Thursday, September 24, 2026

बदरिया बरसे भादों में रिमझिम

लेव, पूरा गीत बना दे हौं - पुराना लोकगीत के रंग म -

"बदरवा बरसे भादो म"

- स्थायी -
बदरवा बरसे भादो म रिमझिम
सुरता सजनवा के आए पल छीन
कास फूल फुले सकल महि छाई
बरसा बीते बेगी सजन घर आई

- अंतरा 1 -
ताल-तलैया भर गए, डहर डुबान
पंछी तको जोड़ी म, मोर सुनसान
अंखियां थक गे मोर, राह निहारे
कब ले अइहौ कहिके, दिन ल गिनारे

- अंतरा 2 -
भादो के अंधियारी, बिजुरी चमके
पिया-पिया बोले पपिहा, जिया तरसे
महुआ मोर महके, मन मोर बहके
सपना म आके सजना, काबर छलके

- अंतरा 3 -
धान के बाली झूमे, खेत लहराए
संगी-सहेली सबके, पिया घर आए
मोरो आंगना सूना, तुंही बिन सजना
बेगि आ जा रे, तोर बिन जिया न लागे सजना

 दादरा - कहरवा ताल म

Wednesday, September 23, 2026

अमृतवाणी का परीक्षण एवं संशोधन

सतनामी अमृतवाणी में प्रक्षिप्त अंशों का परीक्षण और संशोधन

कार्यकारी सारांश

प्रचलित 42 अमृतवाणियों की सूची में सम्मिलित वाणी क्रमांक 14 — "ज्ञान पंथ कृपाण के धारा" — गुरु घासीदास की मौलिक वाणी नहीं है। यह गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में दोहा 114 के बाद की चौपाई "ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा" का रूपांतरण है 1 2। इसका भावार्थ मानस में ज्ञानमार्ग की कठिनता के संदर्भ में है, जबकि सतनाम सिद्धांत में ज्ञान का अर्थ समता, सत्याचरण और अंधविश्वास-खंडन है। अतः इसे अमृतवाणी संग्रह से पृथक कर स्रोत-टिप्पणी के साथ परिशिष्ट में रखना उचित है। इसी कसौटी पर कई अन्य प्रचलित वाणियों में भी परवर्ती प्रक्षेप, ब्राह्मणीकरण और भाषिक विकृति के लक्षण मिलते हैं, जिनका प्रगतिशील सतनामी समाज के साहित्य प्रकोष्ठ द्वारा सर्वसम्मत पाठ-संशोधन आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

1. "ज्ञान पंथ कृपाण के धारा" का मूल स्रोत

1.1 मानस में प्रसंग

उत्तरकाण्ड में काकभुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं:

ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा॥
जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई॥

भावार्थ: ज्ञान का मार्ग दोधारी तलवार की धार के समान है; इस पर गिरते देर नहीं लगती 1 2।

यह संवाद भक्ति बनाम ज्ञान की तुलसीदासीय मीमांसा का भाग है, जिसमें अंततः भक्ति की सुगमता प्रतिपादित की गई है।

1.2 सतनामी सूची में प्रवेश कैसे हुआ

प्रचलित 42 अमृतवाणियों की सूची में क्रमांक 14 पर "गियान के पंथ किरपान के धार ये" दर्ज है 3। छत्तीसगढ़ी मौखिक परंपरा में पंथी गायकों और कथा-वाचकों के माध्यम से मानस की पंक्तियाँ लोक में घुल गईं। उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में मुद्रित गुटकों में बिना स्रोत-परीक्षण के इसका समावेश हो गया।

1.3 सैद्धांतिक विरोधाभास

गुरु घासीदास का ज्ञान बौद्ध-सहज परंपरा का "सतबोध" है — पाली "एस धम्मो सनंतनो" की अनुगूंज, अर्थात बैर को अबैर से, अंधकार को प्रकाश से काटना 4। यह ज्ञान दुर्गम तलवार-धार नहीं, बल्कि आचरण में उतारने योग्य सरल सत्य है: "सतनाम ल अपन आचरण में उतारव" और "अंधविश्वास, रूढ़िवाद ल झन मानव" 3। अतः मानस की ज्ञान-भय वाली पंक्ति सतनाम दर्शन के अनुकूल नहीं है।

संशोधन प्रस्ताव: इस पंक्ति को अमृतवाणी की मुख्य सूची से हटाकर "परवर्ती लोक-प्रचलित सूक्ति (स्रोत: रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड)" शीर्षक से परिशिष्ट में रखा जाए।

2. संदिग्ध वाणियों की पहचान की कसौटी

प्रगतिशील सतनामी समाज के साहित्य प्रकोष्ठ की सर्वसम्मति को आगे बढ़ाने हेतु निम्नलिखित पाठालोचन कसौटियाँ प्रस्तावित हैं:

कसौटीविवरण
स्रोत-संगतिवाणी गुरु घासीदास के समकालीन शिष्यों, पंथी गीतों के प्राचीन रूपों या विश्वसनीय पांडुलिपियों में मिलती है या नहीं
सिद्धांत-संगतिसप्त सिद्धांत — सतनाम-निष्ठा, मूर्तिपूजा-निषेध, जातिभेद-खंडन, जीव-हिंसा निषेध, नशा-निषेध, परस्त्री-मातृभाव, चोरी-जुआ त्याग — के अनुकूल है या नहीं 5
भाषा-संगतिछत्तीसगढ़ी/पाली-प्राकृत मूल की सहज छटा बनाम खड़ी बोली-सanskritनिष्ठ परवर्ती शब्दावली
दर्शन-संगतिपुनर्जन्म-खंडन, पुरोहित-माध्यम निषेध और श्रम-प्रतिष्ठा जैसे सतनामी वैशिष्ट्य के अनुरूपता

