Tuesday, October 20, 2026

भट्टप्रहरी

यह आपके शोध-प्रारूप का व्याकरण-सम्मत और अनुक्रमबद्ध परिष्कृत रूप है। मूल भाव, परिकल्पना और मौखिक स्रोतों को यथावत रखा गया है, केवल भाषा, प्रवाह और अकादमिक क्रम को व्यवस्थित किया गया है।

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### भट्टप्रहरी गोत्र या पद : सिरपुर की खड्गधारी भट्टप्रहरी प्रतिमा एवं सतनाम पंथ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
**एक पुरातात्विक, वंश-परंपरागत एवं धार्मिक-सांस्कृतिक शोध-परिकल्पना**

**शोध-क्षेत्र:** सिरपुर - प्राचीन श्रीपुर, दक्षिण कोसल, वर्तमान छत्तीसगढ़
**प्रमुख विषय:** भट्टप्रहरी समुदाय की स्थानीय परंपरा, खड्गधारी प्रहरी प्रतिमा, बौद्ध सहजयानी परंपरा और सतनाम पंथ
**शोध की प्रकृति:** प्रारंभिक ऐतिहासिक अध्ययन एवं अनुसंधान की रूपरेखा

**शोधार्थी: डॉ. अनिल कुमार भतपहरी**

#### सारांश
छत्तीसगढ़ का सिरपुर प्राचीन दक्षिण कोसल का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्र रहा है। महानदी के तट पर स्थित इस प्राचीन नगर में बौद्ध, शैव, वैष्णव तथा जैन परंपराओं से संबंधित पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहाँ की स्थापत्य एवं मूर्तिकला प्राचीन मध्य भारत की बहु-धार्मिक सांस्कृतिक संरचना को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

प्रस्तुत शोध-पत्र सिरपुर के समीपवर्ती ग्रामों में निवास करने वाले "भट्टप्रहरी" गोत्र के लोगों की मौखिक परंपरा, सिरपुर में संरक्षित एक खड्गधारी पुरुष प्रतिमा की संभावित पहचान, तथा सतनाम पंथ और बौद्ध सहजयानी परंपरा के बीच संभावित ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संबंधों की पड़ताल करता है।

स्थानीय समुदाय में यह धारणा प्रचलित है कि 'भट्टप्रहरी' शब्द का ही अपभ्रंश अथवा मुख-सुख उच्चारण 'भतपहरी' है। लोक-व्याख्या में इसे रोचक, मासूमियत भरे अथवा व्यंग्यात्मक ढंग से "भात की पहरेदारी करने वाले" के रूप में भी समझाया जाता है। समुदाय में यह भी कहा जाता है कि जो पहर या छरिया में रहे वे भतपहरी और जो ढींढ़ा बन गए वे ढीढी - परन्तु इस लोक-व्युत्पत्ति के आधार पर भी दोनों गोत्रों में आज परस्पर विवाह नहीं होता और वे एक-दूसरे को भाई-बहन मानते हैं।

वस्तुतः 'भट्टप्रहरी' शब्द अपने में एक पद तथा एक कुशल रक्षक के भाव को समेटे हुए है। यही इसका निकटतम अर्थ भी है। भट्टप्रहरी समुदाय में दशहरे पर खड्ग-पूजा करने की परंपरा है। विकट या संकट काल में पूर्वज-देव, गोटानी और खांडा की पूजा तथा गांव के चारों ओर परिक्रमा करने का अनुष्ठान आज भी कई परिवारों और ग्रामों में प्रचलित है, ताकि किसी विघ्न, संकट, शत्रु, हिंसक पशु अथवा रोग के आक्रमण से रक्षा हो सके। कालांतर में समुदाय के लोग सुविधा के अनुसार भारद्वाज, भट्ट, भारती, प्रहरी, प्रहरे आदि उपनाम लिखते रहे हैं।

समुदाय की स्मृति के अनुसार सिरपुर भट्टप्रहरियों का प्राचीन क्षेत्र रहा है और उनके पूर्वजों की भूमि सिरपुर में थी। बाद के काल में उनके पूर्वज गुरु घासीदास के विचारों से प्रभावित होकर सतनाम पंथ में सम्मिलित हुए। स्थानीय परंपरा में गुरु घासीदास की पत्नी माता सफुरा के मायके का संबंध भी सिरपुर से जोड़ा जाता है।

इन कथनों को इस शोध में महत्वपूर्ण मौखिक स्रोत के रूप में स्वीकार करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि समुदाय की ऐतिहासिक स्मृति, प्रतिमा की पुरातात्विक पहचान और धार्मिक परंपराओं की निरंतरता को प्रमाणित करने के लिए अभिलेखीय, पुरातात्विक, वंशावलीगत और तुलनात्मक धार्मिक अध्ययन आवश्यक है।

**प्रमुख शब्द:** भट्टप्रहरी, सिरपुर, श्रीपुर, दक्षिण कोसल, खड्गधारी प्रतिमा, द्वारपाल, सतनाम पंथ, गुरु घासीदास, माता सफुरा, बौद्ध धर्म, सहजयान।

### 1. प्रस्तावना
इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और राजवंशों का विवरण मात्र नहीं है। किसी क्षेत्र के प्राचीन निवासियों, उनके सामाजिक दायित्वों, स्थानीय समुदायों, धार्मिक परंपराओं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही स्मृतियों का अध्ययन भी इतिहास का महत्वपूर्ण अंग है।

छत्तीसगढ़ का सिरपुर इस दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। प्राचीन श्रीपुर अथवा सिरीपुर के नाम से विख्यात यह नगर दक्षिण कोसल के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा। यहाँ के पुरातात्विक अवशेष लगभग पाँचवीं से बारहवीं शताब्दी ईस्वी के बीच विकसित स्थापत्य और धार्मिक जीवन की जानकारी देते हैं।

सिरपुर में लक्ष्मण मंदिर, बौद्ध विहार, अन्य धार्मिक स्थापत्य, मूर्तियाँ तथा नगरीय जीवन के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इनसे स्पष्ट होता है कि प्राचीन सिरपुर किसी एक धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं था, बल्कि विभिन्न धार्मिक समुदायों और सांस्कृतिक धाराओं का संगम था। इसी पृष्ठभूमि में सिरपुर के समीपवर्ती ग्रामों में रहने वाले भट्टप्रहरी गोत्र की स्थानीय परंपरा का अध्ययन महत्वपूर्ण हो जाता है।

इस शोध का उद्देश्य किसी पूर्व-निर्धारित वंशगत दावे को प्रमाणित घोषित करना नहीं, बल्कि उपलब्ध ऐतिहासिक संदर्भों और स्थानीय स्मृतियों के आधार पर उसकी व्यवस्थित जाँच करना है।

### 2. शोध के उद्देश्य
1.  प्राचीन सिरपुर की राजनीतिक, धार्मिक और पुरातात्विक पृष्ठभूमि का संक्षिप्त विवेचन करना।
2.  सिरपुर के संग्रहालय में संरक्षित बताई गई खड्गधारी पुरुष प्रतिमा की संभावित पहचान के लिए शोध की दिशा निर्धारित करना।
3.  भट्टप्रहरी गोत्र की स्थानीय वंश-परंपरा, सिरपुर से संबंध और पूर्वजों की भूमि से संबंधित मौखिक स्मृतियों का दस्तावेजीकरण करना।
4.  गुरु घासीदास, माता सफुरा और सिरपुर से संबंधित स्थानीय परंपराओं की ऐतिहासिक जाँच के लिए आधार तैयार करना।
5.  सतनाम पंथ तथा बौद्ध सहजयानी परंपरा के बीच संभावित वैचारिक और ऐतिहासिक संबंधों का आलोचनात्मक अध्ययन करना।

