Friday, July 31, 2026

प्रेमचंद: बेहतर व्यक्ति, समाज और देश

प्रेमचंद : बेहतर व्यक्ति से बेहतर समाज और बेहतर देश

                              - डॉ. अनिल कुमार भतपहरी

गोदान, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि, प्रेमाश्रम जैसे दर्जनों उपन्यास और कफ़न, नमक का दरोगा, ईदगाह, पंच परमेश्वर, पूस की रात, ठाकुर का कुआँ जैसी तीन सौ से अधिक कहानियों के रचयिता, बीसवीं सदी के आरंभिक उत्तर भारतीय जन-जीवन के कुशल चितेरे, कथा सम्राट प्रेमचंद को उनकी जयंती पर सादर नमन।

प्रेमचंद की जयंती केवल एक स्मरण नहीं, आत्मावलोकन का अवसर है। प्रश्न यह है कि उनकी भाषा और भाव के निरंतर हो रहे क्षरण को हम कैसे रोकें?

आज हिंदी के सामने दोहरा संकट है। एक ओर उसे जानबूझकर इतना क्लिष्ट बनाया जा रहा है कि वह जन-विमुख हो जाए, दूसरी ओर वैश्विक होने के नाम पर टपोरी हिंग्लिश में गुड़गुड़ाया जा रहा है। प्रेमचंद ने इन दोनों अतियों के बीच का मध्यम मार्ग दिखाया था। उनकी भाषा सरल थी, पर सस्ती नहीं थी। उसमें उर्दू की रवानी, हिंदी की गरिमा और देशज की ठेठकता का अद्भुत संगम था, जिसे किसान भी समझ लेता था और विद्वान भी नकार नहीं पाता था। आज वही मध्यम मार्ग टूट रहा है।

दूसरा बड़ा प्रश्न यह है कि हम उनके यथार्थ-चित्रण से आदर्श गढ़ने में कहाँ चूक रहे हैं? प्रेमचंद यथार्थ दिखाकर छोड़ते नहीं थे। वे उस यथार्थ में से करुणा, परोपकार, सौहार्द और सहिष्णुता का आदर्श निकालते थे। पंच परमेश्वर में स्वार्थी व्यक्ति भी पंच की कुर्सी पर बैठते ही न्यायी हो जाता है। आज हम यथार्थ के चित्रण पर ही अटक गए हैं। मीडिया और बाजार के लिए विद्रूपता को और चटख बनाकर परोसा जाता है, पर उसमें सुधार का भाव गायब है।

यह सोचना भी जरूरी है कि क्या आज का लेखक स्वतंत्र है? क्या वह प्रेस और पत्रिका मालिकों की कृपा से ही छपेगा और उनके इशारे पर ही रचेगा? प्रेमचंद ने स्वयं सरस्वती प्रेस चलाते हुए घाटा सहा, पर समझौते से इनकार किया। आज जब लेखक को छपने से पहले यह सोचना पड़े कि प्रायोजक को यह बर्दाश्त होगा या नहीं, तो साहित्य सम्मेलन विलुप्ति की कगार पर पहुँचेंगे ही।

आज की स्थिति और भी चिंताजनक है। गुलामी के दौर में जब प्रेमचंद ने समाज की विद्रूपताओं को उजागर किया, तब उद्देश्य सुधार था। आजादी के सौ वर्षों के भीतर वह करुणा और सहिष्णुता धनीभूत होनी चाहिए थी, पर वह क्षीण क्यों हो रही है? समाहार की जगह छंटने, कटने और बंटने की नौबत क्यों आ रही है? क्यों हमारा यथार्थ-बोध और प्रगतिशील दृष्टिकोण इतनी जल्दी कथित धार्मिक, सांप्रदायिक और जातीय विद्वेष की गिरफ्त में आ जाता है? हम सीमा पार के खतरे को तो देखते हैं, पर धार्मिक अंतर्कलह और जातीय वैमनस्य के भीतर के खतरे से अनभिज्ञ क्यों हैं?

एक और द्वंद्व हमारे सामने है - आधुनिक विज्ञान और तकनीक बनाम पारंपरिक मिथकीय अवधारणाएँ। क्या उन्नत विचार लोक-परलोक की कहानियों के समक्ष घुटने टेक देंगे? आज का सृजनशील कथाकार पारंपरिक कथावाचकों के भव्य पंडालों में मूक दर्शक बना भजन-कीर्तन में रमा है, इहलोक की चिंता छोड़ परलोक सुधारने में निमग्न है, क्योंकि वहाँ भीड़ है, भव्य आयोजन हैं और बड़े प्रायोजक हैं।

साहित्यकारों के सम्मेलन के कोई आयोजक-प्रायोजक नहीं हैं, क्योंकि वहाँ यथार्थ बर्दाश्त नहीं होता, सत्य लिखने-पढ़ने-बोलने का साहस नहीं होता। प्रायोजित हास्य-व्यंग्य कवि सम्मेलन मंच पर आयोजकों के प्रशस्ति-वाचन और चुटकुलेबाजी को कतई साहित्य नहीं कहा जा सकता। उनसे कोई अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ता। वहाँ भी 20-20 क्रिकेट की तरह केवल ताली और आह-वाह है। वहाँ भी टीमें हैं और कॉरपोरेट घराने कवियों की क्रिकेटरों की तरह खरीद-फरोख्त कर रहे हैं।

ऐसे में डिजिटल माध्यम ने एक नई आशा जगाई है। उसने प्रकाशक की दहलीज वाला पुराना ताला तोड़ दिया है। आज कोई भी युवा गाँव में बैठकर सीधे पाठक से जुड़ सकता है। पर यहाँ भी सेंसरशिप का रूप बदल गया है। पहले संपादक रोकता था, अब एल्गोरिदम रोकता है। एल्गोरिदम को सन्नाटा बर्दाश्त नहीं, उसे तुरंत हँसी या गुस्सा चाहिए। प्रेमचंद का साहित्य धीरे पकने वाला साहित्य है। पूस की रात में हल्कू और जबरा का खेत में ठंड से सिकुड़ना किसी रील में फिट नहीं होता। उसे पढ़ने के बाद सन्नाटा चाहिए।

इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम डिजिटल को केवल छापने की मशीन न समझें, बल्कि उसे अड्डा बनाएँ, जहाँ बहस हो, टोका-टाकी हो, और एक पाठक के खत को हजार लाइक्स से बड़ा माना जाए।

अंततः प्रेमचंद का संदेश अत्यंत सरल है और वही इस आलेख का निष्कर्ष भी है - बेहतर व्यक्ति से बेहतर समाज बनता है और बेहतर समाज से बेहतर देश। प्रेमचंद जयंती पर यही संकल्प हमें करना है।

जय हिंद, जय हिंदी।

     - डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
            प्राध्यापक हिंदी 
वीरांगना रमौतीन माड़िया आदर्श महिला महाविद्यालय नारायणपुर 

चूल और हुदेसना

#anilbhattcg 

चूल और हुदेसना 

पांच हांडी में भात तीन हांडी में दाल पक रहें हैं एक उतर गया हैं या चढ़ाए नहीं हैं। यह नौ मुंहा चूल हैं इसमें लंबी पतली लकड़ी एवं छेना (कंडा) डाला गया हैं। एक लंबी सीधी लकड़ी जिसे हुदेसना कहते हैं बीच- बीच में हुदेसते रहते हैं ताकि आगी रमरम जलता रहें। हुदेसना का आगे का सिरा भी आग से दहकता रहता हैं । इसके द्वारा चूल के किनारे एवं दूर तक जहां आग या आँच न पहुँचे वहां भी ले जाकर जलाया जाता हैं। अधजले छेने को अलटे -पलटे जाते हैं।
       गुरु घासीदास की अंतिम अमृतवाणी इसी हुदेसना के दृष्टांत से जुड़ा हुआ हैं-
     "कोनों मोला कारकों ले बड़े झन कइहा,काबर ओहा मोला हुदेसना म हुदेसन आय।"

चित्र: चूल अब यह विलुप्ति की ओर  हैं हाड़ी तो नंदा ही गए हैं ।इसमें एल्मुनियम की बांगा चढ़े हैं।बचपन में अपने गाँव जुनवानी के बाड़ी में यह चूल  भंडार तेलासी दसरहा,सिरपुर मेला ,शादी ब्याह के समय सगा आने और दादी की दशगात्र ( 1981) पिताश्री के दशगात्र( 2000 )में  देखते रहें हैं। मिट्टी की काली हाड़ी में तेल चुपर कर अंधना देते थे , पके  चावल ( भात)को झौंहा में उलेड़ कर पसाते फिर फरहर भात का झाल बनते थे। इसकी अनुष्ठानिक पूजा कर झाल से  भात वितरण किए जाते थे।
    वैसे झाल के भात का प्रहरी (रखवार) भतप्रहरी हुआ इस तरह गोत्र आया ऐसा एक लोक मान्यता हैं परन्तु भट्टप्रहरी ही अपभ्रंश होकर भतपहरी हुआ हैं।

