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*गौरक्षा आंदोलन से बनी स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि*
गुरु घासीदास ने सतनाम पंथ का प्रवर्तन कर जिस नवजागरण का सूत्रपात किया, उसका व्यापक प्रभाव समकालीन समाज पर पड़ा। कुल आबादी का लगभग 17-18% समुदाय उनसे जुड़ गया। जनजागरण का कार्य उनके पुत्र *राजा गुरुबालकदास* और उनके बालसखा *वीरनारायण सिंह* के माध्यम से आगे बढ़ा। व्यक्ति स्वतंत्रता की ज्योति प्रज्ज्वलित हुई, जिसकी रोशनी से ट्रांस महानदी क्षेत्र - सिरपुर, भंडारपुरी से लेकर शिवरीनारायण, गिरौदपुरी/सोनाखान तक आलोकित हुआ।
गुरु घासीदास के बाद इन दोनों महानायकों का कार्य स्वर्णाक्षरों में अंकित है। वीरनारायण सिंह प्रजा हितार्थ अंग्रेजी सत्ता और उनके मातहत सामंत-महाजनों के षड्यंत्र के शिकार होकर *10 दिसंबर 1857* को शहीद हो गए। उनके ठीक 3 वर्ष बाद, राजा गुरुबालकदास द्वारा चलाए जा रहे 'रामत-रावटी' से नाराज अंग्रेजी सत्ता और उनके पोषित सामंतों ने निहत्थे गुरु पर भोजन करते समय कायराना हमला कर दिया। फलस्वरूप जनजागरण करते हुए गुरुवर *28 मार्च 1860* को शहादत को प्राप्त हुए।
इस प्रकार जन-आंदोलन को कुचलने का कार्य अंग्रेजी सत्ता ने अपने मातहत देशी सामंतों के द्वारा कर एकछत्र और निर्विघ्न राज किया।
परंतु यह अधिक दिनों तक नहीं चला। *1915* में सतनामियों द्वारा *महंत नयनदास महिलांग* के नेतृत्व में गौरक्षा आंदोलन बलौदाबाजार की सरजमीं से प्रारंभ हुआ और यह घटना पुनः तेजी से जनजागरण में परिवर्तित हो गई। इस प्रकार लोक चेतना गुरु घासीदास के सप्त सिद्धांत, अमृत वाणी और उपदेशों के रूप में अंतःसलिला के समान प्रवाहित होती रही।
*छत्तीसगढ़ में तीन ऐतिहासिक आंदोलन: 1915-1920*
1. सतनामियों का गौरक्षा आंदोलन 1915-20
2. कृषकों का कंडेल नहर सत्याग्रह - 20 दिसंबर 1920
3. आदिवासियों का जंगल सत्याग्रह
इन तीनों आंदोलनों की गूंज देश भर में हुई। फलस्वरूप गांधी जी का प्रथम छत्तीसगढ़ प्रवास हुआ।
दूसरा प्रवास अस्पृश्यता निवारण यात्रा के दौरान *22 नवंबर 1933* को, और तीसरा *1936* में कोलकाता जाते समय रायपुर रेलवे स्टेशन पर संक्षिप्त प्रवास के रूप में हुआ।
इन तीनों प्रवासों के कारण समकालीन छत्तीसगढ़ की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर हुई।
आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आइए, इनमें प्रथम एवं प्रमुख घटना - *बलौदाबाजार परिक्षेत्र के गौरक्षा आंदोलन (1915-1920)* का संक्षिप्त विश्लेषण करें।
*बलौदाबाजार परिक्षेत्र का गौरक्षा आंदोलन (1915-1920)*
सलौनी निवासी *राजमहंत नयनदास महिलांग* के नेतृत्व में यह आंदोलन 1915-20 तक चला। अंततः ब्रिटिश सरकार को अपना शासकीय बूचड़खाना करमनडीह/ढाबाडीह बंद करना पड़ा। समीपस्थ निपानियां-भाटापारा रेलवे स्टेशन से गोमांस कलकत्ता, मद्रास, बॉम्बे सप्लाई होता था। बलौदाबाजार और किरवई दो बड़े मवेशी बाजार थे, जहाँ से गोवंश उपलब्ध होता था।
