Vol. 07 • 2025 • ISSN 3048-XXXX
तीवर देव बौद्ध विहार सिरपुर :
दक्षिण कोसल में बौद्ध धम्म, भाषा और लोक-संस्कृति की जीवित निरंतरता
Tivar Dev Bauddha Vihar Sirpur: Living Continuity of Buddhist Dhamma, Language and Folk Culture in Dakshin Kosal
प्रस्तुत शोध आलेख में सिरपुर (प्राचीन श्रीपुर) स्थित तीवर देव बौद्ध विहार को केंद्र में रखकर दक्षिण कोसल की बौद्ध परम्परा की राजनीतिक, वास्तुगत, सामाजिक एवं भाषिक निरंतरता का विश्लेषण किया गया है। सोमवंशी राजा तीवरदेव (7-8वीं शताब्दी) के काल में सिरपुर राजधानी थी। ह्वेनसांग के विवरण में 100+ संघाराम एवं 10,000 भिक्षुओं का उल्लेख, पुरातत्व में 10+ विहारों का उत्खनन, और तीवर देव विहार की विशाल ईंट-संरचना इस क्षेत्र को महानदी घाटी के बौद्ध केंद्र के रूप में स्थापित करते हैं। शोध में भतपहरी वंश (शरभपुरीय धारा), सतनामी समाज के बौद्ध मूल्यों (समता, अहिंसा, श्रम-प्रतिष्ठा), और विशेषतः पाली-छत्तीसगढ़ी के 11 जीवित शब्द-प्रमाणों के माध्यम से यह प्रतिपादित किया गया है कि छत्तीसगढ़ी पाली की ही लोक-निरंतरता है। कोसा वस्त्र परम्परा एवं विवाह में भंवराही साड़ी का निर्वाह इस सांस्कृतिक डीएनए का जीवंत प्रमाण है।
“सिरपुर केवल ईंट-पत्थरों का समूह नहीं, यह दक्षिण कोसल की आत्मा है — जहाँ बुद्ध धम्म, स्थानीय लोक-संस्कृति और छत्तीसगढ़ी जनमानस एक ही प्रवाह में मिलते हैं।”— शोध की केंद्रीय अवधारणा
१प्रस्तावना एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
दक्षिण कोसल का प्राचीन नगर सिरपुर (श्रीपुर) महानदी के तट पर स्थित है। 7वीं-8वीं शताब्दी ईस्वी में यह सोमवंशी राजाओं की राजधानी था। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग (युवान च्वांग) ने 639 ईस्वी के लगभग सिरपुर की यात्रा कर यहाँ 100 से अधिक संघाराम और लगभग 10,000 बौद्ध भिक्षुओं के निवास का उल्लेख किया है। यह विवरण सिरपुर को तत्कालीन भारत के प्रमुख बौद्ध शिक्षा-केन्द्रों में स्थापित करता है।
स्वतंत्र भारत में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एवं छत्तीसगढ़ राज्य पुरातत्व द्वारा किए गए उत्खननों में सिरपुर से अब तक 10 से अधिक बौद्ध विहार, अनेक स्तूप, ध्यान-कक्ष एवं बुद्ध प्रतिमाएँ प्रकाश में आई हैं। इनमें तीवर देव बौद्ध विहार आकार, विन्यास एवं ईंट-स्थापत्य की दृष्टि से दक्षिण कोसल का सबसे विशाल उत्खनित परिसर है। इसकी योजना — गर्भगृह, प्रदक्षिणा-पथ, भिक्षु-आवास, आँगन एवं प्रवेश-द्वार — बुद्धकालीन महाविहारों की क्लासिक संरचना को दर्शाती है।
- ◆दक्षिण कोसल का सबसे बड़ा उत्खनित बौद्ध विहार परिसर
- ◆7वीं सदी के चीनी विवरण से प्रमाणित
- ◆सोमवंशी — शरभपुरीय राजनीतिक सांस्कृतिक निरंतरता
- ◆महानदी घाटी की बौद्ध परम्परा का केंद्र
