Friday, July 10, 2026

सतनाम धर्म - संस्कृति के संवाहक समुदाय संगठित हो।

सतनाम धर्म -संस्कृति के संवाहक संगठित हो 

भारतीय संस्कृति  में अनेक जाति ,वर्ण , पंथादि हैं। इसलिये उनमें अनेक मत -मतांतर  हैं परंतु उनके बीच एक अंतर्संबंध भी हैं। गहराई से विचार करने पर वे सब उजागर होते हैं। ज्ञात इतिहास से अवगत होते हैं कि बौद्धिक चेतना के केंद्र में बुद्ध  हैं। 
       पूर्व मान्यताओं के इतर उनकी शिक्षा में ईश्वर आत्मा स्वर्ग नर्क नहीं हैं बल्कि मानवता हैं और मानव समुदाय में परस्पर  सौहार्द्र पूर्वक जीवन निर्वाह हेतु सुगम मध्यम मार्ग हैं। उनके उपदेश ध्यान योग समाधि निर्वाण त्रिपिटक धम्मपद आदि ही महायान हीनयान तंत्रयान ब्रजयान होते सहजयान जैसे शाखाओं प्रशाखाओ में अस्तित्व मान हुई।

    कालांतर में सहजयानी सतनामियों के "निर्वाण ग्रन्थ"  कबीर का बीजक, गोरख वाणी ,रैदास रामायण ,नानक सलोकु सहित सबके सार" गुरु ग्रंथ साहिब" ,गुरुघासीदास की अमृतवाणी से छत्तीसगढ़ में "सतनामयन , सतनाम -संकीर्तन जैसे निर्गुण ग्रंथ/साहित्य सृजित हुआ। इनसे विकसित "सतनाम दर्शन "भारतीय षट्दर्शन में वर्ण, जाति विहीन समुदाय हेतु "सप्त दर्शन"  के रुप में प्रतिष्ठित हो रहे हैं।
सिख धर्म में गुरुद्वारा में साध संगत का अत्यंत महत्व हैं वहां साध सतनामी का आदर दर्शनीय हैं। 
  सत्य दर्शन नामक प्रतिष्ठान विगत 50 वर्षों से साहित्यिक एवं बौद्धिक जगत में  लोकप्रिय हैं। सत्य ध्वज, सत्यालोक और सतनाम संदेश जैसे पत्रिकाएं संतो गुरुओं की सीख और उपदेश को लिपिबद्ध कर संरक्षित करने की अनुपम कार्य किए।अब अनेक संस्थान उनके अनुरुप कार्य करने प्रतिबद्ध हैं।
   अब समय हैं कि बुद्ध से लेकर गुरुघासीदास तक 2500 वर्षों की ज्ञान -विज्ञान, साधना -सिद्धी , साहित्य -दर्शन कलाएं जो परम सत्य और सदा मानव को सदमार्ग दिखाने वाले सनातन संस्कृति  के अभिन्न अंग हैं ।इनके प्रवर्तक एवं संवाहक गुरुओं /संतो की अनुयाई जो देश विदेश में करोड़ों की संख्या में विद्यमान हैं वे सभी एकत्र और संगठित हो।  ताकि समानता से युक्त सतनाम की अजस्त्र धारा अविरल प्रवाहित होता रहें। इनके अनुयाई जो कृषक, उत्पादक श्रमण हैं ।वह सामंती  एवं अधिनायक वाद के शोषण दमन आदि से मुक्त रहें । 
      जय सतनाम