Friday, May 29, 2026

सतनाम ही सनातन हैं

सतनाम ही सनातन हैं 

    - प्रो डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
 
      सतबोधिया, सतबोधि, सत संदेसिया,सेतगुरु  , सतगुरु, घासीदास नाम के सम्मुख प्राचीन समय से चला आ रहा हैं। अनेक पंथी , मंगल भजनों में भी यह प्रचलित हैं। बोधि , बोधियां शब्द बौद्ध धम्म और पाली साहित्य के प्रभाव से आया हैं।सत्रहवीं सदी तक व्यापक रुप में यहां बौद्ध धम्म प्रचलित था। अनेक सिद्ध, नाथ, जोगी, जती समाज में थे। उनका सबका उपस्थिति और प्रभाव समकालीन समाज में रहा हैं। फलस्वरूप समाज में समरसता रही और रोटी बेटी भी ग्रामों या समीप में होते रहें हैं। जातपात का ऐसा विकराल स्वरुप अपेक्षाकृत कम ही थे। दक्षिण कौशल में राजभाषा पाली एवं ब्राह्मी लिपि का प्रचलन था। जिसका साक्ष्य यहां के शिलालेखो/ ताम्रपत्रों में संरक्षित हैं। छत्तीसगढ़ी भी पाली प्राकृत का ही स्वरुप हैं।
     छत्तीसगढ़ में इसी समय मराठा अंग्रेजी कालखंड में उत्तर भारतियों का आगमन और पौराणिक कथा कहानियों का वृहत्तर  प्रचार प्रसार राजकीय संरक्षण आदि से पूर्व प्रचलित संस्कृति में अभूतपूर्व बदलाव आया। मैदानी क्षेत्रों में जातियां लामबंद हुई परस्पर भेदभाव और फिरकापरस्ती बढ़ी। 
   आजकल बस्तर बीहड़ जंगलों के सुदूर ग्रामों में जो पहले एक था कोई भेदभाव नहीं था वहां भी इन पर प्रांतिको के हस्तक्षेप से सामाजिक वैमनस्य और सांप्रदायिक उन्माद देखें जा रहे हैं।
   मैदानी क्षेत्र में बढ़ते जातिवाद और अंधविश्वास के विरुद्ध समाज सुधार के लिए गुरु घासीदास का अभ्युदय हुआ। उनकी सतनाम सिद्धांत और दिव्योक्ति" मनखे मनखे एक की अनुगूंज सर्वत्र होने लगी।"अनेक जातियां सतनाम पंथ में सम्मिलित होकर जात पात वर्ण भेद के कुचक्र से मुक्त होने लगे।
   हालांकि उनके बढ़ते प्रभाव को रोकने अनेक षड्यंत्र हुए पर सत्य को कोई रोक नहीं सकते उनकी अपनी प्रभा हैं जो स्वयं प्रसारित और प्रकाशित होते ही हैं।
बुद्ध वचन  हैं 
         "एस धम्मो सनंतनों"

प्रसिद्ध पाली भाषा का वाक्यांश है, जिसका अर्थ है— "यही शाश्वत (सनातन) धर्म है।"यह वाक्य बौद्ध धर्म के प्रमुख ग्रंथ धम्मपद (गाथा ५) से लिया गया है। इसका पूरा श्लोक और अर्थ इस प्रकार है:
न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं।अवेरेन च सम्मन्ति एस धम्मो सनंतनो॥

अर्थ:"इस संसार में कभी भी बैर (दुश्मनी) से बैर शांत नहीं होता। बैर केवल प्रेम और अपकार (क्षमा) से ही शांत होता है। यही शाश्वत नियम (धर्म) है।"प्रमुख विशेषताएँ:सार्वभौमिक सत्य: यह बुद्ध की प्रमुख शिक्षा है जो हिंसा और घृणा को त्यागकर प्रेम और करुणा के मार्ग पर चलने का संदेश देती है।

