Wednesday, September 2, 2026

सतनाम साहित्य सृजन की सतत परंपरा

सतनाम साहित्य सृजन की सतत परंपरा

गुरु घासीदास के परिनिर्वाण (1850) के 18 वर्ष बाद से अद्यतन तक के लेखन का समग्र अवलोकन

लेखक : डॉ. अनिल कुमार भतपहरी (पीएच.डी. शोध 2013 / ग्रन्थ 2019 - गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ)

प्रस्तावना

प्रायः यह कहा जाता है कि सतनाम साहित्य अभी शैशवावस्था में है। यह कथन तथ्यों की सतही समझ पर आधारित है। वस्तुस्थिति यह है कि गुरु घासीदास जी के अंतर्ध्यान 1850 के मात्र 18 वर्ष बाद 1868 से ही सतनाम पर प्रामाणिक लेखन निरंतर जारी है। डॉ. अनिल कुमार भतपहरी के अनुसार अब तक 250 से अधिक स्वतंत्र पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाएँ और शोध-ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं। यह 157 वर्षों की सतत परम्परा है।

1. चिशोल्म का 1868-69 का लेखन - चश्मदीद साक्षात्कार

जे. डब्ल्यू. चिशोल्म की 1869 की रिपोर्ट में स्पष्ट है कि सतनाम पंथ कबीर पंथ से प्रेरित है और गुरु घासीदास ने मूर्ति-पूजा का निषेध कर निराकार सतनाम का उपदेश दिया। यह लेखन तब हुआ जब गुरु जी को देखने वाले जीवित थे, अतः यह फर्स्ट हैंड ओरल हिस्ट्री है। 18 साल का अंतराल नगण्य है।

2. मौखिक से लिखित की ओर - पंथी गीतों की जीवंत परम्परा

गुरु घासीदास जी के समय से ही उनके जीवन-चरित और उपदेशों पर पंथी गीत, मंगल भजन का लेखन-गायन प्रारम्भ हो गया था।

3. महाकाव्यात्मक युग (1907-1968)

1907 - पं. सुंदरलाल शर्मा: 'सतनामी पुराण'

1925 - गुरु अगमदास जी द्वारा पं. सुखीदास से 'सतनाम सागर' लेखन

1965-68 - मनोहरदास नृसिंह: 'गुरु घासीदास नामायण'

सुकुलदास घृतलहरे की 'समायन', सखाराम बघेल की 'सत्यायण', बुलनदास की 'गुरु उपकार', भाऊराम घृतलहरे की 'गुरु अमृतवाणी', सुकालदास भतपहरी की 'गुरु घासीदास चरित गीतमाला'

4. शोधपरक गद्य का विकास

डॉ. जे. आर. सोनी - 'सतनाम के अनुयायी', 'सतनाम रहस्य'

सर्वोत्तम स्वरूप साहेब, टी. आर. खूँटे, डॉ. दादूलाल जोशी, पी. डी. सोनकर

लखन सुबोध एवं GSS संगठन, नरेंद्र भारती एवं कुमार लहरें द्वारा ब्रिटिश दस्तावेजों का अनुवाद

5. डॉ. अनिल कुमार भतपहरी का योगदान (2013/2019)

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी का पीएच.डी. शोध ग्रन्थ (2013) और पुस्तक ‘गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ’ (2019) इस परम्परा का प्रथम समग्र विश्वविद्यालयीय दस्तावेजीकरण है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं स्रोत समीक्षा

जीवन-चरित एवं तप-साधना

सतनाम दर्शन - मनखे-मनखे एक समान

सामाजिक संरचना एवं संगठन

गुरु परम्परा - बालकदास से वर्तमान

Sahapedia (2015) - Panthi Nritya लेख

6. साहित्य कम नहीं, पाठक-परिवेश बाधित था

रेडियो पर पंथी गीत आते ही बैंड बदल देना, बस में कैसेट बदलवाना, शिक्षित अधिकारियों द्वारा घर में फोटो तक न लगाना - यही कारण था कि पुस्तकें 200-500 प्रति में अलमारी की शोभा बनी रहीं।

7. 2000 के बाद विस्फोट

छत्तीसगढ़ राज्य गठन और सोशल मीडिया के बाद डॉ. हीरालाल शुक्ल, डॉ. आर. पी. टंडन, बलदेव, अजय कुमार खूँटे कृत 'Guru Ghasidas Aur Satnami Andolan Ke Aitihasik Sakshya (2021)' आदि की कृतियाँ आईं।

निष्कर्ष

1868 से 2019 तक 157 वर्षों की सतत परम्परा सिद्ध करती है कि सतनाम साहित्य शैशवावस्था में नहीं है। साहित्य परिपक्व था, पाठक-परिवेश बाधित था।


--- डॉ. अनिल कुमार भतपहरी ---

संतान अउ तरिया जतने के तिहार : कमरछट


तरिया के जतन अऊ सुघरई : सांस्कृतिक धरोहर ल बचाय के बेरा

- डॉ. अनिल भतपहरी

छत्तीसगढ़ ही नहीं भारत के जन जीवन अउ लोक संस्कृति म तरिया नंदिया नरवा अउ ओकर घाट पचरी के अबडेच महतम हवय। सिंधु घाटी सभ्यता म तकों तरिया हे । हमर छत्तीसगढ़ म कई ठन  जुन्ना बड़े गाँव,नगर म छ आगर छ कोरी तरिया होय के परमान मिलथे। सबके नाँव तकों धराए रहिथे जैसे रतवा,पैठु, जुन्ना , नवा, गोड़ धोवा, चुहरी, सफरा, अमरौतिन तरिया , बूढ़ा तरिया, तेली तरिया कंकाली, महामाई, शीतला , मौली , तरिया बंधवा तरिया, खोखमा कमल,पोखरा सिंघाड़ा तरिया, खाम, मंदिर, मठ , मर्रा तरिया, जैसन कतकोन नांव धराय यही रकम के डबरी तकों होथे।
कई गांव के मंझोत म तरिया अ उ चारों खुट बस्ती रहिथे। सबके अलगे अलग महातम रहिथे 
जोन गाँव म नरवा तरिया 
तोन गाँव ह सबले बढ़िया 
  कमरछट तिहार म सगरी सजाय अउ भरे के अनुष्ठान हमर महतारी मन करथे। जोन हर बड़ भारी जुन्ना चलागन आय। ये दिन उपास रहिथे बड़ नेम-धेम ले उन्मन कासी फूल पान फूल धूप दीप ले सगरी नन्हे तरिया बना के जल दूध म भरथे अउ छीनी अंगूरी म गठान बांध जल देवती के आराधना करत अपन संतान मन के सुख बर बरदान मांगते हैं। रात्रि बिना नागर जोते परहर चाउर के भात अउ पांच सात रकम के भाजी बनाके फरहर करथे।

