Wednesday, August 26, 2026

सिरपुर बौद्ध विहार : अस्मिता की तलाश

तीवर देव बौद्ध विहार
Sirpur Heritage • Chhattisgarh • 7th Century
तीवर देव बौद्ध विहार प्रांगण, सिरपुर :
अस्मिता की तलाश 
एक विरासत शोध आलेख • जीरो ग्राउंड से
LIVE FIELD

दक्षिण कौशल के नाम से विख्यात वर्तमान छत्तीसगढ़ अपने सांस्कृतिक समन्वय के लिए भी जाने जाते हैं। ऐतरेय उपनिषद के अनुसार सत्यवंत प्रजाति का स्थली हैं।  जहां उत्तर दक्षिण की आर्य अनार्य संस्कृति की समागम हैं।  सतवहन वंश की शासन में सम्राट विज्जस  भट्टप्रहरी की यश गाथा बुद्ध से जुड़ते हैं। महात्मा बुद्ध का आगमन सिरपुर में हुआ उनके स्वागत में एक सहस्त्र कोसा वस्त्र भेंट किए गए जो भिक्षु संघ के चीवर कषाय नाम से विख्यात हैं। बुद्ध कालीन पाली भाषा और परिक्षेत्र की लोक भाषा कोसली (छत्तीसगढ़ी ) एवं कोसा वस्त्र के आलोक में सुरुचिपूर्ण अनुसंधानात्मक आलेख प्रस्तुत हैं।

A4 • Noto Devanagari
दक्षिण कोसल पुरातत्व शोध पत्रिका
Vol. 07 • 2025 • ISSN 3048-XXXX
Peer Reviewed Article
DOI: 10.XXXX/dk.2025.07.001
☸️ बौद्ध पुरातत्व • भाषिक मानवविज्ञान • सांस्कृतिक निरंतरता

तीवर देव बौद्ध विहार सिरपुर :
दक्षिण कोसल में बौद्ध धम्म, भाषा और लोक-संस्कृति की जीवित निरंतरता

Tivar Dev Bauddha Vihar Sirpur: Living Continuity of Buddhist Dhamma, Language and Folk Culture in Dakshin Kosal

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
ग्राम जुनवानी, सिरपुर समीप, महासमुंद (छत्तीसगढ़) • स्वतंत्र शोधकर्ता, पुरातत्व एवं पाली-छत्तीसगढ़ी भाषाविज्ञान
बालोदबाजार - महानदी तटईंट स्थापत्य
सार / Abstract

प्रस्तुत शोध आलेख में सिरपुर (प्राचीन श्रीपुर) स्थित तीवर देव बौद्ध विहार को केंद्र में रखकर दक्षिण कोसल की बौद्ध परम्परा की राजनीतिक, वास्तुगत, सामाजिक एवं भाषिक निरंतरता का विश्लेषण किया गया है। सोमवंशी राजा तीवरदेव (7-8वीं शताब्दी) के काल में सिरपुर राजधानी थी। ह्वेनसांग के विवरण में 100+ संघाराम एवं 10,000 भिक्षुओं का उल्लेख, पुरातत्व में 10+ विहारों का उत्खनन, और तीवर देव विहार की विशाल ईंट-संरचना इस क्षेत्र को महानदी घाटी के बौद्ध केंद्र के रूप में स्थापित करते हैं। शोध में भतपहरी वंश (शरभपुरीय धारा), सतनामी समाज के बौद्ध मूल्यों (समता, अहिंसा, श्रम-प्रतिष्ठा), और विशेषतः पाली-छत्तीसगढ़ी के 11 जीवित शब्द-प्रमाणों के माध्यम से यह प्रतिपादित किया गया है कि छत्तीसगढ़ी पाली की ही लोक-निरंतरता है। कोसा वस्त्र परम्परा एवं विवाह में भंवराही साड़ी का निर्वाह इस सांस्कृतिक डीएनए का जीवंत प्रमाण है।

मुख्य शब्द:तीवर देव विहारदक्षिण कोसलसोमवंशीह्वेनसांगभतपहरी वंशसतनामीपाली-छत्तीसगढ़ीकोसा परम्परा
“सिरपुर केवल ईंट-पत्थरों का समूह नहीं, यह दक्षिण कोसल की आत्मा है — जहाँ बुद्ध धम्म, स्थानीय लोक-संस्कृति और छत्तीसगढ़ी जनमानस एक ही प्रवाह में मिलते हैं।”— शोध की केंद्रीय अवधारणा