3. अन्य संदिग्ध वाणियों का विश्लेषण

प्रचलित पाठसमस्याविश्लेषण और प्रस्तावित संशोधन
पानी पीहू छान के, गुरु बनाहू जान केकबीरपंथी दोहा "पानी पीवै छान के" का स्पष्ट अनुकरण; गुरु-महिमा का ब्राह्मणवादी अतिरेकसतनाम में गुरु का अर्थ सतबोध देने वाला मार्गदर्शक है, अवतारी मध्यस्थ नहीं। प्रस्तावित पाठ: "सतनाम ल जानव, समझव, परखव तब मानव" को ही प्रामाणिक रखा जाए 3। इस दोहे को परिशिष्ट में "कबीर-साहब की परंपरा से आई लोकसूक्ति" टिप्पणी सहित रखा जाए
इही जनम ल सुधारना साँचा ये (पुनर्जन्म के गोठ झूठ आय) — विकृत व्याख्या सहितकुछ संस्करणों में इसे कर्मकांडीय पुनर्जन्म-स्वीकृति से जोड़ा गयागुरु घासीदास की मूल स्थापना इहलोकवादी है: इसी जीवन का सुधार ही सत्य है। ब्राह्मणवादी परलोक-भय जोड़ने वाले अंश हटाए जाएँ। मूल भाव: "इही जनम ल सुधारव, सतकर्म ही पूजा आय"
मोर ह सब्बो संत के आय अउ तोर ह मोर बर कीरा येसंत-महिमा के नाम पर गुरु को ईश्वर-तुल्य अतिमानव बनानासप्त सिद्धांत में सतनाम पर अडिग विश्वास है, व्यक्ति-पूजा नहीं 5। यह पंक्ति मूर्तिपूजा-निषेध और समता-सिद्धांत के विरुद्ध जाती है। इसे हटाकर "जतेक हव सब मोर संत आव" के समतावादी पाठ को रखा जाए
तरिया बनावव, कुआँ बनावव... फेर मंदिर बनई मोर मन नई आवयउत्तरार्ध में कुछ मुद्रणों में "मंदिर" को "धर्मशाला" से बदलनामूल निषेध मंदिर-संस्कृति का है, जो सतनाम के निराकार-सत्य बोध के अनुकूल है 3। प्रक्षिप्त नरम पाठ ("धर्मशाला") हटाकर मूल कठोर पाठ पुनः स्थापित किया जाए
जइसे खाहु अन्न वैसे बनही मनआयुर्वेदीय-वर्णाश्रमी आहार-शुद्धि सिद्धांत का प्रवेशगुरु घासीदास का बल श्रम के रोटी ("मेहनत के रोटी ह सुख के आधार आय") और मद्य-मांस निषेध पर है, आहार-जातिवाद पर नहीं। इसे सीमित टिप्पणी के साथ रखा जाए, सिद्धांत न बनाया जाए

4. साहित्य प्रकोष्ठ की सर्वसम्मति को आगे बढ़ाने हेतु सुझाव

  1. त्रिस्तरीय संग्रह प्रकाशित हो: (क) प्रामाणिक अमृतवाणी — सप्त सिद्धांत से सत्यापित; (ख) परिशिष्ट — लोकप्रचलित पर संदिग्ध सूक्तियाँ स्रोत-टिप्पणी सहित; (ग) त्याज्य प्रक्षेप — सिद्धांत-विरुद्ध अंश।
  2. पांडुलिपि सर्वेक्षण: गिरौदपुरी, भंडारपुरी और पंथी गायकों के घरानों से पुरानी पोथियों, पंथी गीतों के बोल और ब्रिटिश-कालीन गजेटियर विवरणों का तुलनात्मक संकलन किया जाए।
  3. भाषा-परिशोधन: खड़ी बोली में संस्कृतनिष्ठ किए गए पाठों को छत्तीसगढ़ी मूल की ओर लौटाया जाए, क्योंकि छत्तीसगढ़ी पाली-प्राकृत का ही स्वरूप है और शिलालेखों में इसका साक्ष्य सुरक्षित है 4।
  4. पाठ्यपुस्तक टिप्पणी: प्रत्येक अमृतवाणी के साथ सप्त सिद्धांत से संबंध, स्रोत और प्रक्षेप-आशंका की संक्षिप्त टिप्पणी दी जाए ताकि आगामी पीढ़ी अंधानुकरण न करे।

निष्कर्ष

"ज्ञान पंथ कृपाण के धारा" निस्संदेह रामचरितमानस की पंक्ति है, गुरु घासीदास की अमृतवाणी नहीं। इसे हटाना किसी परंपरा का अपमान नहीं, बल्कि सतनाम परंपरा की शुद्धि है। यही दृष्टि अन्य संदिग्ध वाणियों पर लागू होने से सतनाम साहित्य अपने मूल इहलोकवादी, समतावादी और अंधविश्वास-विरोधी स्वरूप में पुनः प्रतिष्ठित होगा — जैसा प्रगतिशील सतनामी समाज के साहित्य प्रकोष्ठ ने वर्षों पूर्व सर्वसम्मति से स्वीकार किया था। उस सर्वसम्मति को मुद्रित, प्रचारित और पाठ्यक्रमों में स्थापित करना ही इस समय का कर्तव्य है।

