Tuesday, September 1, 2026

सतनाम धर्म : संकट और समाधान

सतनाम धर्म सतनामी समाज के इतिहास का सबसे जटिल और अनसुलझा सवाल है। प्रशासन की नज़र में सतनाम पंथ या धर्म के अनुयाई " सतनामी" हैं और वह एक जाति हैं जो कि अनुसूचित जाति के कालम 14 के सम्मिलित जातियों के समूह में से एक हैं। जबकि धरातल में देखें तो यह बिल्कुल अलग हैं क्योंकि सतनामी जाति नहीं बल्कि भारत वर्ष में प्रथम जातिविहीन समुदाय हैं इनके अनुयाई कृषक हैं और इनका अपना कोई पारंपरिक पेशा ही नहीं जिसके आधार पर नामकरण या पहचान स्थापित हो सकें।
   जैसे कबीर पंथ, में अनेक जातियां हैं वे संत कबीरदास को सुनते/मानते  तो हैं परंतु उन सबकी जातियां, जन्म से मरण तक की रीति- नीति, अलग- अलग हैं। परन्तु सतनामियों में ऐसा नहीं हैं। अनेक जाति के लोग यहां एकजतियां हैं। सगोत्र विवाह छोड़कर किसी से भी विवाह कर सकता हैं, कोई बंधन नहीं। वैसे ही इनकी उपासना,व्रत उत्सव एवं विविध आयोजन भी हिंदुओं से 
   सतनामियों की इस व्यवस्था से यहाँ के शासन- प्रशासन हतप्रभ हुआ कि ऐसे कैसे? और इसे कैसे अपनी संवैधानिक ढांचा में स्थान दे? तब बिना कोई माथापच्ची किए इसे एक उप जाति की संज्ञा दे दी गई और इनके साथ होते भेदभाव के आधार पर शेड्यूल कास्ट में सम्मिलित कर दिए गए। तत्कालीन समय पर जैसा भी हो एक व्यवस्था में आए और राष्ट्र निर्माण में सहयोग करे की भावना से हमारे गुरुओं संतो महंतो ने आम सहमति प्रगट की।

छत्तीसगढ़ में सतनामी समाज की परिस्थिति दो हिस्सों में समझना होगा - 
ऐतिहासिक तथ्य 
1. मराठा काल में  स्वतंत्र धर्म  था और हिंदुओं से पृथक पहचान थी। इसलिए  ब्रिटिश काल में सेपरेट रिलीजन के रुप में दस्तावेजों में दर्ज हुई।
गुरु घासीदास जी ने 1795 में सतनाम पंथ की स्थापना मनुस्मृति आधारित जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवादी प्रभुत्व को नकार कर की थी। एकेश्वरवाद, सतनाम, सामाजिक समानता इसका मूल था।  हिंदूओ की बहुदेव वादी पूजा उपासना पद्धति से पृथक होने के कारण ही अपने उद्भव के कुछ वर्ष बाद मराठा काल में स्वतंत्र धर्म के रुप में प्रतिष्ठित हो गया चुका था। व्रत उत्सव मेले इत्यादि पृथक ही थे और उन्हें लोक मान्यता मिली हुई थी।
2 ब्रिटिश काल: जब मराठा भोसला शासन खत्म हुआ और छत्तीसगढ़ सूबा अंग्रेजों के अधीन हुए तब छत्तीसगढ़ सेटलमेंट का कार्य आरम्भ हुआ और अनेक तरह के सर्वेक्षण , जनगणना, गजेटियर आदि निर्माण हुआ। तब उनमें सतनामियों की सामाजिक स्थिति, रीति नीति, संस्कृति के संदर्भ में लेखन हुआ। 
उक्त दोनों तथ्य जिसमें लोक मान्यताओं और दस्तावेजों से हमें वास्तविक जानकारियां प्राप्त होती हैं। इसमें एक बात स्पष्ट और रेखांकित हैं कि 
   "ब्रिटिश जनगणना में सतनामी को लंबे समय तक हिन्दू से अलग गिना गया। 1911, 1921, 1931 की जनगणना में Depressed Classes के साथ-साथ Satnami को अलग धार्मिक समूह के रूप में दिखाया जाता था।" यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