क्षेत्रीय अनुसंधान : सिरपुर विहार प्रांगण में लेखक एवं बौद्ध भिक्षु संघ
तीवर देव बौद्ध विहार, सिरपुर के उत्खनित प्रांगण में लेखक डॉ. अनिल कुमार भतपहरी बौद्ध भिक्षुओं के साथ — प्राचीन ईंट संरचना पृष्ठभूमि में
चित्र में 3 बौद्ध भिक्षु (केसरिया/मरून चीवर) एवं 2 शोधकर्ता (कोसा-ताने की जैकेट में लेखक) सिरपुर की प्राचीन ईंट-संरचना के समक्ष। कोसा वस्त्र परम्परा एवं बौद्ध चीवर का यह संगम 1300 वर्षीय सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत प्रमाण है।
२शोध उद्देश्य एवं पद्धति
३अनुसंधान दृष्टिकोण : तीन जीवित कड़ियाँ
३.१ भतपहरी वंश निरंतरता — शरभपुरीय धारा से कोसा परम्परा तक
जुनवानी - सिरपुर क्षेत्र से जुड़ा भतपहरी वंश, शरभपुरीय वंश की धारा का वाहक माना जाता है। अभिलेखों में उल्लेख है कि सम्राट विज्जस भट्टप्रहरी द्वारा बुद्ध एवं उनके साथ आए भिक्षु संघ को एक सहस्त्र कोसा वस्त्र अर्पण किया गया था। यह केवल दान नहीं, राजसत्ता और बुद्ध धम्म के सह-अस्तित्व का राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रमाण है।
सतनामियों में खासकर भट्टप्रहरी गोत्र के वैवाहिक रस्म में कोसा की भंवराही साड़ी के बिना विवाह सम्पन्न नहीं होते। यदि कोसा अनुपलब्ध हो तो सूती की सफेद साड़ी को हल्दी एवं सोडा से रंगकर कोसा रंग देकर रस्म अदा की जाती है। यह प्रथा आज तक जीवित है। लेखक के स्वयं के विवाह में भी सिंदूरी पीली कोसा साड़ी एवं कोसे की कुर्ता-पगड़ी-अल्फी धारण की गई थी। यह 1300 वर्ष पुरानी कोसा-दान परम्परा की अविच्छिन्न निरंतरता है।
३.२ सतनामी समाज में बौद्ध मूल्य — समता, अहिंसा, श्रम-प्रतिष्ठा
सतनामी समाज के मूलभूत मूल्य — समता, अहिंसा, श्रम-प्रतिष्ठा, मानव-मानव एक समान — में बौद्ध धम्म की स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनाई देती है। बाबा घासीदास द्वारा प्रवर्तित ‘सतनाम’ को लेखक बुद्ध धम्म के छत्तीसगढ़ी स्वरूप के रूप में देखता है, जो सच्च (सत्य) और धम्म (कर्तव्य/धर्म) पर आधारित है। यह न केवल दार्शनिक साम्य है, बल्कि महानदी घाटी में बौद्ध से सतनामी तक की सामाजिक रूपांतरण प्रक्रिया का संकेत भी है।
३.३ पाली-छत्तीसगढ़ी अंतर्संबंध — भाषा कभी मरती नहीं
भाषा केवल संवाद नहीं, सांस्कृतिक डीएनए है। छत्तीसगढ़ी में रोज़मर्रा प्रयुक्त सैकड़ों शब्द धम्म-लिपि पाली से सीधे निःसृत हैं। यह संबंध आकस्मिक नहीं, बल्कि ध्वनि-नियमों (महाप्राण-लोप, द्वित्व-सरलीकरण, स्वर-परिवर्तन) के अनुरूप व्यवस्थित है, जो 1500 वर्षों से जीवित है।
४विशेष भाषिक अनुसंधान : पाली - छत्तीसगढ़ी जीवित प्रमाण
भाषा ही विरासत की सबसे बड़ी निरंतरता है। जब शब्द वही रहते हैं, तो संस्कृति भी वही रहती है।
