Saturday, August 8, 2026

स्वाभिमान की सुगंध

*मूलनिवासी दिवस जनजातीय गौरव पर विशेष*  
*स्वाभिमान की सुगंध*

व्यापक अर्थ में देखें तो हम सभी के पूर्वज आदिवासी ही थे। धरती के किसी भी कोने में मनुष्य का विकास इसी रूप में हुआ। कालांतर में भोजन और आजीविका की तलाश में उसका आव्रजन हुआ, इतना ही।

पर जब हम विशिष्ट अर्थ में 'आदिवासी' कहते हैं, तो अभिप्राय उन समुदायों से होता है जिन्होंने आरंभ से एक ही अंचल में निवास किया। एक जैसी भाषा, कला, संस्कृति और रहन-सहन को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजा और बाहरी हस्तक्षेप से अपने को बचाए रखा।

विडंबना यह है कि 'आदिवासी' शब्द का प्रयोग अक्सर दूरी बनाने के लिए किया जाता है। उनके प्रति दिखाई जाने वाली दया या सहानुभूति भी क्षणिक होती है, जैसे किसी पशु-पक्षी के प्रति उमड़ता स्नेह। मैले-कुचैले और अभावग्रस्त जीवन की छवि तथा खान-पान को लेकर एक हिकारत का भाव गढ़ दिया गया है। इसी कारण यह शब्द कई बार उस वर्ग को भी चुभता है। कोई टाई-कोट पहना उच्च शिक्षित अधिकारी भी, यदि उसे 'आदिवासी' कहा जाए तो असहज हो जाता है। यह मेरे कई ST मित्रों का निजी अनुभव है, चाहे मंचों से 'गर्व से कहो' का उद्घोष कितना भी हो।

इसीलिए डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा दिया गया संवैधानिक शब्द - *'जनजाति' या 'अनुसूचित जनजाति'* - अधिक सार्थक और सर्वग्राह्य है। कुछ वर्षों से 'वनवासी' शब्द भी प्रचलन में आया। पर वन में रहने मात्र से कोई जनजाति नहीं हो जाता, यह तो सभी समझते हैं। 'Tribal' का सबसे सटीक हिंदी पर्याय 'जनजाति' ही है। 'अनुसूचित' का आशय उस सूची से है जिसमें वे समुदाय शामिल हैं जो आरंभ से एक ही भू-भाग में निवासरत रहे और जिन्होंने पलायन नहीं किया।

मैदानी क्षेत्रों में अनुसूचित वर्गों के महापुरुषों द्वारा चलाई गई सतत सामाजिक क्रांति का प्रभाव जनजातीय समाज पर भी पड़ा। यहाँ से भी नया नेतृत्व उभरा। जल, जंगल, जमीन के साथ-साथ भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए जन-आंदोलन हुए। यह चेतना शोषण के विरुद्ध थी, अस्तित्व की रक्षा के लिए थी।

छत्तीसगढ़ के संदर्भ में देखें तो अठारहवीं सदी में सतगुरु घासीदास के नवजागरण से प्रेरणा लेकर वीर नारायण सिंह ने अस्मिता की रक्षा हेतु स्थानीय शोषण के विरुद्ध बगावत की। *10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जय स्तंभ चौक में ब्रिटिश सत्ता ने उन्हें तोप से उड़ा दिया।* 

ठीक 3 वर्ष बाद, *27 मार्च 1860 की रात्रि* को उनके बाल-सखा, गुरु-पुत्र राजा गुरु बालक दास को भोजन के बहाने आमंत्रित कर निहत्थे गुरु पर सशस्त्र ठाकुरों की टोली ने हमला कर दिया। अंगरक्षक सरहा जोधाई ने लोटे के जल को उछालकर उसी को हथियार बनाकर विकट युद्ध किया और घायल गुरु को छप्पर फाड़कर खेत तक ले गए। घनघोर युद्ध के बाद *28 मार्च 1860 को गुरु की शहादत* हुई। 

इस प्रकार ट्रांस-महानदी क्षेत्र के ये दोनों महानायक षड्यंत्र के शिकार हुए। उनकी शहादत की गाथा आज भी जनमानस के हृदय-पटल पर स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है।

आज 'मूलनिवासी' शब्द भी तेजी से प्रचलन में है। इस पर अनावश्यक भ्रम फैलाना ठीक नहीं। मूल भावना एक ही है - इस महादेश के मूल निवासियों में स्वाभिमान की सुगंध बनी रहे। इसके लिए उनकी भाषा, कला, संस्कृति, रीति-नीति के साथ-साथ उनके जल, जंगल, जमीन और उनके गाँव, घर, खेत-खलिहान यानी उनकी संपूर्ण 'अस्मिता' का संरक्षण जरूरी है। वे हैं तो हम हैं, और तभी यह दुनिया है।

*जनजातीय गौरव दिवस की हार्दिक बधाई*  
*जय सेवा, जय सतनाम, जय भारत*


 डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
    प्राध्यापक 
वीरांगना रमौतीन माड़िया महिला महाविद्यालय नारायणपुर 

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Thursday, August 6, 2026

असहिष्णुता

प्रायः सहिष्णुता की पाठ पढ़ाते  हैं 
पर अमल में असहिष्णुता लाते  हैं

Sunday, August 2, 2026

गुरु अम्मर दास

#anilbhattcg 

गुरु अम्मरदास जयंती की हार्दिक बधाई -

सतनाम धर्म संस्कृति में गुरु घासीदास एवम् गुरु अम्मरदास द्वारा प्रवर्तित -
           
          अइटका -परब ( असाढ़ गुरु पूर्णिमा )

सतनाम धर्म के प्रवर्तक गुरु घासीदास बाबा  के ज्येष्ठ पुत्र गुरु अम्मरदास जी का जन्म असाढ़ पुन्नी को 1780 के आसपास गिरौदपुरी मे हुआ।वे बाल्यकाल से ही अपने पिता के सदृश्य विलछण. और तेजस्वी  थे। अत्यन्त  प्रतिभाशाली अम्मरदास जी  ७-८ वर्ष के उम्र मे अपनी माता सफूरा के साथ जलाऊ लकडी लाने वन  गये।एकाएक वे वन मे खो गये।किवदन्ती है कि उन्हे शेर उठाकर ले गये।आज भी शेर पन्जा मन्दिर गिरौदपुरी मे स्थित है।जहा सतपुरष या कोई महान योगी या साधक  के भी चरणचिन्ह है कहते है वह शेर पर सवार योग्य बालक के तलाश मे आये और बालक  अम्मरदास को अपने साथ बिठाकर गहन वन मे  चले गये। सफुरा और उनके साथ गई ग्राम्य महिलायें ढूंढती रही पर बालक  नही मिले।पुत्र वियोग से व्याकुल बेसुध हो गई ।
     वही तेजस्वी बालक गिरौदपुरी के आगे महकोनी जंगल स्थित बाघिन गुफा में साधनारत रहें ।१५ -१६वर्ष बाद २१-२२ वर्ष के उम्र मे साधू वेष मे ग्राम तेलासी मे रामत करते गुरु दम्पत्ति को छिन्दहा तालाब पार मे  मिले।
      तब गुरु अम्मरदास अपनी योग साधना की सिद्धी उपरान्त अपने माता-पिता को तलाशते हुये तेलासी पहुचे थे। पुत्र मिलन जगह होने के कारण सद्गुरु को बडा प्रिय लगा और वे यहा दु:खी पीड़ित लोगों की सेवा और उपचार करने लगे। आसपासके अनेक गाँव जिसमें जुनवानी , गिघपुरी मोहगांव,देवगांव ,गैतरा ,भंडार ,कोडापार अमसेना  आदि के लोगों ने गुरु परिवार को बसाने में अपेक्षित सहयोग किए।
      गुरु दम्पति  की ख्याति उनके योग साधना और अनेक दिव्य औषधियों  से असाध्य रोगो के उपचार आदि से सर्वत्र फैलने लगे।दूर -दूर से लोग उनके दर्शन और अपनी दु:ख -पीड़ा  के निदान के लिये आने लगे।
    उपकृत श्रद्धालुओ   द्वारा भेट स्वरूप भूमि अन्न आदि के संरक्षण हेतु तेलासी भन्डार मे बस गये।कलान्तर मे इन दोनो जगहों पर भव्य बाड़ा, मोती  महल व गढी किला नुमा परकोटा  बनवाये गये।जो  सतनाम धर्म का ऐतिहासिक स्मारक है।
         गुरु अम्मरदास जी  तेलासी वासियों के लिये अत्यधिक प्रिय रहे है।कहते है एक व्यक्ति मान्साहार हेतु कपड़े मे लपेटकर मांस ले जा रहे थे।लोग शिकायत किये।गुरु अम्मरदास ने योग बल से लोगो की दृष्टि बदले और जब पोटली खोले तो वह नाड़ियल प्रसाद के रुप मे लोगो को दिखाई दिये ।सभी चमत्कृत हो  गुरु चरण  मे नत हो  क्षमा -याचना किये। गुरु कृपा से अभिभूत तेलासी व अनेक ग्राम के लोग सतनाम दीक्षा लेकर सतनामी बने। यहाँ महासंगम हुआ।
       और उन सभी वर्गो ,जातियो को गुरु ने तस्मई- चीला  बनवाकर एक परात या बर्तन से बटवाये।यही अइटका है।इसके लिये विधान बनाये।बहते जलधारा से चावल दूध घी  गुड़ और मेवा डालकर सात्विक तस्मई ( खीर )बनाकर परस्पर बाटकर खाना।सत्सन्ग प्रवचन सुनना, पन्थी  नृत्य मन्गल करना यहां तक कि‌ सतनाम संस्कृति से संदर्भित लीला व नाट्य मंचन तक होते  रहे हैं।यह तेलासी सहित आसपास के कई ग्रामो मे तब से प्रचलन मे है।
     सफूरा माता  की अनुनय- विनय और बडे़ के रहते छोटे भाई विवाह कैसे करे के चलते न चाहते   प्रतापपुर मे अन्गारमति से अम्मरदास जी का विवाह हुआ।गौना लाए पर वे ब्रम्हचर्य का ही अनुपालन करते रहे और  सतनाम की आध्यात्मिक गुरु के रुप मे ख्यातिनाम हुए।
        ब्रम्हचारिणी  अन्गारमति भी  साध्वी जीवन अन्गीकृत की । आगे चलकर  माता प्रतापपुरहीन के नाम से विख्यात हुई ।आज उनकी शैय्या दर्शनीय है।
    गुरु अम्मरदास सेत सुमन  घोडे़ मे सेत वसन धारण कर चलते और लोगो मे सतनाम की अलख जगाते।पन्थी मन्गल भजन सत्सन्ग का प्रचलन  समाज मे गुरु अम्मरदास जी ने किया।
       एक दिन शिवनाथ नदी के तट पर  चटुआ घाट के समीप मनोरम स्थल पर अपने अनुयायियों को सतनाम समाधि का रहस्य बताते  अउठ दिन (साढे तीन दिन  )की  समाधि मे चले गये। 
     आसपास से बहुत से लोग आ गये।उन भीड़ मे कुछ विरोधी कहने लगे वो मृत हो गये है।उन्हे बाहर लाओ ।अनुयायी भीड़ के आगे बेबस अधुरी साधाना मे उन्हें वापस तन्द्रा मे लाने लगे।पर गुरु नही जगे।
        अन्तत: उन्हे पूर्ण समाधि दे दी गई ।
      जनश्रूति है जब गुरु की समाधि अवधि पूरी हुई तो लोग  देखे कि एक ज्योति पुन्ज समाधि को चीरती ऊर्ध्वगामी आकाश मे विलीन हो गई ।
       कई वर्षों के अन्तराल मे समीपस्थ ग्राम हरिनभठ्ठा के मालगुजार आधार दास सोनवानी अपने पुत्र मनोकामना पूर्ण होने पर गुरु अम्मरदास की समाधि मे भव्य मन्दिर बनवाये।
         आज यह सतनामिओ को  का प्रमुख धाम है जहां पर पौष - छेरछेरा पुन्नी को विशालकाय मेला गुरु के पुण्य स्मरण मे लगते आ रहे है।
          सतनाम आध्यात्मिक चेतना और साहित्य के प्रणेता गुरु अम्मरदास अम्मर रहे।

टीप - सतनाम अइटका परब प्रथम सार्वजनिक आयोजन हैं। कृपया इस पावन पर्व का सार्वजनिक आयोजन अपने अपने ग्राम मुहल्ले व जैतखाम परिसर पर करें। और तस्म ई बनाकार सत्संग प्रवचन व मंगल पंथी आदि‌ का आयोजन करें।
निम्न लिंक पर भावप्रवण मंगल भजन श्रवण कीजिए 
https://youtu.be/N_tROFeLlKQ?si=EwVgnh4B9AlfuhIT

              जय सतनाम।

गुरु पूर्णिमा की मंगलमय‌ मंगलकामनाएं 
 
     डाॅ. अनिल कुमार भतपहरी 
        9617777514 
            संपादक 
        सतनाम संदेश 
प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज

Friday, July 31, 2026

प्रेमचंद: बेहतर व्यक्ति, समाज और देश

प्रेमचंद : बेहतर व्यक्ति से बेहतर समाज और बेहतर देश

                              - डॉ. अनिल कुमार भतपहरी

गोदान, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि, प्रेमाश्रम जैसे दर्जनों उपन्यास और कफ़न, नमक का दरोगा, ईदगाह, पंच परमेश्वर, पूस की रात, ठाकुर का कुआँ जैसी तीन सौ से अधिक कहानियों के रचयिता, बीसवीं सदी के आरंभिक उत्तर भारतीय जन-जीवन के कुशल चितेरे, कथा सम्राट प्रेमचंद को उनकी जयंती पर सादर नमन।

प्रेमचंद की जयंती केवल एक स्मरण नहीं, आत्मावलोकन का अवसर है। प्रश्न यह है कि उनकी भाषा और भाव के निरंतर हो रहे क्षरण को हम कैसे रोकें?

आज हिंदी के सामने दोहरा संकट है। एक ओर उसे जानबूझकर इतना क्लिष्ट बनाया जा रहा है कि वह जन-विमुख हो जाए, दूसरी ओर वैश्विक होने के नाम पर टपोरी हिंग्लिश में गुड़गुड़ाया जा रहा है। प्रेमचंद ने इन दोनों अतियों के बीच का मध्यम मार्ग दिखाया था। उनकी भाषा सरल थी, पर सस्ती नहीं थी। उसमें उर्दू की रवानी, हिंदी की गरिमा और देशज की ठेठकता का अद्भुत संगम था, जिसे किसान भी समझ लेता था और विद्वान भी नकार नहीं पाता था। आज वही मध्यम मार्ग टूट रहा है।

दूसरा बड़ा प्रश्न यह है कि हम उनके यथार्थ-चित्रण से आदर्श गढ़ने में कहाँ चूक रहे हैं? प्रेमचंद यथार्थ दिखाकर छोड़ते नहीं थे। वे उस यथार्थ में से करुणा, परोपकार, सौहार्द और सहिष्णुता का आदर्श निकालते थे। पंच परमेश्वर में स्वार्थी व्यक्ति भी पंच की कुर्सी पर बैठते ही न्यायी हो जाता है। आज हम यथार्थ के चित्रण पर ही अटक गए हैं। मीडिया और बाजार के लिए विद्रूपता को और चटख बनाकर परोसा जाता है, पर उसमें सुधार का भाव गायब है।

यह सोचना भी जरूरी है कि क्या आज का लेखक स्वतंत्र है? क्या वह प्रेस और पत्रिका मालिकों की कृपा से ही छपेगा और उनके इशारे पर ही रचेगा? प्रेमचंद ने स्वयं सरस्वती प्रेस चलाते हुए घाटा सहा, पर समझौते से इनकार किया। आज जब लेखक को छपने से पहले यह सोचना पड़े कि प्रायोजक को यह बर्दाश्त होगा या नहीं, तो साहित्य सम्मेलन विलुप्ति की कगार पर पहुँचेंगे ही।

आज की स्थिति और भी चिंताजनक है। गुलामी के दौर में जब प्रेमचंद ने समाज की विद्रूपताओं को उजागर किया, तब उद्देश्य सुधार था। आजादी के सौ वर्षों के भीतर वह करुणा और सहिष्णुता धनीभूत होनी चाहिए थी, पर वह क्षीण क्यों हो रही है? समाहार की जगह छंटने, कटने और बंटने की नौबत क्यों आ रही है? क्यों हमारा यथार्थ-बोध और प्रगतिशील दृष्टिकोण इतनी जल्दी कथित धार्मिक, सांप्रदायिक और जातीय विद्वेष की गिरफ्त में आ जाता है? हम सीमा पार के खतरे को तो देखते हैं, पर धार्मिक अंतर्कलह और जातीय वैमनस्य के भीतर के खतरे से अनभिज्ञ क्यों हैं?

