Thursday, October 1, 2026

महानदी

प्रसंग महानदी जल विवाद 

"जाके पाँव न फटे बिवाई ओ क्या जाने पीर पराई " 

महानदी छत्तीसगढ़ और ओडिशा की जीवनरेखा है।
इसके तट पर बसे प्राचीन दक्षिण कोसल की राजधानी सिरपुर के ठीक सामने चिखली-जुनवानी मेरा गाँव है। हमारी घाट में भव्यतम लक्ष्मण देवालय के दर्शन होते हैं तो बाबा गंधेश्वरनाथ के शंख-घंटे की आवाज़ सुनते हुए हम बड़े हुए हैं। अपने खेत में बैठकर नदी को देखना - यह सिर्फ भूगोल नहीं है, यह हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है। नाव से नदी पार करते जीवन बीत रहा हैं। दो तीन बार तो नाव में डूबते डूबते बचे हैं। उलट धार एवं बाढ़ से अनेक जहरीले सांप घरों में घुस जाते हैं। मेरे बड़े पिताजी के सुपुत्र होनहार चंद्र कुमार सर्पदंश का शिकार हो गए। कई बार फसल डूब गए मुआवजा भी बड़ी मुश्किल से मिलते हैं इस तरह के अनेक दुर्घटनाओं से बचकर यहाँ तक आए हैं।
बाल्यावस्था में हमलोग दोनो भाई महानदी में बह गए थे। सुनील एक पेड़ की टहनी पकड़ लिए और इस तरह बचे। वे आगे चलकर पानी पंचायत अध्यक्ष, सरपंच और जिला पंचायत अध्यक्ष  बना। दूरद्रष्टा पिताश्री की चिंतन,भाई बंधु के अदम्य प्रयास , उत्साह से ही क्षेत्र के जनप्रतिनिधि गणों खासकर विधायक चाचा श्री रामलाल भारद्वाज के सार्थक पहल द्वारा जुनवानी से आगे समोदा ग्राम में महानदी में "समोदा डायवर्शन"  बनाने जैसी सोच विकसित हुई।

महानदी तटवर्ती जुनवानी-चिखली घाट के कृषक होने का सुख और दुःख हम एक साथ भोगते आ रहे हैं।
भारी बारिश में बाढ़ का तांडव और पानी नहीं गिरा तो गाँवों के जलस्रोतों को खींच लेना - यह दारुण दुःख था। जोगी जी की नीति, जोगी-डबरी योजना से प्रदेश में हैंडपंप उत्खनन हेतु बोर मशीन आई और तब कहीं जाकर राहत मिली।

इस तरह सुख यह है कि नदी पास है तो जीवन उत्सव है।
दुःख यह कि गर्मी में जब महानदी की जलधारा कम होती है तो वह आसपास के कुओं, तालाबों और हैंडपंपों का पानी भी खींच लेती है। नदी किनारे होकर भी प्यासे रह जाना - जीवन बेहद कष्टमय है। इससे बड़ा विरोधाभास क्या होगा?

मध्य प्रदेश में रहने और इस तरह की राजनैतिक चेतना  का अभाव या उपेक्षा का दंश प्रदेश वासी तटवर्ती लोग झेलते रहे हैं। संभवतः इसीलिए महानदी के प्रति जनमानस की आस्था गंगा-नर्मदा जैसी पनप नहीं पाई, जबकि यहाँ का जनजीवन बेहद सरल और आस्थावान है। परंतु नदी का महिमा-मंडन कर उससे लाभ लेना या पर्यटन आदि के लिए व्यावसायिक उपयोग करना यहाँ की सरलतम संस्कृति का अंग नहीं रहा। इसलिए कभी संरक्षण, संवर्धन एवं सौंदर्य के लिए स्थानीय लोगों में विचार भी नहीं पनप सका।

परंतु छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पड़े अकाल और उनसे निपटने के लिए कमर कसे प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी जी को हमारे पिताजी स्वर्गीय शिक्षक सुकाल दास भतपहरी, पानी पंचायत अध्यक्ष भाई सुनील एवं पिताजी के सहपाठी यशस्वी विधायक रामलाल भारद्वाज (भतपहरी) के माध्यम से महानदी के जल को डायवर्ट कर क्षेत्र के कृषकों के लिए योजना बनाने की सलाह दी गई। इसमें किंचित हमारा भी सोच और सहयोग रहा है। बाद में तत्कालीन पलारी विधायक शिव डहरिया जी का प्रयास रंग लाया फलस्वरूप समोदा डायवर्शन जैसी परियोजना ने आकार लिया और हमारे पलारी कॉलेज के प्रांगण में हुई विशाल जनसभा में माननीय अजीत जोगी जी ने इसकी घोषणा की। तब हमारा मन उल्लास और हर्ष से भर गया कि वर्षों का सपना साकार हो उठेगा। उस कार्यक्रम का मैं चश्मदीद गवाह रहा हूँ। 

हम लोगों की चाह केवल इतनी थी -
1. स्टॉप डैम/एनीकट बने ताकि दोनों ओर फैले रिश्तेदारों का सुगमतापूर्वक आवागमन हो सके। कोई बड़ा बाँध नहीं। बस इतना कि थोड़ा पानी रुके।
2. उद्देश्य पानी रोकना नहीं, निस्तार है - ताकि दोनों तटों के बीच आवागमन बना रहे, जल-भराव से रिचार्ज हो, कुआँ-तालाब-हैंडपंप जिंदा रहें।
3. रोज़ी-रोज़गार से जुड़े - मत्स्याखेट हो, कछार-बाड़ी में फसलें लहलहाएँ, जीवन खुशहाल हो।

परंतु अन्यान्य कारणों या जल-भराव की स्थिति के चलते इसे आरंग के पास निसदा डायवर्शन के रूप में यशस्वी डॉ रमन सिंह के कार्यकाल में निर्मित किया गया।

    समोदा में एनीकेट बना और उसे रायखेड़ा खरोरा के पॉवर प्लांट को पानी दिया जाने लगा।जो नहीं होना था, वह हो गया और संभवतः पानी के इस तरह व्यावसायिक उपयोग के कारण ओडिशा सरकार हस्तक्षेप कर रही है यह विचारणीय हैं। यही चंद्रपुर के समीप एनीकट का हुआ, जिसे निजी कंपनी को पानी सप्लाई की जा रही हैं। तब से ओडिशा जैसे मित्र और सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक रूप से एक रहे प्रदेश के साथ अनावश्यक तनाव निर्मित होने लगा।