Sources

1 Bhavpath Seva Sansthan — Uttar Kand PDF
2 Scribd — Uttarkand in Hindi Chaupaai With Meaning
3 Lalluram — Guru Ghasidas Jaynti: 7 principles and 42 Amritvani
4 Anil Bhatpahari — Satnam hi Sanatan hain
5 Wikipedia — Guru Ghasidas


Saturday, September 19, 2026

सतनामी अनुसूचित जाति के श्रेणी में: एक अध्ययन

अनुसूचित जाति वर्ग में सतनामी को सम्मिलित करने से जो पेशागत भ्रम  निर्मित हुआ हैं और सामाजिक भेदभाव के साथ बहुसंख्यकों द्वारा प्रायोजित दमन दलन हुआ हैं उन्हें  समझे बिना सामाजिक न्याय अधूरा है
भारतीय समाज में ‘अनुसूचित जाति’ को प्रायः एक समान वर्ग समझ लिया जाता है। आरक्षण और कल्याणकारी सुविधाओं के कारण यह भ्रम और गहरा हुआ है कि इस सूची में सम्मिलित सभी समुदायों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एक जैसी रही होगी। वस्तुतः सत्य इससे भिन्न है। ब्रिटिशकालीन जनगणनाओं और तत्कालीन आंदोलनों को ध्यान से देखें तो स्पष्ट दो धाराएं दिखाई देती हैं — एक अस्पृश्य (Untouchables) मानी गई जातियों की, और दूसरी दबाई गई (Depressed Classes) जातियों की।
ब्रिटिश काल में शब्दों का वर्गीकरण
1911 की जनगणना में अंग्रेजों ने पहली बार जातियों की गणना धर्म और सामाजिक स्थिति के आधार पर की। 1916 में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में यह स्पष्ट किया गया कि शासकीय दस्तावेजों में ‘Depressed Classes’ शब्द ‘Untouchables’ के पर्याय के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा है, क्योंकि ‘Untouchable’ शब्द से ठेस पहुँचती है।

कागज पर दोनों शब्द एक कर दिए गए, पर जमीनी सच्चाई दो प्रकार की थी।

1. अस्पृश्य माना गया वर्ग
ये वे जातियां थीं जो हिन्दू वर्ण-व्यवस्था के भीतर होते हुए भी अस्पृश्यता का दंश झेलती थीं। इनके पारंपरिक कार्यों को अशुद्ध माना गया — जैसे मैला और नाली की सफाई करने वाले मेहतर, भंगी, डोम; चमड़े का कार्य करने वाले चमार, मोची; वस्त्र धोने वाले धोबी; कुछ क्षेत्रों में केशकर्तन करने वाले नाई; शव उठाने और मृत पशु उठाने वाले समुदाय। इन्हें छूना पाप माना जाता था। इन्हें गांव के बाहर बसाया जाता था, कुएं से जल लेने और मंदिर में प्रवेश से वंचित रखा जाता था।

2. दबाया गया वर्ग — Depressed Class
ये समुदाय अस्पृश्यता वाले पेशे नहीं करते थे, फिर भी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से जानबूझकर दबा दिए गए। इसके दो प्रधान कारण थे।

पहला, वैचारिक अस्वीकृति। इन्होंने ब्राह्मणवादी रीति-नीति और पुरोहितवाद को मानने से इनकार कर दिया। इनकी अपनी उपासना-पद्धति, अपने देवी-देवता और अपने धर्मगुरु थे — जैसे आदिवासी मूल के अनेक समुदाय, कबीरपंथी, सतनामी। ये वेद-पुराण और पुरोहित की सत्ता को अंतिम प्रमाण नहीं मानते थे।

दूसरा, अधिकार की मांग पर दमन। जब इन समुदायों ने भूमि, मजदूरी और बराबरी की बात उठाई, तो गांव की प्रभावशाली जातियों ने मिलकर इनका सामाजिक बहिष्कार किया, बेदखल किया, मजदूरी बंद की और अमानवीय व्यवहार किया।

इसीलिए इन्हें ‘Depressed’ कहा गया — अर्थात् सुनियोजित रूप से दबाया गया वर्ग।

बाद में 1930 में स्टार्टे समिति और साइमन कमीशन ने इस वर्गीकरण को और उलझा दिया। कभी आदिवासियों को, कभी पिछड़ी जातियों को भी इसी श्रेणी में गिना गया। अंततः 1931 की जनगणना के आधार पर भारत शासन अधिनियम 1935 बना, जो 1937 में लागू हुआ। उसी अधिनियम की Depressed Classes की सूची ही आगे चलकर अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) कहलाई।
छत्तीसगढ़ में सतनामी : दलन के विरुद्ध स्वाभिमान का इतिहास
इस प्रसंग में छत्तीसगढ़ के सतनामी समुदाय का उदाहरण अत्यंत महत्वपूर्ण है।

गुरु घासीदास जी ने घोर तपस्या से प्राप्त आत्मज्ञान के बाद गिरौदपुरी के वन्य ग्राम से सतनाम के सप्त सिद्धांतों का उपदेश दिया। यहीं छत्तीसगढ़ की धरती पर प्रथम जातिविहीन समुदाय ‘सतनाम पंथ’ की स्थापना हुई।