*महंत नयनदास महिलांग* जी और *गुरु अगमदास* जी के इस आंदोलन में सतनामी समाज और *मदन ठेठवार* जी के नेतृत्व में यादव समाज समान रूप से जुड़ा हुआ था। गांव-गांव पर्चे छपवाकर गौरक्षा आंदोलन की पृष्ठभूमि बनाई गई। नारा था: `'छड़वे गाय, बछवा, पाड़ा, वृद्ध बैल, भैंसा नहीं बेचने'` तथा उन्हें माता-पिता, भाई-बहन जैसे आत्मीय रिश्ते से जोड़कर मार्मिक अपील की जाती थी।
जन-जागरण पंथी गीतों के द्वारा होता था -
`झन मारो कसैया मय गैया, हव जी झन मारो कसैया...`
गांधी जी इस आंदोलन से प्रभावित हुए और अवलोकनार्थ इस परिक्षेत्र का भी दौरा किया।
*एक स्मरणीय वाकया*: रायपुर से बलौदाबाजार मार्ग पर भैंसा बस स्टैंड पर गांधी जी को प्रणाम करने एक सतनामी महिला आई। वह इस शर्त पर मिलना चाहती थी कि पहले गांधी जी उसके लिए एक रुपया दान करें। महिला के पास रुपये नहीं थे। सहज भाव से बोली - `'आप यहीं ठहरें, मैं अभी घर से पैसे लेकर आ रही हूँ।'` उनकी इस निश्छलता से गांधी जी बहुत प्रभावित हुए।
आगे चलकर वे गुरुवंशज अगमदास, मिनीमाता सहित अनेक संत-महंतों से मिले और सतनाम संस्कृति तथा तीन बंदरों के दृष्टांत से भी परिचित हुए।
*स्वतंत्रता संग्राम में सहभागिता*
गांधी जी का आगमन छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम और अस्पृश्यता निवारण के संदर्भ में हुआ। सतनामियों ने कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग किया, इस आशा के साथ कि स्वतंत्र भारत में उनका खोया हुआ वैभव लौटेगा और सामाजिक वैमनस्य से मुक्ति मिलेगी।
अनेक मालगुजार, गौटिया, मंडल खुलकर कांग्रेस व गांधी जी के सहयोग में आए। 'हिंदू सतनामी महासभा' का गठन कर स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर सहभागिता निभाई और अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। *1935* में गठित अंतरिम सरकार 'सी.पी. एंड बरार' में *गुरु अगमदास गुरुगोसाईं* ने प्रतिनिधित्व किया और उनके नेतृत्व में पूरा समाज राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ा।
इसी बीच धर्मगुरु *मुक्तावन दास गुरुगोसाईं*, जो अगमदास जी के चचेरे भाई थे, को झूठे हत्याकांड में फंसाकर अमरावती जेल में बंद कर दिया गया था। उन्हें *डॉ. बी.आर. अम्बेडकर* ने विद्वतापूर्ण पैरवी कर बाइज्जत रिहा करवाया, जिसके कारण डॉ. अम्बेडकर का भी यहाँ व्यापक प्रभाव पड़ा।
इस प्रकार सतनामियों का द्वितीय सामाजिक एवं राजनीतिक अभियान 1915 से लेकर आजादी प्राप्ति तक, और उसके बाद सामाजिक समरसता एवं समानता अर्जित करने तक के लंबे संघर्ष का स्वर्णिम इतिहास है। इस समुदाय का सामाजिक आंदोलन आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में परिणत हो गया। तब छत्तीसगढ़ में प्रायः ग्रामीण एवं कस्बाई संस्कृति ही थी।
समकालीन घटनाक्रम का दस्तावेजीकरण अशिक्षा एवं प्रिंट माध्यम के अभाव सहित अन्य कारणों से नहीं हो सका, परंतु जनश्रुतियों में यह आज तक विद्यमान है।
*टिप्पणी*: ज्ञात हो कि तीन बंदरों का शिल्पांकन मोती महल गुरुद्वारा भंडारपुरी के कंगूरे पर अपने निर्माण काल 1820-25 से ही अंकित है और उसका समाज में गहरा प्रभाव है।
*जय हिंद, जय सतनाम*
_डॉ. अनिल कुमार भतपहरी_
_anilbhatpahari@gmail.com_