Thursday, July 30, 2026

वर्षा गीत

येति ओती चारो कोती
 बरसय पानी बन मोती 

घुरगे खपरा चुहत हे छानी
झन पूछ खदर के कहानी 
रदरद रेला बोहे टीपटीप चले ओरवाती 

डोली धनहा  छलकन लागे 
नरवा तरिया उफनन लागे 
चोरोबोरो चारोंमुड़ा होगे चारोंकोती 
 
 बरसा म भींजे आठों अंग 
तन मन म छाए हवे उमंग 
रोपा बियासी मगन माते सवनाही 
 

Thursday, July 23, 2026

बौद्ध भिक्षुणी साधना स्थली: तुरतुरिया

बौद्ध भिक्षुणी साधना स्थली: तुरतुरिया 

सतनाम पंथ में एक साखी हैं। साखी वह जो कि मंगल भजन या पंथी भजन गाने के पूर्व सखियाए जाते हैं। साखी प्रमुखत: मुख्य गायक, पंडित, कड़िहार या कोई वादक भी हो सकते हैं। यह दो पंक्ति के होते हैं और उसके बाद क्षेपक गाकर सबकी मंगल कामना करते मंगल भजन/ पंथी भजन गाये जाते हैं।
उन्हीं अनगिनत साखियों में एक महत्वपूर्ण एवं पारंपरिक साखी हैं -
लक्ष्य कोस म गुरु बसे, सुरता  दिहव पठाय 
ज्ञान तुरी असवार हैं,गुरु छिन आवै पल जाय 
इसमें ज्ञान तुरी शब्द क्या हैं? इसे जानने समझने मेरा मन मथते रहा। कई लोग कहे यह तोर हैं तुरी नहीं।
गुरु ज्ञान में चढ़कर आते जाते हैं। कुछ विद्वान इसे ज्ञान तुरय यानि ज्ञान रूपी अश्व/ घोड़े पर चढ़कर सद्गुरु आते हैं।
तब मुझे बौद्ध धर्म के सहजानी सिद्धों की वाणियों में तुरी का मतलब समझ आया।  सिद्ध सरहपाद सहजयान के प्रवर्तक थे। प्राचीन पंथी निर्गुण और सिद्धवानी में हमें अनेक सिद्धों संतो की दोहा साखी शबद मंत्र उलट बासी आदि मिलते हैं। इन्हें कबीर से भी जोड़ते हैं।
(झारा खल्लारी महासमुंद निवासी भिक्षु रामेश्वरम जिनके दोनों पाँव रेलगाड़ी से कटे थे। वे युवावस्था में अपनी  माता जी की अस्थियां विसर्जन हेतु इलाहाबाद प्रयाग से वापस लौटते दुर्घटना ग्रस्त हो गए। जब स्वस्थ हुआ तब चेतना जागृत हो गए और वे बौद्ध धम्म अपनाकर भिक्षु होकर आजीवन गुरुघासीदास और तथागत बुद्ध की चेतना को प्रसारित करते रहे। वे हमारे दादा महंत नंदू नारायण भतपहरी और नाना द्वय नकुल देव ढीढी एवं कोंदा प्रसाद बघेल के मित्र रिश्तेदार और सहयोगी थे। उनसे मेरा साक्षात्कार वार्तालाप होते थे वे साधु वेश में नेपाल भूटान सिक्किम दार्जलिंग नागपुर इत्यादि बौद्ध स्थलों पर परिभ्रमण करते और बौद्ध विद्वानों से सत्संग वार्तालाप करते थे। उन्होंने ही मुझे पाली भाषा अक्षर इत्यादि की आरंभिक जानकारी दिए थे।
वे ज्ञान तुरी साधना के साधक और निर्भय एवं तटस्थ सा हो गए थे। उनकी पाली संस्कृत भाषा में अथ गुरु घासीदास चरितम अप्रकाशित पांडुलिपि था। जब मैं अध्यापक बना और पुस्तक आदि प्रकाशन की ओर ध्यान आकृष्ट हुआ तो उनके परिजनों से उक्त पांडुलिपि के बारे में जानकारियां ली परन्तु अपेक्षित जानकारी नहीं मिली। अन्यथा उनका प्रकाशन या सतनाम संदेश में किस्त में प्रकाशित करने की योजना असफल रहा।
   बाहरहाल तुरी साधना की एक अवस्था हैं। कबीर इस भाव को उन्मनी कहते हैं। मुझे लगता हैं यह तुरी साधना सिद्धि के कारण ही सिरपुर समीप सुरम्य तुरतुरिया का नाम हुआ। जहां बौद्ध भिक्षुणियां रहती और तुरी तंत्र साधना करती लोक कल्याण करती थी।)

   तुरतुरिया छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण परन्तु कम चर्चित प्राचीन बौद्ध स्थलों में से एक है। साधना में तुरी एक अवस्था हैं इसे सहज प्राप्त करने का सिद्ध स्थल तुरतुरिया हैं। 
कहाँ स्थित है?
तुरतुरिया रायपुर से लगभग 84 किमी और बलौदाबाजार जिला मुख्यालय से 29 किमी दूर, कसडोल तहसील के बहरिया गाँव के पास बलभद्री नाले पर स्थित है । छत्तीसगढ़ के इतिहासकार/ साहित्यकार हरि ठाकुर जी ने इसे बालमदेही नदी नाम देकर तुरतुरिया को वाल्मीकि आश्रम और लवकुश जन्म स्थली लिखें हैं। यह सिरपुर से मात्र 23 किमी दूर है और बारनवापारा अभयारण्य के पास पहाड़ियों से घिरा एक मनोरम स्थल है। इसे स्थानीय लोग सुरसुरी गंगा भी कहते हैं।  
नाम तुरतुरिया क्यों पड़ा?
इसका नाम बलभद्री नाले के कारण पड़ा। नाले का जल चट्टानों के माध्यम से निकलता है तो बुलबुलों से तुरतुर की ध्वनि निकलती है, इसलिए नाम तुरतुरिया पड़ा। जल एक लंबी संकरी सुरंग से होकर प्राचीन ईंटों से बने कुंड में गिरता है, जहाँ गोमुख बना हुआ है।  
बौद्ध भिक्षुणी साधना स्थली क्यों कहा जाता है?
यही इसका सबसे खास पक्ष है।

1. बौद्ध विहारों के प्रमाण: ऐसा माना जाता है कि यहाँ बौद्ध विहार थे जिनमें बौद्ध भिक्षुणियों का निवास था। सिरपुर के समीप होने के कारण इस बात को अधिक बल मिलता है कि यह स्थल कभी बौद्ध संस्कृति का केंद्र रहा होगा।  

2. मूर्तियाँ और अवशेष: यहाँ कुछ प्राचीन बुद्ध की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं, कुछ भग्न मंदिरों के अवशेष भी मिलते हैं। इस स्थल पर बौद्ध, वैष्णव तथा शैव धर्म से संबंधित मूर्तियों का मिलना यह सिद्ध करता है कि यहाँ कभी तीनों संप्रदायों की मिली-जुली संस्कृति रही होगी।  

3. समयकाल: यहाँ से प्राप्त शिलालेखों की लिपि से अनुमान है कि यहाँ की प्रतिमाओं का समय 8-9वीं शताब्दी है, यानी सिरपुर के बौद्ध उत्कर्ष काल के समकालीन।  

4. स्त्री परंपरा आज भी जीवित: आज भी यहाँ स्त्री पुजारिनों की नियुक्ति होती है, जो प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा है। यह सीधे तौर पर भिक्षुणी परंपरा से जुड़ा माना जाता है। कई विद्वान मानते हैं कि जो विशाल बुद्ध मूर्ति यहाँ है, उसे जनसाधारण वाल्मीकि ऋषि के रूप में पूजता है।  
रामायण से जुड़ी मान्यता
जनश्रुति है कि त्रेतायुग में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यही था और लव-कुश की यही जन्मस्थली थी। इसलिए यह स्थल वाल्मीकि आश्रम के नाम से भी प्रसिद्ध है।
  इसके साथ ही बौद्ध साधना स्थली के पार्श्व पहाड़ के शीर्ष में मातागढ़ स्थापित हैं जहाँ दुर्गा की नई प्रतिमा एवं मंदिर बनाई गई है बकरे की बलि होती हैं। खासकर पौष पूर्णिमा में यहाँ मेला लगता हैं।
   जीव हिंसा एवं बलि प्रथा को बंद कराने गुरुघासीदास ने सतनाम पंथ के माध्यम से जनजागरण चलाया इस कारण परिक्षेत्र के सतनामियों ने यहां जैतखाम स्थापित कर उनके विचारों को जनमानस में प्रसारित करते आ रहे हैं। यह भी दर्शनीय हैं।

कब जाएँ?