एक और द्वंद्व हमारे सामने है - आधुनिक विज्ञान और तकनीक बनाम पारंपरिक मिथकीय अवधारणाएँ। क्या उन्नत विचार लोक-परलोक की कहानियों के समक्ष घुटने टेक देंगे? आज का सृजनशील कथाकार पारंपरिक कथावाचकों के भव्य पंडालों में मूक दर्शक बना भजन-कीर्तन में रमा है, इहलोक की चिंता छोड़ परलोक सुधारने में निमग्न है, क्योंकि वहाँ भीड़ है, भव्य आयोजन हैं और बड़े प्रायोजक हैं।

साहित्यकारों के सम्मेलन के कोई आयोजक-प्रायोजक नहीं हैं, क्योंकि वहाँ यथार्थ बर्दाश्त नहीं होता, सत्य लिखने-पढ़ने-बोलने का साहस नहीं होता। प्रायोजित हास्य-व्यंग्य कवि सम्मेलन मंच पर आयोजकों के प्रशस्ति-वाचन और चुटकुलेबाजी को कतई साहित्य नहीं कहा जा सकता। उनसे कोई अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ता। वहाँ भी 20-20 क्रिकेट की तरह केवल ताली और आह-वाह है। वहाँ भी टीमें हैं और कॉरपोरेट घराने कवियों की क्रिकेटरों की तरह खरीद-फरोख्त कर रहे हैं।

ऐसे में डिजिटल माध्यम ने एक नई आशा जगाई है। उसने प्रकाशक की दहलीज वाला पुराना ताला तोड़ दिया है। आज कोई भी युवा गाँव में बैठकर सीधे पाठक से जुड़ सकता है। पर यहाँ भी सेंसरशिप का रूप बदल गया है। पहले संपादक रोकता था, अब एल्गोरिदम रोकता है। एल्गोरिदम को सन्नाटा बर्दाश्त नहीं, उसे तुरंत हँसी या गुस्सा चाहिए। प्रेमचंद का साहित्य धीरे पकने वाला साहित्य है। पूस की रात में हल्कू और जबरा का खेत में ठंड से सिकुड़ना किसी रील में फिट नहीं होता। उसे पढ़ने के बाद सन्नाटा चाहिए।

इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम डिजिटल को केवल छापने की मशीन न समझें, बल्कि उसे अड्डा बनाएँ, जहाँ बहस हो, टोका-टाकी हो, और एक पाठक के खत को हजार लाइक्स से बड़ा माना जाए।

अंततः प्रेमचंद का संदेश अत्यंत सरल है और वही इस आलेख का निष्कर्ष भी है - बेहतर व्यक्ति से बेहतर समाज बनता है और बेहतर समाज से बेहतर देश। प्रेमचंद जयंती पर यही संकल्प हमें करना है।

जय हिंद, जय हिंदी।

     - डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
            प्राध्यापक हिंदी 
वीरांगना रमौतीन माड़िया आदर्श महिला महाविद्यालय नारायणपुर 

चूल और हुदेसना

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चूल और हुदेसना 

पांच हांडी में भात तीन हांडी में दाल पक रहें हैं एक उतर गया हैं या चढ़ाए नहीं हैं। यह नौ मुंहा चूल हैं इसमें लंबी पतली लकड़ी एवं छेना (कंडा) डाला गया हैं। एक लंबी सीधी लकड़ी जिसे हुदेसना कहते हैं बीच- बीच में हुदेसते रहते हैं ताकि आगी रमरम जलता रहें। हुदेसना का आगे का सिरा भी आग से दहकता रहता हैं । इसके द्वारा चूल के किनारे एवं दूर तक जहां आग या आँच न पहुँचे वहां भी ले जाकर जलाया जाता हैं। अधजले छेने को अलटे -पलटे जाते हैं।
       गुरु घासीदास की अंतिम अमृतवाणी इसी हुदेसना के दृष्टांत से जुड़ा हुआ हैं-
     "कोनों मोला कारकों ले बड़े झन कइहा,काबर ओहा मोला हुदेसना म हुदेसन आय।"

चित्र: चूल अब यह विलुप्ति की ओर  हैं हाड़ी तो नंदा ही गए हैं ।इसमें एल्मुनियम की बांगा चढ़े हैं।बचपन में अपने गाँव जुनवानी के बाड़ी में यह चूल  भंडार तेलासी दसरहा,सिरपुर मेला ,शादी ब्याह के समय सगा आने और दादी की दशगात्र ( 1981) पिताश्री के दशगात्र( 2000 )में  देखते रहें हैं। मिट्टी की काली हाड़ी में तेल चुपर कर अंधना देते थे , पके  चावल ( भात)को झौंहा में उलेड़ कर पसाते फिर फरहर भात का झाल बनते थे। इसकी अनुष्ठानिक पूजा कर झाल से  भात वितरण किए जाते थे।
    वैसे झाल के भात का प्रहरी (रखवार) भतप्रहरी हुआ इस तरह गोत्र आया ऐसा एक लोक मान्यता हैं परन्तु भट्टप्रहरी ही अपभ्रंश होकर भतपहरी हुआ हैं।

Thursday, July 30, 2026

वर्षा गीत

येति ओती चारो कोती
 बरसय पानी बन मोती 

घुरगे खपरा चुहत हे छानी
झन पूछ खदर के कहानी 
रदरद रेला बोहे टीपटीप चले ओरवाती 

डोली धनहा  छलकन लागे 
नरवा तरिया उफनन लागे 
चोरोबोरो चारोंमुड़ा होगे चारोंकोती 
 
 बरसा म भींजे आठों अंग 
तन मन म छाए हवे उमंग 
रोपा बियासी मगन माते सवनाही 
 

Thursday, July 23, 2026

बौद्ध भिक्षुणी साधना स्थली: तुरतुरिया

बौद्ध भिक्षुणी साधना स्थली: तुरतुरिया 

सतनाम पंथ में एक साखी हैं। साखी वह जो कि मंगल भजन या पंथी भजन गाने के पूर्व सखियाए जाते हैं। साखी प्रमुखत: मुख्य गायक, पंडित, कड़िहार या कोई वादक भी हो सकते हैं। यह दो पंक्ति के होते हैं और उसके बाद क्षेपक गाकर सबकी मंगल कामना करते मंगल भजन/ पंथी भजन गाये जाते हैं।
उन्हीं अनगिनत साखियों में एक महत्वपूर्ण एवं पारंपरिक साखी हैं -
लक्ष्य कोस म गुरु बसे, सुरता  दिहव पठाय 
ज्ञान तुरी असवार हैं,गुरु छिन आवै पल जाय 
इसमें ज्ञान तुरी शब्द क्या हैं? इसे जानने समझने मेरा मन मथते रहा। कई लोग कहे यह तोर हैं तुरी नहीं।
गुरु ज्ञान में चढ़कर आते जाते हैं। कुछ विद्वान इसे ज्ञान तुरय यानि ज्ञान रूपी अश्व/ घोड़े पर चढ़कर सद्गुरु आते हैं।
तब मुझे बौद्ध धर्म के सहजानी सिद्धों की वाणियों में तुरी का मतलब समझ आया।  सिद्ध सरहपाद सहजयान के प्रवर्तक थे। प्राचीन पंथी निर्गुण और सिद्धवानी में हमें अनेक सिद्धों संतो की दोहा साखी शबद मंत्र उलट बासी आदि मिलते हैं। इन्हें कबीर से भी जोड़ते हैं।
(झारा खल्लारी महासमुंद निवासी भिक्षु रामेश्वरम जिनके दोनों पाँव रेलगाड़ी से कटे थे। वे युवावस्था में अपनी  माता जी की अस्थियां विसर्जन हेतु इलाहाबाद प्रयाग से वापस लौटते दुर्घटना ग्रस्त हो गए। जब स्वस्थ हुआ तब चेतना जागृत हो गए और वे बौद्ध धम्म अपनाकर भिक्षु होकर आजीवन गुरुघासीदास और तथागत बुद्ध की चेतना को प्रसारित करते रहे। वे हमारे दादा महंत नंदू नारायण भतपहरी और नाना द्वय नकुल देव ढीढी एवं कोंदा प्रसाद बघेल के मित्र रिश्तेदार और सहयोगी थे। उनसे मेरा साक्षात्कार वार्तालाप होते थे वे साधु वेश में नेपाल भूटान सिक्किम दार्जलिंग नागपुर इत्यादि बौद्ध स्थलों पर परिभ्रमण करते और बौद्ध विद्वानों से सत्संग वार्तालाप करते थे। उन्होंने ही मुझे पाली भाषा अक्षर इत्यादि की आरंभिक जानकारी दिए थे।
वे ज्ञान तुरी साधना के साधक और निर्भय एवं तटस्थ सा हो गए थे। उनकी पाली संस्कृत भाषा में अथ गुरु घासीदास चरितम अप्रकाशित पांडुलिपि था। जब मैं अध्यापक बना और पुस्तक आदि प्रकाशन की ओर ध्यान आकृष्ट हुआ तो उनके परिजनों से उक्त पांडुलिपि के बारे में जानकारियां ली परन्तु अपेक्षित जानकारी नहीं मिली। अन्यथा उनका प्रकाशन या सतनाम संदेश में किस्त में प्रकाशित करने की योजना असफल रहा।
   बाहरहाल तुरी साधना की एक अवस्था हैं। कबीर इस भाव को उन्मनी कहते हैं। मुझे लगता हैं यह तुरी साधना सिद्धि के कारण ही सिरपुर समीप सुरम्य तुरतुरिया का नाम हुआ। जहां बौद्ध भिक्षुणियां रहती और तुरी तंत्र साधना करती लोक कल्याण करती थी।)

   तुरतुरिया छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण परन्तु कम चर्चित प्राचीन बौद्ध स्थलों में से एक है। साधना में तुरी एक अवस्था हैं इसे सहज प्राप्त करने का सिद्ध स्थल तुरतुरिया हैं। 
कहाँ स्थित है?
तुरतुरिया रायपुर से लगभग 84 किमी और बलौदाबाजार जिला मुख्यालय से 29 किमी दूर, कसडोल तहसील के बहरिया गाँव के पास बलभद्री नाले पर स्थित है । छत्तीसगढ़ के इतिहासकार/ साहित्यकार हरि ठाकुर जी ने इसे बालमदेही नदी नाम देकर तुरतुरिया को वाल्मीकि आश्रम और लवकुश जन्म स्थली लिखें हैं। यह सिरपुर से मात्र 23 किमी दूर है और बारनवापारा अभयारण्य के पास पहाड़ियों से घिरा एक मनोरम स्थल है। इसे स्थानीय लोग सुरसुरी गंगा भी कहते हैं।  
नाम तुरतुरिया क्यों पड़ा?
इसका नाम बलभद्री नाले के कारण पड़ा। नाले का जल चट्टानों के माध्यम से निकलता है तो बुलबुलों से तुरतुर की ध्वनि निकलती है, इसलिए नाम तुरतुरिया पड़ा। जल एक लंबी संकरी सुरंग से होकर प्राचीन ईंटों से बने कुंड में गिरता है, जहाँ गोमुख बना हुआ है।  
बौद्ध भिक्षुणी साधना स्थली क्यों कहा जाता है?
यही इसका सबसे खास पक्ष है।

1. बौद्ध विहारों के प्रमाण: ऐसा माना जाता है कि यहाँ बौद्ध विहार थे जिनमें बौद्ध भिक्षुणियों का निवास था। सिरपुर के समीप होने के कारण इस बात को अधिक बल मिलता है कि यह स्थल कभी बौद्ध संस्कृति का केंद्र रहा होगा।  

2. मूर्तियाँ और अवशेष: यहाँ कुछ प्राचीन बुद्ध की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं, कुछ भग्न मंदिरों के अवशेष भी मिलते हैं। इस स्थल पर बौद्ध, वैष्णव तथा शैव धर्म से संबंधित मूर्तियों का मिलना यह सिद्ध करता है कि यहाँ कभी तीनों संप्रदायों की मिली-जुली संस्कृति रही होगी।  

3. समयकाल: यहाँ से प्राप्त शिलालेखों की लिपि से अनुमान है कि यहाँ की प्रतिमाओं का समय 8-9वीं शताब्दी है, यानी सिरपुर के बौद्ध उत्कर्ष काल के समकालीन।  

4. स्त्री परंपरा आज भी जीवित: आज भी यहाँ स्त्री पुजारिनों की नियुक्ति होती है, जो प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा है। यह सीधे तौर पर भिक्षुणी परंपरा से जुड़ा माना जाता है। कई विद्वान मानते हैं कि जो विशाल बुद्ध मूर्ति यहाँ है, उसे जनसाधारण वाल्मीकि ऋषि के रूप में पूजता है।  
रामायण से जुड़ी मान्यता
जनश्रुति है कि त्रेतायुग में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यही था और लव-कुश की यही जन्मस्थली थी। इसलिए यह स्थल वाल्मीकि आश्रम के नाम से भी प्रसिद्ध है।
  इसके साथ ही बौद्ध साधना स्थली के पार्श्व पहाड़ के शीर्ष में मातागढ़ स्थापित हैं जहाँ दुर्गा की नई प्रतिमा एवं मंदिर बनाई गई है बकरे की बलि होती हैं। खासकर पौष पूर्णिमा में यहाँ मेला लगता हैं।
   जीव हिंसा एवं बलि प्रथा को बंद कराने गुरुघासीदास ने सतनाम पंथ के माध्यम से जनजागरण चलाया इस कारण परिक्षेत्र के सतनामियों ने यहां जैतखाम स्थापित कर उनके विचारों को जनमानस में प्रसारित करते आ रहे हैं। यह भी दर्शनीय हैं।

कब जाएँ?

पौष माह में यहाँ तीन दिवसीय मेला लगता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। धार्मिक और पुरातात्विक महत्व के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी यह पर्यटकों को आकर्षित करता है।  

यदि आप सिरपुर जाते हैं तो तुरतुरिया को एक ही दिन में कवर किया जा सकता है, यह बौद्ध इतिहास में छत्तीसगढ़ की भिक्षुणी संघ की भूमिका को समझने के लिए सबसे प्रामाणिक स्थलों में से एक है।

उक्त जानकारी AI से जनरेटेड हैं कुछेक तथ्य फोटोग्राफ मैंने प्रसंगानुकूल संयोजन किया हूं।
    डॉ. अनिल भतपहरी/ 9617777514

बौद्ध भिक्षुणियों की साधना स्थल : तुरतुरिया

बौद्ध भिक्षुणी साधना स्थली: तुरतुरिया 

सतनाम पंथ में एक साखी हैं। साखी वह जो कि मंगल भजन या पंथी भजन गाने के पूर्व सखियाए जाते हैं। साखी प्रमुखत: मुख्य गायक, पंडित, कड़िहार या कोई वादक भी हो सकते हैं। यह दो पंक्ति के होते हैं और उसके बाद क्षेपक गाकर सबकी मंगल कामना करते मंगल भजन/ पंथी भजन गाये जाते हैं।
उन्हीं अनगिनत साखियों में एक महत्वपूर्ण एवं पारंपरिक साखी हैं -
लक्ष्य कोस म गुरु बसे, सुरता  दिहव पठाय 
ज्ञान तुरी असवार हैं,गुरु छिन आवै पल जाय 
इसमें ज्ञान तुरी शब्द क्या हैं? इसे जानने समझने मेरा मन मथते रहा। कई लोग कहे यह तोर हैं तुरी नहीं।
गुरु ज्ञान में चढ़कर आते जाते हैं। कुछ विद्वान इसे ज्ञान तुरय यानि ज्ञान रूपी अश्व/ घोड़े पर चढ़कर सद्गुरु आते हैं।
तब मुझे बौद्ध धर्म के सहजानी सिद्धों की वाणियों में तुरी का मतलब समझ आया।  सिद्ध सरहपाद सहजयान के प्रवर्तक थे। प्राचीन पंथी निर्गुण और सिद्धवानी में हमें अनेक सिद्धों संतो की दोहा साखी शबद मंत्र उलट बासी आदि मिलते हैं। इन्हें कबीर से भी जोड़ते हैं।
(झारा खल्लारी महासमुंद निवासी भिक्षु रामेश्वरम जिनके दोनों पाँव रेलगाड़ी से कटे थे। वे युवावस्था में अपनी  माता जी की अस्थियां विसर्जन हेतु इलाहाबाद प्रयाग से वापस लौटते दुर्घटना ग्रस्त हो गए। जब स्वस्थ हुआ तब चेतना जागृत हो गए और वे बौद्ध धम्म अपनाकर भिक्षु होकर आजीवन गुरुघासीदास और तथागत बुद्ध की चेतना को प्रसारित करते रहे। वे हमारे दादा महंत नंदू नारायण भतपहरी और नाना द्वय नकुल देव ढीढी एवं कोंदा प्रसाद बघेल के मित्र रिश्तेदार और सहयोगी थे। उनसे मेरा साक्षात्कार वार्तालाप होते थे वे साधु वेश में नेपाल भूटान सिक्किम दार्जलिंग नागपुर इत्यादि बौद्ध स्थलों पर परिभ्रमण करते और बौद्ध विद्वानों से सत्संग वार्तालाप करते थे। उन्होंने ही मुझे पाली भाषा अक्षर इत्यादि की आरंभिक जानकारी दिए थे।
वे ज्ञान तुरी साधना के साधक और निर्भय एवं तटस्थ सा हो गए थे। उनकी पाली संस्कृत भाषा में अथ गुरु घासीदास चरितम अप्रकाशित पांडुलिपि था। जब मैं अध्यापक बना और पुस्तक आदि प्रकाशन की ओर ध्यान आकृष्ट हुआ तो उनके परिजनों से उक्त पांडुलिपि के बारे में जानकारियां ली परन्तु अपेक्षित जानकारी नहीं मिली। अन्यथा उनका प्रकाशन या सतनाम संदेश में किस्त में प्रकाशित करने की योजना असफल रहा।
   बाहरहाल तुरी साधना की एक अवस्था हैं। कबीर इस भाव को उन्मनी कहते हैं। मुझे लगता हैं यह तुरी साधना सिद्धि के कारण ही सिरपुर समीप सुरम्य तुरतुरिया का नाम हुआ। जहां बौद्ध भिक्षुणियां रहती और तुरी तंत्र साधना करती लोक कल्याण करती थी।)