इतिहासकारों के अनुसार सतनामी मूलतः खेतिहर कृषक थे। उन्होंने जाति-व्यवस्था का त्याग कर हिन्दू व्यवस्था के भीतर ही एक नये पंथ का निर्माण किया। उनका उद्देश्य श्रमिकों और भूमिदासों की सामाजिक स्थिति सुधारना तथा उन्हें बहुदेववाद, पुरोहितवाद और अनेक कर्मकांडों से मुक्त कर एकेश्वरवादी ‘सतनाम’ की उपासना से जोड़ना था।

जिसने पूर्व मान्यताओं को नहीं माना, उसे दबाया गया, बहिष्कृत और तिरस्कृत किया गया। यह ‘Depressed’ की परिभाषा में पूर्णतः बैठता है।

यही कारण है कि जब सतनामियों को उनके मूल कृषि-कर्म के स्थान पर पौनी-पेशा कार्य करने वाला कहकर संबोधित किया जाता है, तो समुदाय प्रखर विरोध करता है। आजादी के बाद भी जब कभी गजेटियरों या दस्तावेजों में भ्रामक जानकारी के आधार पर नये रचनाकार या शोधार्थी ऐसा लिखते हैं, तो भावनाएं आहत होती हैं। उल्लेखनीय है कि 1926 में ही विवादित जाति-संज्ञा को शासकीय दस्तावेजों से विलोपित करने का आदेश तत्कालीन गवर्नर बटलर एवं विल्सन के हस्ताक्षर से जारी हो चुका था, जिसकी प्रतियां सर्वत्र उपलब्ध हैं और उसी आधार पर शासकीय कार्य संपादित होते आ रहे हैं।

इतिहास का एक मार्मिक मोड़ यह भी है कि सतनामी दबाने से दबे नहीं, बल्कि उनके प्रभाव में कुछ अस्पृश्य मानी जाने वाली जातियां आने लगीं। तब सभी हिन्दू जातियों ने मिलकर सतनामियों से ही छुआछूत का व्यवहार करना आरंभ कर दिया।
जनगणना की राजनीति और हिन्दू महासभा
ब्रिटिश काल में जब मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा का गठन हुआ और संख्या-बल के आधार पर बड़े नेतृत्व उभरने लगे, तब हिन्दू महासभा ने दबाए गए समुदायों को साथ लेने की रणनीति अपनाई। अंग्रेजों के समक्ष हिन्दुओं की जनसंख्या न घटे, इस उद्देश्य से सिख हिन्दू महासभा, सतनामी हिन्दू महासभा जैसे संगठन बनाए गए।

1932 के कम्युनल अवार्ड और उसके बाद हुए पूना समझौते (यरवदा पैक्ट) में Depressed Classes के लिए पृथक निर्वाचक मंडल का प्रश्न उठा था। उसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में यह संगठनात्मक प्रयास हुआ था।
निष्कर्ष
आज अनुसूचित जाति एक कानूनी-प्रशासनिक श्रेणी है, जिसका आधार 1935 का अधिनियम है। उसके अंतर्गत कल्याण और मुख्यधारा में लाने हेतु विशेष प्रावधान किए गए हैं। परंतु उसके भीतर दो ऐतिहासिक धाराएं स्पष्ट हैं — एक वह जिसे पेशे के कारण अशुद्ध ठहराकर अस्पृश्य माना गया, और दूसरी वह जिसे स्वतंत्र विचार और अधिकार की मांग के कारण जानबूझकर दबाया गया।

छत्तीसगढ़ के सतनामी दूसरी धारा के सबसे बड़े और जीवंत उदाहरण हैं। इस भेद को समझे बिना न तो इतिहास का सही मूल्यांकन संभव है, न ही सामाजिक न्याय की सार्थक बहस।

  डॉ.अनिल कुमार भतपहरी 
       9617777514
जुनवानी अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़ 

अक्षुण्य पुण्यम ( हास्य व्यंग्य एकांकी)

[पर्दा उठता है। मंच दो भागों में बँटा है। एक ओर चित्रगुप्त का दफ्तर, बड़ी बही। दूसरी ओर "स्वर्ग चखना सेंटर" का बोर्ड लगा ठेका-स्टाइल ढाबा। सूत्रधार आता है।]

सूत्रधार : देवियों और सज्जनों! आज का विषय है गूढ़ दर्शन — क्षुण्य क्या, अक्षुण्य क्या? हमारे ऋषियों ने कहा — जो क्षय न हो, वही अक्षुण्य। और हमारे व्हाट्सऐप ऋषियों ने इसका नव-भाष्य किया है। प्रस्तुत है — चार्वाक पुनरागमनम्!

[अंक 1 : चित्रगुप्त का दफ्तर]

चित्रगुप्त : भोलाराम! तुम्हारे खाते में पुण्य शून्य है। न दान, न तप, न विद्या। सिर्फ उधारी है!

भोलाराम : (हाथ जोड़कर) हुजूर, पर मैंने सुना है — जो अक्षुण्य है, वही पुण्य है।

चित्रगुप्त : किसने कहा?

भोलाराम : नवल शर्मा जी ने कहा — धन अकलंक है, अप्सरा अकलंक है। फिर एक और ज्ञानी पधारे, बोले द्विमूर्ति में मजा नहीं, देवता भी तीन होते हैं — उन्होंने उसमें सुरा जोड़ दी!