पौष माह में यहाँ तीन दिवसीय मेला लगता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। धार्मिक और पुरातात्विक महत्व के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी यह पर्यटकों को आकर्षित करता है।  

यदि आप सिरपुर जाते हैं तो तुरतुरिया को एक ही दिन में कवर किया जा सकता है, यह बौद्ध इतिहास में छत्तीसगढ़ की भिक्षुणी संघ की भूमिका को समझने के लिए सबसे प्रामाणिक स्थलों में से एक है।

उक्त जानकारी AI से जनरेटेड हैं कुछेक तथ्य फोटोग्राफ मैंने प्रसंगानुकूल संयोजन किया हूं।
    डॉ. अनिल भतपहरी/ 9617777514

बौद्ध भिक्षुणियों की साधना स्थल : तुरतुरिया

बौद्ध भिक्षुणी साधना स्थली: तुरतुरिया 

सतनाम पंथ में एक साखी हैं। साखी वह जो कि मंगल भजन या पंथी भजन गाने के पूर्व सखियाए जाते हैं। साखी प्रमुखत: मुख्य गायक, पंडित, कड़िहार या कोई वादक भी हो सकते हैं। यह दो पंक्ति के होते हैं और उसके बाद क्षेपक गाकर सबकी मंगल कामना करते मंगल भजन/ पंथी भजन गाये जाते हैं।
उन्हीं अनगिनत साखियों में एक महत्वपूर्ण एवं पारंपरिक साखी हैं -
लक्ष्य कोस म गुरु बसे, सुरता  दिहव पठाय 
ज्ञान तुरी असवार हैं,गुरु छिन आवै पल जाय 
इसमें ज्ञान तुरी शब्द क्या हैं? इसे जानने समझने मेरा मन मथते रहा। कई लोग कहे यह तोर हैं तुरी नहीं।
गुरु ज्ञान में चढ़कर आते जाते हैं। कुछ विद्वान इसे ज्ञान तुरय यानि ज्ञान रूपी अश्व/ घोड़े पर चढ़कर सद्गुरु आते हैं।
तब मुझे बौद्ध धर्म के सहजानी सिद्धों की वाणियों में तुरी का मतलब समझ आया।  सिद्ध सरहपाद सहजयान के प्रवर्तक थे। प्राचीन पंथी निर्गुण और सिद्धवानी में हमें अनेक सिद्धों संतो की दोहा साखी शबद मंत्र उलट बासी आदि मिलते हैं। इन्हें कबीर से भी जोड़ते हैं।
(झारा खल्लारी महासमुंद निवासी भिक्षु रामेश्वरम जिनके दोनों पाँव रेलगाड़ी से कटे थे। वे युवावस्था में अपनी  माता जी की अस्थियां विसर्जन हेतु इलाहाबाद प्रयाग से वापस लौटते दुर्घटना ग्रस्त हो गए। जब स्वस्थ हुआ तब चेतना जागृत हो गए और वे बौद्ध धम्म अपनाकर भिक्षु होकर आजीवन गुरुघासीदास और तथागत बुद्ध की चेतना को प्रसारित करते रहे। वे हमारे दादा महंत नंदू नारायण भतपहरी और नाना द्वय नकुल देव ढीढी एवं कोंदा प्रसाद बघेल के मित्र रिश्तेदार और सहयोगी थे। उनसे मेरा साक्षात्कार वार्तालाप होते थे वे साधु वेश में नेपाल भूटान सिक्किम दार्जलिंग नागपुर इत्यादि बौद्ध स्थलों पर परिभ्रमण करते और बौद्ध विद्वानों से सत्संग वार्तालाप करते थे। उन्होंने ही मुझे पाली भाषा अक्षर इत्यादि की आरंभिक जानकारी दिए थे।
वे ज्ञान तुरी साधना के साधक और निर्भय एवं तटस्थ सा हो गए थे। उनकी पाली संस्कृत भाषा में अथ गुरु घासीदास चरितम अप्रकाशित पांडुलिपि था। जब मैं अध्यापक बना और पुस्तक आदि प्रकाशन की ओर ध्यान आकृष्ट हुआ तो उनके परिजनों से उक्त पांडुलिपि के बारे में जानकारियां ली परन्तु अपेक्षित जानकारी नहीं मिली। अन्यथा उनका प्रकाशन या सतनाम संदेश में किस्त में प्रकाशित करने की योजना असफल रहा।
   बाहरहाल तुरी साधना की एक अवस्था हैं। कबीर इस भाव को उन्मनी कहते हैं। मुझे लगता हैं यह तुरी साधना सिद्धि के कारण ही सिरपुर समीप सुरम्य तुरतुरिया का नाम हुआ। जहां बौद्ध भिक्षुणियां रहती और तुरी तंत्र साधना करती लोक कल्याण करती थी।)

   तुरतुरिया छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण परन्तु कम चर्चित प्राचीन बौद्ध स्थलों में से एक है। साधना में तुरी एक अवस्था हैं इसे सहज प्राप्त करने का सिद्ध स्थल तुरतुरिया हैं। 
कहाँ स्थित है?
तुरतुरिया रायपुर से लगभग 84 किमी और बलौदाबाजार जिला मुख्यालय से 29 किमी दूर, कसडोल तहसील के बहरिया गाँव के पास बलभद्री नाले पर स्थित है । छत्तीसगढ़ के इतिहासकार/ साहित्यकार हरि ठाकुर जी ने इसे बालमदेही नदी नाम देकर तुरतुरिया को वाल्मीकि आश्रम और लवकुश जन्म स्थली लिखें हैं। यह सिरपुर से मात्र 23 किमी दूर है और बारनवापारा अभयारण्य के पास पहाड़ियों से घिरा एक मनोरम स्थल है। इसे स्थानीय लोग सुरसुरी गंगा भी कहते हैं।  
नाम तुरतुरिया क्यों पड़ा?
इसका नाम बलभद्री नाले के कारण पड़ा। नाले का जल चट्टानों के माध्यम से निकलता है तो बुलबुलों से तुरतुर की ध्वनि निकलती है, इसलिए नाम तुरतुरिया पड़ा। जल एक लंबी संकरी सुरंग से होकर प्राचीन ईंटों से बने कुंड में गिरता है, जहाँ गोमुख बना हुआ है।  
बौद्ध भिक्षुणी साधना स्थली क्यों कहा जाता है?
यही इसका सबसे खास पक्ष है।

1. बौद्ध विहारों के प्रमाण: ऐसा माना जाता है कि यहाँ बौद्ध विहार थे जिनमें बौद्ध भिक्षुणियों का निवास था। सिरपुर के समीप होने के कारण इस बात को अधिक बल मिलता है कि यह स्थल कभी बौद्ध संस्कृति का केंद्र रहा होगा।  

2. मूर्तियाँ और अवशेष: यहाँ कुछ प्राचीन बुद्ध की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं, कुछ भग्न मंदिरों के अवशेष भी मिलते हैं। इस स्थल पर बौद्ध, वैष्णव तथा शैव धर्म से संबंधित मूर्तियों का मिलना यह सिद्ध करता है कि यहाँ कभी तीनों संप्रदायों की मिली-जुली संस्कृति रही होगी।  

3. समयकाल: यहाँ से प्राप्त शिलालेखों की लिपि से अनुमान है कि यहाँ की प्रतिमाओं का समय 8-9वीं शताब्दी है, यानी सिरपुर के बौद्ध उत्कर्ष काल के समकालीन।  

4. स्त्री परंपरा आज भी जीवित: आज भी यहाँ स्त्री पुजारिनों की नियुक्ति होती है, जो प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा है। यह सीधे तौर पर भिक्षुणी परंपरा से जुड़ा माना जाता है। कई विद्वान मानते हैं कि जो विशाल बुद्ध मूर्ति यहाँ है, उसे जनसाधारण वाल्मीकि ऋषि के रूप में पूजता है।  
रामायण से जुड़ी मान्यता
जनश्रुति है कि त्रेतायुग में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यही था और लव-कुश की यही जन्मस्थली थी। इसलिए यह स्थल वाल्मीकि आश्रम के नाम से भी प्रसिद्ध है।
  इसके साथ ही बौद्ध साधना स्थली के पार्श्व पहाड़ के शीर्ष में मातागढ़ स्थापित हैं जहाँ दुर्गा की नई प्रतिमा एवं मंदिर बनाई गई है बकरे की बलि होती हैं। खासकर पौष पूर्णिमा में यहाँ मेला लगता हैं।
   जीव हिंसा एवं बलि प्रथा को बंद कराने गुरुघासीदास ने सतनाम पंथ के माध्यम से जनजागरण चलाया इस कारण परिक्षेत्र के सतनामियों ने यहां जैतखाम स्थापित कर उनके विचारों को जनमानस में प्रसारित करते आ रहे हैं। यह भी दर्शनीय हैं।

कब जाएँ?

