Friday, October 16, 2026

चूरी अम्मर रहें

चूरी अमर रहे

जुनवानी के उस पुराने आंगन में आज भी एक खूंटी गड़ी है।

मास्टर जी ने बताया था, इसी खूंटी पर कुटेला वाले तुर्का बाबा अपना कांवर टिकाते थे। एक तरफ टोकनी में लाल, हरी, पीली कांच की चूड़ियां, दूसरी तरफ मनिहारी का छोटा-मोटा सामान। गांव-गांव लगना, यही तो उनकी पौनी-पसारी थी।

बाबा आते तो आंगन भर जाता। आस-पास की सारी बहुएं-बेटियां घेरा बना लेतीं। बाबा किसी का नाम नहीं पूछते थे, बस कहते - "लाओ बिटिया, हाथ आगे करो।" 

चूड़ी पहनाते-पहनाते कलाई पकड़ते, और जब आखिरी चूड़ी कलाई पर खनकती तो औरतें झुक कर उनके पैर छू लेतीं। तुर्का बाबा हड़बड़ा जाते, और हाथ उठा कर एक ही आशीष देते - "चूरी अम्मर रहे बेटी।"

उस आशीष में सुहाग से ज्यादा कुछ और अमर रहता था।

तुर्का बाबा अब नहीं रहे। उनका बेटा रज्जू है। जिसे पलारी का हर लड़का रज्जू भाई कहता है। वही रज्जू जिसे मास्टर जी ने पढ़ाया था, जो उनके लड़कों के साथ एक ही बेंच पर बैठता था। नेक, सीधा, मेहनती। 

इस बार पलारी के बालसमुंद मेले में मास्टर जी की मुलाकात रज्जू से हुई तो वह उदास था। 

"का होगे रज्जू? टोकनी कहां है?"

"धर दिया गुरुजी," रज्जू ने टोपी ठीक करते हुए कहा, "अब कुटेला से जुनवानी तक कोई बुलाता नहीं। शहर से प्लास्टिक की चूड़ी आ गई, और... और अब लोग टोकनी देख के दरवाजा बंद कर लेते हैं। कहते हैं, ये मनिहारी लोग... पता नहीं।"

मास्टर जी कुछ नहीं बोले। विगत कुछ वर्षों से हवा ही ऐसी हो गई है। वही पलारी जो सद्भावना की नगरी थी, जहां 1996 में पेंड्रारोड में नासिर खान साहब इत्र वाले के घर में किरायेदार बनना गर्व की बात थी, जहां बलौदाबाजार में एक मुस्लिम मैडम के घर में बेटे जैसा रखा गया, जहां ईद पर न जा पाने पर दूसरे दिन सुबह-सुबह सेवईं की टिफिन खुद चल कर आती थी - वहीं अब लोग एक-दूसरे को विदेशी कहने लगे हैं।

रज्जू ने कहा, "सोचा था मोबाइल के कवर की दुकान लगा लूं। पर अब्बा की वो बात याद आती है - चूरी अम्मर रहे। तो लगता है, कुछ तो अमर रहना चाहिए।"

उसी मेले में पीछे, जैतखाम के पास एक बुढ़िया बैठी थी - सोनमती। सतनामी बस्ती की। उसके बेटे अंजोर को भी मास्टर जी ने पढ़ाया था। सोनमती के हाथों में चूड़ियां नहीं थीं। सफेद कलाई।

सोनमती ने रज्जू को देखा तो आवाज दी, "अरे रज्जू! इधर आ।"

रज्जू गया। सोनमती ने अपनी बहू को आगे किया।

"पहना दे बेटा। गुरु घासीदास जयंती है कल।"

रज्जू झिझका, "चाची, मेरे पास तो... पुरानी कांच वाली ही हैं। अब कोई लेता नहीं।"

"तो हम का कोई हैं रज्जू? हम सतनामी हैं। हमरे यहां मनखे-मनखे एक समान। हमरे लिए तो कांच ही सोना है। पहना।"

रज्जू ने कांपते हाथों से चूड़ियां पहनाईं। वही खनक। वही आंगन जैसा दृश्य। पहनाने के बाद सोनमती की बहू ने झुक कर रज्जू के पैर छुए।

रज्जू की आंखें भर आईं। उसने वही आशीष दोहराया जो उसने अपने अब्बा से सीखा था - "चूरी अम्मर रहे बेटी।"

पास ही खड़े बाबू खान मुस्कुरा रहे थे। वही बाबू खान, पलारी की शान, जो पत्रकार हैं, और जिन्होंने गुरु घासीदास का जीवन-चरित लिखा है। एक मुसलमान का गुरु घासीदास पर लिखना - इससे बड़ी एकता और क्या होगी?

बाबू खान ने मास्टर जी से कहा, "देख रहे हैं मास्टर जी? जब हिन्दू के बड़े घरों ने दरवाजे बंद किए, तो सतनाम के घरों ने टोकनी के लिए आंगन खोल दिया। क्योंकि सतनाम ने कभी जात नहीं पूछी। और तुर्का ने कभी धर्म नहीं पूछा। दोनों का काम एक ही है - मनखे को जोड़ना।"

मास्टर जी समझ गए।

ये चूड़ी-मनिहारी मुसलमान, ये छुटपुट व्यवसायी, ये कोई बाहर के नहीं हैं। ये इसी मिट्टी के पौनी हैं। जब बाजार ने उन्हें बेकार किया, जब नफरत ने उन्हें अंतर्मुखी किया, तो उन्हें सहारा उसी पंथ में मिला जो खुद हिंदुत्व के समांतर, जातिविहीन, कर्म-प्रिय समाज बन कर खड़ा हुआ था - सतनाम पंथ में।

