सतनाम धर्म-संस्कृति का मांगलिक अनुष्ठान:
गुरुगद्दी पूजा एवं गुरुदर्शन मेला महोत्सव (1825-2025 : 200वाँ वर्ष)
डॉ. अनिल भतपहरी
9617777514
सतश्री उंजियार-सदन, अमलीडीह, रायपुर (छ.ग.)
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सारांश
प्रस्तुत शोध-पत्र में सतनाम धर्म-संस्कृति के सर्वाधिक प्राचीन एवं वृहद् मांगलिक अनुष्ठान — गुरुगद्दी पूजा महोत्सव एवं गुरुदर्शन मेला — का ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सामाजिक विश्लेषण किया गया है। क्वार शुक्ल एकम से दशमी तक आयोजित दस दिवसीय इस महापर्व की परंपरा 1825 में मोती महल गुरुद्वारा, भंडारपुरी के उद्घाटन एवं राजा गुरु बालकदास के राज्याभिषेक से जुड़ी है। 1860 के बाद बाधित हुई इस परंपरा का 1985 में ग्राम जुनवानी से पुनरुद्धार हुआ। यह अध्ययन इस आयोजन को दुःख-दशहरा पर्व के रूप में व्याख्यायित करते हुए इसके समाज-संगठन, ज्ञान-हस्तांतरण एवं लोककल्याणकारी आयामों को रेखांकित करता है।
1. प्रस्तावना
सतनाम धर्म-संस्कृति में क्वार शुक्ल एकम से दशमी तक आयोजित 'गुरुगद्दी पूजा महोत्सव' और समापन पर भव्य शोभायात्रा का आयोजन, गुरुघासीदास के पुत्र राजा गुरु बालकदास के राज्याभिषेक और उनकी शान में मनाए जाने वाले राज दशहरा पर्व की शोभायात्रा का मांगलिक अनुष्ठान है।
2. आयोजन विधि
क्वार शुक्ल एकम से दशमी तक यह आयोजन होता है। दशमी को सतधरा स्नान कर गुरुगद्दी व सतनाम ज्योत कलश को शोभायात्रा द्वारा सतनाम भवन में स्थापित जोत में समाहित कर देते हैं। दूसरे दिन पंथी नर्तक दल और अखाड़े वाले क्वार एकादशी को गुरुदर्शन मेला, भंडारपुरी जाते हैं। वहाँ हाथी-घोड़ों के भव्य जुलूस, अनेक करतब, पंथी नृत्य और अखाड़ों का प्रदर्शन होता है।
दसवें दिन 'सद्गुरु आसन' की प्रातः शोभायात्रा निकालकर ग्राम की गलियों की परिक्रमा कराई जाती है। सदानीरा नदी-सरोवर के समीप जल-परछन कराकर वापस गुरुद्वारा में अथवा श्रद्धालु अपने घर में आगामी उत्सव तक नित्य पूजा-अर्चना हेतु स्थापित करता है। शाम को तेलासी, अमसेना, खपरी, बोड़सरा, खडुआ आदि गुरु-वंशजों के दर्शनार्थ शोभायात्रा जाती है।
3. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कुछ विद्वानों के अनुसार यह परंपरा अशोक दशहरा है, जो सतनाम संस्कृति में आंशिक संशोधन के बाद 1820 के बाद प्रचलित हुई। तब साक्षात् गुरुघासीदास इस आयोजन के सूत्रधार थे।
छत्तीसगढ़ में स्थापित सतनाम धर्म का यह उत्सव 1825 से चला आ रहा है, जब मोती महल गुरुद्वारा का उद्घाटन हुआ और राजा घोषित होने के बाद चतुरंगी सेना सजाकर सद्गुरु घासीदास के मंझले पुत्र राजा गुरु बालकदास, भाई आगरदास, पुत्र साहेबदास हाथी पर सवार होकर आमजन के बीच आए और गुरु-उपदेशना व पंथ-संचालन हेतु दिशा-निर्देशन किया।
सन् 1860 में राजा गुरु बालकदास की हत्या, नेतृत्व-शून्यता, भीषण अकाल तथा बोड़सरा बाड़ा व तेलासी बाड़ा के महाजनों के आधिपत्य एवं सामाजिक उथल-पुथल के कारण यह आयोजन स्थगित हो गया। केवल राज-दशहरा, गुरुदर्शन मेले के नाम पर भंडारपुरी में एक दिवसीय होता रहा।
4. पुनरुद्धार (1985)