पौष माह में यहाँ तीन दिवसीय मेला लगता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। धार्मिक और पुरातात्विक महत्व के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी यह पर्यटकों को आकर्षित करता है।  

यदि आप सिरपुर जाते हैं तो तुरतुरिया को एक ही दिन में कवर किया जा सकता है, यह बौद्ध इतिहास में छत्तीसगढ़ की भिक्षुणी संघ की भूमिका को समझने के लिए सबसे प्रामाणिक स्थलों में से एक है।

उक्त जानकारी AI से जनरेटेड हैं कुछेक तथ्य फोटोग्राफ मैंने प्रसंगानुकूल संयोजन किया हूं।
    डॉ. अनिल भतपहरी/ 9617777514

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी



 परिचय

 -डॉ. अनिल कुमार भतपहरी*

*1. व्यक्तिगत परिचय*
- *नाम*: डॉ. अनिल कुमार भतपहरी 
- *माता*: श्रीमती केराबाई भतपहरी
- *पिता*: स्व. श्री सुकाल दास भतपहरी
- *शिक्षा*: एम.ए., पीएच.डी., पी.जी.डी.टी. (सुगम संगीत)
- *पता*: ऊँजियार सदन, सी 11/9077, सेंट जोसफ टाउन, अमलीडीह, रायपुर, छत्तीसगढ़

*2. सेवा विवरण*
- *संप्रति*: प्राध्यापक, हिंदी  
  वीरांगना रमौतीन माड़िया शासकीय आदर्श महिला महाविद्यालय, नारायणपुर
- *पूर्व पद*: 
  1. उप संचालक, उच्च शिक्षा विभाग, संचालनालय, इंद्रावती भवन, नवा रायपुर - 2024-25
    2. सचिव, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग - 2021 से 2024 
    3. सहायक संचालक, उच्च शिक्षा विभाग - 2019 से 2021
- *श्रेणी*: प्रथम | *वेतन मैट्रिक्स*: लेवल 13 A
- *अनुभव*: 23 वर्षों का अध्यापन अनुभव  
  2003 से 2019 तक 17 वर्षों तक NSS कार्यक्रम अधिकारी

*3. प्रमुख प्रशासकीय दायित्व*
1. राज्य स्तरीय साहित्यकार सम्मेलन आयोजन प्रभारी एवं राजकीय सम्मान निर्णायक समिति सदस्य
2. राजिम कल्प कुंभ 2023 में सत्कार / मंच प्रभारी
3. इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ के नोडल अधिकारी
4. राज्योत्सव 2024 एवं 2025 के लिए उच्च शिक्षा संचालनालय प्रभारी

*4. राजभाषा आयोग में विशेष उपलब्धियां 2021-23*
उत्तर जशपुर से दक्षिण बीजापुर, पूर्व रायगढ़ से पश्चिम डोंगरगढ़ तक *साहित्यकार-कलाकार सम्मेलन एवं प्रशिक्षण*  
- *100+ छत्तीसगढ़ी पुस्तकों का प्रकाशन*
- *"सुरहुत्ती" त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन* 
- प्रदेशभर से *500 साहित्यकारों का प्रांतीय सम्मेलन* होटल बेबीलॉन में आयोजित कर छत्तीसगढ़ी साहित्य को मुख्यधारा में लाने का प्रयास

*5. प्रकाशित कृतियाँ*
1. _कब होही बिहान_ - काव्य संग्रह, 2007
2. _पावन पिरीत के लहरा_ - कहानी संग्रह, 2015  
3. _गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ_ - 2019
4. _हँसा अकेला सतनाम संकीर्तन_ - 2019
5. _ठोस विचारों की कीमगिरी_ - लघु कथा संग्रह, 2021
6. _The value of a cup of tea_ - Short Stories
7. _हड्डी की जीभ नहीं कि न फिसले_ - काव्य संग्रह
8. _सुकुवा उवे न मंदरस झरे_ - काव्य संग्रह

*6. सम्मान एवं अलंकरण*
कौमी एकता सम्मान 2008, आरुग फूल सम्मान 2009, काव्य श्री 2012, विशिष्ट NSS अधिकारी सम्मान मैसूर 2012, छत्तीसगढ़ राजभाषा सम्मान 2012, राष्ट्र भाषा अलंकरण 2013, 2019, स्वास्थ्य मंत्रालय उत्कृष्ट सेवा सम्मान 2019, अंतर्राष्ट्रीय लघुकथा सम्मान काठमांडू 2022, बिलासा सम्मान 2023, विमल मित्र सम्मान 2023 एवं अन्य अनेक सम्मान।

*7. संपर्क सूत्र*
- *मोबाइल*: 9617777514
- *ईमेल*: anilbhatpahari@gmail.com
- *ब्लॉग*: सत सांधन - anilblogpost
- *YouTube*: Anil Bhatt CG
- *Website*: http://anil.in

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डॉ अनिल कुमार भतपहरी

#anilbhaattcg 

 परिचय

 *डॉ. अनिल कुमार भतपहरी*

*1. व्यक्तिगत परिचय*
- *नाम*: डॉ. अनिल कुमार भतपहरी 
- *माता*: श्रीमती केराबाई भतपहरी
- *पिता*: स्व. श्री सुकाल दास भतपहरी
- *शिक्षा*: एम.ए., पीएच.डी., पी.जी.डी.टी. (सुगम संगीत)
- *पता*: ऊँजियार सदन, सी 11/9077, सेंट जोसफ टाउन, अमलीडीह, रायपुर, छत्तीसगढ़

*2. सेवा विवरण*
- *संप्रति*: प्राध्यापक, हिंदी  
  वीरांगना रमौतीन माड़िया शासकीय आदर्श महिला महाविद्यालय, नारायणपुर
- *पूर्व पद*: 
  1. उप संचालक, उच्च शिक्षा विभाग, संचालनालय, इंद्रावती भवन, नवा रायपुर - 2024-25
    2. सचिव, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग - 2021 से 2024 
    3. सहायक संचालक, उच्च शिक्षा विभाग - 2019 से 2021
- *श्रेणी*: प्रथम | *वेतन मैट्रिक्स*: लेवल 13 A
- *अनुभव*: 23 वर्षों का अध्यापन अनुभव  
  2003 से 2019 तक 17 वर्षों तक NSS कार्यक्रम अधिकारी

*3. प्रमुख प्रशासकीय दायित्व*
1. राज्य स्तरीय साहित्यकार सम्मेलन आयोजन प्रभारी एवं राजकीय सम्मान निर्णायक समिति सदस्य
2. राजिम कल्प कुंभ 2023 में सत्कार / मंच प्रभारी
3. इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ के नोडल अधिकारी
4. राज्योत्सव 2024 एवं 2025 के लिए उच्च शिक्षा संचालनालय प्रभारी

*4. राजभाषा आयोग में विशेष उपलब्धियां 2021-23*
उत्तर जशपुर से दक्षिण बीजापुर, पूर्व रायगढ़ से पश्चिम डोंगरगढ़ तक *साहित्यकार-कलाकार सम्मेलन एवं प्रशिक्षण*  
- *100+ छत्तीसगढ़ी पुस्तकों का प्रकाशन*
- *"सुरहुत्ती" त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन* 
- प्रदेशभर से *500 साहित्यकारों का प्रांतीय सम्मेलन* होटल बेबीलॉन में आयोजित कर छत्तीसगढ़ी साहित्य को मुख्यधारा में लाने का प्रयास

*5. प्रकाशित कृतियाँ*
1. _कब होही बिहान_ - काव्य संग्रह, 2007
2. _पावन पिरीत के लहरा_ - कहानी संग्रह, 2015  
3. _गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ_ - 2019
4. _हँसा अकेला सतनाम संकीर्तन_ - 2019
5. _ठोस विचारों की कीमगिरी_ - लघु कथा संग्रह, 2021
6. _The value of a cup of tea_ - Short Stories
7. _हड्डी की जीभ नहीं कि न फिसले_ - काव्य संग्रह
8. _सुकुवा उवे न मंदरस झरे_ - काव्य संग्रह

*6. सम्मान एवं अलंकरण*
कौमी एकता सम्मान 2008, आरुग फूल सम्मान 2009, काव्य श्री 2012, विशिष्ट NSS अधिकारी सम्मान मैसूर 2012, छत्तीसगढ़ राजभाषा सम्मान 2012, राष्ट्र भाषा अलंकरण 2013, 2019, स्वास्थ्य मंत्रालय उत्कृष्ट सेवा सम्मान 2019, अंतर्राष्ट्रीय लघुकथा सम्मान काठमांडू 2022, बिलासा सम्मान 2023, विमल मित्र सम्मान 2023 एवं अन्य अनेक सम्मान।

*7. संपर्क सूत्र*
- *मोबाइल*: 9617777514
- *ईमेल*: anilbhatpahari@gmail.com
- *ब्लॉग*: सत सांधन - anilblogpost
- *YouTube*: Anil Bhatt CG
- *Website*: http://anil.in

