राजा गुरु बालकदास
भूमिका
सतनाम पंथ (धर्म) के प्रवर्तक गुरु घासीदास जी के मंझले पुत्र राजा गुरु बालकदास जी का जन्म गिरौदपुरी में सन् 1795 में भादो कृष्ण पक्ष अष्टमी को हुआ था।
महाप्रतापी, शूरवीर बालकदास बचपन से ही तेजस्वी थे। पिता की तरह 6 फीट ऊँचे कद-काठी, गौर वर्ण, काले घुँघराले बाल और कसरती बदन वाले, राजसी स्वरूप और सम्मोहक छवि के धनी थे। उनमें अभूतपूर्व संगठनात्मक क्षमता थी, फलस्वरूप वे बाल्यावस्था से ही गुरु बाबा के दर्शनार्थ आ रहे जनमानस को व्यवस्थित करते और उन्हें क्रमशः गुरु बाबा से मिलने, वार्तालाप करने और उनकी समस्याओं के उचित निदान हेतु सार्थक विचार-विमर्श करते। सतनाम पंथ के प्रबंधन और उसके प्रभावी संचालन को वे गुरु घासीदास जी के निर्देशानुसार बड़ी कुशलता से किया करते थे। गिरौदपुरी में दूर-दूर से दर्शनार्थी आते और गुरु वचन श्रवण कर सतनाम पंथ की दीक्षा लेते - यह सब क्रिया-कलाप वे बचपन से देखते हुए बड़े हुए।
सतनाम जागरण का विस्तार
गिरौदपुरी में गुरु घासीदास जी के दर्शनार्थ एवं उनसे धर्म-दीक्षा लेने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। सैकड़ों-हजारों की संख्या में लोग पैदल, बैलगाड़ी आदि साधनों से आने लगे। बाबा जी किसी साकार देवी-देवता की मूर्ति और मंदिर के स्थान पर सतनाम सत्पुरुष, जो निराकार और ज्योति स्वरूप है, की ध्यान-आराधना और परस्पर लोगों में सत्याचरण व सदाचार को अपनाने और व्यवहार करने की नैतिक सीख देते थे। वे लोगों को परलोक नहीं, अपने इर्द-गिर्द इहलोक, जो परलोक साधने के उपक्रम में बिगड़ा हुआ था, को सुधारने में अपेक्षित सहयोग करने लगे। इस प्रकार पिता, माता एवं पुत्र का यह संयुक्त उपक्रम बड़ी तेजी से लोकप्रिय होने लगा। पंथ का प्रचार-प्रसार होने से जनमानस इसे अंगीकार भी करने लगा। "मनखे-मनखे एक समान" की दिव्य उक्ति महामंत्र की तरह जनमानस को गहराई से उद्वेलित और प्रभावित करने लगी। इसके कारण सदियों से व्याप्त ऊँच-नीच, जात-पात के दायरे टूटने लगे। फलस्वरूप धर्म-कर्म व सांस्कृतिक क्षेत्र में जो नव-प्रवर्तन हुए, उनसे सुविधाभोगी वर्ग हतप्रभ होकर इस "सतनाम जागरण अभियान" को रोकने के लिए अनेक तरह के कुचक्र व षड्यंत्र करने लगा। उनका हस्तक्षेप इतना अधिक बढ़ गया कि गुरु घासीदास जी को परिवार सहित अपनी प्रिय जन्मस्थली व तपस्थली गिरौदपुरी का परित्याग करना पड़ा और वे सपरिवार रायपुर राज की ओर प्रस्थान कर गए।
तेलासी और भंडारपुरी धाम की स्थापना
इस प्रकार गुरु परिवार तेलासी नामक ग्राम में आकर छिंदहा तालाब के पार आश्रय बनाकर रहने लगा। यहाँ वे अनेक असाध्य रोगियों को अपनी दिव्य चिकित्सा पद्धति से निरोग करने लगे, फलस्वरूप उनकी यश-कीर्ति चहुँदिशा में फैलने लगी। उनके नाम को सुनकर और अपने पिता-माता को तलाशते हुए एक नवयुवक साधु अमरदास, जो बचपन में बिछड़ गए थे, ने आकर अपना परिचय दिया और इस तरह बिखरा हुआ गुरु परिवार खुशियाँ मनाने लगा। दोनों भाई एक-दूसरे को देखकर आश्चर्यचकित हुए और उपस्थित जनसमुदाय को सुखानुभूति हुई। गुरु की यश-कीर्ति चहुँओर फैल चुकी थी, फलस्वरूप अनेक लोग दर्शनार्थ आते, गुरु से नाम-पान (दीक्षा) लेते व श्रद्धानुसार भेंट चढ़ाते। इस तरह एक नया सांस्कृतिक नवजागरण होने लगा। तेलासी में 1810 के आसपास ही विराट महासंगम हुआ, जहाँ अनेक जातियों के लोगों ने स्वस्फूर्त सतनाम पंथ अंगीकार किया। तेलासी धर्मनगरी की तरह ख्याति प्राप्त हो गया, जहाँ चारों ओर से श्रद्धालु आने लगे।