### 3. सिरपुर का ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व
सिरपुर वर्तमान छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में महानदी के तट पर स्थित है। इसका प्राचीन नाम श्रीपुर अथवा सिरीपुर बताया जाता है। 'सिरी' शब्द पाली और बौद्ध धम्म से संदर्भित माना जाता है।

स्थानीय जनश्रुति के अनुसार सातवाहन-वंशज भट्टप्रहरी शासकों के काल में गौतम बुद्ध का आगमन हुआ और उन्हें तथा उनके साथ आए भिक्षु-संघ को एक सहस्र कोसा-वस्त्र भेंट किए गए। कहा जाता है कि कोसा के प्राकृतिक रंग वाले यही वस्त्र आगे चलकर भिक्षुओं के चीवर का आधार बने।

ऐतिहासिक रूप से यह नगर सातवाहन, शरभपुरीय और पाण्डुवंशी शासकों के काल में दक्षिण कोसल के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुआ।

**सिरपुर से प्राप्त प्रमुख पुरातात्विक अवशेष:**
- लक्ष्मण मंदिर तथा अन्य मंदिर स्थापत्य
- बौद्ध विहार और धार्मिक प्रतिमाएँ
- जैन परंपरा से संबंधित अवशेष
- पत्थर एवं धातु की मूर्तियाँ
- आवासीय, व्यापारिक और नगरीय संरचनाओं के अवशेष
- रायकेरा तालाब के समीप निर्मित गुरु घासीदास मंदिर

सिरपुर में महायान बौद्ध धर्म तथा प्रारंभिक वज्रयान परंपरा से संबंधित कलात्मक साक्ष्यों का भी अध्ययन किया गया है।

**महत्वपूर्ण अंतर:** सिरपुर का प्राचीन और बहु-धार्मिक महत्व पुरातात्विक साक्ष्यों से समर्थित है। इसके विपरीत, किसी आधुनिक गोत्र या समुदाय का उस नगर पर विशिष्ट वंशगत अधिकार अथवा प्रत्यक्ष उत्तराधिकार सिद्ध करने के लिए पृथक प्रमाणों की आवश्यकता होगी।

### 4. भट्टप्रहरी गोत्र और सिरपुर की स्थानीय परंपरा
इस शोध का एक महत्वपूर्ण आधार सिरपुर के समीपवर्ती ग्रामों में निवास करने वाले भट्टप्रहरी गोत्र की मौखिक परंपरा है। समुदाय के प्रतिनिधियों के अनुसार:

- भट्टप्रहरी गोत्र के अनेक परिवार सिरपुर के आसपास के ग्रामों में निवास करते हैं।
- ग्रामीणों में यह धारणा प्रचलित है कि सिरपुर भट्टप्रहरियों का प्राचीन क्षेत्र था।
- समुदाय के पूर्वजों की भूमि सिरपुर में होने की बात कही जाती है।
- स्थानीय स्मृति में 'भट्टप्रहरी' नाम का संबंध प्राचीन प्रहरी, द्वारपाल अथवा खड्गधारी सामंत से जोड़ा जाता है।

इन कथनों को सामुदायिक मौखिक इतिहास के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए। ऐसी परंपराएँ कई बार उन सामाजिक संबंधों और ऐतिहासिक स्मृतियों को सुरक्षित रखती हैं, जिनका लिखित अभिलेख सीमित होता है।

**ऐतिहासिक पुष्टि के लिए आवश्यक स्रोत:**
- सिरपुर और आसपास के गाँवों की पुरानी भूमि एवं राजस्व संबंधी प्रविष्टियाँ
- परिवारों की वंशावलियाँ, पुराने दस्तावेज तथा ताम्रपत्र या अन्य अभिलेख
- पुराने अभिलेखों, स्थानीय साहित्य में 'भट्टप्रहरी' नाम का उल्लेख
- विभिन्न गाँवों के बुजुर्गों से स्वतंत्र मौखिक साक्षात्कार
- पदवियों के ऐतिहासिक अर्थों का भाषायी अध्ययन

इस चरण में सिरपुर को भट्टप्रहरी समुदाय का प्रमाणित पैतृक नगर घोषित करना उचित नहीं होगा, परन्तु यह समुदाय की ऐतिहासिक स्मृति और भूमि-संबंधों पर गंभीर शोध का एक महत्वपूर्ण विषय अवश्य है।

### 5. सिरपुर की खड्गधारी पुरुष प्रतिमा: प्रहरी अथवा सामंत की संभावित पहचान
उपलब्ध चित्रों में एक पूर्णाकार पाषाण मानवाकृति दिखाई देती है। समुदाय के प्रतिनिधि के अनुसार यह प्रतिमा लक्ष्मण मंदिर के समीप स्थित संग्रहालय में संरक्षित है।

**दिखाई देने वाली विशेषताएँ:** ऊँचा शिरोभूषण अथवा केश-विन्यास, सामने की ओर उन्मुख शांत मुखाकृति, अलंकृत शरीर, कमर पर वस्त्र और सामने की ओर मुड़े हुए हाथ। हाथों के समीप एक लंबवत आकृति भी दिखाई देती है, जिसकी पहचान केवल चित्र से निश्चित नहीं की जा सकती।

स्थानीय व्याख्या में इसे खड्गधारी सामंत, द्वारपाल अथवा प्रमुख प्रहरी माना जाता है और इसे भट्टप्रहरी परंपरा से जोड़ने की संभावना व्यक्त की गई है।

**पहचान की जाँच के तीन प्रश्न:**

**5.1 क्या यह द्वारपाल प्रतिमा है?**
प्राचीन मंदिरों में द्वारपाल प्रतिमाएँ सामान्यतः प्रवेशद्वारों के निकट स्थापित की जाती थीं। उनमें आयुध, विशेष शारीरिक मुद्रा और रक्षक-भूमिका के प्रतीक मिलते हैं। किसी प्रतिमा को द्वारपाल घोषित करने के लिए उसका मूल स्थापत्य-संदर्भ, हस्त-मुद्रा, आयुध, पृष्ठ-भाग और उत्खनन-विवरण देखना आवश्यक है।

**5.2 क्या यह किसी सामंत अथवा अधिकारी की प्रतिमा हो सकती है?**
प्राचीन मध्य भारत में राजकीय एवं प्रशासनिक पदों से जुड़े व्यक्तियों की प्रतिमाओं की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। फिर भी केवल खड़ी पुरुष-आकृति या हथियार जैसी वस्तु से उसकी राजकीय पदवी निर्धारित नहीं होती। इसके लिए शिलालेख, प्रतिष्ठा-अभिलेख, स्थापना-स्थल अथवा समकालीन कलात्मक तुलनाएँ अधिक उपयोगी होंगी।

**5.3 क्या इसका संबंध भट्टप्रहरी नाम से है?**
यह इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण, किन्तु अभी अप्रमाणित प्रश्न है। यदि किसी पुराने अभिलेख में 'भट्टप्रहरी' नाम, उससे मिलती-जुलती पदवी अथवा प्रहरी-संबंधी पद का उल्लेख मिलता है, तो उसकी भाषायी और ऐतिहासिक जाँच करनी होगी। केवल नाम की समानता से प्रतिमा और समुदाय के बीच संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता। इसके लिए प्रतिमा के आधिकारिक अभिलेख, वंशावली और कालानुक्रमिक प्रमाणों का परस्पर मेल आवश्यक है।

