Friday, May 29, 2026

सतनाम ही सनातन हैं

सतनाम ही सनातन हैं 

    - प्रो डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
 
      सतबोधिया, सतबोधि, सत संदेसिया,सेतगुरु  , सतगुरु, घासीदास नाम के सम्मुख प्राचीन समय से चला आ रहा हैं। अनेक पंथी , मंगल भजनों में भी यह प्रचलित हैं। बोधि , बोधियां शब्द बौद्ध धम्म और पाली साहित्य के प्रभाव से आया हैं।सत्रहवीं सदी तक व्यापक रुप में यहां बौद्ध धम्म प्रचलित था। अनेक सिद्ध, नाथ, जोगी, जती समाज में थे। उनका सबका उपस्थिति और प्रभाव समकालीन समाज में रहा हैं। फलस्वरूप समाज में समरसता रही और रोटी बेटी भी ग्रामों या समीप में होते रहें हैं। जातपात का ऐसा विकराल स्वरुप अपेक्षाकृत कम ही थे। दक्षिण कौशल में राजभाषा पाली एवं ब्राह्मी लिपि का प्रचलन था। जिसका साक्ष्य यहां के शिलालेखो/ ताम्रपत्रों में संरक्षित हैं। छत्तीसगढ़ी भी पाली प्राकृत का ही स्वरुप हैं।
     छत्तीसगढ़ में इसी समय मराठा अंग्रेजी कालखंड में उत्तर भारतियों का आगमन और पौराणिक कथा कहानियों का वृहत्तर  प्रचार प्रसार राजकीय संरक्षण आदि से पूर्व प्रचलित संस्कृति में अभूतपूर्व बदलाव आया। मैदानी क्षेत्रों में जातियां लामबंद हुई परस्पर भेदभाव और फिरकापरस्ती बढ़ी। 
   आजकल बस्तर बीहड़ जंगलों के सुदूर ग्रामों में जो पहले एक था कोई भेदभाव नहीं था वहां भी इन पर प्रांतिको के हस्तक्षेप से सामाजिक वैमनस्य और सांप्रदायिक उन्माद देखें जा रहे हैं।
   मैदानी क्षेत्र में बढ़ते जातिवाद और अंधविश्वास के विरुद्ध समाज सुधार के लिए गुरु घासीदास का अभ्युदय हुआ। उनकी सतनाम सिद्धांत और दिव्योक्ति" मनखे मनखे एक की अनुगूंज सर्वत्र होने लगी।"अनेक जातियां सतनाम पंथ में सम्मिलित होकर जात पात वर्ण भेद के कुचक्र से मुक्त होने लगे।
   हालांकि उनके बढ़ते प्रभाव को रोकने अनेक षड्यंत्र हुए पर सत्य को कोई रोक नहीं सकते उनकी अपनी प्रभा हैं जो स्वयं प्रसारित और प्रकाशित होते ही हैं।
बुद्ध वचन  हैं 
         "एस धम्मो सनंतनों"

प्रसिद्ध पाली भाषा का वाक्यांश है, जिसका अर्थ है— "यही शाश्वत (सनातन) धर्म है।"यह वाक्य बौद्ध धर्म के प्रमुख ग्रंथ धम्मपद (गाथा ५) से लिया गया है। इसका पूरा श्लोक और अर्थ इस प्रकार है:
न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं।अवेरेन च सम्मन्ति एस धम्मो सनंतनो॥

अर्थ:"इस संसार में कभी भी बैर (दुश्मनी) से बैर शांत नहीं होता। बैर केवल प्रेम और अपकार (क्षमा) से ही शांत होता है। यही शाश्वत नियम (धर्म) है।"प्रमुख विशेषताएँ:सार्वभौमिक सत्य: यह बुद्ध की प्रमुख शिक्षा है जो हिंसा और घृणा को त्यागकर प्रेम और करुणा के मार्ग पर चलने का संदेश देती है।