   तुरतुरिया छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण परन्तु कम चर्चित प्राचीन बौद्ध स्थलों में से एक है। साधना में तुरी एक अवस्था हैं इसे सहज प्राप्त करने का सिद्ध स्थल तुरतुरिया हैं। 
कहाँ स्थित है?
तुरतुरिया रायपुर से लगभग 84 किमी और बलौदाबाजार जिला मुख्यालय से 29 किमी दूर, कसडोल तहसील के बहरिया गाँव के पास बलभद्री नाले पर स्थित है । छत्तीसगढ़ के इतिहासकार/ साहित्यकार हरि ठाकुर जी ने इसे बालमदेही नदी नाम देकर तुरतुरिया को वाल्मीकि आश्रम और लवकुश जन्म स्थली लिखें हैं। यह सिरपुर से मात्र 23 किमी दूर है और बारनवापारा अभयारण्य के पास पहाड़ियों से घिरा एक मनोरम स्थल है। इसे स्थानीय लोग सुरसुरी गंगा भी कहते हैं।  
नाम तुरतुरिया क्यों पड़ा?
इसका नाम बलभद्री नाले के कारण पड़ा। नाले का जल चट्टानों के माध्यम से निकलता है तो बुलबुलों से तुरतुर की ध्वनि निकलती है, इसलिए नाम तुरतुरिया पड़ा। जल एक लंबी संकरी सुरंग से होकर प्राचीन ईंटों से बने कुंड में गिरता है, जहाँ गोमुख बना हुआ है।  
बौद्ध भिक्षुणी साधना स्थली क्यों कहा जाता है?
यही इसका सबसे खास पक्ष है।

1. बौद्ध विहारों के प्रमाण: ऐसा माना जाता है कि यहाँ बौद्ध विहार थे जिनमें बौद्ध भिक्षुणियों का निवास था। सिरपुर के समीप होने के कारण इस बात को अधिक बल मिलता है कि यह स्थल कभी बौद्ध संस्कृति का केंद्र रहा होगा।  

2. मूर्तियाँ और अवशेष: यहाँ कुछ प्राचीन बुद्ध की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं, कुछ भग्न मंदिरों के अवशेष भी मिलते हैं। इस स्थल पर बौद्ध, वैष्णव तथा शैव धर्म से संबंधित मूर्तियों का मिलना यह सिद्ध करता है कि यहाँ कभी तीनों संप्रदायों की मिली-जुली संस्कृति रही होगी।  

3. समयकाल: यहाँ से प्राप्त शिलालेखों की लिपि से अनुमान है कि यहाँ की प्रतिमाओं का समय 8-9वीं शताब्दी है, यानी सिरपुर के बौद्ध उत्कर्ष काल के समकालीन।  

4. स्त्री परंपरा आज भी जीवित: आज भी यहाँ स्त्री पुजारिनों की नियुक्ति होती है, जो प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा है। यह सीधे तौर पर भिक्षुणी परंपरा से जुड़ा माना जाता है। कई विद्वान मानते हैं कि जो विशाल बुद्ध मूर्ति यहाँ है, उसे जनसाधारण वाल्मीकि ऋषि के रूप में पूजता है।  
रामायण से जुड़ी मान्यता
जनश्रुति है कि त्रेतायुग में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यही था और लव-कुश की यही जन्मस्थली थी। इसलिए यह स्थल वाल्मीकि आश्रम के नाम से भी प्रसिद्ध है।
  इसके साथ ही बौद्ध साधना स्थली के पार्श्व पहाड़ के शीर्ष में मातागढ़ स्थापित हैं जहाँ दुर्गा की नई प्रतिमा एवं मंदिर बनाई गई है बकरे की बलि होती हैं। खासकर पौष पूर्णिमा में यहाँ मेला लगता हैं।
   जीव हिंसा एवं बलि प्रथा को बंद कराने गुरुघासीदास ने सतनाम पंथ के माध्यम से जनजागरण चलाया इस कारण परिक्षेत्र के सतनामियों ने यहां जैतखाम स्थापित कर उनके विचारों को जनमानस में प्रसारित करते आ रहे हैं। यह भी दर्शनीय हैं।

कब जाएँ?

पौष माह में यहाँ तीन दिवसीय मेला लगता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। धार्मिक और पुरातात्विक महत्व के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी यह पर्यटकों को आकर्षित करता है।  

यदि आप सिरपुर जाते हैं तो तुरतुरिया को एक ही दिन में कवर किया जा सकता है, यह बौद्ध इतिहास में छत्तीसगढ़ की भिक्षुणी संघ की भूमिका को समझने के लिए सबसे प्रामाणिक स्थलों में से एक है।

उक्त जानकारी AI से जनरेटेड हैं कुछेक तथ्य फोटोग्राफ मैंने प्रसंगानुकूल संयोजन किया हूं।
    डॉ. अनिल भतपहरी/ 9617777514

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी



 परिचय

 -डॉ. अनिल कुमार भतपहरी*

*1. व्यक्तिगत परिचय*
- *नाम*: डॉ. अनिल कुमार भतपहरी 
- *माता*: श्रीमती केराबाई भतपहरी
- *पिता*: स्व. श्री सुकाल दास भतपहरी
- *शिक्षा*: एम.ए., पीएच.डी., पी.जी.डी.टी. (सुगम संगीत)
- *पता*: ऊँजियार सदन, सी 11/9077, सेंट जोसफ टाउन, अमलीडीह, रायपुर, छत्तीसगढ़

*2. सेवा विवरण*
- *संप्रति*: प्राध्यापक, हिंदी  
  वीरांगना रमौतीन माड़िया शासकीय आदर्श महिला महाविद्यालय, नारायणपुर
- *पूर्व पद*: 
  1. उप संचालक, उच्च शिक्षा विभाग, संचालनालय, इंद्रावती भवन, नवा रायपुर - 2024-25
    2. सचिव, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग - 2021 से 2024 
    3. सहायक संचालक, उच्च शिक्षा विभाग - 2019 से 2021
- *श्रेणी*: प्रथम | *वेतन मैट्रिक्स*: लेवल 13 A
- *अनुभव*: 23 वर्षों का अध्यापन अनुभव  
  2003 से 2019 तक 17 वर्षों तक NSS कार्यक्रम अधिकारी

*3. प्रमुख प्रशासकीय दायित्व*
1. राज्य स्तरीय साहित्यकार सम्मेलन आयोजन प्रभारी एवं राजकीय सम्मान निर्णायक समिति सदस्य
2. राजिम कल्प कुंभ 2023 में सत्कार / मंच प्रभारी
3. इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ के नोडल अधिकारी
4. राज्योत्सव 2024 एवं 2025 के लिए उच्च शिक्षा संचालनालय प्रभारी

*4. राजभाषा आयोग में विशेष उपलब्धियां 2021-23*
उत्तर जशपुर से दक्षिण बीजापुर, पूर्व रायगढ़ से पश्चिम डोंगरगढ़ तक *साहित्यकार-कलाकार सम्मेलन एवं प्रशिक्षण*  
- *100+ छत्तीसगढ़ी पुस्तकों का प्रकाशन*
- *"सुरहुत्ती" त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन* 
- प्रदेशभर से *500 साहित्यकारों का प्रांतीय सम्मेलन* होटल बेबीलॉन में आयोजित कर छत्तीसगढ़ी साहित्य को मुख्यधारा में लाने का प्रयास

*5. प्रकाशित कृतियाँ*
1. _कब होही बिहान_ - काव्य संग्रह, 2007
2. _पावन पिरीत के लहरा_ - कहानी संग्रह, 2015  
3. _गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ_ - 2019
4. _हँसा अकेला सतनाम संकीर्तन_ - 2019
5. _ठोस विचारों की कीमगिरी_ - लघु कथा संग्रह, 2021
6. _The value of a cup of tea_ - Short Stories
7. _हड्डी की जीभ नहीं कि न फिसले_ - काव्य संग्रह
8. _सुकुवा उवे न मंदरस झरे_ - काव्य संग्रह

*6. सम्मान एवं अलंकरण*
कौमी एकता सम्मान 2008, आरुग फूल सम्मान 2009, काव्य श्री 2012, विशिष्ट NSS अधिकारी सम्मान मैसूर 2012, छत्तीसगढ़ राजभाषा सम्मान 2012, राष्ट्र भाषा अलंकरण 2013, 2019, स्वास्थ्य मंत्रालय उत्कृष्ट सेवा सम्मान 2019, अंतर्राष्ट्रीय लघुकथा सम्मान काठमांडू 2022, बिलासा सम्मान 2023, विमल मित्र सम्मान 2023 एवं अन्य अनेक सम्मान।

*7. संपर्क सूत्र*
- *मोबाइल*: 9617777514
- *ईमेल*: anilbhatpahari@gmail.com
- *ब्लॉग*: सत सांधन - anilblogpost
- *YouTube*: Anil Bhatt CG
- *Website*: http://anil.in

---

डॉ अनिल कुमार भतपहरी

#anilbhaattcg 

 परिचय

 *डॉ. अनिल कुमार भतपहरी*

*1. व्यक्तिगत परिचय*
- *नाम*: डॉ. अनिल कुमार भतपहरी 
- *माता*: श्रीमती केराबाई भतपहरी
- *पिता*: स्व. श्री सुकाल दास भतपहरी
- *शिक्षा*: एम.ए., पीएच.डी., पी.जी.डी.टी. (सुगम संगीत)
- *पता*: ऊँजियार सदन, सी 11/9077, सेंट जोसफ टाउन, अमलीडीह, रायपुर, छत्तीसगढ़

*2. सेवा विवरण*
- *संप्रति*: प्राध्यापक, हिंदी  
  वीरांगना रमौतीन माड़िया शासकीय आदर्श महिला महाविद्यालय, नारायणपुर
- *पूर्व पद*: 
  1. उप संचालक, उच्च शिक्षा विभाग, संचालनालय, इंद्रावती भवन, नवा रायपुर - 2024-25
    2. सचिव, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग - 2021 से 2024 
    3. सहायक संचालक, उच्च शिक्षा विभाग - 2019 से 2021
- *श्रेणी*: प्रथम | *वेतन मैट्रिक्स*: लेवल 13 A
- *अनुभव*: 23 वर्षों का अध्यापन अनुभव  
  2003 से 2019 तक 17 वर्षों तक NSS कार्यक्रम अधिकारी

*3. प्रमुख प्रशासकीय दायित्व*
1. राज्य स्तरीय साहित्यकार सम्मेलन आयोजन प्रभारी एवं राजकीय सम्मान निर्णायक समिति सदस्य
2. राजिम कल्प कुंभ 2023 में सत्कार / मंच प्रभारी
3. इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ के नोडल अधिकारी
4. राज्योत्सव 2024 एवं 2025 के लिए उच्च शिक्षा संचालनालय प्रभारी

*4. राजभाषा आयोग में विशेष उपलब्धियां 2021-23*
उत्तर जशपुर से दक्षिण बीजापुर, पूर्व रायगढ़ से पश्चिम डोंगरगढ़ तक *साहित्यकार-कलाकार सम्मेलन एवं प्रशिक्षण*  
- *100+ छत्तीसगढ़ी पुस्तकों का प्रकाशन*
- *"सुरहुत्ती" त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन* 
- प्रदेशभर से *500 साहित्यकारों का प्रांतीय सम्मेलन* होटल बेबीलॉन में आयोजित कर छत्तीसगढ़ी साहित्य को मुख्यधारा में लाने का प्रयास

*5. प्रकाशित कृतियाँ*
1. _कब होही बिहान_ - काव्य संग्रह, 2007
2. _पावन पिरीत के लहरा_ - कहानी संग्रह, 2015  
3. _गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ_ - 2019
4. _हँसा अकेला सतनाम संकीर्तन_ - 2019
5. _ठोस विचारों की कीमगिरी_ - लघु कथा संग्रह, 2021
6. _The value of a cup of tea_ - Short Stories
7. _हड्डी की जीभ नहीं कि न फिसले_ - काव्य संग्रह
8. _सुकुवा उवे न मंदरस झरे_ - काव्य संग्रह

*6. सम्मान एवं अलंकरण*
कौमी एकता सम्मान 2008, आरुग फूल सम्मान 2009, काव्य श्री 2012, विशिष्ट NSS अधिकारी सम्मान मैसूर 2012, छत्तीसगढ़ राजभाषा सम्मान 2012, राष्ट्र भाषा अलंकरण 2013, 2019, स्वास्थ्य मंत्रालय उत्कृष्ट सेवा सम्मान 2019, अंतर्राष्ट्रीय लघुकथा सम्मान काठमांडू 2022, बिलासा सम्मान 2023, विमल मित्र सम्मान 2023 एवं अन्य अनेक सम्मान।

*7. संपर्क सूत्र*
- *मोबाइल*: 9617777514
- *ईमेल*: anilbhatpahari@gmail.com
- *ब्लॉग*: सत सांधन - anilblogpost
- *YouTube*: Anil Bhatt CG
- *Website*: http://anil.in

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Sunday, July 19, 2026

डॉ अनिल भतपहरी

#anilbhattcg 

धन्यवाद मंशाराम कुर्रे जी

अपने फेसबुक वाल में आज जन्मदिन पर सतनाम धर्म प्रचारक एवं सेवानिवृत  भिलाई स्टील प्लांट अधिकारी  कुर्रे जी  संयोजक गुरूवंदना परिवार भिलाई सदाशयता पूर्वक पोस्ट और फोटो डिज़ाइन कर डाले हैं ।उसे यथावत अपने सुधि पाठकों हेतु प्रस्तुत हैं-

🌹#सृजनधर्मी_साहित्यकार_ड_अनिल_भतपहरी
 
    #जी_को_जन्मदिवस_पर_हार्दिक_अभिनंदन🌹

#बौद्ध_संस्कृति_एवं_विश्व_धरोहर की ऐतिहासिक नगरी सिरपुर तथा परम पूज्य गुरु घासीदास बाबा जी की पावन कर्मभूमि भण्डारपुरी धाम के मध्य स्थित ग्राम पथरा जुनवानी की पुण्यभूमि के गौरव, आदरणीय वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अनिल भतपहरी जी का व्यक्तित्व साहित्य, संस्कृति, समाज और मानवीय मूल्यों का प्रेरणास्पद संगम है।

#डॉ_अनिल_भतपहरी_जी ने अपनी सृजनशील लेखनी के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, ग्रामीण जीवन, जनजीवन की संवेदनाओं, सामाजिक समानता तथा मानवीय मूल्यों को प्रभावशाली अभिव्यक्ति प्रदान की है। आपकी रचनाएँ केवल साहित्यिक सृजन नहीं हैं। बल्कि समाज को जागरूक, शिक्षित और संस्कारित करने वाली प्रेरक धरोहर हैं। उनमें लोकजीवन की सहजता, सामाजिक चेतना, करुणा, सांस्कृतिक अस्मिता तथा लोकमंगल की भावना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

#आप_केवल_एक_प्रख्यात_साहित्यकार ही नहीं है।बल्कि समाज को सकारात्मक दिशा देने वाले संवेदनशील चिंतक भी हैं। आपकी साहित्य साधना ने अनेक पाठकों, शोधार्थियों और युवा साहित्यकारों को नई दृष्टि एवं प्रेरणा प्रदान की है। आपका साहित्य सत, करुणा, समता, मानवता और नैतिक मूल्यों के आदर्शों को आत्मसात करते हुए समाज में सकारात्मक परिवर्तन तथा सांस्कृतिक संरक्षण का संदेश देता है।

#बौद्ध_नगरी_सिरपुर की ज्ञान-परंपरा और भण्डारपुरी धाम की सतनाम संस्कृति के मध्य स्थित इस पावन अंचल ने डॉ. अनिल भतपहरी जी जैसे साहित्य-साधक को जन्म देकर छत्तीसगढ़ की साहित्यिक चेतना को समृद्ध किया है। आपका जीवन इस सत का सशक्त प्रमाण है ,कि साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि समाज-निर्माण का प्रभावी माध्यम भी है।

जन्मदिवस के इस पावन अवसर पर हम सतनाम सतपुरुष पिता जी से प्रार्थना करते हैं।कि आदरणीय डॉ. अनिल भतपहरी जी को उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, सुख, समृद्धि, यश एवं निरंतर सृजनशीलता का आशीर्वाद प्रदान करें। आपकी लेखनी सदैव समाज को ज्ञान, प्रकाश, प्रेरणा और नई दिशा देती रहे तथा आप साहित्य, संस्कृति और मानवीय मूल्यों की अमूल्य सेवा करते हुए आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहें।

#आदरणीय_डॉ_अनिल_भतपहरी जी को जन्मदिवस की अनंत हार्दिक शुभकामनाएँ एवं अशेष मंगलकामनाएँ साधुवाद।

       🙏सादर साहेब सतनाम🙏
          मंशाराम कुर्रे नेचर विला 
                       संयोजक 
 गुरू वंदना केन्द्र भिलाई नगर जिला दुर्ग छत्तीसगढ़

Thursday, July 16, 2026

सतनाम संस्कृति में योग

रचनाकार
विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

 
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"सतनाम संस्कृति में योग" / डा. अनिल भतपहरी
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गुरु घासीदास प्रवर्तित सतनाम संस्कृति में योग एक अभिन्न अंग है। या यूं कहें - अनुयायी और साधक सहज कर्म योग में प्रवृत्त रहते हैं।

सतनाम सुमरन ध्यान और समाधि यहाँ विशिष्ट संस्कृति है।

गुरु घासीदास के पूर्वज मेदनीराय गोसाई संत प्रवृत्ति के थे। वे गिरौदपुरी परिछेत्र में ख्याति नाम नाडी वैद्य रहे। मानव के साथ- साथ अवाक पशुओं के चिकित्सा कर उनकी दुख और पीड़ा का शमन करते थे। वे  अपना नित्य कर्म सतनाम सुमरन और सहज ध्यान योग से आरंभ करके कर्मयोग में निरत हो जाया करते थे।