### 6. गुरु घासीदास, माता सफुरा और सिरपुर की स्थानीय स्मृति
समुदाय द्वारा बताई गई एक अन्य महत्वपूर्ण परंपरा गुरु घासीदास की पत्नी माता सफुरा के मायके को सिरपुर से जोड़ती है। गुरु घासीदास छत्तीसगढ़ के सतनाम आंदोलन के प्रमुख ऐतिहासिक और धार्मिक व्यक्तित्व हैं।

कुछ प्रकाशित विवरणों में माता सफुरा को सिरपुर से संबंधित बताया गया है। इस विषय में विशेष रूप से उनके पैतृक परिवार, पिता के नाम, विवाह-संबंधी परंपरा और मूल निवास से संबंधित स्रोतों की तुलना उपयोगी होगी। समुदाय की यह धारणा कि गुरु घासीदास का ससुराल और माता सफुरा का मायका सिरपुर में था, स्थानीय इतिहास के लिए महत्वपूर्ण अनुसंधान-प्रश्न प्रस्तुत करती है। इसकी पुष्टि के लिए गुरु घासीदास की जीवनियों, सतनामी परंपराओं, परिवारों की मौखिक स्मृतियों और ऐतिहासिक दस्तावेजों की जाँच आवश्यक है।

### 7. सतनाम पंथ और बौद्ध सहजयानी परंपरा: तुलनात्मक अध्ययन

**7.1 सिरपुर में बौद्ध परंपरा**
सिरपुर में बौद्ध विहारों, मूर्तियों तथा धार्मिक गतिविधियों के पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। विद्वानों ने यहाँ महायान और प्रारंभिक वज्रयान की उपस्थिति का अध्ययन किया है। सहजयान का संबंध मध्यकालीन बौद्ध सिद्ध-परंपरा और सहज-अनुभव पर बल देने वाली धाराओं से है।

**7.2 सतनाम पंथ के सामाजिक एवं नैतिक आदर्श**
सतनाम पंथ में सत्य, नैतिक जीवन, मानवीय समानता और जातिगत भेदभाव के विरोध के विचार केंद्रीय हैं। समुदाय की मान्यता के अनुसार माता सफुरा बौद्ध धम्म के अनुयायी महंत अंजोर दास की सुपुत्री थीं और योग-साधना में प्रवीण थीं। उनके लक्षणों के आधार पर ही उनका विवाह गुरु घासीदास से हुआ।

इस संदर्भ में एक प्राचीन पंथी गीत प्रचलित है:
> *सिरपुर नगर के महंत नाव अंजोर दास ग,*
> *ओकर सुघर कइना नाव सफुरा ताय गा।*
> *उज्जर-उज्जर रूप ओकर, जइसे फूल कास गा।*

इन आदर्शों की तुलना बौद्ध धर्म की नैतिक शिक्षाओं, करुणा और अहिंसा की परंपराओं से की जा सकती है।

**7.3 समानता और ऐतिहासिक निरंतरता में अंतर**
दो धार्मिक परंपराओं में समान विचार मिलने से यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि एक परंपरा दूसरी की प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी है। सतनाम पंथ को प्राचीन सहजयानी बौद्ध परंपरा की निरंतरता के रूप में स्थापित करने के लिए बीच की ऐतिहासिक कड़ियों - धार्मिक शब्दावली, प्रथाएँ, ग्रंथ, व्यक्तित्व और सामाजिक समूहों की निरंतरता - के प्रमाण आवश्यक होंगे। अतः इस स्तर पर यह परिकल्पना ही रखी जा सकती है कि दोनों के बीच वैचारिक समानता या क्षेत्रीय सांस्कृतिक संपर्क रहा हो।

### 8. अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में धार्मिक परिवर्तन का प्रश्न
मौखिक परंपरा के अनुसार भट्टप्रहरी गोत्र के पूर्वज गुरु घासीदास के संपर्क में आकर सतनाम पंथ में सम्मिलित हुए। गुरु घासीदास का जीवन अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध से संबंधित है।

**शोध के प्रमुख प्रश्न:**
- भट्टप्रहरी परिवारों के सतनाम पंथ से जुड़ने की परंपरा कितनी पुरानी है?
- क्या इस परिवर्तन से संबंधित कोई वंशावली, पत्र या धार्मिक अभिलेख उपलब्ध है?
- क्या विभिन्न ग्रामों में यह परंपरा समान रूप में प्रचलित है?
- क्या समुदाय की धार्मिक पहचान में पुराने रीति-रिवाजों और सतनाम शिक्षाओं के बीच संबंध दिखाई देता है?

### 9. पूर्वजों की भूमि और ऐतिहासिक अधिकार का प्रश्न
यहाँ दो प्रश्नों को अलग रखना आवश्यक है:
1.  क्या समुदाय के पूर्वज सिरपुर में रहते थे अथवा वहाँ भूमि रखते थे? यह ऐतिहासिक और अभिलेखीय जाँच का विषय है।
2.  वर्तमान में किसी भूमि पर कानूनी अधिकार किसका है? यह राजस्व अभिलेखों और लागू कानूनों के आधार पर निर्धारित होगा।
इस प्रकार ऐतिहासिक वंश-परंपरा का अध्ययन और वर्तमान भूमि-अधिकार का निर्धारण परस्पर संबंधित होते हुए भी अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं।

### 10. शोध-पद्धति
**प्रथम चरण: संग्रहालय अभिलेख -** संग्रहालय प्रभारी से प्रतिमा का आधिकारिक नाम, सूची क्रमांक, प्राप्ति-स्थान, माप, सामग्री, अनुमानित काल और पुरातात्विक विवरण प्राप्त करना।

**द्वितीय चरण: मौखिक इतिहास -** सिरपुर और आसपास के ग्रामों में भट्टप्रहरी गोत्र के बुजुर्गों से साक्षात्कार, जिसमें गाँव, आयु-समूह, वंशावली का आधार और कथन की पीढ़ीगत निरंतरता दर्ज हो।

**तृतीय चरण: भूमि और वंशावली के अभिलेख -** पुराने राजस्व दस्तावेज, वंशावली और ग्राम-स्तरीय दस्तावेजों का संकलन।

**चतुर्थ चरण: धार्मिक इतिहास -** गुरु घासीदास, माता सफुरा, सतनाम आंदोलन तथा बौद्ध सहजयानी परंपरा पर प्रकाशित शोध की तुलना।

**पंचम चरण: तुलनात्मक विश्लेषण -** प्रतिमा, मौखिक परंपरा और लिखित स्रोतों से प्राप्त निष्कर्षों की तुलना, जिसमें प्रमाणित और अप्रमाणित तथ्यों को स्पष्ट रूप से अलग रखा जाए।

### 11. निष्कर्ष
सिरपुर का पुरातात्विक महत्व, उसकी बहु-धार्मिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और बौद्ध परंपराओं की उपस्थिति ऐतिहासिक साक्ष्यों से समर्थित है। भट्टप्रहरी समुदाय की स्थानीय स्मृति, पूर्वजों की भूमि से संबंधित कथन, खड्गधारी प्रतिमा के साथ संभावित संबंध तथा गुरु घासीदास और माता सफुरा से जुड़ी परंपराएँ आगे के शोध के लिए महत्वपूर्ण विषय प्रस्तुत करती हैं। सतनाम पंथ और बौद्ध सहजयानी परंपरा के बीच वैचारिक समानताओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है, किन्तु प्रत्यक्ष ऐतिहासिक निरंतरता स्थापित करने के लिए अधिक ठोस प्रमाण आवश्यक हैं।