प्रस्तावना एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

दक्षिण कोसल का प्राचीन नगर सिरपुर (श्रीपुर) महानदी के तट पर स्थित है। 7वीं-8वीं शताब्दी ईस्वी में यह सोमवंशी राजाओं की राजधानी था। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग (युवान च्वांग) ने 639 ईस्वी के लगभग सिरपुर की यात्रा कर यहाँ 100 से अधिक संघाराम और लगभग 10,000 बौद्ध भिक्षुओं के निवास का उल्लेख किया है। यह विवरण सिरपुर को तत्कालीन भारत के प्रमुख बौद्ध शिक्षा-केन्द्रों में स्थापित करता है।

स्वतंत्र भारत में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एवं छत्तीसगढ़ राज्य पुरातत्व द्वारा किए गए उत्खननों में सिरपुर से अब तक 10 से अधिक बौद्ध विहार, अनेक स्तूप, ध्यान-कक्ष एवं बुद्ध प्रतिमाएँ प्रकाश में आई हैं। इनमें तीवर देव बौद्ध विहार आकार, विन्यास एवं ईंट-स्थापत्य की दृष्टि से दक्षिण कोसल का सबसे विशाल उत्खनित परिसर है। इसकी योजना — गर्भगृह, प्रदक्षिणा-पथ, भिक्षु-आवास, आँगन एवं प्रवेश-द्वार — बुद्धकालीन महाविहारों की क्लासिक संरचना को दर्शाती है।

महत्व सार (Significance)
  • दक्षिण कोसल का सबसे बड़ा उत्खनित बौद्ध विहार परिसर
  • 7वीं सदी के चीनी विवरण से प्रमाणित
  • सोमवंशी — शरभपुरीय राजनीतिक सांस्कृतिक निरंतरता
  • महानदी घाटी की बौद्ध परम्परा का केंद्र
Archaeological Evidence
तीवरदेव शिलालेख • बालोदबाजार-महानदी तट • विशाल ईंट स्थापत्य (Brick Architecture) • ध्यान कक्ष एवं स्तूप परिसर। उत्खनन से प्राप्त मुद्राएँ, अभिलेख एवं बुद्ध मूर्तियाँ सोमवंशी काल के वैभव को प्रमाणित करती हैं।
Ref: ASI Sirpur Excavation Reports, Hiuen-Tsang Si-Yu-Ki Book V

क्षेत्रीय अनुसंधान : सिरपुर विहार प्रांगण में लेखक एवं बौद्ध भिक्षु संघ

तीवर देव बौद्ध विहार सिरपुर में लेखक एवं बौद्ध भिक्षु
Field Documentation • 2024-25

तीवर देव बौद्ध विहार, सिरपुर के उत्खनित प्रांगण में लेखक डॉ. अनिल कुमार भतपहरी बौद्ध भिक्षुओं के साथ — प्राचीन ईंट संरचना पृष्ठभूमि में

चित्र में 3 बौद्ध भिक्षु (केसरिया/मरून चीवर) एवं 2 शोधकर्ता (कोसा-ताने की जैकेट में लेखक) सिरपुर की प्राचीन ईंट-संरचना के समक्ष। कोसा वस्त्र परम्परा एवं बौद्ध चीवर का यह संगम 1300 वर्षीय सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत प्रमाण है।

चित्र: लेखक का सिरपुर बौद्ध विहार में बौद्ध भिक्षुओं के साथ क्षेत्रीय सर्वेक्षण (2024-25) • Photo: Tivar Dev Vihar Excavated Complex

शोध उद्देश्य एवं पद्धति

उद्देश्य
सिरपुर के बौद्ध विहारों को केवल स्थापत्य अवशेष नहीं, बल्कि जीवित सांस्कृतिक निरंतरता के रूप में स्थापित करना।
पद्धति
पुरालेखीय साक्ष्य, चीनी यात्री विवरण, क्षेत्रीय मौखिक इतिहास, विवाह-परम्परा का सहभागी अवलोकन एवं तुलनात्मक भाषाविज्ञान।
क्षेत्र
सिरपुर-जुनवानी अंचल, सतनामी समाज, भतपहरी गोत्र, छत्तीसगढ़ी लोक-प्रयोग।