रज्जू अब हर गुरु पूर्णिमा पर सतनामी बस्ती जाता है। टोकनी लेकर। अंजोर उसकी टोकनी उठाने में मदद करता है। और जब कोई नई बहू चूड़ी पहनती है, तो पूरे बस्ती में वही पुरानी आवाज गूंजती है -

"चूरी अम्मर रहे।"

उस दिन मास्टर जी को लगा, चूड़ी का अमर रहना मतलब कांच का न टूटना नहीं है। चूड़ी का अमर रहना मतलब है, वो हाथ अमर रहे जिसने पहनाई, वो पैर छूने का भाव अमर रहे, वो आंगन अमर रहे जहां हिन्दू, मुस्लिम और सतनामी एक ही टोकनी के चारों ओर बैठते थे।

और जब तक यह आशीष बचा है, पलारी सचमुच सद्भावना की नगरी बची है।

Wednesday, October 14, 2026

सनदई

सनदई 

अबूझमाड़ आज भी अबूझ ही है। यहाँ की राजधानी कही जाने वाली जिला मुख्यालय नारायणपुर से ईरकभट्टी होकर सोनपुर से आगे कुतुल गाँव, जहाँ धूप भी साल के पत्तों से पूछ कर नीचे उतरती है। आज़ादी के बाद अब तक शासन- प्रशासन के लिए चुनौती बनी "माड़"विकास रुपी सूर्योदय से वंचित हैं वहीं की है सनदई 
    माड़िया जनजाति की लड़की जिसने बड़ी ही जद्दोजहज से दो नाले और पहाड़ी रोज पार कर 12वीं प्रथम श्रेणी पास की थी - 62% मार्कशीट लेकर ।जब वह अपने बाबा सोमारू के पास गई, तो जवाब वही मिला जो प्रायः हर अबूझमाड़ की बेटी को मिलता है।

"बहुत पढ़ ली बेटी! अभी इमली का सीजन है, जंगल जाना है।" तेंदू पत्ता से कुछ पैसे जोड़ कर तेरी ब्याह रचाकर पितृ धर्म से उऋण हो,गंगा नहा लूँगा। 

माँ ने कहा - "कॉलेज अपने लोगों के लिए नहीं बना।" 

उस रात सनदई सोई नहीं। दीवार पर टंगी फटी नागरिक शास्त्र की किताब में एक लाइन चमक रही थी - 'शिक्षा हमारा अधिकार है।'

सुबह 4 बजे, जब गाँव सो रहा था, सनदई अपनी बड़े  पिता जी की बेटी और स्कूल में एक क्लास आगे  बुधनी के साथ निकल पड़ी । बुधनी की आठवीं के बाद शादी कर दी थी क्योंकि हाई स्कूल जंगल पहाड़ पार कर ईरकभट्टी जाना होता।  फिर उनके पिता दिन भर सल्फी मंद ताड़ी में चूर रहते थे , माई खेतों में और वनोपज एकत्र कर पास हाट में बेचकर आजीविका चलाती वह उसी में लगी रहती नहीं तो घर में चूल्हा नहीं जलता भला ऐसे में कौन फ़िक्र करता.? उनकी पढ़ाई रुक गई और फिर कुछ दिन बाद ताड़ी की चढ़ी हुई कर्ज़ उतारने ताड़ी वाले अधेड़ के साथ  ब्याह दिए । इस तरह उस भोली मुग्धा को पता ही नहीं कि उनकी जिंदगी कैसे जहन्नूम बन गई। वह जोर से हांफती हुई कही- " बहन मैं हूं तेरे साथ ,जल्दी चलों. हाथ पकड़ गंत्वय की ओर बढ़ चली।

 नारायणपुर उनके लिए नया नहीं हैं वह अपने मर्द के साथ कई बार आ चुकी थी साईकिल में सौदा करने। रस्ते में किस्सा सुनाती आश्रम, बंगला पारा कुम्हार कोस्टा पारा और मावली माता मंदिर जिसके नाम पर हफ्ता भर मेला भरता हैं। ऊपर पहाड़ी पर बिराजे दंतेश्वरी और वहां की बड़े बाँध के पास इतवारी बाज़ार की जो अडताफ़ में प्रसिद्ध हैं। सौदागर दूर -दूर से आते और वनोपज के बदले घरेलू उपयोग की वस्तुएं बेचते। उनकी बातों में खोई सनदई उत्साह से दौड़ी चली जा रही थी।
  कई किलोमीटर का जंगल, नदी, पगडंडी उखड़ी सड़के । नंगे पाँव, छालों भरे पैर। झोले में दो जोड़ी कपड़े, 12वीं की अंक सूची,जाति- निवास और आधार जो उनकी अपनी अदद पहचान हैं एक साड़ी दुकान की पॉली थीन पैकेट में डाल कर  जी जी अंतर रखी पैदल ही सड़क पर चली जा रही थी... छीन सल्फी का पेड़ और पंखी की कलरव के बीच घरघराती एक मेटाडोर  पास रुकी - जाना  कहां हैं?
नारायणपुर 
बैठो ,दाेनों का 100 रुपए लगेंगे। बुधनी उड़द दाल और घर के मुर्गे -मुर्गी बेचकर 500 की नोट यत्नपूर्वक बचा कर रखी थी ।वक्त जरूरत पर काम आए उसी के भरोसे  वह सनदई को साथ ले कर चल पड़ी थी। 

