छत्तीसगढ़ी भाषा के अमर पुरखा : हीरालाल चंद्रनाहु काव्योपाध्याय
(जनम अउ परिवार : एक परिचयात्मक अध्ययन)
An Immortal Forefather of Chhattisgarhi Language : Pandit Hiralal Kavyopadhyay (Birth and Family: An Introductory Study)
डॉ. अनिल कुमार भतपहरी, प्राध्यापक, वीरांगना रमौतीन माड़िया आदर्श महिला महाविद्यालय, नारायणपुर (छत्तीसगढ़)
ईमेल : anilbhatpahari@gmail.com
सारांश
प्रस्तुत शोध पत्र छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रथम व्याकरणाचार्य पंडित हीरालाल काव्योपाध्याय (1856–1890) के जनम, परिवार, शिक्षा, नौकरी, साहित्य सृजन अउ अमर कृति ‘छत्तीसगढ़ी व्याकरण’ के परिचयात्मक अध्ययन हे। मात्र 34 बरस के अल्प आयु में ओमन सात कृतियों के सृजन करिन, जेकर में ‘छत्तीसगढ़ी व्याकरण’ (1890) अइसे ऐतिहासिक ग्रंथ हे जेकर अनुवाद महान भाषाशास्त्री सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने ‘जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल’ में प्रकाशित कराइन। शोध पत्र में ओमन के बहुभाषी प्रतिभा, राजा सौरेंद्र मोहन टैगोर अउ बंगाल संगीत अकादमी ले मिले सम्मान, ‘काव्योपाध्याय’ उपाधि के प्रसंग अउ आज के संदर्भ में छत्तीसगढ़ी भाषा के स्थिति के विवेचन करे गे हे।
मुख्य शब्द : हीरालाल काव्योपाध्याय, छत्तीसगढ़ी व्याकरण, जॉर्ज ग्रियर्सन, काव्योपाध्याय उपाधि, छत्तीसगढ़ी भाषा
1. प्रस्तावना: हिंदी ले पहिली छत्तीसगढ़ी म व्याकरण लिख के छत्तीसगढ़ी ल देश दुनियां एक अलगे पहचान देय के बड़का उदीम आज़ादी के पहली होय रहिस। यदि भाषा विज्ञानी मन के अनुसार शासन- प्रशासन चले त लोकतंत्र म जनता के सच म भला हो सकत हे। फेर ब्यूरोक्रेट और सत्तापक्ष अपन पार्टी नीति के प्रतिबद्धता के कारण देश में हिंदी/ अंग्रेजी ल थोप देय से जन भाषा धिरलघहा महत्व हीन होके नन्दा जाही ।
उही ल बचाय सेती हीरालाल जैसे हीरा होईन आज ओकर जयंती हावय तब तारीख
2. जनम अउ परिवार
हीरालाल जी के जनम सन् 1856 में होइस। ओमन के मूलगांव राखी (भाठागांव), तहसील कुरुद, जिला धमतरी माने जात हे। ओमन के पिता के नाम बालाराम अउ माता के नाम राधाबाई रहिन। चंद्रनाहु कुर्मी अर्थात चंद्राकर परिवार में जनमे हीरालाल जी अपन विद्वता अउ साहित्य साधना से अइसे ऊँचाई पाइन कि ओमन के नाम संग जाति नहीं, बल्कि ओमन के काम जुड़थे।
3. पढ़ई अउ नौकरी
हीरालाल जी के प्राथमिक शिक्षा रायपुर से होइस अउ सन् 1874 में जबलपुर से मैट्रिक के शिक्षा उत्तीर्ण करिन। सन् 1875 में मात्र उन्नीस साल के उमर में जिला स्कूल में सहायक शिक्षक नियुक्त हो गइन। धमतरी के एंग्लो वर्नाकुलर टाउन स्कूल में ओमन ल हेडमास्टर के स्थायी नौकरी मिलिस। एकर पहिले कुछ दिन वो बिलासपुर में भी पदस्थ रहिन। वो धमतरी नगरपालिका अउ डिस्पेंसरी कमेटी के अध्यक्ष भी रहिन। अपन मेहनत से वो खुद उर्दू, उड़िया, बंगला, मराठी अउ गुजराती भाषा के अभ्यास करिन।
4. साहित्य सृजन अउ सम्मान
सन् 1881 में ओमन के कृति ‘शाला गीत चंद्रिका’ के नवल किशोर प्रेस, लखनऊ ने प्रकाशित करिस। ये कृति बर बंगाल के राजा सौरेंद्र मोहन टैगोर ने ओमन ल सम्मानित करिन। 11 सितंबर 1884 के राजा टैगोर ने फिर स्वर्ण पदक देकर ओमन ल सम्मानित करिस। ये सम्मान ओमन के कृति ‘दुर्गायन’ बर मिलिस। दुर्गा सप्तशती ल दोहा में प्रस्तुत करे के ये विशिष्ट काम बर ही राजा टैगोर ने स्वर्ण पदक दिस। ये कृति बर बंगाल संगीत अकादमी के द्वारा ओमन ल ‘काव्योपाध्याय’ के उपाधि से विभूषित करे गिस। बच्चन बर ओमन ‘बालोपयोगी गीत’ भी लिखिन जे संगीतबद्ध रहिस, जेला भी बंगाल संगीत अकादमी ने पुरस्कृत करिस। रोगग्रस्त रहत-रहत भी ओमन ‘गीत रसिक’ कृति के रचना करिन। अंग्रेजी में ओमन के कृति ‘रॉयल रीडर क्रमांक 1 अउ 2’ भी प्रकाशित होइस।
5. अमर कृति : छत्तीसगढ़ी व्याकरण
