Thursday, October 8, 2026

संस्कृत कृत्रिम और शास्त्र भाषा हैं

संस्कृत कृत्रिम एवं शास्त्र भाषा है - एक ऐतिहासिक पुनर्पाठ
1. नाम में ही उत्पत्ति छिपी है

सम् + कृत = अच्छी तरह से गढ़ा हुआ, बनाया हुआ।

दुनिया की कोई भी प्राकृतिक भाषा अपने को "बनाई हुई" नहीं कहती। प्राकृत का अर्थ है जो प्रकृति से जन्मा है, लोगों के मुंह में है। संस्कृत का अर्थ है जिसका संस्कार किया गया है। संस्कार के लिए कच्चा माल चाहिए, और वह कच्चा माल प्राकृत और पाली थी। जैसे कच्चे आम से अचार बनता है, वैसे जनभाषा से प्रयोगशाला में संस्कृत बनी। व्याकरण से ही स्पष्ट है - प्राकृत प्रकृति है, संस्कृत उसकी परिष्कृति है।
अतः संस्कृत एक कृत्रिम राजभाषा हैं राजा, सामंत पुरोहित प्रभुवर्ग या देवगण कहलाते थे और गुरुकुल मे संस्कृत पढ़ा लिखा होने के कारण संस्कृत में वार्तालाप करते थे इसलिए संस्कृत को देववाणी एवं पाली प्राकृत इत्यादि को लोकवाणी कहें गए.

2. शिलालेखीय साक्ष्य: पत्थर झूठ नहीं बोलते

यदि संस्कृत सबसे प्राचीन होती, तो भारत के सबसे प्राचीन अभिलेख संस्कृत में होते। तथ्य उल्टा है।

क. मौर्य काल, 260 ईसा पूर्व: भारत के सबसे प्राचीन पठनीय शिलालेख अशोक के हैं। पूरे भारत में उनकी भाषा प्राकृत, पाली और सीमांत पर ग्रीक-अरामाइक है। एक भी पंक्ति संस्कृत में नहीं। अशोक ने प्रजा की भाषा चुनी।

ख. 400 साल का शून्य: अशोक के बाद शुंग, सातवाहन, इंडो-ग्रीक राजाओं के सैकड़ों शिलालेख और सिक्के मिलते हैं। भाषा वही - प्राकृत।

ग. पहला संस्कृत शिलालेख, 150 ईस्वी: शक राजा रुद्रदामन का जूनागढ़ शिलालेख संस्कृत का पहला लंबा काव्यात्मक शिलालेख है। अशोक से 400 साल बाद।

यह क्रम सिद्ध करता है - जो भाषा जनता की थी, वही पहले पत्थरों पर आई। जो दरबार में गढ़ी गई, वह बाद में आई।

3. भाषावैज्ञानिक साक्ष्य: सरल से जटिल की ओर

भाषा सरल से जटिल बनती है।

पाली-प्राकृत में - धम्म, कम्म, सच्च, मुह, पाणी - छोटे, बोलने में आसान शब्द।
संस्कृत में - धर्म, कर्म, सत्य, मुख, पाणि - उन्हीं को भारी, व्याकरण-बद्ध बनाया गया।

12-15 अक्षरों के लंबे समास, इको यणचि, अतो लोप: जैसे गणित के फॉर्मूले - यह जीवित जनभाषा की विशेषता नहीं, कंठस्थ करने की तकनीक है। रोज की बोली में कोई 15 अक्षर का शब्द नहीं बोलता।

पाणिनि ने चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में अष्टाध्यायी के लगभग 4000 सूत्रों में पहले से चली आ रही लोकभाषा को बाँधा, छाँटा और अपरिवर्तनीय बनाया। वे सृष्टिकर्ता नहीं, संपादक थे।

4. भाषा पर एकाधिकार कैसे बना?

जब किसी भाषा को देववाणी, अनादि, स्वर्ग-बैकुंठ की भाषा घोषित कर दिया जाता है, तो साधारण मनुष्य उसका अधिकारी नहीं रह जाता।

प्राकृत-पाली बौद्धों, जैनों, व्यापारियों, किसानों की भाषा थी - जातक, बुद्ध-उपदेश, लोकगाथाएं सब इसी में।

गुप्त काल में राजतंत्र ने जब इसे राजकीय संरक्षण और राजभाषा बनाया, तब भूमिदान-पत्र, प्रशस्ति, धर्मशास्त्र संस्कृत में लिखे जाने लगे। और फिर प्रचारित किया गया कि प्राकृत तो संस्कृत का अपभ्रंश है। यह उल्टा पाठ था। सच यह है कि मानक भाषा बोली का परिष्कार होती है, जैसे मानक हिंदी खड़ी बोली का परिष्कार है, अपभ्रंश नहीं।

इसी दैवीकरण से ज्ञान की भाषा वर्चस्व की भाषा बन गई और उस पर शैक्षणिक-धार्मिक एकाधिकार स्थापित हो गया।

