हरेली अमावस्या: तंत्रसाधना की रात्रि और कौरुनगर का मिथक
- डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
हरेली अमावस्या। छत्तीसगढ़ में आज की रात्रि को लेकर लोक-मान्यता है कि यह टोनही (डायन) की सिद्धि-रात्रि है। कहा जाता है कि इस रात वे ढाई अक्षर के मारण मंत्र को सिद्ध करती हैं और पुरुष को बैल-बकरा बनाकर अपने वश में रखती हैं।
ग्रामीण परिवेश में दादा-नाना, दादी-नानी से ऐसी ही रहस्य, रोमांच और तिलिस्म से भरी कथाएँ सुनते हुए हम बड़े हुए हैं। ऐसा ही एक मथने वाला मिथक है - **"कौरुनगर"**। मनोरंजनार्थ ही नहीं, लोक-मनोविज्ञान को समझने के लिए भी इस पर बात करना आवश्यक लगता है।
कौरुनगर : एक अलंकारिक व्यंजना
व्यक्ति के जीवन में एक पड़ाव ऐसा आता है जब घर-गृहस्थी, बाल-बच्चों पर प्रभावी नियंत्रण घर की स्वामिनी का हो जाता है और स्वामी उसके निर्देशित कर्म में बाहर रत रहता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो हर किसी का अपना-अपना कौरुनगर है। वर्तमान सुखमय गृहस्थ जीवन पर भी इसका प्रभावी असर है - व्यंग्य ही सही, पर यह सच है।
जनमानस में कौरुनगर वह स्थान है जहाँ स्त्रियों का राज है, जो पुरुषों को पशु-पक्षी - बैल, भेड़, बकरी, तोता, कबूतर - बनाकर रखती हैं। बीहड़ और रहस्यमय होने के कारण असम के कामरूप-कामाख्या देवी स्थल को कौरुनगर कहा जाता है।
मेरी दृष्टि में यह शब्द-शक्ति की अलंकारिक व्यंजना है। यह पुरुष-प्रधान समाज द्वारा स्त्रियों पर किए गए अत्याचारों के प्रत्युत्तर में रचा गया एक सशक्त लोक-मिथक है।
देश में हर अंचल का अपना कौरुनगर है - चाहे वह रेवा-परेवा वाली राजस्थान की ढोला-मारू रा दूहा लोक-काव्य हो या सुदूर बंगाल-केरल में वशीकरण करती मोहिनी या चौंसठ जोगिनी की कथाएँ। स्त्री-पुरुष के अंतर्संबंध, प्रेम-घृणा के नवरस भाव की यह मुग्धकारी साहित्य-परम्परा तोता-मैना से लेकर आधुनिक सिनेमा तक रहस्य-रोमांच से भरी है। गीत, कविता, ग़ज़ल, सजल आज तक मानव-मन की गहराई को पूरी तरह नाप नहीं सके हैं। यह विडंबना ही है कि मनुष्य दूसरों को तो क्या, अपनों को भी रत्ती भर समझ नहीं सका है। स्त्री-पुरुष आज तक एक-दूसरे के लिए पहेली हैं, वैसे ही जातियाँ और समुदाय भी।
लोक में अब भी विश्वास है कि मंत्रों में शक्ति है - 'नाम साँचा, पिंड काँचा'। यह मनोविज्ञान का विषय है। दादी-नानी ने दूध की घुट्टी के साथ जो तिलिस्म, रहस्य, रोमांच की लोककथाएँ हमारे दिल-दिमाग में भरी हैं, उसी कारण गाँव-शहर का कोई पेड़, कोई खंडहर, आज के भारतीय प्रोफेसर, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक को भी एकांत और रात्रि-काल में भयभीत करता है।
छत्तीसगढ़ का कौरुनगर : उड़ियान परिक्षेत्र
छत्तीसगढ़ का कौरुनगर उड़ियान परिक्षेत्र है, जो छत्तीसगढ़ और ओडिशा के सीमावर्ती भाग में स्थित है। इस क्षेत्र में प्राचीन काल में जनजीवन में सहजयान और साधकों-सिद्धों में वज्रयान, तंत्रयान का प्रचलन रहा है। सिरपुर में इससे संदर्भित बुद्ध विहार हैं।
