Monday, November 2, 2026

सतनाम धर्म और हिंदुओं के पौनी व्यवस्था

*सतनामी, पौनी व्यवस्था और धर्म पहचान का प्रश्न : 1955 के पम्पलेट के आलोक में*

*- एक दस्तावेजी विवेचन*

छत्तीसगढ़ के सामाजिक इतिहास में सतनामी समाज की पहचान को लेकर दो धाराएं समानांतर चलती रही हैं। एक धारा इसे हिन्दू समाज के भीतर एक सुधारवादी पंथ मानती है, दूसरी इसे आरम्भ से ही स्वतंत्र सतनाम धर्म मानती है। इस बहस को समझने के लिए 1955 का एक आव्हान-पत्र अत्यंत महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत है।

1. सतनाम पंथ का मूल स्वरूप

संत गुरु घासीदास जी का जन्म 1756 में गिरौदपुरी में हुआ। उन्होंने "मनखे-मनखे एक समान" और सतनाम के सिद्धान्त पर पंथ की स्थापना की। उनका संदेश मूर्तिपूजा का विरोध, निर्गुण सत्य की उपासना, जातिविहीन समाज और जैतखाम की स्थापना था।

ब्रिटिशकालीन जनगणना में सतनामियों का उल्लेख स्वतंत्र वर्ग के रूप में मिलता है। इस संबंध में एक समीक्षा में उल्लेख है कि - "जाति विहिन तथा सत को मानने वालों का एक समाज... वर्ण व्यवस्था के बाहर रहने से तथा अंग्रेजी शासनकाल के जनगणना में स्वतंत्र व पृथक सतनामी का धर्म अस्तित्व में था, अपना नीति-नियम, सांस्कृतिक संस्कार आदि था।" 

आजादी के बाद जनगणना में 6 प्रमुख धर्मों के साथ "अन्य" में लिखने का विकल्प रहा।

2. पौनी-पसारी व्यवस्था : गाँव का आर्थिक तंत्र

छत्तीसगढ़ की ग्रामीण व्यवस्था को "बारा बलूतेदार / पौनी-पसारी" व्यवस्था कहा जाता था। इसमें दो पक्ष थे -

*जजमान :* गाँव का किसान / जमींदार परिवार
*कामिन / पौनी :* सेवा देने वाली जातियाँ, जिन्हें "servicing castes are called kamins while the castes served are called jajman" कहा गया है।

इन सेवाओं में मिट्टी के बर्तन, कपड़े धुलाई, जूते-चप्पल बनाना, लोहे-लकड़ी का काम, बांस का सूपा-टोकना, केशकर्तन, दोना-पत्तल, पूजन सामग्री आदि व्यवसाय शामिल थे, जिन्हें शासन आज भी "पौनी-पसारी व्यवसाय के रूप में मान्यता" देता है।

यह व्यवस्था आधुनिकता के साथ लुप्त होती गई - "आधुनिकता के साथ छत्तीसगढ़ में प्रचलित पौनी पसारी व्यवस्था लुप्त होते जा रही थी। पहले यह हमारी संस्कृति में समाया हुआ था।"

3. 1955 का आव्हान-पत्र : क्या कहता है?

हिन्दू सतनामी महासभा के महंत नैनदास (MLA) और अजोरदास (MLA) द्वारा नागपुर के आदर्श प्रेस में छपवाया गया यह पर्चा अस्पृश्यता निवारण कानून 1 जून 1955 के लागू होने के तुरंत बाद का है।

*मूल पाठ का सार :*

> "हम हरिजन हिन्दू उच्च श्रेणी के हिन्दुओं व निस्तारी पांचों पौनी से नम्र निवेदन... हमको सर्व स्थान में स्थान दें और कुल रुका-बंदी उठा दें। निस्तारी चीज देहाती क्षेत्र में निस्तार के लिये पांच पौनी, जैसे लोहा र, चमार, रावत, नाई, धोबी, वो भोई ब्राह्मण ये सब भाईयों का निस्तार होता है, वैसे ही हमारी भी निस्तार करने की कृपा करें।"

इसमें आगे लिखा है कि पौनियों को सवर्णों के बराबर दाम, नेंग, जेवर देंगे और सरकार तथा कांग्रेस कार्यकर्ताओं से कानून अमल में लाने की अपील है।

*इससे दो तथ्य स्पष्ट होते हैं :*

*क) कौन पौनी था, कौन वंचित था :* पर्चे में पौनी के रूप में लोहार, चमार, रावत, नाई, धोबी और भोई ब्राह्मण गिनाए गए हैं। लेखक कह रहा है कि इन सबका तो गाँव में निस्तार होता है, पर हमारा नहीं। अर्थात उस समय सतनामी बस्तियों को इन सेवाओं से वंचित रखा जाता था।

*ख) पौनी में ब्राह्मण भी :* आपने सही इंगित किया कि इसमें ब्राह्मण भी पौनी में है। छत्तीसगढ़ में "भोई ब्राह्मण / महा-ब्राह्मण" पानी भरना, पत्तल उठाना, श्राद्ध का दान लेना जैसे सेवा-कार्य करते थे, इसलिए उन्हें भी जजमानी बोली में पौनी माना जाता था। यह दर्शाता है कि पौनी व्यवस्था केवल शिल्पी जातियों तक सीमित नहीं थी, बल्कि धार्मिक सेवा देने वाले भी इसमें शामिल थे, फिर भी सतनामियों को इससे बाहर रखा गया था।

4. हिन्दू सतनामी महासभा और हिन्दूकरण का उपक्रम

1955 के बाद का समय संक्रमण का था। एक तरफ अस्पृश्यता विरोधी कानून आया, दूसरी तरफ हिन्दू सतनामी महासभा ने हिन्दू समाज के भीतर ही बराबरी दिलाने के लिए अभियान चलाया। उसका तर्क था कि कबीर पंथ की तरह सतनाम पंथ भी "पंथ" शब्द के कारण धर्म की संज्ञा से वंचित है, पर सांस्कृतिक रूप से हिन्दू परम्परा से जुड़ा है। जैतखाम, पंथी नृत्य, पारिवारिक संस्कार सह-अस्तित्व में रहे।

दूसरी धारा का तर्क है कि पंथ शब्द के कारण ही स्वतंत्र धर्म की पहचान दब गई और पौनी जैसी हिन्दू सामाजिक सुविधाओं के अभाव से यह सिद्ध होता है कि सतनामी आरम्भ से वर्ण-व्यवस्था से बाहर थे।

5. आगामी जनगणना और स्वतंत्र पहचान का प्रश्न

लेखक का प्रश्न है - "तब आगामी जनगणना में स्वतंत्र सतनाम धर्म लिखकर अपनी पहचान स्थापित करने में हर्ज ही क्या है?"