अनुसंधान दृष्टिकोण : तीन जीवित कड़ियाँ

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३.१ भतपहरी वंश निरंतरता — शरभपुरीय धारा से कोसा परम्परा तक

जुनवानी - सिरपुर क्षेत्र से जुड़ा भतपहरी वंश, शरभपुरीय वंश की धारा का वाहक माना जाता है। अभिलेखों में उल्लेख है कि सम्राट विज्जस भट्टप्रहरी द्वारा बुद्ध एवं उनके साथ आए भिक्षु संघ को एक सहस्त्र कोसा वस्त्र अर्पण किया गया था। यह केवल दान नहीं, राजसत्ता और बुद्ध धम्म के सह-अस्तित्व का राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रमाण है।

लोक-नृविज्ञान प्रमाण (Ethnographic Evidence)

सतनामियों में खासकर भट्टप्रहरी गोत्र के वैवाहिक रस्म में कोसा की भंवराही साड़ी के बिना विवाह सम्पन्न नहीं होते। यदि कोसा अनुपलब्ध हो तो सूती की सफेद साड़ी को हल्दी एवं सोडा से रंगकर कोसा रंग देकर रस्म अदा की जाती है। यह प्रथा आज तक जीवित है। लेखक के स्वयं के विवाह में भी सिंदूरी पीली कोसा साड़ी एवं कोसे की कुर्ता-पगड़ी-अल्फी धारण की गई थी। यह 1300 वर्ष पुरानी कोसा-दान परम्परा की अविच्छिन्न निरंतरता है।

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३.२ सतनामी समाज में बौद्ध मूल्य — समता, अहिंसा, श्रम-प्रतिष्ठा

सतनामी समाज के मूलभूत मूल्य — समता, अहिंसा, श्रम-प्रतिष्ठा, मानव-मानव एक समान — में बौद्ध धम्म की स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनाई देती है। बाबा घासीदास द्वारा प्रवर्तित ‘सतनाम’ को लेखक बुद्ध धम्म के छत्तीसगढ़ी स्वरूप के रूप में देखता है, जो सच्च (सत्य) और धम्म (कर्तव्य/धर्म) पर आधारित है। यह न केवल दार्शनिक साम्य है, बल्कि महानदी घाटी में बौद्ध से सतनामी तक की सामाजिक रूपांतरण प्रक्रिया का संकेत भी है।

समता = बौद्ध समताअहिंसा = अविहिंसाश्रम-प्रतिष्ठा = सम्मा आजीवसतनाम = सच्च + धम्म
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३.३ पाली-छत्तीसगढ़ी अंतर्संबंध — भाषा कभी मरती नहीं

भाषा केवल संवाद नहीं, सांस्कृतिक डीएनए है। छत्तीसगढ़ी में रोज़मर्रा प्रयुक्त सैकड़ों शब्द धम्म-लिपि पाली से सीधे निःसृत हैं। यह संबंध आकस्मिक नहीं, बल्कि ध्वनि-नियमों (महाप्राण-लोप, द्वित्व-सरलीकरण, स्वर-परिवर्तन) के अनुरूप व्यवस्थित है, जो 1500 वर्षों से जीवित है।

विशेष भाषिक अनुसंधान : पाली - छत्तीसगढ़ी जीवित प्रमाण

भाषा ही विरासत की सबसे बड़ी निरंतरता है। जब शब्द वही रहते हैं, तो संस्कृति भी वही रहती है।

पाली (मूल)छत्तीसगढ़ी (वर्तमान)हिन्दी अर्थभाषावैज्ञानिक टिप्पणी
अग्गआगीआगद्वित्व-सरलीकरण: ग्ग > गी, महाप्राण लोप का अभाव
मनुक्ख / मनख्खमनखेमनुष्यख्ख > खे, उकार > एकार
सुग्गा / सुवसुवातोताग्गा > वा, मध्यम व्यंजन लोप
दईदईमाँपूर्ण संरक्षण, दोनों में समान
पानीयपानीजलअंत्य -य लोप, सीधा संरक्षण
हत्थहाथहाथत्थ > थ, द्वित्व-सरलीकरण
भत्तभातपका चावलत्त > त, अर्थ-विस्तार
घोटक / घोटघोड़ाअश्वप्रत्यय -ड़ा, तद्भव विकास
धम्मधरम / धम्मधर्म / कर्तव्यसतनामी प्रयोग में 'धरम' रूप सुरक्षित
सच्चसचसत्यच्च > च, सतनाम दर्शन का मूल
अप्पअप्पनअपना / आत्मअप्प > अप्पन, सतनाम 'अप्पन' का मूल
निष्कर्ष / अवलोकन