सिरपुर बौद्ध विहार के प्रवेश द्वार पर भट्टप्रहरी - राज्य के श्रेष्ठ रक्षक - सदृश खड़ा होकर मैं अक्सर छठी सदी और वर्तमान की सांस्कृतिक कड़ियों को जोड़ने का प्रयास करता हूँ। क्योंकि ये हमारे पुरखों का गाँव और जन्मभूमि है। जुनवानी और सिरपुर के मध्य महानदी का विशाल पाट है। गाँव जाने पर समय निकालकर इन प्राचीन नगरियों में अपनी जड़ तलाशने और परिजनों की अंतर्ध्वनि सुनने आ जाता हूँ। इससे सुकून मिलता है।
कहा जाता है कि तुरतुरिया में भिक्षुणियाँ और योगिनियाँ रहकर मंत्र-सिद्धि, योग और प्रकृतिस्थ जीवन जीती थीं। नागार्जुन गुफा में अनेक साधक मंत्र जागृत करते थे। विगत वर्ष यहाँ आकर दलाई लामा जी ने ध्यान किया था।
आज भी सिरपुर और उसके आसपास का जनजीवन आवरणबद्ध है। एक ऐसे अन्वेषक की आवश्यकता है जो यहाँ की लोक-प्रचलित संस्कृति से प्राचीन संस्कृति का अनावरण कर सके। जनजीवन में अब भी अनगिनत मंत्र-सूक्त प्रचलन में हैं जो अलेखन के कारण धीरे-धीरे विलुप्ति के कगार पर हैं।
अखाड़ा, मंत्र और स्मृतियाँ
आज से चालीस वर्ष पूर्व जब हम कक्षा ३-४ में पढ़ते थे, तो अमावस और नागपंचमी पर हमारे बुजुर्ग गाँव में धान मीजने के लिए जब बयारा छोलते - खलिहान तैयार करते - तो उसी जगह हम बच्चों को अमोल असवा, महंत नंदू नारायण, भरोस, छोटू, तनगू बाबा शस्त्र चलाने और अखाड़ा सिखाते थे। रात्रि में शोभित और दयालु सलेनदरा भगेला बाबा सहज मंत्र सिखाते थे। बड़ों को मारण-उच्चाटन आदि घोर गंभीर मंत्र सिखाकर नाम-पान देते थे।
उन्हीं में से एक शरीर बाँधने का मंत्र आज स्मृत हो रहा है -
आसन बाँधेव सिंहासन बाँधेव
आई बाँधेव डाई बाँधेव
डायनी के चक्र बाँधेव
सेत गुरु के चलत फिरत
मरी-मसान बाँधेव
घाट अवघट समसान बाँधेव
बारा ब इला के फेर बाँधेव
मोर गुरु अउ महादेव पारबत्ती के कहे से
आसन अउ सिंहासन बंधा जा...
साहेब गुरु सतनाम
मंत्र कितना प्रभावशाली है और उसकी क्या उपयोगिता है, यह बाद की बात है। असल बात यह है कि जब कोई साधन नहीं था, पहुँच-मार्ग नहीं थे, साँप-बिच्छू से भरे बीहड़ स्थानों पर इन्हीं साधकों - चाहे वह बैगा, बैद, सिद्ध, नाथ, योगी, जपी, तपी हो - ने बेबस और दुखी जनमानस को धैर्य धारण कराया, जीना सिखाया और जीवन-यात्रा के पथ-प्रदर्शक रहे। इन्हें यूँ ही खारिज या विस्मृत कर देना कैसे संभव है?
लोक-मंत्र साहित्य भाषा-विज्ञान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि यह लिपिबद्ध हो तो अनेक नई जानकारियाँ सामने आएँगी और जो सम्मोहन कथित अभिजात्यों ने संस्कृत में रचा है, उससे यह किसी भी दृष्टि से कमतर नहीं होगा।
चित्र संकेत -
1. सिरपुर बौद्ध विहार प्रवेश द्वार पर लेखक भट्टप्रहरी के रूप में 2-3. तुरतुरिया स्थित बौद्ध भिक्षुणियाँ
4. जुनवानी का प्रसिद्ध लीम चौरा जहाँ रात्रि में मंत्र-पाठ सहित लोक-चर्चाएँ होती थीं।
- डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
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