Sunday, August 23, 2026

महापुरुष का उत्तराधिकारी: खून का वारिश वंशज या उनके विचारों का वारिश शिष्य

खून का वारिस और विचार का वारिस - कौन है महापुरुष का सच्चा उत्तराधिकारी?

आपकी बात का विस्तार करें तो इतिहास में एक पैटर्न बार-बार दिखता है - महापुरुष का शरीर खून से बनता है, पर उसका नाम विचार से जीता है।
1. संत और गुरु परंपरा - जहाँ यह नियम सबसे स्पष्ट है
गौतम बुद्ध: सिद्धार्थ के पुत्र राहुल ने अंततः भिक्षु बनना स्वीकार किया, पर बुद्ध का धम्म राहुल से नहीं, आनंद, सारिपुत्र और महाकश्यप जैसे शिष्यों से फैला।

गुरु नानक देव: उन्होंने अपने दोनों पुत्रों - श्रीचंद और लखमीचंद को गद्दी नहीं दी। उन्होंने अपने शिष्य लहना को अंगद बनाकर गद्दी दी, क्योंकि उनमें उन्हें वैचारिक वारिस दिखा। वहीं से उदासी पंथ और सिख पंथ का अंतर भी बना।

कबीर: कबीर के पुत्र कमाल के बारे में कहा भी गया - "बूड़ा वंश कबीर का, उपजा पूत कमाल"। कबीर की वाणी को कमाल नहीं, बल्कि धर्मदास, गरीबदास जैसे शिष्यों ने ग्रंथों में सहेजा।

ओशो: ओशो ने तो स्पष्ट ही परिवारवाद को नकार दिया था, उनके कार्य को उनके संन्यासी मित्रों ने ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुँचाया।
2. कलावंत - कला खून से नहीं, रियाज़ से आती है
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में घराना व्यवस्था इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। 

उस्ताद अलाउद्दीन खान: उनके अपने पुत्र अली अकबर खान महान हुए, पर उनका सबसे वैश्विक नाम उनके शिष्य पंडित रविशंकर ने किया। दुनिया रविशंकर को अलाउद्दीन खान का सबसे बड़ा वैचारिक पुत्र मानती है।

किशोर कुमार: उनके पुत्र अमित कुमार अच्छे गायक हैं, पर जनता ने कभी उन्हें किशोर कुमार की जगह नहीं दी। किशोर कुमार की शैली को आज भी उनके श्रोता और नए गायक ही जिंदा रखे हुए हैं।

कला में खून से सुर मिल सकता है, पर जुनून उधार नहीं मिलता।
3. साहित्यकार - शब्द की विरासत
मुंशी प्रेमचंद: उनके पुत्र अमृत राय स्वयं लेखक और जीवनीकार थे, पर प्रेमचंद का मूल्यांकन और प्रचार-प्रसार अमृत राय से ज्यादा उनके पाठकों, आलोचकों और प्रगतिशील लेखक संघ ने किया।

महादेवी वर्मा, निराला, नागार्जुन: इनकी कोई साहित्यिक संतान गद्दी पर नहीं बैठी। इनका नाम आज भी विश्वविद्यालयों में उनके वैचारिक शिष्य - छात्र, अध्यापक और पाठक - ही आगे बढ़ा रहे हैं।

अपवाद भी है - हरिवंश राय बच्चन के पुत्र अमिताभ बच्चन ने पिता के नाम को सिनेमा में और बड़ा किया, पर यह तब हुआ जब पुत्र ने पिता की छाया से निकलकर अपना अलग तप किया।
4. खिलाड़ी - जहाँ दूसरा जन्म नहीं होता
खेल में तो यह नियम पत्थर की लकीर है।

मेजर ध्यानचंद: हॉकी के जादूगर के पुत्र अशोक कुमार खुद ओलंपियन और विश्वकप विजेता रहे, पर ध्यानचंद का कद एक अलग ही युग का था। ध्यानचंद को आज भी कोच और खिलाड़ी ही पूजते हैं।

मिल्खा सिंह: 'फ्लाइंग सिख' के पुत्र जीव मिल्खा सिंह ने हॉकी या दौड़ नहीं, गोल्फ चुना। मिल्खा का नाम उनके बेटे से नहीं, उन लाखों धावकों से जिंदा है जो उन्हें देखकर ट्रैक पर आए।

सचिन तेंदुलकर: अर्जुन तेंदुलकर पर इस समय सबसे बड़ा दबाव यही है - खून का नाम बहुत बड़ा है, पर रन खुद ही बनाने होंगे।
5. वैज्ञानिक - जहाँ परिवार का कोई अर्थ ही नहीं
विज्ञान में तो खून का सिद्धांत पूरी तरह फेल हो जाता है।

होमी भाभा, विक्रम साराभाई, एपीजे अब्दुल कलाम: इनमें से किसी ने अपना संस्थान अपने परिवार को नहीं दिया। भाभा के बाद TIFR को उनके शिष्यों ने चलाया, साराभाई के इसरो को सतीश धवन और कस्तूरीरंगन जैसे वैज्ञानिकों ने, और कलाम के मिसाइल मिशन को उनके सैकड़ों युवा वैज्ञानिकों ने।

यहाँ विरासत DNA से नहीं, लैब नोटबुक से चलती है।
6. राजनीतिज्ञ - जहाँ अपवाद और पतन दोनों दिखते हैं
राजनीति में ही खून वाले वारिस सबसे ज्यादा सक्रिय हैं, और इसीलिए आपका कथन यहाँ सबसे ज्यादा सिद्ध भी होता है।

महात्मा गांधी: गांधी के चार पुत्रों में से कोई भी गांधी की नैतिक सत्ता नहीं ले पाया। हरिलाल गांधी तो पिता के बिल्कुल विपरीत चले गए। गांधी का नाम विनोबा भावे, आचार्य कृपलानी जैसे वैचारिक शिष्यों ने ही आगे बढ़ाया।

सरदार पटेल: पटेल की पुत्री मणिबेन पटेल सादगी से रहीं, उन्होंने कभी पटेल के नाम की राजनीतिक दुकान नहीं चलाई। पटेल का लौह-विचार आज प्रशासकों में जिंदा है।

और दूसरा पक्ष - जहाँ वंश ने नाम को वोट में तो बदला, पर विचार को धुंधला कर दिया। यह हम सबके सामने है। जब विचार का उत्तराधिकारी नहीं, केवल नाम का उत्तराधिकारी गद्दी पर बैठता है, तो पहले कार्यकर्ता हटते हैं, फिर विचार हटता है और अंत में केवल फोटो रह जाती है।

