Monday, March 30, 2026

भारतीय संस्कृति पर श्रीराम का प्रभाव

"श्रीराम के भारतीय संस्कृति पर प्रभाव"
  -डॉ.अनिल कुमार भतपहरी                 
           प्राध्यापक (हिंदी)

     मानव जीवन निर्वाह के विविध पक्ष है वे सब संस्कृति के अधीन हैं परंतु भारतीय संस्कृति श्री राम के विराट व्यक्तित्व के अधीन हैं कहना या समझना कतई अतिशयोक्ति नहीं हैं।
सच में देखा जाय तो भगवान राम भारत के उत्तर से सुदूर दक्षिण तक पूज्यनीय हैं। जन जीवन ही नहीं पशु पक्षी और प्रकृति के अनेक सुरम्य स्थलों, जिसमें नदी नाले पर्वत झरने आदि पर उनके स्पष्ट प्रभाव दर्शनीय हैं। उनके सहचरो/ सहयोगियों के स्मृतियों को जनमानस आज भी सहेजे हुए हैं ।जहां पर मेले उत्सव आदि के आयोजन होते हैं। जिससे जनजीवन युगों से प्रेरित होते आ रहे हैं। यह बातें किसी भी देश समाज के लिए अत्यंत गौरव की बात हैं। श्री राम का प्रभाव इतना व्यापक हैं कि जैसे निर्गुण भक्ति में परमात्मा चराचर व्याप्त हैं उनके अनुरुप ही सगुण भक्ति में महाकवि तुलसी लिखते हैं - 
सियाराम मैं सब जग जानी, करहूं प्रणाम जोरी जुग पानी। (1)

   
   प्रभु श्रीराम भारतीय संस्कृति में एक आदर्श पुरुष "मर्यादा पुरुषोत्तम"के रूप में पूजित हैं। उनके जीवन का प्रभाव इतना गहरा है कि आज भी समाज को दिशा देने में उनकी कहानी एवं जीवन के विविध प्रसंग महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आइए जानते हैं कि श्रीराम का भारतीय संस्कृति पर क्या प्रभाव है:

आदर्श पुत्र और भाई के रूप में
 बालक राम घर परिवार सहित नगर वासी के लिय भी प्रिय हैं उनकी मोहक छवि का वर्णन द्रष्टव्य हैं - ठुमकी चलत रामचंद्र बाजत पैजनियां( 2)

श्रीराम ने अपने पिता के वचन का पालन करते हुए  14 वर्षों का वनवास स्वीकार किया, जो कर्तव्य और नैतिकता का उत्कृष्ट उदाहरण है। उनके भाई लक्ष्मण और भरत के साथ उनके संबंध प्रेम और समर्पण की मिसाल देते हैं। वनवास काल में उनकी धर्मपत्नी सीता और लघु भ्राता लक्ष्मण तीनों तपस्वी स्वरुप में वनवासियों के मध्य 12 वर्षों तक रहकर उन्हें बेहद गहराई से प्रभावित किया।
वन में वनवासियों के बीच   रमकर आर्य पुत्र राम हुए।(3)
 
आदर्श पति और राजा के रूप में

श्रीराम ने सीता के प्रति अपने प्रेम और सम्मान के साथ-साथ एक राजा के रूप में न्याय, समानता और सुरक्षा का परिचय दिया। उनका शासन "रामराज्य" के नाम से जाना जाता है, जो आदर्श शासन प्रणाली का प्रतीक है। सीता वियोग से व्याकुल अवतारी समझे जाने वाले राम का मानवीय रुप बेहद प्रेरक और संवेदनशील हैं -
हे खग हे मधुकर श्रेणी 
तुम देखि सीता मृगनयनी (4)

समरसता और एकता के प्रतीक:
श्रीराम ने समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को साथ लेकर चलने की शिक्षा दी। उन्होंने वनवासी, गिरिवासी और नगरवासी सभी को समान रूप से सम्मान दिया और उनके साथ घुल-मिलकर रहे। अपने वनवास काल में सभी वर्ण जाति प्रजाति के सहयोग से ही अभेद्य लंका ढहा सके।असंभव को संभव करने का यह नायाब उदाहरण हैं-

लक्ष्मन के रेखा पारे ल परही 
चलो दानों के किल्ला उजारे ल परही (5)

नैतिक मूल्यों का महत्व:

श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि सफलता केवल भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि चरित्र, सत्य और मर्यादा में निहित है। उनके आदर्शों को अपनाकर हम एक बेहतर समाज और राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।  तभी राम नाम की महत्ता को स्वीकारते कबीर जैसे निर्गुण संत गा उठे -

राम नाम के पटतरे देबो को कुछ नाहि।
क्या लै गुरु संतोखीए हौंस रहे मन माहि।। (6 )

भक्तिकाल की सुप्रसिद्ध कवयित्री मीरा राम को अनमोल रतन के रुप में पाकर नाच उठीं -
पायो जी मैने राम रतन धन पायो..
खर्चे न होय चोर न ले जै दिन दिन बढ़त सवायो...(7)



आज के समय में प्रासंगिकता:

आज के समय में जब समाज में विभाजन, असहिष्णुता और स्वार्थ बढ़ रहा है, तब श्रीराम का जीवन हमें एकता, प्रेम और त्याग का मार्ग दिखाता है। उनके आदर्शों को आत्मसात करके हम अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में बदल सकते हैं।  राम रावण युद्ध सत्य असत्य के मध्य धर्म अधर्म के निमित्त हैं ।