तो क्या हम प्रदेशवासी, जिनकी सभी नदियों को अपने 280 किलोमीटर के बहाव क्षेत्र में निचोड़ कर ओडिशा ले जाती है, किंकर्तव्यविमूढ़ से देखते रहें और दुःख भोगते रहें? सवाल यह है।

4. हम प्रदेशवासी और सरकार कतई ओडिशा विरोधी नहीं हैं - महानदी 850 किलोमीटर लंबी है, जिसमें से 280 किलोमीटर ही छत्तीसगढ़ में बहती है। अरपा, पैरी, सोंढूर, शिवनाथ, हसदेव - छत्तीसगढ़ की लगभग सारी नदियों का पानी इसी 280 किलोमीटर में आकर महानदी में मिलता है और सीधे ओडिशा चला जाता है। सवाल वाजिब है कि क्या तटवर्ती छत्तीसगढ़ ही प्यासा रहे?

5. निस्तार प्राकृतिक हक है - जो पानी आपके क्षेत्र की बारिश और आपके नालों ने नदी में डाला है, उस पर तो स्थानीय लोगों का पहला अधिकार बनता है।

आपने अपने पिताजी के समय के नाला बाँधने वाले अभियानों का जिक्र किया - सामुदायिक सिंचाई, उद्वहन, बंधनी बाँधकर निस्तारी करना। वही सोच आज बड़े पैमाने पर स्टॉप डैम के रूप में चाहिए। पहले बारिश पर्याप्त थी, जागरूकता कम थी, पर अब बारिश घट रही है और सारा जल बहकर चला जा रहा है।

नदी वरदान बने, अभिशाप नहीं।

इसलिए प्रत्येक 10-15 किलोमीटर में डायवर्शन एनीकट, स्टॉप डैम होने से बाढ़-नियंत्रण, आवागमन, जलस्रोत, कछार-बाड़ी का पुनर्जीवन एवं पर्यटन विकास होगा और तटवर्ती लोगों को स्वरोजगार मिलेगा, पलायन थमेगा। अन्यथा ट्रांस-महानदी क्षेत्र पलायन के लिए छत्तीसगढ़ में अभिशप्त है। उसके दिन फिरेंगे।

गुरु घासीदास, वीर नारायण सिंह की यह धरती अपना प्राचीन वैभव प्राप्त करेगी, जहाँ चंद्रपुर, शिवरीनारायण, गिरौदपुरी, सोनाखान, सिरपुर, राजिम आबाद रहेंगे।

गर्मी में सूखी रेत देखकर जो अभिशाप जैसा लगता है, वही नदी अगर साल भर थोड़ी-थोड़ी भरी रहे तो वही वरदान बन जाएगी।

सरकार के लिए यह नीति का विषय है - छत्तीसगढ़ सरकार और ओडिशा सरकार दोनों को इस दृष्टि से सोचना होगा। पानी को रोकना नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व में उपयोग करना। स्वस्थ वातावरण में महानदी जल-विवाद का यही समाधान है।

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी 
    जुनवानी चिखली, रायपुर छ ग 

जय महानदी, जय छत्तीसगढ़।

Saturday, September 26, 2026

राजभाषा मास पर

राजभाषा मास के अवसर में
पिरथी म पहली मनखे आइन तेकर पाछू उनकर बोली/भाखा फूटिन अउ मुहावांही होय लगिन। लोगन मन भोजन, रोजी-रोजगार सेती बगरिन अउ एक दूसर संग मिंझरिन। धीरे-धीरे कुछेक लोगन धनवंता/गुनवंता होगिन राज-पाट मठ मंदिर आश्रम बनाइन इहा के भाखा बोली मन प्रसंस्करण (मानक पन) होय लगिन लिपि के बने ले यही हर राज काज अउ शास्त्र आदि के भाखा बनिस।

माने कि लोक भाखा आदिम काल से उद्धरित हवे उही हर छन के प्रसंस्करण होके लिपिबद्ध होय लगिस पाली प्राकृत संस्कृत फारसी लेटिन इंग्लिश चाइनीज अउ अन्य शास्त्रीय (क्लासिक) भाखा बनिस। ये मन उद्भव ले अवतरे के बाद पछा भागे बर लगे अइसें निथे भलुक धीरे-धीरे इनकर बढ़ोतरी होय लगिन ते पाय के गुनवंता मन कहिथे —

'भाखा के क्रमिक विकास ल समझे अउ समझाय ल परथे कोन्हो भी रुढ़-मुढ़ मान्यता ल माने से बूता न इ बनय।'

सिरतों कहे तो कोनो भी भाखा हर अलौकिक या दैवीय नोहय। ओहर इही लौकिक अउ जमौनी जिनिस होथे। जेन लोक म नान्ही नायक होथे ओकर चरित प्रेरक हो जथे ओकर गुनगान होय लगथे या जो समुदाय शासक वर्ग होथे ओकर आचार विचार बनथे लिखित म आथे ओहर समरिद्ध हो जथे। तहां ले ओकर महिमामय बरनन करे के रिवाज तको बन जाथे।

भाखा के प्रसंस्करण अउ समरिद्धी हर सतत चलैया प्रक्रिया आय। हमर हिन्दी हर दिल्ली अउ मेरठ के बीच राज काज में लगे मनसे मन के स्थानीय बोली अउ शासक वर्ग के भाखा के मिंझरे हुए सरूप आय। एकर सरूप हमन ल अमीर खुसरो ले ले के मध्यकालीन संत कवि परंपरा में दिखथे। फेर सच कहे त हिन्दी हर 1857 के क्रांति के बाद संपर्क भाखा के रूप म स्थानीय शासक अउ प्रभावशाली लोगन के बीच बौराय से आइस।

भारतेन्दु से लेकर प्रेमचंद तक उत्तरोत्तर विकास होय लगिन हमर छायावाद से लेकर प्रयोगवाद तक के नामी कवि लेखक मन बड़ सुघ्घर सरूप दिस। संगे सजग अनेक पत्र-पत्रिका अउ आकाशवाणी फिल्म मन हिन्दी सात समुन्दर पार पहुंचाइन। आज हिन्दी सर्वाधिक बोले जाने वाली भाखा के रूप म प्रतिष्ठित होय के अवस्था म हवय। फेर येहर अब भी राष्ट्र भाखा के रूप म ग्राह्य न इ होय पाय हे ए हर बड़ दुःख के बात आय।