इसे पूर्ववत तेजस्वी स्वरूप देते हुए नवकलेवर के साथ, भंडारपुरी के समीपस्थ ग्राम जुनवानी में शिक्षक सुकालदास भतपहरी एवं मध्य बाल समाज व युवा जागृति मंच के संयुक्त तत्वावधान में 1985 में दस दिवसीय आयोजन किया गया। उसके बाद गाँव-गाँव में दस दिवसीय गुरुगद्दी पूजा महोत्सव का व्यवस्थित पुनरारंभ हुआ, जो आज सैकड़ों ग्रामों/कस्बों/शहरों में उत्साहपूर्वक मनाया जा रहा है। गुरुगद्दी पूजा महोत्सव के 42वें वर्ष का आयोजन इस वर्ष ग्राम जुनवानी में हो रहा है।
5. गुरुगद्दी पूजा समापन और दुःख-दशहरा पर्व
सतनाम धर्म की चारों शाखाओं और देश-विदेश में निवासरत सतनामियों में गुरुगद्दी पूजा विधान प्रचलित है। गुरुगद्दी सद्गुरु का आसन है, जिस पर आसीन होकर वे अनुयायियों को धर्मोपदेश देते हैं और उनके तमाम उलझनों, परेशानियों और दसों तरह के दुःख-व्याधि के हरण का उपाय बताते हैं — इसलिए यह दुःख-दशहरा पर्व भी है।
दस दिवसीय महापर्व में नित्य प्रातः-सायं आरती-पूजा के साथ संत-महंत-गुरुओं द्वारा ज्ञानवर्धक व्याख्यान, सत्संग-प्रवचन, गुरु ग्रंथ व चरित का पाठ एवं लोक कलाकारों द्वारा प्रेरक व मनोरंजक नाट्य-मंचन, गायन व नर्तन होता है। कहीं-कहीं हर शाम सामूहिक भोग-भंडारा होता है। इस विकट समय में जब फसलें खेत में हैं और अन्नागार खाली होते हैं, साधन-सक्षम लोग अन्नदान कर भंडारा चलाते हैं ताकि गरीब, वृद्ध, महिलाओं व बच्चों को गुरुप्रसादी मिल सके।
6. गुरुदर्शन मेला, भंडारपुरी
दूसरे दिन जगप्रसिद्ध भंडारपुरी गुरुदर्शन दशहरा पर्व हर्षोल्लासपूर्वक मनाया जाता है। इस दिन हाथी, घोड़े, ऊँट, पैदल चतुरंगी शोभायात्रा, गुरु-वंशजों व गुरुगद्दी नशीन धर्मगुरु का उपदेश व प्रवचन होता है। सतनामियों का यह सबसे बड़ा और प्राचीन महोत्सव है, जहाँ गुरुवंशज के घर से गुरुप्रसादी भोग-भंडारा पाकर श्रद्धालुगण धन्य हो जाते हैं। देशभर के लाखों श्रद्धालु एकत्र होते हैं।
7. सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व
इस महाआयोजन से समाज सुसंगठित होता है। उपस्थित गाँवों के मुखिया/प्रतिनिधिगण यहाँ से सीखी-समझी बातों को अपने-अपने ग्रामों में संचालित करते हैं। इसलिए सतनाम संस्कृति में 'गुरुदर्शन मेला' का अतिशय महत्व है। गुरुगद्दी पूजा महोत्सव का आयोजन प्रत्येक सतनामी ग्राम में होना चाहिए। दस दिनों तक सामूहिक आयोजन से लोग सामाजिक व धार्मिक कार्यों में प्रवृत्त होते हैं, संगठित होते हैं और वर्षभर की कटुताओं का समापन होता है। नई पीढ़ी को समृद्धशाली संस्कृति का हस्तांतरण होता है — यही इस आयोजन का प्रमुख उद्देश्य है।
8. निष्कर्ष
1825 से 2025 तक 200 वर्षों की यह परंपरा सतनाम धर्म की जीवंतता, संगठन-शक्ति एवं लोकमंगलकारी चेतना का प्रमाण है। 1985 के पुनरुद्धार के बाद यह महोत्सव पुनः जन-जन का पर्व बन गया है।
संदर्भ / चित्र सूची
चित्र-1: मोती महल गुरुद्वारा, भंडारपुरी (लेखक द्वारा 1993 में स्वकैमरे से ली गई फोटो)
चित्र-2: सद्गुरु आसन, गुरुगद्दी पूजा महोत्सव, अमलीडीह
चित्र-3: गुरुगद्दी पूजा महोत्सव स्थल में गुरु सतखोजन साहेब के साथ आयोजक मंडल, रायपुर
।। जय सतनाम ।।