गुरु अमरदास व बालकदास परस्पर मिलकर अपने पिता के कार्य को गतिमान करने में सक्रिय हो गए। अमरदास सतनाम के दार्शनिक व आध्यात्मिक पक्ष को लेकर चिंतन-मनन कर व्यवस्थित करने में रम गए, तो बालकदास ने युवाओं में अनुशासन, आत्मसंयम, बल-शक्ति लाने के लिए योग के साथ व्यायाम व अखाड़ा प्रथा का प्रवर्तन किया। यह नवयुवक गुरु के साथ पंथ-प्रचारार्थ रामत-रावटियों में प्रबंधन हेतु जाते और व्यवस्था आदि करते।
तेलासी के पास ही एक छोटा-सा ग्राम धरमपुरा था, वहाँ के मुखिया लोहार थे। वे निःसंतान थे। उनकी विधवा धर्मौतिन लोहारिन ने अपनी जमीन सर्वप्रथम गुरु चरणों में दान स्वरूप भेंट की। भूदान की इस प्रक्रिया ने जनमानस को प्रेरित किया, फलस्वरूप अनेक लोगों ने अन्न व भूदान देना प्रारंभ किया। अन्न-धन के भंडारण होने तथा श्रद्धालुओं के लिए नित्य भोग-भंडारा चलने के कारण कालांतर में धरमपुरा ग्राम "भंडारपुरी" के नाम से ख्याति प्राप्त हो गया, जहाँ गुरुओं ने आकर स्थायी रूप से बसकर ठहरने हेतु विश्रामालय, बाड़ा आदि बनवाए। दोनों गुरु पुत्रों का विवाह भी यहीं संपन्न हुआ। गुरु अमरदास का विवाह प्रतापपुर की प्रतापपुरहिन माता से हुआ और गुरु बालकदास का विवाह महंत भुजबल महंत, ढारा, नवागढ़-बेमेतरा निवासी की बहन नीरा माता से हुआ।
राजा की उपाधि और सतनाम साम्राज्य
गुरु परिवार समृद्ध व ऐश्वर्यवान होने लगा तथा जनमानस में गुरु घासीदास और उनके पुत्रों की अपार लोकप्रियता और अनुयायियों की संख्या लाखों तक पहुँचने पर उनके जनाधार को देखते हुए 1820 में ब्रिटिश सरकार ने गुरु पुत्र बालकदास को सोने की मूठ वाली तलवार और हाथी-घोड़े तथा सैनिक रखने का अधिकार पत्र प्रदान कर 'राजा' घोषित किया। तत्पश्चात गुरु परिवार "राजवंश" परिवार में परिवर्तित हो गया।
उन्हें रायपुर व रतनपुर राज में 8 (तेलासी-भंडार परिक्षेत्र) - 8 गाँव (कुआँ-बोड़सरा परिक्षेत्र) समर्पित किए गए, जहाँ भव्यतम चौखंड़ा मोतीमहल सतनाम गुरुद्वारा का निर्माण 1830 के आसपास करवाया गया। बोड़सरा में भव्यतम लाल पत्थर का बाड़ा बनवाया गया।
गुरु बालकदास ने अपने पिता गुरु घासीदास के सतनाम जागरण को "सतनाम आंदोलन" में परिणत किया और उसे अन्याय, जुल्म व स्वाभिमान हेतु व्यक्ति-स्वतंत्रता के रूप में अलग तरह से संगठित किया। वे सतनाम सेना गठित कर राजपाठ चलाने लगे। अनेक राजवंशों के परिक्षेत्र में जाकर शोभायात्रा व जुलूस निकालकर "सतनाम साम्राज्य" का विस्तार करने लगे। भटगाँव, पलारी, लवन, बिलाईगढ़, सिमगा, तरेंगा, मारो, नवागढ़, मुंगेली आदि जगहों पर चतुरंगिणी सेना, जिसमें हाथी, घोड़े, ऊँट व पैदल का प्रदर्शन किया। गुरु बालकदास के आन-बान-शान की चर्चा चारों ओर फैलने लगी। उनकी प्रशंसा में अनेक लोकगीत व मंगल भजन फिजाओं में गूँजने लगे। एक नया स्वाभिमान व शौर्य से नव-संगठित सतनामी समाज प्रदीप्त होने लगा।
महाप्रयाण और बलिदान
1840 में गुरु अमरदास के समाधिस्थ होने पर गुरु घासीदास अपने प्रिय पुत्र के वियोग से आहत व अनमना-सा एकांतवासी हो गए। वृद्धावस्था आदि के कारण और गुरु बालकदास के प्रखर नेतृत्व के चलते वे अंततः 1850 में मोती महल व भव्यतम गुरु आवास भंडारपुरी का परित्याग करके अपनी प्रिय जन्मभूमि गिरौदपुरी की ओर प्रयाण कर गए।
