छत्तीसगढ़ी सतनामी रहस
The 'Rahas' of the Satnamis in Chhattisgarh
शासकीय बृजलाल वर्मा महाविद्यालय, पलारी (छ.ग.)निर्गुण संत साहित्य पर शोध एवं लेखनProfessor, Hindi
Govt. Brijlal Verma College, Palari (C.G.)
Research & writing on Nirgun Sant literature
यह आलेख छत्तीसगढ़ के सतनामी समाज में प्रचलित रहस परंपरा का प्रलेखन है। रहस वस्तुतः ब्रज की रासलीला का छत्तीसगढ़ी रूपांतरण है, जिसमें कृष्ण-चरित्र का दस दिवसीय मंचन, मिट्टी की मूर्तिकला, सामूहिक भक्ति और लोक-रंजन एक साथ घटित होते हैं। जून 2018 में कबीरधाम जिले के ग्राम रहंगी में आयोजित सामाजिक रहस के क्षेत्र-अध्ययन के आधार पर इसकी संरचना, प्रकारों और सांस्कृतिक अर्थों को समझने का प्रयास किया गया है।
This article documents the Rahas tradition among Satnamis in Chhattisgarh — a ten-day ritual theatre of Krishna Lila, blending devotion, folk art, and collective celebration. Based on fieldwork in Rahangi village, Kabirdham (June 2018), it traces its origins, forms and performative structure.
प्रस्तावना
रासलीला ही छत्तीसगढ़ी जनमानस में रहस कहलाती है। ब्रज क्षेत्र की रासलीला जब सतनामी पंथ के माध्यम से छत्तीसगढ़ के मैदानी अंचल में पहुँची, तो उसने यहाँ की भाषा, भक्ति और लोककला में घुलकर एक विशिष्ट रूप ले लिया। 'रहस' शब्द स्वयं 'रास' का ही तद्भव है — पर अर्थ विस्तार में यह केवल नृत्य नहीं, संपूर्ण अनुष्ठान बन जाता है।
छत्तीसगढ़ में रहस केवल मंचीय प्रस्तुति नहीं, बल्कि बेड़ा है — अर्थात् कई दिनों तक चलने वाला व्रत-संकल्पित आयोजन, जिसमें गाँव भर का सहयोग, मूर्तिकारों की साधना, गायकों-वादकों की संगत और दर्शकों की निरंतर उपस्थिति अनिवार्य है।
सतनामी समाज और ब्रज संस्कृति का प्रभाव
ऐतिहासिक रूप से सतनामी पंथ का संबंध उत्तर भारत के साधु-परंपराओं से रहा है। नारनौल (हरियाणा), दिल्ली और मथुरा के क्षेत्रों में वीरभान, जोगीदास, उदास दास जैसे संतों ने निर्गुण-सगुण के समन्वय की परंपरा विकसित की। इसी परंपरा के प्रवाह में रासलीला का बीज छत्तीसगढ़ पहुँचा।
स्थानीय साक्ष्यों के अनुसार प्रारंभ में यह परंपरा अहीर (यादव) और तेली समुदायों में अधिक प्रचलित थी, जो कृष्ण को अपना वंश-आराध्य मानते थे। कालांतर में सतनामी समाज ने इसे अपनाकर इसमें गुरु घासीदास के सत्य, अहिंसा और समता के उपदेशों का समावेश किया। इस प्रकार रहस आज सतनामी अस्मिता का एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रतीक है — जहाँ कृष्ण-भक्ति और सतनाम-चेतना एक साथ गुंथी हुई दिखती है।
रहस की विशेषताएँ
लोक स्वरूप
शास्त्रीय रास की तरह नियम-बद्ध नहीं। बोली छत्तीसगढ़ी, गीत दोहा-भजन के ढांचे में, संवाद सहज और हास्य-विनोद से भरे। मंच खुला आंगन या बाड़ी।
भक्ति + आनंद + मनोरंजन
एक ही समय में तीन प्रयोजन — ईश्वर-स्मरण, सामूहिक उल्लास और लोक-शिक्षा। दर्शक केवल दर्शक नहीं, व्रती भी है।
समग्र कला-अनुभव
रहस में गायन, वादन (मृदंग, मंजीरा, हारमोनियम), नृत्य और मिट्टी की मूर्तिकला एक साथ उपस्थित रहते हैं। पृष्ठभूमि में बनी मिट्टी की मूर्तियाँ कथा-देश बनाती हैं — गोवर्धन, यमुना तट, मथुरा कारागार — और रात-भर चलने वाले अभिनय को दृश्य आधार देती हैं।
रहस के प्रकार
सामाजिक रहस
- 3 वर्षीय परंपरा — एक बार संकल्प लेने पर लगातार तीन वर्ष तक आयोजन अनिवार्य
- संपूर्ण ग्राम का सामूहिक चंदा और श्रमदान
- बड़ा बेड़ा, 10 दिन, सैकड़ों दर्शक-व्रती
- सुख-शांति-समृद्धि हेतु कामना
बदना / मानौती रहस
- 1 वर्षीय, व्यक्तिगत — मनौती पूर्ण होने पर व्यक्ति/परिवार द्वारा आयोजन