नारायणपुर पहुँच कर पहला काम मूल अंक सूची आदि  फोटो कॉपी कराई और फोटो भी खिंचाई। पता चला कि वहीं कम्पूटर में आन लाईन  प्रवेश हेतु फॉर्म रजिस्ट्रेशन कराना हैं और उसके लिए करीब 1500 रुपए चाहिए।  अब  विकट संकट कि अजनबी शहर में किससे और कैसे मांगे! असमंजस सी खड़ी रहीं तभी फोटो धूल कर आई देखा कि कलर फ़ोटो में नाक की फुल्ली सुनहरी आभा लिए चमक रही थीं। बुधनी कही -"कित्ती सुंदर फब रही हो गिया! " और उसके कंधे को दबाई..वह बहन ही नहीं सहेली जो थी।
       सनदई हाथ से फुल्ली को छूकर देखी और अपनी नानी की याद न में पल भर खो गई... जब वह सज्ञान हुई तभी उसे वह खुशी खुशी तोहफा दी क्योंकि रजस्वला के समय उत्सव मनाने की प्रथा थी। 
  थोड़ी देर असमंजस सी शून्य में रही.. बुधनी कही क्या हुआ? उसने कही - दीदी मुझे इसे बेचकर पढ़ना हैं और नानी का मान रखना हैं वह चाहती थी कि मैं पढू और मास्टरनी डॉक्टरनी बनू ।उसने बिना पल गंवाए कही तू तो जानती होगी सुनार की दुकान कहां हैं? वे दोनों चल पड़ी 

"इसे बेचना है।"

 एक ग्राम की थी तो 7000 रुपये मिले। आँख में आँसू थे, पर हाथ नहीं कांपे। उसने गहना नहीं बेचीं बल्कि अपनी  खुशी खरीदी थी। 

वीरांगना रमोतीन महिला महाविद्यालय, नारायणपुर में एडमिशन की आखिरी तारीख थी। लाइन बहुत लंबी। काउंटर पर बाबू ने फॉर्म देखा - दो टके कहे क्योंकि एक सा ही जवाब बिना प्रश्न पूछे उन्हें कहना हैं "आदिवासी छात्रावास फुल है, जनरल हॉस्टल में जगह नहीं। अभिभावक को लाओ।"

ऐसे हताश सनदई वहीं जमीन पर बैठ गई। बुधनी अन्य अभिभावक के साथ महाविद्यालय के प्रांगण में लगे काजू पेड़ के छाँव में बैठी हुई थी।तभी हिंदी विभाग के प्रो. भट्ट सर उधर से गुजरे... उन्होंने देखा - एक लड़की, फटे चप्पल, पैरों में छाले, पर गोद में मार्कशीट को ऐसे पकड़े है जैसे कोई ग्रंथ हो।

"कहाँ से आई हो बेटा?"

"कुतुल से सर "
"अच्छा "

"किसके साथ?"

"अकेली, सहेली के साथ।"

सनदई ने सब बता दिया - माता-पिता का मना करना, विद्रोह कर आना बड़ी दीदी का साथ इतनी दूर  आना, नाक की फुल्ली बेचना इत्यादि।

प्रो. भट्ट सर हिंदी पढ़ाते थे, पर उन्होंने सनदई के भीतर की कविता पढ़ ली। वे कुछ बोले नहीं, सीधे उसका हाथ पकड़ कर प्राचार्य कक्ष में ले गए।

"सर, ये बच्ची नहीं, अबूझमाड़ का  सवाल है ।इसका जवाब हमें देना है।"
प्राचार्य भी दयालू थे भले वह प्रशासनिक कठोरता का आवरण ओढ़े होते थे पर है तो इंसान ही।
प्रो. भट्ट सर के सहयोग से ही उसका प्रवेश हुआ। उन्होंने अपने पास के टेबल में फॉर्म की अधूरी जानकारियां  भरी, विषय दिलाए, और खुद अपने हस्ताक्षर से उसकी गारंटी ली।

फिर वे उसे महिला छात्रावास ले गए। अधीक्षिका ने कहा - "भट्ट सर, एक भी कमरा खाली नहीं।"

भट्ट सर ने कहा - "मैडम, एक बेटी जंगल से अपनी जड़ उखाड़ कर आई है ताकि वह पेड़ बन सके। इसे बरामदे में भी जगह दे दीजिए, ये खुद अपनी जगह बना लेगी।"

उनके मार्गदर्शन और जिद के कारण ही उस शाम सनदई को कमरा नंबर 7 में एक बेड मिला। साथ ही एक नियम छात्रावास में बनाई गई कि बिना हॉस्टल में सलेक्शन के जरूरत मंद छात्राओं को एक हाल में रखें और उनसे भोजन आदि बनाने में पारिश्रमिक ले या फिर स्कूल छात्रवृत्ति से किस्त अनुसार न्यूनतम शुल्क ले। 
  

आज सनदई बी.ए. प्रथम वर्ष में है। प्रो. भट्ट सर की कक्षा में वह सबसे आगे बैठती है। उसकी नाक आज सूनी है, पर उसकी कॉपी शब्दों से भरी है।

महाविद्यालय में दीक्षारंभ के दिन प्रो. भट्ट सर ने शिक्षा के महत्व को समझते हुए व्याख्यान देते  अचानक सनदई की ओर देखते हुए कहे  - तुमने अपनी फुल्ली बेची नहीं, बोई है। एक दिन पूरा माड़ तुम्हारी नाक की उस फुल्ली जैसा चमकेगा।"
     हाल तालियों से गूँज उठी ... आवाक सनदई  हतप्रभ सी हुई !ओ समझ नहीं पा रही थी क्या और कैसी प्रतिक्रिया दे कि सहज होती धीरे से मुस्कुरा दी और विनीत भाव से सिर झुका ली। 
     अबूझमाड़ की सनदई ने बता दिया कि उनकी  विद्रोह अंधेरे के खिलाफ हैं और रौशनी के लिए पढ़ रही हैं। दोपहर हो गए थे उन्हें पता हैं कि साल वन से सूर्य किरण छनकर पगडंडी में पड़ रही होगीऔर पास ही लता लहलहाती हुई साल पेड़ में चढ़ रही हैं। 