श्रीराम का भारतीय साहित्य एवं समाज पर प्रभाव : 

श्रीराम का भारतीय साहित्य और समाज पर गहरा प्रभाव है। रामायण और रामकथा ने विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों में अपना स्थान बनाया है, जिससे समाज को नैतिकता, न्याय और एकता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।

समाज पर प्रभाव:

- नैतिकता और न्याय: राम की कहानी में अन्याय के प्रतिकार और सत्य की जीत का संदेश है, जो समाज को एक आदर्श प्रदान करता है।
- एकता और समन्वय: रामायण में विभिन्न वर्गों और जातियों के लोगों के बीच एकता और सहयोग का संदेश है, जो समाज में सौहार्द और सहयोग को बढ़ावा देता है। जैसे केवट  सबरी , वानर सुग्रीव, जामवंत, गिद्ध जटायु इत्यादि 
- लोकतंत्र की प्रासंगिकता: राम साहित्य लोकतंत्र के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें जनशक्ति की अनिवार्यता और सामाजिक मूल्यों की रक्षा के लिए जनता की भागीदारी का महत्व बताया गया है।

साहित्य पर प्रभाव:

राममय भारतवर्ष की सभी भाषाओं एवं बोलियों मे रामकाव्य मिलती हैं. राम का काज जन कल्याणकारी होने से स्तुत्य हैं. महाकवि तुलसीदास मानस मे लिखते हैं -
प्रिय लागिही अति सबहि मम भनिति राम जस संग |
दारु बिचारू कि करइ कोउ बंदीय मलय प्रसंग || (  8रामचरित मानस  पृष्ठ 14)

आधुनिक हिंदी साहित्य मे मैथिलिशरण गुप्त लिखते हैं 
राम तेरा जीवन ही काव्य हैं,
कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य हैं.9
    इस तरह हम देखते हैं कि साहित्य के इतिहास मे सभी कलखंड मे श्री राम से प्रभावित मुग्धकारी काव्य का प्रणयन होते आ रहें हैं. बल्कि भक्तिकाल मे राम को लेकर रामाश्रय शाखा का प्रवर्तन हुआ और विविधतापूर्वक भावप्रवण काव्य रचे गए.


- विभिन्न भाषाओं में रामायण: रामायण का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है और इसके विभिन्न संस्करणों में रामकथा को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है।
- जनजातीय और लोक संस्करण: रामायण के जनजातीय और लोक संस्करणों में राम और सीता को सामान्य परिवार से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है, जो भारतीय लोक की एकता और समन्वय की भावना को दर्शाता है। संस्कृत, ब्रज, अवधि, हिंदी उड़िया तमिल, कन्नड़ से लेकर छत्तीसगढी ,हलबी, गोड़ी, सरगुजिहा मे भी रामचरित लिखें गए.
- आधुनिक व्याख्या: राम साहित्य की चिरंतनता का एक आधार यह भी है कि उसमें मूल्यों को जड़ नहीं माना जाता, बल्कि हर युग में मूल्य व्यवस्था को पुनपर्रिभाषित  करना संभव है। पुनरुक्ति की परवाह किये बिना रामायण चुनिंदे पात्रों को केंद्र मे रख राम काव्य लिखें जा रहें.इस तरह रामकाव्य मे वैविध्य भाव दर्शनीय ही नहीं प्रेरक और अभिनंदनीय है.
- रामकाव्य समन्वय के प्रतीक : राम चरित के माध्यम से समकालीन समय मे विभिन्न मत पंथ मे जो विभेद और अग्राह्य भाव था उनमें समन्वय स्थापित की गई. जैसे वैष्णव और शैव मतावलम्बियों के मध्य इस भाव को रखकर उनमें तादातम्य स्थापित की गई : 
- सिव द्रोही मम भगत कहावा, सो नर सपनेहु मोहि न पावा.
- संकर बिमुख भगति चह मोरी, सो नारकी मूढ़ मति थोरी. (   10 लंकाकांड 709)

    इस तरह हम श्रीराम के व्यक्तित्व का सम्यक मूल्यांकन शास्त्रों एवं लोक में व्याप्त छवि के आधार पर विचार करते हैं तो राम को आदर्श लोक नायक के रुप में पाते हैं। हर माता पिता की चाह कि पुत्र राम जैसा हो। उनमें राम का गुण आए। इस दृष्टि से हमारी शिक्षण संस्थानों में राष्ट्र और समाज के लिए आदर्श युवा गढ़ने हेतु भी राम प्रेरक पात्र हैं ।इसलिए भी वह भारतीय रचनाकारों के साहित्य में अन्तर्भूत प्रेरक पुंज हैं।
संदर्भ:

1गोस्वामी तुलसीदास, रामचरित मानस पृष्ठ 

2 गोस्वामी तुलसीदास 

3 भतपहरी डॉ अनिल कुमार, हड्डी की जीभ नहीं कि न फिसले वन एलिगन नई दिल्ली पृष्ठ 
4 गोस्वामी तुलसी दास मानस 
5 लोक गीत आकाश वाणी रायपुर 
6 दास श्याम सुंदर कबीर रचनावली
7 मीरा बाई,मीरा के पद 
8 गोस्वामी तुलसी दास
 रामचरित मानस पृष्ठ 14 
9 मैथिलीशरण गुप्त 
10 गोस्वामी तुलसी दास रामचरित मानस पृष्ठ 709