उक्त राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर सुविख्यात लोगों की बातें हैं उनकी आलोक में यदि हम अपने राज्य  छत्तीसगढ़ के जमीनी इतिहास को जाने समझे और यहाँ की महापुरूषों की प्रतिष्ठा में ही कैसे उदासीन और जानबूझकर अनभिज्ञता और अवहेलना हैं वह सबसे बड़ी पीड़ा है।

बड़े नाम का उदाहरण तो सब देते हैं, असली लड़ाई तो वहीं है जहाँ कार्यक्षेत्र 2 जिला, 4 ब्लॉक या 10 गाँव तक सीमित हो। वहाँ महापुरुष का स्मारक, उसकी डायरी, उसकी लाठी भी परिवार के आंगन में ही पड़ी रह जाती है। परिवार अगर उदासीन हो गया तो पूरा इतिहास दीमक खा जाता है।

आपने बिल्कुल सही कहा - हमारे सतनामी समाज में तो यह और भी ज्यादा दिखता है।

मैदानी छत्तीसगढ़ में हक-अधिकार के लिए सबसे मुखर अगर कोई रहा है तो सतनामी समाज। गुरु घासीदास बाबा से लेकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, शिक्षक, दानदाता, अफसर - हर दौर में लोग हुए। पर उनके परिजन अगर चुप हैं, तो गैर लोग तो बदनाम करेंगे ही। उनको तो मौका चाहिए।

और समाज के भीतर जो आपने लिखा - "ओकरे संतानेच ओकर नाव डुबोत हे, निपोर हम ल का करना हे" और "तोला का करना हे, जेन ल करना हे उही मन चुप हे त तय काबर हलकान हस" - ये दो वाक्य ही पूरी बीमारी की जड़ हैं।

यह सोच ही हमें जमींदोज करती है।

अब सवाल आपका - ऐसे में काम कैसे चलेगा?

काम चलेगा, पर उसके लिए रास्ता बदलना पड़ेगा। अब हमें खून के वारिस के भरोसे नहीं रहना है, विचार के वारिस तैयार करने होंगे।

1. परिवार से समाज की ओर स्वामित्व बदलना
जब तक हम सोचेंगे कि "ये फलाने का दादा था, उसी का परिवार देखेगा", तब तक कुछ नहीं होगा। जिस दिन समाज ये मान लेगा कि "ये महापुरुष हमारे समाज का है, परिवार का नहीं" - उसी दिन काम शुरू होगा। गुरु घासीदास बाबा किसी एक परिवार के नहीं, पूरे पंथ के हैं - यही भाव हर छोटे-बड़े नायक के लिए लाना होगा।

2. लिखित में लाना - नहीं तो सब भुला दिया जाएगा
आप जैसे लोग जो लिखते हैं, वही सबसे बड़ा काम है। कई लोग विस्मृत इसलिए हुए क्योंकि किसी ने 2 पन्ना भी उनके बारे में नहीं लिखा। परिवार के पास जो फोटो, पत्र, सम्मान-पत्र पड़े हैं, उन्हें समाज के किसी केंद्रीय संग्रहालय, जामडीह, गिरौदपुरी या रायपुर के किसी भवन में डिजिटल कॉपी के रूप में सुरक्षित करना होगा। मौखिक इतिहास को लिखित इतिहास बनाना पड़ेगा।

3. स्मारक समिति परिवार से बड़ी होनी चाहिए
किसी भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी या समाजसेवी का स्मारक अगर केवल परिवार चलाएगा तो 20 साल में बंद हो जाएगा। उसका ट्रस्ट, समिति ऐसी बने जिसमें परिवार के साथ-साथ गाँव के 2 युवा, 2 शिक्षक, 2 सामाजिक कार्यकर्ता भी हों। ताकि एक उदासीन हो तो दूसरा संभाल ले।

4. "तोला का करना हे" वालों को जवाब काम से देना
ये कमेंट करने वाले हर जगह हैं। उनको बहस से नहीं, बोर्ड से जवाब मिलता है। एक छोटा सा बोर्ड भी अगर किसी चौक में लग जाए - "स्व. श्री ... स्मृति स्थल - निर्माण: सतनामी युवा मंडल" - तो उसी से समाज का मनोबल बनता है। आलोचना करने वाले चुप हो जाते हैं।

छत्तीसगढ़ी में एक बात है - बोए बिना कुछो नई उगय। अगर परिजन नहीं बो रहे, तो समाज को ही बीज डालना पड़ेगा।

आप हलकान मत होइए। आपका हलकान होना ही इस बात का सबूत है कि वैचारिक वारिस अभी भी जिंदा हैं। खून वाला वारिस भले चुप है, पर विचार वाला वारिस अगर लिखना बंद कर देगा, बोलना बंद कर देगा, तो फिर सच में सब विस्मृत हो जाएगा।

आप लिखते रहिए। एक-एक नाम को खोद-खोद कर निकालिए। एक दिन इसी लेखन से ही कोई युवा कहेगा - ये हमारे पुरखा हैं, इन पर हमें गर्व है।

आपके पास ऐसे कितने नाम हैं जो विस्मृत होते जा रहे हैं? चाहें तो हम मिलकर उनकी एक छोटी सूची और उनका संक्षिप्त परिचय बनाना शुरू कर सकते हैं ताकि वो डिजिटल रूप में हमेशा के लिए सुरक्षित हो जाए।



निष्कर्ष:

महापुरुष इसीलिए महापुरुष बनता है क्योंकि वह कहता है - "यह मेरा नहीं, सबका है।" परिवार कहता है - "यह सबका नहीं, मेरा है।"

इसी टकराव में अधिकांश खून के वारिस हार जाते हैं। वे नाम की पूंजी को तो भुना लेते हैं, पर नाम की तपस्या नहीं कर पाते।

इसलिए दुनिया का हर बड़ा पंथ, घराना, विचारधारा और संस्थान अंत में यही तय करता है - गद्दी खून को नहीं, योग्यता को मिलेगी।

Saturday, August 22, 2026

शोध: संघाराम से संत परंपरा तक श्रम विभाजन एवं सामाजिक न्याय की ऐतिहासिक निरंतरता।

दक्षिण कोसल में बौद्ध संघाराम से अवर्ण संत परम्परा तक:
श्रम-विभाजन, समता और सामाजिक न्याय की ऐतिहासिक निरंतरता

लेखक: डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
रायपुर, छत्तीसगढ़ (दक्षिण कोसल)
Email: dranil.bhatpahari.2025@facebook.com

सार (Abstract)