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Sunday, July 19, 2026

डॉ अनिल भतपहरी

#anilbhattcg 

धन्यवाद मंशाराम कुर्रे जी

अपने फेसबुक वाल में आज जन्मदिन पर सतनाम धर्म प्रचारक एवं सेवानिवृत  भिलाई स्टील प्लांट अधिकारी  कुर्रे जी  संयोजक गुरूवंदना परिवार भिलाई सदाशयता पूर्वक पोस्ट और फोटो डिज़ाइन कर डाले हैं ।उसे यथावत अपने सुधि पाठकों हेतु प्रस्तुत हैं-

🌹#सृजनधर्मी_साहित्यकार_ड_अनिल_भतपहरी
 
    #जी_को_जन्मदिवस_पर_हार्दिक_अभिनंदन🌹

#बौद्ध_संस्कृति_एवं_विश्व_धरोहर की ऐतिहासिक नगरी सिरपुर तथा परम पूज्य गुरु घासीदास बाबा जी की पावन कर्मभूमि भण्डारपुरी धाम के मध्य स्थित ग्राम पथरा जुनवानी की पुण्यभूमि के गौरव, आदरणीय वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अनिल भतपहरी जी का व्यक्तित्व साहित्य, संस्कृति, समाज और मानवीय मूल्यों का प्रेरणास्पद संगम है।

#डॉ_अनिल_भतपहरी_जी ने अपनी सृजनशील लेखनी के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, ग्रामीण जीवन, जनजीवन की संवेदनाओं, सामाजिक समानता तथा मानवीय मूल्यों को प्रभावशाली अभिव्यक्ति प्रदान की है। आपकी रचनाएँ केवल साहित्यिक सृजन नहीं हैं। बल्कि समाज को जागरूक, शिक्षित और संस्कारित करने वाली प्रेरक धरोहर हैं। उनमें लोकजीवन की सहजता, सामाजिक चेतना, करुणा, सांस्कृतिक अस्मिता तथा लोकमंगल की भावना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

#आप_केवल_एक_प्रख्यात_साहित्यकार ही नहीं है।बल्कि समाज को सकारात्मक दिशा देने वाले संवेदनशील चिंतक भी हैं। आपकी साहित्य साधना ने अनेक पाठकों, शोधार्थियों और युवा साहित्यकारों को नई दृष्टि एवं प्रेरणा प्रदान की है। आपका साहित्य सत, करुणा, समता, मानवता और नैतिक मूल्यों के आदर्शों को आत्मसात करते हुए समाज में सकारात्मक परिवर्तन तथा सांस्कृतिक संरक्षण का संदेश देता है।

#बौद्ध_नगरी_सिरपुर की ज्ञान-परंपरा और भण्डारपुरी धाम की सतनाम संस्कृति के मध्य स्थित इस पावन अंचल ने डॉ. अनिल भतपहरी जी जैसे साहित्य-साधक को जन्म देकर छत्तीसगढ़ की साहित्यिक चेतना को समृद्ध किया है। आपका जीवन इस सत का सशक्त प्रमाण है ,कि साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि समाज-निर्माण का प्रभावी माध्यम भी है।

जन्मदिवस के इस पावन अवसर पर हम सतनाम सतपुरुष पिता जी से प्रार्थना करते हैं।कि आदरणीय डॉ. अनिल भतपहरी जी को उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, सुख, समृद्धि, यश एवं निरंतर सृजनशीलता का आशीर्वाद प्रदान करें। आपकी लेखनी सदैव समाज को ज्ञान, प्रकाश, प्रेरणा और नई दिशा देती रहे तथा आप साहित्य, संस्कृति और मानवीय मूल्यों की अमूल्य सेवा करते हुए आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहें।

#आदरणीय_डॉ_अनिल_भतपहरी जी को जन्मदिवस की अनंत हार्दिक शुभकामनाएँ एवं अशेष मंगलकामनाएँ साधुवाद।

       🙏सादर साहेब सतनाम🙏
          मंशाराम कुर्रे नेचर विला 
                       संयोजक 
 गुरू वंदना केन्द्र भिलाई नगर जिला दुर्ग छत्तीसगढ़

Thursday, July 16, 2026

सतनाम संस्कृति में योग

रचनाकार
विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

 
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"सतनाम संस्कृति में योग" / डा. अनिल भतपहरी
image

गुरु घासीदास प्रवर्तित सतनाम संस्कृति में योग एक अभिन्न अंग है। या यूं कहें - अनुयायी और साधक सहज कर्म योग में प्रवृत्त रहते हैं।

सतनाम सुमरन ध्यान और समाधि यहाँ विशिष्ट संस्कृति है।

गुरु घासीदास के पूर्वज मेदनीराय गोसाई संत प्रवृत्ति के थे। वे गिरौदपुरी परिछेत्र में ख्याति नाम नाडी वैद्य रहे। मानव के साथ- साथ अवाक पशुओं के चिकित्सा कर उनकी दुख और पीड़ा का शमन करते थे। वे  अपना नित्य कर्म सतनाम सुमरन और सहज ध्यान योग से आरंभ करके कर्मयोग में निरत हो जाया करते थे।

मेदनीदास /महगूदास के यहाँ अनेक सिद्ध साधु महात्माओं निरन्तर आगमन होते रहते और मानव कल्याण के साथ साथ जीवन के मुक्ति के संदर्भ में साधु संगत समय समय पर होते रहते।

बाल्यावस्था में ही शिशु घासी को विरासत से मानव और पशुओं की पीडा दुख का शमन करने की कला कौशल मिल गये थे। और साधु महात्माओं के दर्शन व सत्संग भी। अनेक सहजयान- ब्रजयान के साथ साथ गोरख पंथी साधुओं का सान्निध्य मिलते रहे हैं।

जन्म के तत्क्षण बाद एक साधु का नवजात शिशु का दर्शन करने आना और बालक को गोद में लेकर आंगन में नाचना तथा उनके चरणों में शीश नवाना एक विलक्षण बालक के शुभागमन का अप्रतिम संदेश है-

आये जोगी द्वार में एक साधु आये द्वार में।

बालक रुप देख मोहाए आये साधु द्वार में

चरण म माथा टेकाए आये साधु द्वार में। ( संदर्भ सतनाम संकीर्तन पृष्ठ ७)

धीर गंभीर संत प्रवृत्ति उनके बाल चरित में अनायास झलकता है।इसका रोचक व मुग्धकारी वर्णन दृष्टव्य है-

दिन दिन बढ़े अंगना गली खोर खेलय

एक समय के बाते ये न

खेलय गुल्ली डंडा

परगे गांव म डंका

मरे चिर ई ल करदिन चंगा ...(सं वही पृ १०)

इस तरह देखे तो पशु पंछी के प्रति प्रेम और उनके धायल अवस्था में उपचार कर नव जीवन देना महत्वपूर्ण है।

इसी तरह गन्ने बाड़ी में सर्पदंश से पीड़ित साथी बुधारु का उपचार से विशिष्ट ख्याति फैलने लगते हैं-

बाल पन म महिमा देखाए

चिर ई अउ बुधरु ल जियाये

(सं सतनाम सरित प्रवाह )

किशोरावस्था के बाद नवयुवक घासी द्वारा एकान्त में ध्यान चिन्तन करना और कुछ असामान्य सा कार्य जैसे बलि हेतु ले बकरा को मुक्त करना और स्वतः हल चलाकर अंधविश्वास का दमन करना गरियार बैल को प्रेम से सहलाकर अधर नागर चलाना अप्रतिम कार्य रहा है। यह सब कार्य एक विशिष्ट सूक्ष्म शक्ति से संचालित हुआ। जिसे हम कह सकते हैं कि गुरु बाबा को यह शक्ति उन्हें यौगिक क्रियाओं से प्राप्त विशिष्ट शक्ति से रहा।

कुछ कह सकते है कि एकाएक उसने यह सब कैसे अर्जित किया? इनका सहज सा उत्तर कि वह एक अज्ञात साधु जो उन्हें बाल अवस्था में पाकर आंगन में नाचे और उनके चरण छुए ।तो यही उन्हें स्पर्श या रेकी योग से आध्यात्मिक शक्ति जो साधारण जनमानस को समझ न आए इसलिए रहस्य है । नहीं दिखने के कारण अलौकिक है ।चमत्कार सा लगने लगे।

गांव के ग्रामीण जन्य घासी को जदुहा होने और तंत्र साधना करने वाले हठयोगी होने की बातें कहने लगे। धुन के पक्का घासीदास कही वैराग्य आदि लेकर साधु जोगी न बन जाय इसलिए उनका विवाह एक सुन्दर कन्या सफुरा से कर दी गई।

पर सफुरा संयोग से विलक्षण और सहज योग की क्रिया अपने पिता महंत अंजोरदास से अर्जित की हुई. थी। यह संयोग भी विलक्षण थे-