     - डॉ.अनिल कुमार भतपहरी 
      प्राध्यापक ( हिंदी) 9617777514
वीरांगना रमोतीन माडिया शासकीय आदर्श महिला महाविद्यालय नारायणपुर छत्तीसगढ़

Sunday, March 22, 2026

बढे असासुन महंगाई

#anilbhattcg #vanprsth 

बाढ़े असासून मंहगाई 

रयपुर वाली दीदी कथे बने जंगल चल देस भाई.
इहा सहर म जिनगी पहई  हवय अबड़ करलाई.
मिलत नइये गैस सिलेंडर  बाढे असासून मंहगाई 
चूल्हा चौका गुजर बसर का कहिबे घाद दुःखदाई 
उहाँ उरर ले मुनगा भाजी कुरमा के चटपट चटनी 
छेना लकड़ी बार रमरम ले चूल्हा के सुग्घर रंधनी 
अम्मट बिच्छल भले कहे फेर सुवाद सेहत के खजाना 
भरे बोजे  जिनिस इहाँ फेर पैसा म रोगरई बिसाना

.डॉ अनिल भतपहरी / 9617777514

Sunday, March 15, 2026

मौहारी

मौहरी में महुआ बिनत हे मौहा रिन 
ये दे साल्हो ददरिया गावत हे मुटियारिन...

डोंगरी के तीर म तितुर बोले का ओ तितुर बोले का 
तोर आरो ल पाके मन हमर डोले का मौहरी म...

अधरे ल देखेंव परसा फुल सही लगत हे 
ये दे लाली के लुगरा ह,सुघर फबत हे...

अंझा मंझा देख मोला ओकर तीर म बलाना 
बोहत गरु झउहा सुग्घर कनिहा के लचकना...

डॉ अनिल भतपहरी/ ८-३-२६

Saturday, March 7, 2026

नई सुबह नाटक नई शिक्षा नीति

नई शिक्षा नीति : नाट्य मंचन 

।।नई सुबह।।

स्थान ग्रामीण या मध्यम वर्गीय क़स्बाई परिवार. जहाँ रेडियो या टीवी में सुबह 8 बजे समाचार प्रसारण हो रहें हैं..इस पर किसी का ध्यान नहीं हैं और बेखबर दैनिक कार्यों मे लगे हुए हैं.. तभी पिता जी के कानो समाचार सुनाई पड़ता हैं - इस वर्ष हायर सेकेण्डरी 12 वीं की परीक्षा परिणाम घोषित कर दी गई. परिणाम 70%. हमेशा की तरह विगत एक दशकों से छात्राएं छात्रों से  बाजी मारती आ रही हैं. मेरिट मे भी सर्वाधिक बालिकाएं हैं. परिणाम लोक शिक्षा विभाग के बेवसाईट मे अपलोड कर दी गई हैं.मान मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री ने उत्तीर्ण विद्यार्थियों को बधाई देते उनकी उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनायें दी. आगे का समाचार.... पिता उत्साह पूर्वक अरे बेटा अम्बा तुम्हारा रिजल्ट आ गया  मोबाईल में देखों... 

अम्बा: हा पापा वें झट आटे गुंथ रही थी को छोड़ उठ खड़ी हूई और वास बेसिन से हाथ धोने लगी...
माता जी: अरे महरानी जी पुरा गुंथ तो लेती भगी नहीं जा रही. अम्बा बिना कोई जवाब दिये जल्दी से मोबाईल लेकर बेवसाईट खोलकर अपना रोल नंबर डाली पर नामांकन नम्बर स्मृत नहीं होने पर वें अपना प्रवेश ढूंढने लगी... तब तक पड़ोसन  अपने घर की बालकनी से आवाज लगाई.
अरे बधाई हो अम्बा मेरिट मे पास हो गई. बिट्टू के पापा बता रहें हैं.

तब तक अम्बा की धडकने सुनकर और बड़ गई पिता जी ख़ुशी से उछल खड़े हो गये और माता जी नमस्ते कर हाथ जोड़ने लगी... मोबाईल सर्च करतें अम्बा धन्यवाद देते दूर से प्रणाम कहीं.

थोड़ी देर बाद वो एकदम सी उच्चल पड़ी मेरिट मे सातवे स्थान प्राप्त की हैं सभी विषय मे डीकटेंशन हैं. सर्वाधिक अंक उन्हें हिंदी साहित्य मे मिली हैं. यह बड़े उत्साह से अपने पापा जी को बताई पास मे माता जी सट कर खड़ी मोबाईल को कौतूहल पूर्वक देख रही हैं.
 
पापा : बेटा नई शिक्षा नीति के तहत तुम्हे अब ऐसे विषय चयन करना हैं कि आगे चलकर एक अच्छा प्रशासनिक अफसर बनो. क्योंकि तुम्हे डॉक्टर बनना पसंद नहीं हैं क्यों सच कहाँ न? 