यमदूत-1 : (हँसकर) ये कौन-सा शास्त्र है? व्हाट्सऐप पुराण?

भोलाराम : शास्त्र नया है हुजूर, पर तर्क पुराना है। चार्वाक कह गए हैं — यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्! सुनिए मेरा तर्क —

सुरा छीजती है, बोतल खाली होती है। सुंदरी छीजती है, उम्र ढलती है। धन छीजता है, खर्च होता है।

चित्रगुप्त : तो ये अक्षुण्य कैसे हुए?

भोलाराम : हुजूर, चीजें छीजती हैं, पर उनकी लत नहीं छीजती! बोतल खत्म, लत बाकी। नोट खत्म, लालच बाकी। सुंदरी बूढ़ी, नज़र बाकी। सिद्ध हुआ — असली अक्षुण्य आनंद है, और आनंद की लत ही पुण्य है!

[अंक 2 : स्वर्ग की मार्केटिंग]

[नवल प्रवेश करता है। हाथ में पम्पलेट — "स्वर्ग में आइए, सब अक्षुण्य पाइए"]

नवल : भोलाराम जी, एकदम सही पकड़े हैं! इसीलिए तो लोग स्वर्ग की लाइन में लगे हैं। पृथ्वी पर ट्रेलर देख लिया, अब पूरी फिल्म देखनी है!

स्वर्ग में —
• अप्सराएँ अमरत्व प्राप्त हैं — कभी बूढ़ी नहीं होंगी, कभी "मूड नहीं है" नहीं कहेंगी! • इंद्रासन का वैभव अक्षुण्य — कुर्सी छिनने का डर नहीं, चुनाव नहीं, विपक्ष नहीं! • और सोम की नदी बह रही है — बार बंद होने का टेंशन नहीं, ड्राई डे नहीं, पुलिस का छापा नहीं! 
यमदूत-2 : मतलब स्वर्ग एक परमानेंट चखना सेंटर है?

नवल : बिल्कुल! पृथ्वी पर क्षुद्र मानव जीवन का संताप भी क्या है? यहाँ बीवी का ताना, बॉस की डाँट, महँगाई की मार। वहाँ नो टेंशन, ओनली अटेंशन — अप्सराओं का!

भोलाराम : (आँखों में चमक) तो मेरा पुण्य यही हुआ कि मैंने पृथ्वी पर अभ्यास किया?

चित्रगुप्त : अभ्यास? तुमने तो उधारी में पी थी!

भोलाराम : हुजूर, उधारी में पीना भी तपस्या है! साहूकार का ताना सहकर भी नशा कायम रखना — क्या यह तप नहीं? पत्नी की गालियाँ सुनकर भी सौंदर्य निहारना — क्या यह साधना नहीं?

[अंक 3 : चखना सेंटर में दर्शन]

[रोशनी मंच के दूसरे हिस्से पर। टेबल पर मसाला पापड़। प्रबुद्ध-1, प्रबुद्ध-2 बैठे हैं।]

प्रबुद्ध-1 : (पापड़ तोड़ते हुए) देखो भाई, नवल जी ने कहा — धन अकलंक, अप्सरा अकलंक। तुमने बेकार में सुरा घसीट ली।

प्रबुद्ध-2 : घसीटा नहीं, न्याय दिलाया है। बिना सुरा के ज्ञान अधूरा है। चखना सेंटर में बैठकर तुम चाय पर ज्ञान दोगे?

वेटर : सर, दो कटिंग?

प्रबुद्ध-1 : नहीं, दो लस्सी। हम प्रबुद्ध हैं, सुरा-सुंदरी से ऊपर।

प्रबुद्ध-2 : वाह! चखना सेंटर में लस्सी? ये तो मंदिर में जाकर चिकन टिक्का माँगने जैसा है!

प्रबुद्ध-1 : धन अक्षुण्य है। जेब में हो तो इज्जत है, न हो तो प्रबुद्ध भी भिखारी।

प्रबुद्ध-2 : इसीलिए वेटर को पहले पेमेंट दिखाओ, तभी चखना आएगा। (सामने से स्कूटी वाली गुजरती है, प्रबुद्ध-1 की गर्दन घूमती है) अभी-अभी तुम्हारी गर्दन 90 डिग्री घूमी — ये अकलंक सौंदर्य का ही प्रभाव था! गर्दन का मोच पाप है, सौंदर्य नहीं।

प्रबुद्ध-1 : तुम अश्लील हो रहे हो। हम दार्शनिक वार्ता कर रहे हैं।

प्रबुद्ध-2 : और दार्शनिक वार्ता चखना सेंटर में? यही सबसे बड़ा व्यंग्य है भाई! जहाँ मूँगफली के दाने गिने जाते हैं, वहाँ मोक्ष के सिद्धांत बघारे जा रहे हैं।

प्रबुद्ध-1 : अच्छा बताओ, तुम्हारी सुरा अक्षुण्य कैसे?

प्रबुद्ध-2 : (धीमे स्वर में) धन तिजोरी में सड़ता है, अप्सरा फोटो में बूढ़ी होती है, पर सुरा? जितनी पुरानी, उतनी कीमती! 12 साल पुरानी स्कॉच... बुढ़ापा भी यहाँ पुण्य है!

वेटर : सर, चखना खत्म, और लाऊँ?

दोनों एक साथ : हाँ, अक्षुण्य है, लाते जाओ!