     इसलिए हर गाँव के तरिया, नरवा, नंदिया सिरिफ पानी के साधन नो हे, वो हमर संस्कृति के धरोहर आय। वो हमर जनम ले मरण तक के संगवारी आय। दाई के गोद ले निकले के बाद तरिया के पछीना म हमन नहायेन, भोजली-जवारा विसर्जन करेन, अऊ आखरी म दशगात्र घलो ओही तीर म होथे। फेर आज वो धरोहर उपेक्षित होवत हे।

आज देख के दु:ख होथे कि हमन मनमाने जगह भोजली-जवारा ल विसर्जित करथन, गणेश-दुर्गा बिसकरमा मूर्ति ल नाला-नाली म फेंक के आ जाथन। मूर्ति मन खंडित होके तरिया के किनारे म पड़े रहिथे, फूल-पान, पॉलिथीन ले तरिया पट जाथे। हमन तरिया ल गहरा तो करवाथन, फेर ओकर सांस्कृतिक उपयोग बर जगहेच नहीं बचाथन। ये बड़े कमी आय। कमर छठ उपास म सगरी भरे अउ सजाय के सुग्घर प्रथा हे फेर एकर केवल प्रतीक भर रहीगे. जबकि एहर सिरतों म तरिया ल जतने सवारे के जुन्ना उदिम अउ अनुष्ठान आय. हम सबोझन ल तरिया सवारे भरे के जतन करें परही. काबर कि यहीं हर जल श्रोत आय तारिया के रहें ले कुआँ बोरिंग सदानीरा रही नहीं त उहूँ हर सुखा जाही.

मन म ये विचार आथे - का हमर बिहतरा अनुष्ठान, नहावन-दशगात्र, पूजा-पाठ, कातिक असनान, भोजली, जवारा, गौरा, विश्वकर्मा विसर्जन बर एक सुग्घर, पवित्र घाट नइ  बना सकन?

समय आ गे हे कि गाँव के हर मनखे के बौरे बर तरिया अऊ तीर म बोहात नरवा के सौंदर्यीकरण ल "तरिया सुघरई योजना" के रूप म देखे जाय। लोक निर्माण, पंचायत अऊ संस्कृति विभाग ल मिलके ये जनहित के काम करना चाही।

आदर्श सांस्कृतिक घाट - आस्था घाट कैसन होना चाही?

1. घाट के बनावट:
तरिया के एक कोती कम से कम 15-20 फीट के पक्का घाट होना चाही, जेमां 2-3 ठन सीढ़ी पानी तक गे होय। फिसलन न होय बर खुरदुरा पत्थर लगाना जरुरी हे। घाट के दुनो कोती छोट-छोट चबूतरा होना चाही, जिहां जवारा बोवइया दाई-बहिनी मन बैठ सकय, भोजली बदे सकय। ऊपर एक ठन छायादार चबूतरा या टिन शेड होना चाही, जिहां दशगात्र / पिंडदान के काम शांति अऊ पवित्रता ले हो सकय।

2. सौंदर्यीकरण अऊ सुरक्षा:
घाट के चारो मुड़ा पीपल, बरगद, कदंब, नीम जइसे छायादार अऊ शोभायमान गाछ लगाना चाही, जेन के जड़ ले तरिया के मेड़ घलो मजबूत होही। घाट म जालीदार बैरिकेड होना चाही ताकि विसर्जन के मूर्ति के पीओपी, प्लास्टिक, लोहा पानी म न घुले, अऊ बाद म सफाई करके निकाले जा सकय। एक कोती जैविक कुंड बनाना चाही - फूल, पान, जवारा विसर्जन खातिर, अऊ दूसर कोती गहरा कुंड मूर्ति विसर्जन खातिर।

3. बहुउपयोगी घाट:
ये एकेच घाट कई काम आही -
• सावन म भोजली विसर्जन • नवरात्रि म जवारा विसर्जन • गणेश, दुर्गा, विश्वकर्मा, गौरा विसर्जन • दशगात्र नहावन, पितर तर्पण अऊ छठ घाट के रूप म • रोज के निस्तारी ले अलग, एक पवित्र घाट बने रहही 
कैसे होही पूरा?

ये काम बहुत बड़े बजट के नो हे। पंचायत ह मनरेगा, 15 वां वित्त आयोग, अमृत सरोवर योजना अऊ डीएमएफ फंड ले एक घाट ल 2-3 लाख म बहुत सुग्घर बना सकत हे। गाँव के मनखे मन के श्रमदान ले घलो ये संभव हे।

जरुरत हे तो बस एक ठन सोच के - तरिया ल मछरी मारे बर ठेका म देके उजाड़े ले अच्छा हे, ओला गाँव निस्तारी अऊ संस्कृति बर जतन करके रखना।

सुनता-मढ़ा, पंच-सरपंच मन चाही तो एक बैठक म एला संकल्प ले सकत हें। शासन-प्रशासन ले घलो हमन मांग कर सकत हन कि हर पंचायत म कम से कम एक आस्था घाट अनिवार्य करे जाय। काबर कि तरिया हर गाँव के धड़कन आय।

तरिया बांचे, तो संस्कृति बांचे।
मंगलू बुढ़ियारिन खुल खुल हांसे

जय जोहार, जय छत्तीसगढ़

डॉ.अनिल कुमार भतपहरी
    9617777514
    नारायणपुर, अबूझमाड़ छत्तीसगढ़

Tuesday, September 1, 2026

सतनाम धर्म : संकट और समाधान

सतनाम धर्म सतनामी समाज के इतिहास का सबसे जटिल और अनसुलझा सवाल है। प्रशासन की नज़र में सतनाम पंथ या धर्म के अनुयाई " सतनामी" हैं और वह एक जाति हैं जो कि अनुसूचित जाति के कालम 14 के सम्मिलित जातियों के समूह में से एक हैं। जबकि धरातल में देखें तो यह बिल्कुल अलग हैं क्योंकि सतनामी जाति नहीं बल्कि भारत वर्ष में प्रथम जातिविहीन समुदाय हैं इनके अनुयाई कृषक हैं और इनका अपना कोई पारंपरिक पेशा ही नहीं जिसके आधार पर नामकरण या पहचान स्थापित हो सकें।
   जैसे कबीर पंथ, में अनेक जातियां हैं वे संत कबीरदास को सुनते/मानते  तो हैं परंतु उन सबकी जातियां, जन्म से मरण तक की रीति- नीति, अलग- अलग हैं। परन्तु सतनामियों में ऐसा नहीं हैं। अनेक जाति के लोग यहां एकजतियां हैं। सगोत्र विवाह छोड़कर किसी से भी विवाह कर सकता हैं, कोई बंधन नहीं। वैसे ही इनकी उपासना,व्रत उत्सव एवं विविध आयोजन भी हिंदुओं से 
   सतनामियों की इस व्यवस्था से यहाँ के शासन- प्रशासन हतप्रभ हुआ कि ऐसे कैसे? और इसे कैसे अपनी संवैधानिक ढांचा में स्थान दे? तब बिना कोई माथापच्ची किए इसे एक उप जाति की संज्ञा दे दी गई और इनके साथ होते भेदभाव के आधार पर शेड्यूल कास्ट में सम्मिलित कर दिए गए। तत्कालीन समय पर जैसा भी हो एक व्यवस्था में आए और राष्ट्र निर्माण में सहयोग करे की भावना से हमारे गुरुओं संतो महंतो ने आम सहमति प्रगट की।