असल में हर राज्य के भाखा ल राजभाखा अउ बहुसंख्यक समुदाय अउ स्वतंत्रता संग्राम के समय संपर्क के भाखा हिन्दी ल राष्ट्रीय भाखा घोषित करे के गंभीर प्रयास होना चाही। अंग्रेजी वैश्विक अउ आधुनिक ज्ञान विज्ञान के भाखा के रूप म प्रतिष्ठित हवय त ओला उही सरूप म अंगीकार करे जा सकत हे भलुक कर चुके हन।

अब पाठ्यक्रम में राष्ट्रीय स्तर म तीन भाखाई सिद्धान्त हवय त एमा राष्ट्रीय भाखा हिन्दी, राजभाखा (जैसे पंजाबी तमिल मलयालम मराठी उड़िया छत्तीसगढ़ी असमिया हर राज के भाखा) अउ अंतरराष्ट्रीय संपर्क भाखा अंग्रेजी म बनाय जाय। प्राचीन क्लासिक भाखा पाली प्राकृत संस्कृत अरबी फारसी आदि ल ऐच्छिक रखना चाहिए।

ऐसे करे से स्थानीय राजकीय भाखा मन के साथ संस्कृति हर तको जतनाही अउ प्रतिभा के समुचित विकास होही। नहि ते मातृभाखा (राजभाखा) ल छोड़ अन्य भाखा म नान्हे लइका मन शिक्षा दे जाही त अपन सीखे समझे उमर 14-15 साल तक ओहर भाखा के चक्कर म फदगे पड़े रही। स्कूल अउ घर के भाखा के चक्रव्यूह म फंस के रहि जाही।

छत्तीसगढ़ के संदर्भ म देखे जाय अबतक इहा ने छात्र मन न हिन्दी के होय सकय न संस्कृत के न अंग्रेजी के। तेन पाय के अखिल भारतीय स्तर म प्रतिभा के कमती केवल भाखाई रूप म ही झलकथे अउ आत्मविश्वास के कमती के सेती शासन प्रशासन म पिछवाय सरीख नजर आथे।

सच तो ए हवय कि — 'जोन समुदाय सचेत रहिथे ओकर सम्हला अउ जनता जथे अउ जोन समुदाय अचेत रथे ओकर भाखा बोली मन नंदावत चले जाथे।'

भाखा-बोली से संस्कृति तको प्रभावित होथे। वर्तमान म छत्तीसगढ़ी संस्कृति शहरी अउ मध्यमवर्गीय परिवार से विदाई होय के कगार म खड़े हवय। एला बचाय खातिर हमर शासन-प्रशासन ल पोठलग्गा अउ ठोसलग्गा बूता करेच ल परही।

डॉ. अनिल भतपहरी, सत श्री ऊँजियार सदन अमलीडीह, रायपुर

राजभाषा मास पर

राजभाषा मास के अवसर में

पिरथी म पहली मनखे आइन तेकर पाछू उनकर बोली/भाखा फूटिन अउ मुहावांही होय लगिन। लोगन मन भोजन, रोजी-रोजगार सेती बगरिन अउ एक दूसर संग मिंझरिन। धीरे-धीरे कुछेक लोगन धनवंता/गुनवंता होगिन राज-पाट मठ मंदिर आश्रम बनाइन इहा के भाखा बोली मन प्रसंस्करण (मानक पन) होय लगिन लिपि के बने ले यही हर राज काज अउ शास्त्र आदि के भाखा बनिस।

माने कि लोक भाखा आदिम काल से उद्धरित हवे उही हर छन के प्रसंस्करण होके लिपिबद्ध होय लगिस पाली प्राकृत संस्कृत फारसी लेटिन इंग्लिश चाइनीज अउ अन्य शास्त्रीय (क्लासिक) भाखा बनिस। ये मन उद्भव ले अवतरे के बाद पछा भागे बर लगे अइसें निथे भलुक धीरे-धीरे इनकर बढ़ोतरी होय लगिन ते पाय के गुनवंता मन कहिथे —

'भाखा के क्रमिक विकास ल समझे अउ समझाय ल परथे कोन्हो भी रुढ़-मुढ़ मान्यता ल माने से बूता न इ बनय।'

सिरतों कहे तो कोनो भी भाखा हर अलौकिक या दैवीय नोहय। ओहर इही लौकिक अउ जमौनी जिनिस होथे। जेन लोक म नान्ही नायक होथे ओकर चरित प्रेरक हो जथे ओकर गुनगान होय लगथे या जो समुदाय शासक वर्ग होथे ओकर आचार विचार बनथे लिखित म आथे ओहर समरिद्ध हो जथे। तहां ले ओकर महिमामय बरनन करे के रिवाज तको बन जाथे।

भाखा के प्रसंस्करण अउ समरिद्धी हर सतत चलैया प्रक्रिया आय। हमर हिन्दी हर दिल्ली अउ मेरठ के बीच राज काज में लगे मनसे मन के स्थानीय बोली अउ शासक वर्ग के भाखा के मिंझरे हुए सरूप आय। एकर सरूप हमन ल अमीर खुसरो ले ले के मध्यकालीन संत कवि परंपरा में दिखथे। फेर सच कहे त हिन्दी हर 1857 के क्रांति के बाद संपर्क भाखा के रूप म स्थानीय शासक अउ प्रभावशाली लोगन के बीच बौराय से आइस।

भारतेन्दु से लेकर प्रेमचंद तक उत्तरोत्तर विकास होय लगिन हमर छायावाद से लेकर प्रयोगवाद तक के नामी कवि लेखक मन बड़ सुघ्घर सरूप दिस। संगे सजग अनेक पत्र-पत्रिका अउ आकाशवाणी फिल्म मन हिन्दी सात समुन्दर पार पहुंचाइन। आज हिन्दी सर्वाधिक बोले जाने वाली भाखा के रूप म प्रतिष्ठित होय के अवस्था म हवय। फेर येहर अब भी राष्ट्र भाखा के रूप म ग्राह्य न इ होय पाय हे ए हर बड़ दुःख के बात आय।