जनगणना की वर्तमान प्रक्रिया के अनुसार :

- भारत में धर्म का कॉलम स्व-घोषणा पर आधारित है। 2011 में लगभग 79 लाख लोगों ने "अन्य" में अपना धर्म लिखा था।
- अगर बड़ी संख्या में लोग "सतनाम धर्म" या "सतनामी धर्म" लिखते हैं, तो यह आंकड़ा "Other Religions" में प्रकाशित होगा और भविष्य में अलग धर्म कोड की मांग के लिए सांख्यिकीय आधार बनेगा।
- इसका SC आरक्षण या संवैधानिक स्थिति पर सीधा प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि अनुसूचित जाति का निर्धारण राष्ट्रपति के आदेश से होता है, धर्म कॉलम से नहीं। वर्तमान में सरना, लिंगायत, सतनाम सहित कई समुदाय अलग कोड की मांग इसी आधार पर कर रहे हैं।

*निष्कर्ष*

1955 का यह पम्पलेट इस बात का समकालीन लिखित प्रमाण है कि पौनी-पसारी जैसी ग्रामीण सेवा-व्यवस्था से सतनामी समाज वंचित था, जिसके लिए उन्हें अपील करनी पड़ी। इसमें भोई ब्राह्मण तक का पौनी में शामिल होना यह दर्शाता है कि वंचना कितनी गहरी थी।

इस दस्तावेज को सुरक्षित, ट्रांसक्राइब और डिजिटल आर्काइव में रखना, सतनामी पहचान पर होने वाले किसी भी अकादमिक और जनगणना-संबंधी विमर्श के लिए महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत होगा।

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*स्रोत :*
1. पम्पलेट - "हमारे हिन्दू भाईयों से अपील", आदर्श प्रेस, नागपुर, 1955
2. British Census and Satnami Dharma - Review, Amazon
3. Pauni Pasari - Chhattisgarh Govt Scheme and traditional system description
4. Jajmani System definition

 इस आलेख के साथ मूल पम्पलेट का चित्र संलग्न हैं 

डॉ.अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514
चित्र: निलेश अनंत के वाल से 
टीप - कृपया शेयर करते हैं यह अच्छी बात हैं इसलिए ही पोस्ट डालते भी हैं परंतु लेखक का हटाकर न करें।
   धन्यवाद

Friday, October 30, 2026

गुरु घासीदास की अमृतवाणी के आलोक में देश की दिशा एवं दशा

गुरु घासीदास की वाणी ही इसका मूल समाधान है -

मनखे मनखे एक - दान नहीं, समानता चाहिए

इस महादेश का सबसे बड़ा संकट गरीबी नहीं, अकर्मण्यता को सम्मान मिल जाना है। यदि यह सम्मान परिश्रम ईमानदारी, गुणी सदाचारी को सम्मान मिलने लग जाय तो लम्पट और ऐय्यास अमीरों की सम्मान विरासत से मिले दौलत और उनके नशे से जकड़ा सामंतवाद का खात्मा हो जाय।

यह नहीं होने और देश में घोर पूंजीवादी सामंती  व्यवस्था के कारण ही ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप की आबादी के तीन चार गुणा बड़ी आबादी गैर बराबरी व्यवस्था के अधीन होकर दान-दक्षिणा के  भरोसे मुफ्तखोरी जी रहे हैं। देश के विकास में उनकी कोई भागीदारी नहीं। परिश्रमी समुदाय को दो जून की रोटी मयस्सर नहीं, और साधन-सक्षम लोग अजगर करे न चाकरी वाला अधूरा दोहा ओढ़कर सबका दाता राम कहकर अकर्मण्य बैठे हैं।

इस भ्रम को सबसे पहले काटा था देश के प्रथम जाति-वर्ण विहीन मानव समुदाय सतनाम पंथ के प्रवर्तक गुरु घासीदास ने।

उनकी पहली दिव्योक्ति है - **"मनखे मनखे एक समान"**। इस एक वाक्य में वसुधैव कुटुम्बकम् से लेकर समस्त मानव प्रजाति को समानता से देखने की नैतिक सीख है। जब सब मनखे एक हैं तो कोई ऊँचा नहीं, कोई नीचा नहीं, कोई दाता बनकर अहंकार करे और कोई याचक बनकर खुद को छोटा समझे, यह व्यवस्था ही अधर्म है।

इसीलिए उनकी दूसरी अमृतवाणी मन को मथ देती है - **"दान के देवैया पापी, दान के लवैया पापी"**। गुरु ने कहा, दान को पुण्य से मत जोड़ो। क्योंकि पुण्य कमाने के लोभ में लोग अनैतिक ढंग से धन जुटाकर दाता बनने के दर्प में जीते हैं, और जो याचक है वह उन्हें अन्नदाता, मालिक, स्वामी कहने लगता है। यहीं से गैर-बराबरी पैदा होती है। दान-दक्षिणा वृत्ति समानता के पथ का सबसे बड़ा रोड़ा है। हमारी व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि कोई याचक ही न रहे, तो दाता बनने की जरूरत ही न पड़े।

और समाधान क्या दिया गुरु ने? मंदिर-मूर्ति-गुरुद्वारा के प्रदर्शन से हटकर सार्वजनिक कल्याण का मार्ग -

"मंदिर मूर्ति गुरुद्वारा झन बना, तोला बनाएच बर हवय कुआँ तरिया बना, सराय पाठशाला दवाखाना बना, ये जिनगी कठिन ओला सरल बना।"

मतलब साफ है। अगर बनाना ही है तो ऐसी चीज बनाओ जो किसी की व्यक्तिगत संपत्ति न हो। अस्पताल, स्कूल, सराय, तालाब, कुआँ, सड़क। गुरु ने कहा इसे बरार से बनाओ। जिसके पास धन है वह चंदा या बरार दे, जिसके पास धन नहीं वह श्रमदान करे। तब वह निर्माण सबका होगा और सबकी भागीदारी होगी।

यही कसौटी आज के परमार्थ पर भी लागू होती है।

एक परमार्थ वह है जो बरार और श्रमदान से स्कूल अस्पताल चलाता है, वह इस देश की आत्मा है, उसका सम्मान अक्षुण्ण रहना चाहिए।

दूसरा वह दिखावे का परमार्थ है जहां बड़े आश्रम, संस्थान और धार्मिक स्थल काले धन को पचाने-खपाने का केंद्र बने हैं, शासकीय अनुदान और बेशकीमती जमीनों पर कब्जा भी है, और भीतर चमत्कार के नाम पर ढोंग और परलोक सुधारने के नाम पर डर बेचा जाता है। यही वह जगह है जहां धर्म-कर्म और सनातन जैसे पवित्र शब्दों को ढाल बनाकर भावनात्मक शोषण होता है।

और सबसे बड़ा पाखंड यह है कि यही मुफ्तखोरी का उपभोग करने वाला, ईश्वर-खुदा-गॉड-सद्गुरु के नाम पर छप्पन भोग उड़ाने वाला और शातिर ढंग से सम्माननीय बना बैठा वर्ग, वंचित तबके को मिल रहे आरक्षण का सबसे तीव्र विरोधी भी है। जो खुद बिना श्रम के सब लेना चाहता है, वह दूसरे को हक का अवसर मिलते ही न्याय की दुहाई देने लगता है।

इसलिए अब प्रशासन से अपेक्षा है कि वह दया को योजना में बदले।

पहला, किसी भी अनुदान प्राप्त ट्रस्ट की पवित्रता उसकी पारदर्शिता से तय हो। सार्वजनिक सोशल ऑडिट हो।

दूसरा, याचक-मुक्त व्यवस्था बनाई जाए। सहायता को कौशल, शिक्षा और श्रमदान से जोड़ा जाए। मुफ्त के साथ काम जुड़ेगा तो सम्मान भी लौटेगा।