 इसी अलग पहचान को खत्म करने और उन्हें हिंदुओं में समेटने के लिए 1920 के दशक में Satnami -Hindu Mahasabha बनी।  
    आइए ऐसा क्यों हुआ और किसलिए ब्रिटिश इंडिया में हिंदू महासभा संगठन अस्तित्वमान हुआ, यह समझते है।
अखिल भारत हिन्दू महासभा का बनना एक दिन की घटना नहीं, 3 चरणों में हुआ:

1. जड़ - पंजाब हिन्दू सभा 1907-1909
ब्रिटिश काल में मुस्लिम लीग (1906) के बनने के बाद 1907 में लाला लाजपत राय, लालचंद जैसे नेताओं ने लाहौर में पंजाब हिन्दू सभा बनाई।

2. औपचारिक स्थापना - 1914-1915 हरिद्वार
1910 में इलाहाबाद के प्रमुख हिन्दुओं ने अखिल भारतीय सम्मेलन करने का फैसला किया। पंडित मदन मोहन मालवीय के प्रयास से 1914 में इसकी तैयारी हुई और 13-14 अप्रैल 1915 को हरिद्वार कुंभ में सर्वदेशक हिन्दू सभा के नाम से पहला अधिवेशन हुआ। इसी को आज हिन्दू महासभा का स्थापना दिवस माना जाता है। इस दिन का नाम 'सर्वदेशक हिन्दू सभा' था, जिसे अप्रैल 1921 में बदलकर 'अखिल भारत हिन्दू महासभा' कर दिया गया।  

3. राष्ट्रीय पार्टी बनना - 1920 के बाद
1920 के दशक में मालवीय, लाला लाजपत राय के नेतृत्व में यह सक्रिय हुई। 1927-28 में मुंजे, बाद में 1937 से वीर सावरकर इसके अध्यक्ष रहे और इसने हिंदुत्व को राजनीतिक सत्ता प्राप्ति के सिद्धांत और पाथेय बनाया।


छत्तीसगढ़ में 1932 के आसपास "हिंदू-सतनामी महासभा" का कार्य प्रगति पर था क्योंकि यह क्षेत्र cp & barar के केंद्र नागपुर से करीब था और एक तरह से छत्तीसगढ़ को प्रयोग स्थली के रूप में लिया गया था।
अखिल भारतीय महासभा की ही एक प्रांतीय/सामाजिक शाखा थी। जैसा कि 1920 के दशक में Satnami Mahasabha बनी थी और उस पर हिन्दू राष्ट्रवादी प्रभाव था।  रायपुर में 1921 में सतनामी आश्रम की स्थापना हुई और यही से सतनामियों का राजनैतिक रुप से हिंदूकरण करने की प्रक्रिया आरंभ हुईं। 

आगे चलकर 1930-32 में गुरु अगमदास जी के माध्यम से कुछ महंतों के साथ मिलकर "हिन्दू-सतनामी" के रूप में संगठित किया गया, ताकि सतनामियों को अलग धर्म की जनगणना से निकालकर हिन्दू जनगणना में गिना जा सके।



इस तरह 1932 के आसपास "हिंदू-सतनामी महासभा" का यहाँ बेहद प्रभाव पड़ा। इसके समान्तर कोई और संगठन भी नहीं था जो सतनामियों को उचित मार्गदर्शन करा सकें।महाराष्ट्र के एक ब्राह्मण हिंदू राष्ट्रवादी बाबा रामचंद्र का प्रभुत्व था, जिन्होंने सतनामी इतिहास को ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण से पुनर्लेखन भी किया।  तब से यह पंथ ईश्वर (सत्पुरुष)आश्रित हो भाग्य भगवान के चक्रव्यूह में फंस कर रह गया।

इसी समय गुरु घासीदास के वंशज अगमदास जी (Minimata के पति, विवाह 1932 में) और उनके साथ जुड़े महंतों ने राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। आपने 72 महंतों का जो आंकड़ा दिया, वह इसी पारिवारिक-महंती संरचना से जुड़ा है, जिसने बाद में कांग्रेस के साथ मिलकर आंदोलन को राजनीतिक दिशा दी।  

