा में मील का पत्थर हैं।
  वैसे भी रायपुर में सतनाम पंथ के तीन प्रमुख बाड़ा था जिसमें गोसाई बाड़ा गुढियारी, मांगडा बाड़ा जवाहर नगर एवं साहेब बाड़ा मोवा जहां  गुरु अगमदास गोसाई मिनीमाता जी का निवास थी और सामाजिक जनो/ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के लिए शरण स्थली व धर्मशाला थी। यही पर जवाहर लाल नेहरु के सचिव बाबा रामचंद्र जी रहकर अंग्रेज भारत छोड़ो आंदोलन का संचालन किए।

डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

   चित्र: नवापारा राजिम नगर कमेटी द्वारा महात्मा गाँधी जी को 19-11-1933 को प्रदान किए गए अभिनंदन पत्र में सतनामियों के संदर्भ में दी गई जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण एवं रेखांकनीय हैं।

Sunday, October 26, 2025

किस्सा बहराम चोट्टे का

#anilbhatpahari 

किस्सा बहराम चोट्टे का 

उक्त उपन्यास का लोकार्पण समारोह का आमंत्रण पत्र और शीर्षक देख मुझे "चरणदास चोर "स्मृत हुआ कि कही "महंत जुगुलदास गाथा" जैसा  छत्तीसगढ़िया रॉबिन हुड किरदार तो नहीं होगा? जिसे  नाचा गम्मत से लेकर हबीब साहब ने सत्य के प्रति अटूट निष्ठा से अमर हुए पात्र को "चरणदास चोर" बनाकर  प्रतिष्ठित एवं सम्मानित कराया। एक तरह से उन्होंने नया थियेटर के माध्यम से छत्तीसगढ़ी कला ,संस्कृति ,धर्म और मान्यता को वैश्विक मंच प्रदान किया। उसी चरणदास को पिताश्री के निर्देशन में  नवरंग नाट्य कला मंच 1975 से हम लोग भी करते रहे हैं। इस कारण भी बिलासपुर की अनिवार्य सा प्रवास को स्थगित कर कथानक के मोह वश भी जाना हुआ।

बहरहाल कार्यक्रम के उद्बोधनों में जाना कि यह तो एकदम से अलग पात्र हैं एक ऐसा बहराम जो लोगों को खूबसूरती से लूटते रहा / उनका हर चीज यहां तक विश्वास /मत चुराते रहे ,नेतृत्व करते रहा. पर वह अपना सा लगा और जाना भी तो चाहकर विद्रोह भी नहीं कर पाया।
    समीक्षक प्रथम वक्ता डॉ सुधीर शर्मा पते की बात कहे कि ऐसे बहराम अब छत्तीसगढ़ में लाखों की संख्या हैं। जो हर क्षेत्र में मौजूद हैं। सचमुच उपन्यास बिना पढ़े प्रासंगिक लगने लगा।

   आज़ादी के महज 10 साल बाद 1958 में मोहभंग से ऊपजे मनोदशा कथानक के रुप में ,पहले धारावाहिक  आया। उसके 4 साल बाद 1962 में  प्रकाशित " किस्सा बहराम चोट्टे का" संभवतः हिंदी के प्रथम हास्य व्यंग्य उपन्यास हैं जो "राग दरबारी "की पूर्व पीठिका सा हैं।
   उक्त उपन्यास के लेखक विश्वेन्द्र ठाकुर के  परिजनों ने 65 वर्ष बाद लगभग विस्मृत कर चुके और बमुश्किल लतीफ घोंघी जी के घर उनके सुपुत्र प्रो करीम साहब के सौजन्य से एक प्रति मिले । इस प्रसंग को महासमुंद से पधारे लेखक  शर्मा जी ने रोचक आपबीती बताते भावुक होते ऐसे बताए कि परिजन खो चुके पुस्तक की एक प्रति को दिवंगत "पिता के अस्थि कलश " प्राप्त करते हुए सा कंपकपी हाथों से धारण किए... खचाखच भरा विमतारा हाल भाव विह्वल हो उठे।
 उनके समकालीन वरिष्ठ साहित्यकार रवि श्रीवास्तव ने उपन्यास की एक पंक्ति सुनाते कहे कि बहराम किसी नदी  के बाढ़ की तरह बस्ती में चढ़ा जा रहा हैं। क्या विलक्षण उपमान हैं। ऐसा तो आजकल गांवों को निगलते अनेक भू माफिया और कॉर्पोरेट घराने के लोग सर्वत्र मिलने क्या दिखने लगे हैं। नव धनाढ्यों की बढ़ती बाढ़ से तबाह होते गांव और जनजीवन सहज ही द्रष्टव्य हैं।