यह परम सत्य हैं कि बैर अबैर से नष्ट होती हैं 
घृणा प्रेम से,झूठ सत्य से
अंधेरा प्रकाश से कटती हैं यही सनातन हैं।
       तो समाज में षड्यंत्र जनित शास्त्रीय ढंग से विभाजित और फैली हुई जात पात उच्च नीच , ढोंग पाखंड का विनाश सतनाम से होगा। यही सनातन हैं।
  इस गुरुघासीदास ने नैसर्गिक रूप से जो सत्य हैं उनकी उदघोषणा किया संयोग से सत्य की नैसर्गिक स्वरुप का दिग्दर्शन तथागत बुद्ध भी करते सनातन कहे। उसी को यहाँ प्रतिष्ठित किया गया और लोक व्यवहार में लाये गए। फलस्वरूप सतनाम ही सनातन हैं या कहे सनातन सतनाम हैं। यदि सतनाम कहने में समझने में दिक्कत हैं तो व्यर्थ सनातन की दुहाई न दे क्योंकि बिना समता न्याय बंधुत्व के धर्म व्यर्थ हैं यदि वर्ण एवं जाति विभाजन और उच्च नीच हैं तब तो यही तत्व सनातन की घोर शत्रु हैं। वे बैर पालकर कैसे अबैर भाव को अर्जित करेगा? जात पात, उच्च नीच छुआछूत को बढ़ावा देकर शस्त्र सम्मत कहकर मानकर बढ़ावा देते हैं वह कतई सनातन एवं सतनाम का स अक्षर नहीं जान समझ सकता।

     नब्बे के दशक में  सिरपुर के आसपास 5-7 ग्रामों में बसे हम प्राचीन सहजयानी लोग जिनके पूर्वज सतनामी हो गए थे वे बुद्ध पूर्णिमा को आनंद प्रभु बुद्ध विहार प्रांगण में मेला लगाने एवं बुद्ध वंदना के लिए प्रयास किए। 
बाद में महासमुंद रायपुर बौद्ध समाज से सामंजस्य बिठाकर भंते आर्य नागार्गुन सुरई ससई गुरु दयावंत ,सरदार दिलीप सिंग होरा की आतिथ्य और हजारों सतनामी बौद्ध जनों की उपस्थिति में"बोधिसत्व गुरुघासीदास" कहें गए । 
   कालांतर में यह भावपूर्ण संबोधन प्रबुद्ध समुदाय में श्रद्धापूर्वक कहे जा रहें हैं। बुद्ध ने भंते संघ को उपदेशना देते त्रिशरण पंचशील अष्टमार्ग तय किए और उन्हें घोषित किया कि "येतो धम्मो सनंतनो" यह सिद्धांत ओर सूत्र मन वचन कर्म में धारनीय हैं। उन्हीं के अनुरुप गुरु घासीदास का  सप्त सिद्धांत, अमृतवाणी उपदेशना आदि सतनाम पंथ की शाश्वत सत्य विशेषता हैं जो कि अपरिवर्तनीय एवं नित नवीन  हैं। यह विशेषता सत्य सनातन हैं अर्थात" सतनाम ही  सच्चे अर्थों में सनातन हैं।
         वर्तमान में सतनाम पंथ अपनी प्राचीन स्वरुप को जानने समझने और आत्मसात करने की ओर अग्रसर हैं। ताकि भारतीय समाज में जन्मना जातियां वर्ण आदि खत्म हो और बुद्ध कालीन समृद्धशाली समाज वैश्विक  मार्गदर्शक ( गुरु) होने की ओर सच में अग्रसर हो सके। केवल ख्याली पुलाव बनाते भ्रमित न रहें।