       डॉ.अनिल कुमार भतपहरी
           9617777514  
           नारायणपुर बस्तर 
anilbhatpahari@gmail.com

Thursday, October 8, 2026

संस्कृत कृत्रिम और शास्त्र भाषा हैं

संस्कृत कृत्रिम एवं शास्त्र भाषा है - एक ऐतिहासिक पुनर्पाठ
1. नाम में ही उत्पत्ति छिपी है

सम् + कृत = अच्छी तरह से गढ़ा हुआ, बनाया हुआ।

दुनिया की कोई भी प्राकृतिक भाषा अपने को "बनाई हुई" नहीं कहती। प्राकृत का अर्थ है जो प्रकृति से जन्मा है, लोगों के मुंह में है। संस्कृत का अर्थ है जिसका संस्कार किया गया है। संस्कार के लिए कच्चा माल चाहिए, और वह कच्चा माल प्राकृत और पाली थी। जैसे कच्चे आम से अचार बनता है, वैसे जनभाषा से प्रयोगशाला में संस्कृत बनी। व्याकरण से ही स्पष्ट है - प्राकृत प्रकृति है, संस्कृत उसकी परिष्कृति है।
अतः संस्कृत एक कृत्रिम राजभाषा हैं राजा, सामंत पुरोहित प्रभुवर्ग या देवगण कहलाते थे और गुरुकुल मे संस्कृत पढ़ा लिखा होने के कारण संस्कृत में वार्तालाप करते थे इसलिए संस्कृत को देववाणी एवं पाली प्राकृत इत्यादि को लोकवाणी कहें गए.

2. शिलालेखीय साक्ष्य: पत्थर झूठ नहीं बोलते

यदि संस्कृत सबसे प्राचीन होती, तो भारत के सबसे प्राचीन अभिलेख संस्कृत में होते। तथ्य उल्टा है।

क. मौर्य काल, 260 ईसा पूर्व: भारत के सबसे प्राचीन पठनीय शिलालेख अशोक के हैं। पूरे भारत में उनकी भाषा प्राकृत, पाली और सीमांत पर ग्रीक-अरामाइक है। एक भी पंक्ति संस्कृत में नहीं। अशोक ने प्रजा की भाषा चुनी।

ख. 400 साल का शून्य: अशोक के बाद शुंग, सातवाहन, इंडो-ग्रीक राजाओं के सैकड़ों शिलालेख और सिक्के मिलते हैं। भाषा वही - प्राकृत।

ग. पहला संस्कृत शिलालेख, 150 ईस्वी: शक राजा रुद्रदामन का जूनागढ़ शिलालेख संस्कृत का पहला लंबा काव्यात्मक शिलालेख है। अशोक से 400 साल बाद।

यह क्रम सिद्ध करता है - जो भाषा जनता की थी, वही पहले पत्थरों पर आई। जो दरबार में गढ़ी गई, वह बाद में आई।

3. भाषावैज्ञानिक साक्ष्य: सरल से जटिल की ओर

भाषा सरल से जटिल बनती है।

पाली-प्राकृत में - धम्म, कम्म, सच्च, मुह, पाणी - छोटे, बोलने में आसान शब्द।
संस्कृत में - धर्म, कर्म, सत्य, मुख, पाणि - उन्हीं को भारी, व्याकरण-बद्ध बनाया गया।

12-15 अक्षरों के लंबे समास, इको यणचि, अतो लोप: जैसे गणित के फॉर्मूले - यह जीवित जनभाषा की विशेषता नहीं, कंठस्थ करने की तकनीक है। रोज की बोली में कोई 15 अक्षर का शब्द नहीं बोलता।

पाणिनि ने चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में अष्टाध्यायी के लगभग 4000 सूत्रों में पहले से चली आ रही लोकभाषा को बाँधा, छाँटा और अपरिवर्तनीय बनाया। वे सृष्टिकर्ता नहीं, संपादक थे।

4. भाषा पर एकाधिकार कैसे बना?

जब किसी भाषा को देववाणी, अनादि, स्वर्ग-बैकुंठ की भाषा घोषित कर दिया जाता है, तो साधारण मनुष्य उसका अधिकारी नहीं रह जाता।

प्राकृत-पाली बौद्धों, जैनों, व्यापारियों, किसानों की भाषा थी - जातक, बुद्ध-उपदेश, लोकगाथाएं सब इसी में।

गुप्त काल में राजतंत्र ने जब इसे राजकीय संरक्षण और राजभाषा बनाया, तब भूमिदान-पत्र, प्रशस्ति, धर्मशास्त्र संस्कृत में लिखे जाने लगे। और फिर प्रचारित किया गया कि प्राकृत तो संस्कृत का अपभ्रंश है। यह उल्टा पाठ था। सच यह है कि मानक भाषा बोली का परिष्कार होती है, जैसे मानक हिंदी खड़ी बोली का परिष्कार है, अपभ्रंश नहीं।

इसी दैवीकरण से ज्ञान की भाषा वर्चस्व की भाषा बन गई और उस पर शैक्षणिक-धार्मिक एकाधिकार स्थापित हो गया।

निष्कर्ष

संस्कृत प्राचीन है, पर आदि नहीं है न ही इनसे भारतीय भाषाएं जन्मी हैं बल्कि लोक भाषाएँ से यह स्वयं विकसित हुई हैं। वह एक लंबी बोली-परंपरा का, बौद्धिक चेतना और राज्य-व्यवस्था द्वारा किया गया अंतिम, सबसे परिष्कृत और कृत्रिम संस्करण है। वह आकाश से नहीं उतरी, धरती पर ही, जनता की बोली से, व्याकरण की प्रयोगशाला में गढ़ी गई है।

डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
#anilbhattcg #सतसंधान

Wednesday, October 7, 2026

गुरु घासीदास पर लेखन।

गुरु घासीदास पर रसेल अंग्रेज सह लेखक हीरालाल  राजस्व अधिकारी पहले भारतीय थे। इनके रिपोर्ट वाहियात और सांप्रदायिक हैं।
   प्रायः हिंदू  लेखक द्वेषपूर्ण और निंदनीय लेखन ही करते रहें हैं।
प सुंदरलाल शर्मा जी प मिलाऊ दास कोसरिया के साथी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे के पहल से सर्वप्रथम सतनामी पुराण 1907 में लिखे हैं ।ऐसा जिक्र मिलता तो हैं पर आज पर्यंत देखने नहीं मिला और न ही उनकी कोई पंक्तियां उपलब्ध हुई हैं।
  फिर मनोहर दास नृसिंह के बाद अनवरत लेखन का सिलसिला चला और महज 50-55 वर्षों में छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक लेखन सतनाम पंथ और गुरुघासीदास पर हुआ।
उनके उपदेश अमृतवाणी जगजाहिर हुआ तथा भारतीय बौद्धिक जगत ऐसे मनीषी से परिचीत हुआ जो बुद्ध के बाद सबसे अधिक प्रखर और परम सत्य के उद्घोषक और प्रवर्तक हैं। उनके वाणी में कोई भ्रम नहीं कोई ऊहापोह नहीं और न ही परिकल्पना हैं बस सत्य का सीधा साक्षात्कार हैं।

Thursday, October 1, 2026

महानदी

प्रसंग महानदी जल विवाद 

"जाके पाँव न फटे बिवाई ओ क्या जाने पीर पराई " 

महानदी छत्तीसगढ़ और ओडिशा की जीवनरेखा है।
इसके तट पर बसे प्राचीन दक्षिण कोसल की राजधानी सिरपुर के ठीक सामने चिखली-जुनवानी मेरा गाँव है। हमारी घाट में भव्यतम लक्ष्मण देवालय के दर्शन होते हैं तो बाबा गंधेश्वरनाथ के शंख-घंटे की आवाज़ सुनते हुए हम बड़े हुए हैं। अपने खेत में बैठकर नदी को देखना - यह सिर्फ भूगोल नहीं है, यह हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है। नाव से नदी पार करते जीवन बीत रहा हैं। दो तीन बार तो नाव में डूबते डूबते बचे हैं। उलट धार एवं बाढ़ से अनेक जहरीले सांप घरों में घुस जाते हैं। मेरे बड़े पिताजी के सुपुत्र होनहार चंद्र कुमार सर्पदंश का शिकार हो गए। कई बार फसल डूब गए मुआवजा भी बड़ी मुश्किल से मिलते हैं इस तरह के अनेक दुर्घटनाओं से बचकर यहाँ तक आए हैं।
बाल्यावस्था में हमलोग दोनो भाई महानदी में बह गए थे। सुनील एक पेड़ की टहनी पकड़ लिए और इस तरह बचे। वे आगे चलकर पानी पंचायत अध्यक्ष, सरपंच और जिला पंचायत अध्यक्ष  बना। दूरद्रष्टा पिताश्री की चिंतन,भाई बंधु के अदम्य प्रयास , उत्साह से ही क्षेत्र के जनप्रतिनिधि गणों खासकर विधायक चाचा श्री रामलाल भारद्वाज के सार्थक पहल द्वारा जुनवानी से आगे समोदा ग्राम में महानदी में "समोदा डायवर्शन"  बनाने जैसी सोच विकसित हुई।

महानदी तटवर्ती जुनवानी-चिखली घाट के कृषक होने का सुख और दुःख हम एक साथ भोगते आ रहे हैं।
भारी बारिश में बाढ़ का तांडव और पानी नहीं गिरा तो गाँवों के जलस्रोतों को खींच लेना - यह दारुण दुःख था। जोगी जी की नीति, जोगी-डबरी योजना से प्रदेश में हैंडपंप उत्खनन हेतु बोर मशीन आई और तब कहीं जाकर राहत मिली।

इस तरह सुख यह है कि नदी पास है तो जीवन उत्सव है।
दुःख यह कि गर्मी में जब महानदी की जलधारा कम होती है तो वह आसपास के कुओं, तालाबों और हैंडपंपों का पानी भी खींच लेती है। नदी किनारे होकर भी प्यासे रह जाना - जीवन बेहद कष्टमय है। इससे बड़ा विरोधाभास क्या होगा?

मध्य प्रदेश में रहने और इस तरह की राजनैतिक चेतना  का अभाव या उपेक्षा का दंश प्रदेश वासी तटवर्ती लोग झेलते रहे हैं। संभवतः इसीलिए महानदी के प्रति जनमानस की आस्था गंगा-नर्मदा जैसी पनप नहीं पाई, जबकि यहाँ का जनजीवन बेहद सरल और आस्थावान है। परंतु नदी का महिमा-मंडन कर उससे लाभ लेना या पर्यटन आदि के लिए व्यावसायिक उपयोग करना यहाँ की सरलतम संस्कृति का अंग नहीं रहा। इसलिए कभी संरक्षण, संवर्धन एवं सौंदर्य के लिए स्थानीय लोगों में विचार भी नहीं पनप सका।

परंतु छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पड़े अकाल और उनसे निपटने के लिए कमर कसे प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी जी को हमारे पिताजी स्वर्गीय शिक्षक सुकाल दास भतपहरी, पानी पंचायत अध्यक्ष भाई सुनील एवं पिताजी के सहपाठी यशस्वी विधायक रामलाल भारद्वाज (भतपहरी) के माध्यम से महानदी के जल को डायवर्ट कर क्षेत्र के कृषकों के लिए योजना बनाने की सलाह दी गई। इसमें किंचित हमारा भी सोच और सहयोग रहा है। बाद में तत्कालीन पलारी विधायक शिव डहरिया जी का प्रयास रंग लाया फलस्वरूप समोदा डायवर्शन जैसी परियोजना ने आकार लिया और हमारे पलारी कॉलेज के प्रांगण में हुई विशाल जनसभा में माननीय अजीत जोगी जी ने इसकी घोषणा की। तब हमारा मन उल्लास और हर्ष से भर गया कि वर्षों का सपना साकार हो उठेगा। उस कार्यक्रम का मैं चश्मदीद गवाह रहा हूँ। 