मेदनीदास /महगूदास के यहाँ अनेक सिद्ध साधु महात्माओं निरन्तर आगमन होते रहते और मानव कल्याण के साथ साथ जीवन के मुक्ति के संदर्भ में साधु संगत समय समय पर होते रहते।

बाल्यावस्था में ही शिशु घासी को विरासत से मानव और पशुओं की पीडा दुख का शमन करने की कला कौशल मिल गये थे। और साधु महात्माओं के दर्शन व सत्संग भी। अनेक सहजयान- ब्रजयान के साथ साथ गोरख पंथी साधुओं का सान्निध्य मिलते रहे हैं।

जन्म के तत्क्षण बाद एक साधु का नवजात शिशु का दर्शन करने आना और बालक को गोद में लेकर आंगन में नाचना तथा उनके चरणों में शीश नवाना एक विलक्षण बालक के शुभागमन का अप्रतिम संदेश है-

आये जोगी द्वार में एक साधु आये द्वार में।

बालक रुप देख मोहाए आये साधु द्वार में

चरण म माथा टेकाए आये साधु द्वार में। ( संदर्भ सतनाम संकीर्तन पृष्ठ ७)

धीर गंभीर संत प्रवृत्ति उनके बाल चरित में अनायास झलकता है।इसका रोचक व मुग्धकारी वर्णन दृष्टव्य है-

दिन दिन बढ़े अंगना गली खोर खेलय

एक समय के बाते ये न

खेलय गुल्ली डंडा

परगे गांव म डंका

मरे चिर ई ल करदिन चंगा ...(सं वही पृ १०)

इस तरह देखे तो पशु पंछी के प्रति प्रेम और उनके धायल अवस्था में उपचार कर नव जीवन देना महत्वपूर्ण है।

इसी तरह गन्ने बाड़ी में सर्पदंश से पीड़ित साथी बुधारु का उपचार से विशिष्ट ख्याति फैलने लगते हैं-

बाल पन म महिमा देखाए

चिर ई अउ बुधरु ल जियाये

(सं सतनाम सरित प्रवाह )

किशोरावस्था के बाद नवयुवक घासी द्वारा एकान्त में ध्यान चिन्तन करना और कुछ असामान्य सा कार्य जैसे बलि हेतु ले बकरा को मुक्त करना और स्वतः हल चलाकर अंधविश्वास का दमन करना गरियार बैल को प्रेम से सहलाकर अधर नागर चलाना अप्रतिम कार्य रहा है। यह सब कार्य एक विशिष्ट सूक्ष्म शक्ति से संचालित हुआ। जिसे हम कह सकते हैं कि गुरु बाबा को यह शक्ति उन्हें यौगिक क्रियाओं से प्राप्त विशिष्ट शक्ति से रहा।

कुछ कह सकते है कि एकाएक उसने यह सब कैसे अर्जित किया? इनका सहज सा उत्तर कि वह एक अज्ञात साधु जो उन्हें बाल अवस्था में पाकर आंगन में नाचे और उनके चरण छुए ।तो यही उन्हें स्पर्श या रेकी योग से आध्यात्मिक शक्ति जो साधारण जनमानस को समझ न आए इसलिए रहस्य है । नहीं दिखने के कारण अलौकिक है ।चमत्कार सा लगने लगे।

गांव के ग्रामीण जन्य घासी को जदुहा होने और तंत्र साधना करने वाले हठयोगी होने की बातें कहने लगे। धुन के पक्का घासीदास कही वैराग्य आदि लेकर साधु जोगी न बन जाय इसलिए उनका विवाह एक सुन्दर कन्या सफुरा से कर दी गई।

पर सफुरा संयोग से विलक्षण और सहज योग की क्रिया अपने पिता महंत अंजोरदास से अर्जित की हुई. थी। यह संयोग भी विलक्षण थे-

सिरपुर नगर के मंहत नाम्ही अंजोरदास ग

ओकर सुध्धर क इना

नाव सफुरा ताय ग

उज्जर उज्जर रुप ओकर

ज इसे फूल कांस ग

ये दे शोभा बरन नही जाय ग ..सतनाम संकीर्तन पृ १३

विवाहोपरान्त सहज और कर्म योग चलते रहा पर इस बीच अनहोनी हुआ । उनके ७ वर्ष के ज्येष्ठ पुत्र अम्मरदास का खो जाना दुख का सबब बना ।कहते है उस विलक्षण बालक को किसी साधू ने योग सिद्धी की दीछा हेतु साथ वन ले गये।

वे मन शान्ति प्रयोजनार्थ तीर्थ यात्रियों के जत्थे में सम्मिलित होकर जगन्नाथ पुरी प्रयाण किए ।इस दरम्यान उन्हें साधु संगत मिला और अनेक पाखन्ड कुरीतियों से रुबरु हुए  -

धरिन रद्दा जगन्नाथ के गजब सुनिस बडाई।

दीन दुखिया दुख देखिस अउ पंडा के लुटाई ।।

कपडा रंगाये मिले गोरख मुनी बबा ब इठिन उन के पास।

सुनिन परवचन मुनि के पुरा न इ होइस आस

रंगहा कपडा फेर मन न इ रंगे

देखे लहुटत चंद्रसेनी म बलि छैदत्ता पाडा।

मन बिचलित हालाकान जीव हिंसा गाडा गाडा

देख बबा के मन भिरंगे तीरथ में शांति न इ पाए ....

माध पुन्नी के पुनवास म सतनाम उच्चारे .....वही पृ १७

अब वह आत्म ज्ञान और अनेक तरह के रहस्य को समझने सहज योग के स्थान पर हठ योग साधते हैं और कठोर अग्नि तपस्या में लीन हो ६ माह तक कठोर साधना सोनाखान जंगल में करते हैं। और छाता पहाड़ में ध्यान समाधि करते थे।

इस दरम्यान पुत्र संताप और पति वियोग से सफुरा अवचेतन अवस्था में घर पर ही भाव समाधि ली। और उधर घासीदास कठोर हठ योग अग्नि समाधि में प्रवृत्त हुये।

कुण्डली जागरण और अनेक तरह के अपरा ज्ञान से अभिभूत घासी को अहसास हुआ कि अब घर जाया जाए।

जब पता चला कि सफूरा का देहान्त हो गया और उसे दफना दिया गया है। तो वह मानने तैयार नहीं हुये कि उनकी कैसी मृत्यु होगी। वह भावलीन समाधि में सिद्धहस्त हैं । उसका कब्र खोदो ....उसे जागरण करते हैं। बात बिजली की करेन्ट की भांति सर्वत्र फैल गई । हजारों की उपस्थिति में माता सफुरा को उनकी समाधि से मुक्त करवाकर चेतना सम्पन्न किए। नवजीवन दिये इस प्रसंग को देखे-

ब्रह्मांड में सांस चढ़ा के करे गुरु योगासन

जोति समागे लाश म करे नर नारि दरसन

सतनाम सुमर के बबा देवय अमृतपानी....

इस तरह उनकी ख्याति सर्वत्र फैल गई ।गुरु भी अपनी विशिष्ट ज्ञान कला कौशल को सहज योग से सदैव साधते रहे औरा धौरा तेन्दु वृक्ष के नीचे उनका ध्यान योग समाधि चलते और धूनी जलाते भीषण वन में साधनारत रहते।

एक दिन अपार भीड़ के समक्ष सतनाम पंथ का सिद्धान्त और उपदेश तथा लोकाचार व सहज योग को व्यवहृत करने सात्विक जीवन व सत्य को सदैव अपने अंतःकरण में धारण और व्यवहार करने की उपदेशना देते सतनाम धर्म ( पंथ ) का प्रवर्तन किए।

नित्य प्रात और संध्या सूर्योपासना करते सात्विक जीवन यापन करना और सतनाम धुनि में निमग्न कर्मयोग ही सतनाम का आधार है। हर अच्छाइयों का समन्वय सतनाम में सन्निहित है। पंचाक्षर सतनाम का नित्य सुमरन स्नान सूर्योपासना और ध्यान कर कर्म में लीन अभाव के मध्य जितना है उतने में संतुष्ट सुखमय जीवन ही सतनाम का मरहम और धरम है ।

गुरु घासीदास के साधना अवस्था में पद्मासन मुद्रा और उनके उपदेश देते अभय मुद्रा तथा सर्व मंगल की कामना करते अर्ध निमिलित नयन ध्यान मुद्रा की चित्र अत्यन्त लोकप्रिय है। यह सभी तथ्य उनके महायोगी होने का साक्ष्य है। जिसने संसार में मानव के दुख के निदान बताये । ७ सिद्धांत असंख्य उपदेश ४२ अमृतवाणी २७ मुक्तक और सुन्दर भावप्रवण पंथी गीत मंगलभजन व सामूहिक प्रदर्शन हेतु पंथी नृत्य जिसे देख सुन तन मन वचन पवित्र होते है। दुख का तिरोभाव हो जाते है और अन्तकरण में आनंद समाते हैं।

इनके लिए वे गुरु संत महंत भंडारी साटीदार जैसे धार्मिक पद सृजित किए।जो अध्यात्म की परिचालन करते सतनाम दर्शन को व्यवहारिक स्वरुप देते हैं। जमीन के नीचे ढाई तीन पांच और सप्त दिन की विशिष्ट भू समाधि आज भी सतनामियों में प्रचलित है ।इसके सैकड़ों साधक वर्तमान में है।इसी तरह जल समाधि अग्नि समाधि और सहज प्रचलित है।गुरु वंशज गुरु मुक्ति साहेब जल समाधि में प्रवीण है जो गुरुद्वारा खपरीधाम सरोवर में प्रति सोमवार संध्या जल समाधि लेते हैं हजारों श्रद्धालु एकत्र हो दर्शन लाभ लेते हैं।

गुरु घासीदास के सम्मान व उनके समकक्ष न होने के लिए अग्नि समाधि अब तक कोई नहीं लिए है। सहज समाधि हर किसी के लिए है और इसे लाखों लोग लेते आ रहे हैं।

जहां दुख है वहाँ सतनाम नहीं बल्कि दुखों के बीच ही सुख भाव में रहकर सद्कर्म करते दुख का निदान ही सतनाम का प्रयोजन है। इस तरह देखें तो

जन्म और सुखमय जीवन का उपाय सतनाम में है यह उपाय या युक्ति ही सहज योग है।

सत श्री सतनाम

डा- अनिल भतपहरी, जुनवानी रायपुर छग

सतनाम संस्कृति में योग

रचनाकार
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"सतनाम संस्कृति में योग" / डा. अनिल भतपहरी
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गुरु घासीदास प्रवर्तित सतनाम संस्कृति में योग एक अभिन्न अंग है। या यूं कहें - अनुयायी और साधक सहज कर्म योग में प्रवृत्त रहते हैं।

सतनाम सुमरन ध्यान और समाधि यहाँ विशिष्ट संस्कृति है।

गुरु घासीदास के पूर्वज मेदनीराय गोसाई संत प्रवृत्ति के थे। वे गिरौदपुरी परिछेत्र में ख्याति नाम नाडी वैद्य रहे। मानव के साथ- साथ अवाक पशुओं के चिकित्सा कर उनकी दुख और पीड़ा का शमन करते थे। वे  अपना नित्य कर्म सतनाम सुमरन और सहज ध्यान योग से आरंभ करके कर्मयोग में निरत हो जाया करते थे।

मेदनीदास /महगूदास के यहाँ अनेक सिद्ध साधु महात्माओं निरन्तर आगमन होते रहते और मानव कल्याण के साथ साथ जीवन के मुक्ति के संदर्भ में साधु संगत समय समय पर होते रहते।

बाल्यावस्था में ही शिशु घासी को विरासत से मानव और पशुओं की पीडा दुख का शमन करने की कला कौशल मिल गये थे। और साधु महात्माओं के दर्शन व सत्संग भी। अनेक सहजयान- ब्रजयान के साथ साथ गोरख पंथी साधुओं का सान्निध्य मिलते रहे हैं।

जन्म के तत्क्षण बाद एक साधु का नवजात शिशु का दर्शन करने आना और बालक को गोद में लेकर आंगन में नाचना तथा उनके चरणों में शीश नवाना एक विलक्षण बालक के शुभागमन का अप्रतिम संदेश है-

आये जोगी द्वार में एक साधु आये द्वार में।

बालक रुप देख मोहाए आये साधु द्वार में

चरण म माथा टेकाए आये साधु द्वार में। ( संदर्भ सतनाम संकीर्तन पृष्ठ ७)

धीर गंभीर संत प्रवृत्ति उनके बाल चरित में अनायास झलकता है।इसका रोचक व मुग्धकारी वर्णन दृष्टव्य है-

दिन दिन बढ़े अंगना गली खोर खेलय

एक समय के बाते ये न

खेलय गुल्ली डंडा

परगे गांव म डंका

मरे चिर ई ल करदिन चंगा ...(सं वही पृ १०)

इस तरह देखे तो पशु पंछी के प्रति प्रेम और उनके धायल अवस्था में उपचार कर नव जीवन देना महत्वपूर्ण है।

इसी तरह गन्ने बाड़ी में सर्पदंश से पीड़ित साथी बुधारु का उपचार से विशिष्ट ख्याति फैलने लगते हैं-

बाल पन म महिमा देखाए

चिर ई अउ बुधरु ल जियाये

(सं सतनाम सरित प्रवाह )

किशोरावस्था के बाद नवयुवक घासी द्वारा एकान्त में ध्यान चिन्तन करना और कुछ असामान्य सा कार्य जैसे बलि हेतु ले बकरा को मुक्त करना और स्वतः हल चलाकर अंधविश्वास का दमन करना गरियार बैल को प्रेम से सहलाकर अधर नागर चलाना अप्रतिम कार्य रहा है। यह सब कार्य एक विशिष्ट सूक्ष्म शक्ति से संचालित हुआ। जिसे हम कह सकते हैं कि गुरु बाबा को यह शक्ति उन्हें यौगिक क्रियाओं से प्राप्त विशिष्ट शक्ति से रहा।

कुछ कह सकते है कि एकाएक उसने यह सब कैसे अर्जित किया? इनका सहज सा उत्तर कि वह एक अज्ञात साधु जो उन्हें बाल अवस्था में पाकर आंगन में नाचे और उनके चरण छुए ।तो यही उन्हें स्पर्श या रेकी योग से आध्यात्मिक शक्ति जो साधारण जनमानस को समझ न आए इसलिए रहस्य है । नहीं दिखने के कारण अलौकिक है ।चमत्कार सा लगने लगे।

गांव के ग्रामीण जन्य घासी को जदुहा होने और तंत्र साधना करने वाले हठयोगी होने की बातें कहने लगे। धुन के पक्का घासीदास कही वैराग्य आदि लेकर साधु जोगी न बन जाय इसलिए उनका विवाह एक सुन्दर कन्या सफुरा से कर दी गई।

पर सफुरा संयोग से विलक्षण और सहज योग की क्रिया अपने पिता महंत अंजोरदास से अर्जित की हुई. थी। यह संयोग भी विलक्षण थे-

सिरपुर नगर के मंहत नाम्ही अंजोरदास ग

ओकर सुध्धर क इना

नाव सफुरा ताय ग

उज्जर उज्जर रुप ओकर

ज इसे फूल कांस ग

ये दे शोभा बरन नही जाय ग ..सतनाम संकीर्तन पृ १३

विवाहोपरान्त सहज और कर्म योग चलते रहा पर इस बीच अनहोनी हुआ । उनके ७ वर्ष के ज्येष्ठ पुत्र अम्मरदास का खो जाना दुख का सबब बना ।कहते है उस विलक्षण बालक को किसी साधू ने योग सिद्धी की दीछा हेतु साथ वन ले गये।

वे मन शान्ति प्रयोजनार्थ तीर्थ यात्रियों के जत्थे में सम्मिलित होकर जगन्नाथ पुरी प्रयाण किए ।इस दरम्यान उन्हें साधु संगत मिला और अनेक पाखन्ड कुरीतियों से रुबरु हुए  -

धरिन रद्दा जगन्नाथ के गजब सुनिस बडाई।

दीन दुखिया दुख देखिस अउ पंडा के लुटाई ।।

कपडा रंगाये मिले गोरख मुनी बबा ब इठिन उन के पास।

सुनिन परवचन मुनि के पुरा न इ होइस आस

रंगहा कपडा फेर मन न इ रंगे

देखे लहुटत चंद्रसेनी म बलि छैदत्ता पाडा।

मन बिचलित हालाकान जीव हिंसा गाडा गाडा

देख बबा के मन भिरंगे तीरथ में शांति न इ पाए ....

माघ पुन्नी के पुनवास म सतनाम उच्चारे .....वही पृ १७

अब वह आत्म ज्ञान और अनेक तरह के रहस्य को समझने सहज योग के स्थान पर हठ योग साधते हैं और कठोर अग्नि तपस्या में लीन हो ६ माह तक कठोर साधना सोनाखान जंगल में करते हैं। और छाता पहाड़ में ध्यान समाधि करते थे।

इस दरम्यान पुत्र संताप और पति वियोग से सफुरा अवचेतन अवस्था में घर पर ही भाव समाधि ली। और उधर घासीदास कठोर हठ योग अग्नि समाधि में प्रवृत्त हुये।

कुण्डली जागरण और अनेक तरह के अपरा ज्ञान से अभिभूत घासी को अहसास हुआ कि अब घर जाया जाए।

जब पता चला कि सफूरा का देहान्त हो गया और उसे दफना दिया गया है। तो वह मानने तैयार नहीं हुये कि उनकी कैसी मृत्यु होगी। वह भावलीन समाधि में सिद्धहस्त हैं । उसका कब्र खोदो ....उसे जागरण करते हैं। बात बिजली की करेन्ट की भांति सर्वत्र फैल गई । हजारों की उपस्थिति में माता सफुरा को उनकी समाधि से मुक्त करवाकर चेतना सम्पन्न किए। नवजीवन दिये इस प्रसंग को देखे-

ब्रह्मांड में सांस चढ़ा के करे गुरु योगासन

जोति समागे लाश म करे नर नारि दरसन

सतनाम सुमर के बबा देवय अमृतपानी....