हा पापा क्लास मे प्रवेश के समय    वेलकम पार्टी मे मैंने दृढ़ता पूर्वक अपना एम बता दी थी कि मुझे डॉक्टर,इंजिनियर नहीं एक सक्षम प्रशासनिक अधिकारी बनकर देश और समाज सेवा करना हैं.
शाबास तभी तो बारहवीं मे इतिहास, नागरिक शास्त्र और अर्थशास्त्र ली थी. मैं तो तुम्हारी मैथस का अंक देख इंजीनियरिंग करने का सलाह दिया था. पर तुम्हारी माता श्री डॉक्टर बनाना चाहती थी.
खैर बेटा जाओ और मिठाई दुकान से कलाकंद लेते आना. जेब से रूपये निकलते.. ये लो पैसे.
माता:  और हा,नाड़ीयल अगरबत्ती तो है, कपूर, सात बंगला पान जरुर लेते आना..
अम्बा चाबी ले बाहर पोर्च मे खड़ी स्कूटी को कपड़े से पोछने लगी.
     दृश्य 2
दृश्य बाजार का चारों ओर चहल पहल है वहाँ एक मिठाई दुकान के पास  अम्बा स्कूटी खड़ी कर ज्यो ही मुड़ी उनकी सहपाठी लडके लड़की मिल गये वें सभी मिठाई लेने आये थे कुछ ले चुके और हाथ मे मिठाई  लटकाएं हुए एक दूसरे को खिलाने लगे.
अम्बा तुम्हे मिठाई के साथ साथ पी वी आर मे फ़िल्म भी दिखानी होगी. बड़ी छुपी रुस्तम निकली यार!
   सहेलियां उन्हें गले से लगा ली माहौल खुशनुमा और चहकते हुए सभी एक -दूसरे को बधाई देते अपने अपने घर चली गई.
     पान खरीदने ज्यो ही पनवाड़ी की दुकान गई अम्बा देख कर चौकी कि उनका भाई आरव कुछ दोस्तों के साथ गुटखा सिगरेट पीने मे उन्मत्त थे. दूर से आकाश सिगरेट फेकते लपकते हुए अम्बा के पास जाकर गुस्से से गरियाने लगे.
आकाश - यहाँ क्या कर रही हो सुना है इधर लड़कियां नहीं आती? 
अम्बा - अच्छा ताकि तुम लडके गुलछर्रे उड़ाओ. 
आकाश - उंगली दिखाते देखोंsss
क्या देखों ! मैं यहाँ  पूजा के लिए पान लेने आई हूँ. 
 आकाश - तो घर मे मुझे क्यों नहीं कहाँ? 
अम्बा - तुम थे ही कहाँ और रहते भी हो? 
आकाश - अच्छा तुम क्या कहना चाहती हो  देखों बहस मत करो सभी इधर देख रहें है. अच्छा जाओ मैं लेते आ रहा हूँ.
अम्बा - नहीं लेकर ही जाउंगी या तुम्ही लाकर दे दो और घर चलो. तुम्हे पता होनी चाहिए कि मेरी रिजल्ट की ख़ुशी मे पापा मिठाई और मम्मी पूजन सामग्री मंगाई है. बात को चेंज करती हूई कहीं ताकि कोई बखेड़ा खड़ा न कर दे क्योंकि आकाश के स्वाभाव को अम्बा अच्छी तरह जानती समझती है. इस वर्ष आकाश भी इंजिनियर बनने कॉलेज ड्राफ कर PET दिया है और उनका रिजल्ट नहीं आया है.सो कुछ दोस्तों के साथ शहर के बाजार के आसपास  यु ही घूमते फिरते रहते है.


     3 दृश्य कॉलेज परिसर 

चारों तरफ छात्रों का शोर और सूचना पटल पर प्रवेश सूची की लिस्ट देखने उद्द्त है पंजे के एड़ी उठाकर या जम्प लगाकर उचक उचक कर नाम देखें जा रहें है.
अम्बा का नाम लिस्ट मे सबसे ऊपर था. इस बार आकाश भी प्रवेश हेतु  फार्म भरा तो  है पर नाम आने की भरोसा नहीं है.
भीड़ को चिरते अम्बा के पास गया जो अपनी स्कूटी के पास एक सहेली रेणु के साथ खड़ी थी.
आकाश - तुम दोनों का नाम फस्ट लिस्ट मे है. पर मेरा नहीं सेकेण्ड लिस्ट मे आएगा क्योंकि अभी कटाफ 65% है.
मेरा 61 है और एक वर्ष का गैप तो सेकेड लिस्ट मे आना तय है.
चलो घर एक सप्ताह के अंदर फीस पटाना है.

दृश्य 4
    
क्लास रूम बी ए प्रथम

प्रोफ़ेसर का कॉलेज प्रवेश 

 छात्रों का समवेत स्वर -गुड मार्निग सर 
 प्रोफेसर- गुड मार्निग, अच्छा  आपलोग सुप्रभात और नमस्कार भी कहना सीखो क्योंकि हमें अपनी संस्कृति भूलना नहीं चाहिए 
छात्रों- जी सर 

प्रोफेसर - तो बच्चों आप लोगो को पता है अपना अपना  मुख्य विषय और सहायक विषय क्योंकि आप लोग नई शिक्षा नीति के तहत नए पाठ्यक्रम पढ़ रहें है.
अम्बा - जी सर इनकी जानकारी बेबसाईट मे अपलोड है और चवाइस सेंटर में फार्म भरते पता है.
प्रो वेरी गुड क्या नाम है बेटा 
अम्बा - जी अम्बा पर बेटा क्यों सर मैं तो बेटी हूँ.
प्रो - वो इसलिए की कोई फर्क न हो 
अम्बा - जी ऐसा कहने मे ही फर्क या भेद सा हमें चुभता है. हमें बेटी या छात्रों कहें. 
प्रो अच्छा ऐसा क्यों?
अम्बा - क्योंकि ऐसा हमारे पिताजी अक्सर कहते है पर मुझे उनका बेटा अच्छा नहीं लगता. अच्छा और सफलता के काम करे तो भी क्रेडिट बेटा को बेटियों को नहीं ऐसा ना हो सर.