    भवतु सब्ब मंगलम 

       जय सतनाम नमो बुद्धाय

सेवक राम बाँधे

सतनाम धर्म संस्कृति पर केंद्रित छत्तीसगढ़ एवं छत्तीसगढ़ी में साहित्य सृजन तो सद्गुरु घासीदास के  सतनाम पंथ की प्रवर्तन एवं सप्त सिद्धांत की प्रस्तुति 1790 और निरंतर रामत रावटी में उपदेशना के समय ही प्रचलन में आ गए। उनकी बातों को लयात्मक गीतात्मक रुप देकर गाने एवं कंठस्थ करने की कलाएं समाज में प्रचलित हो गए। साथ ही छत्तीसगढ़ी को साहित्यिक एवं कलात्मक रुप मिला। उनमें जीवन दर्शन की बातें आई आध्यात्मिक चेतना जगी इस तरह सद्गुरु घासीदास के श्रीमुख से नि:सृत छत्तीसगढी देव भाषा कही जाने वाली संस्कृत पाली जैसी महिमामय हुई।उनके सुपुत्र गुरु अमरदास एवं संत महंत ने समाज में  प्रतिबद्धता पूर्वक संपूर्ण छत्तीसगढ़ में प्रचार प्रसार किया।
   कालांतर में जब शिक्षा आई तो गुरु उपदेश एवं अलग अलग परिक्षेत्र में प्रचलित लोक कथाएं संत मंहत की प्रेरक संस्मरण, वृत्तांत जीवनी इत्यादि का लेखन आरंभ हुआ। फलस्वरूप मानवता एवं करुणा से आप्लावित लोक कल्याण की उच्च आदर्श का स्वर सतनाम साहित्य में समादृत हैं।
     उच्च शिक्षित एवं राज्य में उप सचिव (राजस्व) जैसे उच्च प्रशासनिक अधिकारी  रहे सेवक राम बांधे "सवेरा" जी अनेक जगहों पर लोक सेवक थे। वे जनमानस की समस्याओं एवं उनकी संघर्ष एवं पीड़ा के विगत 60 वर्षों के चश्मदीद गवाह भी हैं। उनका लेखा जोखा सतनाम दर्शन से प्राप्त दृष्टि से किये हैं वह अभिनंदनीय हैं।
  विषय पर उनकी दृढ़ पकड़ और सहजता से प्रभावी प्रस्तुति उनके व्यक्तव्य एवं लेखन में दृष्टिगोचर होते हैं। आपकी प्रथम चर्चित निबंध संग्रह पाखी पठनीय ही नहीं संग्रहणीय भी हैं।
अब यह उनकी दूसरी कृति हैं जिसमें वे गुरु उपदेश और वाणी की प्रतिध्वनि पर रची गई अनुपम कृति है। जिसे वह प्राचीन किस्सागोई शैली में आखीन देखी कानन सुनी रोचक दास्तान हैं।
 सेवानिवृती उपरांत समाज सेवा हेतु समर्पित बाँधे साहब राज्य में गठित प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज के महासचिव हैं और सतनाम रावटी दर्शन यात्रा के प्रणेता आध्यक्ष हैं। जिनके प्रयास से गुरु घासीदास के सभी 9 रावटी स्थलों पर परिक्रमा यात्रा की अवधारणा विकसित हुई। यह यात्रा अनेक परिक्षेत्रों पर वर्गीकृत समुदाय में सांस्कृतिक एवं धार्मिक एकीकरण हेतु अत्युतम प्रयास हैं।
     इसी तरह वे समाज में प्रचलित व्रत त्यौहार उत्सव इत्यादि व्याप्त  विभिन्नता में एकता लाने सतत सक्रिय हैं। ताकि सतनाम संस्कृति स्पष्टत: पृथक नजर आए और कोई भी हो सहजता से जान समझ सके कि सतनाम संस्कृति  क्या हैं?उनमें व्याप्त धर्म,दर्शन साहित्य के अवयव मानव के लिये कितने उपयोगी हैं? 
इन्हीं प्रश्नों के उचित समाधान और हल हेतु वे सतत् साहित्य सृजन और व्यापक आयोजन में सतत सक्रिय हैं। नई कृति हेतु आपको एवं पारिवारिक सदस्यों को हार्दिक बधाई!