इस तरह उनकी ख्याति सर्वत्र फैल गई ।गुरु भी अपनी विशिष्ट ज्ञान कला कौशल को सहज योग से सदैव साधते रहे औरा धौरा तेन्दु वृक्ष के नीचे उनका ध्यान योग समाधि चलते और धूनी जलाते भीषण वन में साधनारत रहते।

एक दिन अपार भीड़ के समक्ष सतनाम पंथ का सिद्धान्त और उपदेश तथा लोकाचार व सहज योग को व्यवहृत करने सात्विक जीवन व सत्य को सदैव अपने अंतःकरण में धारण और व्यवहार करने की उपदेशना देते सतनाम धर्म ( पंथ ) का प्रवर्तन किए।

नित्य प्रात और संध्या सूर्योपासना करते सात्विक जीवन यापन करना और सतनाम धुनि में निमग्न कर्मयोग ही सतनाम का आधार है। हर अच्छाइयों का समन्वय सतनाम में सन्निहित है। पंचाक्षर सतनाम का नित्य सुमरन स्नान सूर्योपासना और ध्यान कर कर्म में लीन अभाव के मध्य जितना है उतने में संतुष्ट सुखमय जीवन ही सतनाम का मरहम और धरम है ।

गुरु घासीदास के साधना अवस्था में पद्मासन मुद्रा और उनके उपदेश देते अभय मुद्रा तथा सर्व मंगल की कामना करते अर्ध निमिलित नयन ध्यान मुद्रा की चित्र अत्यन्त लोकप्रिय है। यह सभी तथ्य उनके महायोगी होने का साक्ष्य है। जिसने संसार में मानव के दुख के निदान बताये । ७ सिद्धांत असंख्य उपदेश ४२ अमृतवाणी २७ मुक्तक और सुन्दर भावप्रवण पंथी गीत मंगलभजन व सामूहिक प्रदर्शन हेतु पंथी नृत्य जिसे देख सुन तन मन वचन पवित्र होते है। दुख का तिरोभाव हो जाते है और अन्तकरण में आनंद समाते हैं।

इनके लिए वे गुरु संत महंत भंडारी साटीदार जैसे धार्मिक पद सृजित किए।जो अध्यात्म की परिचालन करते सतनाम दर्शन को व्यवहारिक स्वरुप देते हैं। जमीन के नीचे ढाई तीन पांच और सप्त दिन की विशिष्ट भू समाधि आज भी सतनामियों में प्रचलित है ।इसके सैकड़ों साधक वर्तमान में है।इसी तरह जल समाधि अग्नि समाधि और सहज प्रचलित है।गुरु वंशज गुरु मुक्ति साहेब जल समाधि में प्रवीण है जो गुरुद्वारा खपरीधाम सरोवर में प्रति सोमवार संध्या जल समाधि लेते हैं हजारों श्रद्धालु एकत्र हो दर्शन लाभ लेते हैं।

गुरु घासीदास के सम्मान व उनके समकक्ष न होने के लिए अग्नि समाधि अब तक कोई नहीं लिए है। सहज समाधि हर किसी के लिए है और इसे लाखों लोग लेते आ रहे हैं।

जहां दुख है वहाँ सतनाम नहीं बल्कि दुखों के बीच ही सुख भाव में रहकर सद्कर्म करते दुख का निदान ही सतनाम का प्रयोजन है। इस तरह देखें तो

जन्म और सुखमय जीवन का उपाय सतनाम में है यह उपाय या युक्ति ही सहज योग है।

सत श्री सतनाम

डा- अनिल भतपहरी, जुनवानी रायपुर छग

गजामुंग ख वइया

Tuesday, July 14, 2026

स्वतंत्रता

#anilbhattcg 
स्वतंत्रता 

समझ न आने वाली बातें
 करना ही बौद्धिकता है
जहाँ जरुरत हो बोलने की 
वहाँ चुप रहना नैतिकता है
पुरातन परम्पराओं का 
उत्सव मनाना धार्मिकता है
बर्बर आदिम प्रथाओं को 
विरासत समझ भाव गर्विता हैं 
यथास्थिति कायम रहें
यही प्राथमिकता है 
कोई हलचल न हो 
बस इसकी आवश्यकता हैं 
नवाचार का प्रतिरोध 
उनकी आधुनिकता है 
इन सब पर हस्तक्षेप 
न करना सज्जनता है
मित्रों ऐसा जीवन निर्वहन 
करना क्या स्वतंत्रता हैं ?

     -डॉ.अनिल भतपहरी

     

Saturday, July 11, 2026

टैबलेट

होते उपदेश 
बड़े लोगों की मौन 
करा रहें क्लेश 
अब बड़े लोगों की मौन 

टैबलेट

बड़े लोगों की मौन 
होते उपदेश 
अब उनके मौन ही 
करा रहे क्लेश 

हाइकू

पहले मौन 
होते थे उपदेश 
अब है क्लेश 

तीजन

तीजन 

पंडवानी की पर्याय हो चुकी  पद्म विभूषण तीजन बाई की लंबी बीमारी के बाद दुःखद निधन से कला जगत सहित प्रदेश में शोक व्याप्त हैं। निरक्षर होते हुए भी वो महाभारत एवं श्रीमद्भागवत की गूढ़तम बातें ऐसे प्रस्तुत करती कि श्रोताओं के मानस पटल पर उनकी बातें सदैव अंकित हो जाती थी।

   गुरु घासीदास छात्रावास आमापारा रायपुर में रहते छात्र जीवन में पहली बार मैं 1988 -89 में उनकी पंडवानी  विवेकानंद आश्रम रायपुर में श्रवण किया ।तब आत्मानंद जी थे और उनसे छिटपुट संवाद भी होते रहें हैं । तत्कालीन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा जी के आगमन पूर्व उनकी "राजा जनमेजय नाग यज्ञ पर्व " प्रस्तुति सुना और उनकी अप्रतिम भावाभिव्यक्ति देख चकित हुआ। क्योंकि मैं पिता श्री के नवरंग नाट्य कला मंच से निकला अभिनय की बारीकियां को छुटपुट जनता समझता भी था और शहर की सांस्कृतिक गतिविधियों के दर्शक और यदा कदा प्रतिभागी भी हुआ करता था।

उनकी दूसरी प्रस्तुति लंबे अंतराल बाद छत्तीसगढ़ राज्य के अभ्युदय के बाद प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी जी के शपथ ग्रहण समारोह पुलिस ग्राउंड रायपुर में देखा ।तब सहायक प्राध्यापक हुए 4 वर्ष हो चुका था और कई छात्रों/ कलावंत लोगों को ऑटोबायोग्राफी देने का सौभाग्य मिलना शुरू भी हो गया था। (पिताश्री सुकाल दास भतपहरी शिक्षक कलावंत रायपुर रिसर्च सेंटर हॉस्पिटल में हार्निया आपरेशन उपरांत भर्ती था। वे ही समारोह स्थल जाकर इतिहास बनते देखने और साक्षी होने का आशीष दिए थे।हालांकि उन्हें लाख उपाय के बाद बचा नहीं सके और महीने भर बाद दिल्ली एम्स में 4 दिसंबर 2000 को सतलोक प्रयाण कर गये। )  पहली ऑटोग्राफ मैने अपने पॉकेट डायरी जो अक्सर रखकर चलता था ,के एक पेज पर तीजन बाई का ऑटोबायोग्राफ लिया। कत्थक देखा और वापस अस्पताल आकर पिता श्री को उनकी ऑटोग्राफ दिखाया। वे प्रदेश बनते और एक कला साधिका की हस्ताक्षर देख हर्षित हुए।
     तीजन साक्षरता अभियान से जुड़ी अक्षर समझी,हस्ताक्षर करना सीखी। विरासत से प्राप्त ज्ञान  नैसर्गिक प्रतिभा से वे विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट मानद उपाधि पाई और लोग उनपर पी-एच.डी. भी की। आगे भी करेंगे।
        निःसंदेह  तीजन कापालिक शाखा की महारानी थी और उनकी असाधारण उपलब्धियां कला साधकों के लिए प्रेरक और प्रदेश के गौरव हैं। वे छिन (पाम पौधे की पत्ती)की बाहरी (झाड़ू )बेचकर आजीविका कमाती अपनी कला साधना से "फर्श से अर्श की ऊँचाई"  स्पर्श की। उनकी अदम्य संघर्ष, साधना, प्रस्तुति  एवं उपलब्धि सदैव प्रेरक रहेंगे।
     विन्रम श्रद्धांजलि शत शत नमन...

डॉ.अनिल भतपहरी 9617777514

Friday, July 10, 2026

सतनाम धर्म - संस्कृति के संवाहक समुदाय संगठित हो।

सतनाम धर्म -संस्कृति के संवाहक संगठित हो 

भारतीय संस्कृति  में अनेक जाति ,वर्ण , पंथादि हैं। इसलिये उनमें अनेक मत -मतांतर  हैं परंतु उनके बीच एक अंतर्संबंध भी हैं। गहराई से विचार करने पर वे सब उजागर होते हैं। ज्ञात इतिहास से अवगत होते हैं कि बौद्धिक चेतना के केंद्र में बुद्ध  हैं। 
       पूर्व मान्यताओं के इतर उनकी शिक्षा में ईश्वर आत्मा स्वर्ग नर्क नहीं हैं बल्कि मानवता हैं और मानव समुदाय में परस्पर  सौहार्द्र पूर्वक जीवन निर्वाह हेतु सुगम मध्यम मार्ग हैं। उनके उपदेश ध्यान योग समाधि निर्वाण त्रिपिटक धम्मपद आदि ही महायान हीनयान तंत्रयान ब्रजयान होते सहजयान जैसे शाखाओं प्रशाखाओ में अस्तित्व मान हुई।

    कालांतर में सहजयानी सतनामियों के "निर्वाण ग्रन्थ"  कबीर का बीजक, गोरख वाणी ,रैदास रामायण ,नानक सलोकु सहित सबके सार" गुरु ग्रंथ साहिब" ,गुरुघासीदास की अमृतवाणी से छत्तीसगढ़ में "सतनामयन , सतनाम -संकीर्तन जैसे निर्गुण ग्रंथ/साहित्य सृजित हुआ। इनसे विकसित "सतनाम दर्शन "भारतीय षट्दर्शन में वर्ण, जाति विहीन समुदाय हेतु "सप्त दर्शन"  के रुप में प्रतिष्ठित हो रहे हैं।
सिख धर्म में गुरुद्वारा में साध संगत का अत्यंत महत्व हैं वहां साध सतनामी का आदर दर्शनीय हैं। 
  सत्य दर्शन नामक प्रतिष्ठान विगत 50 वर्षों से साहित्यिक एवं बौद्धिक जगत में  लोकप्रिय हैं। सत्य ध्वज, सत्यालोक और सतनाम संदेश जैसे पत्रिकाएं संतो गुरुओं की सीख और उपदेश को लिपिबद्ध कर संरक्षित करने की अनुपम कार्य किए।अब अनेक संस्थान उनके अनुरुप कार्य करने प्रतिबद्ध हैं।
   अब समय हैं कि बुद्ध से लेकर गुरुघासीदास तक 2500 वर्षों की ज्ञान -विज्ञान, साधना -सिद्धी , साहित्य -दर्शन कलाएं जो परम सत्य और सदा मानव को सदमार्ग दिखाने वाले सनातन संस्कृति  के अभिन्न अंग हैं ।इनके प्रवर्तक एवं संवाहक गुरुओं /संतो की अनुयाई जो देश विदेश में करोड़ों की संख्या में विद्यमान हैं वे सभी एकत्र और संगठित हो।  ताकि समानता से युक्त सतनाम की अजस्त्र धारा अविरल प्रवाहित होता रहें। इनके अनुयाई जो कृषक, उत्पादक श्रमण हैं ।वह सामंती  एवं अधिनायक वाद के शोषण दमन आदि से मुक्त रहें । 
      जय सतनाम

Sunday, June 28, 2026

शउर ( ग़ज़ल)

शउर तक नहीं जिन्हें प्याली उठाने के 
कैसे कैसे लोग चले आते हैं मयखाने में 

खा रहे बेतरतीब पर वे क्यों अघाते नहीं 
कोई नायाब नुस्खा मददगार हैं पचाने में 

मत जाओं वहां न कद्र और शोर हैं बहुत 
चुप अजनबी सा मौज किसी के जनाज़े में 

हर बार हसरतें जग उठती हैं बारिश में 
पर क्या बेबसी जमीं की बंजर है उगाने में 

शलिकादारो से न करो उम्मीद कुछ होगा नहीं 
चले बेशउर तलाशे अब नई मज़ा अफ़साने में

सरई बोड़ा

सरई बोड़ा की साग 

बोड़ा, ईमली कढ़ी, मडिया (रागी)चीला, स्ट्रीम रईस भात और कई दशकों से एक ही ब्रांड जबलपुर का लिज्जत पापड़ ।

पहली बार आज रात्रि भोजन में औषधीय गुणकारी एवं अनुपम स्वाद का मणिकांचन युति.. बोड़ा की साग खाकर सच में मज़ा आ गया।
   तभी तो बोड़ा बस्तर के हाट बाजार में ही हज़ार बारह सौ किलो बिक रहे हैं।

   वैसे अपने सुधि पाठकों को अवगत करा दूं 1996 में ही पेंड्रारोड के बाज़ार में बोड़ा 20 रु कूढ़ा (लगभग 200 Gram)  में सबसे महंगी और अनोखी सब्ज़ी का गुणगान कॉलेज के वरिष्ठ प्राध्यापको से सुनकर मंगली बाजार से खरीद कर घर लाया ।परन्तु नई नवेली सुवारी ने जब धोकर काटी अंदर से कालापन और लिरबूट चिपचिपा पन देख बिचक कर फेंक दी। पंडित घर की बेटी विशुद्ध शाकाहारी जो थीं...तब से बोड़ा कभी खरीदे ही नहीं न कहीं खाने मिल पाया।
पर आज 30 वर्षों के बाद उनकी अनुपस्थिति में  बोड़ा का आस्वादन ले ही लिया। हालाँकि इसे न खरीदा न बनाया पर इतना तो हैं कि आसपास आज भी कुछ स्नेही जनों से  भेंट उपहार स्वरुप मिल ही जाते हैं। एक सज्जन ने इसी तरह जोजिया के भीषण गर्मी में मड़िया पेज पिलाकर तृप्त किया।

    बहरहाल अनुपम स्वाद वाली यह बोड़ा सरई पेड़ के नीचे तने के आसपास बादल की गर्जना से मशरुम की तरह उग आते हैं। इस तरह सरई वनांचल में महुए के बाद बहुपयोगी वृक्ष हैं। इनकी पत्ते की दोना पत्तल, सीधी नर्म टहनियों की दातुन , फूल फल खाने एवं अन्य उपयोगी वस्तुएं बनाने और लकड़ी चौखट दरवाजे से लेकर रेलवे सीलपट से लेकर अनेक तरह की उपयोगी हैं।
   सतनाम संस्कृति में सरई अत्यंत पवित्र वृक्ष हैं इनके जैतखाम बनाएं जाते हैं इसलिए सरई पेड़ श्रद्धा एवं आस्था का प्रतीक हैं। श्रद्धालु पेड़ को देखकर प्रणाम करके ही आगे गंतव्य की ओर प्रयाण करते हैं।

Saturday, June 6, 2026

डॉ अनिल कुमार भतपहरी

नाम : डॉ.अनिल कुमार भतपहरी 
माता : श्रीमती केराबाई भतपहरी
पिता: स्व. सुकाल दास  भतपहरी 
शिक्षा : एम ए पीएचडी पी. जी. डी. टी. सुगम संगीत 
संप्रति: प्राध्यापक हिंदी 
वर्तमान पद : उप संचालक उच्च शिक्षा विभाग संचालनालाय इंद्रावती भवन नवा रायपुर 

श्रेणी : प्रथम
वेतन मैट्रिक लेवल 13 A
वेतन : 205000

अनुभव: 23 वर्षो का आध्यापन
एवं 2003 से 2019 तक सत्रह वर्षो तक रसेयों कार्यक्रम अधिकारी

प्रशासकीय अनुभव : 1.  सहायक संचालक उच्च शिक्षा विभाग 2019-2021 

2. सचिव,छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग  2021- 2024 

3 उप संचालक उच्च शिक्षा विभाग 2024  से अब तक
 
4 राज्य स्तरीय साहित्यकार सम्मेलन आयोजन प्रभारी एवं राजकीय सम्मान के लिए निर्णायक समिति में सदस्य 
5 राजिम कल्प कुंभ 2023 में सत्कार/ मंच प्रभारी
6 इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ का नोडल अधिकारी 
7  राज्योत्सव 2024 एवं 2025 के लिए उच्च शिक्षा संचालनालय प्रभारी ।
प्रकाशित कृति - 1 कब होही बिहान  काव्य संग्रह (सर्व प्रिय प्रकाशन नई दिल्ली ) 2007

2 पावन पिरीत के लहरा कहानी संग्रह वैभव प्रकाशन रायपुर 2015

3 गुरु घासीददास और उनका सतनाम पंथ वैभव प्रकाशन रायपुर, एवं  बुक क्लिनिक बिलासपुर 2019

4 हँसा अकेला सतनाम संकीर्तन   
वैभव प्रकाशन रायपुर 2019

5 ठोस विचारों की कीमगिरी लघु  कथा संग्रह , बुक क्लिनिक 2021 

6 The value of a cup of tea (short stories ) book clinic Bilaspur

7 हड्डी की जीभ नहीं कि न फिसले काव्य संग्रह ,वन एलीगन नई दिल्ली 
8 सुकुवा उवे न मंदरस झरे काव्य संग्रह सत श्री प्रकाशन 


सम्मान - कौमी एकता सम्मान 2008,आरुग फूल सम्मान 2009, काव्य श्री सम्मान 2012,   विशिष्ट कार्यक्रम अधिकारी सम्मान मैसूर 2012 छत्तीसगढ़ राजभाषा सम्मान 2012, राष्ट्र भाषा अलंकरण 2013, 2019, स्वास्थ्य मंत्रालय नई दिल्ली से उत्कृष्ट सेवा सम्मान 2019, अंतर्राष्ट्रीय लघुकथा सम्मान काठमांडू नेपाल 2022 
बिलासा सम्मान 2023, विमल मित्र सम्मान 2023 
विभिन्न सामाजिक / साहित्यिक सस्थानों ने विविध सम्मान. 