यह परम सत्य हैं कि बैर अबैर से नष्ट होती हैं 
घृणा प्रेम से,झूठ सत्य से
अंधेरा प्रकाश से कटती हैं यही सनातन हैं।
       तो समाज में षड्यंत्र जनित शास्त्रीय ढंग से विभाजित और फैली हुई जात पात उच्च नीच , ढोंग पाखंड का विनाश सतनाम से होगा। यही सनातन हैं।
  इस गुरुघासीदास ने नैसर्गिक रूप से जो सत्य हैं उनकी उदघोषणा किया संयोग से सत्य की नैसर्गिक स्वरुप का दिग्दर्शन तथागत बुद्ध भी करते सनातन कहे। उसी को यहाँ प्रतिष्ठित किया गया और लोक व्यवहार में लाये गए। फलस्वरूप सतनाम ही सनातन हैं या कहे सनातन सतनाम हैं। यदि सतनाम कहने में समझने में दिक्कत हैं तो व्यर्थ सनातन की दुहाई न दे क्योंकि बिना समता न्याय बंधुत्व के धर्म व्यर्थ हैं यदि वर्ण एवं जाति विभाजन और उच्च नीच हैं तब तो यही तत्व सनातन की घोर शत्रु हैं। वे बैर पालकर कैसे अबैर भाव को अर्जित करेगा? जात पात, उच्च नीच छुआछूत को बढ़ावा देकर शस्त्र सम्मत कहकर मानकर बढ़ावा देते हैं वह कतई सनातन एवं सतनाम का स अक्षर नहीं जान समझ सकता।

     नब्बे के दशक में  सिरपुर के आसपास 5-7 ग्रामों में बसे हम प्राचीन सहजयानी लोग जिनके पूर्वज सतनामी हो गए थे वे बुद्ध पूर्णिमा को आनंद प्रभु बुद्ध विहार प्रांगण में मेला लगाने एवं बुद्ध वंदना के लिए प्रयास किए। 
बाद में महासमुंद रायपुर बौद्ध समाज से सामंजस्य बिठाकर भंते आर्य नागार्गुन सुरई ससई गुरु दयावंत ,सरदार दिलीप सिंग होरा की आतिथ्य और हजारों सतनामी बौद्ध जनों की उपस्थिति में"बोधिसत्व गुरुघासीदास" कहें गए । 
   कालांतर में यह भावपूर्ण संबोधन प्रबुद्ध समुदाय में श्रद्धापूर्वक कहे जा रहें हैं। बुद्ध ने भंते संघ को उपदेशना देते त्रिशरण पंचशील अष्टमार्ग तय किए और उन्हें घोषित किया कि "येतो धम्मो सनंतनो" यह सिद्धांत ओर सूत्र मन वचन कर्म में धारनीय हैं। उन्हीं के अनुरुप गुरु घासीदास का  सप्त सिद्धांत, अमृतवाणी उपदेशना आदि सतनाम पंथ की शाश्वत सत्य विशेषता हैं जो कि अपरिवर्तनीय एवं नित नवीन  हैं। यह विशेषता सत्य सनातन हैं अर्थात" सतनाम ही  सच्चे अर्थों में सनातन हैं।
         वर्तमान में सतनाम पंथ अपनी प्राचीन स्वरुप को जानने समझने और आत्मसात करने की ओर अग्रसर हैं। ताकि भारतीय समाज में जन्मना जातियां वर्ण आदि खत्म हो और बुद्ध कालीन समृद्धशाली समाज वैश्विक  मार्गदर्शक ( गुरु) होने की ओर सच में अग्रसर हो सके। केवल ख्याली पुलाव बनाते भ्रमित न रहें।