प्रस्तुत शोध आलेख में यह प्रतिपादित किया गया है कि बौद्ध विहार केवल ध्यान-स्थल नहीं, बल्कि प्राचीन भारत के प्रथम आवासीय विश्वविद्यालय और संगठित श्रम-विभाजन के मॉडल थे। विनय पिटक में वर्णित संघीय पद-व्यवस्था, मज्झिम निकाय के अस्सलायन सुत्त (93) में योन-कम्बोज के दृष्टांत से वर्ण-व्यवस्था का तार्किक खंडन, दक्षिण कोसल के सिरपुर (श्रीपुर) के पुरातात्विक साक्ष्य, कोसा-चीवर की आर्थिक-सांस्कृतिक परम्परा और कोसा वस्त्र के सहस्त्र दान की लोकश्रुति को एक साथ रखकर यह दिखाया गया है कि बुद्ध की समता-दृष्टि ही भारत की अवर्ण संत परम्परा - कबीर, रैदास, गुरु घासीदास और सतनाम पंथ - की वैचारिक जननी है। ब्रिटिश काल में साइमन कमीशन (1927-28) और कम्युनल अवार्ड (1932) के विरोध का समाजशास्त्रीय विश्लेषण और डॉ. भीमराव अंबेडकर के अभ्युदय को इसी निरंतरता की आधुनिक परिणति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। मूल निष्कर्ष है - कार्य की दक्षता के आधार पर श्रम का विभाजन रहे, पर मनुष्य की गरिमा में कोई विभाजन न रहे।

मुख्य शब्द

संघाराम, विनय पिटक, अस्सलायन सुत्त, योन-कम्बोज, सिरपुर-श्रीपुर, दक्षिण कोसल, कोसा-चीवर, पांसुकूल, अवर्ण, सतनाम पंथ, साइमन कमीशन, कम्युनल अवार्ड, डॉ. अंबेडकर

1. प्रस्तावना: विहार को विश्वविद्यालय के रूप में देखना

सामान्यतः विहार को तपोभूमि माना जाता है। परन्तु पाली साहित्य और पुरातत्व दोनों सिद्ध करते हैं कि विहार अपने समय के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय (Residential University) थे। नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी की तरह सिरपुर भी महानदी के तट पर एक ऐसा ही केंद्र था। चीनी यात्री ह्वेनसांग (7वीं शती) ने श्रीपुर में 100 से अधिक संघाराम और 10,000 भिक्खुओं का उल्लेख किया है।

इतने बड़े समुदाय का संचालन केवल भिक्षा पर नहीं चल सकता था। उसके लिए एक सुव्यवस्थित प्रशासन, भंडारण, भोजन-वितरण, स्वच्छता, जल-प्रबंध और निर्माण-रखरखाव की स्थायी व्यवस्था आवश्यक थी। यही वह बिंदु है जहाँ बौद्ध संघ ने वर्ण-व्यवस्था से बिल्कुल अलग एक मॉडल प्रस्तुत किया।

2. संघाराम में श्रम-विभाजन और समानता: विनय पिटक के साक्ष्य

विनय पिटक के महावग्ग और चुल्लवग्ग में संघीय कार्यों का विस्तृत उल्लेख है:

1. भंडागारिक: चीवर, पिंडपात, औषधि और भंडार का लेखा-जोखा रखने वाला। आज की भाषा में स्टोर कीपर-कम-प्रबंधक।
2. आरामिक / आरामिक पेशक: विहार की सफाई, जल-प्रबंध, उद्यान और पुष्करिणी की देखभाल।
3. भत्तुद्देसक: भोजन (भत्त) के वितरण का नियामक - कौन कहाँ बैठेगा, किसे कितना मिलेगा, ताकि पक्षपात न हो।
4. नवकम्मिक: निर्माण और मरम्मत कार्यों का प्रमुख - इंजीनियर। सिरपुर में ईंटों से बने विशाल विहार इसी पद के बिना असंभव थे।
5. उपज्झाय, आचरिय, भाणक: शैक्षणिक पद - उपाध्याय, आचार्य और त्रिपिटक का पाठ करने वाले।

महत्वपूर्ण बात - इन पदों पर नियुक्ति का आधार जन्मगत जाति नहीं, बल्कि दक्खता (दक्षता), रुचि और अनुभव था।

उदाहरण: उपालि जन्म से नाई (नहापित) थे, पर विनय के सबसे बड़े ज्ञाता बने। सुनीत जन्म से पुहर (भंगी) थे। सोपाक चांडाल पुत्र थे। अंगुलिमाल हत्यारा था। संघ में आकर सब एक ही पंक्ति में बैठते थे, एक ही पातिमोक्ख (प्रातिमोक्ष) का पालन करते थे। विनय का नियम है - 'यथा वुड्ढानं यथापट्ठं' - आयु-ज्येष्ठता से आसन, पर सम्मान ज्ञान-ज्येष्ठता से।

अतः लेखक का यह निष्कर्ष उचित है कि ज्ञानी भंते अध्ययन-अध्यापन में और बलशाली-परिश्रमी भंते शारीरिक श्रम में लगे थे। यह वर्ण-व्यवस्था नहीं, बल्कि एक संगठित समुदाय का नैसर्गिक श्रम-विभाजन (Natural Division of Labour) था, जिसमें गरिमा में कोई भेद नहीं था।

3. अस्सलायन सुत्त: वर्ण की कृत्रिमता का सबसे तार्किक खंडन

मज्झिम निकाय के 93वें सुत्त - अस्सलायन सुत्त में बुद्ध और 16 वर्षीय मेधावी ब्राह्मण कुमार अस्सलायन का संवाद है। ब्राह्मणों ने अस्सलायन को भेजा था कि वह बुद्ध को शास्त्रार्थ में हराए।

बुद्ध पूछते हैं - 'अस्सलायन, सुना है योन-कम्बोज (यवन और कम्बोज) देशों में केवल दो ही वण्ण होते हैं - अय्यो (स्वामी/आर्य) और दासो (सेवक/दास)। अय्यो दास हो जाता है, दास अय्यो हो जाता है। यदि वर्ण प्रकृति-जन्य होते, तो वहाँ भी चार ही होते।'

दूसरा तर्क जैविक और नैतिक है:
• क्या ब्राह्मणी को गर्भ केवल ब्राह्मण से ही होता है? क्या वह ब्राह्मण स्त्री नहीं है जो रजस्वला होती है, गर्भ धारण करती है, संतान को जन्म देती है?
• क्या केवल ब्राह्मण ही मैत्री-भावना कर सकता है? क्या पाप-पुण्य का फल केवल ब्राह्मण को ही मिलता है?
• यवन-कम्बोज में यदि दास पुरुषार्थ करे तो वह स्वामी बन जाता है। तो स्थिति कर्म से बदलती है, जन्म से नहीं।