उम्र के इस पड़ाव में भी आपका साहित्य सृजन एवं सांगठनिक  योगदान प्रेरक और अविस्मरणीय रहेगा । उक्त स्तुत्य कार्य के कारण विमल यश कीर्ति के आप प्रतिभागी बनेंगे,ऐसी दृढ़ विश्वास हैं।
    आप सतत सृजनशील सुखी एवं दीर्घायु रहें। मंगलकामनाएं ।

     जय सतनाम 

डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
9617777514
    प्राध्यापक 
वीरांगना रमोतीन माड़िया आदर्श महिला महाविद्यालय नारायणपुर छत्तीसगढ़

Tuesday, April 21, 2026

सतनाम सनातन हैं

जो तजे जीर्ण शीर्ण पुरातन 
वो सतनाम सनातन हैं.

युगों युगों से शोषित मानव 
आकर तृप्त हुए पावन हैं ...
          
पामम्ममम्मद खंड नहीं कर्मकांड नहीं 
सद्व्यवहार पूजा अर्चन हैं..

ऊंच नीच जात पात नहीं 
न जन्मना वर्ण विभाजन हैं


भूखे को भोजन प्यासे को पानी 
समता और न्याय ही      mkñn दर्शन हैं...

Saturday, April 11, 2026

😘🎇

दीवार 

विचार वि हीन समुदाय में रहना 
जैसे काल कोठरी की दीवारों से घिरना 
आबोहवा ही नहीं चंद रौशनी के लिए  
इधर उधर भटक ना चीखना  
नागवार ही नहींml अपराध हैं तुम्हारा 
मानवता के लिए अलख जगाना 
नुकीली दीवारों से सर टकराना 
अंततः लहूलुहान सkलीब सा जीवन को ढोना 
कोई तो हैं जो हांक ले जा रहा हैं भेड़ें 
पर कहां  दोनों को पता 

..,नहीं पता 
पर कोई तो गया हैं वहां
 कोई देखें हैं जहां 
यह केवल सुने या बुझे हैं लाल बुझक्कड़ सा 
इतने में देखो भला जली रस्सी अकड़ सा 
विचार विहीन जड़वत समुदाय ही समाज हैं 
यदि इन्हीं पैरावटो, मिट्टी गिट्टी की ढेरों पर नाज हैं 
जिसमें हलचल नहीं वे न समुदाय है न समाज हैं
वह हैं काल कोठरी की स्याह दीवार  
चलिए संग पग दो पग लगाने खिड़की किवार
या फिर चलें मित्रों ढहाने वो दीवार...

Monday, March 30, 2026

भारतीय संस्कृति पर श्रीराम का प्रभाव

"श्रीराम के भारतीय संस्कृति पर प्रभाव"
  -डॉ.अनिल कुमार भतपहरी                 
           प्राध्यापक (हिंदी)

     मानव जीवन निर्वाह के विविध पक्ष है वे सब संस्कृति के अधीन हैं परंतु भारतीय संस्कृति श्री राम के विराट व्यक्तित्व के अधीन हैं कहना या समझना कतई अतिशयोक्ति नहीं हैं।
सच में देखा जाय तो भगवान राम भारत के उत्तर से सुदूर दक्षिण तक पूज्यनीय हैं। जन जीवन ही नहीं पशु पक्षी और प्रकृति के अनेक सुरम्य स्थलों, जिसमें नदी नाले पर्वत झरने आदि पर उनके स्पष्ट प्रभाव दर्शनीय हैं। उनके सहचरो/ सहयोगियों के स्मृतियों को जनमानस आज भी सहेजे हुए हैं ।जहां पर मेले उत्सव आदि के आयोजन होते हैं। जिससे जनजीवन युगों से प्रेरित होते आ रहे हैं। यह बातें किसी भी देश समाज के लिए अत्यंत गौरव की बात हैं। श्री राम का प्रभाव इतना व्यापक हैं कि जैसे निर्गुण भक्ति में परमात्मा चराचर व्याप्त हैं उनके अनुरुप ही सगुण भक्ति में महाकवि तुलसी लिखते हैं - 
सियाराम मैं सब जग जानी, करहूं प्रणाम जोरी जुग पानी। (1)