निष्कर्ष

संस्कृत प्राचीन है, पर आदि नहीं है न ही इनसे भारतीय भाषाएं जन्मी हैं बल्कि लोक भाषाएँ से यह स्वयं विकसित हुई हैं। वह एक लंबी बोली-परंपरा का, बौद्धिक चेतना और राज्य-व्यवस्था द्वारा किया गया अंतिम, सबसे परिष्कृत और कृत्रिम संस्करण है। वह आकाश से नहीं उतरी, धरती पर ही, जनता की बोली से, व्याकरण की प्रयोगशाला में गढ़ी गई है।

डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
#anilbhattcg #सतसंधान

Wednesday, October 7, 2026

गुरु घासीदास पर लेखन।

गुरु घासीदास पर रसेल अंग्रेज सह लेखक हीरालाल  राजस्व अधिकारी पहले भारतीय थे। इनके रिपोर्ट वाहियात और सांप्रदायिक हैं।
   प्रायः हिंदू  लेखक द्वेषपूर्ण और निंदनीय लेखन ही करते रहें हैं।
प सुंदरलाल शर्मा जी प मिलाऊ दास कोसरिया के साथी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे के पहल से सर्वप्रथम सतनामी पुराण 1907 में लिखे हैं ।ऐसा जिक्र मिलता तो हैं पर आज पर्यंत देखने नहीं मिला और न ही उनकी कोई पंक्तियां उपलब्ध हुई हैं।
  फिर मनोहर दास नृसिंह के बाद अनवरत लेखन का सिलसिला चला और महज 50-55 वर्षों में छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक लेखन सतनाम पंथ और गुरुघासीदास पर हुआ।
उनके उपदेश अमृतवाणी जगजाहिर हुआ तथा भारतीय बौद्धिक जगत ऐसे मनीषी से परिचीत हुआ जो बुद्ध के बाद सबसे अधिक प्रखर और परम सत्य के उद्घोषक और प्रवर्तक हैं। उनके वाणी में कोई भ्रम नहीं कोई ऊहापोह नहीं और न ही परिकल्पना हैं बस सत्य का सीधा साक्षात्कार हैं।

Thursday, October 1, 2026

महानदी

प्रसंग महानदी जल विवाद 

"जाके पाँव न फटे बिवाई ओ क्या जाने पीर पराई " 

महानदी छत्तीसगढ़ और ओडिशा की जीवनरेखा है।
इसके तट पर बसे प्राचीन दक्षिण कोसल की राजधानी सिरपुर के ठीक सामने चिखली-जुनवानी मेरा गाँव है। हमारी घाट में भव्यतम लक्ष्मण देवालय के दर्शन होते हैं तो बाबा गंधेश्वरनाथ के शंख-घंटे की आवाज़ सुनते हुए हम बड़े हुए हैं। अपने खेत में बैठकर नदी को देखना - यह सिर्फ भूगोल नहीं है, यह हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है। नाव से नदी पार करते जीवन बीत रहा हैं। दो तीन बार तो नाव में डूबते डूबते बचे हैं। उलट धार एवं बाढ़ से अनेक जहरीले सांप घरों में घुस जाते हैं। मेरे बड़े पिताजी के सुपुत्र होनहार चंद्र कुमार सर्पदंश का शिकार हो गए। कई बार फसल डूब गए मुआवजा भी बड़ी मुश्किल से मिलते हैं इस तरह के अनेक दुर्घटनाओं से बचकर यहाँ तक आए हैं।
बाल्यावस्था में हमलोग दोनो भाई महानदी में बह गए थे। सुनील एक पेड़ की टहनी पकड़ लिए और इस तरह बचे। वे आगे चलकर पानी पंचायत अध्यक्ष, सरपंच और जिला पंचायत अध्यक्ष  बना। दूरद्रष्टा पिताश्री की चिंतन,भाई बंधु के अदम्य प्रयास , उत्साह से ही क्षेत्र के जनप्रतिनिधि गणों खासकर विधायक चाचा श्री रामलाल भारद्वाज के सार्थक पहल द्वारा जुनवानी से आगे समोदा ग्राम में महानदी में "समोदा डायवर्शन"  बनाने जैसी सोच विकसित हुई।

महानदी तटवर्ती जुनवानी-चिखली घाट के कृषक होने का सुख और दुःख हम एक साथ भोगते आ रहे हैं।
भारी बारिश में बाढ़ का तांडव और पानी नहीं गिरा तो गाँवों के जलस्रोतों को खींच लेना - यह दारुण दुःख था। जोगी जी की नीति, जोगी-डबरी योजना से प्रदेश में हैंडपंप उत्खनन हेतु बोर मशीन आई और तब कहीं जाकर राहत मिली।

इस तरह सुख यह है कि नदी पास है तो जीवन उत्सव है।
दुःख यह कि गर्मी में जब महानदी की जलधारा कम होती है तो वह आसपास के कुओं, तालाबों और हैंडपंपों का पानी भी खींच लेती है। नदी किनारे होकर भी प्यासे रह जाना - जीवन बेहद कष्टमय है। इससे बड़ा विरोधाभास क्या होगा?