इस शोध का केंद्रीय निष्कर्ष यह है कि भट्टप्रहरी समुदाय की ऐतिहासिक स्मृति का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण, सिरपुर की संबंधित प्रतिमा का आधिकारिक पुरातात्विक विवरण प्राप्त करना तथा भूमि और वंशावली के दस्तावेजों की जाँच अत्यंत उपयोगी होगी।

### 12. संदर्भ एवं आगे के अध्ययन के लिए स्रोत
1. UNESCO World Heritage Centre, Sirpur Cultural and Archaeological Landscape.
2. Singh, Saurabh. (2021). The Emergence and Spread of the Buddhist Tārā Cult in India...
3. Singh, Saurabh. (2021). Buddhism in Sirpur (Chhattisgarh): An Archaeological Study. Deccan College, Pune.
4. गुरु घासीदास और सतनाम आंदोलन से संबंधित प्रकाशित जीवनियाँ एवं छत्तीसगढ़ के क्षेत्रीय इतिहास-ग्रंथ।
5. सिरपुर संग्रहालय की प्रतिमा-सूची, पुरातत्व विभाग की उत्खनन रिपोर्टें, स्थानीय भूमि अभिलेख और भट्टप्रहरी गोत्र की मौखिक वंश-परंपराएँ - जिनका अगले चरण में संकलन और सत्यापन किया जाना है।

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इच्छुक शोधार्थी इस कार्य हेतु संपर्क कर सकते हैं।
**- डॉ. अनिल कुमार भतपहरी**

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Monday, October 19, 2026

जगराता

जगराता

प्रातः सैर, सरोवर तट पर,
बैठा तरु की शीतल छाँह,
भीगे नयनों से एक पुरुष
देख रहा जीवन-प्रवाह।

उद्वेलित युवा, असहिष्णु,
क्यों अशांति इस महादेश में,
आसुरी शक्तियों के जाल
फैल रहे हैं सर्वत्र देश में।

नेट-नशे के जाल हैं,
छद्म धर्म-कर्म भेड़-चाल है,
प्रदर्शन की होड़ सर्वत्र,
आचरणहीन भीड़ विकराल है।

दिशाहीन, सद्भावहीन,
छल-छद्म की भगदड़ है,
संसाधनों पर कब्जा,
जन बेदखल, बड़ी तिकड़म है।

खेल रहे हैं सभी यह खेल,
बड़ा ही मनोरंजक है, वाह,
अपनों में मगन हैं हम सब,
पड़ोसी से बेपरवाह।

खुद-सुख, बेपरवाही का
अंतिम लक्ष्य अलगाव है,
उसी में सब उलझे हुए,
तंत्र-जाल में भटकाव है।

हे आद्ये, सुलझा इन्हें,
भव का अंध तमस हरो माता,
भटकाव, अलगाव से बचाओ,
यही मेरी है जगराता।

  - डॉ.अनिल कुमार भतपहरी

Friday, October 16, 2026

चूरी अम्मर रहें

चूरी अमर रहे

जुनवानी के उस पुराने आंगन में आज भी एक खूंटी गड़ी है।

मास्टर जी ने बताया था, इसी खूंटी पर कुटेला वाले तुर्का बाबा अपना कांवर टिकाते थे। एक तरफ टोकनी में लाल, हरी, पीली कांच की चूड़ियां, दूसरी तरफ मनिहारी का छोटा-मोटा सामान। गांव-गांव लगना, यही तो उनकी पौनी-पसारी थी।

बाबा आते तो आंगन भर जाता। आस-पास की सारी बहुएं-बेटियां घेरा बना लेतीं। बाबा किसी का नाम नहीं पूछते थे, बस कहते - "लाओ बिटिया, हाथ आगे करो।" 

चूड़ी पहनाते-पहनाते कलाई पकड़ते, और जब आखिरी चूड़ी कलाई पर खनकती तो औरतें झुक कर उनके पैर छू लेतीं। तुर्का बाबा हड़बड़ा जाते, और हाथ उठा कर एक ही आशीष देते - "चूरी अम्मर रहे बेटी।"

उस आशीष में सुहाग से ज्यादा कुछ और अमर रहता था।

तुर्का बाबा अब नहीं रहे। उनका बेटा रज्जू है। जिसे पलारी का हर लड़का रज्जू भाई कहता है। वही रज्जू जिसे मास्टर जी ने पढ़ाया था, जो उनके लड़कों के साथ एक ही बेंच पर बैठता था। नेक, सीधा, मेहनती। 

इस बार पलारी के बालसमुंद मेले में मास्टर जी की मुलाकात रज्जू से हुई तो वह उदास था। 

"का होगे रज्जू? टोकनी कहां है?"

"धर दिया गुरुजी," रज्जू ने टोपी ठीक करते हुए कहा, "अब कुटेला से जुनवानी तक कोई बुलाता नहीं। शहर से प्लास्टिक की चूड़ी आ गई, और... और अब लोग टोकनी देख के दरवाजा बंद कर लेते हैं। कहते हैं, ये मनिहारी लोग... पता नहीं।"

मास्टर जी कुछ नहीं बोले। विगत कुछ वर्षों से हवा ही ऐसी हो गई है। वही पलारी जो सद्भावना की नगरी थी, जहां 1996 में पेंड्रारोड में नासिर खान साहब इत्र वाले के घर में किरायेदार बनना गर्व की बात थी, जहां बलौदाबाजार में एक मुस्लिम मैडम के घर में बेटे जैसा रखा गया, जहां ईद पर न जा पाने पर दूसरे दिन सुबह-सुबह सेवईं की टिफिन खुद चल कर आती थी - वहीं अब लोग एक-दूसरे को विदेशी कहने लगे हैं।

रज्जू ने कहा, "सोचा था मोबाइल के कवर की दुकान लगा लूं। पर अब्बा की वो बात याद आती है - चूरी अम्मर रहे। तो लगता है, कुछ तो अमर रहना चाहिए।"

उसी मेले में पीछे, जैतखाम के पास एक बुढ़िया बैठी थी - सोनमती। सतनामी बस्ती की। उसके बेटे अंजोर को भी मास्टर जी ने पढ़ाया था। सोनमती के हाथों में चूड़ियां नहीं थीं। सफेद कलाई।

सोनमती ने रज्जू को देखा तो आवाज दी, "अरे रज्जू! इधर आ।"

रज्जू गया। सोनमती ने अपनी बहू को आगे किया।

"पहना दे बेटा। गुरु घासीदास जयंती है कल।"

रज्जू झिझका, "चाची, मेरे पास तो... पुरानी कांच वाली ही हैं। अब कोई लेता नहीं।"

"तो हम का कोई हैं रज्जू? हम सतनामी हैं। हमरे यहां मनखे-मनखे एक समान। हमरे लिए तो कांच ही सोना है। पहना।"

रज्जू ने कांपते हाथों से चूड़ियां पहनाईं। वही खनक। वही आंगन जैसा दृश्य। पहनाने के बाद सोनमती की बहू ने झुक कर रज्जू के पैर छुए।

रज्जू की आंखें भर आईं। उसने वही आशीष दोहराया जो उसने अपने अब्बा से सीखा था - "चूरी अम्मर रहे बेटी।"

पास ही खड़े बाबू खान मुस्कुरा रहे थे। वही बाबू खान, पलारी की शान, जो पत्रकार हैं, और जिन्होंने गुरु घासीदास का जीवन-चरित लिखा है। एक मुसलमान का गुरु घासीदास पर लिखना - इससे बड़ी एकता और क्या होगी?