   
   प्रभु श्रीराम भारतीय संस्कृति में एक आदर्श पुरुष "मर्यादा पुरुषोत्तम"के रूप में पूजित हैं। उनके जीवन का प्रभाव इतना गहरा है कि आज भी समाज को दिशा देने में उनकी कहानी एवं जीवन के विविध प्रसंग महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आइए जानते हैं कि श्रीराम का भारतीय संस्कृति पर क्या प्रभाव है:

आदर्श पुत्र और भाई के रूप में
 बालक राम घर परिवार सहित नगर वासी के लिय भी प्रिय हैं उनकी मोहक छवि का वर्णन द्रष्टव्य हैं - ठुमकी चलत रामचंद्र बाजत पैजनियां( 2)

श्रीराम ने अपने पिता के वचन का पालन करते हुए  14 वर्षों का वनवास स्वीकार किया, जो कर्तव्य और नैतिकता का उत्कृष्ट उदाहरण है। उनके भाई लक्ष्मण और भरत के साथ उनके संबंध प्रेम और समर्पण की मिसाल देते हैं। वनवास काल में उनकी धर्मपत्नी सीता और लघु भ्राता लक्ष्मण तीनों तपस्वी स्वरुप में वनवासियों के मध्य 12 वर्षों तक रहकर उन्हें बेहद गहराई से प्रभावित किया।
वन में वनवासियों के बीच   रमकर आर्य पुत्र राम हुए।(3)
 
आदर्श पति और राजा के रूप में

श्रीराम ने सीता के प्रति अपने प्रेम और सम्मान के साथ-साथ एक राजा के रूप में न्याय, समानता और सुरक्षा का परिचय दिया। उनका शासन "रामराज्य" के नाम से जाना जाता है, जो आदर्श शासन प्रणाली का प्रतीक है। सीता वियोग से व्याकुल अवतारी समझे जाने वाले राम का मानवीय रुप बेहद प्रेरक और संवेदनशील हैं -
हे खग हे मधुकर श्रेणी 
तुम देखि सीता मृगनयनी (4)

समरसता और एकता के प्रतीक:
श्रीराम ने समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को साथ लेकर चलने की शिक्षा दी। उन्होंने वनवासी, गिरिवासी और नगरवासी सभी को समान रूप से सम्मान दिया और उनके साथ घुल-मिलकर रहे। अपने वनवास काल में सभी वर्ण जाति प्रजाति के सहयोग से ही अभेद्य लंका ढहा सके।असंभव को संभव करने का यह नायाब उदाहरण हैं-

लक्ष्मन के रेखा पारे ल परही 
चलो दानों के किल्ला उजारे ल परही (5)

नैतिक मूल्यों का महत्व:

श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि सफलता केवल भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि चरित्र, सत्य और मर्यादा में निहित है। उनके आदर्शों को अपनाकर हम एक बेहतर समाज और राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।  तभी राम नाम की महत्ता को स्वीकारते कबीर जैसे निर्गुण संत गा उठे -

राम नाम के पटतरे देबो को कुछ नाहि।
क्या लै गुरु संतोखीए हौंस रहे मन माहि।। (6 )

भक्तिकाल की सुप्रसिद्ध कवयित्री मीरा राम को अनमोल रतन के रुप में पाकर नाच उठीं -
पायो जी मैने राम रतन धन पायो..
खर्चे न होय चोर न ले जै दिन दिन बढ़त सवायो...(7)