मध्य प्रदेश में रहने और इस तरह की राजनैतिक चेतना  का अभाव या उपेक्षा का दंश प्रदेश वासी तटवर्ती लोग झेलते रहे हैं। संभवतः इसीलिए महानदी के प्रति जनमानस की आस्था गंगा-नर्मदा जैसी पनप नहीं पाई, जबकि यहाँ का जनजीवन बेहद सरल और आस्थावान है। परंतु नदी का महिमा-मंडन कर उससे लाभ लेना या पर्यटन आदि के लिए व्यावसायिक उपयोग करना यहाँ की सरलतम संस्कृति का अंग नहीं रहा। इसलिए कभी संरक्षण, संवर्धन एवं सौंदर्य के लिए स्थानीय लोगों में विचार भी नहीं पनप सका।

परंतु छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पड़े अकाल और उनसे निपटने के लिए कमर कसे प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी जी को हमारे पिताजी स्वर्गीय शिक्षक सुकाल दास भतपहरी, पानी पंचायत अध्यक्ष भाई सुनील एवं पिताजी के सहपाठी यशस्वी विधायक रामलाल भारद्वाज (भतपहरी) के माध्यम से महानदी के जल को डायवर्ट कर क्षेत्र के कृषकों के लिए योजना बनाने की सलाह दी गई। इसमें किंचित हमारा भी सोच और सहयोग रहा है। बाद में तत्कालीन पलारी विधायक शिव डहरिया जी का प्रयास रंग लाया फलस्वरूप समोदा डायवर्शन जैसी परियोजना ने आकार लिया और हमारे पलारी कॉलेज के प्रांगण में हुई विशाल जनसभा में माननीय अजीत जोगी जी ने इसकी घोषणा की। तब हमारा मन उल्लास और हर्ष से भर गया कि वर्षों का सपना साकार हो उठेगा। उस कार्यक्रम का मैं चश्मदीद गवाह रहा हूँ। 

हम लोगों की चाह केवल इतनी थी -
1. स्टॉप डैम/एनीकट बने ताकि दोनों ओर फैले रिश्तेदारों का सुगमतापूर्वक आवागमन हो सके। कोई बड़ा बाँध नहीं। बस इतना कि थोड़ा पानी रुके।
2. उद्देश्य पानी रोकना नहीं, निस्तार है - ताकि दोनों तटों के बीच आवागमन बना रहे, जल-भराव से रिचार्ज हो, कुआँ-तालाब-हैंडपंप जिंदा रहें।
3. रोज़ी-रोज़गार से जुड़े - मत्स्याखेट हो, कछार-बाड़ी में फसलें लहलहाएँ, जीवन खुशहाल हो।

परंतु अन्यान्य कारणों या जल-भराव की स्थिति के चलते इसे आरंग के पास निसदा डायवर्शन के रूप में यशस्वी डॉ रमन सिंह के कार्यकाल में निर्मित किया गया।

    समोदा में एनीकेट बना और उसे रायखेड़ा खरोरा के पॉवर प्लांट को पानी दिया जाने लगा।जो नहीं होना था, वह हो गया और संभवतः पानी के इस तरह व्यावसायिक उपयोग के कारण ओडिशा सरकार हस्तक्षेप कर रही है यह विचारणीय हैं। यही चंद्रपुर के समीप एनीकट का हुआ, जिसे निजी कंपनी को पानी सप्लाई की जा रही हैं। तब से ओडिशा जैसे मित्र और सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक रूप से एक रहे प्रदेश के साथ अनावश्यक तनाव निर्मित होने लगा।

तो क्या हम प्रदेशवासी, जिनकी सभी नदियों को अपने 280 किलोमीटर के बहाव क्षेत्र में निचोड़ कर ओडिशा ले जाती है, किंकर्तव्यविमूढ़ से देखते रहें और दुःख भोगते रहें? सवाल यह है।

4. हम प्रदेशवासी और सरकार कतई ओडिशा विरोधी नहीं हैं - महानदी 850 किलोमीटर लंबी है, जिसमें से 280 किलोमीटर ही छत्तीसगढ़ में बहती है। अरपा, पैरी, सोंढूर, शिवनाथ, हसदेव - छत्तीसगढ़ की लगभग सारी नदियों का पानी इसी 280 किलोमीटर में आकर महानदी में मिलता है और सीधे ओडिशा चला जाता है। सवाल वाजिब है कि क्या तटवर्ती छत्तीसगढ़ ही प्यासा रहे?