सिरपुर नगर के मंहत नाम्ही अंजोरदास ग

ओकर सुध्धर क इना

नाव सफुरा ताय ग

उज्जर उज्जर रुप ओकर

ज इसे फूल कांस ग

ये दे शोभा बरन नही जाय ग ..सतनाम संकीर्तन पृ १३

विवाहोपरान्त सहज और कर्म योग चलते रहा पर इस बीच अनहोनी हुआ । उनके ७ वर्ष के ज्येष्ठ पुत्र अम्मरदास का खो जाना दुख का सबब बना ।कहते है उस विलक्षण बालक को किसी साधू ने योग सिद्धी की दीछा हेतु साथ वन ले गये।

वे मन शान्ति प्रयोजनार्थ तीर्थ यात्रियों के जत्थे में सम्मिलित होकर जगन्नाथ पुरी प्रयाण किए ।इस दरम्यान उन्हें साधु संगत मिला और अनेक पाखन्ड कुरीतियों से रुबरु हुए  -

धरिन रद्दा जगन्नाथ के गजब सुनिस बडाई।

दीन दुखिया दुख देखिस अउ पंडा के लुटाई ।।

कपडा रंगाये मिले गोरख मुनी बबा ब इठिन उन के पास।

सुनिन परवचन मुनि के पुरा न इ होइस आस

रंगहा कपडा फेर मन न इ रंगे

देखे लहुटत चंद्रसेनी म बलि छैदत्ता पाडा।

मन बिचलित हालाकान जीव हिंसा गाडा गाडा

देख बबा के मन भिरंगे तीरथ में शांति न इ पाए ....

माध पुन्नी के पुनवास म सतनाम उच्चारे .....वही पृ १७

अब वह आत्म ज्ञान और अनेक तरह के रहस्य को समझने सहज योग के स्थान पर हठ योग साधते हैं और कठोर अग्नि तपस्या में लीन हो ६ माह तक कठोर साधना सोनाखान जंगल में करते हैं। और छाता पहाड़ में ध्यान समाधि करते थे।

इस दरम्यान पुत्र संताप और पति वियोग से सफुरा अवचेतन अवस्था में घर पर ही भाव समाधि ली। और उधर घासीदास कठोर हठ योग अग्नि समाधि में प्रवृत्त हुये।

कुण्डली जागरण और अनेक तरह के अपरा ज्ञान से अभिभूत घासी को अहसास हुआ कि अब घर जाया जाए।

जब पता चला कि सफूरा का देहान्त हो गया और उसे दफना दिया गया है। तो वह मानने तैयार नहीं हुये कि उनकी कैसी मृत्यु होगी। वह भावलीन समाधि में सिद्धहस्त हैं । उसका कब्र खोदो ....उसे जागरण करते हैं। बात बिजली की करेन्ट की भांति सर्वत्र फैल गई । हजारों की उपस्थिति में माता सफुरा को उनकी समाधि से मुक्त करवाकर चेतना सम्पन्न किए। नवजीवन दिये इस प्रसंग को देखे-

ब्रह्मांड में सांस चढ़ा के करे गुरु योगासन

जोति समागे लाश म करे नर नारि दरसन

सतनाम सुमर के बबा देवय अमृतपानी....

इस तरह उनकी ख्याति सर्वत्र फैल गई ।गुरु भी अपनी विशिष्ट ज्ञान कला कौशल को सहज योग से सदैव साधते रहे औरा धौरा तेन्दु वृक्ष के नीचे उनका ध्यान योग समाधि चलते और धूनी जलाते भीषण वन में साधनारत रहते।

एक दिन अपार भीड़ के समक्ष सतनाम पंथ का सिद्धान्त और उपदेश तथा लोकाचार व सहज योग को व्यवहृत करने सात्विक जीवन व सत्य को सदैव अपने अंतःकरण में धारण और व्यवहार करने की उपदेशना देते सतनाम धर्म ( पंथ ) का प्रवर्तन किए।

नित्य प्रात और संध्या सूर्योपासना करते सात्विक जीवन यापन करना और सतनाम धुनि में निमग्न कर्मयोग ही सतनाम का आधार है। हर अच्छाइयों का समन्वय सतनाम में सन्निहित है। पंचाक्षर सतनाम का नित्य सुमरन स्नान सूर्योपासना और ध्यान कर कर्म में लीन अभाव के मध्य जितना है उतने में संतुष्ट सुखमय जीवन ही सतनाम का मरहम और धरम है ।

गुरु घासीदास के साधना अवस्था में पद्मासन मुद्रा और उनके उपदेश देते अभय मुद्रा तथा सर्व मंगल की कामना करते अर्ध निमिलित नयन ध्यान मुद्रा की चित्र अत्यन्त लोकप्रिय है। यह सभी तथ्य उनके महायोगी होने का साक्ष्य है। जिसने संसार में मानव के दुख के निदान बताये । ७ सिद्धांत असंख्य उपदेश ४२ अमृतवाणी २७ मुक्तक और सुन्दर भावप्रवण पंथी गीत मंगलभजन व सामूहिक प्रदर्शन हेतु पंथी नृत्य जिसे देख सुन तन मन वचन पवित्र होते है। दुख का तिरोभाव हो जाते है और अन्तकरण में आनंद समाते हैं।

इनके लिए वे गुरु संत महंत भंडारी साटीदार जैसे धार्मिक पद सृजित किए।जो अध्यात्म की परिचालन करते सतनाम दर्शन को व्यवहारिक स्वरुप देते हैं। जमीन के नीचे ढाई तीन पांच और सप्त दिन की विशिष्ट भू समाधि आज भी सतनामियों में प्रचलित है ।इसके सैकड़ों साधक वर्तमान में है।इसी तरह जल समाधि अग्नि समाधि और सहज प्रचलित है।गुरु वंशज गुरु मुक्ति साहेब जल समाधि में प्रवीण है जो गुरुद्वारा खपरीधाम सरोवर में प्रति सोमवार संध्या जल समाधि लेते हैं हजारों श्रद्धालु एकत्र हो दर्शन लाभ लेते हैं।

गुरु घासीदास के सम्मान व उनके समकक्ष न होने के लिए अग्नि समाधि अब तक कोई नहीं लिए है। सहज समाधि हर किसी के लिए है और इसे लाखों लोग लेते आ रहे हैं।

जहां दुख है वहाँ सतनाम नहीं बल्कि दुखों के बीच ही सुख भाव में रहकर सद्कर्म करते दुख का निदान ही सतनाम का प्रयोजन है। इस तरह देखें तो

जन्म और सुखमय जीवन का उपाय सतनाम में है यह उपाय या युक्ति ही सहज योग है।

सत श्री सतनाम

डा- अनिल भतपहरी, जुनवानी रायपुर छग

सतनाम संस्कृति में योग

रचनाकार
विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

 
MENU
HOME / UNLABELLED / "सतनाम संस्कृति में योग" /डा. अनिल भतपहरी
"सतनाम संस्कृति में योग" / डा. अनिल भतपहरी
image

गुरु घासीदास प्रवर्तित सतनाम संस्कृति में योग एक अभिन्न अंग है। या यूं कहें - अनुयायी और साधक सहज कर्म योग में प्रवृत्त रहते हैं।

सतनाम सुमरन ध्यान और समाधि यहाँ विशिष्ट संस्कृति है।

गुरु घासीदास के पूर्वज मेदनीराय गोसाई संत प्रवृत्ति के थे। वे गिरौदपुरी परिछेत्र में ख्याति नाम नाडी वैद्य रहे। मानव के साथ- साथ अवाक पशुओं के चिकित्सा कर उनकी दुख और पीड़ा का शमन करते थे। वे  अपना नित्य कर्म सतनाम सुमरन और सहज ध्यान योग से आरंभ करके कर्मयोग में निरत हो जाया करते थे।

मेदनीदास /महगूदास के यहाँ अनेक सिद्ध साधु महात्माओं निरन्तर आगमन होते रहते और मानव कल्याण के साथ साथ जीवन के मुक्ति के संदर्भ में साधु संगत समय समय पर होते रहते।

बाल्यावस्था में ही शिशु घासी को विरासत से मानव और पशुओं की पीडा दुख का शमन करने की कला कौशल मिल गये थे। और साधु महात्माओं के दर्शन व सत्संग भी। अनेक सहजयान- ब्रजयान के साथ साथ गोरख पंथी साधुओं का सान्निध्य मिलते रहे हैं।

जन्म के तत्क्षण बाद एक साधु का नवजात शिशु का दर्शन करने आना और बालक को गोद में लेकर आंगन में नाचना तथा उनके चरणों में शीश नवाना एक विलक्षण बालक के शुभागमन का अप्रतिम संदेश है-

आये जोगी द्वार में एक साधु आये द्वार में।

बालक रुप देख मोहाए आये साधु द्वार में

चरण म माथा टेकाए आये साधु द्वार में। ( संदर्भ सतनाम संकीर्तन पृष्ठ ७)