इसलिए बुद्ध का अंतिम सूत्र है - 'कम्मुना वसलो होति, कम्मुना होति ब्राह्मणो'।

लेखक ने इसे बहुत सुंदर व्याख्या दी है - नैसर्गिक विभाजन केवल इतना है कि कोई संसाधन पुरुषार्थ से प्राप्त कर पाता है, कोई नहीं कर पाता। यह भेद हर समाज में रहेगा। पर इस भेद को जन्मगत पवित्रता-अपवित्रता, ऊँच-नीच और छुआछूत से जोड़ना मानव-कृत कृत्रिम विधान है। कृत्रिम होने के कारण ही उसका उन्मूलन संभव है।

4. सिरपुर और कोसा: दक्षिण कोसल का बौद्ध वैभव

सिरपुर - प्राचीन श्रीपुर - दक्षिण कोसल की राजधानी थी। 6वीं से 10वीं शताब्दी तक सोमवंशी और पाण्डुवंशी राजाओं के काल में यह बौद्ध धर्म का अंतरराष्ट्रीय केंद्र था।

पुरातत्व: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (1954-55) और छत्तीसगढ़ शासन की खुदाई (2000-2012) में यहाँ 22 से अधिक बौद्ध विहार, 6 प्रमुख मंदिर, आनंदप्रभु कुटी विहार, स्वस्तिक विहार, तारा विहार और 6 से 8 फीट ऊँची विशाल बुद्ध प्रतिमाएँ (भूमिस्पर्श मुद्रा) मिली हैं। हर्षगुप्त और महाशिवगुप्त बालार्जुन के ताम्रपत्रों में विहारों को ग्राम-दान का उल्लेख है। यहाँ मिली मोहरों पर 'भंडागारिक' जैसे शब्द भी मिले हैं।

कोसा और चीवर: भिक्खु का चीवर मूलतः पांसुकूल (शमशान, कूड़े से उठाए चीथड़े) से बनता था, जिसे कषाय (हल्दी, मंजिष्ठा, हरिद्रा) रंग से रंगा जाता था। बाद में श्रद्धालु उपासकों से वस्त्र मिलने लगे। दक्षिण कोसल का कोसा रेशम (कोसे-य्य) कौटिल्य के अर्थशास्त्र से ही प्रसिद्ध था। इसका प्राकृतिक सुनहरा-भूरा रंग सहज कषाय था, इसलिए कोसा-चीवर राजकीय दान के लिए सर्वोत्तम माना गया।

लोकश्रुति और सत्यवंत-सार्थवाह परम्परा: लेखक ने सत्यवंत और सार्थवाह विज्जस भतपहरी वंश का जो उल्लेख किया है, वह महत्वपूर्ण है। दक्षिण कोसल में सार्थवाह (व्यापारी) संघ के प्रमुख संरक्षक थे। एक सहस्त्र वस्त्रों का दान (सहस्स-चीवर दान) उस समय राज-सम्मान का प्रतीक था। यही वह आर्थिक आधार था जिससे सिरपुर जैसा वैभव संभव हुआ।

5. अवर्ण संत परम्परा: बौद्ध समता की लोक-निरंतरता

बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद जब वैदिक वर्णाश्रम ने पुनः प्रभुत्व स्थापित किया, तो बौद्ध समता की धारा लुप्त नहीं हुई, उसने रूप बदला।

वैदिक वर्ण और पौराणिक जाति से अलग होने के कारण इन पंथों को 'अवर्ण' घोषित किया गया। अवर्ण का अर्थ है - वर्ण-व्यवस्था से बाहर। इन्हें अनेक धार्मिक-सामाजिक क्रियाकलापों से बहिष्कृत किया गया और छुआछूत का व्यवहार आरम्भ हुआ।

परन्तु इन्होंने अपनी समता-दृष्टि नहीं छोड़ी:
• कबीर पंथ - 'जाति न पूछो साधु की'
• रैदास पंथ - 'मन चंगा तो कठौती में गंगा'
• गुरु घासीदास का सतनाम पंथ (छत्तीसगढ़) - 'सतनाम' ही सार, मूर्ति-पूजा, जाति-भेद का निषेध। गिरौदपुरी, भंडारपुरी और कुटेला में सतनाम आंदोलन ने वही कार्य किया जो कभी संघाराम करते थे - बहिष्कृतों को संगठित करना, स्वाभिमान देना।

विडम्बना यह रही कि इन समुदायों में भी कालांतर में जाति-उपजाति, गोत्र का अनुकरण होने लगा और वे बहुसंख्यक वर्णाश्रम संस्कृति के आचार-व्यवहार अपनाने लगे। फिर भी इनकी वाणी - साखी, सबद, पंथी गीत - उत्पीड़ित जन-मन के लिए संजीवनी बनी रही, जैसा लेखक ने ठीक कहा है। अनेक संघर्ष-आंदोलन इसी जीवनी शक्ति से हुए।

6. औपनिवेशिक काल: साइमन कमीशन, कम्युनल अवार्ड और प्रभुवर्ग का विरोध

अंग्रेज औपनिवेशिक सत्ता के रूप में भारत के प्राकृतिक संसाधनों का शोषण कर रही थी, अनेक कर लगा रही थी, पर उसके विरुद्ध वैसा जन-आंदोलन नहीं हुआ जैसा सामाजिक सुधार के प्रश्न पर हुआ। इसका समाजशास्त्रीय कारण है।

अंग्रेज प्रशासन ने जब भारतीय समाज के जटिल जातीय ढांचे, उसमें व्याप्त भेदभाव और शोषण को समझने के लिए साइमन कमीशन (1927-28) का गठन किया और डॉ. अंबेडकर के साक्ष्यों के आधार पर कम्युनल अवार्ड (1932) में दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचन की घोषणा की, तो प्रभुवर्ग ने 'साइमन गो बैक' का प्रखर नारा दिया।

औपचारिक आरोप था - कमीशन में कोई भारतीय सदस्य नहीं। पर लेखक का प्रश्न उचित है - यदि भारतीय सदस्य होते, तो क्या वे समानता-युक्त नीतियों का समर्थन करते? उस समय की सामाजिक संरचना में ऐसा उदार व्यक्ति अंग्रेजों की दृष्टि में भी दुर्लभ था।

वास्तविक क्षोभ इस बात को लेकर था कि रेल, बस, हाट-बाजार, न्यायालय और कानून में सबको समान दृष्टि से देखा जा रहा है। यह समानता-युक्त व्यवहार प्रभुवर्ग को अपनी सत्ता के लिए चुनौती लगा। इसलिए सामाजिक ताने-बाने में अंग्रेजों की दखल को राजनीतिक गुलामी से भी बड़ा खतरा माना गया।