प्रो-  ए बात है पर मुझे क्या आजकल सभी जगहों घर आफिस बाज़ार सभी... बात काटते हुए अम्बा जो है वहीं कहीं जाय.
 रेणु  :जी सर हम बेटियों का वजूद और प्रभाव तो कुछ हो सके.  साहसिक कार्य और सफलता का मतलब लडके/ बेटे यह  तो न हो 
प्रो- झेपते हुए ठीक है, ठीक है

नेपथ्य  स्वर -  राज्य के 12 बोर्ड मे अधिकतर छात्र संख्या पास हुए है लेकिन सबके लिए उच्च शिक्षा संभव नहीं. इस बार इस महाविद्याल मे बी ए फस्ट ईयर  का 200 सीट, बीएससी का 70 और बी काम का 50 सीट पुरा भर गया.और अनेक छात्र कम मार्क्स के कारण प्रवेश से वंचित भी गये  उन्हें मौका मिलना चाहिए 

 दृश्य 5

 नेपथ्य स्वर  - हा जी हा अनेक व्यवसायिक/ तकनीकी शिक्षा है आई आई टी पालिटेक्निक, इंजिनियरिंग नर्सिंग  मेडिकल कृषि डेयरी मत्स्य इत्यादि इन जगहों पर छात्र बट जाते है बाकी डिग्री / पोस्ट डिग्री कॉलेज जिनकी प्रदेश मे 335 महाविद्यालय और 9 विश्वविद्यालय है 

फिर उसके बाद अशासकीय विश्वविद्यालय 11 और 350  महाविद्याल है. इसके बाद  स्वाध्यायी  परीक्षा और मुक्त और दूरस्थ विश्वविद्यालय के ऑप्शन भी है कोई भी अपने सुविधा अनुसार चयन कर सकते है.

महाविद्याल परिसर दो सहेली परस्पर चर्चा करतें हुए 
अम्बा- 12 वीं के अनुसार विषय तो ले लिए पर रुची के अनुरुप वैकल्पिक विषय मेरा साइस का होता तो अच्छा रहता क्योंकि माता जी मुझे डॉक्टर बनाना चाहती थी और पिताजी इंजिनियर. 
रेणु :- अच्छा तो तुम्हारी इच्छा? हाई स्कूल तक तो कोई लक्ष्य या समझ नहीं था और फिर हमारे इर्द गिर्द 12 वीं मे ओ विषय नहीं मिले अन्य जगह पढ़ने भेजा नहीं तो आर्ट ही ले ली..
तो फिर रूचि किसमे मे है? 
ओ तो इच्छा डॉक्टर बनने की थी पर...
तो अभी भी आप्सन मे जुलाजी ग्रुप ले लीजिये. आगे चलकर काम आएगा. हो सके तो नर्सिंग कॉलेज चुन लेना.
क्या ऐसा संभव है क्यों नहीं? चलिए महाविद्याल में स्थापित हेल्प डेक्स मे जाये.. ओके चलिए

दृश्य 6

हेल्प डेक्स  टेबल  एक्सपर्ट लोग उस पार बैठे हुए कुछेक सामने बैठे/  खड़े

एन ई पी के तहत प्रत्येक छात्रों को मुख्य विषय के साथ ऐच्छीक विषय और रोजगार एवं मूल्य आधारित कोर्स ले सकते है. भारतीय ज्ञान परम्परा पृथक से जो रुचिकर हो. मतलब कम्प्लीट ऐजुकेशन का पाठ्यक्रम नए केरीकुलम के आधार पर निर्मित है और हमारा प्रदेश दो वर्ष पूर्व लागु कर देश मे चर्चित है.

आकाश: अच्छा सर लेकिन पूरी तरह स्पष्ट समझ नहीं आ रहा हैं ।
आप ध्यान से सुनिए और इसे समझने सामने स्क्रीन बोर्ड देखिए उसमें सारे ऑप्शन प्ले हो रहे हैं। वेबसाइट और गुगल भी देख समझ सकते हैं।
फिर भी समझिए_

हेल्प डेक्स _ किसी भी संकाय के मुख्य तीन विषय DSC है दूसरे संकाय से  किसी एक विषय  को लेगा वह DSE होता है।पर्यावरण और भाषा सिर्फ एक सेमेस्टर मे  पढ़ना होगा वहAEC है।बाकी के संवैधानिक मूल्य  /भारतीय पंरपरा आदि का अध्ययन  है वह और कौसल विकास से संबंधित कोर्स है।

  अम्बा _ जी सर बहुत अच्छा समझ आ गया।

हेल्प डेक्स _ और हा आसपास के उद्योग जगत से आगे चर्चा और अनुबंधन किया जाएगा कि संबंधित छात्रों को अप्रेंटिश करवाया जाय ताकि उन्हें सैद्धांतिक और व्यवहारिक ज्ञान हो सके। और यह सब सेमेस्टर पद्धति में होगा।
 सेमेस्टर पद्वति के कोर्स भविष्य में विद्वार्थियों के लिए उपयोगी है  सभी विषयों की जानकारी होगी किंतु  खासकर।प्रतियोगिता.परीक्षाओं के लिए उपयोगी है। 

लेकिन  विद्वार्थियों की नियमित उपस्थिति  होना होगा । उनके लिए सरकार योजना बना रहे है जैसे बस किराया साइकिल या स्कूटी वितरण इत्यादि।