पता -  ऊँजियार सदन, सी 11/ 9077 
सेंट जोसफ टाउन अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़

संपर्क - 9617777514
anilbhatpahari@gmail.com 
Blog - सत सांधन anilblogpost 

YouTube channel : Anil Bhatt CG 

Website - anil.in

Friday, May 29, 2026

सतनाम ही सनातन हैं

सतनाम ही सनातन हैं 

    - प्रो डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
 
      सतबोधिया, सतबोधि, सत संदेसिया,सेतगुरु  , सतगुरु, घासीदास नाम के सम्मुख प्राचीन समय से चला आ रहा हैं। अनेक पंथी , मंगल भजनों में भी यह प्रचलित हैं। बोधि , बोधियां शब्द बौद्ध धम्म और पाली साहित्य के प्रभाव से आया हैं।सत्रहवीं सदी तक व्यापक रुप में यहां बौद्ध धम्म प्रचलित था। अनेक सिद्ध, नाथ, जोगी, जती समाज में थे। उनका सबका उपस्थिति और प्रभाव समकालीन समाज में रहा हैं। फलस्वरूप समाज में समरसता रही और रोटी बेटी भी ग्रामों या समीप में होते रहें हैं। जातपात का ऐसा विकराल स्वरुप अपेक्षाकृत कम ही थे। दक्षिण कौशल में राजभाषा पाली एवं ब्राह्मी लिपि का प्रचलन था। जिसका साक्ष्य यहां के शिलालेखो/ ताम्रपत्रों में संरक्षित हैं। छत्तीसगढ़ी भी पाली प्राकृत का ही स्वरुप हैं।
     छत्तीसगढ़ में इसी समय मराठा अंग्रेजी कालखंड में उत्तर भारतियों का आगमन और पौराणिक कथा कहानियों का वृहत्तर  प्रचार प्रसार राजकीय संरक्षण आदि से पूर्व प्रचलित संस्कृति में अभूतपूर्व बदलाव आया। मैदानी क्षेत्रों में जातियां लामबंद हुई परस्पर भेदभाव और फिरकापरस्ती बढ़ी। 
   आजकल बस्तर बीहड़ जंगलों के सुदूर ग्रामों में जो पहले एक था कोई भेदभाव नहीं था वहां भी इन पर प्रांतिको के हस्तक्षेप से सामाजिक वैमनस्य और सांप्रदायिक उन्माद देखें जा रहे हैं।
   मैदानी क्षेत्र में बढ़ते जातिवाद और अंधविश्वास के विरुद्ध समाज सुधार के लिए गुरु घासीदास का अभ्युदय हुआ। उनकी सतनाम सिद्धांत और दिव्योक्ति" मनखे मनखे एक की अनुगूंज सर्वत्र होने लगी।"अनेक जातियां सतनाम पंथ में सम्मिलित होकर जात पात वर्ण भेद के कुचक्र से मुक्त होने लगे।
   हालांकि उनके बढ़ते प्रभाव को रोकने अनेक षड्यंत्र हुए पर सत्य को कोई रोक नहीं सकते उनकी अपनी प्रभा हैं जो स्वयं प्रसारित और प्रकाशित होते ही हैं।
बुद्ध वचन  हैं 
         "एस धम्मो सनंतनों"

प्रसिद्ध पाली भाषा का वाक्यांश है, जिसका अर्थ है— "यही शाश्वत (सनातन) धर्म है।"यह वाक्य बौद्ध धर्म के प्रमुख ग्रंथ धम्मपद (गाथा ५) से लिया गया है। इसका पूरा श्लोक और अर्थ इस प्रकार है:
न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं।अवेरेन च सम्मन्ति एस धम्मो सनंतनो॥

अर्थ:"इस संसार में कभी भी बैर (दुश्मनी) से बैर शांत नहीं होता। बैर केवल प्रेम और अपकार (क्षमा) से ही शांत होता है। यही शाश्वत नियम (धर्म) है।"प्रमुख विशेषताएँ:सार्वभौमिक सत्य: यह बुद्ध की प्रमुख शिक्षा है जो हिंसा और घृणा को त्यागकर प्रेम और करुणा के मार्ग पर चलने का संदेश देती है।

यह परम सत्य हैं कि बैर अबैर से नष्ट होती हैं 
घृणा प्रेम से,झूठ सत्य से
अंधेरा प्रकाश से कटती हैं यही सनातन हैं।
       तो समाज में षड्यंत्र जनित शास्त्रीय ढंग से विभाजित और फैली हुई जात पात उच्च नीच , ढोंग पाखंड का विनाश सतनाम से होगा। यही सनातन हैं।
  इस गुरुघासीदास ने नैसर्गिक रूप से जो सत्य हैं उनकी उदघोषणा किया संयोग से सत्य की नैसर्गिक स्वरुप का दिग्दर्शन तथागत बुद्ध भी करते सनातन कहे। उसी को यहाँ प्रतिष्ठित किया गया और लोक व्यवहार में लाये गए। फलस्वरूप सतनाम ही सनातन हैं या कहे सनातन सतनाम हैं। यदि सतनाम कहने में समझने में दिक्कत हैं तो व्यर्थ सनातन की दुहाई न दे क्योंकि बिना समता न्याय बंधुत्व के धर्म व्यर्थ हैं यदि वर्ण एवं जाति विभाजन और उच्च नीच हैं तब तो यही तत्व सनातन की घोर शत्रु हैं। वे बैर पालकर कैसे अबैर भाव को अर्जित करेगा? जात पात, उच्च नीच छुआछूत को बढ़ावा देकर शस्त्र सम्मत कहकर मानकर बढ़ावा देते हैं वह कतई सनातन एवं सतनाम का स अक्षर नहीं जान समझ सकता।

     नब्बे के दशक में  सिरपुर के आसपास 5-7 ग्रामों में बसे हम प्राचीन सहजयानी लोग जिनके पूर्वज सतनामी हो गए थे वे बुद्ध पूर्णिमा को आनंद प्रभु बुद्ध विहार प्रांगण में मेला लगाने एवं बुद्ध वंदना के लिए प्रयास किए। 
बाद में महासमुंद रायपुर बौद्ध समाज से सामंजस्य बिठाकर भंते आर्य नागार्गुन सुरई ससई गुरु दयावंत ,सरदार दिलीप सिंग होरा की आतिथ्य और हजारों सतनामी बौद्ध जनों की उपस्थिति में"बोधिसत्व गुरुघासीदास" कहें गए । 
   कालांतर में यह भावपूर्ण संबोधन प्रबुद्ध समुदाय में श्रद्धापूर्वक कहे जा रहें हैं। बुद्ध ने भंते संघ को उपदेशना देते त्रिशरण पंचशील अष्टमार्ग तय किए और उन्हें घोषित किया कि "येतो धम्मो सनंतनो" यह सिद्धांत ओर सूत्र मन वचन कर्म में धारनीय हैं। उन्हीं के अनुरुप गुरु घासीदास का  सप्त सिद्धांत, अमृतवाणी उपदेशना आदि सतनाम पंथ की शाश्वत सत्य विशेषता हैं जो कि अपरिवर्तनीय एवं नित नवीन  हैं। यह विशेषता सत्य सनातन हैं अर्थात" सतनाम ही  सच्चे अर्थों में सनातन हैं।
         वर्तमान में सतनाम पंथ अपनी प्राचीन स्वरुप को जानने समझने और आत्मसात करने की ओर अग्रसर हैं। ताकि भारतीय समाज में जन्मना जातियां वर्ण आदि खत्म हो और बुद्ध कालीन समृद्धशाली समाज वैश्विक  मार्गदर्शक ( गुरु) होने की ओर सच में अग्रसर हो सके। केवल ख्याली पुलाव बनाते भ्रमित न रहें।

    भवतु सब्ब मंगलम 

       जय सतनाम नमो बुद्धाय

सेवक राम बाँधे

सतनाम धर्म संस्कृति पर केंद्रित छत्तीसगढ़ एवं छत्तीसगढ़ी में साहित्य सृजन तो सद्गुरु घासीदास के  सतनाम पंथ की प्रवर्तन एवं सप्त सिद्धांत की प्रस्तुति 1790 और निरंतर रामत रावटी में उपदेशना के समय ही प्रचलन में आ गए। उनकी बातों को लयात्मक गीतात्मक रुप देकर गाने एवं कंठस्थ करने की कलाएं समाज में प्रचलित हो गए। साथ ही छत्तीसगढ़ी को साहित्यिक एवं कलात्मक रुप मिला। उनमें जीवन दर्शन की बातें आई आध्यात्मिक चेतना जगी इस तरह सद्गुरु घासीदास के श्रीमुख से नि:सृत छत्तीसगढी देव भाषा कही जाने वाली संस्कृत पाली जैसी महिमामय हुई।उनके सुपुत्र गुरु अमरदास एवं संत महंत ने समाज में  प्रतिबद्धता पूर्वक संपूर्ण छत्तीसगढ़ में प्रचार प्रसार किया।
   कालांतर में जब शिक्षा आई तो गुरु उपदेश एवं अलग अलग परिक्षेत्र में प्रचलित लोक कथाएं संत मंहत की प्रेरक संस्मरण, वृत्तांत जीवनी इत्यादि का लेखन आरंभ हुआ। फलस्वरूप मानवता एवं करुणा से आप्लावित लोक कल्याण की उच्च आदर्श का स्वर सतनाम साहित्य में समादृत हैं।
     उच्च शिक्षित एवं राज्य में उप सचिव (राजस्व) जैसे उच्च प्रशासनिक अधिकारी  रहे सेवक राम बांधे "सवेरा" जी अनेक जगहों पर लोक सेवक थे। वे जनमानस की समस्याओं एवं उनकी संघर्ष एवं पीड़ा के विगत 60 वर्षों के चश्मदीद गवाह भी हैं। उनका लेखा जोखा सतनाम दर्शन से प्राप्त दृष्टि से किये हैं वह अभिनंदनीय हैं।
  विषय पर उनकी दृढ़ पकड़ और सहजता से प्रभावी प्रस्तुति उनके व्यक्तव्य एवं लेखन में दृष्टिगोचर होते हैं। आपकी प्रथम चर्चित निबंध संग्रह पाखी पठनीय ही नहीं संग्रहणीय भी हैं।
अब यह उनकी दूसरी कृति हैं जिसमें वे गुरु उपदेश और वाणी की प्रतिध्वनि पर रची गई अनुपम कृति है। जिसे वह प्राचीन किस्सागोई शैली में आखीन देखी कानन सुनी रोचक दास्तान हैं।
 सेवानिवृती उपरांत समाज सेवा हेतु समर्पित बाँधे साहब राज्य में गठित प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज के महासचिव हैं और सतनाम रावटी दर्शन यात्रा के प्रणेता आध्यक्ष हैं। जिनके प्रयास से गुरु घासीदास के सभी 9 रावटी स्थलों पर परिक्रमा यात्रा की अवधारणा विकसित हुई। यह यात्रा अनेक परिक्षेत्रों पर वर्गीकृत समुदाय में सांस्कृतिक एवं धार्मिक एकीकरण हेतु अत्युतम प्रयास हैं।
     इसी तरह वे समाज में प्रचलित व्रत त्यौहार उत्सव इत्यादि व्याप्त  विभिन्नता में एकता लाने सतत सक्रिय हैं। ताकि सतनाम संस्कृति स्पष्टत: पृथक नजर आए और कोई भी हो सहजता से जान समझ सके कि सतनाम संस्कृति  क्या हैं?उनमें व्याप्त धर्म,दर्शन साहित्य के अवयव मानव के लिये कितने उपयोगी हैं? 
इन्हीं प्रश्नों के उचित समाधान और हल हेतु वे सतत् साहित्य सृजन और व्यापक आयोजन में सतत सक्रिय हैं। नई कृति हेतु आपको एवं पारिवारिक सदस्यों को हार्दिक बधाई!

उम्र के इस पड़ाव में भी आपका साहित्य सृजन एवं सांगठनिक  योगदान प्रेरक और अविस्मरणीय रहेगा । उक्त स्तुत्य कार्य के कारण विमल यश कीर्ति के आप प्रतिभागी बनेंगे,ऐसी दृढ़ विश्वास हैं।
    आप सतत सृजनशील सुखी एवं दीर्घायु रहें। मंगलकामनाएं ।

     जय सतनाम 

डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
9617777514
    प्राध्यापक 
वीरांगना रमोतीन माड़िया आदर्श महिला महाविद्यालय नारायणपुर छत्तीसगढ़

Tuesday, April 21, 2026

सतनाम सनातन हैं

जो तजे जीर्ण शीर्ण पुरातन 
वो सतनाम सनातन हैं.

युगों युगों से शोषित मानव 
आकर तृप्त हुए पावन हैं ...
          
पामम्ममम्मद खंड नहीं कर्मकांड नहीं 
सद्व्यवहार पूजा अर्चन हैं..

ऊंच नीच जात पात नहीं 
न जन्मना वर्ण विभाजन हैं


भूखे को भोजन प्यासे को पानी 
समता और न्याय ही      mkñn दर्शन हैं...

Saturday, April 11, 2026

😘🎇

दीवार 

विचार वि हीन समुदाय में रहना 
जैसे काल कोठरी की दीवारों से घिरना 
आबोहवा ही नहीं चंद रौशनी के लिए  
इधर उधर भटक ना चीखना  
नागवार ही नहींml अपराध हैं तुम्हारा 
मानवता के लिए अलख जगाना 
नुकीली दीवारों से सर टकराना 
अंततः लहूलुहान सkलीब सा जीवन को ढोना 
कोई तो हैं जो हांक ले जा रहा हैं भेड़ें 
पर कहां  दोनों को पता 

..,नहीं पता 
पर कोई तो गया हैं वहां
 कोई देखें हैं जहां 
यह केवल सुने या बुझे हैं लाल बुझक्कड़ सा 
इतने में देखो भला जली रस्सी अकड़ सा 
विचार विहीन जड़वत समुदाय ही समाज हैं 
यदि इन्हीं पैरावटो, मिट्टी गिट्टी की ढेरों पर नाज हैं 
जिसमें हलचल नहीं वे न समुदाय है न समाज हैं
वह हैं काल कोठरी की स्याह दीवार  
चलिए संग पग दो पग लगाने खिड़की किवार
या फिर चलें मित्रों ढहाने वो दीवार...