धीर गंभीर संत प्रवृत्ति उनके बाल चरित में अनायास झलकता है।इसका रोचक व मुग्धकारी वर्णन दृष्टव्य है-

दिन दिन बढ़े अंगना गली खोर खेलय

एक समय के बाते ये न

खेलय गुल्ली डंडा

परगे गांव म डंका

मरे चिर ई ल करदिन चंगा ...(सं वही पृ १०)

इस तरह देखे तो पशु पंछी के प्रति प्रेम और उनके धायल अवस्था में उपचार कर नव जीवन देना महत्वपूर्ण है।

इसी तरह गन्ने बाड़ी में सर्पदंश से पीड़ित साथी बुधारु का उपचार से विशिष्ट ख्याति फैलने लगते हैं-

बाल पन म महिमा देखाए

चिर ई अउ बुधरु ल जियाये

(सं सतनाम सरित प्रवाह )

किशोरावस्था के बाद नवयुवक घासी द्वारा एकान्त में ध्यान चिन्तन करना और कुछ असामान्य सा कार्य जैसे बलि हेतु ले बकरा को मुक्त करना और स्वतः हल चलाकर अंधविश्वास का दमन करना गरियार बैल को प्रेम से सहलाकर अधर नागर चलाना अप्रतिम कार्य रहा है। यह सब कार्य एक विशिष्ट सूक्ष्म शक्ति से संचालित हुआ। जिसे हम कह सकते हैं कि गुरु बाबा को यह शक्ति उन्हें यौगिक क्रियाओं से प्राप्त विशिष्ट शक्ति से रहा।

कुछ कह सकते है कि एकाएक उसने यह सब कैसे अर्जित किया? इनका सहज सा उत्तर कि वह एक अज्ञात साधु जो उन्हें बाल अवस्था में पाकर आंगन में नाचे और उनके चरण छुए ।तो यही उन्हें स्पर्श या रेकी योग से आध्यात्मिक शक्ति जो साधारण जनमानस को समझ न आए इसलिए रहस्य है । नहीं दिखने के कारण अलौकिक है ।चमत्कार सा लगने लगे।

गांव के ग्रामीण जन्य घासी को जदुहा होने और तंत्र साधना करने वाले हठयोगी होने की बातें कहने लगे। धुन के पक्का घासीदास कही वैराग्य आदि लेकर साधु जोगी न बन जाय इसलिए उनका विवाह एक सुन्दर कन्या सफुरा से कर दी गई।

पर सफुरा संयोग से विलक्षण और सहज योग की क्रिया अपने पिता महंत अंजोरदास से अर्जित की हुई. थी। यह संयोग भी विलक्षण थे-

सिरपुर नगर के मंहत नाम्ही अंजोरदास ग

ओकर सुध्धर क इना

नाव सफुरा ताय ग

उज्जर उज्जर रुप ओकर

ज इसे फूल कांस ग

ये दे शोभा बरन नही जाय ग ..सतनाम संकीर्तन पृ १३

विवाहोपरान्त सहज और कर्म योग चलते रहा पर इस बीच अनहोनी हुआ । उनके ७ वर्ष के ज्येष्ठ पुत्र अम्मरदास का खो जाना दुख का सबब बना ।कहते है उस विलक्षण बालक को किसी साधू ने योग सिद्धी की दीछा हेतु साथ वन ले गये।

वे मन शान्ति प्रयोजनार्थ तीर्थ यात्रियों के जत्थे में सम्मिलित होकर जगन्नाथ पुरी प्रयाण किए ।इस दरम्यान उन्हें साधु संगत मिला और अनेक पाखन्ड कुरीतियों से रुबरु हुए  -

धरिन रद्दा जगन्नाथ के गजब सुनिस बडाई।

दीन दुखिया दुख देखिस अउ पंडा के लुटाई ।।

कपडा रंगाये मिले गोरख मुनी बबा ब इठिन उन के पास।

सुनिन परवचन मुनि के पुरा न इ होइस आस

रंगहा कपडा फेर मन न इ रंगे

देखे लहुटत चंद्रसेनी म बलि छैदत्ता पाडा।

मन बिचलित हालाकान जीव हिंसा गाडा गाडा

देख बबा के मन भिरंगे तीरथ में शांति न इ पाए ....

माघ पुन्नी के पुनवास म सतनाम उच्चारे .....वही पृ १७

अब वह आत्म ज्ञान और अनेक तरह के रहस्य को समझने सहज योग के स्थान पर हठ योग साधते हैं और कठोर अग्नि तपस्या में लीन हो ६ माह तक कठोर साधना सोनाखान जंगल में करते हैं। और छाता पहाड़ में ध्यान समाधि करते थे।

इस दरम्यान पुत्र संताप और पति वियोग से सफुरा अवचेतन अवस्था में घर पर ही भाव समाधि ली। और उधर घासीदास कठोर हठ योग अग्नि समाधि में प्रवृत्त हुये।

कुण्डली जागरण और अनेक तरह के अपरा ज्ञान से अभिभूत घासी को अहसास हुआ कि अब घर जाया जाए।

जब पता चला कि सफूरा का देहान्त हो गया और उसे दफना दिया गया है। तो वह मानने तैयार नहीं हुये कि उनकी कैसी मृत्यु होगी। वह भावलीन समाधि में सिद्धहस्त हैं । उसका कब्र खोदो ....उसे जागरण करते हैं। बात बिजली की करेन्ट की भांति सर्वत्र फैल गई । हजारों की उपस्थिति में माता सफुरा को उनकी समाधि से मुक्त करवाकर चेतना सम्पन्न किए। नवजीवन दिये इस प्रसंग को देखे-

ब्रह्मांड में सांस चढ़ा के करे गुरु योगासन

जोति समागे लाश म करे नर नारि दरसन

सतनाम सुमर के बबा देवय अमृतपानी....

इस तरह उनकी ख्याति सर्वत्र फैल गई ।गुरु भी अपनी विशिष्ट ज्ञान कला कौशल को सहज योग से सदैव साधते रहे औरा धौरा तेन्दु वृक्ष के नीचे उनका ध्यान योग समाधि चलते और धूनी जलाते भीषण वन में साधनारत रहते।

एक दिन अपार भीड़ के समक्ष सतनाम पंथ का सिद्धान्त और उपदेश तथा लोकाचार व सहज योग को व्यवहृत करने सात्विक जीवन व सत्य को सदैव अपने अंतःकरण में धारण और व्यवहार करने की उपदेशना देते सतनाम धर्म ( पंथ ) का प्रवर्तन किए।

नित्य प्रात और संध्या सूर्योपासना करते सात्विक जीवन यापन करना और सतनाम धुनि में निमग्न कर्मयोग ही सतनाम का आधार है। हर अच्छाइयों का समन्वय सतनाम में सन्निहित है। पंचाक्षर सतनाम का नित्य सुमरन स्नान सूर्योपासना और ध्यान कर कर्म में लीन अभाव के मध्य जितना है उतने में संतुष्ट सुखमय जीवन ही सतनाम का मरहम और धरम है ।

गुरु घासीदास के साधना अवस्था में पद्मासन मुद्रा और उनके उपदेश देते अभय मुद्रा तथा सर्व मंगल की कामना करते अर्ध निमिलित नयन ध्यान मुद्रा की चित्र अत्यन्त लोकप्रिय है। यह सभी तथ्य उनके महायोगी होने का साक्ष्य है। जिसने संसार में मानव के दुख के निदान बताये । ७ सिद्धांत असंख्य उपदेश ४२ अमृतवाणी २७ मुक्तक और सुन्दर भावप्रवण पंथी गीत मंगलभजन व सामूहिक प्रदर्शन हेतु पंथी नृत्य जिसे देख सुन तन मन वचन पवित्र होते है। दुख का तिरोभाव हो जाते है और अन्तकरण में आनंद समाते हैं।

इनके लिए वे गुरु संत महंत भंडारी साटीदार जैसे धार्मिक पद सृजित किए।जो अध्यात्म की परिचालन करते सतनाम दर्शन को व्यवहारिक स्वरुप देते हैं। जमीन के नीचे ढाई तीन पांच और सप्त दिन की विशिष्ट भू समाधि आज भी सतनामियों में प्रचलित है ।इसके सैकड़ों साधक वर्तमान में है।इसी तरह जल समाधि अग्नि समाधि और सहज प्रचलित है।गुरु वंशज गुरु मुक्ति साहेब जल समाधि में प्रवीण है जो गुरुद्वारा खपरीधाम सरोवर में प्रति सोमवार संध्या जल समाधि लेते हैं हजारों श्रद्धालु एकत्र हो दर्शन लाभ लेते हैं।

गुरु घासीदास के सम्मान व उनके समकक्ष न होने के लिए अग्नि समाधि अब तक कोई नहीं लिए है। सहज समाधि हर किसी के लिए है और इसे लाखों लोग लेते आ रहे हैं।

जहां दुख है वहाँ सतनाम नहीं बल्कि दुखों के बीच ही सुख भाव में रहकर सद्कर्म करते दुख का निदान ही सतनाम का प्रयोजन है। इस तरह देखें तो

जन्म और सुखमय जीवन का उपाय सतनाम में है यह उपाय या युक्ति ही सहज योग है।

सत श्री सतनाम

डा- अनिल भतपहरी, जुनवानी रायपुर छग

गजामुंग ख वइया

Tuesday, July 14, 2026

स्वतंत्रता

#anilbhattcg 
स्वतंत्रता 

समझ न आने वाली बातें
 करना ही बौद्धिकता है
जहाँ जरुरत हो बोलने की 
वहाँ चुप रहना नैतिकता है
पुरातन परम्पराओं का 
उत्सव मनाना धार्मिकता है
बर्बर आदिम प्रथाओं को 
विरासत समझ भाव गर्विता हैं 
यथास्थिति कायम रहें
यही प्राथमिकता है 
कोई हलचल न हो 
बस इसकी आवश्यकता हैं 
नवाचार का प्रतिरोध 
उनकी आधुनिकता है 
इन सब पर हस्तक्षेप 
न करना सज्जनता है
मित्रों ऐसा जीवन निर्वहन 
करना क्या स्वतंत्रता हैं ?