छत्तीसगढ़ में सतनामी समाज की परिस्थिति दो हिस्सों में समझना होगा - 
ऐतिहासिक तथ्य 
1. मराठा काल में  स्वतंत्र धर्म  था और हिंदुओं से पृथक पहचान थी। इसलिए  ब्रिटिश काल में सेपरेट रिलीजन के रुप में दस्तावेजों में दर्ज हुई।
गुरु घासीदास जी ने 1795 में सतनाम पंथ की स्थापना मनुस्मृति आधारित जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवादी प्रभुत्व को नकार कर की थी। एकेश्वरवाद, सतनाम, सामाजिक समानता इसका मूल था।  हिंदूओ की बहुदेव वादी पूजा उपासना पद्धति से पृथक होने के कारण ही अपने उद्भव के कुछ वर्ष बाद मराठा काल में स्वतंत्र धर्म के रुप में प्रतिष्ठित हो गया चुका था। व्रत उत्सव मेले इत्यादि पृथक ही थे और उन्हें लोक मान्यता मिली हुई थी।
2 ब्रिटिश काल: जब मराठा भोसला शासन खत्म हुआ और छत्तीसगढ़ सूबा अंग्रेजों के अधीन हुए तब छत्तीसगढ़ सेटलमेंट का कार्य आरम्भ हुआ और अनेक तरह के सर्वेक्षण , जनगणना, गजेटियर आदि निर्माण हुआ। तब उनमें सतनामियों की सामाजिक स्थिति, रीति नीति, संस्कृति के संदर्भ में लेखन हुआ। 
उक्त दोनों तथ्य जिसमें लोक मान्यताओं और दस्तावेजों से हमें वास्तविक जानकारियां प्राप्त होती हैं। इसमें एक बात स्पष्ट और रेखांकित हैं कि 
   "ब्रिटिश जनगणना में सतनामी को लंबे समय तक हिन्दू से अलग गिना गया। 1911, 1921, 1931 की जनगणना में Depressed Classes के साथ-साथ Satnami को अलग धार्मिक समूह के रूप में दिखाया जाता था।" यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

 इसी अलग पहचान को खत्म करने और उन्हें हिंदुओं में समेटने के लिए 1920 के दशक में Satnami -Hindu Mahasabha बनी।  
    आइए ऐसा क्यों हुआ और किसलिए ब्रिटिश इंडिया में हिंदू महासभा संगठन अस्तित्वमान हुआ, यह समझते है।
अखिल भारत हिन्दू महासभा का बनना एक दिन की घटना नहीं, 3 चरणों में हुआ:

1. जड़ - पंजाब हिन्दू सभा 1907-1909
ब्रिटिश काल में मुस्लिम लीग (1906) के बनने के बाद 1907 में लाला लाजपत राय, लालचंद जैसे नेताओं ने लाहौर में पंजाब हिन्दू सभा बनाई।

2. औपचारिक स्थापना - 1914-1915 हरिद्वार
1910 में इलाहाबाद के प्रमुख हिन्दुओं ने अखिल भारतीय सम्मेलन करने का फैसला किया। पंडित मदन मोहन मालवीय के प्रयास से 1914 में इसकी तैयारी हुई और 13-14 अप्रैल 1915 को हरिद्वार कुंभ में सर्वदेशक हिन्दू सभा के नाम से पहला अधिवेशन हुआ। इसी को आज हिन्दू महासभा का स्थापना दिवस माना जाता है। इस दिन का नाम 'सर्वदेशक हिन्दू सभा' था, जिसे अप्रैल 1921 में बदलकर 'अखिल भारत हिन्दू महासभा' कर दिया गया।  

3. राष्ट्रीय पार्टी बनना - 1920 के बाद
1920 के दशक में मालवीय, लाला लाजपत राय के नेतृत्व में यह सक्रिय हुई। 1927-28 में मुंजे, बाद में 1937 से वीर सावरकर इसके अध्यक्ष रहे और इसने हिंदुत्व को राजनीतिक सत्ता प्राप्ति के सिद्धांत और पाथेय बनाया।


छत्तीसगढ़ में 1932 के आसपास "हिंदू-सतनामी महासभा" का कार्य प्रगति पर था क्योंकि यह क्षेत्र cp & barar के केंद्र नागपुर से करीब था और एक तरह से छत्तीसगढ़ को प्रयोग स्थली के रूप में लिया गया था।
अखिल भारतीय महासभा की ही एक प्रांतीय/सामाजिक शाखा थी। जैसा कि 1920 के दशक में Satnami Mahasabha बनी थी और उस पर हिन्दू राष्ट्रवादी प्रभाव था।  रायपुर में 1921 में सतनामी आश्रम की स्थापना हुई और यही से सतनामियों का राजनैतिक रुप से हिंदूकरण करने की प्रक्रिया आरंभ हुईं। 

आगे चलकर 1930-32 में गुरु अगमदास जी के माध्यम से कुछ महंतों के साथ मिलकर "हिन्दू-सतनामी" के रूप में संगठित किया गया, ताकि सतनामियों को अलग धर्म की जनगणना से निकालकर हिन्दू जनगणना में गिना जा सके।



इस तरह 1932 के आसपास "हिंदू-सतनामी महासभा" का यहाँ बेहद प्रभाव पड़ा। इसके समान्तर कोई और संगठन भी नहीं था जो सतनामियों को उचित मार्गदर्शन करा सकें।महाराष्ट्र के एक ब्राह्मण हिंदू राष्ट्रवादी बाबा रामचंद्र का प्रभुत्व था, जिन्होंने सतनामी इतिहास को ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण से पुनर्लेखन भी किया।  तब से यह पंथ ईश्वर (सत्पुरुष)आश्रित हो भाग्य भगवान के चक्रव्यूह में फंस कर रह गया।

इसी समय गुरु घासीदास के वंशज अगमदास जी (Minimata के पति, विवाह 1932 में) और उनके साथ जुड़े महंतों ने राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। आपने 72 महंतों का जो आंकड़ा दिया, वह इसी पारिवारिक-महंती संरचना से जुड़ा है, जिसने बाद में कांग्रेस के साथ मिलकर आंदोलन को राजनीतिक दिशा दी।  