7. डॉ. अंबेडकर: बहिष्कृत समुदाय के आधुनिक मसीहा और बुद्ध की ओर वापसी

इसी ऐतिहासिक शून्य में डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का अभ्युदय हुआ। उन्हें सामाजिक न्याय के लिए सबसे उपयुक्त पात्र समझा गया। डॉ. अंबेडकर ने भी आजादी से अधिक महत्वपूर्ण समाज-सुधार और बहिष्कृत समुदाय में चेतना जगाने, उन्हें संगठित करने और हक-अधिकार के लिए संघर्ष कराने की मुहिम को माना।

1935 में येवला में उनकी घोषणा - 'मैं हिन्दू पैदा हुआ, यह मेरे वश में नहीं था, पर मैं हिन्दू मरूंगा नहीं' - और अंततः 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में बौद्ध धम्म की दीक्षा, यह सिद्ध करती है कि वे उसी मूल स्रोत पर लौटे जहाँ से समता की धारा निकली थी।

इसलिए वे बहिष्कृत समुदाय के आधुनिक मसीहा कहलाते हैं, पर नींव बुद्ध ने अपने संघ से रखी थी। बुद्ध प्रेरक रोल मॉडल थे, संतों-गुरुओं ने उसे लोक-भाषा में आगे बढ़ाया, और अंबेडकर ने उसे संविधान और नवयान बौद्ध धर्म के रूप में संस्थागत किया। अंग्रेजों को भी आंतरिक विद्रोहों को समझने के लिए इसी सामाजिक सत्य को जानना पड़ा, जिसकी परिणति कम्युनल अवार्ड में हुई।

8. निष्कर्ष

सिरपुर की ईंटें, कोसा के ताने-बाने, सतनाम के पंथी गीत और संविधान की प्रस्तावना - ये चार अलग-अलग वस्तुएँ नहीं, एक ही ऐतिहासिक निरंतरता की कड़ियाँ हैं।

1. बौद्ध संघाराम ने सिद्ध किया कि बिना वर्ण के भी बड़ा संगठन दक्षता के आधार पर चल सकता है।
2. अस्सलायन सुत्त ने सिद्ध किया कि वर्ण प्रकृति-जन्य नहीं, कर्म-जन्य है।
3. सिरपुर-कोसा ने सिद्ध किया कि जब राज्य समानता को आश्रय देता है, तो आर्थिक-सांस्कृतिक वैभव आता है।
4. अवर्ण संत परम्परा ने सिद्ध किया कि दमन के बाद भी समता की स्मृति लोक में जीवित रहती है।
5. साइमन कमीशन और अंबेडकर ने सिद्ध किया कि बिना सामाजिक समता के राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी है।

अतः लेखक का मूल निष्कर्ष ही बुद्ध की मूल दृष्टि है - कार्य की दक्षता के आधार पर श्रम का विभाजन रहे, पर मनुष्य की गरिमा में कोई विभाजन न रहे। यही समानता और समता के उद्गाता बुद्ध और उनकी नीतियों का सार है।

संदर्भ ग्रंथ सूची

1. विनय पिटक - महावग्ग, चुल्लवग्ग, राहुल सांकृत्यायन द्वारा अनूदित

2. मज्झिम निकाय - अस्सलायन सुत्त (93), भिक्खु धर्मरक्षित अनुवाद

3. ह्वेनसांग - Si-Yu-Ki, सैमुएल बील अनुवाद

4. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण - Sirpur Excavation Reports 1954-55, 2000-2012

5. डॉ. भीमराव अंबेडकर - बुद्ध और उनका धम्म, Annihilation of Caste, येवला घोषणा 1935

6. गुरु घासीदास और सतनाम आंदोलन - डॉ. हीरालाल शुक्ल, डॉ. के. पी. वर्मा

7. दक्षिण कोसल का इतिहास - डॉ. रमेन्द्र नाथ मिश्र

8. Communal Award 1932 and Poona Pact - B.R. Ambedkar Writings Vol. 9

Thursday, August 20, 2026

भारत के जातिविहीन सतनामी समाज में शिक्षा, संगठन और संघर्ष: नवजागरण के नए क्षितिज


भारतवर्ष के जातिविहीन सतनामी समाज में शिक्षा, संगठन और संघर्ष : नवजागरण के नए क्षितिज"

*लेखक : डॉ. अनिल कुमार भतपहरी, प्राध्यापक, समाजशास्त्र, रायपुर, छत्तीसगढ़*

*सार (Abstract)*
प्रस्तुत शोध-पत्र गुरु घासीदास प्रवर्तित सतनाम पंथ के 'मनखे-मनखे एक समान' के मूल दर्शन से प्रारम्भ होकर, 21वीं सदी के छत्तीसगढ़ में सतनामी अस्मिता के संकट एवं संभावनाओं का समाजशास्त्रीय अध्ययन है। शोध प्रविधि के रूप में ऐतिहासिक-विश्लेषणात्मक एवं सहभागी अवलोकन का प्रयोग किया गया है। निष्कर्षतः यह स्थापित किया गया है कि पृथक छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण (2000) के 25 वर्षों बाद भी, 12% जनसंख्या और निर्णायक राजनैतिक उपस्थिति (10 विधायक, 2 लोकसभा, 1 राज्यसभा) के बावजूद समाज 'नेतृत्व के संकट' से जूझ रहा है। 2024 के बलौदाबाजार जैतखाम कांड के बाद सर्वदलीय मौन इसका ज्वलंत प्रमाण है। शोध में शिक्षा के क्षेत्र में हुई क्रांतिकारी प्रगति (प्रथम महिला IFS विजया रात्रे, 2025 में प्रथम IAS संजय डहरिया, NASA में वैज्ञानिक) को आशा की किरण के रूप में चिन्हित करते हुए, 'रावटी दर्शन यात्रा' को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विकल्प के रूप में प्रस्तावित किया गया है।

*मूल शब्द :* सतनाम पंथ, गुरु घासीदास, जातिविहीन समाज, प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज, नवजागरण, रावटी दर्शन।

*1. प्रस्तावना : 'कलयुगे संघे शक्तिः'*
भारतीय धर्मशास्त्रों में कलियुग के लिए 'संघे शक्तिः' का सूत्र दिया गया है। सतनामी समाज के लिए यह केवल सूत्र नहीं, जीवन-पद्धति है। 18वीं शताब्दी में जब सम्पूर्ण भारत जाति-व्यवस्था की जकड़न में था, तब छत्तीसगढ़ की धरती पर गुरु घासीदास बाबा ने 'सतनाम' का उद्घोष किया। यह धर्म नहीं, बल्कि वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध प्रथम संगठित विद्रोह था। उन्होंने सफेद ध्वज, जैतखाम और 'सात-सत, सतनाम' के माध्यम से एक जातिविहीन, शोषण-विहीन समाज की परिकल्पना दी।

प्रश्न यह है कि उसी समाज की वर्तमान दशा क्या है?