5. निस्तार प्राकृतिक हक है - जो पानी आपके क्षेत्र की बारिश और आपके नालों ने नदी में डाला है, उस पर तो स्थानीय लोगों का पहला अधिकार बनता है।

आपने अपने पिताजी के समय के नाला बाँधने वाले अभियानों का जिक्र किया - सामुदायिक सिंचाई, उद्वहन, बंधनी बाँधकर निस्तारी करना। वही सोच आज बड़े पैमाने पर स्टॉप डैम के रूप में चाहिए। पहले बारिश पर्याप्त थी, जागरूकता कम थी, पर अब बारिश घट रही है और सारा जल बहकर चला जा रहा है।

नदी वरदान बने, अभिशाप नहीं।

इसलिए प्रत्येक 10-15 किलोमीटर में डायवर्शन एनीकट, स्टॉप डैम होने से बाढ़-नियंत्रण, आवागमन, जलस्रोत, कछार-बाड़ी का पुनर्जीवन एवं पर्यटन विकास होगा और तटवर्ती लोगों को स्वरोजगार मिलेगा, पलायन थमेगा। अन्यथा ट्रांस-महानदी क्षेत्र पलायन के लिए छत्तीसगढ़ में अभिशप्त है। उसके दिन फिरेंगे।

गुरु घासीदास, वीर नारायण सिंह की यह धरती अपना प्राचीन वैभव प्राप्त करेगी, जहाँ चंद्रपुर, शिवरीनारायण, गिरौदपुरी, सोनाखान, सिरपुर, राजिम आबाद रहेंगे।

गर्मी में सूखी रेत देखकर जो अभिशाप जैसा लगता है, वही नदी अगर साल भर थोड़ी-थोड़ी भरी रहे तो वही वरदान बन जाएगी।

सरकार के लिए यह नीति का विषय है - छत्तीसगढ़ सरकार और ओडिशा सरकार दोनों को इस दृष्टि से सोचना होगा। पानी को रोकना नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व में उपयोग करना। स्वस्थ वातावरण में महानदी जल-विवाद का यही समाधान है।

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी 
    जुनवानी चिखली, रायपुर छ ग 

जय महानदी, जय छत्तीसगढ़।

Saturday, September 26, 2026

राजभाषा मास पर

राजभाषा मास के अवसर में
पिरथी म पहली मनखे आइन तेकर पाछू उनकर बोली/भाखा फूटिन अउ मुहावांही होय लगिन। लोगन मन भोजन, रोजी-रोजगार सेती बगरिन अउ एक दूसर संग मिंझरिन। धीरे-धीरे कुछेक लोगन धनवंता/गुनवंता होगिन राज-पाट मठ मंदिर आश्रम बनाइन इहा के भाखा बोली मन प्रसंस्करण (मानक पन) होय लगिन लिपि के बने ले यही हर राज काज अउ शास्त्र आदि के भाखा बनिस।

माने कि लोक भाखा आदिम काल से उद्धरित हवे उही हर छन के प्रसंस्करण होके लिपिबद्ध होय लगिस पाली प्राकृत संस्कृत फारसी लेटिन इंग्लिश चाइनीज अउ अन्य शास्त्रीय (क्लासिक) भाखा बनिस। ये मन उद्भव ले अवतरे के बाद पछा भागे बर लगे अइसें निथे भलुक धीरे-धीरे इनकर बढ़ोतरी होय लगिन ते पाय के गुनवंता मन कहिथे —

'भाखा के क्रमिक विकास ल समझे अउ समझाय ल परथे कोन्हो भी रुढ़-मुढ़ मान्यता ल माने से बूता न इ बनय।'

सिरतों कहे तो कोनो भी भाखा हर अलौकिक या दैवीय नोहय। ओहर इही लौकिक अउ जमौनी जिनिस होथे। जेन लोक म नान्ही नायक होथे ओकर चरित प्रेरक हो जथे ओकर गुनगान होय लगथे या जो समुदाय शासक वर्ग होथे ओकर आचार विचार बनथे लिखित म आथे ओहर समरिद्ध हो जथे। तहां ले ओकर महिमामय बरनन करे के रिवाज तको बन जाथे।

भाखा के प्रसंस्करण अउ समरिद्धी हर सतत चलैया प्रक्रिया आय। हमर हिन्दी हर दिल्ली अउ मेरठ के बीच राज काज में लगे मनसे मन के स्थानीय बोली अउ शासक वर्ग के भाखा के मिंझरे हुए सरूप आय। एकर सरूप हमन ल अमीर खुसरो ले ले के मध्यकालीन संत कवि परंपरा में दिखथे। फेर सच कहे त हिन्दी हर 1857 के क्रांति के बाद संपर्क भाखा के रूप म स्थानीय शासक अउ प्रभावशाली लोगन के बीच बौराय से आइस।