हम लोगों की चाह केवल इतनी थी -
1. स्टॉप डैम/एनीकट बने ताकि दोनों ओर फैले रिश्तेदारों का सुगमतापूर्वक आवागमन हो सके। कोई बड़ा बाँध नहीं। बस इतना कि थोड़ा पानी रुके।
2. उद्देश्य पानी रोकना नहीं, निस्तार है - ताकि दोनों तटों के बीच आवागमन बना रहे, जल-भराव से रिचार्ज हो, कुआँ-तालाब-हैंडपंप जिंदा रहें।
3. रोज़ी-रोज़गार से जुड़े - मत्स्याखेट हो, कछार-बाड़ी में फसलें लहलहाएँ, जीवन खुशहाल हो।

परंतु अन्यान्य कारणों या जल-भराव की स्थिति के चलते इसे आरंग के पास निसदा डायवर्शन के रूप में यशस्वी डॉ रमन सिंह के कार्यकाल में निर्मित किया गया।

    समोदा में एनीकेट बना और उसे रायखेड़ा खरोरा के पॉवर प्लांट को पानी दिया जाने लगा।जो नहीं होना था, वह हो गया और संभवतः पानी के इस तरह व्यावसायिक उपयोग के कारण ओडिशा सरकार हस्तक्षेप कर रही है यह विचारणीय हैं। यही चंद्रपुर के समीप एनीकट का हुआ, जिसे निजी कंपनी को पानी सप्लाई की जा रही हैं। तब से ओडिशा जैसे मित्र और सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक रूप से एक रहे प्रदेश के साथ अनावश्यक तनाव निर्मित होने लगा।

तो क्या हम प्रदेशवासी, जिनकी सभी नदियों को अपने 280 किलोमीटर के बहाव क्षेत्र में निचोड़ कर ओडिशा ले जाती है, किंकर्तव्यविमूढ़ से देखते रहें और दुःख भोगते रहें? सवाल यह है।

4. हम प्रदेशवासी और सरकार कतई ओडिशा विरोधी नहीं हैं - महानदी 850 किलोमीटर लंबी है, जिसमें से 280 किलोमीटर ही छत्तीसगढ़ में बहती है। अरपा, पैरी, सोंढूर, शिवनाथ, हसदेव - छत्तीसगढ़ की लगभग सारी नदियों का पानी इसी 280 किलोमीटर में आकर महानदी में मिलता है और सीधे ओडिशा चला जाता है। सवाल वाजिब है कि क्या तटवर्ती छत्तीसगढ़ ही प्यासा रहे?

5. निस्तार प्राकृतिक हक है - जो पानी आपके क्षेत्र की बारिश और आपके नालों ने नदी में डाला है, उस पर तो स्थानीय लोगों का पहला अधिकार बनता है।

आपने अपने पिताजी के समय के नाला बाँधने वाले अभियानों का जिक्र किया - सामुदायिक सिंचाई, उद्वहन, बंधनी बाँधकर निस्तारी करना। वही सोच आज बड़े पैमाने पर स्टॉप डैम के रूप में चाहिए। पहले बारिश पर्याप्त थी, जागरूकता कम थी, पर अब बारिश घट रही है और सारा जल बहकर चला जा रहा है।

नदी वरदान बने, अभिशाप नहीं।

इसलिए प्रत्येक 10-15 किलोमीटर में डायवर्शन एनीकट, स्टॉप डैम होने से बाढ़-नियंत्रण, आवागमन, जलस्रोत, कछार-बाड़ी का पुनर्जीवन एवं पर्यटन विकास होगा और तटवर्ती लोगों को स्वरोजगार मिलेगा, पलायन थमेगा। अन्यथा ट्रांस-महानदी क्षेत्र पलायन के लिए छत्तीसगढ़ में अभिशप्त है। उसके दिन फिरेंगे।

गुरु घासीदास, वीर नारायण सिंह की यह धरती अपना प्राचीन वैभव प्राप्त करेगी, जहाँ चंद्रपुर, शिवरीनारायण, गिरौदपुरी, सोनाखान, सिरपुर, राजिम आबाद रहेंगे।

गर्मी में सूखी रेत देखकर जो अभिशाप जैसा लगता है, वही नदी अगर साल भर थोड़ी-थोड़ी भरी रहे तो वही वरदान बन जाएगी।

सरकार के लिए यह नीति का विषय है - छत्तीसगढ़ सरकार और ओडिशा सरकार दोनों को इस दृष्टि से सोचना होगा। पानी को रोकना नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व में उपयोग करना। स्वस्थ वातावरण में महानदी जल-विवाद का यही समाधान है।

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी 
    जुनवानी चिखली, रायपुर छ ग 

जय महानदी, जय छत्तीसगढ़।

Saturday, September 26, 2026

राजभाषा मास पर

राजभाषा मास के अवसर में
पिरथी म पहली मनखे आइन तेकर पाछू उनकर बोली/भाखा फूटिन अउ मुहावांही होय लगिन। लोगन मन भोजन, रोजी-रोजगार सेती बगरिन अउ एक दूसर संग मिंझरिन। धीरे-धीरे कुछेक लोगन धनवंता/गुनवंता होगिन राज-पाट मठ मंदिर आश्रम बनाइन इहा के भाखा बोली मन प्रसंस्करण (मानक पन) होय लगिन लिपि के बने ले यही हर राज काज अउ शास्त्र आदि के भाखा बनिस।

