Tuesday, September 15, 2026

नवा खाई बनाम नुआ खाई

महानदी के इस पार का नवान्न : नुआखाई, दालखई और देवारी
- डॉ. अनिल भतपहरी

महानदी केवल एक नदी नहीं है, वह एक सांस्कृतिक सीमा-रेखा भी है। उसके उस पार और इस पार फसल का चक्र एक-सा है, पर उसे मनाने की तिथि और विधि अलग-अलग है। इसी भिन्नता में छत्तीसगढ़ की कृषि-संस्कृति की मौलिक समझ छिपी है।
उस पार : नुआखाई
महानदी के उस पार लरियांचल अर्थात पश्चिमी ओडिशा - संबलपुर, बलांगीर, कालाहांडी अंचल में नुआखाई सबसे बड़ा पर्व है। भादों शुक्ल पंचमी को धान की नई फसल घर आने पर नवान्न ग्रहण किया जाता है। नुआखाई जुहार वहां की आत्मा का उद्घोष है।
इस पार : भादों में नवान्न संभव ही नहीं
लेकिन इस पार - शिवरीनारायण, सिरपुर, राजिम अंचल में नुआखाई उस रूप में नहीं मनाई जाती। इसका कारण विशुद्ध कृषि-शास्त्रीय है। भादो महीने में छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग में कोई नई फसल पकती ही नहीं, तो नया खाने का प्रश्न ही नहीं उठता।

यहां धान की एक विशेष व्यवस्था है - पसहर**। क्वांर माह में आने वाले पसहर धान को किसान साल भर यत्नपूर्वक रखता है। उसी पसहर के चावल का भात खाकर महिलाएं **कमरछठ में उपवास खोलती हैं और दिन भर फलाहार करती हैं। यह परंपरा बताती है कि यहां अन्न को केवल उपज नहीं, थाती माना गया है।
असली नवान्न : सुरहुती, देवारी, मातर
यहां खरीफ की प्रमुख फसल हरहुना किस्म का धान है, जो दशहरा और दिवाली के बीच खलिहान में आता है। इसीलिए इस अंचल में नवा खाने की असली रस्म त्रिदिवसीय महापर्व - सुरहुती, देवारी, मातर में निहित है।

घर-घर में इसका अनुष्ठानिक रूप दिवाली की खिचड़ी में दिखता है। खिचड़ी बनाते समय उसमें नए धान के चावल डाले जाते हैं, पहले पितरों और देवताओं को भोग लगाया जाता है, फिर परिवार नवा खाता है। भाव वही है जो नुआखाई का है - नई फसल का सम्मान - बस तिथि फसल के पकने के साथ जुड़ी है, पंचांग के साथ नहीं।
दशहरा : शोभायात्रा और मेल-जोल
इस संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि यहां दशहरा अन्य अंचलों की तरह रावण-दहन का कर्मकांडीय उत्सव मात्र नहीं है। यह शोभायात्रा और परस्पर मेल-जोल का पर्व है। गांव-गांव से देवी-देवताओं की शोभायात्रा निकलती है, लोग एक-दूसरे से भेंटते हैं, सुख-दुख बांटते हैं। यह फसल कटने के बाद के अवकाश और उल्लास का सामूहिक उत्सव है।
साथ में : दालखई
उस पार के अंचल में एक और परंपरा है - **दालखई**। यह मूलतः लोकनृत्य-गीत परंपरा है, जो दशहरा से प्रारंभ होकर दालखई पूर्णिमा तक चलती है। कुंवारी कन्याएं भाई की लंबी आयु की कामना से दालखई गाती-नाचती हैं। इसे भाई-बहन के स्नेह का पर्व भी कहा जा सकता है।
बस्तर : सेतु-अंचल
उड़ीसा से लगा बस्तर अंचल इस सांस्कृतिक संवाद का सेतु है। वहां 18 सितंबर को नवाखाई मनाई जाती है और इस दिन कलेक्टर द्वारा घोषित सार्वजनिक अवकाश रहता है। एक ही प्रदेश में यह विविधता छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रमाण है।
निष्कर्ष
तो एक ही फसल-चक्र के तीन रूप हमारे सामने हैं :
• उस पार : नुआखाई - भादों में नवान्न • इस पार : दिवाली की खिचड़ी में नवा-खाना - सुरहुती, देवारी, मातर • साथ में : दालखई नृत्य-पर्व 
पर्वों की तिथियां अलग हो सकती हैं, पर मूल भाव एक ही है - धरती के प्रति कृतज्ञता और अन्न का सम्मान। लरियांचल के सभी मित्रों को नुआखाई की हार्दिक बधाई - नुआखाई जुहार!

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