भारतेन्दु से लेकर प्रेमचंद तक उत्तरोत्तर विकास होय लगिन हमर छायावाद से लेकर प्रयोगवाद तक के नामी कवि लेखक मन बड़ सुघ्घर सरूप दिस। संगे सजग अनेक पत्र-पत्रिका अउ आकाशवाणी फिल्म मन हिन्दी सात समुन्दर पार पहुंचाइन। आज हिन्दी सर्वाधिक बोले जाने वाली भाखा के रूप म प्रतिष्ठित होय के अवस्था म हवय। फेर येहर अब भी राष्ट्र भाखा के रूप म ग्राह्य न इ होय पाय हे ए हर बड़ दुःख के बात आय।

असल में हर राज्य के भाखा ल राजभाखा अउ बहुसंख्यक समुदाय अउ स्वतंत्रता संग्राम के समय संपर्क के भाखा हिन्दी ल राष्ट्रीय भाखा घोषित करे के गंभीर प्रयास होना चाही। अंग्रेजी वैश्विक अउ आधुनिक ज्ञान विज्ञान के भाखा के रूप म प्रतिष्ठित हवय त ओला उही सरूप म अंगीकार करे जा सकत हे भलुक कर चुके हन।

अब पाठ्यक्रम में राष्ट्रीय स्तर म तीन भाखाई सिद्धान्त हवय त एमा राष्ट्रीय भाखा हिन्दी, राजभाखा (जैसे पंजाबी तमिल मलयालम मराठी उड़िया छत्तीसगढ़ी असमिया हर राज के भाखा) अउ अंतरराष्ट्रीय संपर्क भाखा अंग्रेजी म बनाय जाय। प्राचीन क्लासिक भाखा पाली प्राकृत संस्कृत अरबी फारसी आदि ल ऐच्छिक रखना चाहिए।

ऐसे करे से स्थानीय राजकीय भाखा मन के साथ संस्कृति हर तको जतनाही अउ प्रतिभा के समुचित विकास होही। नहि ते मातृभाखा (राजभाखा) ल छोड़ अन्य भाखा म नान्हे लइका मन शिक्षा दे जाही त अपन सीखे समझे उमर 14-15 साल तक ओहर भाखा के चक्कर म फदगे पड़े रही। स्कूल अउ घर के भाखा के चक्रव्यूह म फंस के रहि जाही।

छत्तीसगढ़ के संदर्भ म देखे जाय अबतक इहा ने छात्र मन न हिन्दी के होय सकय न संस्कृत के न अंग्रेजी के। तेन पाय के अखिल भारतीय स्तर म प्रतिभा के कमती केवल भाखाई रूप म ही झलकथे अउ आत्मविश्वास के कमती के सेती शासन प्रशासन म पिछवाय सरीख नजर आथे।

सच तो ए हवय कि — 'जोन समुदाय सचेत रहिथे ओकर सम्हला अउ जनता जथे अउ जोन समुदाय अचेत रथे ओकर भाखा बोली मन नंदावत चले जाथे।'

भाखा-बोली से संस्कृति तको प्रभावित होथे। वर्तमान म छत्तीसगढ़ी संस्कृति शहरी अउ मध्यमवर्गीय परिवार से विदाई होय के कगार म खड़े हवय। एला बचाय खातिर हमर शासन-प्रशासन ल पोठलग्गा अउ ठोसलग्गा बूता करेच ल परही।

डॉ. अनिल भतपहरी, सत श्री ऊँजियार सदन अमलीडीह, रायपुर

राजभाषा मास पर

राजभाषा मास के अवसर में

पिरथी म पहली मनखे आइन तेकर पाछू उनकर बोली/भाखा फूटिन अउ मुहावांही होय लगिन। लोगन मन भोजन, रोजी-रोजगार सेती बगरिन अउ एक दूसर संग मिंझरिन। धीरे-धीरे कुछेक लोगन धनवंता/गुनवंता होगिन राज-पाट मठ मंदिर आश्रम बनाइन इहा के भाखा बोली मन प्रसंस्करण (मानक पन) होय लगिन लिपि के बने ले यही हर राज काज अउ शास्त्र आदि के भाखा बनिस।

माने कि लोक भाखा आदिम काल से उद्धरित हवे उही हर छन के प्रसंस्करण होके लिपिबद्ध होय लगिस पाली प्राकृत संस्कृत फारसी लेटिन इंग्लिश चाइनीज अउ अन्य शास्त्रीय (क्लासिक) भाखा बनिस। ये मन उद्भव ले अवतरे के बाद पछा भागे बर लगे अइसें निथे भलुक धीरे-धीरे इनकर बढ़ोतरी होय लगिन ते पाय के गुनवंता मन कहिथे —

'भाखा के क्रमिक विकास ल समझे अउ समझाय ल परथे कोन्हो भी रुढ़-मुढ़ मान्यता ल माने से बूता न इ बनय।'

सिरतों कहे तो कोनो भी भाखा हर अलौकिक या दैवीय नोहय। ओहर इही लौकिक अउ जमौनी जिनिस होथे। जेन लोक म नान्ही नायक होथे ओकर चरित प्रेरक हो जथे ओकर गुनगान होय लगथे या जो समुदाय शासक वर्ग होथे ओकर आचार विचार बनथे लिखित म आथे ओहर समरिद्ध हो जथे। तहां ले ओकर महिमामय बरनन करे के रिवाज तको बन जाथे।