तीसरा, भाग्यवाद के स्थान पर कर्मवाद की शिक्षा दी जाए। लोगों को मनोवैज्ञानिक मोटिवेशन मिले कि परलोक बाद में सुधरेगा, पहले इस लोक को कर्म से सरल बनाना है।

गुरु घासीदास का सत्य ही परम सत्य है। मनखे मनखे एक मानकर जब धन वाला बरार देगा और निर्धन श्रमदान, तभी कोई याचक नहीं रहेगा, कोई शोषक नहीं रहेगा।

देश को दानवीरों की नहीं, कर्मवीरों की जरूरत है।

जय सतनाम।

Monday, October 26, 2026

जरा जतन कर

छकड़ी 

 पहन कर सिंग, बजा कर ढोल
 सुने गीत मधुर, सुंदर मीठे बोल

 सुंदर मीठे बोल पर, है दुःख यारी
चुपचाप सहते, प्रकृति इनकी न्यारी

नाचते-गाते ही रहे, क्या  ये जीवन भर
कब होगी उजास,इनके जरा जतन कर 

डॉ.अनिल भतपहरी/ 9617777514

Tuesday, October 20, 2026

भट्टप्रहरी

यह आपके शोध-प्रारूप का व्याकरण-सम्मत और अनुक्रमबद्ध परिष्कृत रूप है। मूल भाव, परिकल्पना और मौखिक स्रोतों को यथावत रखा गया है, केवल भाषा, प्रवाह और अकादमिक क्रम को व्यवस्थित किया गया है।

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### भट्टप्रहरी गोत्र या पद : सिरपुर की खड्गधारी भट्टप्रहरी प्रतिमा एवं सतनाम पंथ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
**एक पुरातात्विक, वंश-परंपरागत एवं धार्मिक-सांस्कृतिक शोध-परिकल्पना**

**शोध-क्षेत्र:** सिरपुर - प्राचीन श्रीपुर, दक्षिण कोसल, वर्तमान छत्तीसगढ़
**प्रमुख विषय:** भट्टप्रहरी समुदाय की स्थानीय परंपरा, खड्गधारी प्रहरी प्रतिमा, बौद्ध सहजयानी परंपरा और सतनाम पंथ
**शोध की प्रकृति:** प्रारंभिक ऐतिहासिक अध्ययन एवं अनुसंधान की रूपरेखा

**शोधार्थी: डॉ. अनिल कुमार भतपहरी**

#### सारांश
छत्तीसगढ़ का सिरपुर प्राचीन दक्षिण कोसल का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्र रहा है। महानदी के तट पर स्थित इस प्राचीन नगर में बौद्ध, शैव, वैष्णव तथा जैन परंपराओं से संबंधित पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहाँ की स्थापत्य एवं मूर्तिकला प्राचीन मध्य भारत की बहु-धार्मिक सांस्कृतिक संरचना को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

प्रस्तुत शोध-पत्र सिरपुर के समीपवर्ती ग्रामों में निवास करने वाले "भट्टप्रहरी" गोत्र के लोगों की मौखिक परंपरा, सिरपुर में संरक्षित एक खड्गधारी पुरुष प्रतिमा की संभावित पहचान, तथा सतनाम पंथ और बौद्ध सहजयानी परंपरा के बीच संभावित ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संबंधों की पड़ताल करता है।

स्थानीय समुदाय में यह धारणा प्रचलित है कि 'भट्टप्रहरी' शब्द का ही अपभ्रंश अथवा मुख-सुख उच्चारण 'भतपहरी' है। लोक-व्याख्या में इसे रोचक, मासूमियत भरे अथवा व्यंग्यात्मक ढंग से "भात की पहरेदारी करने वाले" के रूप में भी समझाया जाता है। समुदाय में यह भी कहा जाता है कि जो पहर या छरिया में रहे वे भतपहरी और जो ढींढ़ा बन गए वे ढीढी - परन्तु इस लोक-व्युत्पत्ति के आधार पर भी दोनों गोत्रों में आज परस्पर विवाह नहीं होता और वे एक-दूसरे को भाई-बहन मानते हैं।

वस्तुतः 'भट्टप्रहरी' शब्द अपने में एक पद तथा एक कुशल रक्षक के भाव को समेटे हुए है। यही इसका निकटतम अर्थ भी है। भट्टप्रहरी समुदाय में दशहरे पर खड्ग-पूजा करने की परंपरा है। विकट या संकट काल में पूर्वज-देव, गोटानी और खांडा की पूजा तथा गांव के चारों ओर परिक्रमा करने का अनुष्ठान आज भी कई परिवारों और ग्रामों में प्रचलित है, ताकि किसी विघ्न, संकट, शत्रु, हिंसक पशु अथवा रोग के आक्रमण से रक्षा हो सके। कालांतर में समुदाय के लोग सुविधा के अनुसार भारद्वाज, भट्ट, भारती, प्रहरी, प्रहरे आदि उपनाम लिखते रहे हैं।

समुदाय की स्मृति के अनुसार सिरपुर भट्टप्रहरियों का प्राचीन क्षेत्र रहा है और उनके पूर्वजों की भूमि सिरपुर में थी। बाद के काल में उनके पूर्वज गुरु घासीदास के विचारों से प्रभावित होकर सतनाम पंथ में सम्मिलित हुए। स्थानीय परंपरा में गुरु घासीदास की पत्नी माता सफुरा के मायके का संबंध भी सिरपुर से जोड़ा जाता है।

इन कथनों को इस शोध में महत्वपूर्ण मौखिक स्रोत के रूप में स्वीकार करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि समुदाय की ऐतिहासिक स्मृति, प्रतिमा की पुरातात्विक पहचान और धार्मिक परंपराओं की निरंतरता को प्रमाणित करने के लिए अभिलेखीय, पुरातात्विक, वंशावलीगत और तुलनात्मक धार्मिक अध्ययन आवश्यक है।

**प्रमुख शब्द:** भट्टप्रहरी, सिरपुर, श्रीपुर, दक्षिण कोसल, खड्गधारी प्रतिमा, द्वारपाल, सतनाम पंथ, गुरु घासीदास, माता सफुरा, बौद्ध धर्म, सहजयान।

### 1. प्रस्तावना
इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और राजवंशों का विवरण मात्र नहीं है। किसी क्षेत्र के प्राचीन निवासियों, उनके सामाजिक दायित्वों, स्थानीय समुदायों, धार्मिक परंपराओं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही स्मृतियों का अध्ययन भी इतिहास का महत्वपूर्ण अंग है।

छत्तीसगढ़ का सिरपुर इस दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। प्राचीन श्रीपुर अथवा सिरीपुर के नाम से विख्यात यह नगर दक्षिण कोसल के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा। यहाँ के पुरातात्विक अवशेष लगभग पाँचवीं से बारहवीं शताब्दी ईस्वी के बीच विकसित स्थापत्य और धार्मिक जीवन की जानकारी देते हैं।

सिरपुर में लक्ष्मण मंदिर, बौद्ध विहार, अन्य धार्मिक स्थापत्य, मूर्तियाँ तथा नगरीय जीवन के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इनसे स्पष्ट होता है कि प्राचीन सिरपुर किसी एक धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं था, बल्कि विभिन्न धार्मिक समुदायों और सांस्कृतिक धाराओं का संगम था। इसी पृष्ठभूमि में सिरपुर के समीपवर्ती ग्रामों में रहने वाले भट्टप्रहरी गोत्र की स्थानीय परंपरा का अध्ययन महत्वपूर्ण हो जाता है।