आज के समय में प्रासंगिकता:

आज के समय में जब समाज में विभाजन, असहिष्णुता और स्वार्थ बढ़ रहा है, तब श्रीराम का जीवन हमें एकता, प्रेम और त्याग का मार्ग दिखाता है। उनके आदर्शों को आत्मसात करके हम अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में बदल सकते हैं।  राम रावण युद्ध सत्य असत्य के मध्य धर्म अधर्म के निमित्त हैं ।


श्रीराम का भारतीय साहित्य एवं समाज पर प्रभाव : 

श्रीराम का भारतीय साहित्य और समाज पर गहरा प्रभाव है। रामायण और रामकथा ने विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों में अपना स्थान बनाया है, जिससे समाज को नैतिकता, न्याय और एकता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।

समाज पर प्रभाव:

- नैतिकता और न्याय: राम की कहानी में अन्याय के प्रतिकार और सत्य की जीत का संदेश है, जो समाज को एक आदर्श प्रदान करता है।
- एकता और समन्वय: रामायण में विभिन्न वर्गों और जातियों के लोगों के बीच एकता और सहयोग का संदेश है, जो समाज में सौहार्द और सहयोग को बढ़ावा देता है। जैसे केवट  सबरी , वानर सुग्रीव, जामवंत, गिद्ध जटायु इत्यादि 
- लोकतंत्र की प्रासंगिकता: राम साहित्य लोकतंत्र के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें जनशक्ति की अनिवार्यता और सामाजिक मूल्यों की रक्षा के लिए जनता की भागीदारी का महत्व बताया गया है।

साहित्य पर प्रभाव:

राममय भारतवर्ष की सभी भाषाओं एवं बोलियों मे रामकाव्य मिलती हैं. राम का काज जन कल्याणकारी होने से स्तुत्य हैं. महाकवि तुलसीदास मानस मे लिखते हैं -
प्रिय लागिही अति सबहि मम भनिति राम जस संग |
दारु बिचारू कि करइ कोउ बंदीय मलय प्रसंग || (  8रामचरित मानस  पृष्ठ 14)

आधुनिक हिंदी साहित्य मे मैथिलिशरण गुप्त लिखते हैं 
राम तेरा जीवन ही काव्य हैं,
कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य हैं.9
    इस तरह हम देखते हैं कि साहित्य के इतिहास मे सभी कलखंड मे श्री राम से प्रभावित मुग्धकारी काव्य का प्रणयन होते आ रहें हैं. बल्कि भक्तिकाल मे राम को लेकर रामाश्रय शाखा का प्रवर्तन हुआ और विविधतापूर्वक भावप्रवण काव्य रचे गए.


- विभिन्न भाषाओं में रामायण: रामायण का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है और इसके विभिन्न संस्करणों में रामकथा को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है।
- जनजातीय और लोक संस्करण: रामायण के जनजातीय और लोक संस्करणों में राम और सीता को सामान्य परिवार से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है, जो भारतीय लोक की एकता और समन्वय की भावना को दर्शाता है। संस्कृत, ब्रज, अवधि, हिंदी उड़िया तमिल, कन्नड़ से लेकर छत्तीसगढी ,हलबी, गोड़ी, सरगुजिहा मे भी रामचरित लिखें गए.
- आधुनिक व्याख्या: राम साहित्य की चिरंतनता का एक आधार यह भी है कि उसमें मूल्यों को जड़ नहीं माना जाता, बल्कि हर युग में मूल्य व्यवस्था को पुनपर्रिभाषित  करना संभव है। पुनरुक्ति की परवाह किये बिना रामायण चुनिंदे पात्रों को केंद्र मे रख राम काव्य लिखें जा रहें.इस तरह रामकाव्य मे वैविध्य भाव दर्शनीय ही नहीं प्रेरक और अभिनंदनीय है.
- रामकाव्य समन्वय के प्रतीक : राम चरित के माध्यम से समकालीन समय मे विभिन्न मत पंथ मे जो विभेद और अग्राह्य भाव था उनमें समन्वय स्थापित की गई. जैसे वैष्णव और शैव मतावलम्बियों के मध्य इस भाव को रखकर उनमें तादातम्य स्थापित की गई : 
- सिव द्रोही मम भगत कहावा, सो नर सपनेहु मोहि न पावा.
- संकर बिमुख भगति चह मोरी, सो नारकी मूढ़ मति थोरी. (   10 लंकाकांड 709)