बाबू खान ने मास्टर जी से कहा, "देख रहे हैं मास्टर जी? जब हिन्दू के बड़े घरों ने दरवाजे बंद किए, तो सतनाम के घरों ने टोकनी के लिए आंगन खोल दिया। क्योंकि सतनाम ने कभी जात नहीं पूछी। और तुर्का ने कभी धर्म नहीं पूछा। दोनों का काम एक ही है - मनखे को जोड़ना।"

मास्टर जी समझ गए।

ये चूड़ी-मनिहारी मुसलमान, ये छुटपुट व्यवसायी, ये कोई बाहर के नहीं हैं। ये इसी मिट्टी के पौनी हैं। जब बाजार ने उन्हें बेकार किया, जब नफरत ने उन्हें अंतर्मुखी किया, तो उन्हें सहारा उसी पंथ में मिला जो खुद हिंदुत्व के समांतर, जातिविहीन, कर्म-प्रिय समाज बन कर खड़ा हुआ था - सतनाम पंथ में।

रज्जू अब हर गुरु पूर्णिमा पर सतनामी बस्ती जाता है। टोकनी लेकर। अंजोर उसकी टोकनी उठाने में मदद करता है। और जब कोई नई बहू चूड़ी पहनती है, तो पूरे बस्ती में वही पुरानी आवाज गूंजती है -

"चूरी अम्मर रहे।"

उस दिन मास्टर जी को लगा, चूड़ी का अमर रहना मतलब कांच का न टूटना नहीं है। चूड़ी का अमर रहना मतलब है, वो हाथ अमर रहे जिसने पहनाई, वो पैर छूने का भाव अमर रहे, वो आंगन अमर रहे जहां हिन्दू, मुस्लिम और सतनामी एक ही टोकनी के चारों ओर बैठते थे।

और जब तक यह आशीष बचा है, पलारी सचमुच सद्भावना की नगरी बची है।

Wednesday, October 14, 2026

सनदई

सनदई 

अबूझमाड़ आज भी अबूझ ही है। यहाँ की राजधानी कही जाने वाली जिला मुख्यालय नारायणपुर से ईरकभट्टी होकर सोनपुर से आगे कुतुल गाँव, जहाँ धूप भी साल के पत्तों से पूछ कर नीचे उतरती है। आज़ादी के बाद अब तक शासन- प्रशासन के लिए चुनौती बनी "माड़"विकास रुपी सूर्योदय से वंचित हैं वहीं की है सनदई 
    माड़िया जनजाति की लड़की जिसने बड़ी ही जद्दोजहज से दो नाले और पहाड़ी रोज पार कर 12वीं प्रथम श्रेणी पास की थी - 62% मार्कशीट लेकर ।जब वह अपने बाबा सोमारू के पास गई, तो जवाब वही मिला जो प्रायः हर अबूझमाड़ की बेटी को मिलता है।

"बहुत पढ़ ली बेटी! अभी इमली का सीजन है, जंगल जाना है।" तेंदू पत्ता से कुछ पैसे जोड़ कर तेरी ब्याह रचाकर पितृ धर्म से उऋण हो,गंगा नहा लूँगा। 

माँ ने कहा - "कॉलेज अपने लोगों के लिए नहीं बना।" 

उस रात सनदई सोई नहीं। दीवार पर टंगी फटी नागरिक शास्त्र की किताब में एक लाइन चमक रही थी - 'शिक्षा हमारा अधिकार है।'

सुबह 4 बजे, जब गाँव सो रहा था, सनदई अपनी बड़े  पिता जी की बेटी और स्कूल में एक क्लास आगे  बुधनी के साथ निकल पड़ी । बुधनी की आठवीं के बाद शादी कर दी थी क्योंकि हाई स्कूल जंगल पहाड़ पार कर ईरकभट्टी जाना होता।  फिर उनके पिता दिन भर सल्फी मंद ताड़ी में चूर रहते थे , माई खेतों में और वनोपज एकत्र कर पास हाट में बेचकर आजीविका चलाती वह उसी में लगी रहती नहीं तो घर में चूल्हा नहीं जलता भला ऐसे में कौन फ़िक्र करता.? उनकी पढ़ाई रुक गई और फिर कुछ दिन बाद ताड़ी की चढ़ी हुई कर्ज़ उतारने ताड़ी वाले अधेड़ के साथ  ब्याह दिए । इस तरह उस भोली मुग्धा को पता ही नहीं कि उनकी जिंदगी कैसे जहन्नूम बन गई। वह जोर से हांफती हुई कही- " बहन मैं हूं तेरे साथ ,जल्दी चलों. हाथ पकड़ गंत्वय की ओर बढ़ चली।

 नारायणपुर उनके लिए नया नहीं हैं वह अपने मर्द के साथ कई बार आ चुकी थी साईकिल में सौदा करने। रस्ते में किस्सा सुनाती आश्रम, बंगला पारा कुम्हार कोस्टा पारा और मावली माता मंदिर जिसके नाम पर हफ्ता भर मेला भरता हैं। ऊपर पहाड़ी पर बिराजे दंतेश्वरी और वहां की बड़े बाँध के पास इतवारी बाज़ार की जो अडताफ़ में प्रसिद्ध हैं। सौदागर दूर -दूर से आते और वनोपज के बदले घरेलू उपयोग की वस्तुएं बेचते। उनकी बातों में खोई सनदई उत्साह से दौड़ी चली जा रही थी।
  कई किलोमीटर का जंगल, नदी, पगडंडी उखड़ी सड़के । नंगे पाँव, छालों भरे पैर। झोले में दो जोड़ी कपड़े, 12वीं की अंक सूची,जाति- निवास और आधार जो उनकी अपनी अदद पहचान हैं एक साड़ी दुकान की पॉली थीन पैकेट में डाल कर  जी जी अंतर रखी पैदल ही सड़क पर चली जा रही थी... छीन सल्फी का पेड़ और पंखी की कलरव के बीच घरघराती एक मेटाडोर  पास रुकी - जाना  कहां हैं?
नारायणपुर 
बैठो ,दाेनों का 100 रुपए लगेंगे। बुधनी उड़द दाल और घर के मुर्गे -मुर्गी बेचकर 500 की नोट यत्नपूर्वक बचा कर रखी थी ।वक्त जरूरत पर काम आए उसी के भरोसे  वह सनदई को साथ ले कर चल पड़ी थी। 