ये शब्द सिद्ध करते हैं कि छत्तीसगढ़ी, पाली की ही लोक-निरंतरता है — धम्म की भाषा आज भी हमारे घर-आँगन में बोली जाती है। पाली के महाप्राण-लोप, द्वित्व-सरलीकरण और स्वर-परिवर्तन के नियम आज भी छत्तीसगढ़ी उच्चारण में सक्रिय हैं। यह 1500 वर्षीय भाषिक अविच्छिन्नता सिरपुर को केवल पुरातत्व स्थल नहीं, जीवित भाषा-प्रयोगशाला बनाती है।

स्रोत एवं पद्धति
  • • पाली कोश (Pali Text Society)
  • • छत्तीसगढ़ी लोक-प्रयोग, सिरपुर अंचल सर्वे 2023-25
  • • क्षेत्रीय विवाह-रस्म अवलोकन
  • • ध्वनि-नियम: Turner, Grierson के तद्भव सिद्धांत

निष्कर्ष एवं विमर्श

तीवर देव बौद्ध विहार केवल अतीत नहीं, यह वर्तमान का दर्पण है। जब हम ‘आगी’, ‘पानी’, ‘हाथ’, ‘भात’ कहते हैं, तो हम अनजाने में उसी पाली को दोहराते हैं जो कभी इन्हीं विहारों में गूँजती थी। हमारी भाषा ही हमारी निरंतरता है — और सिरपुर ही उसका उद्गम। भतपहरी वंश की कोसा-परम्परा, सतनामी समाज के बौद्ध-मूल्य और छत्तीसगढ़ी की पाली-निरंतरता — तीनों मिलकर यह सिद्ध करते हैं कि दक्षिण कोसल में बौद्ध धम्म विलुप्त नहीं हुआ, बल्कि लोक-संस्कृति में रूपांतरित होकर जीवित रहा।

अतः सिरपुर का संरक्षण केवल ईंट-संरचनाओं का संरक्षण नहीं, बल्कि भाषा, रस्म और मूल्य-बोध की जीवित विरासत का संरक्षण है। भविष्य के शोध में आनुवंशिक (DNA), वस्त्र-तकनीक (कोसा बुनाई) और तुलनात्मक धर्म-दर्शन के अंतःविषय अध्ययन की आवश्यकता है।

☸धम्मं शरणं गच्छामि🙏 नमो बुद्धाय! जय सतनाम!

संदर्भ ग्रंथ सूची / References

  1. Hiuen-Tsang, Si-Yu-Ki, tr. Samuel Beal, Book V, Chap. on Kosala.
  2. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, सिरपुर उत्खनन रिपोर्ट 1956-62, 2000-2010.
  3. शरभपुरीय एवं सोमवंशी अभिलेख, छत्तीसगढ़ राज्य संग्रहालय, रायपुर।
  4. Pali Text Society, Pali-English Dictionary, Rhys Davids.
  5. भतपहरी, अनिल कुमार — क्षेत्रीय सर्वेक्षण डायरी, जुनवानी-सिरपुर 2023-25।
  6. सतनामी समाज — मौखिक इतिहास, विवाह-रस्म अवलोकन।
लेखक परिचय
डॉ. अनिल कुमार भतपहरी, ग्राम जुनवानी, सिरपुर समीप, महासमुंद। भतपहरी गोत्र, सतनामी समाज से संबद्ध। दक्षिण कोसल पुरातत्व, पाली-छत्तीसगढ़ी भाषाविज्ञान एवं लोक-संस्कृति के स्वतंत्र शोधकर्ता।
Heritage Research Article
Tivar Dev Vihar Sirpur • Dakshin Kosal
A4 • Noto Serif Devanagari • © 2025
चित्र: लेखक का सिरपुर बौद्ध विहार में बौद्ध भिक्षुओं के साथ क्षेत्रीय सर्वेक्षण (2024-25) • तीवर देव बौद्ध विहार उत्खनित ईंट प्रांगण, सिरपुर
व्यवस्थित शोध आलेख • सार, पद्धति, प्रमाण, निष्कर्ष एवं संदर्भ सहित • A4 प्रिंट-रेडी
Noto Serif Devanagari • Buddhist Heritage Design System