भाखा के प्रसंस्करण अउ समरिद्धी हर सतत चलैया प्रक्रिया आय। हमर हिन्दी हर दिल्ली अउ मेरठ के बीच राज काज में लगे मनसे मन के स्थानीय बोली अउ शासक वर्ग के भाखा के मिंझरे हुए सरूप आय। एकर सरूप हमन ल अमीर खुसरो ले ले के मध्यकालीन संत कवि परंपरा में दिखथे। फेर सच कहे त हिन्दी हर 1857 के क्रांति के बाद संपर्क भाखा के रूप म स्थानीय शासक अउ प्रभावशाली लोगन के बीच बौराय से आइस।

भारतेन्दु से लेकर प्रेमचंद तक उत्तरोत्तर विकास होय लगिन हमर छायावाद से लेकर प्रयोगवाद तक के नामी कवि लेखक मन बड़ सुघ्घर सरूप दिस। संगे सजग अनेक पत्र-पत्रिका अउ आकाशवाणी फिल्म मन हिन्दी सात समुन्दर पार पहुंचाइन। आज हिन्दी सर्वाधिक बोले जाने वाली भाखा के रूप म प्रतिष्ठित होय के अवस्था म हवय। फेर येहर अब भी राष्ट्र भाखा के रूप म ग्राह्य न इ होय पाय हे ए हर बड़ दुःख के बात आय।

असल में हर राज्य के भाखा ल राजभाखा अउ बहुसंख्यक समुदाय अउ स्वतंत्रता संग्राम के समय संपर्क के भाखा हिन्दी ल राष्ट्रीय भाखा घोषित करे के गंभीर प्रयास होना चाही। अंग्रेजी वैश्विक अउ आधुनिक ज्ञान विज्ञान के भाखा के रूप म प्रतिष्ठित हवय त ओला उही सरूप म अंगीकार करे जा सकत हे भलुक कर चुके हन।

अब पाठ्यक्रम में राष्ट्रीय स्तर म तीन भाखाई सिद्धान्त हवय त एमा राष्ट्रीय भाखा हिन्दी, राजभाखा (जैसे पंजाबी तमिल मलयालम मराठी उड़िया छत्तीसगढ़ी असमिया हर राज के भाखा) अउ अंतरराष्ट्रीय संपर्क भाखा अंग्रेजी म बनाय जाय। प्राचीन क्लासिक भाखा पाली प्राकृत संस्कृत अरबी फारसी आदि ल ऐच्छिक रखना चाहिए।

ऐसे करे से स्थानीय राजकीय भाखा मन के साथ संस्कृति हर तको जतनाही अउ प्रतिभा के समुचित विकास होही। नहि ते मातृभाखा (राजभाखा) ल छोड़ अन्य भाखा म नान्हे लइका मन शिक्षा दे जाही त अपन सीखे समझे उमर 14-15 साल तक ओहर भाखा के चक्कर म फदगे पड़े रही। स्कूल अउ घर के भाखा के चक्रव्यूह म फंस के रहि जाही।

छत्तीसगढ़ के संदर्भ म देखे जाय अबतक इहा ने छात्र मन न हिन्दी के होय सकय न संस्कृत के न अंग्रेजी के। तेन पाय के अखिल भारतीय स्तर म प्रतिभा के कमती केवल भाखाई रूप म ही झलकथे अउ आत्मविश्वास के कमती के सेती शासन प्रशासन म पिछवाय सरीख नजर आथे।

सच तो ए हवय कि — 'जोन समुदाय सचेत रहिथे ओकर सम्हला अउ जनता जथे अउ जोन समुदाय अचेत रथे ओकर भाखा बोली मन नंदावत चले जाथे।'

भाखा-बोली से संस्कृति तको प्रभावित होथे। वर्तमान म छत्तीसगढ़ी संस्कृति शहरी अउ मध्यमवर्गीय परिवार से विदाई होय के कगार म खड़े हवय। एला बचाय खातिर हमर शासन-प्रशासन ल पोठलग्गा अउ ठोसलग्गा बूता करेच ल परही।

डॉ. अनिल भतपहरी, सत श्री ऊँजियार सदन अमलीडीह, रायपुर

Friday, September 25, 2026

गुरुगद्दी पूजा एवं गुरुदर्शन मेला

सतनाम धर्म-संस्कृति का मांगलिक अनुष्ठान:
गुरुगद्दी पूजा एवं गुरुदर्शन मेला महोत्सव (1825-2025 : 200वाँ वर्ष)


डॉ. अनिल भतपहरी
9617777514
सतश्री उंजियार-सदन, अमलीडीह, रायपुर (छ.ग.)