1930 के बाद दो दबाव एक साथ आए - मुस्लिम लीग का अलग निर्वाचक मंडल का दावा और डॉ. अम्बेडकर का शेड्यूल कास्ट फेडरेशन। इस राजनीतिक समीकरण में हिंदू महासभा और कांग्रेस दोनों को लगा कि यदि सतनामी अलग धर्म के रूप में रहे तो हिंदू आबादी का बड़ा हिस्सा अलग हो जाएगा। इसलिए उन्हें रणनीतिक रूप से हिंदू फोल्ड में लाया गया।
2. आरक्षण और "अकारण हिन्दू" की आपकी पीड़ा
आपकी यह बात तथ्यतः सही है कि सतनामी छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा अनुसूचित जाति समुदाय है। संविधान के 1950 के राष्ट्रपति आदेश के अनुसार अनुसूचित जाति का आरक्षण केवल उन्हीं को मिलता है जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म मानते हैं।

इसीलिए एक कानूनी पेंच बनता है:
• यदि सतनामी अपने आप को ब्रिटिश काल की तरह सेपरेट रिलीजन घोषित करते हैं, तो तकनीकी रूप से वे SC लिस्ट से बाहर हो सकते हैं, जैसे आज दलित ईसाई और दलित मुस्लिम बाहर हैं। • यदि हिंदू बने रहते हैं, तो जैसा आपने कहा, आबादी में 10-12% होने के बावजूद आरक्षण का लाभ 2% से भी कम लोग ले पाते हैं, जबकि सामाजिक-धार्मिक आयोजनों, मंदिर प्रवेश, सहभोज में आज भी भेदभाव के मामले सबसे ज्यादा दर्ज होते हैं। NCRB के आंकड़ों में छत्तीसगढ़ में SC उत्पीड़न के मामलों में बड़ा हिस्सा सतनामी समुदाय से जुड़ा रहा है। 
यही वह "ऊहापोह" है जिसका आपने जिक्र किया - धर्म से बाहर तो आरक्षण खतरे में, धर्म में तो समानता नहीं।
3. आगे का रास्ता क्या हो सकता है?
दोनों पक्षों के लिए व्यावहारिक समाधान के लिए इतिहास में उदाहरण हैं:

क) यदि स्वतंत्र धर्म की मांग करनी है: तो लिंगायत, सारना धर्म की तरह मांग रखनी होगी कि "धर्म स्वतंत्र हो, पर सामाजिक पिछड़ापन और अस्पृश्यता का इतिहास वही रहा है, इसलिए SC का दर्जा धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक उत्पीड़न के आधार पर जारी रहे।" इसके लिए राज्य अल्पसंख्यक आयोग और केंद्र को ऐतिहासिक दस्तावेज - ब्रिटिश जनगणना, 1920 की महासभा के रिकॉर्ड, गुरु घासीदास की वाणी (अमृतवाणी) - के साथ प्रस्ताव देना होगा।

ख) यदि हिंदू के भीतर रहकर समानता चाहिए: तो जैसा आपने कहा, हिंदू धर्माचार्यों को औपचारिक रूप से सतनाम पंथ को वैष्णव, शैव की तरह ही एक स्वतंत्र पंथ-परंपरा मानकर आचार्य स्तर पर भागीदारी देनी होगी। केवल राजनीतिक हिंदू न कहकर धार्मिक-रिवाजों में समानता दिखानी होगी।

प्रशासनिक रूप से छत्तीसगढ़ सरकार "सतनामी" को SC लिस्ट में रखते हुए भी कॉलम में "धर्म - सतनाम" लिखने की व्यवस्था कर सकती है, जैसा कई राज्यों में "रविदासिया, वाल्मीकि" के लिए किया जाता है। इससे पहचान भी बची रहेगी और आरक्षण भी।

 निष्कर्ष  - उक्त सम्यक अध्ययन से यह बातें और तथ्य स्पष्ट होती हैं कि "जब तक सतनामी को या तो पूरी तरह हिंदू मानकर बराबरी नहीं दी जाती, या पूरी तरह स्वतंत्र धर्म मानकर उसका सम्मान और संवैधानिक सुरक्षा दोनों नहीं दी जाती, तब तक यह द्वंद्व चलता रहेगा।" 
        अत: आज़ादी के इतने वर्षों बाद एक विराट समुदाय जिनकी अपनी स्वतंत्र धर्म होने के बाद भी उसे जाति लिखने और जो धर्म लिख रहें हैं उस धर्म में मान्यता नहीं समाहार नहीं ऐसी विषम परिस्थितियों का शिकार होना पड़ रहा हैं आखिर यह दुविधा भ्रम कब तक चलता रहेगा? 
   जय सतनाम 

डॉ.अनिल कुमार भतपहरी 9617777514

Sunday, August 30, 2026

हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर: गजानंद माधव मुक्तिबोध

शोध-पत्र
हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर: गजानन माधव मुक्तिबोध
- डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
सार
यह शोध-पत्र मुक्तिबोध के काव्य-व्यक्तित्व को उनकी तीन केन्द्रीय कृतियों - भूल-गलती, अंधेरे में तथा एक साहित्यिक की डायरी के आलोक में परखने का प्रयास है। मुक्तिबोध केवल कवि नहीं, एक संपूर्ण वैचारिक प्रक्रिया हैं। उनके यहाँ कविता आत्म-संघर्ष, आत्म-साक्षात्कार और युग-चेतना का त्रिकोण है। प्रस्तुत पत्र में उनकी फैंटेसी, बिम्ब-विधान, आत्म-आलोचना और मार्क्सवादी चेतना का विश्लेषण किया गया है।

बीज शब्द: मुक्तिबोध, फैंटेसी, द्वंद्व, आत्म-संघर्ष, अंधेरे में, एक साहित्यिक की डायरी, मार्क्सवाद, अभिव्यक्ति
प्रस्तावना
हिंदी कविता में मुक्तिबोध का आगमन एक घटना है। तारसप्तक के प्रथम कवि के रूप में आए मुक्तिबोध को उनका वास्तविक स्थान उनके जीवनकाल में नहीं, निधन के बाद मिला। 11 सितंबर 1964 को उनका देहावसान हुआ और उसके बाद श्रीकांत वर्मा, अशोक वाजपेयी, नामवर सिंह जैसे आलोचकों ने उन्हें हिंदी की नई कविता का केंद्रीय हस्ताक्षर सिद्ध किया।

मुक्तिबोध की कविता सहज नहीं, सायास अर्जित कविता है। वह पाठक से श्रम माँगती है। जैसा कि उन्होंने स्वयं एक साहित्यिक की डायरी में लिखा है - "साहित्य में जीवन की वास्तविकता का चित्रण नहीं, जीवन की वास्तविकता की खोज होती है।" यही खोज उन्हें विशिष्ट बनाती है।
1. भूल-गलती : आत्म-स्वीकृति का काव्य
मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता भूल-गलती उनके काव्य-दर्शन का प्रवेश-द्वार है।
भूल-गलती
आज बैठी है
छाती पर
जिरह करती है...
यहाँ भूल-गलती कोई अमूर्त नैतिक अवधारणा नहीं, एक जीवित चरित्र है। मुक्तिबोध मध्यवर्गीय मन के अपराध-बोध को मूर्त कर देते हैं। कवि एक जिरह के कठघरे में खड़ा है। यह जिरह बाहर की अदालत नहीं, भीतर की अदालत है।