माने कि लोक भाखा आदिम काल से उद्धरित हवे उही हर छन के प्रसंस्करण होके लिपिबद्ध होय लगिस पाली प्राकृत संस्कृत फारसी लेटिन इंग्लिश चाइनीज अउ अन्य शास्त्रीय (क्लासिक) भाखा बनिस। ये मन उद्भव ले अवतरे के बाद पछा भागे बर लगे अइसें निथे भलुक धीरे-धीरे इनकर बढ़ोतरी होय लगिन ते पाय के गुनवंता मन कहिथे —

'भाखा के क्रमिक विकास ल समझे अउ समझाय ल परथे कोन्हो भी रुढ़-मुढ़ मान्यता ल माने से बूता न इ बनय।'

सिरतों कहे तो कोनो भी भाखा हर अलौकिक या दैवीय नोहय। ओहर इही लौकिक अउ जमौनी जिनिस होथे। जेन लोक म नान्ही नायक होथे ओकर चरित प्रेरक हो जथे ओकर गुनगान होय लगथे या जो समुदाय शासक वर्ग होथे ओकर आचार विचार बनथे लिखित म आथे ओहर समरिद्ध हो जथे। तहां ले ओकर महिमामय बरनन करे के रिवाज तको बन जाथे।

भाखा के प्रसंस्करण अउ समरिद्धी हर सतत चलैया प्रक्रिया आय। हमर हिन्दी हर दिल्ली अउ मेरठ के बीच राज काज में लगे मनसे मन के स्थानीय बोली अउ शासक वर्ग के भाखा के मिंझरे हुए सरूप आय। एकर सरूप हमन ल अमीर खुसरो ले ले के मध्यकालीन संत कवि परंपरा में दिखथे। फेर सच कहे त हिन्दी हर 1857 के क्रांति के बाद संपर्क भाखा के रूप म स्थानीय शासक अउ प्रभावशाली लोगन के बीच बौराय से आइस।

भारतेन्दु से लेकर प्रेमचंद तक उत्तरोत्तर विकास होय लगिन हमर छायावाद से लेकर प्रयोगवाद तक के नामी कवि लेखक मन बड़ सुघ्घर सरूप दिस। संगे सजग अनेक पत्र-पत्रिका अउ आकाशवाणी फिल्म मन हिन्दी सात समुन्दर पार पहुंचाइन। आज हिन्दी सर्वाधिक बोले जाने वाली भाखा के रूप म प्रतिष्ठित होय के अवस्था म हवय। फेर येहर अब भी राष्ट्र भाखा के रूप म ग्राह्य न इ होय पाय हे ए हर बड़ दुःख के बात आय।

असल में हर राज्य के भाखा ल राजभाखा अउ बहुसंख्यक समुदाय अउ स्वतंत्रता संग्राम के समय संपर्क के भाखा हिन्दी ल राष्ट्रीय भाखा घोषित करे के गंभीर प्रयास होना चाही। अंग्रेजी वैश्विक अउ आधुनिक ज्ञान विज्ञान के भाखा के रूप म प्रतिष्ठित हवय त ओला उही सरूप म अंगीकार करे जा सकत हे भलुक कर चुके हन।

अब पाठ्यक्रम में राष्ट्रीय स्तर म तीन भाखाई सिद्धान्त हवय त एमा राष्ट्रीय भाखा हिन्दी, राजभाखा (जैसे पंजाबी तमिल मलयालम मराठी उड़िया छत्तीसगढ़ी असमिया हर राज के भाखा) अउ अंतरराष्ट्रीय संपर्क भाखा अंग्रेजी म बनाय जाय। प्राचीन क्लासिक भाखा पाली प्राकृत संस्कृत अरबी फारसी आदि ल ऐच्छिक रखना चाहिए।

ऐसे करे से स्थानीय राजकीय भाखा मन के साथ संस्कृति हर तको जतनाही अउ प्रतिभा के समुचित विकास होही। नहि ते मातृभाखा (राजभाखा) ल छोड़ अन्य भाखा म नान्हे लइका मन शिक्षा दे जाही त अपन सीखे समझे उमर 14-15 साल तक ओहर भाखा के चक्कर म फदगे पड़े रही। स्कूल अउ घर के भाखा के चक्रव्यूह म फंस के रहि जाही।

छत्तीसगढ़ के संदर्भ म देखे जाय अबतक इहा ने छात्र मन न हिन्दी के होय सकय न संस्कृत के न अंग्रेजी के। तेन पाय के अखिल भारतीय स्तर म प्रतिभा के कमती केवल भाखाई रूप म ही झलकथे अउ आत्मविश्वास के कमती के सेती शासन प्रशासन म पिछवाय सरीख नजर आथे।

सच तो ए हवय कि — 'जोन समुदाय सचेत रहिथे ओकर सम्हला अउ जनता जथे अउ जोन समुदाय अचेत रथे ओकर भाखा बोली मन नंदावत चले जाथे।'

भाखा-बोली से संस्कृति तको प्रभावित होथे। वर्तमान म छत्तीसगढ़ी संस्कृति शहरी अउ मध्यमवर्गीय परिवार से विदाई होय के कगार म खड़े हवय। एला बचाय खातिर हमर शासन-प्रशासन ल पोठलग्गा अउ ठोसलग्गा बूता करेच ल परही।

डॉ. अनिल भतपहरी, सत श्री ऊँजियार सदन अमलीडीह, रायपुर

राजभाषा मास पर

राजभाषा मास के अवसर में

पिरथी म पहली मनखे आइन तेकर पाछू उनकर बोली/भाखा फूटिन अउ मुहावांही होय लगिन। लोगन मन भोजन, रोजी-रोजगार सेती बगरिन अउ एक दूसर संग मिंझरिन। धीरे-धीरे कुछेक लोगन धनवंता/गुनवंता होगिन राज-पाट मठ मंदिर आश्रम बनाइन इहा के भाखा बोली मन प्रसंस्करण (मानक पन) होय लगिन लिपि के बने ले यही हर राज काज अउ शास्त्र आदि के भाखा बनिस।