1850-60 तक गुरु बालकदास का स्वतंत्र नेतृत्व रहा। वे तत्पश्चात सफलताएँ अर्जित करने के लिए अपने विश्वस्त सिपहसालार, अंगरक्षक सरहा और जोधाई सहित अनेक प्रवीण सतनाम सैनिकों के साथ महाअभियान रामत-रावटी हेतु निकल पड़े। अंग्रेज सतनामियों की वर्तमान स्थिति को देखकर उन्हें ईसाइयत की ओर ले जाना चाहते थे, पर धर्मांतरण हो नहीं पा रहा था, क्योंकि समाज में गुरु घासीदास का गहरा प्रभाव था तथा गुरु बालकदास का सुदृढ़ सामाजिक संगठन - दोनों की युति ने हिंदुओं और ईसाइयों के मंसूबों पर पानी फेर दिया। अधिकतर लोग सतनाम पंथ में दीक्षित होने लगे। इस कारण राजा गुरु बालकदास दोनों धार्मिक संगठन - हिंदू और ईसाई - के संज्ञान व षड्यंत्र के केंद्रबिंदु में थे।
27 मार्च सन् 1860 की रात्रि में सतनाम पंथ प्रचार में गए गुरु बालकदास को मौका पाकर औराबांधा नामक ग्राम में निहत्थे भोजन के लिए आमंत्रित किया गया और एक राजपूत सैनिकों की टोली ने उन पर आक्रमण कर दिया। उनके अंगरक्षक सरहा-जोधाई ने चंदाही लोटे से पानी उलीचकर हाथ की मुट्ठी में फँसाकर अदम्य शौर्य का प्रदर्शन करते हुए लड़ते हुए उन्हें घर से सुरक्षित बाहर निकाला और चनवारी खेत की ओर ले गए।
रात्रि में शिष्य व अनुयायी की आवाज निकालकर धोखा देते हुए - "गुरु गोसाईं... राजा गुरु... गुरु बाबा जी आप कहाँ हो, शत्रु चले गए" - कहकर शत्रुओं ने धोखे से निहत्थे गुरु के ऊपर तलवार से वार किया। वे पगड़ी को डोरी बनाकर वार झेलते हुए युद्धरत रहे और सरहा-जोधाई भी भीषण संघर्ष करते रहे। गुरु को घायल अवस्था में छोड़कर भय से शत्रु टोली भाग खड़ी हुई। घायल अवस्था में रक्तरंजित गुरु के शरीर को सिर और पैर को कंधे पर रखकर अनुयायी मेड़पार व भर्री के धरसा वाले अरकट्ठा रास्ते से कोसा, मुलमुला होते हुए पुरान की ओर शिवनाथ नदी तट ले गए। उधर त्वरित दौड़ते हुए गुरु के ऊपर हुए वार का समाचार देने उनके बहनोई भुजबल महंत, ढारा और गुरुद्वारा भंडारपुरी को संदेश भेजा गया। महंत भुजबल, भाई आगरदास और पुत्र साहेब दास की उपस्थिति में अंतिम बाखरी वाणी में संदेश और झीना दरस दिखाकर गुरु बालकदास 28 मार्च 1860 को सतलोक प्रयाण कर गए। लाखों अनुयायी और जनमानस अपने प्रिय गुरु के वियोग से हतप्रभ और किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए। उधर सरहा-जोधाई भी लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए।
फलस्वरूप तेजी से गतिमान सतनाम पंथ प्रवर्तन का चक्र थम-सा गया।
कालांतर में अंग्रेजों ने गुरु बालकदास के प्रदेय पर लिखा कि "वे कुशल संगठनकर्ता और प्रभावी प्रवक्ता थे। वे कुछ दिन और रहते तो छत्तीसगढ़ को सतनाममय कर देते।"
काव्यांजलि
"राजा गुरु बालकदास"
धन्य गुरु बालकदास,
गुरुवंश म जनम धर आये तैं...
बन के बड़वा बेटा बाबा के,
सपना ल संवारे तैं...
बनके सतनामी राजा,
गुरु राजपाठ ल चलाये तैं...
रावटी लगा के दुनिया म,
सतनाम पंथ ल चलाये तैं...
गाँव-गाँव अठगवा बनाके,
सतनाम अखाड़ा ल चलाये तैं...
भंडार धाम म अचरुज,
मोती महल सिरजाये तैं...
चाँद-सूरज जोड़ा खाम गड़ाये,
सतनाम-सेना साजे तैं...
दुख-पीरा हरके मनखे-मन के,
मान ल बढ़ाये तैं...
सतनाम के सेती बाबा,
अपन जान ल गवाये तैं...
जुग-जुग नाम अमर होगे,
वीर बलिदानी कहाये तैं...