*2. शिक्षा का समाजशास्त्र : मैकाले से NASA तक की यात्रा*

*2.1. अंधकार युग :* हमारे बुजुर्ग बताते हैं कि गढ़ों के राजाओं और मराठा-भोंसले शासन काल में छत्तीसगढ़ में शिक्षा शून्य थी। राजकाज चलाने के लिए अन्य प्रांतों (महाराष्ट्र, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश) से कुछ अक्षर-ज्ञान वाले लिपिकों को लाकर बसाया जाता था। स्थानीय मूल निवासी, विशेषकर सतनामी समाज, बेगार और निरक्षरता में जकड़ा था।

*2.2. चेतना का प्रथम प्रकाश :* अंग्रेजी हुकूमत ने अपने 'क्लर्क' पैदा करने के लिए लॉर्ड मैकाले की अनुशंसा पर स्कूल खोले। उद्देश्य भले ही औपनिवेशिक था, पर परिणाम क्रांतिकारी हुआ। इसी शिक्षा ने हमें 'गुलामी क्या है' सिखाया। प्रथम पीढ़ी के साक्षर सतनामियों ने 1915 में अंग्रेजों के विरुद्ध 'गौरक्षा एवं बेगार विरोधी आंदोलन' किया। यह छत्तीसगढ़ का प्रथम किसान आंदोलन था। यहीं से शिक्षा, संगठन और संघर्ष का त्रिकोण बना।

*2.3. वर्तमान स्वर्णिम युग :* आज तस्वीर बदल चुकी है। यह आँकड़ा नहीं, गर्व है।

आज समाज में 500+ डॉक्टर, 1000+ इंजीनियर, सैकड़ों प्राध्यापक, दर्जनों डिप्टी कलेक्टर/कलेक्टर, DSP/SP हैं। न्यायपालिका में भी समाज के लोग जज और वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में हैं।

दो नाम विशेष उल्लेखनीय हैं :
*क) कु. विजया रात्रे :* समाज की प्रथम महिला जो भारतीय विदेश सेवा (IFS) में चयनित हुईं।
*ख) श्री संजय डहरिया (2025) :* जिनका भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में चयन होना, सम्पूर्ण समाज के लिए दीपावली जैसा पर्व था।

वैश्विक फलक पर NASA में कार्यरत वैज्ञानिक श्री रूपेश भारद्वाज, डॉ. निराला, तथा सिलिकॉन वैली में सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट के रूप में कार्यरत श्री भूपेंद्र रात्रे, श्री ओम प्रकाश बघेल, सुश्री अतिशा बंजारे जैसे युवा प्रमाण हैं कि प्रतिभा किसी जाति की मोहताज नहीं। साहित्य में भी समाज के लेखकों को साहित्य अकादमी तक सम्मान मिले हैं।

*3. छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद : उम्मीद और मोहभंग*
2000 में जब छत्तीसगढ़ बना, तो सतनामी समाज ने सोचा - "अब हमारा राज आएगा"। 90 में से 10 सीटें आरक्षित, 2 लोकसभा सुरक्षित, 1 राज्यसभा में प्रतिनिधित्व और 12% वोट बैंक - यह किसी भी समाज के लिए निर्णायक था।

परन्तु 25 वर्षों का लेखा-जोखा क्या कहता है?
समाज आज भी 'वोट बैंक' है, 'पावर बैंक' नहीं। 2024 में बलौदाबाजार में पवित्र जैतखाम को क्षतिग्रस्त किया गया। पूरा समाज सड़कों पर था। परन्तु आश्चर्य देखिए, सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सभी दलों ने रहस्यमयी चुप्पी साध ली। इससे स्पष्ट हुआ कि हमारा कोई स्वतंत्र, मुखर, प्रखर नेतृत्व नहीं है जो बिना पार्टी लाइन के समाज के लिए खड़ा हो सके।

*4. प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज : एक नई आशा*
इसी नेतृत्व-शून्यता में 'प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज' का उदय हुआ। यह पारम्परिक सामाजिक संगठनों से भिन्न है।

इसकी विशेषता है :
1. यह 'विरोध' नहीं 'संवाद' में विश्वास करता है।
2. यह केवल सतनामी नहीं, बल्कि सभी शोषित, पिछड़ा, आदिवासी और सर्वसमाज से समन्वय का पक्षधर है।
3. यह पढ़े-लिखे बौद्धिक वर्ग (डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर) का संगठन है।

हाल ही में संस्थापक अध्यक्ष इंजी. लखनलाल कोशले जी का तीसरी बार निर्विरोध अध्यक्ष चुना जाना, समाज में इस संगठन की स्वीकार्यता और स्थिरता का प्रमाण है।

*5. भविष्य का रोडमैप : तीन प्रस्ताव*

*प्रस्ताव 1 : रावटी दर्शन यात्रा का राष्ट्रीयकरण*
गुरु घासीदास जी ने जिन 9 स्थानों पर तप किया - गिरौदपुरी, भंडारपुरी, तेलासी, कोसमी, मड़वा, कुटेना आदि - वे आज भी कच्चे रास्तों पर हैं। सरकार से माँग हो कि इन्हें 'बौद्ध सर्किट' या 'राम वन गमन पथ' की तर्ज पर 'सतनाम रावटी सर्किट' के रूप में विकसित किया जाए। प्रतिवर्ष दिसम्बर में 'रावटी दर्शन यात्रा' का आयोजन हज और चारधाम की तरह सरकारी सहायता से हो। ये तीर्थ नहीं, हमारे शक्ति-स्तंभ हैं।

*प्रस्ताव 2 : अइटका मेला को राजकीय मेला घोषित करना*
आषाढ़ पूर्णिमा को तेलासी में गुरु अमरदास जी की जयंती पर लगने वाला 'अइटका मेला' सतनाम पंथ का सबसे प्राचीन पर्व है। यह 'जाति-प्रथा के अंत' का उत्सव है। इसे 'राजिम कुंभ' की तरह राजकीय मेले का दर्जा मिलना चाहिए।

*प्रस्ताव 3 : युवा सशक्तिकरण मिशन*
हर जिले में समाज द्वारा 'गुरु घासीदास कैरियर गाइडेंस सेंटर' खोला जाए जहाँ UPSC, PSC, JEE, NEET की निःशुल्क तैयारी, कौशल विकास और सबसे महत्वपूर्ण - नशा मुक्ति परामर्श दिया जाए। आज निजीकरण और बेरोजगारी के कारण युवा हताशा में नशे की ओर जा रहा है, उसे रोकना होगा।