इस शोध का उद्देश्य किसी पूर्व-निर्धारित वंशगत दावे को प्रमाणित घोषित करना नहीं, बल्कि उपलब्ध ऐतिहासिक संदर्भों और स्थानीय स्मृतियों के आधार पर उसकी व्यवस्थित जाँच करना है।

### 2. शोध के उद्देश्य
1.  प्राचीन सिरपुर की राजनीतिक, धार्मिक और पुरातात्विक पृष्ठभूमि का संक्षिप्त विवेचन करना।
2.  सिरपुर के संग्रहालय में संरक्षित बताई गई खड्गधारी पुरुष प्रतिमा की संभावित पहचान के लिए शोध की दिशा निर्धारित करना।
3.  भट्टप्रहरी गोत्र की स्थानीय वंश-परंपरा, सिरपुर से संबंध और पूर्वजों की भूमि से संबंधित मौखिक स्मृतियों का दस्तावेजीकरण करना।
4.  गुरु घासीदास, माता सफुरा और सिरपुर से संबंधित स्थानीय परंपराओं की ऐतिहासिक जाँच के लिए आधार तैयार करना।
5.  सतनाम पंथ तथा बौद्ध सहजयानी परंपरा के बीच संभावित वैचारिक और ऐतिहासिक संबंधों का आलोचनात्मक अध्ययन करना।

### 3. सिरपुर का ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व
सिरपुर वर्तमान छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में महानदी के तट पर स्थित है। इसका प्राचीन नाम श्रीपुर अथवा सिरीपुर बताया जाता है। 'सिरी' शब्द पाली और बौद्ध धम्म से संदर्भित माना जाता है।

स्थानीय जनश्रुति के अनुसार सातवाहन-वंशज भट्टप्रहरी शासकों के काल में गौतम बुद्ध का आगमन हुआ और उन्हें तथा उनके साथ आए भिक्षु-संघ को एक सहस्र कोसा-वस्त्र भेंट किए गए। कहा जाता है कि कोसा के प्राकृतिक रंग वाले यही वस्त्र आगे चलकर भिक्षुओं के चीवर का आधार बने।

ऐतिहासिक रूप से यह नगर सातवाहन, शरभपुरीय और पाण्डुवंशी शासकों के काल में दक्षिण कोसल के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुआ।

**सिरपुर से प्राप्त प्रमुख पुरातात्विक अवशेष:**
- लक्ष्मण मंदिर तथा अन्य मंदिर स्थापत्य
- बौद्ध विहार और धार्मिक प्रतिमाएँ
- जैन परंपरा से संबंधित अवशेष
- पत्थर एवं धातु की मूर्तियाँ
- आवासीय, व्यापारिक और नगरीय संरचनाओं के अवशेष
- रायकेरा तालाब के समीप निर्मित गुरु घासीदास मंदिर

सिरपुर में महायान बौद्ध धर्म तथा प्रारंभिक वज्रयान परंपरा से संबंधित कलात्मक साक्ष्यों का भी अध्ययन किया गया है।

**महत्वपूर्ण अंतर:** सिरपुर का प्राचीन और बहु-धार्मिक महत्व पुरातात्विक साक्ष्यों से समर्थित है। इसके विपरीत, किसी आधुनिक गोत्र या समुदाय का उस नगर पर विशिष्ट वंशगत अधिकार अथवा प्रत्यक्ष उत्तराधिकार सिद्ध करने के लिए पृथक प्रमाणों की आवश्यकता होगी।

### 4. भट्टप्रहरी गोत्र और सिरपुर की स्थानीय परंपरा
इस शोध का एक महत्वपूर्ण आधार सिरपुर के समीपवर्ती ग्रामों में निवास करने वाले भट्टप्रहरी गोत्र की मौखिक परंपरा है। समुदाय के प्रतिनिधियों के अनुसार:

- भट्टप्रहरी गोत्र के अनेक परिवार सिरपुर के आसपास के ग्रामों में निवास करते हैं।
- ग्रामीणों में यह धारणा प्रचलित है कि सिरपुर भट्टप्रहरियों का प्राचीन क्षेत्र था।
- समुदाय के पूर्वजों की भूमि सिरपुर में होने की बात कही जाती है।
- स्थानीय स्मृति में 'भट्टप्रहरी' नाम का संबंध प्राचीन प्रहरी, द्वारपाल अथवा खड्गधारी सामंत से जोड़ा जाता है।

इन कथनों को सामुदायिक मौखिक इतिहास के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए। ऐसी परंपराएँ कई बार उन सामाजिक संबंधों और ऐतिहासिक स्मृतियों को सुरक्षित रखती हैं, जिनका लिखित अभिलेख सीमित होता है।

**ऐतिहासिक पुष्टि के लिए आवश्यक स्रोत:**
- सिरपुर और आसपास के गाँवों की पुरानी भूमि एवं राजस्व संबंधी प्रविष्टियाँ
- परिवारों की वंशावलियाँ, पुराने दस्तावेज तथा ताम्रपत्र या अन्य अभिलेख
- पुराने अभिलेखों, स्थानीय साहित्य में 'भट्टप्रहरी' नाम का उल्लेख
- विभिन्न गाँवों के बुजुर्गों से स्वतंत्र मौखिक साक्षात्कार
- पदवियों के ऐतिहासिक अर्थों का भाषायी अध्ययन

इस चरण में सिरपुर को भट्टप्रहरी समुदाय का प्रमाणित पैतृक नगर घोषित करना उचित नहीं होगा, परन्तु यह समुदाय की ऐतिहासिक स्मृति और भूमि-संबंधों पर गंभीर शोध का एक महत्वपूर्ण विषय अवश्य है।

### 5. सिरपुर की खड्गधारी पुरुष प्रतिमा: प्रहरी अथवा सामंत की संभावित पहचान
उपलब्ध चित्रों में एक पूर्णाकार पाषाण मानवाकृति दिखाई देती है। समुदाय के प्रतिनिधि के अनुसार यह प्रतिमा लक्ष्मण मंदिर के समीप स्थित संग्रहालय में संरक्षित है।

**दिखाई देने वाली विशेषताएँ:** ऊँचा शिरोभूषण अथवा केश-विन्यास, सामने की ओर उन्मुख शांत मुखाकृति, अलंकृत शरीर, कमर पर वस्त्र और सामने की ओर मुड़े हुए हाथ। हाथों के समीप एक लंबवत आकृति भी दिखाई देती है, जिसकी पहचान केवल चित्र से निश्चित नहीं की जा सकती।

स्थानीय व्याख्या में इसे खड्गधारी सामंत, द्वारपाल अथवा प्रमुख प्रहरी माना जाता है और इसे भट्टप्रहरी परंपरा से जोड़ने की संभावना व्यक्त की गई है।

**पहचान की जाँच के तीन प्रश्न:**

**5.1 क्या यह द्वारपाल प्रतिमा है?**
प्राचीन मंदिरों में द्वारपाल प्रतिमाएँ सामान्यतः प्रवेशद्वारों के निकट स्थापित की जाती थीं। उनमें आयुध, विशेष शारीरिक मुद्रा और रक्षक-भूमिका के प्रतीक मिलते हैं। किसी प्रतिमा को द्वारपाल घोषित करने के लिए उसका मूल स्थापत्य-संदर्भ, हस्त-मुद्रा, आयुध, पृष्ठ-भाग और उत्खनन-विवरण देखना आवश्यक है।