माने कि लोक भाखा आदिम काल से उद्धरित हवे उही हर छन के प्रसंस्करण होके लिपिबद्ध होय लगिस पाली प्राकृत संस्कृत फारसी लेटिन इंग्लिश चाइनीज अउ अन्य शास्त्रीय (क्लासिक) भाखा बनिस। ये मन उद्भव ले अवतरे के बाद पछा भागे बर लगे अइसें निथे भलुक धीरे-धीरे इनकर बढ़ोतरी होय लगिन ते पाय के गुनवंता मन कहिथे —

'भाखा के क्रमिक विकास ल समझे अउ समझाय ल परथे कोन्हो भी रुढ़-मुढ़ मान्यता ल माने से बूता न इ बनय।'

सिरतों कहे तो कोनो भी भाखा हर अलौकिक या दैवीय नोहय। ओहर इही लौकिक अउ जमौनी जिनिस होथे। जेन लोक म नान्ही नायक होथे ओकर चरित प्रेरक हो जथे ओकर गुनगान होय लगथे या जो समुदाय शासक वर्ग होथे ओकर आचार विचार बनथे लिखित म आथे ओहर समरिद्ध हो जथे। तहां ले ओकर महिमामय बरनन करे के रिवाज तको बन जाथे।

भाखा के प्रसंस्करण अउ समरिद्धी हर सतत चलैया प्रक्रिया आय। हमर हिन्दी हर दिल्ली अउ मेरठ के बीच राज काज में लगे मनसे मन के स्थानीय बोली अउ शासक वर्ग के भाखा के मिंझरे हुए सरूप आय। एकर सरूप हमन ल अमीर खुसरो ले ले के मध्यकालीन संत कवि परंपरा में दिखथे। फेर सच कहे त हिन्दी हर 1857 के क्रांति के बाद संपर्क भाखा के रूप म स्थानीय शासक अउ प्रभावशाली लोगन के बीच बौराय से आइस।

भारतेन्दु से लेकर प्रेमचंद तक उत्तरोत्तर विकास होय लगिन हमर छायावाद से लेकर प्रयोगवाद तक के नामी कवि लेखक मन बड़ सुघ्घर सरूप दिस। संगे सजग अनेक पत्र-पत्रिका अउ आकाशवाणी फिल्म मन हिन्दी सात समुन्दर पार पहुंचाइन। आज हिन्दी सर्वाधिक बोले जाने वाली भाखा के रूप म प्रतिष्ठित होय के अवस्था म हवय। फेर येहर अब भी राष्ट्र भाखा के रूप म ग्राह्य न इ होय पाय हे ए हर बड़ दुःख के बात आय।

असल में हर राज्य के भाखा ल राजभाखा अउ बहुसंख्यक समुदाय अउ स्वतंत्रता संग्राम के समय संपर्क के भाखा हिन्दी ल राष्ट्रीय भाखा घोषित करे के गंभीर प्रयास होना चाही। अंग्रेजी वैश्विक अउ आधुनिक ज्ञान विज्ञान के भाखा के रूप म प्रतिष्ठित हवय त ओला उही सरूप म अंगीकार करे जा सकत हे भलुक कर चुके हन।

अब पाठ्यक्रम में राष्ट्रीय स्तर म तीन भाखाई सिद्धान्त हवय त एमा राष्ट्रीय भाखा हिन्दी, राजभाखा (जैसे पंजाबी तमिल मलयालम मराठी उड़िया छत्तीसगढ़ी असमिया हर राज के भाखा) अउ अंतरराष्ट्रीय संपर्क भाखा अंग्रेजी म बनाय जाय। प्राचीन क्लासिक भाखा पाली प्राकृत संस्कृत अरबी फारसी आदि ल ऐच्छिक रखना चाहिए।

ऐसे करे से स्थानीय राजकीय भाखा मन के साथ संस्कृति हर तको जतनाही अउ प्रतिभा के समुचित विकास होही। नहि ते मातृभाखा (राजभाखा) ल छोड़ अन्य भाखा म नान्हे लइका मन शिक्षा दे जाही त अपन सीखे समझे उमर 14-15 साल तक ओहर भाखा के चक्कर म फदगे पड़े रही। स्कूल अउ घर के भाखा के चक्रव्यूह म फंस के रहि जाही।

छत्तीसगढ़ के संदर्भ म देखे जाय अबतक इहा ने छात्र मन न हिन्दी के होय सकय न संस्कृत के न अंग्रेजी के। तेन पाय के अखिल भारतीय स्तर म प्रतिभा के कमती केवल भाखाई रूप म ही झलकथे अउ आत्मविश्वास के कमती के सेती शासन प्रशासन म पिछवाय सरीख नजर आथे।

सच तो ए हवय कि — 'जोन समुदाय सचेत रहिथे ओकर सम्हला अउ जनता जथे अउ जोन समुदाय अचेत रथे ओकर भाखा बोली मन नंदावत चले जाथे।'

भाखा-बोली से संस्कृति तको प्रभावित होथे। वर्तमान म छत्तीसगढ़ी संस्कृति शहरी अउ मध्यमवर्गीय परिवार से विदाई होय के कगार म खड़े हवय। एला बचाय खातिर हमर शासन-प्रशासन ल पोठलग्गा अउ ठोसलग्गा बूता करेच ल परही।

डॉ. अनिल भतपहरी, सत श्री ऊँजियार सदन अमलीडीह, रायपुर