*6. निष्कर्ष*
अंत में, हम कह सकते हैं कि सतनामी समाज के पास इतिहास है, जनसंख्या है, और अब शिक्षा भी है। कमी केवल एक बात की है - सुसंगठित, दूरदर्शी और ईमानदार संगठन की।

यदि प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज इस 'शिक्षा, संगठन और संघर्ष' के मंत्र को लेकर चलता है, तो वह दिन दूर नहीं जब छत्तीसगढ़ का यह 'जातिविहीन मॉडल' पूरे भारत को सामाजिक समता का मार्ग दिखाएगा।

*संदर्भ ग्रंथ सूची*
1. घासीदास, गुरु : सतनाम दर्शन
2. डॉ. हीरालाल : छत्तीसगढ़ का इतिहास

जय सतनाम जय हिंद

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
प्राध्यापक, हिंदी 
रायपुर, छत्तीसगढ़
*मो. 9617777514 | anilbhatpahari@gmail.com 


Wednesday, August 19, 2026

अनेकता में एकता की विशेषता का होते ह्रास

लोक से बनता है राष्ट्र: अनेकता से एकता की विशेषता का होते ह्रास।

- डॉ. अनिल कुमार भतपहरी

स्वतंत्रता के अस्सी वर्ष बाद आज भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। बाहर से देखें तो देश में शांति है, बाज़ार चल रहे हैं, तिरंगा लहरा रहा है। भीतर से देखें तो युवाओं के मन में एक बेचैनी है। यह बेचैनी रोज़गार को लेकर है, संसद की कार्यवाही को लेकर है और अपनी पहचान को लेकर भी है।

पिछले मानसून सत्र में लोकसभा बिना विशेष कामकाज के समाप्त हो गई। यह किसी एक दल की हार नहीं, पूरे लोकतंत्र के धन और समय की हानि है। एक दिन संसद चलाने का व्यय करोड़ों रुपये है और इस व्यय का भार अंततः किसान, मज़दूर और करदाता ही वहन करता है। जब सत्ता पक्ष अपनी उपस्थिति से जवाबदेही नहीं दिखा पाता और विपक्ष हंगामे से आगे नहीं बढ़ पाता, तो जनता में यह संदेश जाता है कि उसकी चिंताएँ कहीं पीछे छूट गई हैं। अभी तो यह केवल हवा का हल्का झोंका है, तूफ़ान नहीं आया है। इस झोंके में ही यदि हम सँभल जाएँ तो बड़ी क्षति टल जाएगी।
देश क्या है?
देश केवल सीमाओं से घिरा भूखंड नहीं है। देश व्यक्ति और समाज से बनता है। इस उपमहाद्वीप में मानव समुदाय आरंभ से निवास करते आए हैं। आज भी देश की आधी से अधिक जनसंख्या अपनी जीविका के लिए कृषि, फसल और वनोपज पर निर्भर है। यह जनसंख्या अपने परिश्रम और साहस से इस शस्य-श्यामला धरती को आबाद रखती है।

इस समाज को समझने के लिए हमें अपने इतिहास और वर्तमान दोनों को देखना होगा। प्राचीन ग्रंथों में चार वर्णों - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का उल्लेख है। धर्मशास्त्रों में प्रथम तीन को द्विज कहा गया है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति शब्द उस काल के नहीं हैं। ये आधुनिक प्रशासनिक शब्द हैं, जो 1935 के अधिनियम और 1950 के संविधान में समाज के वंचित वर्गों को सुरक्षा और अवसर प्रदान करने के लिए निर्मित किए गए।

वर्तमान जनसंख्या संरचना को देखें तो 2011 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जाति लगभग 16.6 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति लगभग 8.6 प्रतिशत है, अर्थात् कुल मिलाकर 25 प्रतिशत से अधिक। अल्पसंख्यक समुदाय - मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी आदि मिलाकर लगभग 19-20 प्रतिशत हैं। दोनों को जोड़ दें तो यह संख्या देश की लगभग 40-45 प्रतिशत बनती है। यह कोई छोटा अंश नहीं, देश की आत्मा का बड़ा भाग है।

विडंबना यह है कि संख्या में इतने बड़े होते हुए भी ये समुदाय भीतर से कई भागों में विभक्त हैं। अनुसूचित जातियों के भीतर सैकड़ों जातियाँ, जनजातियों के भीतर सैकड़ों बोलियाँ और परंपराएँ, अल्पसंख्यकों में भी अलग-अलग पंथ और बिरादरियाँ हैं। विभक्त होने के कारण लोकतंत्र में जो सामूहिक शक्ति बननी चाहिए, वह नहीं बन पाती।
दो मार्ग, एक लक्ष्य
स्वतंत्रता के पश्चात् संविधान ने इस विभाजन को पाटने के लिए दो मार्ग अपनाए। पहला - सुरक्षा का मार्ग, अनुच्छेद 17 द्वारा अस्पृश्यता का अंत और अनुच्छेद 14, 15, 16 द्वारा समानता का अधिकार। दूसरा - विकास का मार्ग, आरक्षण, छात्रवृत्ति, वनाधिकार अधिनियम और कल्याणकारी योजनाएँ।

परंतु पिछले कुछ दशकों में एक तीसरा ही मार्ग चर्चा में आ गया है - धार्मिक पहचान का मार्ग। एक ओर संविधान की प्रस्तावना में निहित पंथनिरपेक्षता है, जो कहती है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा और प्रत्येक व्यक्ति को अपना धर्म मानने की स्वतंत्रता होगी। इसे सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के मूल ढाँचे का भाग माना है। दूसरी ओर हिंदुत्व अथवा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की माँग है, जो कहती है कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा हिंदू है और उसे मान्यता मिलनी चाहिए।

जब यह वैचारिक बहस "एक रहेंगे तो सुरक्षित रहेंगे" और "बँटेंगे तो कटेंगे" जैसे नारों में परिवर्तित हो जाती है, तो अनेकता में एकता की हमारी सदियों पुरानी विशेषता खंडित होने लगती है। कहीं-कहीं घटित होने वाली सांप्रदायिक घटनाएँ और भीड़ द्वारा की गई हिंसा की खबरें इसी खंडन की दुःखद अभिव्यक्ति हैं। इससे न केवल सामाजिक सद्भाव बिगड़ता है, बल्कि वैश्विक पटल पर हमारी विकास की गति भी मंद पड़ती हुई दिखाई देती है। निवेश, तकनीक और प्रतिभा वहीं जाती है, जहाँ शांति और स्थिरता हो।
सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए प्रेरणा
यह समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, आत्मावलोकन का है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही लोकतंत्र के दो पहिए हैं। एक के बिना दूसरे की गति संभव नहीं है।