विभाग का प्रयास रहेगा कि सभी विद्वार्थी सेमेस्टर पद्वति को बारीकी से  समझ सकें हैं।

नई शिक्षा नीति केवल सरकारी नौकरी पर ही ध्यान केंद्रित नहीं करेगी बल्कि छात्र को सामान्यतः ज्ञान और व्यवहार यानि लोकाचार से अवगत कराएगी। उन्हें हर तरह से दक्ष करने प्रतिबद्ध होगी।

 इसके लिए प्राध्यापकों को भी प्रशिक्षित करने योजना बनाई जाएगी ताकि हमारे देश के होनहार युवाओं को समय परिस्थिति के अनुरूप पढ़ा सके। नई शिक्षा नीति अध्ययन अध्यापन और क्षेत्र में व्यवहारिक ज्ञान हेतु परिभ्रमण के निमित्त हैं। इन तीनों प्रक्रिया ही नई सुबह आएगी।
आजकल मोबाइल नेट में गुगल e-book सोसल,मीडिया, मेटा फेसबुक A I जैसे अत्यधिक टेक्नोलॉजी हैं E  लाइब्रेरी है ।परन्तु इन सबको कैसे अनुप्रयोग करे और महत्वपूर्ण चीजों इत्यादि को समझाए इसलिए हमारे प्राध्यापकों को सामग्री उपलब्ध करवा रहे हैं।

जी सर धन्यवाद आभार , प्रणाम।

दृश्य 7

सभी छात्र संतुष्ट होकर क्लास रुम में प्रवेश करते हैं। और नई शिक्षा नीति की प्रशंसा करते हुए 
महाविद्यालय में स्मार्ट कक्ष, लैब लाइब्रेरी और स्वच्छ परिसर के साथ केंटिंग लिए महाविद्यालय प्रशासन और उच्च शिक्षा विभाग का प्रशंसा करते विद्यार्थी गीत गाते हुए नृत्य करते हैं ।
      
    पटाक्षेप 

डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
9617777514
[1/8, 16:52] Dr. Anil Bhatt: सात दृश्य रहेगा मेडम 

प्रमुख पात्र 

2माता पिता 
3 छात्र 
1प्राध्यापक 
1प्राचार्य 
3हेल्प डेक्स 
कुल 10 पात्र 

यही लोग आरम्भ और अंत में नृत्य गीत प्रस्तुत करते रोचक और इंटरटेनमेंट करेंगे। क्योपकथन में रिहर्सल के वक्त चुटिले संवाद भी जोड़ सकते हैं।
[1/8, 16:52] Dr. Anil Bhatt: नृत्य गान के बाद कुछ महीने और टेस्ट परीक्षा के बाद 
छात्रों और अध्यापकों की समस्या और निदान पर तीन दृश्य और लिखा जाएगा।
फिर यह स्क्रिप्ट 10 दृश्यों में समाप्त हो जाएगी।

Tuesday, March 3, 2026

उनका धर्म राजनीति हैं

#anilbhattcg 

उनका धर्म राजनीति हैं 

जन्म जंगल में 
कर्म जंगल में 
पुरखों की तह  
मिलेंगे जंगल में 
काट कर भरुहा 
बसाएं गांव बस्ती 
आबाद रहें हरदम 
नृत्य गान मस्ती 
पर किसने कराया 
भेद अपना पराया 
वर0
छल छद्म पेल ढकेल ààq
छोड़ गांव बसे नगर 
चालक धूर्त नट नागर 
1कहे ग्रामीण देहाती 
हमारे उद्यम उत्पाद 
हेर फेर कर बने उस्ताद 
संचय कर धन आपार 
राज सत्ता का कारोबार 
जनसेवा हुआ व्यापार 
बढ़ते रहे सदैव करारोपण 
अब न होगा प्रकृति संरक्षण 
बचाकर जंगल करेंगे क्या 
ये जंगली अभाव से मरेंगे क्या 
करना हैं विकास उजड़ेंगे जंगल 
तभी तो होगा वहां नित्य मंगल
सीधे साधे भोले भाले 
प्रकृति पुत्र जंगल रखवाले 
टंगीये के बेठ बनकर 
बनते उजाड़ने वाले 
पर चलाने वाले कौन 
परस्पर लड़ाने वाले कौन 
बहुरूपिया बहुत पहुंचे हुए 
मीठी बानी शहद से पागे हुए 
हर तरफ वाग्जाल फैलाएं हुए 
अरे वनवासी धरती आबा
भुइयां के भगवान तय किसान 
गुड़ी कुटी मंदिर, तेरा ही काशी काबा 
फूल कर कुप्पा गर्व से अज्ञानी 
अरे अवघट अरे महादानी 
पड़े रहो शव सा बिन शक्ति के 
बिखरे हुए कलयुगे बिन संघ शक्ति के 
डूबे रहों तुम मदिरा सी धर्म भक्ति हैं 
भ्रम में रहो तुम कि इसी में मुक्ति हैं.
पता हैं उन्हें उनका धर्म ही राजनीति हैं 
तुम भ्रम में रहो क्या धर्म रीति नीति हैं 

-डॉ.अनिल भतपहरी/9617777514

Tuesday, February 24, 2026

सतनाम की त्रिचरण संगत पंगत अंगत

सतनाम धर्म के त्रिचरण: संगत पंगत अंगत 

सतनाम पंथ भारत वर्ष में एक स्वतंत्र धार्मिक संप्रदाय है। छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास ने इसे व्यवस्थित स्वरुप देकर  17वीं शताब्दी में प्रवर्तन किया इसके मुख्य तीन चरण इस प्रकार हैं: 