     -डॉ.अनिल भतपहरी

     

Saturday, July 11, 2026

टैबलेट

होते उपदेश 
बड़े लोगों की मौन 
करा रहें क्लेश 
अब बड़े लोगों की मौन 

टैबलेट

बड़े लोगों की मौन 
होते उपदेश 
अब उनके मौन ही 
करा रहे क्लेश 

हाइकू

पहले मौन 
होते थे उपदेश 
अब है क्लेश 

तीजन

तीजन 

पंडवानी की पर्याय हो चुकी  पद्म विभूषण तीजन बाई की लंबी बीमारी के बाद दुःखद निधन से कला जगत सहित प्रदेश में शोक व्याप्त हैं। निरक्षर होते हुए भी वो महाभारत एवं श्रीमद्भागवत की गूढ़तम बातें ऐसे प्रस्तुत करती कि श्रोताओं के मानस पटल पर उनकी बातें सदैव अंकित हो जाती थी।

   गुरु घासीदास छात्रावास आमापारा रायपुर में रहते छात्र जीवन में पहली बार मैं 1988 -89 में उनकी पंडवानी  विवेकानंद आश्रम रायपुर में श्रवण किया ।तब आत्मानंद जी थे और उनसे छिटपुट संवाद भी होते रहें हैं । तत्कालीन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा जी के आगमन पूर्व उनकी "राजा जनमेजय नाग यज्ञ पर्व " प्रस्तुति सुना और उनकी अप्रतिम भावाभिव्यक्ति देख चकित हुआ। क्योंकि मैं पिता श्री के नवरंग नाट्य कला मंच से निकला अभिनय की बारीकियां को छुटपुट जनता समझता भी था और शहर की सांस्कृतिक गतिविधियों के दर्शक और यदा कदा प्रतिभागी भी हुआ करता था।

उनकी दूसरी प्रस्तुति लंबे अंतराल बाद छत्तीसगढ़ राज्य के अभ्युदय के बाद प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी जी के शपथ ग्रहण समारोह पुलिस ग्राउंड रायपुर में देखा ।तब सहायक प्राध्यापक हुए 4 वर्ष हो चुका था और कई छात्रों/ कलावंत लोगों को ऑटोबायोग्राफी देने का सौभाग्य मिलना शुरू भी हो गया था। (पिताश्री सुकाल दास भतपहरी शिक्षक कलावंत रायपुर रिसर्च सेंटर हॉस्पिटल में हार्निया आपरेशन उपरांत भर्ती था। वे ही समारोह स्थल जाकर इतिहास बनते देखने और साक्षी होने का आशीष दिए थे।हालांकि उन्हें लाख उपाय के बाद बचा नहीं सके और महीने भर बाद दिल्ली एम्स में 4 दिसंबर 2000 को सतलोक प्रयाण कर गये। )  पहली ऑटोग्राफ मैने अपने पॉकेट डायरी जो अक्सर रखकर चलता था ,के एक पेज पर तीजन बाई का ऑटोबायोग्राफ लिया। कत्थक देखा और वापस अस्पताल आकर पिता श्री को उनकी ऑटोग्राफ दिखाया। वे प्रदेश बनते और एक कला साधिका की हस्ताक्षर देख हर्षित हुए।
     तीजन साक्षरता अभियान से जुड़ी अक्षर समझी,हस्ताक्षर करना सीखी। विरासत से प्राप्त ज्ञान  नैसर्गिक प्रतिभा से वे विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट मानद उपाधि पाई और लोग उनपर पी-एच.डी. भी की। आगे भी करेंगे।
        निःसंदेह  तीजन कापालिक शाखा की महारानी थी और उनकी असाधारण उपलब्धियां कला साधकों के लिए प्रेरक और प्रदेश के गौरव हैं। वे छिन (पाम पौधे की पत्ती)की बाहरी (झाड़ू )बेचकर आजीविका कमाती अपनी कला साधना से "फर्श से अर्श की ऊँचाई"  स्पर्श की। उनकी अदम्य संघर्ष, साधना, प्रस्तुति  एवं उपलब्धि सदैव प्रेरक रहेंगे।
     विन्रम श्रद्धांजलि शत शत नमन...

डॉ.अनिल भतपहरी 9617777514

Friday, July 10, 2026

सतनाम धर्म - संस्कृति के संवाहक समुदाय संगठित हो।

सतनाम धर्म -संस्कृति के संवाहक संगठित हो 

भारतीय संस्कृति  में अनेक जाति ,वर्ण , पंथादि हैं। इसलिये उनमें अनेक मत -मतांतर  हैं परंतु उनके बीच एक अंतर्संबंध भी हैं। गहराई से विचार करने पर वे सब उजागर होते हैं। ज्ञात इतिहास से अवगत होते हैं कि बौद्धिक चेतना के केंद्र में बुद्ध  हैं। 
       पूर्व मान्यताओं के इतर उनकी शिक्षा में ईश्वर आत्मा स्वर्ग नर्क नहीं हैं बल्कि मानवता हैं और मानव समुदाय में परस्पर  सौहार्द्र पूर्वक जीवन निर्वाह हेतु सुगम मध्यम मार्ग हैं। उनके उपदेश ध्यान योग समाधि निर्वाण त्रिपिटक धम्मपद आदि ही महायान हीनयान तंत्रयान ब्रजयान होते सहजयान जैसे शाखाओं प्रशाखाओ में अस्तित्व मान हुई।

    कालांतर में सहजयानी सतनामियों के "निर्वाण ग्रन्थ"  कबीर का बीजक, गोरख वाणी ,रैदास रामायण ,नानक सलोकु सहित सबके सार" गुरु ग्रंथ साहिब" ,गुरुघासीदास की अमृतवाणी से छत्तीसगढ़ में "सतनामयन , सतनाम -संकीर्तन जैसे निर्गुण ग्रंथ/साहित्य सृजित हुआ। इनसे विकसित "सतनाम दर्शन "भारतीय षट्दर्शन में वर्ण, जाति विहीन समुदाय हेतु "सप्त दर्शन"  के रुप में प्रतिष्ठित हो रहे हैं।
सिख धर्म में गुरुद्वारा में साध संगत का अत्यंत महत्व हैं वहां साध सतनामी का आदर दर्शनीय हैं। 
  सत्य दर्शन नामक प्रतिष्ठान विगत 50 वर्षों से साहित्यिक एवं बौद्धिक जगत में  लोकप्रिय हैं। सत्य ध्वज, सत्यालोक और सतनाम संदेश जैसे पत्रिकाएं संतो गुरुओं की सीख और उपदेश को लिपिबद्ध कर संरक्षित करने की अनुपम कार्य किए।अब अनेक संस्थान उनके अनुरुप कार्य करने प्रतिबद्ध हैं।
   अब समय हैं कि बुद्ध से लेकर गुरुघासीदास तक 2500 वर्षों की ज्ञान -विज्ञान, साधना -सिद्धी , साहित्य -दर्शन कलाएं जो परम सत्य और सदा मानव को सदमार्ग दिखाने वाले सनातन संस्कृति  के अभिन्न अंग हैं ।इनके प्रवर्तक एवं संवाहक गुरुओं /संतो की अनुयाई जो देश विदेश में करोड़ों की संख्या में विद्यमान हैं वे सभी एकत्र और संगठित हो।  ताकि समानता से युक्त सतनाम की अजस्त्र धारा अविरल प्रवाहित होता रहें। इनके अनुयाई जो कृषक, उत्पादक श्रमण हैं ।वह सामंती  एवं अधिनायक वाद के शोषण दमन आदि से मुक्त रहें । 
      जय सतनाम