इस महत्वपूर्ण उपन्यास को उनके सुपुत्र संकेत/ सरल ठाकुर एवं अन्य सभी मिलकर पुनर्प्रकाशित कर साहित्य जगत के लिए अप्रतिम व स्वागतेय कार्य किया हैं।
   सतलोकी लेखक विश्वेंद्र ठाकुर जी को विनम्र श्रद्धांजलि सहित परिजनों को बधाई कि उन्होंने मिलकर  पिताश्री की कृति और उन्हें चीर स्मरणीय बनाएं हैं। यह उपलब्धि हमारे छत्तीसगढ़ राज्य और कथानक क्षेत्र महासमुंद के लिए ही नहीं बल्कि हिंदी जगत के लिए गर्व का विषय हैं। अनेक साहित्यिक और स्वनाम धन्य लोगों के साथ मुझे आमंत्रित कर इस ऐतिहासिक  पल का साक्षी बनाने के लिए ठाकुर परिवार के प्रति आभार।

   जय हिंदी जय भारत 

डॉ अनिल भतपहरी/ 9617777514

Tuesday, October 21, 2025

दीपावली

#anilbhattcg 

दीपावली की हार्दिक बधाई 

दीपावली का आशय अनेक दीपों की पंक्तियां हैं जिसे कतारबद्ध रखा गया हो।  ऐतिहासिक तथ्य यह है कि सम्राट अशोक अपने अधिकार वाले इस महादेश जिसकी सीमाएं सुदूर कंधार (गंधार)कजाकिस्तान से लेकर श्याम देश बाली सुमात्रा तक नेपाल से सिंहल द्वीप श्रीलंका तक 84 हजार बौद्ध स्तूप बनवाए और एक ही तिथि कार्तिक अमावस्या को इन स्तूपों में दीप प्रज्वलित करवाकर उद्घाटन कराए। 
  रामायण महाकाव्य के अनुसार भगवान राम वनवास से अयोध्या लौटे उनकी स्वागत में लोग अपने घरों में दीप जलाएं। 
पौराणिक वृतांत के अनुसार समुद्र मंथन में धनवंतरी और लक्ष्मी प्रगट हुई उनके स्वागत में दीप जलाएं।
      छत्तीसगढ़ में कृषि संस्कृति का यह पावन पर्व हैं फसलों  के खासकर धान का घर, कोठी,खलिहान में आने उनके स्वागत में ग्राम देवताओं में दीप जलाने, रात्रि को पशु पालक भैंस के कोठे में सुअर, गाय के कोठे में मुर्गा कबूतर आदि के बलि चढ़ाने, मांस मदिरा पान कर सामूहिक नृत्य गान करते खुशियां मनाने का प्राकृतिक पर्व हैं ।
 रात्रि में गौरा गौरी विवाह उत्सव का भी आयोजन बड़ी धूमधाम से किए जाते हैं। इसके लिए सुवा नृत्य कर पंद्रह दिनों तक महिलाएं तैयारी करती हैं।प्रातः विसर्जन कर सुख संपदा की कामना की जाती हैं।

जब से मानव समाज में कृषि संस्कृति विकसित हुईं गांव बनाकर एक जगह बसाहट हुई  तब से यह प्रथा प्रचलन हैं। कालांतर में इस दिन लोग अपनी अपनी धर्म मत की कथा कहानियों को जोड़ दिए गए। फिर मूल बातें विस्तृत कर कथाओं को ही सच मानने लगे।