संगत 

- संस्थापक: सतनाम पंथ के संस्थापक गुरु घासीदास बाबा जी हैं, जो छत्तीसगढ़ के गिरौदपुरी में पैदा हुए थे. और सोनाखान जंगल के मध्य छाता पहाड़ में 6 माह तक कठोर साधना करके  "सतनाम के सप्त सिद्धांत" का प्रतिपादन फागुन शुक्ल  सप्तमी को गिरौदपुरी में अपने प्रिय स्थल औरा धौरा तेंदू पेड़ के समक्ष समतल मैदान में एकत्र हजारों लोगों की उपस्थिति में किया। उन्होंने सतनाम के प्रमुख सप्त सिद्धांत एवं वाणी को जनमानस श्रद्धापूर्वक श्रवण किए यह प्रथम संगत था। फिर रामत रावटी करते संगत करते रहें।
 इस तरह उन्होंने धार्मिक एवं सामाजिक क्षेत्र में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध सतत सतनाम जागरण चलाए। उनमें मुख्यत: जातिगत भेदभाव के खिलाफ: गुरु घासीदास ने जातिगत भेदभाव और सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। वे "मनखे मनखे एक "कह अनेक जीवनोपयोगी उपदेश दिए। वे अपने सिद्धांत और उपदेश को जनजीवन को श्रवण की आजीवन रामत रावटी किए यह प्रथम चरण संगत का था। 

      पंगत 
     रामत रावटी में उपस्थित जनसमूह को  अलग अलग जातिय समूह थे और उनके रहन सहन खान पान में विविधताएं थी फलस्वरूप कभी संग साथ भोजन नहीं करते उन्हें सामूहिक रुप से एक ही पात्र में पके सात्विक भोजन प्रसाद को एक ही पात्र बड़ा थाल या गंज में परोस कर   तेलसीपुरी महासंगम स्थल में जहां अनेक जातियों के लोग स्वेच्छा पूर्वक सतनाम धर्म को अंगीकृत किया उन्हें खिलाएं गए।उसे पान प्रसाद कहते हैं। यह पान प्रसाद खिलाना ही सतनाम संस्कृति में पंगत हैं। जब सब संग साथ में ,संगत में कही गई बातें सुन समझ लिए और सब संग साथ में पंगत में परोसे गए पान प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह दूसरा चरण पंगत के नाम से प्रसिद्ध हैं।
   श्रद्धालु आज भी गुरुद्वारा में जाकर मनौति मांगते हैं कि " हे सत्पुरुष साहेब तोर असीस ले मोरो घर शुभ  कारज होय चार संत मोर अंगना म पंगत करय मय अपन हाथ म पतरी उचावव।" 

अंगत 
    इस तरह सतनाम पंथ में 65-70 जातियों का समागम हैं जो कि गुरुघासीदास के उपदेशों से प्रभावित होकर अपनी मूल जाति और मान्यताओं को छोड़कर सतनाम को अंगीकृत कर लिया हैं। ऐसा करना ही सतनाम संस्कृति में अंगत प्रथा हैं। अनेक जाति के लोग प्रेम विवाह इत्यादि के कारण बहिष्कृत हो जाने पर यहां आकर शरण लेते हैं। गुरुगोसाई चार संत की उपस्थिति में उन्हें सतनाम धर्म में मिला लेते हैं।
एक प्राचीन मंगल भजन इसी प्रक्रिया हेतु सृजित हैं -
बीच गंगा बहत हे मँझधारा हो मिले बर होही संतो मिल जहु न ...
समानता बराबरी और प्रेम सौहार्द भाव के कारण निरंतर सतनाम धर्म में अन्य धर्म जाति के लोगों को सहजता से आत्मसात या समागम करने की विधि विधान हैं। यह सतनाम धर्म का तीसरा चरण हैं।

- जैतखाम: 
सतनामी समाज में जैतखाम की मान्यता बहुत होती है, जो सतनामी पंथ के ध्वज का नाम है। इसे एक चबूतरे या प्रमुख स्थल पर खंभे में सफेद झंडा लगाकर पूजा जाता है.
- जीवनशैली:
 गुरु घासीदास ने अपने अनुयायियों को मांस खाने, शराब पीने, धूम्रपान करने या तंबाकू चबाने से दूर रहने को कहा। उन्होंने मिट्टी के बर्तनों के बजाय पीतल के बर्तनों का उपयोग करते हैं।
- संगठनात्मक संरचना: 
गुरु घासीदास ने गुरुओं की एक वंशावली निर्धारित की जो उनके बाद संप्रदाय का नेतृत्व करेंगे। एक दो-स्तरीय संगठनात्मक संरचना विकसित हुई जिसमें गुरु सबसे ऊपर थे और उनके नीचे कई ग्राम-स्तरीय महंत साटीदार भंडारी पदाधिकारी हैं।
- वर्तमान स्थिति: 
सतनामी अब एक तेजी से मुखर राजनीतिक ताकत बन गए हैं और छत्तीसगढ़ की अनुसूचित जाति आबादी पर उनका प्रभाव है। अपनी पुरुषार्थ से अनेक विकास के आयाम स्पर्श कर विविध क्षेत्रों में अवसर मिलने से देश दुनियां में सम्मानित होते आ रहें हैं।