Monday, March 30, 2026

भारतीय संस्कृति पर श्रीराम का प्रभाव

"श्रीराम के भारतीय संस्कृति पर प्रभाव"
  -डॉ.अनिल कुमार भतपहरी                 
           प्राध्यापक (हिंदी)

     मानव जीवन निर्वाह के विविध पक्ष है वे सब संस्कृति के अधीन हैं परंतु भारतीय संस्कृति श्री राम के विराट व्यक्तित्व के अधीन हैं कहना या समझना कतई अतिशयोक्ति नहीं हैं।
सच में देखा जाय तो भगवान राम भारत के उत्तर से सुदूर दक्षिण तक पूज्यनीय हैं। जन जीवन ही नहीं पशु पक्षी और प्रकृति के अनेक सुरम्य स्थलों, जिसमें नदी नाले पर्वत झरने आदि पर उनके स्पष्ट प्रभाव दर्शनीय हैं। उनके सहचरो/ सहयोगियों के स्मृतियों को जनमानस आज भी सहेजे हुए हैं ।जहां पर मेले उत्सव आदि के आयोजन होते हैं। जिससे जनजीवन युगों से प्रेरित होते आ रहे हैं। यह बातें किसी भी देश समाज के लिए अत्यंत गौरव की बात हैं। श्री राम का प्रभाव इतना व्यापक हैं कि जैसे निर्गुण भक्ति में परमात्मा चराचर व्याप्त हैं उनके अनुरुप ही सगुण भक्ति में महाकवि तुलसी लिखते हैं - 
सियाराम मैं सब जग जानी, करहूं प्रणाम जोरी जुग पानी। (1)

   
   प्रभु श्रीराम भारतीय संस्कृति में एक आदर्श पुरुष "मर्यादा पुरुषोत्तम"के रूप में पूजित हैं। उनके जीवन का प्रभाव इतना गहरा है कि आज भी समाज को दिशा देने में उनकी कहानी एवं जीवन के विविध प्रसंग महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आइए जानते हैं कि श्रीराम का भारतीय संस्कृति पर क्या प्रभाव है:

आदर्श पुत्र और भाई के रूप में
 बालक राम घर परिवार सहित नगर वासी के लिय भी प्रिय हैं उनकी मोहक छवि का वर्णन द्रष्टव्य हैं - ठुमकी चलत रामचंद्र बाजत पैजनियां( 2)

श्रीराम ने अपने पिता के वचन का पालन करते हुए  14 वर्षों का वनवास स्वीकार किया, जो कर्तव्य और नैतिकता का उत्कृष्ट उदाहरण है। उनके भाई लक्ष्मण और भरत के साथ उनके संबंध प्रेम और समर्पण की मिसाल देते हैं। वनवास काल में उनकी धर्मपत्नी सीता और लघु भ्राता लक्ष्मण तीनों तपस्वी स्वरुप में वनवासियों के मध्य 12 वर्षों तक रहकर उन्हें बेहद गहराई से प्रभावित किया।
वन में वनवासियों के बीच   रमकर आर्य पुत्र राम हुए।(3)
 
आदर्श पति और राजा के रूप में

श्रीराम ने सीता के प्रति अपने प्रेम और सम्मान के साथ-साथ एक राजा के रूप में न्याय, समानता और सुरक्षा का परिचय दिया। उनका शासन "रामराज्य" के नाम से जाना जाता है, जो आदर्श शासन प्रणाली का प्रतीक है। सीता वियोग से व्याकुल अवतारी समझे जाने वाले राम का मानवीय रुप बेहद प्रेरक और संवेदनशील हैं -
हे खग हे मधुकर श्रेणी 
तुम देखि सीता मृगनयनी (4)

समरसता और एकता के प्रतीक:
श्रीराम ने समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को साथ लेकर चलने की शिक्षा दी। उन्होंने वनवासी, गिरिवासी और नगरवासी सभी को समान रूप से सम्मान दिया और उनके साथ घुल-मिलकर रहे। अपने वनवास काल में सभी वर्ण जाति प्रजाति के सहयोग से ही अभेद्य लंका ढहा सके।असंभव को संभव करने का यह नायाब उदाहरण हैं-

लक्ष्मन के रेखा पारे ल परही 
चलो दानों के किल्ला उजारे ल परही (5)

नैतिक मूल्यों का महत्व:

श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि सफलता केवल भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि चरित्र, सत्य और मर्यादा में निहित है। उनके आदर्शों को अपनाकर हम एक बेहतर समाज और राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।  तभी राम नाम की महत्ता को स्वीकारते कबीर जैसे निर्गुण संत गा उठे -

राम नाम के पटतरे देबो को कुछ नाहि।
क्या लै गुरु संतोखीए हौंस रहे मन माहि।। (6 )

भक्तिकाल की सुप्रसिद्ध कवयित्री मीरा राम को अनमोल रतन के रुप में पाकर नाच उठीं -
पायो जी मैने राम रतन धन पायो..
खर्चे न होय चोर न ले जै दिन दिन बढ़त सवायो...(7)



आज के समय में प्रासंगिकता:

आज के समय में जब समाज में विभाजन, असहिष्णुता और स्वार्थ बढ़ रहा है, तब श्रीराम का जीवन हमें एकता, प्रेम और त्याग का मार्ग दिखाता है। उनके आदर्शों को आत्मसात करके हम अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में बदल सकते हैं।  राम रावण युद्ध सत्य असत्य के मध्य धर्म अधर्म के निमित्त हैं ।


श्रीराम का भारतीय साहित्य एवं समाज पर प्रभाव : 

श्रीराम का भारतीय साहित्य और समाज पर गहरा प्रभाव है। रामायण और रामकथा ने विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों में अपना स्थान बनाया है, जिससे समाज को नैतिकता, न्याय और एकता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।

समाज पर प्रभाव:

- नैतिकता और न्याय: राम की कहानी में अन्याय के प्रतिकार और सत्य की जीत का संदेश है, जो समाज को एक आदर्श प्रदान करता है।
- एकता और समन्वय: रामायण में विभिन्न वर्गों और जातियों के लोगों के बीच एकता और सहयोग का संदेश है, जो समाज में सौहार्द और सहयोग को बढ़ावा देता है। जैसे केवट  सबरी , वानर सुग्रीव, जामवंत, गिद्ध जटायु इत्यादि 
- लोकतंत्र की प्रासंगिकता: राम साहित्य लोकतंत्र के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें जनशक्ति की अनिवार्यता और सामाजिक मूल्यों की रक्षा के लिए जनता की भागीदारी का महत्व बताया गया है।

साहित्य पर प्रभाव:

राममय भारतवर्ष की सभी भाषाओं एवं बोलियों मे रामकाव्य मिलती हैं. राम का काज जन कल्याणकारी होने से स्तुत्य हैं. महाकवि तुलसीदास मानस मे लिखते हैं -
प्रिय लागिही अति सबहि मम भनिति राम जस संग |
दारु बिचारू कि करइ कोउ बंदीय मलय प्रसंग || (  8रामचरित मानस  पृष्ठ 14)

आधुनिक हिंदी साहित्य मे मैथिलिशरण गुप्त लिखते हैं 
राम तेरा जीवन ही काव्य हैं,
कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य हैं.9
    इस तरह हम देखते हैं कि साहित्य के इतिहास मे सभी कलखंड मे श्री राम से प्रभावित मुग्धकारी काव्य का प्रणयन होते आ रहें हैं. बल्कि भक्तिकाल मे राम को लेकर रामाश्रय शाखा का प्रवर्तन हुआ और विविधतापूर्वक भावप्रवण काव्य रचे गए.


- विभिन्न भाषाओं में रामायण: रामायण का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है और इसके विभिन्न संस्करणों में रामकथा को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है।
- जनजातीय और लोक संस्करण: रामायण के जनजातीय और लोक संस्करणों में राम और सीता को सामान्य परिवार से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है, जो भारतीय लोक की एकता और समन्वय की भावना को दर्शाता है। संस्कृत, ब्रज, अवधि, हिंदी उड़िया तमिल, कन्नड़ से लेकर छत्तीसगढी ,हलबी, गोड़ी, सरगुजिहा मे भी रामचरित लिखें गए.
- आधुनिक व्याख्या: राम साहित्य की चिरंतनता का एक आधार यह भी है कि उसमें मूल्यों को जड़ नहीं माना जाता, बल्कि हर युग में मूल्य व्यवस्था को पुनपर्रिभाषित  करना संभव है। पुनरुक्ति की परवाह किये बिना रामायण चुनिंदे पात्रों को केंद्र मे रख राम काव्य लिखें जा रहें.इस तरह रामकाव्य मे वैविध्य भाव दर्शनीय ही नहीं प्रेरक और अभिनंदनीय है.
- रामकाव्य समन्वय के प्रतीक : राम चरित के माध्यम से समकालीन समय मे विभिन्न मत पंथ मे जो विभेद और अग्राह्य भाव था उनमें समन्वय स्थापित की गई. जैसे वैष्णव और शैव मतावलम्बियों के मध्य इस भाव को रखकर उनमें तादातम्य स्थापित की गई : 
- सिव द्रोही मम भगत कहावा, सो नर सपनेहु मोहि न पावा.
- संकर बिमुख भगति चह मोरी, सो नारकी मूढ़ मति थोरी. (   10 लंकाकांड 709)

    इस तरह हम श्रीराम के व्यक्तित्व का सम्यक मूल्यांकन शास्त्रों एवं लोक में व्याप्त छवि के आधार पर विचार करते हैं तो राम को आदर्श लोक नायक के रुप में पाते हैं। हर माता पिता की चाह कि पुत्र राम जैसा हो। उनमें राम का गुण आए। इस दृष्टि से हमारी शिक्षण संस्थानों में राष्ट्र और समाज के लिए आदर्श युवा गढ़ने हेतु भी राम प्रेरक पात्र हैं ।इसलिए भी वह भारतीय रचनाकारों के साहित्य में अन्तर्भूत प्रेरक पुंज हैं।
संदर्भ:

1गोस्वामी तुलसीदास, रामचरित मानस पृष्ठ 

2 गोस्वामी तुलसीदास 

3 भतपहरी डॉ अनिल कुमार, हड्डी की जीभ नहीं कि न फिसले वन एलिगन नई दिल्ली पृष्ठ 
4 गोस्वामी तुलसी दास मानस 
5 लोक गीत आकाश वाणी रायपुर 
6 दास श्याम सुंदर कबीर रचनावली
7 मीरा बाई,मीरा के पद 
8 गोस्वामी तुलसी दास
 रामचरित मानस पृष्ठ 14 
9 मैथिलीशरण गुप्त 
10 गोस्वामी तुलसी दास रामचरित मानस पृष्ठ 709


     - डॉ.अनिल कुमार भतपहरी 
      प्राध्यापक ( हिंदी) 9617777514
वीरांगना रमोतीन माडिया शासकीय आदर्श महिला महाविद्यालय नारायणपुर छत्तीसगढ़

Sunday, March 22, 2026

बढे असासुन महंगाई

#anilbhattcg #vanprsth 

बाढ़े असासून मंहगाई 

रयपुर वाली दीदी कथे बने जंगल चल देस भाई.
इहा सहर म जिनगी पहई  हवय अबड़ करलाई.
मिलत नइये गैस सिलेंडर  बाढे असासून मंहगाई 
चूल्हा चौका गुजर बसर का कहिबे घाद दुःखदाई 
उहाँ उरर ले मुनगा भाजी कुरमा के चटपट चटनी 
छेना लकड़ी बार रमरम ले चूल्हा के सुग्घर रंधनी 
अम्मट बिच्छल भले कहे फेर सुवाद सेहत के खजाना 
भरे बोजे  जिनिस इहाँ फेर पैसा म रोगरई बिसाना

.डॉ अनिल भतपहरी / 9617777514

Sunday, March 15, 2026

मौहारी

मौहरी में महुआ बिनत हे मौहा रिन 
ये दे साल्हो ददरिया गावत हे मुटियारिन...

डोंगरी के तीर म तितुर बोले का ओ तितुर बोले का 
तोर आरो ल पाके मन हमर डोले का मौहरी म...

अधरे ल देखेंव परसा फुल सही लगत हे 
ये दे लाली के लुगरा ह,सुघर फबत हे...

अंझा मंझा देख मोला ओकर तीर म बलाना 
बोहत गरु झउहा सुग्घर कनिहा के लचकना...

डॉ अनिल भतपहरी/ ८-३-२६

Saturday, March 7, 2026

नई सुबह नाटक नई शिक्षा नीति

नई शिक्षा नीति : नाट्य मंचन 

।।नई सुबह।।

स्थान ग्रामीण या मध्यम वर्गीय क़स्बाई परिवार. जहाँ रेडियो या टीवी में सुबह 8 बजे समाचार प्रसारण हो रहें हैं..इस पर किसी का ध्यान नहीं हैं और बेखबर दैनिक कार्यों मे लगे हुए हैं.. तभी पिता जी के कानो समाचार सुनाई पड़ता हैं - इस वर्ष हायर सेकेण्डरी 12 वीं की परीक्षा परिणाम घोषित कर दी गई. परिणाम 70%. हमेशा की तरह विगत एक दशकों से छात्राएं छात्रों से  बाजी मारती आ रही हैं. मेरिट मे भी सर्वाधिक बालिकाएं हैं. परिणाम लोक शिक्षा विभाग के बेवसाईट मे अपलोड कर दी गई हैं.मान मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री ने उत्तीर्ण विद्यार्थियों को बधाई देते उनकी उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनायें दी. आगे का समाचार.... पिता उत्साह पूर्वक अरे बेटा अम्बा तुम्हारा रिजल्ट आ गया  मोबाईल में देखों... 

अम्बा: हा पापा वें झट आटे गुंथ रही थी को छोड़ उठ खड़ी हूई और वास बेसिन से हाथ धोने लगी...
माता जी: अरे महरानी जी पुरा गुंथ तो लेती भगी नहीं जा रही. अम्बा बिना कोई जवाब दिये जल्दी से मोबाईल लेकर बेवसाईट खोलकर अपना रोल नंबर डाली पर नामांकन नम्बर स्मृत नहीं होने पर वें अपना प्रवेश ढूंढने लगी... तब तक पड़ोसन  अपने घर की बालकनी से आवाज लगाई.
अरे बधाई हो अम्बा मेरिट मे पास हो गई. बिट्टू के पापा बता रहें हैं.

तब तक अम्बा की धडकने सुनकर और बड़ गई पिता जी ख़ुशी से उछल खड़े हो गये और माता जी नमस्ते कर हाथ जोड़ने लगी... मोबाईल सर्च करतें अम्बा धन्यवाद देते दूर से प्रणाम कहीं.

थोड़ी देर बाद वो एकदम सी उच्चल पड़ी मेरिट मे सातवे स्थान प्राप्त की हैं सभी विषय मे डीकटेंशन हैं. सर्वाधिक अंक उन्हें हिंदी साहित्य मे मिली हैं. यह बड़े उत्साह से अपने पापा जी को बताई पास मे माता जी सट कर खड़ी मोबाईल को कौतूहल पूर्वक देख रही हैं.
 
पापा : बेटा नई शिक्षा नीति के तहत तुम्हे अब ऐसे विषय चयन करना हैं कि आगे चलकर एक अच्छा प्रशासनिक अफसर बनो. क्योंकि तुम्हे डॉक्टर बनना पसंद नहीं हैं क्यों सच कहाँ न? 

हा पापा क्लास मे प्रवेश के समय    वेलकम पार्टी मे मैंने दृढ़ता पूर्वक अपना एम बता दी थी कि मुझे डॉक्टर,इंजिनियर नहीं एक सक्षम प्रशासनिक अधिकारी बनकर देश और समाज सेवा करना हैं.
शाबास तभी तो बारहवीं मे इतिहास, नागरिक शास्त्र और अर्थशास्त्र ली थी. मैं तो तुम्हारी मैथस का अंक देख इंजीनियरिंग करने का सलाह दिया था. पर तुम्हारी माता श्री डॉक्टर बनाना चाहती थी.
खैर बेटा जाओ और मिठाई दुकान से कलाकंद लेते आना. जेब से रूपये निकलते.. ये लो पैसे.
माता:  और हा,नाड़ीयल अगरबत्ती तो है, कपूर, सात बंगला पान जरुर लेते आना..
अम्बा चाबी ले बाहर पोर्च मे खड़ी स्कूटी को कपड़े से पोछने लगी.
     दृश्य 2
दृश्य बाजार का चारों ओर चहल पहल है वहाँ एक मिठाई दुकान के पास  अम्बा स्कूटी खड़ी कर ज्यो ही मुड़ी उनकी सहपाठी लडके लड़की मिल गये वें सभी मिठाई लेने आये थे कुछ ले चुके और हाथ मे मिठाई  लटकाएं हुए एक दूसरे को खिलाने लगे.
अम्बा तुम्हे मिठाई के साथ साथ पी वी आर मे फ़िल्म भी दिखानी होगी. बड़ी छुपी रुस्तम निकली यार!
   सहेलियां उन्हें गले से लगा ली माहौल खुशनुमा और चहकते हुए सभी एक -दूसरे को बधाई देते अपने अपने घर चली गई.
     पान खरीदने ज्यो ही पनवाड़ी की दुकान गई अम्बा देख कर चौकी कि उनका भाई आरव कुछ दोस्तों के साथ गुटखा सिगरेट पीने मे उन्मत्त थे. दूर से आकाश सिगरेट फेकते लपकते हुए अम्बा के पास जाकर गुस्से से गरियाने लगे.
आकाश - यहाँ क्या कर रही हो सुना है इधर लड़कियां नहीं आती? 
अम्बा - अच्छा ताकि तुम लडके गुलछर्रे उड़ाओ. 
आकाश - उंगली दिखाते देखोंsss
क्या देखों ! मैं यहाँ  पूजा के लिए पान लेने आई हूँ. 
 आकाश - तो घर मे मुझे क्यों नहीं कहाँ? 
अम्बा - तुम थे ही कहाँ और रहते भी हो? 
आकाश - अच्छा तुम क्या कहना चाहती हो  देखों बहस मत करो सभी इधर देख रहें है. अच्छा जाओ मैं लेते आ रहा हूँ.
अम्बा - नहीं लेकर ही जाउंगी या तुम्ही लाकर दे दो और घर चलो. तुम्हे पता होनी चाहिए कि मेरी रिजल्ट की ख़ुशी मे पापा मिठाई और मम्मी पूजन सामग्री मंगाई है. बात को चेंज करती हूई कहीं ताकि कोई बखेड़ा खड़ा न कर दे क्योंकि आकाश के स्वाभाव को अम्बा अच्छी तरह जानती समझती है. इस वर्ष आकाश भी इंजिनियर बनने कॉलेज ड्राफ कर PET दिया है और उनका रिजल्ट नहीं आया है.सो कुछ दोस्तों के साथ शहर के बाजार के आसपास  यु ही घूमते फिरते रहते है.


     3 दृश्य कॉलेज परिसर 

चारों तरफ छात्रों का शोर और सूचना पटल पर प्रवेश सूची की लिस्ट देखने उद्द्त है पंजे के एड़ी उठाकर या जम्प लगाकर उचक उचक कर नाम देखें जा रहें है.
अम्बा का नाम लिस्ट मे सबसे ऊपर था. इस बार आकाश भी प्रवेश हेतु  फार्म भरा तो  है पर नाम आने की भरोसा नहीं है.
भीड़ को चिरते अम्बा के पास गया जो अपनी स्कूटी के पास एक सहेली रेणु के साथ खड़ी थी.
आकाश - तुम दोनों का नाम फस्ट लिस्ट मे है. पर मेरा नहीं सेकेण्ड लिस्ट मे आएगा क्योंकि अभी कटाफ 65% है.
मेरा 61 है और एक वर्ष का गैप तो सेकेड लिस्ट मे आना तय है.
चलो घर एक सप्ताह के अंदर फीस पटाना है.