१सुरहुत्ती / देवारी= ग्राम देवताओं में दीप चढ़ना/ बलि देना 
 २गोवर्धन  पशुओ को खिचड़ी खिलाने कोठी में टीका देना धन की बढ़वार की कामना का पर्व।

३ मातर भूदेवी की पूजा लोग सामूहिक नृत्य गान करते गौठान में एकत्र होते हैं और खेल शौर्य का प्रदर्शन करते हैं। मातृका पूजन का अवशेष सिंधु घाटी सभ्यता में भी मिलती है।
यह लोक पर्व हैं न कि शास्त्रीय पर्व।
व्यापारियों/ धार्मिकों/ ने इसे अपने अपने ढंग से व्याख्यायित कर इस लोक पर्व को अपना लिए हैं और उसी तरह प्रचार प्रसार करते हैं।
मुगलों ने बारूद से तोप पटाखे फोड़े कर परीक्षण किए आवाज से हर्ष प्रगट किए , बिजली आई तो रौशनी करने बल्बों की झालर बने। 
। पुष्य नक्षत्र में सोने चांदी  खरीदी हेतु शुभ मुहूर्त घोषित किए गए। बर्तन लेने धन तेरस गढ़े गए इस तरह अनेक चीजें जुड़ती गई। इस तरह यह दीपोत्सव देश का  महापर्व हो गया।
  
सबके अंत: करण में परिव्याप्त अज्ञान अभाव रुपी कष्ट कलुष कटे, सर्वत्र उजियारा फैले। मंगलकामनाएं ।

डॉ .अनिल भतपहरी/9617777514

फ़कत

आपके वास्ते छकड़ी हमरी
        "फ़कत"
खेल रेखाओं का नही
और न तक़दीर का है
भाग्य,भगवान-खुदा
न कोई पीर-फ़कीर का है
ये तो 0फ़कत आपके चुनाव
और उनकी ज़मीर का है...

बिंदास कहें- डा.अनिल भतपहरी

Friday, October 10, 2025

बीरन माला

Gopikrishnasoni Soni 
मुखड़ा 

रुप तोर मोहिनी मोर मन झाला हो मन झाला 
मैं तोर बर भेजव बीरन माला ओ बीरन माला...
मोरो मन भाए तय बतावव काला ग बतावव काला 
महु तोर भेजहु बीरन माला ग बीरन माला 

डोंगरी तीर म तितुर बोले ओ तितुर बोले 
तोर आरो ल पाके मोर मन डोले ओ बीरन माला 

सेमी के मड़वा  अबड गहिदे ग अबड गहिदे 
तोर बोली बचन म मोर अरिझे 


Sunday, October 5, 2025

गुनान गोष्ठी

#anilbhatpahari

छत्तीसगढ़ी साहित्यकार सम्मेलन म गुनान गोष्ठी

राज मिले २५ बछर होगे बड़ उछाह हे !
फेर इहां के भाषा,कला संस्कृति
अउ अस्मिता के संगे संग
जल जंगल जमीन ख़िरात हे!
छत्तीसगढ़ी गीत संगीत सनीमा संग
पठन पाठन लेखन म छत्तीसगढ़ नदात हे!
ये संसो कि खरही लेसत अउ कोठी के धान हेर
हमरे छानी म होरा भुजंत हमीं ल बिलेर मिझेर
अतेक मान देवन  कि उन ल डरान
चिटकोन नइये कोनो ल काही भान
का संत भूमि के रहैया संते कस संतई करत रही जाबोन
तियाग तपस्या करतेच रहिबोन कि कभू राजपाट पाबोंन
मंद माखुर के निशा पानी,देव धामी के पूजई आनी बानी
यहीच मोकाय बोकाय जम्मो जिनीस ल लुटाय नंगाय
का मुड़ी धर गुनत रहि जाबोन सरी जिनगी ल पहाबोन

कइसे कही कछु कहत नइअस ग सियान
चीटिक मने मन भंजा ले कब होही बिहान

   डॉ. अनिल भतपहरी/ 9617777514