शोध-पत्र
अबूझमाड़ धुरबेड़ा विद्रोह की नायिका: वीरांगना रमोतीन माड़िया का ऐतिहासिक अनुशीलन
The Heroine of Abujhmad Dhurbeda Rebellion: A Historical Study of Veerangana Ramoteen Maria
लेखक: डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
प्राध्यापक, वीरांगना रमोतीन माड़िया शासकीय महिला महाविद्यालय, नारायणपुर (छ.ग.)
Email: anilbhatpahari@gmail.com
1. सारांश
भारत में औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध सर्वाधिक तीव्र प्रतिरोध नगरीय नहीं, बल्कि ग्रामीण एवं वनांचल में हुआ, जहाँ कृषि उत्पाद, वनोपज एवं खनिजों का सीधा दोहन होता था। छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़ क्षेत्र इसका प्रमुख उदाहरण है। प्रस्तुत शोध-पत्र में नारायणपुर जिले के धुरबेड़ा गांव की माड़िया जनजातीय वीरांगना रमोतीन माड़िया के जीवन-संघर्ष का ऐतिहासिक पुनर्मूल्यांकन किया गया है। स्थानीय मौखिक परम्परा, माड़िया समाज के अभिलेखों एवं भूमकाल विद्रोह के द्वितीयक स्रोतों के आधार पर यह अध्ययन स्थापित करता है कि 1910-1911 के भूमकाल विद्रोह में रमोतीन ने महिला संगठन और छापामार युद्ध पद्धति के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी और 17 मई 1911 को वीरगति प्राप्त की। यह शोध इतिहास लेखन में उपेक्षित आदिवासी महिला नेतृत्व को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है।
बीज-शब्द: अबूझमाड़, धुरबेड़ा विद्रोह, रमोतीन माड़िया, भूमकाल, माड़िया जनजाति, गुंडाधुर, आदिवासी प्रतिरोध
2. प्रस्तावना
इतिहास लेखन की विडंबना रही है कि सत्ता के केंद्रों में रहने वाले वेतनभोगी वर्ग का इतिहास तो सुरक्षित रहा, परन्तु हक-अधिकार के लिए लड़ने वाले वनांचल के नायकों को विस्मृत कर दिया गया। ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों से सर्वाधिक पीड़ित कृषक और वनोपज संग्राहक जनजातीय समुदाय थे। इसी कारण सोनाखान में वीर नारायण सिंह, भंडारपुरी में गुरु बालक दास, परलकोट में गेंदसिंह, बस्तर में गुंडाधुर जैसे विद्रोह प्रस्फुटित हुए। इन्हीं रणबांकुरों की श्रृंखला में अबूझमाड़ की बेटी वीरांगना रमोतीन माड़िया का नाम अत्यंत सम्मान से लिया जाता है, जिन्होंने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए।
3. शोध के उद्देश्य
1. अबूझमाड़ के जनजातीय विद्रोह में महिला नेतृत्व की भूमिका का अन्वेषण करना। 2. रमोतीन माड़िया से संबंधित दो परम्पराओं का कालक्रमानुसार परीक्षण करना। 3. धुरबेड़ा विद्रोह (1910-1911) में उनकी सैन्य एवं संगठनात्मक भूमिका का दस्तावेजीकरण करना। 4. उनके स्मृति-संरक्षण एवं वर्तमान प्रासंगिकता का मूल्यांकन करना।
4. शोध प्रविधि
प्रस्तुत अध्ययन हेतु ऐतिहासिक-विश्लेषणात्मक एवं वर्णनात्मक पद्धति अपनाई गई है। प्राथमिक स्रोत के रूप में नारायणपुर माड़िया समाज द्वारा प्रस्तुत जीवनी, धुरबेड़ा के वृद्धजनों के मौखिक आख्यान तथा महाविद्यालय परिसर में उपलब्ध स्मृति-अभिलेखों का उपयोग किया गया है। द्वितीयक स्रोत के रूप में बस्तर गजेटियर, बस्तर के भूमकाल आंदोलन पर प्रकाशित शोध ग्रंथों का अध्ययन किया गया है।
5. परिचय एवं नामकरण में द्वंद्व का निराकरण
छत्तीसगढ़ के इतिहास में रमोतीन माड़िया के संबंध में दो परम्पराएं मिलती हैं:
क) प्रथम परम्परा: सोशल मीडिया में प्रचलित विवरण के अनुसार उन्हें परलकोट विद्रोह (जनवरी 1820) की वीरांगना और बारकोट तालुका के तालुकेदार चैनसिंह की पुत्री बताया गया है।
ख) द्वितीय परम्परा: नारायणपुर के माड़िया समाज के अनुसार उनका पूरा नाम वीरांगना रमोतीन कोर्राम था और वे माड़िया जनजाति की सम्मानित सदस्या थीं।
कालक्रम की दृष्टि से प्रथम परम्परा में विसंगति है, क्योंकि 1820 और 1910 के भूमकाल में 90 वर्षों का अंतर है। अतः स्थानीय स्मृति, गोत्र-व्यवस्था (कोर्राम गोत्र) और शासकीय मांग-पत्रों में दर्ज द्वितीय विवरण अधिक प्रामाणिक एवं ग्राह्य है।
6. जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