**5.2 क्या यह किसी सामंत अथवा अधिकारी की प्रतिमा हो सकती है?**
प्राचीन मध्य भारत में राजकीय एवं प्रशासनिक पदों से जुड़े व्यक्तियों की प्रतिमाओं की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। फिर भी केवल खड़ी पुरुष-आकृति या हथियार जैसी वस्तु से उसकी राजकीय पदवी निर्धारित नहीं होती। इसके लिए शिलालेख, प्रतिष्ठा-अभिलेख, स्थापना-स्थल अथवा समकालीन कलात्मक तुलनाएँ अधिक उपयोगी होंगी।

**5.3 क्या इसका संबंध भट्टप्रहरी नाम से है?**
यह इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण, किन्तु अभी अप्रमाणित प्रश्न है। यदि किसी पुराने अभिलेख में 'भट्टप्रहरी' नाम, उससे मिलती-जुलती पदवी अथवा प्रहरी-संबंधी पद का उल्लेख मिलता है, तो उसकी भाषायी और ऐतिहासिक जाँच करनी होगी। केवल नाम की समानता से प्रतिमा और समुदाय के बीच संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता। इसके लिए प्रतिमा के आधिकारिक अभिलेख, वंशावली और कालानुक्रमिक प्रमाणों का परस्पर मेल आवश्यक है।

### 6. गुरु घासीदास, माता सफुरा और सिरपुर की स्थानीय स्मृति
समुदाय द्वारा बताई गई एक अन्य महत्वपूर्ण परंपरा गुरु घासीदास की पत्नी माता सफुरा के मायके को सिरपुर से जोड़ती है। गुरु घासीदास छत्तीसगढ़ के सतनाम आंदोलन के प्रमुख ऐतिहासिक और धार्मिक व्यक्तित्व हैं।

कुछ प्रकाशित विवरणों में माता सफुरा को सिरपुर से संबंधित बताया गया है। इस विषय में विशेष रूप से उनके पैतृक परिवार, पिता के नाम, विवाह-संबंधी परंपरा और मूल निवास से संबंधित स्रोतों की तुलना उपयोगी होगी। समुदाय की यह धारणा कि गुरु घासीदास का ससुराल और माता सफुरा का मायका सिरपुर में था, स्थानीय इतिहास के लिए महत्वपूर्ण अनुसंधान-प्रश्न प्रस्तुत करती है। इसकी पुष्टि के लिए गुरु घासीदास की जीवनियों, सतनामी परंपराओं, परिवारों की मौखिक स्मृतियों और ऐतिहासिक दस्तावेजों की जाँच आवश्यक है।

### 7. सतनाम पंथ और बौद्ध सहजयानी परंपरा: तुलनात्मक अध्ययन

**7.1 सिरपुर में बौद्ध परंपरा**
सिरपुर में बौद्ध विहारों, मूर्तियों तथा धार्मिक गतिविधियों के पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। विद्वानों ने यहाँ महायान और प्रारंभिक वज्रयान की उपस्थिति का अध्ययन किया है। सहजयान का संबंध मध्यकालीन बौद्ध सिद्ध-परंपरा और सहज-अनुभव पर बल देने वाली धाराओं से है।

**7.2 सतनाम पंथ के सामाजिक एवं नैतिक आदर्श**
सतनाम पंथ में सत्य, नैतिक जीवन, मानवीय समानता और जातिगत भेदभाव के विरोध के विचार केंद्रीय हैं। समुदाय की मान्यता के अनुसार माता सफुरा बौद्ध धम्म के अनुयायी महंत अंजोर दास की सुपुत्री थीं और योग-साधना में प्रवीण थीं। उनके लक्षणों के आधार पर ही उनका विवाह गुरु घासीदास से हुआ।

इस संदर्भ में एक प्राचीन पंथी गीत प्रचलित है:
> *सिरपुर नगर के महंत नाव अंजोर दास ग,*
> *ओकर सुघर कइना नाव सफुरा ताय गा।*
> *उज्जर-उज्जर रूप ओकर, जइसे फूल कास गा।*

इन आदर्शों की तुलना बौद्ध धर्म की नैतिक शिक्षाओं, करुणा और अहिंसा की परंपराओं से की जा सकती है।

**7.3 समानता और ऐतिहासिक निरंतरता में अंतर**
दो धार्मिक परंपराओं में समान विचार मिलने से यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि एक परंपरा दूसरी की प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी है। सतनाम पंथ को प्राचीन सहजयानी बौद्ध परंपरा की निरंतरता के रूप में स्थापित करने के लिए बीच की ऐतिहासिक कड़ियों - धार्मिक शब्दावली, प्रथाएँ, ग्रंथ, व्यक्तित्व और सामाजिक समूहों की निरंतरता - के प्रमाण आवश्यक होंगे। अतः इस स्तर पर यह परिकल्पना ही रखी जा सकती है कि दोनों के बीच वैचारिक समानता या क्षेत्रीय सांस्कृतिक संपर्क रहा हो।

### 8. अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में धार्मिक परिवर्तन का प्रश्न
मौखिक परंपरा के अनुसार भट्टप्रहरी गोत्र के पूर्वज गुरु घासीदास के संपर्क में आकर सतनाम पंथ में सम्मिलित हुए। गुरु घासीदास का जीवन अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध से संबंधित है।

**शोध के प्रमुख प्रश्न:**
- भट्टप्रहरी परिवारों के सतनाम पंथ से जुड़ने की परंपरा कितनी पुरानी है?
- क्या इस परिवर्तन से संबंधित कोई वंशावली, पत्र या धार्मिक अभिलेख उपलब्ध है?
- क्या विभिन्न ग्रामों में यह परंपरा समान रूप में प्रचलित है?
- क्या समुदाय की धार्मिक पहचान में पुराने रीति-रिवाजों और सतनाम शिक्षाओं के बीच संबंध दिखाई देता है?

### 9. पूर्वजों की भूमि और ऐतिहासिक अधिकार का प्रश्न
यहाँ दो प्रश्नों को अलग रखना आवश्यक है:
1.  क्या समुदाय के पूर्वज सिरपुर में रहते थे अथवा वहाँ भूमि रखते थे? यह ऐतिहासिक और अभिलेखीय जाँच का विषय है।
2.  वर्तमान में किसी भूमि पर कानूनी अधिकार किसका है? यह राजस्व अभिलेखों और लागू कानूनों के आधार पर निर्धारित होगा।
इस प्रकार ऐतिहासिक वंश-परंपरा का अध्ययन और वर्तमान भूमि-अधिकार का निर्धारण परस्पर संबंधित होते हुए भी अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं।

### 10. शोध-पद्धति
**प्रथम चरण: संग्रहालय अभिलेख -** संग्रहालय प्रभारी से प्रतिमा का आधिकारिक नाम, सूची क्रमांक, प्राप्ति-स्थान, माप, सामग्री, अनुमानित काल और पुरातात्विक विवरण प्राप्त करना।

**द्वितीय चरण: मौखिक इतिहास -** सिरपुर और आसपास के ग्रामों में भट्टप्रहरी गोत्र के बुजुर्गों से साक्षात्कार, जिसमें गाँव, आयु-समूह, वंशावली का आधार और कथन की पीढ़ीगत निरंतरता दर्ज हो।