- छोटा बेड़ा, सीमित संसाधन पर पूर्ण निष्ठा से
- अक्सर संतान-प्राप्ति, रोग-मुक्ति, फसल-समृद्धि हेतु
- अधिक आत्मीय और घरेलू वातावरण
क्षेत्र अध्ययन : ग्राम रहंगी, कबीरधाम
जून 2018 में लेखक ने रहंगी में आयोजित सामाजिक रहस का प्रत्यक्ष प्रलेखन किया। बेड़ा गाँव के बाहर खुले मैदान में बाँधा गया — पीछे मिट्टी की ऊँची पृष्ठभूमि पर गोवर्धन-यमुना-कारागार की मूर्तियाँ, सामने चूने से लिपा आंगन, चारों ओर बाँस-बल्लियों पर टाट-पंडाल। प्रत्येक रात्रि 8 बजे से भोर 4 बजे तक लीला चलती, दिन में मूर्तिकार मूर्तियों की मरम्मत और मंडली अगले प्रसंग का अभ्यास करती।
यदुवंश महात्म्य एवं वासुदेव-देवकी विवाह
प्रस्तावना गान, सृष्टि-वर्णन, यदुवंश की महिमा। कंस के अत्याचार की पृष्ठभूमि, वासुदेव-देवकी विवाह और आकाशवाणी — 'आठवाँ पुत्र तेरा वध करेगा'।
कृष्ण जन्म, नंद यशोदा आगमन, भविष्य फल वाचन
कारागार में चतुर्भुज रूप में जन्म, वसुदेव द्वारा गोकुल में पहुँचाना। नंद-यशोदा के घर आनंदोत्सव, गर्गाचार्य द्वारा नामकरण और भविष्य-वाणी।
बाल महिमा, पूतना वध
बाल-कृष्ण की लीलाएँ, पूतना का छद्म मातृत्व और उसका वध। लोक-गीतों में 'पूतना मौसी' प्रसंग हास्य और भय दोनों जगाता है।
अन्नप्राशन, गोचारण, बकासुर वध
अन्नप्राशन संस्कार, ग्वाल-बालों के साथ गोचारण, वन-भोजन। बकासुर (बगुले रूपी असुर) का वध — पर्यावरणीय प्रतीक के रूप में भी व्याख्यायित।
माखन चोरी
सबसे प्रिय प्रसंग। गोपियों के घर माखन-चोरी, उखल से बाँधना, यशोदा का वात्सल्य। गीत — 'माखन चोर नंदकिशोर'। दर्शकों में हँसी और भावुकता।
कंदुक खेल, कालिया नाग नाथना, गोपिका-राधा मिलन
यमुना में गेंद खेलते हुए कालिया नाग का दमन — मूर्तिकला में यमुना का घुमावदार रूप विशेष। तत्पश्चात राधा और गोपिकाओं का प्रथम मिलन, श्रृंगार-गीत।
महारास
रहस का शिखर। चंद्र-रात्रि में महारास — कृष्ण का अनेक रूप धर प्रत्येक गोपी के साथ नृत्य। मंडलाकार नृत्य, पुष्प-वर्षा, दर्शक भाव-विभोर।
कृष्ण-बलराम मथुरा प्रवास
अक्रूर का आगमन, गोपियों का वियोग-गीत — 'मथुरा जाओगे तो क्या हमें भूल जाओगे'। रथ-प्रस्थान, यमुना तट का सूना होना।
चाणूर-मुष्टिक युद्ध
मथुरा में धनुष-यज्ञ, कुवलयापीड हाथी का वध, चाणूर-मुष्टिक जैसे मल्लों से कृष्ण-बलराम का युद्ध। अखाड़े का दृश्य मिट्टी से निर्मित।
कंस वध, गणेश विसर्जन एवं समापन
कंस वध, उग्रसेन का राज्याभिषेक, कारागार से माता-पिता की मुक्ति। अंत में बेड़ा के गणेश जी का विसर्जन, प्रसाद वितरण और अगले वर्ष के संकल्प के साथ समापन।
निष्कर्ष
रहस केवल नाटक नहीं, एक लंबा अनुष्ठान (बेड़ा) है। दस रातों तक गाँव जागता है, गाता है, बनाता और बिगाड़ता है — मिट्टी की मूर्तियाँ बनती हैं, टूटती हैं, फिर बनती हैं। इस क्रम में कृष्ण लीला केवल कथा नहीं रहती, वह सामूहिक स्मृति बन जाती है।
सतनामी समाज ने इस ब्रज-परंपरा को केवल अपनाया नहीं, उसे अपने जीवन-दर्शन से जोड़ा है। जहाँ एक ओर कृष्ण के जीवन-प्रसंग मंचित होते हैं, वहीं दूसरी ओर गुरु घासीदास के सत्य बोलना, समता रखना, जीवों पर दया करना जैसे उपदेश भजनों और दोहों में गूँजते हैं। इस संगम से रहस में भक्ति के साथ सामाजिक चेतना भी आती है।
अंततः रहस सुख, शांति और समृद्धि हेतु किया गया सामूहिक संकल्प है — जहाँ कला प्रार्थना बन जाती है और प्रार्थना उत्सव।
REFERENCES & FURTHER READING
- Field notes, Rahangi village, Kabirdham, 12–22 June 2018
- Interviews with Rahas mandali pramukh and murtikars
- Guru Ghasidas and Satnami movement in Chhattisgarh — oral histories
- Brj Raslila traditions — Narnaul to Chhattisgarh transmission