नारायणपुर पहुँच कर पहला काम मूल अंक सूची आदि  फोटो कॉपी कराई और फोटो भी खिंचाई। पता चला कि वहीं कम्पूटर में आन लाईन  प्रवेश हेतु फॉर्म रजिस्ट्रेशन कराना हैं और उसके लिए करीब 1500 रुपए चाहिए।  अब  विकट संकट कि अजनबी शहर में किससे और कैसे मांगे! असमंजस सी खड़ी रहीं तभी फोटो धूल कर आई देखा कि कलर फ़ोटो में नाक की फुल्ली सुनहरी आभा लिए चमक रही थीं। बुधनी कही -"कित्ती सुंदर फब रही हो गिया! " और उसके कंधे को दबाई..वह बहन ही नहीं सहेली जो थी।
       सनदई हाथ से फुल्ली को छूकर देखी और अपनी नानी की याद न में पल भर खो गई... जब वह सज्ञान हुई तभी उसे वह खुशी खुशी तोहफा दी क्योंकि रजस्वला के समय उत्सव मनाने की प्रथा थी। 
  थोड़ी देर असमंजस सी शून्य में रही.. बुधनी कही क्या हुआ? उसने कही - दीदी मुझे इसे बेचकर पढ़ना हैं और नानी का मान रखना हैं वह चाहती थी कि मैं पढू और मास्टरनी डॉक्टरनी बनू ।उसने बिना पल गंवाए कही तू तो जानती होगी सुनार की दुकान कहां हैं? वे दोनों चल पड़ी 

"इसे बेचना है।"

 एक ग्राम की थी तो 7000 रुपये मिले। आँख में आँसू थे, पर हाथ नहीं कांपे। उसने गहना नहीं बेचीं बल्कि अपनी  खुशी खरीदी थी। 

वीरांगना रमोतीन महिला महाविद्यालय, नारायणपुर में एडमिशन की आखिरी तारीख थी। लाइन बहुत लंबी। काउंटर पर बाबू ने फॉर्म देखा - दो टके कहे क्योंकि एक सा ही जवाब बिना प्रश्न पूछे उन्हें कहना हैं "आदिवासी छात्रावास फुल है, जनरल हॉस्टल में जगह नहीं। अभिभावक को लाओ।"

ऐसे हताश सनदई वहीं जमीन पर बैठ गई। बुधनी अन्य अभिभावक के साथ महाविद्यालय के प्रांगण में लगे काजू पेड़ के छाँव में बैठी हुई थी।तभी हिंदी विभाग के प्रो. भट्ट सर उधर से गुजरे... उन्होंने देखा - एक लड़की, फटे चप्पल, पैरों में छाले, पर गोद में मार्कशीट को ऐसे पकड़े है जैसे कोई ग्रंथ हो।

"कहाँ से आई हो बेटा?"

"कुतुल से सर "
"अच्छा "

"किसके साथ?"

"अकेली, सहेली के साथ।"

सनदई ने सब बता दिया - माता-पिता का मना करना, विद्रोह कर आना बड़ी दीदी का साथ इतनी दूर  आना, नाक की फुल्ली बेचना इत्यादि।

प्रो. भट्ट सर हिंदी पढ़ाते थे, पर उन्होंने सनदई के भीतर की कविता पढ़ ली। वे कुछ बोले नहीं, सीधे उसका हाथ पकड़ कर प्राचार्य कक्ष में ले गए।

"सर, ये बच्ची नहीं, अबूझमाड़ का  सवाल है ।इसका जवाब हमें देना है।"
प्राचार्य भी दयालू थे भले वह प्रशासनिक कठोरता का आवरण ओढ़े होते थे पर है तो इंसान ही।
प्रो. भट्ट सर के सहयोग से ही उसका प्रवेश हुआ। उन्होंने अपने पास के टेबल में फॉर्म की अधूरी जानकारियां  भरी, विषय दिलाए, और खुद अपने हस्ताक्षर से उसकी गारंटी ली।

फिर वे उसे महिला छात्रावास ले गए। अधीक्षिका ने कहा - "भट्ट सर, एक भी कमरा खाली नहीं।"

भट्ट सर ने कहा - "मैडम, एक बेटी जंगल से अपनी जड़ उखाड़ कर आई है ताकि वह पेड़ बन सके। इसे बरामदे में भी जगह दे दीजिए, ये खुद अपनी जगह बना लेगी।"

उनके मार्गदर्शन और जिद के कारण ही उस शाम सनदई को कमरा नंबर 7 में एक बेड मिला। साथ ही एक नियम छात्रावास में बनाई गई कि बिना हॉस्टल में सलेक्शन के जरूरत मंद छात्राओं को एक हाल में रखें और उनसे भोजन आदि बनाने में पारिश्रमिक ले या फिर स्कूल छात्रवृत्ति से किस्त अनुसार न्यूनतम शुल्क ले। 
  

आज सनदई बी.ए. प्रथम वर्ष में है। प्रो. भट्ट सर की कक्षा में वह सबसे आगे बैठती है। उसकी नाक आज सूनी है, पर उसकी कॉपी शब्दों से भरी है।

महाविद्यालय में दीक्षारंभ के दिन प्रो. भट्ट सर ने शिक्षा के महत्व को समझते हुए व्याख्यान देते  अचानक सनदई की ओर देखते हुए कहे  - तुमने अपनी फुल्ली बेची नहीं, बोई है। एक दिन पूरा माड़ तुम्हारी नाक की उस फुल्ली जैसा चमकेगा।"
     हाल तालियों से गूँज उठी ... आवाक सनदई  हतप्रभ सी हुई !ओ समझ नहीं पा रही थी क्या और कैसी प्रतिक्रिया दे कि सहज होती धीरे से मुस्कुरा दी और विनीत भाव से सिर झुका ली। 
     अबूझमाड़ की सनदई ने बता दिया कि उनकी  विद्रोह अंधेरे के खिलाफ हैं और रौशनी के लिए पढ़ रही हैं। दोपहर हो गए थे उन्हें पता हैं कि साल वन से सूर्य किरण छनकर पगडंडी में पड़ रही होगीऔर पास ही लता लहलहाती हुई साल पेड़ में चढ़ रही हैं। 

       डॉ.अनिल कुमार भतपहरी
           9617777514  
           नारायणपुर बस्तर 
anilbhatpahari@gmail.com

Thursday, October 8, 2026

संस्कृत कृत्रिम और शास्त्र भाषा हैं

संस्कृत कृत्रिम एवं शास्त्र भाषा है - एक ऐतिहासिक पुनर्पाठ
1. नाम में ही उत्पत्ति छिपी है

सम् + कृत = अच्छी तरह से गढ़ा हुआ, बनाया हुआ।

दुनिया की कोई भी प्राकृतिक भाषा अपने को "बनाई हुई" नहीं कहती। प्राकृत का अर्थ है जो प्रकृति से जन्मा है, लोगों के मुंह में है। संस्कृत का अर्थ है जिसका संस्कार किया गया है। संस्कार के लिए कच्चा माल चाहिए, और वह कच्चा माल प्राकृत और पाली थी। जैसे कच्चे आम से अचार बनता है, वैसे जनभाषा से प्रयोगशाला में संस्कृत बनी। व्याकरण से ही स्पष्ट है - प्राकृत प्रकृति है, संस्कृत उसकी परिष्कृति है।
अतः संस्कृत एक कृत्रिम राजभाषा हैं राजा, सामंत पुरोहित प्रभुवर्ग या देवगण कहलाते थे और गुरुकुल मे संस्कृत पढ़ा लिखा होने के कारण संस्कृत में वार्तालाप करते थे इसलिए संस्कृत को देववाणी एवं पाली प्राकृत इत्यादि को लोकवाणी कहें गए.