____________________________________________________________

सारांश

प्रस्तुत शोध-पत्र में सतनाम धर्म-संस्कृति के सर्वाधिक प्राचीन एवं वृहद् मांगलिक अनुष्ठान — गुरुगद्दी पूजा महोत्सव एवं गुरुदर्शन मेला — का ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सामाजिक विश्लेषण किया गया है। क्वार शुक्ल एकम से दशमी तक आयोजित दस दिवसीय इस महापर्व की परंपरा 1825 में मोती महल गुरुद्वारा, भंडारपुरी के उद्घाटन एवं राजा गुरु बालकदास के राज्याभिषेक से जुड़ी है। 1860 के बाद बाधित हुई इस परंपरा का 1985 में ग्राम जुनवानी से पुनरुद्धार हुआ। यह अध्ययन इस आयोजन को दुःख-दशहरा पर्व के रूप में व्याख्यायित करते हुए इसके समाज-संगठन, ज्ञान-हस्तांतरण एवं लोककल्याणकारी आयामों को रेखांकित करता है।

1. प्रस्तावना

सतनाम धर्म-संस्कृति में क्वार शुक्ल एकम से दशमी तक आयोजित 'गुरुगद्दी पूजा महोत्सव' और समापन पर भव्य शोभायात्रा का आयोजन, गुरुघासीदास के पुत्र राजा गुरु बालकदास के राज्याभिषेक और उनकी शान में मनाए जाने वाले राज दशहरा पर्व की शोभायात्रा का मांगलिक अनुष्ठान है।

2. आयोजन विधि

क्वार शुक्ल एकम से दशमी तक यह आयोजन होता है। दशमी को सतधरा स्नान कर गुरुगद्दी व सतनाम ज्योत कलश को शोभायात्रा द्वारा सतनाम भवन में स्थापित जोत में समाहित कर देते हैं। दूसरे दिन पंथी नर्तक दल और अखाड़े वाले क्वार एकादशी को गुरुदर्शन मेला, भंडारपुरी जाते हैं। वहाँ हाथी-घोड़ों के भव्य जुलूस, अनेक करतब, पंथी नृत्य और अखाड़ों का प्रदर्शन होता है।

दसवें दिन 'सद्गुरु आसन' की प्रातः शोभायात्रा निकालकर ग्राम की गलियों की परिक्रमा कराई जाती है। सदानीरा नदी-सरोवर के समीप जल-परछन कराकर वापस गुरुद्वारा में अथवा श्रद्धालु अपने घर में आगामी उत्सव तक नित्य पूजा-अर्चना हेतु स्थापित करता है। शाम को तेलासी, अमसेना, खपरी, बोड़सरा, खडुआ आदि गुरु-वंशजों के दर्शनार्थ शोभायात्रा जाती है।

3. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

कुछ विद्वानों के अनुसार यह परंपरा अशोक दशहरा है, जो सतनाम संस्कृति में आंशिक संशोधन के बाद 1820 के बाद प्रचलित हुई। तब साक्षात् गुरुघासीदास इस आयोजन के सूत्रधार थे।

छत्तीसगढ़ में स्थापित सतनाम धर्म का यह उत्सव 1825 से चला आ रहा है, जब मोती महल गुरुद्वारा का उद्घाटन हुआ और राजा घोषित होने के बाद चतुरंगी सेना सजाकर सद्गुरु घासीदास के मंझले पुत्र राजा गुरु बालकदास, भाई आगरदास, पुत्र साहेबदास हाथी पर सवार होकर आमजन के बीच आए और गुरु-उपदेशना व पंथ-संचालन हेतु दिशा-निर्देशन किया।

सन् 1860 में राजा गुरु बालकदास की हत्या, नेतृत्व-शून्यता, भीषण अकाल तथा बोड़सरा बाड़ा व तेलासी बाड़ा के महाजनों के आधिपत्य एवं सामाजिक उथल-पुथल के कारण यह आयोजन स्थगित हो गया। केवल राज-दशहरा, गुरुदर्शन मेले के नाम पर भंडारपुरी में एक दिवसीय होता रहा।

4. पुनरुद्धार (1985)

इसे पूर्ववत तेजस्वी स्वरूप देते हुए नवकलेवर के साथ, भंडारपुरी के समीपस्थ ग्राम जुनवानी में शिक्षक सुकालदास भतपहरी एवं मध्य बाल समाज व युवा जागृति मंच के संयुक्त तत्वावधान में 1985 में दस दिवसीय आयोजन किया गया। उसके बाद गाँव-गाँव में दस दिवसीय गुरुगद्दी पूजा महोत्सव का व्यवस्थित पुनरारंभ हुआ, जो आज सैकड़ों ग्रामों/कस्बों/शहरों में उत्साहपूर्वक मनाया जा रहा है। गुरुगद्दी पूजा महोत्सव के 42वें वर्ष का आयोजन इस वर्ष ग्राम जुनवानी में हो रहा है।