1930 के बाद दो दबाव एक साथ आए - मुस्लिम लीग का अलग निर्वाचक मंडल का दावा और डॉ. अम्बेडकर का शेड्यूल कास्ट फेडरेशन। इस राजनीतिक समीकरण में हिंदू महासभा और कांग्रेस दोनों को लगा कि यदि सतनामी अलग धर्म के रूप में रहे तो हिंदू आबादी का बड़ा हिस्सा अलग हो जाएगा। इसलिए उन्हें रणनीतिक रूप से हिंदू फोल्ड में लाया गया।
2. आरक्षण और "अकारण हिन्दू" की आपकी पीड़ा
आपकी यह बात तथ्यतः सही है कि सतनामी छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा अनुसूचित जाति समुदाय है। संविधान के 1950 के राष्ट्रपति आदेश के अनुसार अनुसूचित जाति का आरक्षण केवल उन्हीं को मिलता है जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म मानते हैं।

इसीलिए एक कानूनी पेंच बनता है:
• यदि सतनामी अपने आप को ब्रिटिश काल की तरह सेपरेट रिलीजन घोषित करते हैं, तो तकनीकी रूप से वे SC लिस्ट से बाहर हो सकते हैं, जैसे आज दलित ईसाई और दलित मुस्लिम बाहर हैं। • यदि हिंदू बने रहते हैं, तो जैसा आपने कहा, आबादी में 10-12% होने के बावजूद आरक्षण का लाभ 2% से भी कम लोग ले पाते हैं, जबकि सामाजिक-धार्मिक आयोजनों, मंदिर प्रवेश, सहभोज में आज भी भेदभाव के मामले सबसे ज्यादा दर्ज होते हैं। NCRB के आंकड़ों में छत्तीसगढ़ में SC उत्पीड़न के मामलों में बड़ा हिस्सा सतनामी समुदाय से जुड़ा रहा है। 
यही वह "ऊहापोह" है जिसका आपने जिक्र किया - धर्म से बाहर तो आरक्षण खतरे में, धर्म में तो समानता नहीं।
3. आगे का रास्ता क्या हो सकता है?
दोनों पक्षों के लिए व्यावहारिक समाधान के लिए इतिहास में उदाहरण हैं:

क) यदि स्वतंत्र धर्म की मांग करनी है: तो लिंगायत, सारना धर्म की तरह मांग रखनी होगी कि "धर्म स्वतंत्र हो, पर सामाजिक पिछड़ापन और अस्पृश्यता का इतिहास वही रहा है, इसलिए SC का दर्जा धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक उत्पीड़न के आधार पर जारी रहे।" इसके लिए राज्य अल्पसंख्यक आयोग और केंद्र को ऐतिहासिक दस्तावेज - ब्रिटिश जनगणना, 1920 की महासभा के रिकॉर्ड, गुरु घासीदास की वाणी (अमृतवाणी) - के साथ प्रस्ताव देना होगा।

ख) यदि हिंदू के भीतर रहकर समानता चाहिए: तो जैसा आपने कहा, हिंदू धर्माचार्यों को औपचारिक रूप से सतनाम पंथ को वैष्णव, शैव की तरह ही एक स्वतंत्र पंथ-परंपरा मानकर आचार्य स्तर पर भागीदारी देनी होगी। केवल राजनीतिक हिंदू न कहकर धार्मिक-रिवाजों में समानता दिखानी होगी।

प्रशासनिक रूप से छत्तीसगढ़ सरकार "सतनामी" को SC लिस्ट में रखते हुए भी कॉलम में "धर्म - सतनाम" लिखने की व्यवस्था कर सकती है, जैसा कई राज्यों में "रविदासिया, वाल्मीकि" के लिए किया जाता है। इससे पहचान भी बची रहेगी और आरक्षण भी।

 निष्कर्ष  - उक्त सम्यक अध्ययन से यह बातें और तथ्य स्पष्ट होती हैं कि "जब तक सतनामी को या तो पूरी तरह हिंदू मानकर बराबरी नहीं दी जाती, या पूरी तरह स्वतंत्र धर्म मानकर उसका सम्मान और संवैधानिक सुरक्षा दोनों नहीं दी जाती, तब तक यह द्वंद्व चलता रहेगा।" 
        अत: आज़ादी के इतने वर्षों बाद एक विराट समुदाय जिनकी अपनी स्वतंत्र धर्म होने के बाद भी उसे जाति लिखने और जो धर्म लिख रहें हैं उस धर्म में मान्यता नहीं समाहार नहीं ऐसी विषम परिस्थितियों का शिकार होना पड़ रहा हैं आखिर यह दुविधा भ्रम कब तक चलता रहेगा? 
   जय सतनाम 

डॉ.अनिल कुमार भतपहरी 9617777514

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