प्रबुद्ध-1 : (ज्ञान-मुद्रा में) वैसे सिद्धांत ये है — जो चीज चखने से घटे, वो क्षुण्य। जो ज्ञान बघारने से बढ़े, वो अक्षुण्य।

प्रबुद्ध-2 : मतलब?

प्रबुद्ध-1 : मतलब ये पापड़ क्षुण्य है — खत्म हो गया। पर इस पर हमारी बहस अक्षुण्य है — कल फिर करेंगे!

प्रबुद्ध-2 : वाह! तो सिद्ध हुआ — चखना क्षणभंगुर है, चखना-सेंटर का ज्ञान अक्षुण्य है, और...

दोनों : वेटर! बिल कौन देगा?

[सन्नाटा। दोनों एक-दूसरे को देखते हैं। यही असली दर्शन है।]

[अंक 4 : परसाईयाना मोड़]

[नारद प्रकट होते हैं, वीणा पर 'मोहब्बत' की धुन]

नारद : नारायण! नारायण! ये कैसा पुण्य-परिवर्तन हो रहा है!

नवल : देवर्षि, समय बदल गया है। अब पुण्य वह नहीं जो छीजता न हो। पुण्य वह है जिसकी लत छूटती न हो!

नारद : तो नरक में कौन जाएगा?

चित्रगुप्त : (बही पलटकर) जो सत्य बोलेगा, जो रिश्वत नहीं देगा, जो फाइल नहीं दबाएगा... वैसे मूर्ख अब बचे कहाँ हैं?

भोलाराम : हुजूर, मुझे स्वर्ग दीजिए। मैंने पृथ्वी पर दुख झेला है। अब मुझे अक्षुण्य आनंद चाहिए।

यमदूत-1 : पर भोलाराम, स्वर्ग में भी महँगाई है। एक अप्सरा के अभिसार के लिए 100 पुण्य चाहिए। तुम्हारे पास शून्य है।

भोलाराम : तो क्या मैं फिर से फाइल बनकर लटकूँ?

सब एक स्वर में : यही तुम्हारा असली अक्षुण्य है भोलाराम! पृथ्वी पर फाइल लटकी थी, अब आत्मा लटकेगी। लटकना ही अक्षुण्य है!

[पर्दा गिरता है। पीछे से आवाज — "सोम की नदी में स्नान करने वालों, कृपया अपने पुण्य का टिकट दिखाएँ..."]

सूत्रधार : (आगे आकर) तो देवियों और सज्जनों! सिद्ध हुआ —

सुरा छीजती है, सुंदरी छीजती है, धन छीजता है,
पर उनकी लत अक्षुण्य है!

चार्वाक कह गए — खाओ-पीओ मौज करो,
नवल कह गए — स्वर्ग में इसका एक्सटेंडेड वर्जन देखो,
और प्रबुद्ध कह गए — चखना खत्म हो सकता है,
पर बिल से बचना ही सबसे बड़ा मोक्ष है!

कहा भी गया है — जो अक्षुण्य हो, वही पुण्य है।
अब लत से बड़ा अक्षुण्य क्या होगा?

बोलो — भोलाराम के जीव की जय!

[पर्दा]

Tuesday, September 15, 2026

नवा खाई बनाम नुआ खाई

महानदी के इस पार का नवान्न : नुआखाई, दालखई और देवारी
- डॉ. अनिल भतपहरी

महानदी केवल एक नदी नहीं है, वह एक सांस्कृतिक सीमा-रेखा भी है। उसके उस पार और इस पार फसल का चक्र एक-सा है, पर उसे मनाने की तिथि और विधि अलग-अलग है। इसी भिन्नता में छत्तीसगढ़ की कृषि-संस्कृति की मौलिक समझ छिपी है।
उस पार : नुआखाई
महानदी के उस पार लरियांचल अर्थात पश्चिमी ओडिशा - संबलपुर, बलांगीर, कालाहांडी अंचल में नुआखाई सबसे बड़ा पर्व है। भादों शुक्ल पंचमी को धान की नई फसल घर आने पर नवान्न ग्रहण किया जाता है। नुआखाई जुहार वहां की आत्मा का उद्घोष है।
इस पार : भादों में नवान्न संभव ही नहीं
लेकिन इस पार - शिवरीनारायण, सिरपुर, राजिम अंचल में नुआखाई उस रूप में नहीं मनाई जाती। इसका कारण विशुद्ध कृषि-शास्त्रीय है। भादो महीने में छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग में कोई नई फसल पकती ही नहीं, तो नया खाने का प्रश्न ही नहीं उठता।

यहां धान की एक विशेष व्यवस्था है - पसहर**। क्वांर माह में आने वाले पसहर धान को किसान साल भर यत्नपूर्वक रखता है। उसी पसहर के चावल का भात खाकर महिलाएं **कमरछठ में उपवास खोलती हैं और दिन भर फलाहार करती हैं। यह परंपरा बताती है कि यहां अन्न को केवल उपज नहीं, थाती माना गया है।
असली नवान्न : सुरहुती, देवारी, मातर
यहां खरीफ की प्रमुख फसल हरहुना किस्म का धान है, जो दशहरा और दिवाली के बीच खलिहान में आता है। इसीलिए इस अंचल में नवा खाने की असली रस्म त्रिदिवसीय महापर्व - सुरहुती, देवारी, मातर में निहित है।