**तृतीय चरण: भूमि और वंशावली के अभिलेख -** पुराने राजस्व दस्तावेज, वंशावली और ग्राम-स्तरीय दस्तावेजों का संकलन।

**चतुर्थ चरण: धार्मिक इतिहास -** गुरु घासीदास, माता सफुरा, सतनाम आंदोलन तथा बौद्ध सहजयानी परंपरा पर प्रकाशित शोध की तुलना।

**पंचम चरण: तुलनात्मक विश्लेषण -** प्रतिमा, मौखिक परंपरा और लिखित स्रोतों से प्राप्त निष्कर्षों की तुलना, जिसमें प्रमाणित और अप्रमाणित तथ्यों को स्पष्ट रूप से अलग रखा जाए।

### 11. निष्कर्ष
सिरपुर का पुरातात्विक महत्व, उसकी बहु-धार्मिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और बौद्ध परंपराओं की उपस्थिति ऐतिहासिक साक्ष्यों से समर्थित है। भट्टप्रहरी समुदाय की स्थानीय स्मृति, पूर्वजों की भूमि से संबंधित कथन, खड्गधारी प्रतिमा के साथ संभावित संबंध तथा गुरु घासीदास और माता सफुरा से जुड़ी परंपराएँ आगे के शोध के लिए महत्वपूर्ण विषय प्रस्तुत करती हैं। सतनाम पंथ और बौद्ध सहजयानी परंपरा के बीच वैचारिक समानताओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है, किन्तु प्रत्यक्ष ऐतिहासिक निरंतरता स्थापित करने के लिए अधिक ठोस प्रमाण आवश्यक हैं।

इस शोध का केंद्रीय निष्कर्ष यह है कि भट्टप्रहरी समुदाय की ऐतिहासिक स्मृति का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण, सिरपुर की संबंधित प्रतिमा का आधिकारिक पुरातात्विक विवरण प्राप्त करना तथा भूमि और वंशावली के दस्तावेजों की जाँच अत्यंत उपयोगी होगी।

### 12. संदर्भ एवं आगे के अध्ययन के लिए स्रोत
1. UNESCO World Heritage Centre, Sirpur Cultural and Archaeological Landscape.
2. Singh, Saurabh. (2021). The Emergence and Spread of the Buddhist Tārā Cult in India...
3. Singh, Saurabh. (2021). Buddhism in Sirpur (Chhattisgarh): An Archaeological Study. Deccan College, Pune.
4. गुरु घासीदास और सतनाम आंदोलन से संबंधित प्रकाशित जीवनियाँ एवं छत्तीसगढ़ के क्षेत्रीय इतिहास-ग्रंथ।
5. सिरपुर संग्रहालय की प्रतिमा-सूची, पुरातत्व विभाग की उत्खनन रिपोर्टें, स्थानीय भूमि अभिलेख और भट्टप्रहरी गोत्र की मौखिक वंश-परंपराएँ - जिनका अगले चरण में संकलन और सत्यापन किया जाना है।

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इच्छुक शोधार्थी इस कार्य हेतु संपर्क कर सकते हैं।
**- डॉ. अनिल कुमार भतपहरी**

चाहें तो मैं इसका सुंदर Word / PDF शोध-पत्र प्रारूप, या प्रस्तुति के लिए PPT भी बना दूं?

Monday, October 19, 2026

जगराता

जगराता

प्रातः सैर, सरोवर तट पर,
बैठा तरु की शीतल छाँह,
भीगे नयनों से एक पुरुष
देख रहा जीवन-प्रवाह।

उद्वेलित युवा, असहिष्णु,
क्यों अशांति इस महादेश में,
आसुरी शक्तियों के जाल
फैल रहे हैं सर्वत्र देश में।

नेट-नशे के जाल हैं,
छद्म धर्म-कर्म भेड़-चाल है,
प्रदर्शन की होड़ सर्वत्र,
आचरणहीन भीड़ विकराल है।

दिशाहीन, सद्भावहीन,
छल-छद्म की भगदड़ है,
संसाधनों पर कब्जा,
जन बेदखल, बड़ी तिकड़म है।

खेल रहे हैं सभी यह खेल,
बड़ा ही मनोरंजक है, वाह,
अपनों में मगन हैं हम सब,
पड़ोसी से बेपरवाह।

खुद-सुख, बेपरवाही का
अंतिम लक्ष्य अलगाव है,
उसी में सब उलझे हुए,
तंत्र-जाल में भटकाव है।

हे आद्ये, सुलझा इन्हें,
भव का अंध तमस हरो माता,
भटकाव, अलगाव से बचाओ,
यही मेरी है जगराता।

  - डॉ.अनिल कुमार भतपहरी

Friday, October 16, 2026

चूरी अम्मर रहें

चूरी अमर रहे

जुनवानी के उस पुराने आंगन में आज भी एक खूंटी गड़ी है।

मास्टर जी ने बताया था, इसी खूंटी पर कुटेला वाले तुर्का बाबा अपना कांवर टिकाते थे। एक तरफ टोकनी में लाल, हरी, पीली कांच की चूड़ियां, दूसरी तरफ मनिहारी का छोटा-मोटा सामान। गांव-गांव लगना, यही तो उनकी पौनी-पसारी थी।

बाबा आते तो आंगन भर जाता। आस-पास की सारी बहुएं-बेटियां घेरा बना लेतीं। बाबा किसी का नाम नहीं पूछते थे, बस कहते - "लाओ बिटिया, हाथ आगे करो।" 

चूड़ी पहनाते-पहनाते कलाई पकड़ते, और जब आखिरी चूड़ी कलाई पर खनकती तो औरतें झुक कर उनके पैर छू लेतीं। तुर्का बाबा हड़बड़ा जाते, और हाथ उठा कर एक ही आशीष देते - "चूरी अम्मर रहे बेटी।"

उस आशीष में सुहाग से ज्यादा कुछ और अमर रहता था।

तुर्का बाबा अब नहीं रहे। उनका बेटा रज्जू है। जिसे पलारी का हर लड़का रज्जू भाई कहता है। वही रज्जू जिसे मास्टर जी ने पढ़ाया था, जो उनके लड़कों के साथ एक ही बेंच पर बैठता था। नेक, सीधा, मेहनती। 

इस बार पलारी के बालसमुंद मेले में मास्टर जी की मुलाकात रज्जू से हुई तो वह उदास था। 

"का होगे रज्जू? टोकनी कहां है?"