दृश्य 4
    
क्लास रूम बी ए प्रथम

प्रोफ़ेसर का कॉलेज प्रवेश 

 छात्रों का समवेत स्वर -गुड मार्निग सर 
 प्रोफेसर- गुड मार्निग, अच्छा  आपलोग सुप्रभात और नमस्कार भी कहना सीखो क्योंकि हमें अपनी संस्कृति भूलना नहीं चाहिए 
छात्रों- जी सर 

प्रोफेसर - तो बच्चों आप लोगो को पता है अपना अपना  मुख्य विषय और सहायक विषय क्योंकि आप लोग नई शिक्षा नीति के तहत नए पाठ्यक्रम पढ़ रहें है.
अम्बा - जी सर इनकी जानकारी बेबसाईट मे अपलोड है और चवाइस सेंटर में फार्म भरते पता है.
प्रो वेरी गुड क्या नाम है बेटा 
अम्बा - जी अम्बा पर बेटा क्यों सर मैं तो बेटी हूँ.
प्रो - वो इसलिए की कोई फर्क न हो 
अम्बा - जी ऐसा कहने मे ही फर्क या भेद सा हमें चुभता है. हमें बेटी या छात्रों कहें. 
प्रो अच्छा ऐसा क्यों?
अम्बा - क्योंकि ऐसा हमारे पिताजी अक्सर कहते है पर मुझे उनका बेटा अच्छा नहीं लगता. अच्छा और सफलता के काम करे तो भी क्रेडिट बेटा को बेटियों को नहीं ऐसा ना हो सर.


प्रो-  ए बात है पर मुझे क्या आजकल सभी जगहों घर आफिस बाज़ार सभी... बात काटते हुए अम्बा जो है वहीं कहीं जाय.
 रेणु  :जी सर हम बेटियों का वजूद और प्रभाव तो कुछ हो सके.  साहसिक कार्य और सफलता का मतलब लडके/ बेटे यह  तो न हो 
प्रो- झेपते हुए ठीक है, ठीक है

नेपथ्य  स्वर -  राज्य के 12 बोर्ड मे अधिकतर छात्र संख्या पास हुए है लेकिन सबके लिए उच्च शिक्षा संभव नहीं. इस बार इस महाविद्याल मे बी ए फस्ट ईयर  का 200 सीट, बीएससी का 70 और बी काम का 50 सीट पुरा भर गया.और अनेक छात्र कम मार्क्स के कारण प्रवेश से वंचित भी गये  उन्हें मौका मिलना चाहिए 

 दृश्य 5

 नेपथ्य स्वर  - हा जी हा अनेक व्यवसायिक/ तकनीकी शिक्षा है आई आई टी पालिटेक्निक, इंजिनियरिंग नर्सिंग  मेडिकल कृषि डेयरी मत्स्य इत्यादि इन जगहों पर छात्र बट जाते है बाकी डिग्री / पोस्ट डिग्री कॉलेज जिनकी प्रदेश मे 335 महाविद्यालय और 9 विश्वविद्यालय है 

फिर उसके बाद अशासकीय विश्वविद्यालय 11 और 350  महाविद्याल है. इसके बाद  स्वाध्यायी  परीक्षा और मुक्त और दूरस्थ विश्वविद्यालय के ऑप्शन भी है कोई भी अपने सुविधा अनुसार चयन कर सकते है.

महाविद्याल परिसर दो सहेली परस्पर चर्चा करतें हुए 
अम्बा- 12 वीं के अनुसार विषय तो ले लिए पर रुची के अनुरुप वैकल्पिक विषय मेरा साइस का होता तो अच्छा रहता क्योंकि माता जी मुझे डॉक्टर बनाना चाहती थी और पिताजी इंजिनियर. 
रेणु :- अच्छा तो तुम्हारी इच्छा? हाई स्कूल तक तो कोई लक्ष्य या समझ नहीं था और फिर हमारे इर्द गिर्द 12 वीं मे ओ विषय नहीं मिले अन्य जगह पढ़ने भेजा नहीं तो आर्ट ही ले ली..
तो फिर रूचि किसमे मे है? 
ओ तो इच्छा डॉक्टर बनने की थी पर...
तो अभी भी आप्सन मे जुलाजी ग्रुप ले लीजिये. आगे चलकर काम आएगा. हो सके तो नर्सिंग कॉलेज चुन लेना.
क्या ऐसा संभव है क्यों नहीं? चलिए महाविद्याल में स्थापित हेल्प डेक्स मे जाये.. ओके चलिए

दृश्य 6

हेल्प डेक्स  टेबल  एक्सपर्ट लोग उस पार बैठे हुए कुछेक सामने बैठे/  खड़े

एन ई पी के तहत प्रत्येक छात्रों को मुख्य विषय के साथ ऐच्छीक विषय और रोजगार एवं मूल्य आधारित कोर्स ले सकते है. भारतीय ज्ञान परम्परा पृथक से जो रुचिकर हो. मतलब कम्प्लीट ऐजुकेशन का पाठ्यक्रम नए केरीकुलम के आधार पर निर्मित है और हमारा प्रदेश दो वर्ष पूर्व लागु कर देश मे चर्चित है.

आकाश: अच्छा सर लेकिन पूरी तरह स्पष्ट समझ नहीं आ रहा हैं ।
आप ध्यान से सुनिए और इसे समझने सामने स्क्रीन बोर्ड देखिए उसमें सारे ऑप्शन प्ले हो रहे हैं। वेबसाइट और गुगल भी देख समझ सकते हैं।
फिर भी समझिए_

हेल्प डेक्स _ किसी भी संकाय के मुख्य तीन विषय DSC है दूसरे संकाय से  किसी एक विषय  को लेगा वह DSE होता है।पर्यावरण और भाषा सिर्फ एक सेमेस्टर मे  पढ़ना होगा वहAEC है।बाकी के संवैधानिक मूल्य  /भारतीय पंरपरा आदि का अध्ययन  है वह और कौसल विकास से संबंधित कोर्स है।

  अम्बा _ जी सर बहुत अच्छा समझ आ गया।

हेल्प डेक्स _ और हा आसपास के उद्योग जगत से आगे चर्चा और अनुबंधन किया जाएगा कि संबंधित छात्रों को अप्रेंटिश करवाया जाय ताकि उन्हें सैद्धांतिक और व्यवहारिक ज्ञान हो सके। और यह सब सेमेस्टर पद्धति में होगा।
 सेमेस्टर पद्वति के कोर्स भविष्य में विद्वार्थियों के लिए उपयोगी है  सभी विषयों की जानकारी होगी किंतु  खासकर।प्रतियोगिता.परीक्षाओं के लिए उपयोगी है। 

लेकिन  विद्वार्थियों की नियमित उपस्थिति  होना होगा । उनके लिए सरकार योजना बना रहे है जैसे बस किराया साइकिल या स्कूटी वितरण इत्यादि।

विभाग का प्रयास रहेगा कि सभी विद्वार्थी सेमेस्टर पद्वति को बारीकी से  समझ सकें हैं।

नई शिक्षा नीति केवल सरकारी नौकरी पर ही ध्यान केंद्रित नहीं करेगी बल्कि छात्र को सामान्यतः ज्ञान और व्यवहार यानि लोकाचार से अवगत कराएगी। उन्हें हर तरह से दक्ष करने प्रतिबद्ध होगी।

 इसके लिए प्राध्यापकों को भी प्रशिक्षित करने योजना बनाई जाएगी ताकि हमारे देश के होनहार युवाओं को समय परिस्थिति के अनुरूप पढ़ा सके। नई शिक्षा नीति अध्ययन अध्यापन और क्षेत्र में व्यवहारिक ज्ञान हेतु परिभ्रमण के निमित्त हैं। इन तीनों प्रक्रिया ही नई सुबह आएगी।
आजकल मोबाइल नेट में गुगल e-book सोसल,मीडिया, मेटा फेसबुक A I जैसे अत्यधिक टेक्नोलॉजी हैं E  लाइब्रेरी है ।परन्तु इन सबको कैसे अनुप्रयोग करे और महत्वपूर्ण चीजों इत्यादि को समझाए इसलिए हमारे प्राध्यापकों को सामग्री उपलब्ध करवा रहे हैं।

जी सर धन्यवाद आभार , प्रणाम।

दृश्य 7

सभी छात्र संतुष्ट होकर क्लास रुम में प्रवेश करते हैं। और नई शिक्षा नीति की प्रशंसा करते हुए 
महाविद्यालय में स्मार्ट कक्ष, लैब लाइब्रेरी और स्वच्छ परिसर के साथ केंटिंग लिए महाविद्यालय प्रशासन और उच्च शिक्षा विभाग का प्रशंसा करते विद्यार्थी गीत गाते हुए नृत्य करते हैं ।
      
    पटाक्षेप 

डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
9617777514
[1/8, 16:52] Dr. Anil Bhatt: सात दृश्य रहेगा मेडम 

प्रमुख पात्र 

2माता पिता 
3 छात्र 
1प्राध्यापक 
1प्राचार्य 
3हेल्प डेक्स 
कुल 10 पात्र 

यही लोग आरम्भ और अंत में नृत्य गीत प्रस्तुत करते रोचक और इंटरटेनमेंट करेंगे। क्योपकथन में रिहर्सल के वक्त चुटिले संवाद भी जोड़ सकते हैं।
[1/8, 16:52] Dr. Anil Bhatt: नृत्य गान के बाद कुछ महीने और टेस्ट परीक्षा के बाद 
छात्रों और अध्यापकों की समस्या और निदान पर तीन दृश्य और लिखा जाएगा।
फिर यह स्क्रिप्ट 10 दृश्यों में समाप्त हो जाएगी।

Tuesday, March 3, 2026

उनका धर्म राजनीति हैं

#anilbhattcg 

उनका धर्म राजनीति हैं 

जन्म जंगल में 
कर्म जंगल में 
पुरखों की तह  
मिलेंगे जंगल में 
काट कर भरुहा काड़ी 
बसाएं गांव बस्ती 
आबाद रहें हरदम 
नृत्य गान मस्ती 
पर किसने कराया 
भेद अपना पराया 
जात पात का खेल 
छल छद्म पेल ढकेल
छोड़ गांव बसे नगर 
चालक धूर्त नट नागर 
1कहे ग्रामीण देहाती 
हमारे उद्यम उत्पाद 
हेर फेर कर बने उस्ताद 
संचय कर धन आपार 
राज सत्ता का कारोबार 
जनसेवा हुआ व्यापार 
बढ़ते रहे सदैव करारोपण 
अब न होगा प्रकृति संरक्षण 
बचाकर जंगल करेंगे क्या 
ये जंगली अभाव से मरेंगे क्या 
करना हैं विकास उजड़ेंगे जंगल 
तभी तो होगा वहां नित्य मंगल
सीधे साधे भोले भाले 
प्रकृति पुत्र जंगल रखवाले 
टंगीये के बेठ बनकर 
बनते उजाड़ने वाले 
पर चलाने वाले कौन 
परस्पर लड़ाने वाले कौन 
बहुरूपिया बहुत पहुंचे हुए 
मीठी बानी शहद से पागे हुए 
हर तरफ वाग्जाल फैलाएं हुए 
अरे वनवासी धरती आबा
भुइयां के भगवान तय किसान 
गुड़ी कुटी मंदिर, तेरा ही काशी काबा 
फूल कर कुप्पा गर्व से अज्ञानी 
अरे अवघट अरे महादानी 
पड़े रहो शव सा बिन शक्ति के 
बिखरे हुए कलयुगे बिन संघ शक्ति के 
डूबे रहों तुम मदिरा सी धर्म भक्ति हैं 
भ्रम में रहो तुम कि इसी में मुक्ति हैं.
पता हैं उन्हें उनका धर्म ही राजनीति हैं 
तुम भ्रम में रहो क्या धर्म रीति नीति हैं 

-डॉ.अनिल भतपहरी/9617777514

Tuesday, February 24, 2026

सतनाम की त्रिचरण संगत पंगत अंगत

सतनाम धर्म के त्रिचरण: संगत पंगत अंगत 

सतनाम पंथ भारत वर्ष में एक स्वतंत्र धार्मिक संप्रदाय है। छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास ने इसे व्यवस्थित स्वरुप देकर  17वीं शताब्दी में प्रवर्तन किया इसके मुख्य तीन चरण इस प्रकार हैं: 

संगत 

- संस्थापक: सतनाम पंथ के संस्थापक गुरु घासीदास बाबा जी हैं, जो छत्तीसगढ़ के गिरौदपुरी में पैदा हुए थे. और सोनाखान जंगल के मध्य छाता पहाड़ में 6 माह तक कठोर साधना करके  "सतनाम के सप्त सिद्धांत" का प्रतिपादन फागुन शुक्ल  सप्तमी को गिरौदपुरी में अपने प्रिय स्थल औरा धौरा तेंदू पेड़ के समक्ष समतल मैदान में एकत्र हजारों लोगों की उपस्थिति में किया। उन्होंने सतनाम के प्रमुख सप्त सिद्धांत एवं वाणी को जनमानस श्रद्धापूर्वक श्रवण किए यह प्रथम संगत था। फिर रामत रावटी करते संगत करते रहें।
 इस तरह उन्होंने धार्मिक एवं सामाजिक क्षेत्र में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध सतत सतनाम जागरण चलाए। उनमें मुख्यत: जातिगत भेदभाव के खिलाफ: गुरु घासीदास ने जातिगत भेदभाव और सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। वे "मनखे मनखे एक "कह अनेक जीवनोपयोगी उपदेश दिए। वे अपने सिद्धांत और उपदेश को जनजीवन को श्रवण की आजीवन रामत रावटी किए यह प्रथम चरण संगत का था। 

      पंगत 
     रामत रावटी में उपस्थित जनसमूह को  अलग अलग जातिय समूह थे और उनके रहन सहन खान पान में विविधताएं थी फलस्वरूप कभी संग साथ भोजन नहीं करते उन्हें सामूहिक रुप से एक ही पात्र में पके सात्विक भोजन प्रसाद को एक ही पात्र बड़ा थाल या गंज में परोस कर   तेलसीपुरी महासंगम स्थल में जहां अनेक जातियों के लोग स्वेच्छा पूर्वक सतनाम धर्म को अंगीकृत किया उन्हें खिलाएं गए।उसे पान प्रसाद कहते हैं। यह पान प्रसाद खिलाना ही सतनाम संस्कृति में पंगत हैं। जब सब संग साथ में ,संगत में कही गई बातें सुन समझ लिए और सब संग साथ में पंगत में परोसे गए पान प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह दूसरा चरण पंगत के नाम से प्रसिद्ध हैं।
   श्रद्धालु आज भी गुरुद्वारा में जाकर मनौति मांगते हैं कि " हे सत्पुरुष साहेब तोर असीस ले मोरो घर शुभ  कारज होय चार संत मोर अंगना म पंगत करय मय अपन हाथ म पतरी उचावव।" 

अंगत 
    इस तरह सतनाम पंथ में 65-70 जातियों का समागम हैं जो कि गुरुघासीदास के उपदेशों से प्रभावित होकर अपनी मूल जाति और मान्यताओं को छोड़कर सतनाम को अंगीकृत कर लिया हैं। ऐसा करना ही सतनाम संस्कृति में अंगत प्रथा हैं। अनेक जाति के लोग प्रेम विवाह इत्यादि के कारण बहिष्कृत हो जाने पर यहां आकर शरण लेते हैं। गुरुगोसाई चार संत की उपस्थिति में उन्हें सतनाम धर्म में मिला लेते हैं।
एक प्राचीन मंगल भजन इसी प्रक्रिया हेतु सृजित हैं -
बीच गंगा बहत हे मँझधारा हो मिले बर होही संतो मिल जहु न ...
समानता बराबरी और प्रेम सौहार्द भाव के कारण निरंतर सतनाम धर्म में अन्य धर्म जाति के लोगों को सहजता से आत्मसात या समागम करने की विधि विधान हैं। यह सतनाम धर्म का तीसरा चरण हैं।

- जैतखाम: 
सतनामी समाज में जैतखाम की मान्यता बहुत होती है, जो सतनामी पंथ के ध्वज का नाम है। इसे एक चबूतरे या प्रमुख स्थल पर खंभे में सफेद झंडा लगाकर पूजा जाता है.
- जीवनशैली:
 गुरु घासीदास ने अपने अनुयायियों को मांस खाने, शराब पीने, धूम्रपान करने या तंबाकू चबाने से दूर रहने को कहा। उन्होंने मिट्टी के बर्तनों के बजाय पीतल के बर्तनों का उपयोग करते हैं।
- संगठनात्मक संरचना: 
गुरु घासीदास ने गुरुओं की एक वंशावली निर्धारित की जो उनके बाद संप्रदाय का नेतृत्व करेंगे। एक दो-स्तरीय संगठनात्मक संरचना विकसित हुई जिसमें गुरु सबसे ऊपर थे और उनके नीचे कई ग्राम-स्तरीय महंत साटीदार भंडारी पदाधिकारी हैं।
- वर्तमान स्थिति: 
सतनामी अब एक तेजी से मुखर राजनीतिक ताकत बन गए हैं और छत्तीसगढ़ की अनुसूचित जाति आबादी पर उनका प्रभाव है। अपनी पुरुषार्थ से अनेक विकास के आयाम स्पर्श कर विविध क्षेत्रों में अवसर मिलने से देश दुनियां में सम्मानित होते आ रहें हैं।

सतनाम धर्म के अनुयायी को सतनामी कहें जाते हैं जिनकी अपनी विशिष्ट धार्मिक और सामाजिक क्रियाएं हैं। यह समाज अपनी विशिष्ट सात्विक जीवन शैली और आदर्शों के लिए जाने जाते हैं। 

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

फागुन शुक्ल सप्तमी , मंगलवार तदानुसार दि 23-2-2026 

नारायणपुर छत्तीसगढ़ प्रातः 7.25