घर-घर में इसका अनुष्ठानिक रूप दिवाली की खिचड़ी में दिखता है। खिचड़ी बनाते समय उसमें नए धान के चावल डाले जाते हैं, पहले पितरों और देवताओं को भोग लगाया जाता है, फिर परिवार नवा खाता है। भाव वही है जो नुआखाई का है - नई फसल का सम्मान - बस तिथि फसल के पकने के साथ जुड़ी है, पंचांग के साथ नहीं।
दशहरा : शोभायात्रा और मेल-जोल
इस संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि यहां दशहरा अन्य अंचलों की तरह रावण-दहन का कर्मकांडीय उत्सव मात्र नहीं है। यह शोभायात्रा और परस्पर मेल-जोल का पर्व है। गांव-गांव से देवी-देवताओं की शोभायात्रा निकलती है, लोग एक-दूसरे से भेंटते हैं, सुख-दुख बांटते हैं। यह फसल कटने के बाद के अवकाश और उल्लास का सामूहिक उत्सव है।
साथ में : दालखई
उस पार के अंचल में एक और परंपरा है - **दालखई**। यह मूलतः लोकनृत्य-गीत परंपरा है, जो दशहरा से प्रारंभ होकर दालखई पूर्णिमा तक चलती है। कुंवारी कन्याएं भाई की लंबी आयु की कामना से दालखई गाती-नाचती हैं। इसे भाई-बहन के स्नेह का पर्व भी कहा जा सकता है।
बस्तर : सेतु-अंचल
उड़ीसा से लगा बस्तर अंचल इस सांस्कृतिक संवाद का सेतु है। वहां 18 सितंबर को नवाखाई मनाई जाती है और इस दिन कलेक्टर द्वारा घोषित सार्वजनिक अवकाश रहता है। एक ही प्रदेश में यह विविधता छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रमाण है।
निष्कर्ष
तो एक ही फसल-चक्र के तीन रूप हमारे सामने हैं :
• उस पार : नुआखाई - भादों में नवान्न • इस पार : दिवाली की खिचड़ी में नवा-खाना - सुरहुती, देवारी, मातर • साथ में : दालखई नृत्य-पर्व 
पर्वों की तिथियां अलग हो सकती हैं, पर मूल भाव एक ही है - धरती के प्रति कृतज्ञता और अन्न का सम्मान। लरियांचल के सभी मित्रों को नुआखाई की हार्दिक बधाई - नुआखाई जुहार!

Monday, September 14, 2026

गणनायक गणपति

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गणोंत्सव पर

गणों का अधिपति गणपति - एक शब्द की सांस्कृतिक यात्रा

भारतीय वाङ्मय में कुछ शब्द ऐसे हैं जो केवल नाम नहीं, पूरी व्यवस्था के प्रतीक हैं। गणपति ऐसा ही शब्द है। इसे यदि केवल पुराण कथा तक सीमित रखकर देखा जाए तो इसका व्यापक अर्थ छूट जाता है। इस शब्द के दो तल हैं - एक भाषिक-ऐतिहासिक और दूसरा सांस्कृतिक-प्रतीकात्मक। दोनों को साथ देखने से इसकी निरन्तरता स्पष्ट होती है।
1. गणपति का मूल अर्थ - एक पद, न कि केवल एक नाम
वेदों में गण का अर्थ शिव के गण नहीं, बल्कि समूह, परिषद, जन-समूह है।

ऋग्वेद 2.23.1 में मंत्र है - गणानां त्वा गणपतिं हवामहे - यहाँ गणपति का अर्थ है मंत्रों और ज्ञान के समूह के स्वामी ।

इसी मूल से आगे चलकर अर्थ का विस्तार हुआ। बौद्ध काल में भारत में गण-राज्य और गण-संघ एक प्रसिद्ध शासन व्यवस्था थी - वज्जि, मल्ल, शाक्य, लिच्छवी इसके उदाहरण हैं। यहाँ एक वंशानुगत राजा नहीं होता था, बल्कि गण की परिषद होती थी।

उस व्यवस्था में जो पूरे गण का अधिपति हो, जो मार्गदर्शक हो, जो निर्णय दे सके, वह गणपति कहलाता था। इस अर्थ में गणपति एक लोकतांत्रिक पद था।

पाली साहित्य में तथागत बुद्ध के लिए गणाचारिय, गणज्येष्ठ, महाशास्ता जैसे शब्द इसी भाव में आते हैं। वे स्वयं गण-संघों में जाकर धम्म पर चर्चा करते थे, और मगध और कोसल जैसे महाजनपदों के राजा तथा गणप्रमुख उनकी परिषद में बैठकर सुनते थे। इस दृष्टि से बुद्ध प्रबुद्ध गणों के प्रेरक के रूप में गणपति के आदर्श को चरितार्थ करते हैं।
2. हाथी का प्रतीक - विशालता और प्रज्ञा का रूपक
भारतीय प्रतीक-शास्त्र में हाथी केवल एक पशु नहीं है।

बौद्ध परम्परा में हाथी अत्यंत पवित्र है। बुद्ध के जन्म से पूर्व महामाया देवी ने श्वेत हाथी का स्वप्न देखा था। हाथी को सबसे बड़ा, शांत, स्थिर और मेधावी प्राणी माना गया, जो स्मृति और प्रज्ञा का प्रतीक है।

वैदिक परम्परा में भी हाथी ऐश्वर्य, गंभीरता और बुद्धिमत्ता का प्रतीक रहा है - इन्द्र का ऐरावत, दिग्गजों की कल्पना, गजलक्ष्मी का रूप।