असल में हर राज्य के भाखा ल राजभाखा अउ बहुसंख्यक समुदाय अउ स्वतंत्रता संग्राम के समय संपर्क के भाखा हिन्दी ल राष्ट्रीय भाखा घोषित करे के गंभीर प्रयास होना चाही। अंग्रेजी वैश्विक अउ आधुनिक ज्ञान विज्ञान के भाखा के रूप म प्रतिष्ठित हवय त ओला उही सरूप म अंगीकार करे जा सकत हे भलुक कर चुके हन।

अब पाठ्यक्रम में राष्ट्रीय स्तर म तीन भाखाई सिद्धान्त हवय त एमा राष्ट्रीय भाखा हिन्दी, राजभाखा (जैसे पंजाबी तमिल मलयालम मराठी उड़िया छत्तीसगढ़ी असमिया हर राज के भाखा) अउ अंतरराष्ट्रीय संपर्क भाखा अंग्रेजी म बनाय जाय। प्राचीन क्लासिक भाखा पाली प्राकृत संस्कृत अरबी फारसी आदि ल ऐच्छिक रखना चाहिए।

ऐसे करे से स्थानीय राजकीय भाखा मन के साथ संस्कृति हर तको जतनाही अउ प्रतिभा के समुचित विकास होही। नहि ते मातृभाखा (राजभाखा) ल छोड़ अन्य भाखा म नान्हे लइका मन शिक्षा दे जाही त अपन सीखे समझे उमर 14-15 साल तक ओहर भाखा के चक्कर म फदगे पड़े रही। स्कूल अउ घर के भाखा के चक्रव्यूह म फंस के रहि जाही।

छत्तीसगढ़ के संदर्भ म देखे जाय अबतक इहा ने छात्र मन न हिन्दी के होय सकय न संस्कृत के न अंग्रेजी के। तेन पाय के अखिल भारतीय स्तर म प्रतिभा के कमती केवल भाखाई रूप म ही झलकथे अउ आत्मविश्वास के कमती के सेती शासन प्रशासन म पिछवाय सरीख नजर आथे।

सच तो ए हवय कि — 'जोन समुदाय सचेत रहिथे ओकर सम्हला अउ जनता जथे अउ जोन समुदाय अचेत रथे ओकर भाखा बोली मन नंदावत चले जाथे।'

भाखा-बोली से संस्कृति तको प्रभावित होथे। वर्तमान म छत्तीसगढ़ी संस्कृति शहरी अउ मध्यमवर्गीय परिवार से विदाई होय के कगार म खड़े हवय। एला बचाय खातिर हमर शासन-प्रशासन ल पोठलग्गा अउ ठोसलग्गा बूता करेच ल परही।

डॉ. अनिल भतपहरी, सत श्री ऊँजियार सदन अमलीडीह, रायपुर

Friday, September 25, 2026

गुरुगद्दी पूजा एवं गुरुदर्शन मेला

सतनाम धर्म-संस्कृति का मांगलिक अनुष्ठान:
गुरुगद्दी पूजा एवं गुरुदर्शन मेला महोत्सव (1825-2025 : 200वाँ वर्ष)


डॉ. अनिल भतपहरी
9617777514
सतश्री उंजियार-सदन, अमलीडीह, रायपुर (छ.ग.)

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सारांश

प्रस्तुत शोध-पत्र में सतनाम धर्म-संस्कृति के सर्वाधिक प्राचीन एवं वृहद् मांगलिक अनुष्ठान — गुरुगद्दी पूजा महोत्सव एवं गुरुदर्शन मेला — का ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सामाजिक विश्लेषण किया गया है। क्वार शुक्ल एकम से दशमी तक आयोजित दस दिवसीय इस महापर्व की परंपरा 1825 में मोती महल गुरुद्वारा, भंडारपुरी के उद्घाटन एवं राजा गुरु बालकदास के राज्याभिषेक से जुड़ी है। 1860 के बाद बाधित हुई इस परंपरा का 1985 में ग्राम जुनवानी से पुनरुद्धार हुआ। यह अध्ययन इस आयोजन को दुःख-दशहरा पर्व के रूप में व्याख्यायित करते हुए इसके समाज-संगठन, ज्ञान-हस्तांतरण एवं लोककल्याणकारी आयामों को रेखांकित करता है।

1. प्रस्तावना

सतनाम धर्म-संस्कृति में क्वार शुक्ल एकम से दशमी तक आयोजित 'गुरुगद्दी पूजा महोत्सव' और समापन पर भव्य शोभायात्रा का आयोजन, गुरुघासीदास के पुत्र राजा गुरु बालकदास के राज्याभिषेक और उनकी शान में मनाए जाने वाले राज दशहरा पर्व की शोभायात्रा का मांगलिक अनुष्ठान है।

2. आयोजन विधि

क्वार शुक्ल एकम से दशमी तक यह आयोजन होता है। दशमी को सतधरा स्नान कर गुरुगद्दी व सतनाम ज्योत कलश को शोभायात्रा द्वारा सतनाम भवन में स्थापित जोत में समाहित कर देते हैं। दूसरे दिन पंथी नर्तक दल और अखाड़े वाले क्वार एकादशी को गुरुदर्शन मेला, भंडारपुरी जाते हैं। वहाँ हाथी-घोड़ों के भव्य जुलूस, अनेक करतब, पंथी नृत्य और अखाड़ों का प्रदर्शन होता है।

दसवें दिन 'सद्गुरु आसन' की प्रातः शोभायात्रा निकालकर ग्राम की गलियों की परिक्रमा कराई जाती है। सदानीरा नदी-सरोवर के समीप जल-परछन कराकर वापस गुरुद्वारा में अथवा श्रद्धालु अपने घर में आगामी उत्सव तक नित्य पूजा-अर्चना हेतु स्थापित करता है। शाम को तेलासी, अमसेना, खपरी, बोड़सरा, खडुआ आदि गुरु-वंशजों के दर्शनार्थ शोभायात्रा जाती है।

3. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

कुछ विद्वानों के अनुसार यह परंपरा अशोक दशहरा है, जो सतनाम संस्कृति में आंशिक संशोधन के बाद 1820 के बाद प्रचलित हुई। तब साक्षात् गुरुघासीदास इस आयोजन के सूत्रधार थे।