ओमन के सातवीं अउ अंतिम कृति ‘छत्तीसगढ़ी व्याकरण’ हे। कहे जात हे कि रचनाकार मन में से अधिकांश ने जीवन के संध्या में अपन श्रेष्ठतम कृति के सृजन करे हें। हीरालाल जी जीवन भर के अनुभव के ताकत से छत्तीसगढ़ी व्याकरण ल तैयार करत रहिन। ये कृति जब 1885 में लिखे गिस, तब खड़ी बोली के कोई सर्वमान्य अउ प्रामाणिक व्याकरण नहीं रहिस। सन् 1890 में प्रकाशित ‘छत्तीसगढ़ी व्याकरण’ ऐसी कृति हे जेकर अनुवाद महान भाषाशास्त्री सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने ‘जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल’ के जिल्द तीस, भाग 1 में प्रकाशित कराइन। ओमन के अभिमत रहिस कि ये ग्रंथ भारतीय भाषाओं पर प्रकाश डाले के प्रयास करे वाला मन बर प्रेरणास्पद हे। बाद में ये कृति के संशोधन करके पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय ने मध्यप्रदेश शासन से प्रकाशित कराइन। ग्रियर्सन ने ये कृति ल दो भाग में प्रकाशित करिस — एक में विशुद्ध व्याकरण अउ दूसर में मुहावरे, कहावतें, पहेलियां, लोकगीत, कथा, कहानी इत्यादि। ग्रियर्सन ने आभार व्यक्त करत हुए लिखिस कि हीरालाल जी जैसे विद्वान मन के कारण ही वो भिन्न-भिन्न भाषाओं के बीच सेतु बनाए के अपन प्रयास में सफल हो पाथें। हरि ठाकुर ने लिखे हे कि ओमन के कुछ कविताओं के इटालियन भाषा में सिग्नोर कैनिनी ने अनुवाद भी करे हे।
6. अल्प आयु में महान काम
मात्र 34 साल के उमर में अक्टूबर 1890 में ओमन के देहांत हो गिस। मगर हीरालाल काव्योपाध्याय अपन रचनाओं के कारण अमर हें। छत्तीसगढ़ी भाषा के जउन व्याकरण आज अंग्रेजी में अनुवादित होके लगातार चर्चा में हे, वो एक ऐसे छत्तीसगढ़िया महापुरुष के देन हे जेकर नाम संग ओमन के जाति नहीं जुड़थे, बल्कि ओमन के काम जुड़थे।
7. आज के संदर्भ
आज छत्तीसगढ़ी के पहली व्याकरणाचार्य हीरालाल चंद्रनाहु काव्योपाध्याय जी के जयंती हे। हिंदी ले पहली छत्तीसगढ़ी के व्याकरण बना के उन्मन इतिहास रचिस, फेर देवनागरी लिपि के कारण छत्तीसगढ़ी के अलग पहचान नई बन पाइस, ये हर बड़ दुःख के बात आय। जबकि देवनागरी में संस्कृत, हिंदी, मराठी, यहाँ तक की विदेश के नेपाली तकों अपन पहचान बना लिस। शब्द-ध्वनि, प्रवृत्ति, प्रकृति अलगे होय के बाद भी ब्रज-अवधी कस हिंदी में संघेर के इहा भाषाई उपनिवेश उदीम प्रायोजित ढंग से चलत हे। एकरे सेती राजभाषा होय के बाद भी छत्तीसगढ़ी में न राजकाज होत हे, न शिक्षा के माध्यम बन सकत हे। रोजी-रोजगार तो बढ़ दूर के बात हे। पुरखा के सुरता करत प्रदेश के भाषा, कला अउ साहित्य के माध्यम ले मान-सम्मान बर सबझन ल उमिहाये ल परही। जय छत्तीसगढ़, जय जोहार!
8. निष्कर्ष
हीरालाल काव्योपाध्याय छत्तीसगढ़ी भाषा के अमर पुरखा हें। मात्र 34 बरस के जीवन में ओमन सात कृतियों के सृजन करिन अउ ‘छत्तीसगढ़ी व्याकरण’ जइसे ऐतिहासिक ग्रंथ देके छत्तीसगढ़ी ल भाषाशास्त्रीय प्रतिष्ठा दिलाइन। ग्रियर्सन जइसे विश्वविख्यात भाषाशास्त्री के द्वारा ओमन के कृति के अनुवाद अउ प्रशंसा ये साबित करत हे कि छत्तीसगढ़ी एक समृद्ध अउ स्वतंत्र भाषा हे। आज ओमन के जयंती के अवसर में ये संकल्प लेना जरूरी हे कि पुरखा के सुरता ल जीवंत रखत छत्तीसगढ़ी भाषा, कला अउ साहित्य के मान-सम्मान बर सबझन मिलके उमिहाहीं।
प्रमुख रचनाएं
शाला गीत चंद्रिका (1881)
दुर्गायन
बालोपयोगी गीत
रॉयल रीडर भाग 1 (अंग्रेजी में)
रॉयल रीडर भाग 2 (अंग्रेजी में)
गीत रसिक
छत्तीसगढ़ी व्याकरण (1890)
संदर्भ
हीरालाल काव्योपाध्याय, छत्तीसगढ़ी व्याकरण, 1890 (संशोधित संस्करण : पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय, मध्यप्रदेश शासन)।
ग्रियर्सन, जॉर्ज, जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल, जिल्द 30, भाग 1 (छत्तीसगढ़ी व्याकरण के अनुवाद सहित)।
ठाकुर, हरि, छत्तीसगढ़ी साहित्य संबंधी लेखन (सिग्नोर कैनिनी द्वारा इटालियन अनुवाद के उल्लेख सहित)।
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