इसलिए जब किसी विराट, गंभीर और प्रज्ञावान व्यक्तित्व या सत्ता को दृश्य रूप देना हो, तो हाथी का रूपक सबसे स्वाभाविक माध्यम बन जाता है। विशालता को गजमुख के द्वारा पूजने की परम्परा इसी रूपक-पूजा की कड़ी है।
3. कथा का विकास - पद से देवता तक
इस शब्द की यात्रा को कालक्रम में इस प्रकार समझा जा सकता है:

क. वैदिक काल: गणपति एक पद और विशेषण के रूप में।

ख. मौर्योत्तर और गुप्त काल: लोक-जीवन में विनायक और हस्तिमुख लोक-देवता की स्वतंत्र उपासना का उदय। मथुरा और मध्य भारत से प्राप्त 1ली-2री शताब्दी और 5वीं शताब्दी की गुप्तकालीन मूर्तियाँ इसका पुरातात्विक प्रमाण हैं।

ग. पुराण काल: 7वीं शताब्दी के बाद जब पुराण साहित्य अपने वर्तमान रूप में संकलित हुआ, तो उस लोक-प्रिय गजमुख रूप को एक पारिवारिक कथा से जोड़ा गया - शिव और पार्वती के पुत्र की कथा, जो आज सर्वाधिक प्रसिद्ध है।

इस प्रकार एक ही नाम गणपति ने अलग-अलग युग में अलग-अलग विराट व्यक्तित्व के लिए कार्य किया - कभी एक प्रशासनिक पद के रूप में, कभी बुद्ध जैसे महाशास्ता के लिए सम्मान के रूप में, और बाद में पौराणिक देवता के रूप में।
निष्कर्ष
गणपति को केवल एक पौराणिक चरित्र तक सीमित न रखकर गण-व्यवस्था, लोक-परम्परा और बुद्ध के प्रभाव के साथ जोड़कर देखना भारतीय वाङ्मय की निरन्तरता को समझने का एक गहरा तरीका है। यह दिखाता है कि कैसे एक शब्द, एक प्रतीक, समय के साथ लोक की चेतना में नया-नया रूप धारण करता हुआ भी अपने मूल अर्थ - समूह के नेतृत्व और प्रज्ञा - को बनाए रखता है। इसलिए गणों के ईश  गणेश को ज्ञानदाता ज्ञान सागर भी कहते हैं.. वस्तुतः भारतीय मनीषा को सम्यक ज्ञान महाकारूणिक बुद्ध ही देते हैं. इसलिए ही दुनियां मे ज्ञान की अनुगूंज हुई और एशिया बुद्ध मय हुआ.
     नमो गणपति नमो बुद्धाय.

डॉ अनिल भतपहरी 9617777514

Sunday, September 13, 2026

हमर फटफटी राजदूत


शीर्षक: हमर फटफटी (1984) : परिक्षेत्र की पहली मोटर साइकिल और एक धरोहर की कथा

लेखक: डॉ. अनिल भतपहरी

1984 की बात है। मतलब मैं तब से राइडर था। संलग्न फोटो में पीछे बैठा बच्चा मैं ही हूं — यह फोटो राजू भाई (कोसले चाचा, बीईओ के बेटे) ने उपलब्ध कराया है।

इसे 1984 में पिताश्री सुकाल दास भतपहरी (प्र. प्राचार्य, शास. हाई स्कूल कोसरंगी) और मिलन बंजारे चाचा (सेवानिवृत्त प्रबंधक, लघु उद्योग निगम, भोपाल) ने रायपुर से 7500 रुपये में खरीदा था। 100 रुपये में फूल टैंक करवाए गए और 100 रुपये की टोकनी भर फल, मिठाई, फूल-माला लाए गए थे।

मां से अनबन होकर 8 हजार फूंक दिए गए, जबकि हमारे बंधियाँ चक से लगा 10 हजार में एक सवा एकड़ का खेत चुकता में खरीदने का प्लान कर चुके थे। जिसने खरीदा, उनके चलते आज तक हमारी "चकबंदी" नहीं हो पाई। उसका मलाल माताश्री-पिताश्री को होता रहा।

परंतु परिक्षेत्र की पहली मोटर साइकिल की ध्वनि जब गूंजती, तो खेत में काम कर रहे लोग दूर तक टकटकी लगाकर देखते। हम बच्चों का एक अलग ही मजा और शान होता था।

बारिश के दिनों में पहुंच-विहीन टापू बनते गांव से नहर रास्ते जाने के लिए यही हमारी इमरजेंसी एम्बुलेंस थी। पिताजी और मैंने अनेक लोगों को कन्नौजिया डॉक्टर, खरोरा वैद्य, डॉक्टर खरतोरा, संडी ले जाकर बचाया है।

यह राजदूत अंत तक रहा। पिताश्री के जाने (2000) के बाद भी उन्हें संभाल कर धरोहर की तरह रखा गया था। भले खेती करना छोड़ दिया और धीरे-धीरे सभी भाई-बहन शहरों में बस गए, वह यूं घर के बरामदे में एक गार्जन की तरह रखवाली करते रहे। जब-जब जाते, प्रणाम करते थे।

कुछ वर्ष पूर्व सुनील ने उसे मिट्टी तेल में चलने लायक बनवाया, और अंततः जो हमारे खदान मुंशी चलाते थे, उन्हीं के हो गए।