छत्तीसगढ़ में स्थापित सतनाम धर्म का यह उत्सव 1825 से चला आ रहा है, जब मोती महल गुरुद्वारा का उद्घाटन हुआ और राजा घोषित होने के बाद चतुरंगी सेना सजाकर सद्गुरु घासीदास के मंझले पुत्र राजा गुरु बालकदास, भाई आगरदास, पुत्र साहेबदास हाथी पर सवार होकर आमजन के बीच आए और गुरु-उपदेशना व पंथ-संचालन हेतु दिशा-निर्देशन किया।

सन् 1860 में राजा गुरु बालकदास की हत्या, नेतृत्व-शून्यता, भीषण अकाल तथा बोड़सरा बाड़ा व तेलासी बाड़ा के महाजनों के आधिपत्य एवं सामाजिक उथल-पुथल के कारण यह आयोजन स्थगित हो गया। केवल राज-दशहरा, गुरुदर्शन मेले के नाम पर भंडारपुरी में एक दिवसीय होता रहा।

4. पुनरुद्धार (1985)

इसे पूर्ववत तेजस्वी स्वरूप देते हुए नवकलेवर के साथ, भंडारपुरी के समीपस्थ ग्राम जुनवानी में शिक्षक सुकालदास भतपहरी एवं मध्य बाल समाज व युवा जागृति मंच के संयुक्त तत्वावधान में 1985 में दस दिवसीय आयोजन किया गया। उसके बाद गाँव-गाँव में दस दिवसीय गुरुगद्दी पूजा महोत्सव का व्यवस्थित पुनरारंभ हुआ, जो आज सैकड़ों ग्रामों/कस्बों/शहरों में उत्साहपूर्वक मनाया जा रहा है। गुरुगद्दी पूजा महोत्सव के 42वें वर्ष का आयोजन इस वर्ष ग्राम जुनवानी में हो रहा है।

5. गुरुगद्दी पूजा समापन और दुःख-दशहरा पर्व

सतनाम धर्म की चारों शाखाओं और देश-विदेश में निवासरत सतनामियों में गुरुगद्दी पूजा विधान प्रचलित है। गुरुगद्दी सद्गुरु का आसन है, जिस पर आसीन होकर वे अनुयायियों को धर्मोपदेश देते हैं और उनके तमाम उलझनों, परेशानियों और दसों तरह के दुःख-व्याधि के हरण का उपाय बताते हैं — इसलिए यह दुःख-दशहरा पर्व भी है।

दस दिवसीय महापर्व में नित्य प्रातः-सायं आरती-पूजा के साथ संत-महंत-गुरुओं द्वारा ज्ञानवर्धक व्याख्यान, सत्संग-प्रवचन, गुरु ग्रंथ व चरित का पाठ एवं लोक कलाकारों द्वारा प्रेरक व मनोरंजक नाट्य-मंचन, गायन व नर्तन होता है। कहीं-कहीं हर शाम सामूहिक भोग-भंडारा होता है। इस विकट समय में जब फसलें खेत में हैं और अन्नागार खाली होते हैं, साधन-सक्षम लोग अन्नदान कर भंडारा चलाते हैं ताकि गरीब, वृद्ध, महिलाओं व बच्चों को गुरुप्रसादी मिल सके।

6. गुरुदर्शन मेला, भंडारपुरी

दूसरे दिन जगप्रसिद्ध भंडारपुरी गुरुदर्शन दशहरा पर्व हर्षोल्लासपूर्वक मनाया जाता है। इस दिन हाथी, घोड़े, ऊँट, पैदल चतुरंगी शोभायात्रा, गुरु-वंशजों व गुरुगद्दी नशीन धर्मगुरु का उपदेश व प्रवचन होता है। सतनामियों का यह सबसे बड़ा और प्राचीन महोत्सव है, जहाँ गुरुवंशज के घर से गुरुप्रसादी भोग-भंडारा पाकर श्रद्धालुगण धन्य हो जाते हैं। देशभर के लाखों श्रद्धालु एकत्र होते हैं।

7. सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व

इस महाआयोजन से समाज सुसंगठित होता है। उपस्थित गाँवों के मुखिया/प्रतिनिधिगण यहाँ से सीखी-समझी बातों को अपने-अपने ग्रामों में संचालित करते हैं। इसलिए सतनाम संस्कृति में 'गुरुदर्शन मेला' का अतिशय महत्व है। गुरुगद्दी पूजा महोत्सव का आयोजन प्रत्येक सतनामी ग्राम में होना चाहिए। दस दिनों तक सामूहिक आयोजन से लोग सामाजिक व धार्मिक कार्यों में प्रवृत्त होते हैं, संगठित होते हैं और वर्षभर की कटुताओं का समापन होता है। नई पीढ़ी को समृद्धशाली संस्कृति का हस्तांतरण होता है — यही इस आयोजन का प्रमुख उद्देश्य है।

8. निष्कर्ष

1825 से 2025 तक 200 वर्षों की यह परंपरा सतनाम धर्म की जीवंतता, संगठन-शक्ति एवं लोकमंगलकारी चेतना का प्रमाण है। 1985 के पुनरुद्धार के बाद यह महोत्सव पुनः जन-जन का पर्व बन गया है।

संदर्भ / चित्र सूची

चित्र-1: मोती महल गुरुद्वारा, भंडारपुरी (लेखक द्वारा 1993 में स्वकैमरे से ली गई फोटो)

चित्र-2: सद्गुरु आसन, गुरुगद्दी पूजा महोत्सव, अमलीडीह

चित्र-3: गुरुगद्दी पूजा महोत्सव स्थल में गुरु सतखोजन साहेब के साथ आयोजक मंडल, रायपुर

।। जय सतनाम ।।

Thursday, September 24, 2026

बदरिया बरसे भादों में रिमझिम

लेव, पूरा गीत बना दे हौं - पुराना लोकगीत के रंग म -

"बदरवा बरसे भादो म"

- स्थायी -
बदरवा बरसे भादो म रिमझिम
सुरता सजनवा के आए पल छीन
कास फूल फुले सकल महि छाई
बरसा बीते बेगी सजन घर आई

- अंतरा 1 -
ताल-तलैया भर गए, डहर डुबान
पंछी तको जोड़ी म, मोर सुनसान
अंखियां थक गे मोर, राह निहारे
कब ले अइहौ कहिके, दिन ल गिनारे

- अंतरा 2 -
भादो के अंधियारी, बिजुरी चमके
पिया-पिया बोले पपिहा, जिया तरसे
महुआ मोर महके, मन मोर बहके
सपना म आके सजना, काबर छलके