| पाली (मूल) | छत्तीसगढ़ी (वर्तमान) | हिन्दी अर्थ | भाषावैज्ञानिक टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| अग्ग | आगी | आग | द्वित्व-सरलीकरण: ग्ग > गी, महाप्राण लोप का अभाव |
| मनुक्ख / मनख्ख | मनखे | मनुष्य | ख्ख > खे, उकार > एकार |
| सुग्गा / सुव | सुवा | तोता | ग्गा > वा, मध्यम व्यंजन लोप |
| दई | दई | माँ | पूर्ण संरक्षण, दोनों में समान |
| पानीय | पानी | जल | अंत्य -य लोप, सीधा संरक्षण |
| हत्थ | हाथ | हाथ | त्थ > थ, द्वित्व-सरलीकरण |
| भत्त | भात | पका चावल | त्त > त, अर्थ-विस्तार |
| घोटक / घोट | घोड़ा | अश्व | प्रत्यय -ड़ा, तद्भव विकास |
| धम्म | धरम / धम्म | धर्म / कर्तव्य | सतनामी प्रयोग में 'धरम' रूप सुरक्षित |
| सच्च | सच | सत्य | च्च > च, सतनाम दर्शन का मूल |
| अप्प | अप्पन | अपना / आत्म | अप्प > अप्पन, सतनाम 'अप्पन' का मूल |
ये शब्द सिद्ध करते हैं कि छत्तीसगढ़ी, पाली की ही लोक-निरंतरता है — धम्म की भाषा आज भी हमारे घर-आँगन में बोली जाती है। पाली के महाप्राण-लोप, द्वित्व-सरलीकरण और स्वर-परिवर्तन के नियम आज भी छत्तीसगढ़ी उच्चारण में सक्रिय हैं। यह 1500 वर्षीय भाषिक अविच्छिन्नता सिरपुर को केवल पुरातत्व स्थल नहीं, जीवित भाषा-प्रयोगशाला बनाती है।
- • पाली कोश (Pali Text Society)
- • छत्तीसगढ़ी लोक-प्रयोग, सिरपुर अंचल सर्वे 2023-25
- • क्षेत्रीय विवाह-रस्म अवलोकन
- • ध्वनि-नियम: Turner, Grierson के तद्भव सिद्धांत
५निष्कर्ष एवं विमर्श
तीवर देव बौद्ध विहार केवल अतीत नहीं, यह वर्तमान का दर्पण है। जब हम ‘आगी’, ‘पानी’, ‘हाथ’, ‘भात’ कहते हैं, तो हम अनजाने में उसी पाली को दोहराते हैं जो कभी इन्हीं विहारों में गूँजती थी। हमारी भाषा ही हमारी निरंतरता है — और सिरपुर ही उसका उद्गम। भतपहरी वंश की कोसा-परम्परा, सतनामी समाज के बौद्ध-मूल्य और छत्तीसगढ़ी की पाली-निरंतरता — तीनों मिलकर यह सिद्ध करते हैं कि दक्षिण कोसल में बौद्ध धम्म विलुप्त नहीं हुआ, बल्कि लोक-संस्कृति में रूपांतरित होकर जीवित रहा।
अतः सिरपुर का संरक्षण केवल ईंट-संरचनाओं का संरक्षण नहीं, बल्कि भाषा, रस्म और मूल्य-बोध की जीवित विरासत का संरक्षण है। भविष्य के शोध में आनुवंशिक (DNA), वस्त्र-तकनीक (कोसा बुनाई) और तुलनात्मक धर्म-दर्शन के अंतःविषय अध्ययन की आवश्यकता है।
संदर्भ ग्रंथ सूची / References
- Hiuen-Tsang, Si-Yu-Ki, tr. Samuel Beal, Book V, Chap. on Kosala.
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, सिरपुर उत्खनन रिपोर्ट 1956-62, 2000-2010.
- शरभपुरीय एवं सोमवंशी अभिलेख, छत्तीसगढ़ राज्य संग्रहालय, रायपुर।
- Pali Text Society, Pali-English Dictionary, Rhys Davids.
- भतपहरी, अनिल कुमार — क्षेत्रीय सर्वेक्षण डायरी, जुनवानी-सिरपुर 2023-25।
- सतनामी समाज — मौखिक इतिहास, विवाह-रस्म अवलोकन।
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