इस कविता में दो महत्वपूर्ण बातें हैं। पहली, आत्मालोचना। मुक्तिबोध किसी दूसरे पर आरोप नहीं लगाते, स्वयं को कटघरे में खड़ा करते हैं। दूसरी, इतिहास-बोध। भूल-गलती कहती है -
तूने क्या किया जीवन भर?
यह प्रश्न केवल व्यक्तिगत नहीं, ऐतिहासिक है। स्वतंत्रता के बाद के बुद्धिजीवी की निष्क्रियता पर यह सीधा प्रहार है। यही कारण है कि मुक्तिबोध की कविता में मैं हमेशा हम में बदल जाता है।

भाषा की दृष्टि से देखें तो इस कविता में भी वही मुक्तिबोधी लंबी, क्लॉज-दर-क्लॉज चलने वाली वाक्य-संरचना है जो पाठक को भटकाती नहीं, उलझाती है ताकि वह सोचे।
2. अंधेरे में : फैंटेसी और युग-चेतना का महाकाव्य
यदि हिंदी में कोई एक कविता आधुनिक समय का डिवाइन कॉमेडी कहलाने योग्य है तो वह अंधेरे में है। यह लगभग 300 से अधिक पंक्तियों की लंबी कविता है जो आठ खंडों में विभाजित है।

कथानक और फैंटेसी:
रात के अंधेरे में कवि के कमरे में एक रहस्यमय व्यक्ति आता है - तिलक लगाए, मस्तक पर खून का टीका। वह गांधी का प्रतिरूप लगता है पर साथ ही वह विद्रोह का प्रतीक भी है। शहर में मार्शल लॉ लगा है। कवि भागता है, एक जुलूस देखता है, पहाड़, खोह, बरगद का पेड़, सैनिक, गुहान्धकार - सब एक स्वप्न-क्रम में आते-जाते हैं। अंत में वह आत्म-रूपांतरण की घोषणा करता है।

यह फैंटेसी पलायन नहीं है, जैसा कि अक्सर समझा जाता है। मुक्तिबोध के लिए फैंटेसी यथार्थ को अधिक सच बनाने का औजार है। वे एक साहित्यिक की डायरी में लिखते हैं - "फैंटेसी में मन की निगूढ़ वृत्तियों का उद्घाटन होता है।"

अंधेरे में की फैंटेसी के तीन स्तर हैं:
क. मनोवैज्ञानिक स्तर - यह कवि के अंतर्मन का अपराध-बोध, भय और मुक्ति की इच्छा का प्रक्षेपण है।
ख. सामाजिक स्तर - यह 60 के दशक के भारतीय जनतंत्र में उभरते फासीवाद, दमन और मध्यवर्ग की कायरता का चित्र है।
ग. दार्शनिक स्तर - यह अंधकार से प्रकाश की ओर, आत्म से परमात्म की ओर नहीं, बल्कि स्वार्थ से जन-पक्षधरता की ओर जाने की यात्रा है।

कविता की सबसे चर्चित पंक्तियाँ इसी द्वंद्व को व्यक्त करती हैं:
अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे
उठाने ही होंगे
तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब
यहाँ अभिव्यक्ति केवल काव्य की अभिव्यक्ति नहीं, जीवन-पक्षधरता की अभिव्यक्ति है। मुक्तिबोध मानते हैं कि बिना खतरा उठाए कोई सार्थक लेखन संभव नहीं।
3. एक साहित्यिक की डायरी : सृजन-प्रक्रिया का दस्तावेज
मुक्तिबोध को समझना हो तो उनकी डायरी पढ़ना अनिवार्य है। यह डायरी रोज़नामचा नहीं, साहित्यिक सिद्धांत की प्रयोगशाला है।

इसमें तीन सूत्र बहुत महत्वपूर्ण हैं:

पहला सूत्र - ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान: मुक्तिबोध कहते हैं कि ज्ञान केवल बुद्धि की चीज नहीं, वह संवेदना बनकर आता है। और संवेदना केवल भावुकता नहीं, वह ज्ञान बनकर ठोस होती है। इसी द्वंद्वात्मक प्रक्रिया से श्रेष्ठ कविता बनती है।

दूसरा सूत्र - आत्म-संघर्ष: वे लिखते हैं कि लेखक के भीतर दो वर्ग हैं - एक शोषक वर्ग के संस्कारों वाला मन और दूसरा शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति रखने वाला मन। इन दोनों के बीच निरंतर संघर्ष चलता है। जो लेखक इस संघर्ष से बचता है, वह समझौतावादी हो जाता है।

तीसरा सूत्र - साहित्य का उद्देश्य: उनके लिए साहित्य आत्म-शोभा नहीं, आत्म-खोज है। वे तीसरा क्षण नामक निबंध में कहते हैं कि सृजन का पहला क्षण जीवन-अनुभव है, दूसरा क्षण उस अनुभव से तटस्थ होकर चिंतन करना है, और तीसरा क्षण उस चिंतन को फिर से संवेदना में बदलकर अभिव्यक्त करना है।

यही कारण है कि मुक्तिबोध की भाषा में सौंदर्यता या सुखात्मकता जैसे प्रयोग मिलते हैं। वे भाषा के शास्त्रीय नहीं, प्रयोगधर्मी हैं। वे कबीर की परंपरा के कवि हैं जहाँ भाव की सचाई के सामने व्याकरण गौण हो जाता है।
4. बिम्ब-विधान और भाषा
मुक्तिबोध के बिम्ब घुटन, अंधकार, सीलन, ब्रह्मराक्षस, लकड़ी के रावण, चाँद का टेढ़ा मुँह जैसे हैं। ये बिम्ब सुंदर नहीं, सच्चे हैं।

उदाहरण के लिए ब्रह्मराक्षस कविता लें:
ब्रह्मराक्षस
शिष्य को पढ़ाता है
पछाड़ कर...
यह गुरु-शिष्य परंपरा, ज्ञान के व्यवसायीकरण और अधूरे आत्म-ज्ञान का बिम्ब है। ब्रह्मराक्षस स्वयं मुक्तिबोध ही हैं जो आत्म-ज्ञान के कुएँ में फँसे हैं।

इसी तरह चाँद का मुँह टेढ़ा है में चाँद पूँजीवादी संस्कृति का प्रतीक है जो टेढ़ा होकर देखता है।

मुक्तिबोध की भाषा लंबी साँस की भाषा है। वे छोटे-छोटे वाक्यों में नहीं, एक ही साँस में कई पंक्तियों तक चलते हैं। इससे कविता में एक बेचैनी, एक भाग-दौड़ पैदा होती है जो उनके युग की बेचैनी है।
निष्कर्ष
मुक्तिबोध हिंदी के ऐसे कवि हैं जो अपने पाठक को सुख नहीं दायित्व देते हैं। अंधेरे में का अंत निराशा में नहीं, एक संकल्प में होता है -
मुझे अपने आँसुओं का अर्घ्य
उस महाशक्ति को देना है
जो मेरे भीतर है
यह महाशक्ति कोई ईश्वर नहीं, जन-चेतना है।

