Wednesday, September 2, 2026

सतनाम साहित्य सृजन की सतत परंपरा

सतनाम साहित्य सृजन की सतत परंपरा

गुरु घासीदास के परिनिर्वाण (1850) के 18 वर्ष बाद से अद्यतन तक के लेखन का समग्र अवलोकन

लेखक : डॉ. अनिल कुमार भतपहरी (पीएच.डी. शोध 2013 / ग्रन्थ 2019 - गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ)

प्रस्तावना

प्रायः यह कहा जाता है कि सतनाम साहित्य अभी शैशवावस्था में है। यह कथन तथ्यों की सतही समझ पर आधारित है। वस्तुस्थिति यह है कि गुरु घासीदास जी के अंतर्ध्यान 1850 के मात्र 18 वर्ष बाद 1868 से ही सतनाम पर प्रामाणिक लेखन निरंतर जारी है। डॉ. अनिल कुमार भतपहरी के अनुसार अब तक 250 से अधिक स्वतंत्र पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाएँ और शोध-ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं। यह 157 वर्षों की सतत परम्परा है।

1. चिशोल्म का 1868-69 का लेखन - चश्मदीद साक्षात्कार

जे. डब्ल्यू. चिशोल्म की 1869 की रिपोर्ट में स्पष्ट है कि सतनाम पंथ कबीर पंथ से प्रेरित है और गुरु घासीदास ने मूर्ति-पूजा का निषेध कर निराकार सतनाम का उपदेश दिया। यह लेखन तब हुआ जब गुरु जी को देखने वाले जीवित थे, अतः यह फर्स्ट हैंड ओरल हिस्ट्री है। 18 साल का अंतराल नगण्य है।

2. मौखिक से लिखित की ओर - पंथी गीतों की जीवंत परम्परा

गुरु घासीदास जी के समय से ही उनके जीवन-चरित और उपदेशों पर पंथी गीत, मंगल भजन का लेखन-गायन प्रारम्भ हो गया था।

3. महाकाव्यात्मक युग (1907-1968)

1907 - पं. सुंदरलाल शर्मा: 'सतनामी पुराण'

1925 - गुरु अगमदास जी द्वारा पं. सुखीदास से 'सतनाम सागर' लेखन

1965-68 - मनोहरदास नृसिंह: 'गुरु घासीदास नामायण'

सुकुलदास घृतलहरे की 'समायन', सखाराम बघेल की 'सत्यायण', बुलनदास की 'गुरु उपकार', भाऊराम घृतलहरे की 'गुरु अमृतवाणी', सुकालदास भतपहरी की 'गुरु घासीदास चरित गीतमाला'

4. शोधपरक गद्य का विकास

डॉ. जे. आर. सोनी - 'सतनाम के अनुयायी', 'सतनाम रहस्य'

सर्वोत्तम स्वरूप साहेब, टी. आर. खूँटे, डॉ. दादूलाल जोशी, पी. डी. सोनकर

लखन सुबोध एवं GSS संगठन, नरेंद्र भारती एवं कुमार लहरें द्वारा ब्रिटिश दस्तावेजों का अनुवाद

5. डॉ. अनिल कुमार भतपहरी का योगदान (2013/2019)

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी का पीएच.डी. शोध ग्रन्थ (2013) और पुस्तक ‘गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ’ (2019) इस परम्परा का प्रथम समग्र विश्वविद्यालयीय दस्तावेजीकरण है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं स्रोत समीक्षा

जीवन-चरित एवं तप-साधना

सतनाम दर्शन - मनखे-मनखे एक समान

सामाजिक संरचना एवं संगठन

गुरु परम्परा - बालकदास से वर्तमान

Sahapedia (2015) - Panthi Nritya लेख

6. साहित्य कम नहीं, पाठक-परिवेश बाधित था

रेडियो पर पंथी गीत आते ही बैंड बदल देना, बस में कैसेट बदलवाना, शिक्षित अधिकारियों द्वारा घर में फोटो तक न लगाना - यही कारण था कि पुस्तकें 200-500 प्रति में अलमारी की शोभा बनी रहीं।

7. 2000 के बाद विस्फोट

छत्तीसगढ़ राज्य गठन और सोशल मीडिया के बाद डॉ. हीरालाल शुक्ल, डॉ. आर. पी. टंडन, बलदेव, अजय कुमार खूँटे कृत 'Guru Ghasidas Aur Satnami Andolan Ke Aitihasik Sakshya (2021)' आदि की कृतियाँ आईं।

निष्कर्ष

1868 से 2019 तक 157 वर्षों की सतत परम्परा सिद्ध करती है कि सतनाम साहित्य शैशवावस्था में नहीं है। साहित्य परिपक्व था, पाठक-परिवेश बाधित था।


--- डॉ. अनिल कुमार भतपहरी ---

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