2. शिलालेखीय साक्ष्य: पत्थर झूठ नहीं बोलते

यदि संस्कृत सबसे प्राचीन होती, तो भारत के सबसे प्राचीन अभिलेख संस्कृत में होते। तथ्य उल्टा है।

क. मौर्य काल, 260 ईसा पूर्व: भारत के सबसे प्राचीन पठनीय शिलालेख अशोक के हैं। पूरे भारत में उनकी भाषा प्राकृत, पाली और सीमांत पर ग्रीक-अरामाइक है। एक भी पंक्ति संस्कृत में नहीं। अशोक ने प्रजा की भाषा चुनी।

ख. 400 साल का शून्य: अशोक के बाद शुंग, सातवाहन, इंडो-ग्रीक राजाओं के सैकड़ों शिलालेख और सिक्के मिलते हैं। भाषा वही - प्राकृत।

ग. पहला संस्कृत शिलालेख, 150 ईस्वी: शक राजा रुद्रदामन का जूनागढ़ शिलालेख संस्कृत का पहला लंबा काव्यात्मक शिलालेख है। अशोक से 400 साल बाद।

यह क्रम सिद्ध करता है - जो भाषा जनता की थी, वही पहले पत्थरों पर आई। जो दरबार में गढ़ी गई, वह बाद में आई।

3. भाषावैज्ञानिक साक्ष्य: सरल से जटिल की ओर

भाषा सरल से जटिल बनती है।

पाली-प्राकृत में - धम्म, कम्म, सच्च, मुह, पाणी - छोटे, बोलने में आसान शब्द।
संस्कृत में - धर्म, कर्म, सत्य, मुख, पाणि - उन्हीं को भारी, व्याकरण-बद्ध बनाया गया।

12-15 अक्षरों के लंबे समास, इको यणचि, अतो लोप: जैसे गणित के फॉर्मूले - यह जीवित जनभाषा की विशेषता नहीं, कंठस्थ करने की तकनीक है। रोज की बोली में कोई 15 अक्षर का शब्द नहीं बोलता।

पाणिनि ने चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में अष्टाध्यायी के लगभग 4000 सूत्रों में पहले से चली आ रही लोकभाषा को बाँधा, छाँटा और अपरिवर्तनीय बनाया। वे सृष्टिकर्ता नहीं, संपादक थे।

4. भाषा पर एकाधिकार कैसे बना?

जब किसी भाषा को देववाणी, अनादि, स्वर्ग-बैकुंठ की भाषा घोषित कर दिया जाता है, तो साधारण मनुष्य उसका अधिकारी नहीं रह जाता।

प्राकृत-पाली बौद्धों, जैनों, व्यापारियों, किसानों की भाषा थी - जातक, बुद्ध-उपदेश, लोकगाथाएं सब इसी में।

गुप्त काल में राजतंत्र ने जब इसे राजकीय संरक्षण और राजभाषा बनाया, तब भूमिदान-पत्र, प्रशस्ति, धर्मशास्त्र संस्कृत में लिखे जाने लगे। और फिर प्रचारित किया गया कि प्राकृत तो संस्कृत का अपभ्रंश है। यह उल्टा पाठ था। सच यह है कि मानक भाषा बोली का परिष्कार होती है, जैसे मानक हिंदी खड़ी बोली का परिष्कार है, अपभ्रंश नहीं।

इसी दैवीकरण से ज्ञान की भाषा वर्चस्व की भाषा बन गई और उस पर शैक्षणिक-धार्मिक एकाधिकार स्थापित हो गया।

निष्कर्ष

संस्कृत प्राचीन है, पर आदि नहीं है न ही इनसे भारतीय भाषाएं जन्मी हैं बल्कि लोक भाषाएँ से यह स्वयं विकसित हुई हैं। वह एक लंबी बोली-परंपरा का, बौद्धिक चेतना और राज्य-व्यवस्था द्वारा किया गया अंतिम, सबसे परिष्कृत और कृत्रिम संस्करण है। वह आकाश से नहीं उतरी, धरती पर ही, जनता की बोली से, व्याकरण की प्रयोगशाला में गढ़ी गई है।

डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
#anilbhattcg #सतसंधान

Wednesday, October 7, 2026

गुरु घासीदास पर लेखन।

गुरु घासीदास पर रसेल अंग्रेज सह लेखक हीरालाल  राजस्व अधिकारी पहले भारतीय थे। इनके रिपोर्ट वाहियात और सांप्रदायिक हैं।
   प्रायः हिंदू  लेखक द्वेषपूर्ण और निंदनीय लेखन ही करते रहें हैं।
प सुंदरलाल शर्मा जी प मिलाऊ दास कोसरिया के साथी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे के पहल से सर्वप्रथम सतनामी पुराण 1907 में लिखे हैं ।ऐसा जिक्र मिलता तो हैं पर आज पर्यंत देखने नहीं मिला और न ही उनकी कोई पंक्तियां उपलब्ध हुई हैं।
  फिर मनोहर दास नृसिंह के बाद अनवरत लेखन का सिलसिला चला और महज 50-55 वर्षों में छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक लेखन सतनाम पंथ और गुरुघासीदास पर हुआ।
उनके उपदेश अमृतवाणी जगजाहिर हुआ तथा भारतीय बौद्धिक जगत ऐसे मनीषी से परिचीत हुआ जो बुद्ध के बाद सबसे अधिक प्रखर और परम सत्य के उद्घोषक और प्रवर्तक हैं। उनके वाणी में कोई भ्रम नहीं कोई ऊहापोह नहीं और न ही परिकल्पना हैं बस सत्य का सीधा साक्षात्कार हैं।

Thursday, October 1, 2026

महानदी

प्रसंग महानदी जल विवाद 

"जाके पाँव न फटे बिवाई ओ क्या जाने पीर पराई " 

महानदी छत्तीसगढ़ और ओडिशा की जीवनरेखा है।
इसके तट पर बसे प्राचीन दक्षिण कोसल की राजधानी सिरपुर के ठीक सामने चिखली-जुनवानी मेरा गाँव है। हमारी घाट में भव्यतम लक्ष्मण देवालय के दर्शन होते हैं तो बाबा गंधेश्वरनाथ के शंख-घंटे की आवाज़ सुनते हुए हम बड़े हुए हैं। अपने खेत में बैठकर नदी को देखना - यह सिर्फ भूगोल नहीं है, यह हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है। नाव से नदी पार करते जीवन बीत रहा हैं। दो तीन बार तो नाव में डूबते डूबते बचे हैं। उलट धार एवं बाढ़ से अनेक जहरीले सांप घरों में घुस जाते हैं। मेरे बड़े पिताजी के सुपुत्र होनहार चंद्र कुमार सर्पदंश का शिकार हो गए। कई बार फसल डूब गए मुआवजा भी बड़ी मुश्किल से मिलते हैं इस तरह के अनेक दुर्घटनाओं से बचकर यहाँ तक आए हैं।
बाल्यावस्था में हमलोग दोनो भाई महानदी में बह गए थे। सुनील एक पेड़ की टहनी पकड़ लिए और इस तरह बचे। वे आगे चलकर पानी पंचायत अध्यक्ष, सरपंच और जिला पंचायत अध्यक्ष  बना। दूरद्रष्टा पिताश्री की चिंतन,भाई बंधु के अदम्य प्रयास , उत्साह से ही क्षेत्र के जनप्रतिनिधि गणों खासकर विधायक चाचा श्री रामलाल भारद्वाज के सार्थक पहल द्वारा जुनवानी से आगे समोदा ग्राम में महानदी में "समोदा डायवर्शन"  बनाने जैसी सोच विकसित हुई।

महानदी तटवर्ती जुनवानी-चिखली घाट के कृषक होने का सुख और दुःख हम एक साथ भोगते आ रहे हैं।
भारी बारिश में बाढ़ का तांडव और पानी नहीं गिरा तो गाँवों के जलस्रोतों को खींच लेना - यह दारुण दुःख था। जोगी जी की नीति, जोगी-डबरी योजना से प्रदेश में हैंडपंप उत्खनन हेतु बोर मशीन आई और तब कहीं जाकर राहत मिली।

इस तरह सुख यह है कि नदी पास है तो जीवन उत्सव है।
दुःख यह कि गर्मी में जब महानदी की जलधारा कम होती है तो वह आसपास के कुओं, तालाबों और हैंडपंपों का पानी भी खींच लेती है। नदी किनारे होकर भी प्यासे रह जाना - जीवन बेहद कष्टमय है। इससे बड़ा विरोधाभास क्या होगा?