मुक्तिबोध आज इसलिए प्रासंगिक हैं क्योंकि आज भी अभिव्यक्ति के खतरे वही हैं, अंधेरा वही है, और भूल-गलती आज भी हमारी छाती पर बैठी जिरह कर रही है। वे केवल कवि नहीं, एक नैतिक विवेक हैं। हिंदी कविता में उनका होना इस बात का प्रमाण है कि कविता केवल सजावट नहीं, आत्मा की मशाल भी हो सकती है।


डॉ.अनिल कुमार भतपहरी 
   प्राध्यापक 
रमोतीन माड़िया आदर्श महिला महाविद्यालय नारायणपुर बस्तर।

Saturday, August 29, 2026

मोतीमहल गुरुद्वारा भण्डारपुरी जीर्णोद्वार

मोती महल सतनाम गुरुद्वारा, भंडारपुरी : 1962 से जीर्णोद्धार की प्रतीक्षा

भंडारपुरी धाम स्थित मोती महल सतनाम गुरुद्वारा के जीर्णोद्धार की चर्चा आज की नहीं है। नीलेश अनंत जी के दादा जी के पास सुरक्षित एक जयंती सूचना पम्पलेट से यह स्पष्ट होता है कि इसकी बातें 1962 से ही होती रही हैं।

1962 में तत्कालीन सांसद मिनीमाता जी के आह्वान पर भंडारपुरी में तृतीय गुरु घासीदास जयंती का भव्य आयोजन किया गया था। उल्लेखनीय है कि 1960 के पूर्व गुरुद्वारा परिसर में जयंती पर्व नहीं मनाया जाता था।

गुरुपर्व की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

18 दिसंबर जयंती की परम्परा का शुभारंभ 1936 में भोरिंग और जुनवानी से हुआ था। इसकी शुरुआत मंत्री नकुल देव ढीढी एवं महंत नंदू नारायण भतपहरी ने की थी, जो आज "गुरुपर्व" के रूप में प्रतिष्ठित है।

जीर्णोद्धार के प्रयास और राजनीतिक उतार-चढ़ाव

अनेक उतार-चढ़ावों के पश्चात वर्ष 1992 में भंडारपुरी मेला सभा में तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने गुरुद्वारा को पुरातत्व विभाग के अधीन लेकर जीर्णोद्धार की घोषणा की। इस अवसर पर भाजपा की वरिष्ठ नेत्री एवं ग्वालियर राजमाता विजयाराजे सिंधिया जी भी उपस्थित थीं। गुरु मनमोहन दास जी ने उन्हें गुरुद्वारा के जीर्ण-शीर्ण स्थलों को दिखाकर जीर्णोद्धार की मांग रखी थी। इस क्षण का मैं (अनिल भतपहरी) स्वयं साक्षी रहा हूँ।

कुछ समय पश्चात बाबरी मस्जिद कांड के बाद उक्त सरकार गिर गई। इसके बाद कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार के कार्यकाल में पुराने ढांचे को ध्वस्त कर पुनर्निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई, जो आज तक अपूर्ण है।

65 वर्षों से उपेक्षित आस्था का केंद्र

वस्तुतः लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र "मोती महल सतनाम गुरुद्वारा" पिछले 65 वर्षों से क्षत-विक्षत अवस्था में है। दोनों प्रमुख सत्तादलों की अनेक सरकारें आईं और गईं, परंतु स्थिति जस की तस बनी रही।

वर्तमान से अपेक्षा

वर्तमान सरकार से बड़ी अपेक्षा है कि उसके शेष कार्यकाल में गुरुद्वारा का लोकार्पण हो सके। इससे हम जैसे प्रणधारियों का यह प्रण पूर्ण होगा कि गुरुद्वारा के पूर्ण होने पर ही मेले में सम्मिलित होंगे। छठवीं पीढ़ी के गुरुवंशज खुशवंत साहेब वर्तमान में कैबिनेट मंत्री हैं, अतः स्वाभाविक है कि वे इस दिशा में सार्थक पहल करेंगे। वर्तमान सरकार धर्म और संस्कृति के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध भी है, इसलिए वर्षों पुरानी यह चाह साकार हो सकती है।

लेखक गुरुद्वारा ढहने के बाद से समीपस्थ ग्राम जुनवानी का निवासी होने तथा शोध कार्यों के कारण वहां जाता रहता है, परंतु प्रण के कारण मेले में सम्मिलित नहीं हुआ है।

संदर्भ : चित्र - नीलेश अनंत जी की फेसबुक वॉल से साभार प्राप्त, यह पम्पलेट उनके दादा जी द्वारा संरक्षित है।

- डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
जुनवानी, आरंग
मो. 9617777514
नवीनतम जानकारी : 21 अगस्त को छत्तीसगढ़ शासन द्वारा भंडारपुरी धाम में गुरुद्वारा (मोती महल) निर्माण हेतु 17 करोड़ 11 लाख 22 हजार रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति प्रदान की गई है।

Friday, August 28, 2026

सतनाम पंथ में सूर्य- चंद्र उपासना और जोड़ा जैतखाम की अवधारणा

सतनाम पंथ में सूर्य-चंद्र उपासना और जोड़ा जैतखाम की अवधारणा : एक सांस्कृतिक अध्ययन
लेखक : डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
सार (Abstract)
सतनाम पंथ केवल एक धार्मिक सम्प्रदाय नहीं, बल्कि सत्य, समानता और प्रकाश की साधना है। इस शोध पत्र में सतनामी समाज में प्रचलित सूर्योपासना, पूर्णिमा को चंद्र-वंदना, और भंडारपुरी-गिरौदपुरी में स्थापित सूरज-चंदा नामक जोड़ा जैतखाम के आध्यात्मिक, योगिक और सामाजिक अर्थों का विश्लेषण किया गया है। 1908 में E.M. Gordon द्वारा लिखित Indian Folk Tales में मिले प्रत्यक्ष अवलोकन को आधार बनाकर यह सिद्ध किया गया है कि सतनाम पंथ की प्रकाश-उपासना निर्गुण निराकार सतनाम की ही अभिव्यक्ति है।
1. प्रस्तावना
भारतीय संस्कृति में सूर्य, चंद्र और तारा मंडल आदिकाल से मानव के प्रेरक और रहनुमा रहे हैं। वे अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं, इसलिए विश्व भर में कई स्वरूपों में पूज्यनीय हैं। गुरु घासीदास बाबा (1756-1836) ने इसी नैसर्गिक प्रकाश-पूंज की आराधना को जाति-पाति और मूर्ति-भेद से मुक्त कर सीधे 'सतनाम' से जोड़ दिया।
2. ऐतिहासिक प्रमाण : 1908 का अवलोकन
इस परम्परा की सबसे पुरानी लिखित गवाही ब्रिटिश मिशनरी और नृविज्ञानी E.M. Gordon की पुस्तक Indian Folk Tales: Being Side-Lights on Village Life in Bilaspore, Central Provinces (1908) के Chapter II - Objects of Worship and Festivals में मिलती है।  