- अंतरा 3 -
धान के बाली झूमे, खेत लहराए
संगी-सहेली सबके, पिया घर आए
मोरो आंगना सूना, तुंही बिन सजना
बेगि आ जा रे, तोर बिन जिया न लागे सजना

 दादरा - कहरवा ताल म

Wednesday, September 23, 2026

अमृतवाणी का परीक्षण एवं संशोधन

सतनामी अमृतवाणी में प्रक्षिप्त अंशों का परीक्षण और संशोधन

कार्यकारी सारांश

प्रचलित 42 अमृतवाणियों की सूची में सम्मिलित वाणी क्रमांक 14 — "ज्ञान पंथ कृपाण के धारा" — गुरु घासीदास की मौलिक वाणी नहीं है। यह गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में दोहा 114 के बाद की चौपाई "ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा" का रूपांतरण है 1 2। इसका भावार्थ मानस में ज्ञानमार्ग की कठिनता के संदर्भ में है, जबकि सतनाम सिद्धांत में ज्ञान का अर्थ समता, सत्याचरण और अंधविश्वास-खंडन है। अतः इसे अमृतवाणी संग्रह से पृथक कर स्रोत-टिप्पणी के साथ परिशिष्ट में रखना उचित है। इसी कसौटी पर कई अन्य प्रचलित वाणियों में भी परवर्ती प्रक्षेप, ब्राह्मणीकरण और भाषिक विकृति के लक्षण मिलते हैं, जिनका प्रगतिशील सतनामी समाज के साहित्य प्रकोष्ठ द्वारा सर्वसम्मत पाठ-संशोधन आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

1. "ज्ञान पंथ कृपाण के धारा" का मूल स्रोत

1.1 मानस में प्रसंग

उत्तरकाण्ड में काकभुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं:

ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा॥
जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई॥

भावार्थ: ज्ञान का मार्ग दोधारी तलवार की धार के समान है; इस पर गिरते देर नहीं लगती 1 2।

यह संवाद भक्ति बनाम ज्ञान की तुलसीदासीय मीमांसा का भाग है, जिसमें अंततः भक्ति की सुगमता प्रतिपादित की गई है।

1.2 सतनामी सूची में प्रवेश कैसे हुआ

प्रचलित 42 अमृतवाणियों की सूची में क्रमांक 14 पर "गियान के पंथ किरपान के धार ये" दर्ज है 3। छत्तीसगढ़ी मौखिक परंपरा में पंथी गायकों और कथा-वाचकों के माध्यम से मानस की पंक्तियाँ लोक में घुल गईं। उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में मुद्रित गुटकों में बिना स्रोत-परीक्षण के इसका समावेश हो गया।

1.3 सैद्धांतिक विरोधाभास

गुरु घासीदास का ज्ञान बौद्ध-सहज परंपरा का "सतबोध" है — पाली "एस धम्मो सनंतनो" की अनुगूंज, अर्थात बैर को अबैर से, अंधकार को प्रकाश से काटना 4। यह ज्ञान दुर्गम तलवार-धार नहीं, बल्कि आचरण में उतारने योग्य सरल सत्य है: "सतनाम ल अपन आचरण में उतारव" और "अंधविश्वास, रूढ़िवाद ल झन मानव" 3। अतः मानस की ज्ञान-भय वाली पंक्ति सतनाम दर्शन के अनुकूल नहीं है।

संशोधन प्रस्ताव: इस पंक्ति को अमृतवाणी की मुख्य सूची से हटाकर "परवर्ती लोक-प्रचलित सूक्ति (स्रोत: रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड)" शीर्षक से परिशिष्ट में रखा जाए।

2. संदिग्ध वाणियों की पहचान की कसौटी

प्रगतिशील सतनामी समाज के साहित्य प्रकोष्ठ की सर्वसम्मति को आगे बढ़ाने हेतु निम्नलिखित पाठालोचन कसौटियाँ प्रस्तावित हैं:

कसौटीविवरण
स्रोत-संगतिवाणी गुरु घासीदास के समकालीन शिष्यों, पंथी गीतों के प्राचीन रूपों या विश्वसनीय पांडुलिपियों में मिलती है या नहीं
सिद्धांत-संगतिसप्त सिद्धांत — सतनाम-निष्ठा, मूर्तिपूजा-निषेध, जातिभेद-खंडन, जीव-हिंसा निषेध, नशा-निषेध, परस्त्री-मातृभाव, चोरी-जुआ त्याग — के अनुकूल है या नहीं 5
भाषा-संगतिछत्तीसगढ़ी/पाली-प्राकृत मूल की सहज छटा बनाम खड़ी बोली-सanskritनिष्ठ परवर्ती शब्दावली
दर्शन-संगतिपुनर्जन्म-खंडन, पुरोहित-माध्यम निषेध और श्रम-प्रतिष्ठा जैसे सतनामी वैशिष्ट्य के अनुरूपता

3. अन्य संदिग्ध वाणियों का विश्लेषण

प्रचलित पाठसमस्याविश्लेषण और प्रस्तावित संशोधन
पानी पीहू छान के, गुरु बनाहू जान केकबीरपंथी दोहा "पानी पीवै छान के" का स्पष्ट अनुकरण; गुरु-महिमा का ब्राह्मणवादी अतिरेकसतनाम में गुरु का अर्थ सतबोध देने वाला मार्गदर्शक है, अवतारी मध्यस्थ नहीं। प्रस्तावित पाठ: "सतनाम ल जानव, समझव, परखव तब मानव" को ही प्रामाणिक रखा जाए 3। इस दोहे को परिशिष्ट में "कबीर-साहब की परंपरा से आई लोकसूक्ति" टिप्पणी सहित रखा जाए
इही जनम ल सुधारना साँचा ये (पुनर्जन्म के गोठ झूठ आय) — विकृत व्याख्या सहितकुछ संस्करणों में इसे कर्मकांडीय पुनर्जन्म-स्वीकृति से जोड़ा गयागुरु घासीदास की मूल स्थापना इहलोकवादी है: इसी जीवन का सुधार ही सत्य है। ब्राह्मणवादी परलोक-भय जोड़ने वाले अंश हटाए जाएँ। मूल भाव: "इही जनम ल सुधारव, सतकर्म ही पूजा आय"
मोर ह सब्बो संत के आय अउ तोर ह मोर बर कीरा येसंत-महिमा के नाम पर गुरु को ईश्वर-तुल्य अतिमानव बनानासप्त सिद्धांत में सतनाम पर अडिग विश्वास है, व्यक्ति-पूजा नहीं 5। यह पंक्ति मूर्तिपूजा-निषेध और समता-सिद्धांत के विरुद्ध जाती है। इसे हटाकर "जतेक हव सब मोर संत आव" के समतावादी पाठ को रखा जाए
तरिया बनावव, कुआँ बनावव... फेर मंदिर बनई मोर मन नई आवयउत्तरार्ध में कुछ मुद्रणों में "मंदिर" को "धर्मशाला" से बदलनामूल निषेध मंदिर-संस्कृति का है, जो सतनाम के निराकार-सत्य बोध के अनुकूल है 3। प्रक्षिप्त नरम पाठ ("धर्मशाला") हटाकर मूल कठोर पाठ पुनः स्थापित किया जाए
जइसे खाहु अन्न वैसे बनही मनआयुर्वेदीय-वर्णाश्रमी आहार-शुद्धि सिद्धांत का प्रवेशगुरु घासीदास का बल श्रम के रोटी ("मेहनत के रोटी ह सुख के आधार आय") और मद्य-मांस निषेध पर है, आहार-जातिवाद पर नहीं। इसे सीमित टिप्पणी के साथ रखा जाए, सिद्धांत न बनाया जाए

