*मूलनिवासी दिवस जनजातीय गौरव पर विशेष*
*स्वाभिमान की सुगंध*
व्यापक अर्थ में देखें तो हम सभी के पूर्वज आदिवासी ही थे। धरती के किसी भी कोने में मनुष्य का विकास इसी रूप में हुआ। कालांतर में भोजन और आजीविका की तलाश में उसका आव्रजन हुआ, इतना ही।
पर जब हम विशिष्ट अर्थ में 'आदिवासी' कहते हैं, तो अभिप्राय उन समुदायों से होता है जिन्होंने आरंभ से एक ही अंचल में निवास किया। एक जैसी भाषा, कला, संस्कृति और रहन-सहन को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजा और बाहरी हस्तक्षेप से अपने को बचाए रखा।
विडंबना यह है कि 'आदिवासी' शब्द का प्रयोग अक्सर दूरी बनाने के लिए किया जाता है। उनके प्रति दिखाई जाने वाली दया या सहानुभूति भी क्षणिक होती है, जैसे किसी पशु-पक्षी के प्रति उमड़ता स्नेह। मैले-कुचैले और अभावग्रस्त जीवन की छवि तथा खान-पान को लेकर एक हिकारत का भाव गढ़ दिया गया है। इसी कारण यह शब्द कई बार उस वर्ग को भी चुभता है। कोई टाई-कोट पहना उच्च शिक्षित अधिकारी भी, यदि उसे 'आदिवासी' कहा जाए तो असहज हो जाता है। यह मेरे कई ST मित्रों का निजी अनुभव है, चाहे मंचों से 'गर्व से कहो' का उद्घोष कितना भी हो।
इसीलिए डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा दिया गया संवैधानिक शब्द - *'जनजाति' या 'अनुसूचित जनजाति'* - अधिक सार्थक और सर्वग्राह्य है। कुछ वर्षों से 'वनवासी' शब्द भी प्रचलन में आया। पर वन में रहने मात्र से कोई जनजाति नहीं हो जाता, यह तो सभी समझते हैं। 'Tribal' का सबसे सटीक हिंदी पर्याय 'जनजाति' ही है। 'अनुसूचित' का आशय उस सूची से है जिसमें वे समुदाय शामिल हैं जो आरंभ से एक ही भू-भाग में निवासरत रहे और जिन्होंने पलायन नहीं किया।
मैदानी क्षेत्रों में अनुसूचित वर्गों के महापुरुषों द्वारा चलाई गई सतत सामाजिक क्रांति का प्रभाव जनजातीय समाज पर भी पड़ा। यहाँ से भी नया नेतृत्व उभरा। जल, जंगल, जमीन के साथ-साथ भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए जन-आंदोलन हुए। यह चेतना शोषण के विरुद्ध थी, अस्तित्व की रक्षा के लिए थी।
छत्तीसगढ़ के संदर्भ में देखें तो अठारहवीं सदी में सतगुरु घासीदास के नवजागरण से प्रेरणा लेकर वीर नारायण सिंह ने अस्मिता की रक्षा हेतु स्थानीय शोषण के विरुद्ध बगावत की। *10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जय स्तंभ चौक में ब्रिटिश सत्ता ने उन्हें तोप से उड़ा दिया।*
ठीक 3 वर्ष बाद, *27 मार्च 1860 की रात्रि* को उनके बाल-सखा, गुरु-पुत्र राजा गुरु बालक दास को भोजन के बहाने आमंत्रित कर निहत्थे गुरु पर सशस्त्र ठाकुरों की टोली ने हमला कर दिया। अंगरक्षक सरहा जोधाई ने लोटे के जल को उछालकर उसी को हथियार बनाकर विकट युद्ध किया और घायल गुरु को छप्पर फाड़कर खेत तक ले गए। घनघोर युद्ध के बाद *28 मार्च 1860 को गुरु की शहादत* हुई।
इस प्रकार ट्रांस-महानदी क्षेत्र के ये दोनों महानायक षड्यंत्र के शिकार हुए। उनकी शहादत की गाथा आज भी जनमानस के हृदय-पटल पर स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है।
आज 'मूलनिवासी' शब्द भी तेजी से प्रचलन में है। इस पर अनावश्यक भ्रम फैलाना ठीक नहीं। मूल भावना एक ही है - इस महादेश के मूल निवासियों में स्वाभिमान की सुगंध बनी रहे। इसके लिए उनकी भाषा, कला, संस्कृति, रीति-नीति के साथ-साथ उनके जल, जंगल, जमीन और उनके गाँव, घर, खेत-खलिहान यानी उनकी संपूर्ण 'अस्मिता' का संरक्षण जरूरी है। वे हैं तो हम हैं, और तभी यह दुनिया है।
*जनजातीय गौरव दिवस की हार्दिक बधाई*
*जय सेवा, जय सतनाम, जय भारत*
डॉ अनिल कुमार भतपहरी
प्राध्यापक
वीरांगना रमौतीन माड़िया महिला महाविद्यालय नारायणपुर
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