सतनाम धर्म के अनुयायी को सतनामी कहें जाते हैं जिनकी अपनी विशिष्ट धार्मिक और सामाजिक क्रियाएं हैं। यह समाज अपनी विशिष्ट सात्विक जीवन शैली और आदर्शों के लिए जाने जाते हैं। 

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

फागुन शुक्ल सप्तमी , मंगलवार तदानुसार दि 23-2-2026 

नारायणपुर छत्तीसगढ़ प्रातः 7.25

Monday, February 23, 2026

सतबोधिया गुरु घासीदास जिसके सतनाम सिद्धांत की विशेषता "सत्य सनातन " हैं।

सतबोधिया गुरु,सेत गुरु , सतगुरु 
 
         उक्त विशेषण घासीदास नाम के सम्मुख प्राचीन समय से चला आ रहा था। अनेक पंथी , मंगल भजनों में भी यह प्रचलित हैं। बोधि , बोधियां शब्द बौद्ध धम्म और पाली साहित्य के प्रभाव से आया हैं।सत्रहवीं सदी तक व्यापक रुप में यहां बौद्ध धम्म प्रचलित था। अनेक सिद्ध नाथ जोगी जती समाज में थे। उनका सबका उपस्थिति और प्रभाव समकालीन समाज में रहा हैं। फलस्वरूप समाज में समरसता रही और रोटी बेटी भी ग्रामों या समीप में होते रहें हैं। जातपात का ऐसा विकराल स्वरुप अपेक्षाकृत कम ही थे। दक्षिण कौशल में राजभाषा पाली एवं ब्राह्मी लिपि का प्रचलन था। जिसका साक्ष्य यहां के शिलालेखो/ ताम्रपत्रों में संरक्षित हैं। छत्तीसगढ़ी भी पाली प्राकृत का ही स्वरुप हैं।
     छत्तीसगढ़ में इसी समय मराठा अंग्रेजी कालखंड में उत्तर भारतियों का आगमन और पौराणिक कथा कहानियों का वृहत्तर  प्रचार प्रसार राजकीय संरक्षण आदि से पूर्व प्रचलित संस्कृति में अभूतपूर्व बदलाव आया। मैदानी क्षेत्रों में जातियां लामबंद हुई परस्पर भेदभाव और फिरकापरस्ती बढ़ी। 
   आजकल बस्तर बीहड़ जंगलों के सुदूर ग्रामों में जो पहले एक था कोई भेदभाव नहीं था वहां भी इन पर प्रांतिको के हस्तक्षेप से सामाजिक वैमनस्य और सांप्रदायिक उन्माद देखें जा रहे हैं।
   मैदानी क्षेत्र में बढ़ते जातिवाद और अंधविश्वास के विरुद्ध समाज सुधार के लिए गुरु घासीदास का अभ्युदय हुआ। उनकी सतनाम सिद्धांत और दिव्योक्ति" मनखे मनखे एक की अनुगूंज सर्वत्र होने लगी।"अनेक जातियां सतनाम पंथ में सम्मिलित होकर जात पात वर्ण भेद के कुचक्र से मुक्त होने लगे।
   हालांकि उनके बढ़ते प्रभाव को रोकने अनेक षड्यंत्र हुए पर सत्य को कोई रोक नहीं सकते उनकी अपनी प्रभा हैं जो स्वयं प्रसारित और प्रकाशित होते ही हैं।

     नब्बे के दशक में  सिरपुर के आसपास 5-7 ग्रामों में बसे हम प्राचीन सहजयानी लोग जिनके पूर्वज सतनामी हो गए थे वे बुद्ध पूर्णिमा को आनंद प्रभु बुद्ध विहार प्रांगण में मेला लगाने एवं बुद्ध वंदना के लिए प्रयास किए। 
बाद में महासमुंद रायपुर बौद्ध समाज से सामंजस्य बिठाकर भंते आर्य नागार्गुन सुरई ससई गुरु दयावंत ,सरदार दिलीप सिंग होरा की आतिथ्य और हजारों सतनामी बौद्ध जनों की उपस्थिति में"बोधिसत्व गुरुघासीदास" कहें गए । 
   कालांतर में यह भावपूर्ण संबोधन प्रबुद्ध समुदाय में श्रद्धापूर्वक कहे जा रहें हैं। बुद्ध ने भंते संघ को उपदेशना देते त्रिशरण पंचशील अष्टमार्ग तय किए और उन्हें घोषित किया कि "येतो धम्मो सनंतनो" यह सिद्धांत ओर सूत्र मन वचन कर्म में धारनीय हैं। उन्हीं के अनुरुप गुरु घासीदास का  सप्त सिद्धांत, अमृतवाणी उपदेशना आदि सतनाम पंथ की शाश्वत सत्य विशेषता हैं जो कि अपरिवर्तनीय एवं नित नवीन  हैं। यह विशेषता सत्य सनातन हैं अर्थात सतनाम ही सनातन हैं।
         वर्तमान में सतनाम पंथ अपनी प्राचीन स्वरुप को जानने समझने और आत्मसात करने की ओर अग्रसर हैं। ताकि भारतीय समाज में जन्मना जातियां वर्ण आदि खत्म हो और बुद्ध कालीन समृद्धशाली समाज वैश्विक  मार्गदर्शक ( गुरु) होने की ओर सच में अग्रसर हो सके। केवल ख्याली पुलाव बनाते भ्रमित न रहें।

    भवतु सब्ब मंगलम 

       जय सतनाम नमो बुद्धाय