4. साहित्य प्रकोष्ठ की सर्वसम्मति को आगे बढ़ाने हेतु सुझाव

  1. त्रिस्तरीय संग्रह प्रकाशित हो: (क) प्रामाणिक अमृतवाणी — सप्त सिद्धांत से सत्यापित; (ख) परिशिष्ट — लोकप्रचलित पर संदिग्ध सूक्तियाँ स्रोत-टिप्पणी सहित; (ग) त्याज्य प्रक्षेप — सिद्धांत-विरुद्ध अंश।
  2. पांडुलिपि सर्वेक्षण: गिरौदपुरी, भंडारपुरी और पंथी गायकों के घरानों से पुरानी पोथियों, पंथी गीतों के बोल और ब्रिटिश-कालीन गजेटियर विवरणों का तुलनात्मक संकलन किया जाए।
  3. भाषा-परिशोधन: खड़ी बोली में संस्कृतनिष्ठ किए गए पाठों को छत्तीसगढ़ी मूल की ओर लौटाया जाए, क्योंकि छत्तीसगढ़ी पाली-प्राकृत का ही स्वरूप है और शिलालेखों में इसका साक्ष्य सुरक्षित है 4।
  4. पाठ्यपुस्तक टिप्पणी: प्रत्येक अमृतवाणी के साथ सप्त सिद्धांत से संबंध, स्रोत और प्रक्षेप-आशंका की संक्षिप्त टिप्पणी दी जाए ताकि आगामी पीढ़ी अंधानुकरण न करे।

निष्कर्ष

"ज्ञान पंथ कृपाण के धारा" निस्संदेह रामचरितमानस की पंक्ति है, गुरु घासीदास की अमृतवाणी नहीं। इसे हटाना किसी परंपरा का अपमान नहीं, बल्कि सतनाम परंपरा की शुद्धि है। यही दृष्टि अन्य संदिग्ध वाणियों पर लागू होने से सतनाम साहित्य अपने मूल इहलोकवादी, समतावादी और अंधविश्वास-विरोधी स्वरूप में पुनः प्रतिष्ठित होगा — जैसा प्रगतिशील सतनामी समाज के साहित्य प्रकोष्ठ ने वर्षों पूर्व सर्वसम्मति से स्वीकार किया था। उस सर्वसम्मति को मुद्रित, प्रचारित और पाठ्यक्रमों में स्थापित करना ही इस समय का कर्तव्य है।

Sources

1 Bhavpath Seva Sansthan — Uttar Kand PDF
2 Scribd — Uttarkand in Hindi Chaupaai With Meaning
3 Lalluram — Guru Ghasidas Jaynti: 7 principles and 42 Amritvani
4 Anil Bhatpahari — Satnam hi Sanatan hain
5 Wikipedia — Guru Ghasidas


Saturday, September 19, 2026

सतनामी अनुसूचित जाति के श्रेणी में: एक अध्ययन

अनुसूचित जाति वर्ग में सतनामी को सम्मिलित करने से जो पेशागत भ्रम  निर्मित हुआ हैं और सामाजिक भेदभाव के साथ बहुसंख्यकों द्वारा प्रायोजित दमन दलन हुआ हैं उन्हें  समझे बिना सामाजिक न्याय अधूरा है
भारतीय समाज में ‘अनुसूचित जाति’ को प्रायः एक समान वर्ग समझ लिया जाता है। आरक्षण और कल्याणकारी सुविधाओं के कारण यह भ्रम और गहरा हुआ है कि इस सूची में सम्मिलित सभी समुदायों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एक जैसी रही होगी। वस्तुतः सत्य इससे भिन्न है। ब्रिटिशकालीन जनगणनाओं और तत्कालीन आंदोलनों को ध्यान से देखें तो स्पष्ट दो धाराएं दिखाई देती हैं — एक अस्पृश्य (Untouchables) मानी गई जातियों की, और दूसरी दबाई गई (Depressed Classes) जातियों की।
ब्रिटिश काल में शब्दों का वर्गीकरण
1911 की जनगणना में अंग्रेजों ने पहली बार जातियों की गणना धर्म और सामाजिक स्थिति के आधार पर की। 1916 में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में यह स्पष्ट किया गया कि शासकीय दस्तावेजों में ‘Depressed Classes’ शब्द ‘Untouchables’ के पर्याय के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा है, क्योंकि ‘Untouchable’ शब्द से ठेस पहुँचती है।

कागज पर दोनों शब्द एक कर दिए गए, पर जमीनी सच्चाई दो प्रकार की थी।

1. अस्पृश्य माना गया वर्ग
ये वे जातियां थीं जो हिन्दू वर्ण-व्यवस्था के भीतर होते हुए भी अस्पृश्यता का दंश झेलती थीं। इनके पारंपरिक कार्यों को अशुद्ध माना गया — जैसे मैला और नाली की सफाई करने वाले मेहतर, भंगी, डोम; चमड़े का कार्य करने वाले चमार, मोची; वस्त्र धोने वाले धोबी; कुछ क्षेत्रों में केशकर्तन करने वाले नाई; शव उठाने और मृत पशु उठाने वाले समुदाय। इन्हें छूना पाप माना जाता था। इन्हें गांव के बाहर बसाया जाता था, कुएं से जल लेने और मंदिर में प्रवेश से वंचित रखा जाता था।