"धर दिया गुरुजी," रज्जू ने टोपी ठीक करते हुए कहा, "अब कुटेला से जुनवानी तक कोई बुलाता नहीं। शहर से प्लास्टिक की चूड़ी आ गई, और... और अब लोग टोकनी देख के दरवाजा बंद कर लेते हैं। कहते हैं, ये मनिहारी लोग... पता नहीं।"

मास्टर जी कुछ नहीं बोले। विगत कुछ वर्षों से हवा ही ऐसी हो गई है। वही पलारी जो सद्भावना की नगरी थी, जहां 1996 में पेंड्रारोड में नासिर खान साहब इत्र वाले के घर में किरायेदार बनना गर्व की बात थी, जहां बलौदाबाजार में एक मुस्लिम मैडम के घर में बेटे जैसा रखा गया, जहां ईद पर न जा पाने पर दूसरे दिन सुबह-सुबह सेवईं की टिफिन खुद चल कर आती थी - वहीं अब लोग एक-दूसरे को विदेशी कहने लगे हैं।

रज्जू ने कहा, "सोचा था मोबाइल के कवर की दुकान लगा लूं। पर अब्बा की वो बात याद आती है - चूरी अम्मर रहे। तो लगता है, कुछ तो अमर रहना चाहिए।"

उसी मेले में पीछे, जैतखाम के पास एक बुढ़िया बैठी थी - सोनमती। सतनामी बस्ती की। उसके बेटे अंजोर को भी मास्टर जी ने पढ़ाया था। सोनमती के हाथों में चूड़ियां नहीं थीं। सफेद कलाई।

सोनमती ने रज्जू को देखा तो आवाज दी, "अरे रज्जू! इधर आ।"

रज्जू गया। सोनमती ने अपनी बहू को आगे किया।

"पहना दे बेटा। गुरु घासीदास जयंती है कल।"

रज्जू झिझका, "चाची, मेरे पास तो... पुरानी कांच वाली ही हैं। अब कोई लेता नहीं।"

"तो हम का कोई हैं रज्जू? हम सतनामी हैं। हमरे यहां मनखे-मनखे एक समान। हमरे लिए तो कांच ही सोना है। पहना।"

रज्जू ने कांपते हाथों से चूड़ियां पहनाईं। वही खनक। वही आंगन जैसा दृश्य। पहनाने के बाद सोनमती की बहू ने झुक कर रज्जू के पैर छुए।

रज्जू की आंखें भर आईं। उसने वही आशीष दोहराया जो उसने अपने अब्बा से सीखा था - "चूरी अम्मर रहे बेटी।"

पास ही खड़े बाबू खान मुस्कुरा रहे थे। वही बाबू खान, पलारी की शान, जो पत्रकार हैं, और जिन्होंने गुरु घासीदास का जीवन-चरित लिखा है। एक मुसलमान का गुरु घासीदास पर लिखना - इससे बड़ी एकता और क्या होगी?

बाबू खान ने मास्टर जी से कहा, "देख रहे हैं मास्टर जी? जब हिन्दू के बड़े घरों ने दरवाजे बंद किए, तो सतनाम के घरों ने टोकनी के लिए आंगन खोल दिया। क्योंकि सतनाम ने कभी जात नहीं पूछी। और तुर्का ने कभी धर्म नहीं पूछा। दोनों का काम एक ही है - मनखे को जोड़ना।"

मास्टर जी समझ गए।

ये चूड़ी-मनिहारी मुसलमान, ये छुटपुट व्यवसायी, ये कोई बाहर के नहीं हैं। ये इसी मिट्टी के पौनी हैं। जब बाजार ने उन्हें बेकार किया, जब नफरत ने उन्हें अंतर्मुखी किया, तो उन्हें सहारा उसी पंथ में मिला जो खुद हिंदुत्व के समांतर, जातिविहीन, कर्म-प्रिय समाज बन कर खड़ा हुआ था - सतनाम पंथ में।

रज्जू अब हर गुरु पूर्णिमा पर सतनामी बस्ती जाता है। टोकनी लेकर। अंजोर उसकी टोकनी उठाने में मदद करता है। और जब कोई नई बहू चूड़ी पहनती है, तो पूरे बस्ती में वही पुरानी आवाज गूंजती है -

"चूरी अम्मर रहे।"

उस दिन मास्टर जी को लगा, चूड़ी का अमर रहना मतलब कांच का न टूटना नहीं है। चूड़ी का अमर रहना मतलब है, वो हाथ अमर रहे जिसने पहनाई, वो पैर छूने का भाव अमर रहे, वो आंगन अमर रहे जहां हिन्दू, मुस्लिम और सतनामी एक ही टोकनी के चारों ओर बैठते थे।

और जब तक यह आशीष बचा है, पलारी सचमुच सद्भावना की नगरी बची है।

Wednesday, October 14, 2026

सनदई

सनदई 

अबूझमाड़ आज भी अबूझ ही है। यहाँ की राजधानी कही जाने वाली जिला मुख्यालय नारायणपुर से ईरकभट्टी होकर सोनपुर से आगे कुतुल गाँव, जहाँ धूप भी साल के पत्तों से पूछ कर नीचे उतरती है। आज़ादी के बाद अब तक शासन- प्रशासन के लिए चुनौती बनी "माड़"विकास रुपी सूर्योदय से वंचित हैं वहीं की है सनदई 
    माड़िया जनजाति की लड़की जिसने बड़ी ही जद्दोजहज से दो नाले और पहाड़ी रोज पार कर 12वीं प्रथम श्रेणी पास की थी - 62% मार्कशीट लेकर ।जब वह अपने बाबा सोमारू के पास गई, तो जवाब वही मिला जो प्रायः हर अबूझमाड़ की बेटी को मिलता है।

"बहुत पढ़ ली बेटी! अभी इमली का सीजन है, जंगल जाना है।" तेंदू पत्ता से कुछ पैसे जोड़ कर तेरी ब्याह रचाकर पितृ धर्म से उऋण हो,गंगा नहा लूँगा। 

माँ ने कहा - "कॉलेज अपने लोगों के लिए नहीं बना।" 

उस रात सनदई सोई नहीं। दीवार पर टंगी फटी नागरिक शास्त्र की किताब में एक लाइन चमक रही थी - 'शिक्षा हमारा अधिकार है।'

सुबह 4 बजे, जब गाँव सो रहा था, सनदई अपनी बड़े  पिता जी की बेटी और स्कूल में एक क्लास आगे  बुधनी के साथ निकल पड़ी । बुधनी की आठवीं के बाद शादी कर दी थी क्योंकि हाई स्कूल जंगल पहाड़ पार कर ईरकभट्टी जाना होता।  फिर उनके पिता दिन भर सल्फी मंद ताड़ी में चूर रहते थे , माई खेतों में और वनोपज एकत्र कर पास हाट में बेचकर आजीविका चलाती वह उसी में लगी रहती नहीं तो घर में चूल्हा नहीं जलता भला ऐसे में कौन फ़िक्र करता.? उनकी पढ़ाई रुक गई और फिर कुछ दिन बाद ताड़ी की चढ़ी हुई कर्ज़ उतारने ताड़ी वाले अधेड़ के साथ  ब्याह दिए । इस तरह उस भोली मुग्धा को पता ही नहीं कि उनकी जिंदगी कैसे जहन्नूम बन गई। वह जोर से हांफती हुई कही- " बहन मैं हूं तेरे साथ ,जल्दी चलों. हाथ पकड़ गंत्वय की ओर बढ़ चली।

