सनदई
अबूझमाड़ आज भी अबूझ ही है। ईरकभट्टी होकर सोनपुर से आगे कुतुल गाँव, जहाँ धूप भी साल के पत्तों से पूछ कर नीचे उतरती है। वहीं की है सनदई।
माड़िया जनजाति की लड़की जिसने 12वीं पास की थी - 62%। मार्कशीट लेकर जब वह अपने बाबा सोमारू के पास गई, तो जवाब वही मिला जो प्रायः हर अबूझमाड़ की बेटी को मिलता है।
"बहुत पढ़ ली बेटी! अभी इमली का सीजन है, जंगल जाना है।" तेंदू पत्ता से कुछ पैसे जोड़ कर तेरी ब्याह रचाकर पितृ धर्म से उऋण हो,गंगा नहा लूँगा।
माँ ने कहा - "कॉलेज अपने लोगों के लिए नहीं बना।"
उस रात सनदई सोई नहीं। दीवार पर टंगी फटी नागरिक शास्त्र की किताब में एक लाइन चमक रही थी - 'शिक्षा हमारा अधिकार है।'
सुबह 4 बजे, जब गाँव सो रहा था, सनदई अपनी बड़े पिता जी की बेटी और स्कूल में एक क्लास आगे बुधनी के साथ निकल पड़ी । बुधनी की आठवीं के बाद शादी कर दी थी क्योंकि हाई स्कूल जंगल पहाड़ पार कर ईरकभट्टी जाना होता। फिर उनके पिता दिन भर सल्फी मंद ताड़ी में चूर रहते थे , माई खेतों में और वनोपज एकत्र कर पास हाट में बेचकर आजीविका चलाती वह उसी में लगी रहती नहीं तो घर में चूल्हा नहीं जलता भला ऐसे में कौन फ़िक्र करता.? उनकी पढ़ाई रुक गई और फिर कुछ दिन बाद ताड़ी की चढ़ी हुई कर्ज़ उतारने ताड़ी वाले अधेड़ के साथ ब्याह दिए । इस तरह उस भोली मुग्धा को पता ही नहीं कि उनकी जिंदगी कैसे जहन्नम बन गई। वह जोर से हांफती हुई कही- " बहन मैं हूं तेरे साथ ,जल्दी चलों. हाथ पकड़ गंत्वय की ओर बढ़ चली।
नारायणपुर उनके लिए नया नहीं हैं वह अपने मर्द के साथ कई बार आ चुकी थी साईकिल में सौदा करने। रस्ते में किस्सा सुनाती आश्रम, बंगला पारा कुम्हार कोस्टा पारा और मावली माता मंदिर जिसके नाम पर हफ्ता भर मेला भरता हैं। ऊपर पहाड़ी पर बिराजे दंतेश्वरी और वहां की बड़े बाँध के पास इतवारी बाज़ार की जो इडताफ़ में प्रसिद्ध हैं। सौदागर दूर दूर से आते और वनोपज के बदले घरेलू उपयोग की वस्तुएं बेचते। उनकी बातों में खोई सनदई उत्साह से दौड़ी चली जा रही थी।
कई किलोमीटर का जंगल, नदी, पगडंडी उखड़ी सड़के । नंगे पाँव, छालों भरे पैर। झोले में दो जोड़ी कपड़े, 12वीं की अंक सूची,जाति- निवास और आधार जो उनकी अपनी अदद पहचान हैं एक साड़ी दुकान की पॉली थीन पैकेट में डाल कर जी जी अंतर रखी पैदल ही सड़क पर चली जा रही थी... छीन सल्फी का पेड़ और पंखी की कलरव के बीच घरघराती एक मेटाडोर पास रुकी - जाना कहां हैं?