लेखक लिखता है :
"Passing a certain Satnami village early one morning, I noticed an old woman seated at the doorway of her hut facing east. As the sun appeared above the horizon I observed her bowing her head to the ground three times, and repeating the words of salutation enjoined by Ghassi Das - 'Satnam, Satnam, Satnam'; 'True name' she said three times, and this alone was her morning worship."
अर्थात नित्य सुबह शाम सूर्य की ओर मुख कर सतनाम उच्चारण ही सतनामियों की मूल उपासना थी। यही परम्परा आज भी जीवित है।
3. सतनामी उपासना के दो प्रमुख स्वरूप
अ) नित्य सूर्योपासना: प्रातः और सायं सूर्याभिमुख होकर तीन बार सतनाम का उच्चारण। यह मूर्ति पूजा नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष प्रकृति में सत को देखना है। सतनाम का अर्थ ही है - जो सत्य है वही ईश्वर है, और सूर्य उस सत्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

ब) पूर्णिमा में चंदा उपासना: सतनामी समाज में चौका-आरती, भजन प्रायः चौदस और पुन्नी (पूर्णिमा) को ही कराए जाते हैं। पूर्णिमा की रात चंद्रमा की ओर मुख कर सतनाम उच्चारण किया जाता है। यह शीतल प्रकाश की साधना है, जो मन को शांत और स्थिर करती है।
4. जैतखाम का योगिक और सामाजिक दर्शन
आपके द्वारा बताया गया यह चिंतन इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।

सतनामी मान्यता में जैतखाम केवल स्तंभ नहीं है, वह सत्य का खाम (Satya-Stambh) है, सेतखाम, ज्योतिखाम भी कहलाता है।
• योगिक अर्थ: जैतखाम एक ज्योति-पुंज है। जैसे सिद्ध योग साधक में कुंडलिनी जागरण होता है तो वह दीये की ज्योत के समान प्रकाशवान और ऊर्ध्वगामी होता है, उसी के प्रतीकार्थ एक हाथ का निसाना घर के आँगन में स्थापित किया जाता है, जिससे घर आलोकित हो और कल्मष / बुरी शक्ति का दुष्प्रभाव न पड़े। • सामाजिक अर्थ: उसी एक से इक्कीस की बढ़ोत्तरी ही गाँव की गली में विराट 21 हाथ का जैतखाम होता है, ताकि पूरा गाँव प्रकाशवान हो और कल्मष / बुरी शक्ति का असर न हो। अर्थात व्यक्ति से समष्टि तक प्रकाश का विस्तार।  5. सूरज-चंदा जोड़ा जैतखाम : भंडारपुरी मोतीमहल का विशेष महत्व
जोड़ा जैतखाम का अर्थ है - एक ही चबूतरे पर दो स्तंभों की स्थापना। गुरु घासीदास बाबा ने स्वयं भंडारपुरी मोतीमहल गुरुद्वारा में सूर्य और चंद्रमा नाम के दो जोड़ा जैतखाम स्थापित कराए थे, ताकि इस पावन धाम से सर्वत्र लोक-मंगल का भाव मानव समुदाय में विस्तारित हो।  

गिरौदपुरी और भंडारपुरी दोनों ही आज सतनामी आस्था के मुख्य केंद्र हैं, जहाँ जोड़ा जैतखाम स्थापित हैं। यह गुरु की दूरदर्शिता थी कि उन्होंने दिन और रात, दोनों के प्रकाश-स्रोतों को सतनाम का प्रतीक बना दिया।
6. लोक-आरती में अभिव्यक्ति
इसी दर्शन की अभिव्यक्ति पारंपरिक जैतखाम आरती में होती है:
जगमग जोती खाम के, सूरज चंदा नाम हे
आरती मनावव जोड़ा जैतखाम के...
भावार्थ - जैतखाम की ज्योति जगमगा रही है, जिसके दो नाम हैं - सूरज और चंदा। दोनों ही काल के साक्षी हैं, दोनों ही सतनाम के प्रतीक हैं। एक दिन को प्रकाश देता है, दूसरा रात को, पर सत्य अखंड है।
7. निष्कर्ष
सतनाम पंथ में सूर्य-चंद्र की पूजा किसी ग्रह-शांति के लिए नहीं, बल्कि मानव को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने की प्रेरणा के लिए है। गुरु घासीदास जी ने इन नैसर्गिक प्रकाश-पुंजों की आराधना को उनके प्रतीक जैतखाम से जोड़कर एक ऐसा मार्ग दिया जहाँ स्वयं येऔर समुदाय दोनों का कल्याण हो सके।

भंडारपुरी का जोड़ा जैतखाम इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सतनाम पंथ प्रकृति, योग और सामाजिक समता को एक ही सूत्र में पिरोता है।

डॉ.अनिल कुमार भतपहरी 
9617777514

जुनवानी: ब्रिटिश काल से जन जागरण की गौरव- गाथा

ग्राम जुनवानी : सामाजिक चेतना से राजनैतिक चेतना तक
ब्रिटिश काल से जनजागरण की गौरव-गाथा (1937-2026)

लेखक : डॉ. अनिल कुमार भतपहरी (9617777514)
प्राध्यापक, जुनवानी, रायपुर (छत्तीसगढ़)

प्रस्तावना : चार भाइयों का बसाया ग्राम और उसका विशिष्ट महत्व

भतपहरी एवं परिवार जुनवानी - ललवा, नोहरा, भारत, बंशी चार भाइयों द्वारा बसाया गया ऐतिहासिक ग्राम जुनवानी, विकासखंड पलारी, जिला रायपुर आज प्रदेश में विशिष्ट महत्व रखता है।

इस ग्राम में सतनाम पंथ प्रवर्तक गुरु घासीदास, शहीद वीर नारायण सिंह, अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पं. विद्याचरण शुक्ल, छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री श्री अजीत जोगी जैसी प्रसिद्ध हस्तियों का आगमन हुआ है। वहीं डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी के पुण्य स्मरण एवं परिनिर्वाण दिवस पर आयोजन कर दो विपरीत विचारधाराओं में समन्वय की परम्परा भी विकसित हुई है। इनके सूत्रधार रहे ग्राम के बड़े-बुजुर्ग, जिनके आशीष से यह छोटा सा ग्राम आज भी जीवंत है।

किसी आयोजन के समाप्त होने के बाद हम पर्चे, पोस्टर, बैज को बेकार समझकर फेंक देते हैं। लेकिन यही संभालकर रखे जाएँ तो ऐतिहासिक दस्तावेज बन जाते हैं। लगभग 1995 का यह पर्चा - महंत स्व. श्री नंदू नारायण भतपहरी जी की 5वीं पुण्यतिथि (10-11-1995) के अवसर पर आयोजित आमसभा का है (सिन्हा प्रिंटर्स, मोवा, रायपुर द्वारा मुद्रित) - जुनवानी के 90 वर्षीय जनजागरण का साक्ष्य है।