    भवतु सब्ब मंगलम 

       जय सतनाम नमो बुद्धाय

सेवक राम बाँधे

सतनाम धर्म संस्कृति पर केंद्रित छत्तीसगढ़ एवं छत्तीसगढ़ी में साहित्य सृजन तो सद्गुरु घासीदास के  सतनाम पंथ की प्रवर्तन एवं सप्त सिद्धांत की प्रस्तुति 1790 और निरंतर रामत रावटी में उपदेशना के समय ही प्रचलन में आ गए। उनकी बातों को लयात्मक गीतात्मक रुप देकर गाने एवं कंठस्थ करने की कलाएं समाज में प्रचलित हो गए। साथ ही छत्तीसगढ़ी को साहित्यिक एवं कलात्मक रुप मिला। उनमें जीवन दर्शन की बातें आई आध्यात्मिक चेतना जगी इस तरह सद्गुरु घासीदास के श्रीमुख से नि:सृत छत्तीसगढी देव भाषा कही जाने वाली संस्कृत पाली जैसी महिमामय हुई।उनके सुपुत्र गुरु अमरदास एवं संत महंत ने समाज में  प्रतिबद्धता पूर्वक संपूर्ण छत्तीसगढ़ में प्रचार प्रसार किया।
   कालांतर में जब शिक्षा आई तो गुरु उपदेश एवं अलग अलग परिक्षेत्र में प्रचलित लोक कथाएं संत मंहत की प्रेरक संस्मरण, वृत्तांत जीवनी इत्यादि का लेखन आरंभ हुआ। फलस्वरूप मानवता एवं करुणा से आप्लावित लोक कल्याण की उच्च आदर्श का स्वर सतनाम साहित्य में समादृत हैं।
     उच्च शिक्षित एवं राज्य में उप सचिव (राजस्व) जैसे उच्च प्रशासनिक अधिकारी  रहे सेवक राम बांधे "सवेरा" जी अनेक जगहों पर लोक सेवक थे। वे जनमानस की समस्याओं एवं उनकी संघर्ष एवं पीड़ा के विगत 60 वर्षों के चश्मदीद गवाह भी हैं। उनका लेखा जोखा सतनाम दर्शन से प्राप्त दृष्टि से किये हैं वह अभिनंदनीय हैं।
  विषय पर उनकी दृढ़ पकड़ और सहजता से प्रभावी प्रस्तुति उनके व्यक्तव्य एवं लेखन में दृष्टिगोचर होते हैं। आपकी प्रथम चर्चित निबंध संग्रह पाखी पठनीय ही नहीं संग्रहणीय भी हैं।
अब यह उनकी दूसरी कृति हैं जिसमें वे गुरु उपदेश और वाणी की प्रतिध्वनि पर रची गई अनुपम कृति है। जिसे वह प्राचीन किस्सागोई शैली में आखीन देखी कानन सुनी रोचक दास्तान हैं।
 सेवानिवृती उपरांत समाज सेवा हेतु समर्पित बाँधे साहब राज्य में गठित प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज के महासचिव हैं और सतनाम रावटी दर्शन यात्रा के प्रणेता आध्यक्ष हैं। जिनके प्रयास से गुरु घासीदास के सभी 9 रावटी स्थलों पर परिक्रमा यात्रा की अवधारणा विकसित हुई। यह यात्रा अनेक परिक्षेत्रों पर वर्गीकृत समुदाय में सांस्कृतिक एवं धार्मिक एकीकरण हेतु अत्युतम प्रयास हैं।
     इसी तरह वे समाज में प्रचलित व्रत त्यौहार उत्सव इत्यादि व्याप्त  विभिन्नता में एकता लाने सतत सक्रिय हैं। ताकि सतनाम संस्कृति स्पष्टत: पृथक नजर आए और कोई भी हो सहजता से जान समझ सके कि सतनाम संस्कृति  क्या हैं?उनमें व्याप्त धर्म,दर्शन साहित्य के अवयव मानव के लिये कितने उपयोगी हैं? 
इन्हीं प्रश्नों के उचित समाधान और हल हेतु वे सतत् साहित्य सृजन और व्यापक आयोजन में सतत सक्रिय हैं। नई कृति हेतु आपको एवं पारिवारिक सदस्यों को हार्दिक बधाई!

उम्र के इस पड़ाव में भी आपका साहित्य सृजन एवं सांगठनिक  योगदान प्रेरक और अविस्मरणीय रहेगा । उक्त स्तुत्य कार्य के कारण विमल यश कीर्ति के आप प्रतिभागी बनेंगे,ऐसी दृढ़ विश्वास हैं।
    आप सतत सृजनशील सुखी एवं दीर्घायु रहें। मंगलकामनाएं ।

     जय सतनाम 

डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
9617777514
    प्राध्यापक 
वीरांगना रमोतीन माड़िया आदर्श महिला महाविद्यालय नारायणपुर छत्तीसगढ़