रमोतीन का जन्म 1887 में नारायणपुर जिले की तहसील छोटेडोंगर के ग्राम धुरबेड़ा में कोर्राम गोत्रीय माड़िया परिवार में हुआ। पिता श्री डोगा कोर्राम, माता श्रीमती वागली बाई, दो भाई कोसा और मासा तथा एक छोटी बहन सनोतीन थीं। तत्कालीन धुरबेड़ा बीहड़ जंगलों से घिरा था, जहाँ बांस-फूस की झोपड़ियों में जीवन-यापन के साथ-साथ शेर, बाघ, भालू का निरंतर भय बना रहता था।
7. बचपन में वीरता का परिचय
बाल्यकाल से ही रमोतीन में असाधारण साहस था। जनश्रुति के अनुसार एक बार एक शेर ने गांव की गाय को पंजों में दबोच लिया। ग्रामीण मशाल और धनुष-बाण से शेर को भगाने का प्रयास कर रहे थे, तभी बालिका रमोतीन ने जलती हुई मशाल सीधे शेर के मुंह में डाल दी। मुंह जलने से शेर गाय को छोड़कर भाग गया। इस घटना ने उन्हें पूरे क्षेत्र में साहसी बालिका के रूप में स्थापित कर दिया।
8. अंग्रेजी अत्याचार एवं भूमकाल का बीज
1887 में माड़ क्षेत्र में सड़कें नहीं, केवल पगडंडियां थीं। अंग्रेज घोड़ों पर सवार होकर भ्रमण करते थे। जनश्रुति के अनुसार उनके अत्याचार इस प्रकार थे:
1. गरीब माड़िया परिवारों के मुर्गे, पशु-पक्षी लूटकर खा जाना। 2. जबरन बेगार लेना और सामान ढुलवाना। 3. काम न करने पर मारपीट करना। 4. आदिवासी युवतियों से छेड़छाड़ करना।
इन अत्याचारों के विरुद्ध रमोतीन और उनके भाइयों कोसा-मासा ने गांव वालों को संगठित किया। यह संगठन माड़िया देव-संस्कृति की रक्षा और आत्मरक्षा का आंदोलन बन गया।
9. परलकोट / भूमकाल विद्रोह में भूमिका
1. वे परलकोट के जमींदार शहीद गेंदसिंह की शोषण-विरोधी परम्परा और गुंडाधुर के भूमकाल विचारों से प्रभावित थीं। 2. उन्होंने माड़िया महिलाओं को संगठित कर पुरुषों के साथ छापामार युद्ध में भाग लिया। जंगल की भौगोलिक जानकारी उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। 3. सन् 1910 में उन्होंने विधिवत भूमकाल लड़ाई का गठन किया। उनके पास बंदूक नहीं, केवल पैने और तीखे बाण थे। 1910-1911 में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ खुला विद्रोह छेड़ दिया। इस संघर्ष में धुरबेड़ा के कई ग्रामीण वीरगति को प्राप्त हुए, परन्तु विद्रोहियों ने कई अंग्रेज सैनिकों को भी मार गिराया।
10. अंतिम युद्ध और शहादत
अंग्रेजों ने बार-बार धुरबेड़ा पर चढ़ाई की। अंतिम भीषण युद्ध में कोसा और मासा के बाण समाप्त हो गए और अंग्रेजों ने उन्हें बंदी बनाकर घसीटना शुरू कर दिया। यह दृश्य देखकर रमोतीन ने बचे हुए माड़िया योद्धाओं के साथ धावा बोल दिया।
उन्होंने साजा पेड़ की आड़ लेकर भाइयों को बचाने हेतु तीर वर्षा की। इसी दौरान लड़ते-लड़ते उनके पेट में गोली लग गई। गोली लगने के बाद भी वे लड़ती रहीं। अंततः अंग्रेज थककर कोसा-मासा को छोड़कर भाग गए, परन्तु अत्यधिक रक्तस्राव के कारण रमोतीन को बचाया नहीं जा सका। 17 मई 1911 को वे भूमकाल लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हुईं। मान्यता है कि उनके बलिदान के बाद अंग्रेज कभी दोबारा धुरबेड़ा गांव में नहीं आए।
11. प्रमुख योगदान एवं सम्मान
1. वीरता, साहस और संगठन क्षमता की प्रतीक। 2. लूट-खसोट, शोषण और बेगार प्रथा के विरुद्ध सशक्त प्रतिरोध। 3. आदिवासी समाज में महिला शक्ति और स्वाभिमान की प्रेरणा। 4. उनकी स्मृति में "वीरांगना रमोतीन माड़िया शासकीय महिला महाविद्यालय, नारायणपुर" का नामकरण एवं परिसर में प्रतिमा स्थापना।
12. निष्कर्ष
वीरांगना रमोतीन माड़िया का जीवन केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि नारी नेतृत्व, आदिवासी अस्मिता और अन्याय के विरुद्ध अंतिम सांस तक लड़ने की जीवंत प्रेरणा है। अबूझमाड़ के अंदरूनी क्षेत्र में घटित होने के कारण उनका इतिहास लंबे समय तक उजागर नहीं हो सका। आवश्यकता है कि मौखिक इतिहास का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण कर उन्हें बस्तर के मुख्य विद्रोही नायकों की श्रृंखला में समुचित स्थान दिया जाए।
जय सेवा, जोहार, जय भारत।
संदर्भ सूची
1. Sundar, N. (2007). Subalterns and Sovereigns: An Anthropological History of Bastar. OUP. 2. शुक्ल, हिरा लाल. (2006). बस्तर का इतिहास. मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल. 3. Elwin, Verrier. (1947). Maria Murder and Suicide. 4. छत्तीसगढ़ शासन. (2021). बस्तर संभाग गजेटियर. 5. माड़िया समाज, नारायणपुर द्वारा प्रस्तुत जीवनी एवं ज्ञापन (2023).