खंड 1 : प्रथम जागरण - बाल समाज (1937)

आजादी के पूर्व 1937 में 'बाल समाज' की स्थापना हुई। प्रणेता द्वय थे - डेढ़ शाला मंत्री नकुल देव ढीढी जी और **महंत नंदू नारायण भतपहरी जी (जन्म 1916)**।

भतपहरी जी एक साधारण कृषक परिवार में जन्मे। ब्रिटिश काल में गीधपुरी मिडिल स्कूल से सातवीं कक्षा में उन्होंने सम्पूर्ण रायपुर जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया। वे अखिल भारतीय सतनामी महासभा (पंजीयन क्र. 65) के प्रथम अध्यक्ष और बाबा साहब के सान्निध्य में शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन, महाकौशल प्रांत के प्रथम अध्यक्ष बने। उनका परिनिर्वाण 1990 में हुआ।

खंड 2 : संसाधन का अनूठा मॉडल (1938-39)

जयंती हेतु 1938-39 में प्रति घर एक बोरा धान एकत्र किया गया - कुल लगभग 50 बोरा। उसे बेचकर रायपुर से बैटरी वाला माइक सेट खरीदा गया, जिसे बैलगाड़ी से भैंसा बस स्टैंड से ग्राम लाया गया। यही माइक क्रांति का साधन बना - आसपास सभाएँ, रैलियाँ, पंथी नृत्य, भजन-कीर्तन, कव्वाली होने लगीं। अंत में मंत्री जी और महंत जी का उद्बोधन होता। रात्रि में पेट्रोमैक्स लगाकर गम्मत-नाच होते थे।

खंड 3 : पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकास

प्रथम पीढ़ी (बाल समाज): चैतू, चैतराम, मनोहर लाल, भुवनलाल, बिहारी लाल, जीवनलाल (सुकालदास), किशन लाल, किसलाल, जोहन लाल, फत्तेलाल, बुधेलाल, राधेलाल, मनीराम, जमुना, साधुराम, कार्तिक, बरातू। ये आगे चलकर वकील, शिक्षक, फौज, बीएसपी जैसी सेवाओं में गए - नवजागरण के असल सिपाही।

द्वितीय पीढ़ी (पंथी पीढ़ी): प्रेमदास, कनकदास, चरणदास, आशा, सुनहर दास, भोकवा, बाठुल, जयनंद, जितेंद्र, पवन, अशोक, सुधारण, कार्तिक, सराधु, हरिश्चन्द्र, मदन। इनकी पंथी पार्टी प्रसिद्ध थी, गिरौदपुरी के मंच पर सम्मानित हुई। इसी पीढ़ी ने दस दिवसीय गुरु गद्दी पूजा की नींव रखी।

तृतीय पीढ़ी - युवा जागृति मंच (1984): 1984 में इंदिरा गांधी जी की हत्या के बाद जनरल प्रमोशन से खाली समय में शिक्षक श्री सुकालदास भतपहरी जी ने पुत्र अनिल भतपहरी के नेतृत्व में 'युवा जागृति मंच' बनाया। सदस्य - चेतन, आत्मा, उभे, शिवकुमार, जैनेंद्र, सुमरन, उजेन, चित्रांगद, नारायण, आजुराम, राजकुमार, संतोष, अरुण, गजाधर, लक्ष्मण, माधो, दिलीप, इतवारी। इन्होंने पाम्पलेट प्रकाशित कर गुरु गद्दी पूजा को व्यवस्थित किया। संचालन सुकालदास जी ने ही किया।

इसी दौर में सुनील भतपहरी (एम.एड) ने जय सतनाम कबड्डी टीम व सतनाम क्रिकेट क्लब बनाया। छोटे भाई सुशील भतपहरी 'क्लोन सचिन तेंदुलकर' के नाम से प्रसिद्ध शानदार बल्लेबाज थे। डॉ. अनिल भतपहरी के मैनेजरशिप में अनेक प्रतियोगिताएँ जीती गईं। सतनाम भवन मेडल-शील्ड से सजा प्रेरणा स्थल बना।

खंड 4 : सामाजिक चेतना से राजनैतिक चेतना

ग्राम में प्राचीन समय से काली फर्शी खदान के व्यवसाय से आर्थिक समृद्धि थी, अतएव नवाचार हुए। सतनाम धर्म के चतुर्थ उत्तराधिकारी धर्मगुरु अगमदास और गुरु महंत नयनदास के गौरक्षा आंदोलन से उत्साहित होकर श्री प्यारी टंडन स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुए और उन्हें आजीवन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पेंशन मिली। वहीं दूसरी ओर डॉ. अम्बेडकर की विचारधारा से समता सैनिक दल का गठन हुआ।

1952 के प्रथम आम चुनाव में मंत्री नकुल देव ढीढी रायपुर लोकसभा से SCF प्रत्याशी बने - पूरा गाँव प्रचार में उमड़ा। बाद में RPI गठन पर महंत नंदू नारायण महाकौशल प्रांत अध्यक्ष बने, पलारी विधानसभा से लड़े और पलारी जनपद पंचायत के उपाध्यक्ष रहे (अध्यक्ष - तिलक वर्मा जी)। उनके बाद एड. भीष्म देव ढीढी महासमुंद लोकसभा और एड. मनोहर लाल भतपहरी रायपुर लोकसभा से RPI प्रत्याशी रहे। म.प्र. शासन में एड. भुवनलाल भतपहरी अनु. जाति आयोग में राज्य मंत्री दर्जा के अध्यक्ष बने।

इसी प्रतिष्ठा से अनेक प्रतिष्ठित परिवारों की रिश्तेदारी जुड़ी। डॉ. शिवकुमार डहरिया जी का ससुराल जुनवानी बना - वे पलारी विधायक और बाद में छत्तीसगढ़ के कैबिनेट मंत्री बने। सुनील भतपहरी जिला पंचायत सदस्य, सरपंच, पानी पंचायत अध्यक्ष रहे। वर्तमान में कैबिनेट मंत्री श्री दयालदास बघेल जी की सुपुत्री भी यहाँ की बहू हैं।

उपसंहार

गुरु घासीदास जयंती, अइटका तिहार, गुरु गद्दी पूजा, पंथी, कबड्डी और क्रिकेट टीमों ने सामाजिक एकता का उदाहरण प्रस्तुत किया। इसी निरंतर शैक्षिक जागरूकता का परिणाम है कि आज ग्राम के प्रायः हर घर से स्नातक, शिक्षक, शासकीय सेवक रायपुर, बलौदाबाजार, महासमुंद, आरंग, खरोरा में फैले हुए हैं।

जुनवानी की यात्रा बताती है - एक बोरा धान से माइक आया, माइक से आवाज आई और आवाज से अधिकार की चेतना जगी।

डॉ अनिल कुमार भतपहरी