5. गुरुगद्दी पूजा समापन और दुःख-दशहरा पर्व

सतनाम धर्म की चारों शाखाओं और देश-विदेश में निवासरत सतनामियों में गुरुगद्दी पूजा विधान प्रचलित है। गुरुगद्दी सद्गुरु का आसन है, जिस पर आसीन होकर वे अनुयायियों को धर्मोपदेश देते हैं और उनके तमाम उलझनों, परेशानियों और दसों तरह के दुःख-व्याधि के हरण का उपाय बताते हैं — इसलिए यह दुःख-दशहरा पर्व भी है।

दस दिवसीय महापर्व में नित्य प्रातः-सायं आरती-पूजा के साथ संत-महंत-गुरुओं द्वारा ज्ञानवर्धक व्याख्यान, सत्संग-प्रवचन, गुरु ग्रंथ व चरित का पाठ एवं लोक कलाकारों द्वारा प्रेरक व मनोरंजक नाट्य-मंचन, गायन व नर्तन होता है। कहीं-कहीं हर शाम सामूहिक भोग-भंडारा होता है। इस विकट समय में जब फसलें खेत में हैं और अन्नागार खाली होते हैं, साधन-सक्षम लोग अन्नदान कर भंडारा चलाते हैं ताकि गरीब, वृद्ध, महिलाओं व बच्चों को गुरुप्रसादी मिल सके।

6. गुरुदर्शन मेला, भंडारपुरी

दूसरे दिन जगप्रसिद्ध भंडारपुरी गुरुदर्शन दशहरा पर्व हर्षोल्लासपूर्वक मनाया जाता है। इस दिन हाथी, घोड़े, ऊँट, पैदल चतुरंगी शोभायात्रा, गुरु-वंशजों व गुरुगद्दी नशीन धर्मगुरु का उपदेश व प्रवचन होता है। सतनामियों का यह सबसे बड़ा और प्राचीन महोत्सव है, जहाँ गुरुवंशज के घर से गुरुप्रसादी भोग-भंडारा पाकर श्रद्धालुगण धन्य हो जाते हैं। देशभर के लाखों श्रद्धालु एकत्र होते हैं।

7. सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व

इस महाआयोजन से समाज सुसंगठित होता है। उपस्थित गाँवों के मुखिया/प्रतिनिधिगण यहाँ से सीखी-समझी बातों को अपने-अपने ग्रामों में संचालित करते हैं। इसलिए सतनाम संस्कृति में 'गुरुदर्शन मेला' का अतिशय महत्व है। गुरुगद्दी पूजा महोत्सव का आयोजन प्रत्येक सतनामी ग्राम में होना चाहिए। दस दिनों तक सामूहिक आयोजन से लोग सामाजिक व धार्मिक कार्यों में प्रवृत्त होते हैं, संगठित होते हैं और वर्षभर की कटुताओं का समापन होता है। नई पीढ़ी को समृद्धशाली संस्कृति का हस्तांतरण होता है — यही इस आयोजन का प्रमुख उद्देश्य है।

8. निष्कर्ष

1825 से 2025 तक 200 वर्षों की यह परंपरा सतनाम धर्म की जीवंतता, संगठन-शक्ति एवं लोकमंगलकारी चेतना का प्रमाण है। 1985 के पुनरुद्धार के बाद यह महोत्सव पुनः जन-जन का पर्व बन गया है।

संदर्भ / चित्र सूची

चित्र-1: मोती महल गुरुद्वारा, भंडारपुरी (लेखक द्वारा 1993 में स्वकैमरे से ली गई फोटो)

चित्र-2: सद्गुरु आसन, गुरुगद्दी पूजा महोत्सव, अमलीडीह

चित्र-3: गुरुगद्दी पूजा महोत्सव स्थल में गुरु सतखोजन साहेब के साथ आयोजक मंडल, रायपुर

।। जय सतनाम ।।

Thursday, September 24, 2026

बदरिया बरसे भादों में रिमझिम

लेव, पूरा गीत बना दे हौं - पुराना लोकगीत के रंग म -

"बदरवा बरसे भादो म"

- स्थायी -
बदरवा बरसे भादो म रिमझिम
सुरता सजनवा के आए पल छीन
कास फूल फुले सकल महि छाई
बरसा बीते बेगी सजन घर आई

- अंतरा 1 -
ताल-तलैया भर गए, डहर डुबान
पंछी तको जोड़ी म, मोर सुनसान
अंखियां थक गे मोर, राह निहारे
कब ले अइहौ कहिके, दिन ल गिनारे

- अंतरा 2 -
भादो के अंधियारी, बिजुरी चमके
पिया-पिया बोले पपिहा, जिया तरसे
महुआ मोर महके, मन मोर बहके
सपना म आके सजना, काबर छलके

- अंतरा 3 -
धान के बाली झूमे, खेत लहराए
संगी-सहेली सबके, पिया घर आए
मोरो आंगना सूना, तुंही बिन सजना
बेगि आ जा रे, तोर बिन जिया न लागे सजना

 दादरा - कहरवा ताल म