मध्य प्रदेश में रहने और इस तरह की राजनैतिक चेतना  का अभाव या उपेक्षा का दंश प्रदेश वासी तटवर्ती लोग झेलते रहे हैं। संभवतः इसीलिए महानदी के प्रति जनमानस की आस्था गंगा-नर्मदा जैसी पनप नहीं पाई, जबकि यहाँ का जनजीवन बेहद सरल और आस्थावान है। परंतु नदी का महिमा-मंडन कर उससे लाभ लेना या पर्यटन आदि के लिए व्यावसायिक उपयोग करना यहाँ की सरलतम संस्कृति का अंग नहीं रहा। इसलिए कभी संरक्षण, संवर्धन एवं सौंदर्य के लिए स्थानीय लोगों में विचार भी नहीं पनप सका।

परंतु छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पड़े अकाल और उनसे निपटने के लिए कमर कसे प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी जी को हमारे पिताजी स्वर्गीय शिक्षक सुकाल दास भतपहरी, पानी पंचायत अध्यक्ष भाई सुनील एवं पिताजी के सहपाठी यशस्वी विधायक रामलाल भारद्वाज (भतपहरी) के माध्यम से महानदी के जल को डायवर्ट कर क्षेत्र के कृषकों के लिए योजना बनाने की सलाह दी गई। इसमें किंचित हमारा भी सोच और सहयोग रहा है। बाद में तत्कालीन पलारी विधायक शिव डहरिया जी का प्रयास रंग लाया फलस्वरूप समोदा डायवर्शन जैसी परियोजना ने आकार लिया और हमारे पलारी कॉलेज के प्रांगण में हुई विशाल जनसभा में माननीय अजीत जोगी जी ने इसकी घोषणा की। तब हमारा मन उल्लास और हर्ष से भर गया कि वर्षों का सपना साकार हो उठेगा। उस कार्यक्रम का मैं चश्मदीद गवाह रहा हूँ। 

हम लोगों की चाह केवल इतनी थी -
1. स्टॉप डैम/एनीकट बने ताकि दोनों ओर फैले रिश्तेदारों का सुगमतापूर्वक आवागमन हो सके। कोई बड़ा बाँध नहीं। बस इतना कि थोड़ा पानी रुके।
2. उद्देश्य पानी रोकना नहीं, निस्तार है - ताकि दोनों तटों के बीच आवागमन बना रहे, जल-भराव से रिचार्ज हो, कुआँ-तालाब-हैंडपंप जिंदा रहें।
3. रोज़ी-रोज़गार से जुड़े - मत्स्याखेट हो, कछार-बाड़ी में फसलें लहलहाएँ, जीवन खुशहाल हो।

परंतु अन्यान्य कारणों या जल-भराव की स्थिति के चलते इसे आरंग के पास निसदा डायवर्शन के रूप में यशस्वी डॉ रमन सिंह के कार्यकाल में निर्मित किया गया।

    समोदा में एनीकेट बना और उसे रायखेड़ा खरोरा के पॉवर प्लांट को पानी दिया जाने लगा।जो नहीं होना था, वह हो गया और संभवतः पानी के इस तरह व्यावसायिक उपयोग के कारण ओडिशा सरकार हस्तक्षेप कर रही है यह विचारणीय हैं। यही चंद्रपुर के समीप एनीकट का हुआ, जिसे निजी कंपनी को पानी सप्लाई की जा रही हैं। तब से ओडिशा जैसे मित्र और सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक रूप से एक रहे प्रदेश के साथ अनावश्यक तनाव निर्मित होने लगा।

तो क्या हम प्रदेशवासी, जिनकी सभी नदियों को अपने 280 किलोमीटर के बहाव क्षेत्र में निचोड़ कर ओडिशा ले जाती है, किंकर्तव्यविमूढ़ से देखते रहें और दुःख भोगते रहें? सवाल यह है।

4. हम प्रदेशवासी और सरकार कतई ओडिशा विरोधी नहीं हैं - महानदी 850 किलोमीटर लंबी है, जिसमें से 280 किलोमीटर ही छत्तीसगढ़ में बहती है। अरपा, पैरी, सोंढूर, शिवनाथ, हसदेव - छत्तीसगढ़ की लगभग सारी नदियों का पानी इसी 280 किलोमीटर में आकर महानदी में मिलता है और सीधे ओडिशा चला जाता है। सवाल वाजिब है कि क्या तटवर्ती छत्तीसगढ़ ही प्यासा रहे?

5. निस्तार प्राकृतिक हक है - जो पानी आपके क्षेत्र की बारिश और आपके नालों ने नदी में डाला है, उस पर तो स्थानीय लोगों का पहला अधिकार बनता है।

आपने अपने पिताजी के समय के नाला बाँधने वाले अभियानों का जिक्र किया - सामुदायिक सिंचाई, उद्वहन, बंधनी बाँधकर निस्तारी करना। वही सोच आज बड़े पैमाने पर स्टॉप डैम के रूप में चाहिए। पहले बारिश पर्याप्त थी, जागरूकता कम थी, पर अब बारिश घट रही है और सारा जल बहकर चला जा रहा है।

नदी वरदान बने, अभिशाप नहीं।

इसलिए प्रत्येक 10-15 किलोमीटर में डायवर्शन एनीकट, स्टॉप डैम होने से बाढ़-नियंत्रण, आवागमन, जलस्रोत, कछार-बाड़ी का पुनर्जीवन एवं पर्यटन विकास होगा और तटवर्ती लोगों को स्वरोजगार मिलेगा, पलायन थमेगा। अन्यथा ट्रांस-महानदी क्षेत्र पलायन के लिए छत्तीसगढ़ में अभिशप्त है। उसके दिन फिरेंगे।

गुरु घासीदास, वीर नारायण सिंह की यह धरती अपना प्राचीन वैभव प्राप्त करेगी, जहाँ चंद्रपुर, शिवरीनारायण, गिरौदपुरी, सोनाखान, सिरपुर, राजिम आबाद रहेंगे।

गर्मी में सूखी रेत देखकर जो अभिशाप जैसा लगता है, वही नदी अगर साल भर थोड़ी-थोड़ी भरी रहे तो वही वरदान बन जाएगी।

सरकार के लिए यह नीति का विषय है - छत्तीसगढ़ सरकार और ओडिशा सरकार दोनों को इस दृष्टि से सोचना होगा। पानी को रोकना नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व में उपयोग करना। स्वस्थ वातावरण में महानदी जल-विवाद का यही समाधान है।

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी 
    जुनवानी चिखली, रायपुर छ ग 

जय महानदी, जय छत्तीसगढ़।