नारायणपुर
बैठो ,दाेनों का 100 रुपए लगेंगे। बुधनी उड़द दाल और घर के मुर्गे -मुर्गी बेचकर 500 की नोट यत्नपूर्वक बचा कर रखी थी ।वक्त जरूरत पर काम आए उसी के भरोसे वह सनदई को साथ ले कर चल पड़ी थी।
नारायणपुर पहुँच कर पहला काम मूल अंक सूची आदि फोटो कॉपी कराई और फोटो भी खिंचाई। पता चला कि वहीं कम्पूटर में आन लाईन प्रवेश हेतु फॉर्म रजिस्ट्रेशन कराना हैं और उसके लिए करीब 1500 रुपए चाहिए। अब विकट संकट कि अजनबी शहर में किससे और कैसे मांगे! असमंजस सी खड़ी रहीं तभी फोटो धूल कर आई देखा कि कलर फ़ोटो में नाक की फुल्ली सुनहरी आभा लिए चमक रही थीं। बुधनी कही कित्ती सुंदर फब रही हो गिया! और उसके कंधे को दबाई..वह बहन ही नहीं सहेली जो थी।
सनदई हाथ से फुल्ली को छूकर देखी और अपनी नानी की याद न में पल भर खो गई... जब वह सज्ञान हुई तभी उसे वह खुशी खुशी तोहफा दी क्योंकि रजस्वला के समय उत्सव मनाने की प्रथा थी।
थोड़ी देर असमंजस सी शून्य में रही.. बुधनी कही क्या हुआ? उसने कही - दीदी मुझे इसे बेचकर पढ़ना हैं और नानी का मान रखना हैं वह चाहती थी कि मैं पढू और मास्टरनी डॉक्टरनी बनू ।उसने बिना पल गंवाए कही तू तो जानती होगी सुनार की दुकान कहां हैं? वे दोनों चल पड़ी
"इसे बेचना है।"
एक ग्राम की थी तो 7000 रुपये मिले। आँख में आँसू थे, पर हाथ नहीं कांपे। उसने गहना नहीं बेचीं बल्कि अपनी खुशी खरीदी थी।
वीरांगना रमोतीन महिला महाविद्यालय, नारायणपुर में एडमिशन की आखिरी तारीख थी। लाइन बहुत लंबी। काउंटर पर बाबू ने फॉर्म देखा - दो टके कहे क्योंकि एक सा ही जवाब बिना प्रश्न पूछे उन्हें कहना हैं "आदिवासी छात्रावास फुल है, जनरल हॉस्टल में जगह नहीं। अभिभावक को लाओ।"
ऐसे हताश सनदई वहीं जमीन पर बैठ गई। बुधनी अन्य अभिभावक के साथ महाविद्यालय के प्रांगण में लगे काजू पेड़ के छाँव में बैठी हुई थी।तभी हिंदी विभाग के प्रो. भट्ट सर उधर से गुजरे... उन्होंने देखा - एक लड़की, फटे चप्पल, पैरों में छाले, पर गोद में मार्कशीट को ऐसे पकड़े है जैसे कोई ग्रंथ हो।
"कहाँ से आई हो बेटा?"
"कुतुल से सर "
"अच्छा "
"किसके साथ?"
"अकेली, सहेली के साथ।"
सनदई ने सब बता दिया - माता-पिता का मना करना, विद्रोह कर आना बड़ी दीदी का साथ इतनी दूर आना, नाक की फुल्ली बेचना इत्यादि।
प्रो. भट्ट सर हिंदी पढ़ाते थे, पर उन्होंने सनदई के भीतर की कविता पढ़ ली। वे कुछ बोले नहीं, सीधे उसका हाथ पकड़ कर प्राचार्य कक्ष में ले गए।
"सर, ये बच्ची नहीं, अबूझमाड़ का सवाल है ।इसका जवाब हमें देना है।"
प्राचार्य भी दयालू थे भले वह प्रशासनिक कठोरता का आवरण ओढ़े होते थे पर है तो इंसान ही।
प्रो. भट्ट सर के सहयोग से ही उसका प्रवेश हुआ। उन्होंने अपने पास के टेबल में फॉर्म की अधूरी जानकारियां भरी, विषय दिलाए, और खुद अपने हस्ताक्षर से उसकी गारंटी ली।
फिर वे उसे महिला छात्रावास ले गए। अधीक्षिका ने कहा - "भट्ट सर, एक भी कमरा खाली नहीं।"
भट्ट सर ने कहा - "मैडम, एक बेटी जंगल से अपनी जड़ उखाड़ कर आई है ताकि वह पेड़ बन सके। इसे बरामदे में भी जगह दे दीजिए, ये खुद अपनी जगह बना लेगी।"
उनके मार्गदर्शन और जिद के कारण ही उस शाम सनदई को कमरा नंबर 7 में एक बेड मिला। साथ ही एक नियम छात्रावास में बनाई गई कि बिना हॉस्टल में सलेक्शन के जरूरत मंद छात्राओं को एक हाल में रखें और उनसे भोजन आदि बनाने में पारिश्रमिक ले या फिर स्कूल छात्रवृत्ति से किस्त अनुसार न्यूनतम शुल्क ले।
आज सनदई बी.ए. प्रथम वर्ष में है। प्रो. भट्ट सर की कक्षा में वह सबसे आगे बैठती है। उसकी नाक आज सूनी है, पर उसकी कॉपी शब्दों से भरी है।
महाविद्यालय में दीक्षारंभ के दिन प्रो. भट्ट सर ने शिक्षा के महत्व को समझते हुए व्याख्यान देते अचानक सनदई की ओर देखते हुए कहे - तुमने अपनी फुल्ली बेची नहीं, बोई है। एक दिन पूरा माड़ तुम्हारी नाक की उस फुल्ली जैसा चमकेगा।"
हाल तालियों से गूँज उठी ... आवाक सनदई हतप्रभ सी हुई ओ समझ नहीं पा रही थी क्या और कैसी प्रतिक्रिया दे कि सहज होती धीरे से मुस्कुरा दी और विनीत भाव से सिर झुका ली।
अबूझमाड़ की सनदई ने बता दिया कि उनकी विद्रोह अंधेरे के खिलाफ हैं और रौशनी के लिए पढ़ रही हैं। दोपहर हो गए थे उन्हें पता हैं कि साल वन से सूर्य किरण छनकर पगडंडी में पड़ रही हैं और पास ही लता लहलहाती हुई साल पेड़ में चढ़ रही हैं।
डॉ अनिल कुमार भतपहरी
9617777514
नारायणपुर बस्तर