    इस तरह हम श्रीराम के व्यक्तित्व का सम्यक मूल्यांकन शास्त्रों एवं लोक में व्याप्त छवि के आधार पर विचार करते हैं तो राम को आदर्श लोक नायक के रुप में पाते हैं। हर माता पिता की चाह कि पुत्र राम जैसा हो। उनमें राम का गुण आए। इस दृष्टि से हमारी शिक्षण संस्थानों में राष्ट्र और समाज के लिए आदर्श युवा गढ़ने हेतु भी राम प्रेरक पात्र हैं ।इसलिए भी वह भारतीय रचनाकारों के साहित्य में अन्तर्भूत प्रेरक पुंज हैं।
संदर्भ:

1गोस्वामी तुलसीदास, रामचरित मानस पृष्ठ 

2 गोस्वामी तुलसीदास 

3 भतपहरी डॉ अनिल कुमार, हड्डी की जीभ नहीं कि न फिसले वन एलिगन नई दिल्ली पृष्ठ 
4 गोस्वामी तुलसी दास मानस 
5 लोक गीत आकाश वाणी रायपुर 
6 दास श्याम सुंदर कबीर रचनावली
7 मीरा बाई,मीरा के पद 
8 गोस्वामी तुलसी दास
 रामचरित मानस पृष्ठ 14 
9 मैथिलीशरण गुप्त 
10 गोस्वामी तुलसी दास रामचरित मानस पृष्ठ 709


     - डॉ.अनिल कुमार भतपहरी 
      प्राध्यापक ( हिंदी) 9617777514
वीरांगना रमोतीन माडिया शासकीय आदर्श महिला महाविद्यालय नारायणपुर छत्तीसगढ़

Sunday, March 22, 2026

बढे असासुन महंगाई

#anilbhattcg #vanprsth 

बाढ़े असासून मंहगाई 

रयपुर वाली दीदी कथे बने जंगल चल देस भाई.
इहा सहर म जिनगी पहई  हवय अबड़ करलाई.
मिलत नइये गैस सिलेंडर  बाढे असासून मंहगाई 
चूल्हा चौका गुजर बसर का कहिबे घाद दुःखदाई 
उहाँ उरर ले मुनगा भाजी कुरमा के चटपट चटनी 
छेना लकड़ी बार रमरम ले चूल्हा के सुग्घर रंधनी 
अम्मट बिच्छल भले कहे फेर सुवाद सेहत के खजाना 
भरे बोजे  जिनिस इहाँ फेर पैसा म रोगरई बिसाना

.डॉ अनिल भतपहरी / 9617777514

Sunday, March 15, 2026

मौहारी

मौहरी में महुआ बिनत हे मौहा रिन 
ये दे साल्हो ददरिया गावत हे मुटियारिन...

डोंगरी के तीर म तितुर बोले का ओ तितुर बोले का 
तोर आरो ल पाके मन हमर डोले का मौहरी म...

अधरे ल देखेंव परसा फुल सही लगत हे 
ये दे लाली के लुगरा ह,सुघर फबत हे...

अंझा मंझा देख मोला ओकर तीर म बलाना 
बोहत गरु झउहा सुग्घर कनिहा के लचकना...

डॉ अनिल भतपहरी/ ८-३-२६