2. दबाया गया वर्ग — Depressed Class
ये समुदाय अस्पृश्यता वाले पेशे नहीं करते थे, फिर भी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से जानबूझकर दबा दिए गए। इसके दो प्रधान कारण थे।

पहला, वैचारिक अस्वीकृति। इन्होंने ब्राह्मणवादी रीति-नीति और पुरोहितवाद को मानने से इनकार कर दिया। इनकी अपनी उपासना-पद्धति, अपने देवी-देवता और अपने धर्मगुरु थे — जैसे आदिवासी मूल के अनेक समुदाय, कबीरपंथी, सतनामी। ये वेद-पुराण और पुरोहित की सत्ता को अंतिम प्रमाण नहीं मानते थे।

दूसरा, अधिकार की मांग पर दमन। जब इन समुदायों ने भूमि, मजदूरी और बराबरी की बात उठाई, तो गांव की प्रभावशाली जातियों ने मिलकर इनका सामाजिक बहिष्कार किया, बेदखल किया, मजदूरी बंद की और अमानवीय व्यवहार किया।

इसीलिए इन्हें ‘Depressed’ कहा गया — अर्थात् सुनियोजित रूप से दबाया गया वर्ग।

बाद में 1930 में स्टार्टे समिति और साइमन कमीशन ने इस वर्गीकरण को और उलझा दिया। कभी आदिवासियों को, कभी पिछड़ी जातियों को भी इसी श्रेणी में गिना गया। अंततः 1931 की जनगणना के आधार पर भारत शासन अधिनियम 1935 बना, जो 1937 में लागू हुआ। उसी अधिनियम की Depressed Classes की सूची ही आगे चलकर अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) कहलाई।
छत्तीसगढ़ में सतनामी : दलन के विरुद्ध स्वाभिमान का इतिहास
इस प्रसंग में छत्तीसगढ़ के सतनामी समुदाय का उदाहरण अत्यंत महत्वपूर्ण है।

गुरु घासीदास जी ने घोर तपस्या से प्राप्त आत्मज्ञान के बाद गिरौदपुरी के वन्य ग्राम से सतनाम के सप्त सिद्धांतों का उपदेश दिया। यहीं छत्तीसगढ़ की धरती पर प्रथम जातिविहीन समुदाय ‘सतनाम पंथ’ की स्थापना हुई।

इतिहासकारों के अनुसार सतनामी मूलतः खेतिहर कृषक थे। उन्होंने जाति-व्यवस्था का त्याग कर हिन्दू व्यवस्था के भीतर ही एक नये पंथ का निर्माण किया। उनका उद्देश्य श्रमिकों और भूमिदासों की सामाजिक स्थिति सुधारना तथा उन्हें बहुदेववाद, पुरोहितवाद और अनेक कर्मकांडों से मुक्त कर एकेश्वरवादी ‘सतनाम’ की उपासना से जोड़ना था।

जिसने पूर्व मान्यताओं को नहीं माना, उसे दबाया गया, बहिष्कृत और तिरस्कृत किया गया। यह ‘Depressed’ की परिभाषा में पूर्णतः बैठता है।

यही कारण है कि जब सतनामियों को उनके मूल कृषि-कर्म के स्थान पर पौनी-पेशा कार्य करने वाला कहकर संबोधित किया जाता है, तो समुदाय प्रखर विरोध करता है। आजादी के बाद भी जब कभी गजेटियरों या दस्तावेजों में भ्रामक जानकारी के आधार पर नये रचनाकार या शोधार्थी ऐसा लिखते हैं, तो भावनाएं आहत होती हैं। उल्लेखनीय है कि 1926 में ही विवादित जाति-संज्ञा को शासकीय दस्तावेजों से विलोपित करने का आदेश तत्कालीन गवर्नर बटलर एवं विल्सन के हस्ताक्षर से जारी हो चुका था, जिसकी प्रतियां सर्वत्र उपलब्ध हैं और उसी आधार पर शासकीय कार्य संपादित होते आ रहे हैं।

इतिहास का एक मार्मिक मोड़ यह भी है कि सतनामी दबाने से दबे नहीं, बल्कि उनके प्रभाव में कुछ अस्पृश्य मानी जाने वाली जातियां आने लगीं। तब सभी हिन्दू जातियों ने मिलकर सतनामियों से ही छुआछूत का व्यवहार करना आरंभ कर दिया।
जनगणना की राजनीति और हिन्दू महासभा
ब्रिटिश काल में जब मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा का गठन हुआ और संख्या-बल के आधार पर बड़े नेतृत्व उभरने लगे, तब हिन्दू महासभा ने दबाए गए समुदायों को साथ लेने की रणनीति अपनाई। अंग्रेजों के समक्ष हिन्दुओं की जनसंख्या न घटे, इस उद्देश्य से सिख हिन्दू महासभा, सतनामी हिन्दू महासभा जैसे संगठन बनाए गए।

1932 के कम्युनल अवार्ड और उसके बाद हुए पूना समझौते (यरवदा पैक्ट) में Depressed Classes के लिए पृथक निर्वाचक मंडल का प्रश्न उठा था। उसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में यह संगठनात्मक प्रयास हुआ था।
निष्कर्ष
आज अनुसूचित जाति एक कानूनी-प्रशासनिक श्रेणी है, जिसका आधार 1935 का अधिनियम है। उसके अंतर्गत कल्याण और मुख्यधारा में लाने हेतु विशेष प्रावधान किए गए हैं। परंतु उसके भीतर दो ऐतिहासिक धाराएं स्पष्ट हैं — एक वह जिसे पेशे के कारण अशुद्ध ठहराकर अस्पृश्य माना गया, और दूसरी वह जिसे स्वतंत्र विचार और अधिकार की मांग के कारण जानबूझकर दबाया गया।

छत्तीसगढ़ के सतनामी दूसरी धारा के सबसे बड़े और जीवंत उदाहरण हैं। इस भेद को समझे बिना न तो इतिहास का सही मूल्यांकन संभव है, न ही सामाजिक न्याय की सार्थक बहस।

  डॉ.अनिल कुमार भतपहरी 
       9617777514
जुनवानी अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़