 नारायणपुर उनके लिए नया नहीं हैं वह अपने मर्द के साथ कई बार आ चुकी थी साईकिल में सौदा करने। रस्ते में किस्सा सुनाती आश्रम, बंगला पारा कुम्हार कोस्टा पारा और मावली माता मंदिर जिसके नाम पर हफ्ता भर मेला भरता हैं। ऊपर पहाड़ी पर बिराजे दंतेश्वरी और वहां की बड़े बाँध के पास इतवारी बाज़ार की जो अडताफ़ में प्रसिद्ध हैं। सौदागर दूर -दूर से आते और वनोपज के बदले घरेलू उपयोग की वस्तुएं बेचते। उनकी बातों में खोई सनदई उत्साह से दौड़ी चली जा रही थी।
  कई किलोमीटर का जंगल, नदी, पगडंडी उखड़ी सड़के । नंगे पाँव, छालों भरे पैर। झोले में दो जोड़ी कपड़े, 12वीं की अंक सूची,जाति- निवास और आधार जो उनकी अपनी अदद पहचान हैं एक साड़ी दुकान की पॉली थीन पैकेट में डाल कर  जी जी अंतर रखी पैदल ही सड़क पर चली जा रही थी... छीन सल्फी का पेड़ और पंखी की कलरव के बीच घरघराती एक मेटाडोर  पास रुकी - जाना  कहां हैं?
नारायणपुर 
बैठो ,दाेनों का 100 रुपए लगेंगे। बुधनी उड़द दाल और घर के मुर्गे -मुर्गी बेचकर 500 की नोट यत्नपूर्वक बचा कर रखी थी ।वक्त जरूरत पर काम आए उसी के भरोसे  वह सनदई को साथ ले कर चल पड़ी थी। 

नारायणपुर पहुँच कर पहला काम मूल अंक सूची आदि  फोटो कॉपी कराई और फोटो भी खिंचाई। पता चला कि वहीं कम्पूटर में आन लाईन  प्रवेश हेतु फॉर्म रजिस्ट्रेशन कराना हैं और उसके लिए करीब 1500 रुपए चाहिए।  अब  विकट संकट कि अजनबी शहर में किससे और कैसे मांगे! असमंजस सी खड़ी रहीं तभी फोटो धूल कर आई देखा कि कलर फ़ोटो में नाक की फुल्ली सुनहरी आभा लिए चमक रही थीं। बुधनी कही -"कित्ती सुंदर फब रही हो गिया! " और उसके कंधे को दबाई..वह बहन ही नहीं सहेली जो थी।
       सनदई हाथ से फुल्ली को छूकर देखी और अपनी नानी की याद न में पल भर खो गई... जब वह सज्ञान हुई तभी उसे वह खुशी खुशी तोहफा दी क्योंकि रजस्वला के समय उत्सव मनाने की प्रथा थी। 
  थोड़ी देर असमंजस सी शून्य में रही.. बुधनी कही क्या हुआ? उसने कही - दीदी मुझे इसे बेचकर पढ़ना हैं और नानी का मान रखना हैं वह चाहती थी कि मैं पढू और मास्टरनी डॉक्टरनी बनू ।उसने बिना पल गंवाए कही तू तो जानती होगी सुनार की दुकान कहां हैं? वे दोनों चल पड़ी 

"इसे बेचना है।"

 एक ग्राम की थी तो 7000 रुपये मिले। आँख में आँसू थे, पर हाथ नहीं कांपे। उसने गहना नहीं बेचीं बल्कि अपनी  खुशी खरीदी थी। 

वीरांगना रमोतीन महिला महाविद्यालय, नारायणपुर में एडमिशन की आखिरी तारीख थी। लाइन बहुत लंबी। काउंटर पर बाबू ने फॉर्म देखा - दो टके कहे क्योंकि एक सा ही जवाब बिना प्रश्न पूछे उन्हें कहना हैं "आदिवासी छात्रावास फुल है, जनरल हॉस्टल में जगह नहीं। अभिभावक को लाओ।"

ऐसे हताश सनदई वहीं जमीन पर बैठ गई। बुधनी अन्य अभिभावक के साथ महाविद्यालय के प्रांगण में लगे काजू पेड़ के छाँव में बैठी हुई थी।तभी हिंदी विभाग के प्रो. भट्ट सर उधर से गुजरे... उन्होंने देखा - एक लड़की, फटे चप्पल, पैरों में छाले, पर गोद में मार्कशीट को ऐसे पकड़े है जैसे कोई ग्रंथ हो।

"कहाँ से आई हो बेटा?"

"कुतुल से सर "
"अच्छा "

"किसके साथ?"

"अकेली, सहेली के साथ।"

सनदई ने सब बता दिया - माता-पिता का मना करना, विद्रोह कर आना बड़ी दीदी का साथ इतनी दूर  आना, नाक की फुल्ली बेचना इत्यादि।

प्रो. भट्ट सर हिंदी पढ़ाते थे, पर उन्होंने सनदई के भीतर की कविता पढ़ ली। वे कुछ बोले नहीं, सीधे उसका हाथ पकड़ कर प्राचार्य कक्ष में ले गए।

"सर, ये बच्ची नहीं, अबूझमाड़ का  सवाल है ।इसका जवाब हमें देना है।"
प्राचार्य भी दयालू थे भले वह प्रशासनिक कठोरता का आवरण ओढ़े होते थे पर है तो इंसान ही।
प्रो. भट्ट सर के सहयोग से ही उसका प्रवेश हुआ। उन्होंने अपने पास के टेबल में फॉर्म की अधूरी जानकारियां  भरी, विषय दिलाए, और खुद अपने हस्ताक्षर से उसकी गारंटी ली।

फिर वे उसे महिला छात्रावास ले गए। अधीक्षिका ने कहा - "भट्ट सर, एक भी कमरा खाली नहीं।"

भट्ट सर ने कहा - "मैडम, एक बेटी जंगल से अपनी जड़ उखाड़ कर आई है ताकि वह पेड़ बन सके। इसे बरामदे में भी जगह दे दीजिए, ये खुद अपनी जगह बना लेगी।"

उनके मार्गदर्शन और जिद के कारण ही उस शाम सनदई को कमरा नंबर 7 में एक बेड मिला। साथ ही एक नियम छात्रावास में बनाई गई कि बिना हॉस्टल में सलेक्शन के जरूरत मंद छात्राओं को एक हाल में रखें और उनसे भोजन आदि बनाने में पारिश्रमिक ले या फिर स्कूल छात्रवृत्ति से किस्त अनुसार न्यूनतम शुल्क ले। 
  

आज सनदई बी.ए. प्रथम वर्ष में है। प्रो. भट्ट सर की कक्षा में वह सबसे आगे बैठती है। उसकी नाक आज सूनी है, पर उसकी कॉपी शब्दों से भरी है।

महाविद्यालय में दीक्षारंभ के दिन प्रो. भट्ट सर ने शिक्षा के महत्व को समझते हुए व्याख्यान देते  अचानक सनदई की ओर देखते हुए कहे  - तुमने अपनी फुल्ली बेची नहीं, बोई है। एक दिन पूरा माड़ तुम्हारी नाक की उस फुल्ली जैसा चमकेगा।"
     हाल तालियों से गूँज उठी ... आवाक सनदई  हतप्रभ सी हुई !ओ समझ नहीं पा रही थी क्या और कैसी प्रतिक्रिया दे कि सहज होती धीरे से मुस्कुरा दी और विनीत भाव से सिर झुका ली। 
     अबूझमाड़ की सनदई ने बता दिया कि उनकी  विद्रोह अंधेरे के खिलाफ हैं और रौशनी के लिए पढ़ रही हैं। दोपहर हो गए थे उन्हें पता हैं कि साल वन से सूर्य किरण छनकर पगडंडी में पड़ रही होगीऔर पास ही लता लहलहाती हुई साल पेड़ में चढ़ रही हैं। 

       डॉ.अनिल कुमार भतपहरी
           9617777514  
           नारायणपुर बस्तर 
anilbhatpahari@gmail.com