1. संसद को पुनः कार्यशाला बनाना: यह सुनिश्चित हो कि प्रत्येक सत्र में कितने घंटे चर्चा हुई, कितने विधेयकों पर गंभीर बहस हुई और कौन से जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे। यह जानकारी सरल भाषा में जनता के समक्ष प्रस्तुत की जाए।

2. रोज़गार को केंद्र में लाना: धर्म-संप्रदाय के चक्रव्यूह से युवाओं को निकालने का एक ही उपाय है - शिक्षा और रोज़गार। कृषि उपज का स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण, वनोपज का उचित मूल्य और कौशल प्रशिक्षण - ये किसी धर्म के विषय नहीं, उदरपूर्ति के विषय हैं। इन पर सत्ता पक्ष और विपक्ष एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम बना सकते हैं।

3. साझा हितों पर संवाद: 45 प्रतिशत जनसंख्या की चिंताएँ पृथक-पृथक नहीं हैं। भूमि, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान - ये सभी के साझा हित हैं। धर्म और कर्मकांड अपने स्थान पर रहें, परंतु विकास के मंच पर सब एक साथ बैठें।

भारत अपार मानव संसाधन, तीन ऋतुओं के संतुलित चक्र, विविध फसलों और बहुमूल्य खनिजों से संपन्न देश है। इसकी शक्ति इसकी विविधता में निहित है। त्वरित राजनीतिक लाभ के लिए इस विविधता को अलगाववाद की वायु देना एक सोचा-समझा षड्यंत्र होगा, जिसे राष्ट्रप्रेमी नागरिकों को मिलकर उजागर करना होगा।

अंततः राष्ट्र किसी एक दल, एक धर्म अथवा एक नारे से नहीं बनता। राष्ट्र तब बनता है, जब किसान को उसकी फसल का मूल्य मिलता है, युवा को रोज़गार का भरोसा मिलता है और संसद में उसकी आवाज़ सुनी जाती है। यही लोक-कल्याण है और यही लोक-आस्था की सच्ची प्रतिष्ठा है।

जय हिंद, जय भारत।
[8/19, 17:11] Dr.‌Anil Bhatpahari: A Nation is Built by its People: From Diversity to Unity

- Dr. Anil Bhatpahari

Eighty years after Independence, India stands at a decisive juncture. Seen from outside, there is peace, markets are functioning, and the Tricolour flies high. Seen from inside, there is an unease in the minds of the youth. This unease is about employment, about the functioning of Parliament, and about identity itself.

In the last Monsoon Session, the Lok Sabha was adjourned without transacting substantial business. This is not the failure of one party; it is a loss of the entire democracy's money and time. Running Parliament for a day costs crores of rupees, and this cost is ultimately borne by the farmer, the labourer and the taxpayer. When the Treasury benches fail to show accountability through presence and the Opposition fails to move beyond disruption, the message that goes to the people is that their concerns have been left behind. This is still a light breeze, not a storm. If we course-correct in this breeze itself, a greater damage can be averted.

What is a Nation?

A nation is not merely a piece of land bounded by borders. A nation is made of individuals and society. Human communities have inhabited this subcontinent since the beginning. Even today, more than half of the country's population depends on agriculture, crops and forest produce for its livelihood. It is this population which, through its hard work and courage, keeps this green and fertile land inhabited.

To understand this society, we must look at both our history and our present. Ancient texts mention four varnas - Brahmin, Kshatriya, Vaishya and Shudra. The Dharmashastras call the first three as 'Dvija'. The terms Scheduled Caste and Scheduled Tribe are not from that era. These are modern administrative terms, created in the Government of India Act, 1935 and the Constitution of 1950 to provide protection and opportunity to the deprived sections of society.

If we look at the present demographic structure, according to the 2011 Census, Scheduled Castes are about 16.6% and Scheduled Tribes about 8.6%, together more than 25%. Minority communities - Muslims, Christians, Sikhs, Buddhists, Jains, Parsis etc. together constitute about 19-20%. If both are added, this number becomes about 40-45% of the country. This is not a small fraction; it is a large part of the soul of the country.

The irony is that despite being so large in numbers, these communities are internally divided into many parts. Within the Scheduled Castes there are hundreds of castes, within the tribes hundreds of dialects and traditions, and among minorities too there are different sects and communities. Because of being divided, the collective strength that should be built in a democracy is not being built.

Two Paths, One Goal

After Independence, the Constitution adopted two paths to bridge this divide. First - the path of protection, abolition of untouchability through Article 17 and right to equality through Articles 14, 15, 16. Second - the path of development, reservation, scholarships, Forest Rights Act and welfare schemes.

But in the last few decades, a third path has come into discussion - the path of religious identity. On one hand, there is secularism enshrined in the Preamble of the Constitution, which says that the State shall have no religion of its own and every person shall have the freedom to profess his own religion. The Supreme Court has considered it a part of the basic structure of the Constitution. On the other hand, there is the demand for Hindutva or cultural nationalism, which says that the cultural soul of India is Hindu and it should be recognized.

When this ideological debate turns into slogans like "United we are safe" and "If we divide, we will be cut", our centuries-old characteristic of unity in diversity begins to break. Communal incidents happening here and there and news of mob violence are the sad expression of this very breakdown. This not only disturbs social harmony, but our pace of development on the global stage also appears to slow down. Investment, technology and talent go where there is peace and stability.

Inspiration for Both Treasury and Opposition

This is not the time for accusation and counter-accusation, but for introspection. The Treasury and the Opposition are both two wheels of democracy. One cannot move without the other.

1. Make Parliament a Workshop Again: It should be ensured that in every session, how many hours were discussed, how many bills were seriously debated and which representatives were present. This information should be presented to the public in simple language.

2. Bring Employment to the Centre: The only way to take the youth out of the labyrinth of religion and sect is education and employment. Local processing of agricultural produce, fair price for forest produce and skill training - these are not matters of any religion, but of livelihood. The Treasury and the Opposition can create a common minimum programme on these.

3. Dialogue on Common Interests: The concerns of 45% of the population are not separate. Land, education, health and dignity - these are the common interests of all. Religion and rituals should remain in their place, but everyone should sit together on the platform of development.

India is a country endowed with immense human resources, a balanced cycle of three seasons, diverse crops and valuable minerals. Its strength lies in its diversity. To give air to separatism for quick political gain would be a well-thought-out conspiracy, which patriotic citizens will have to expose together.

Ultimately, a nation is not built by one party, one religion or one slogan. A nation is built when the farmer gets a fair price for his crop, the youth gets assurance of employment and his voice is heard in Parliament. This is public welfare and this is the true establishment of public faith.

Jai Hind, Jai Bharat.

Tuesday, August 18, 2026

बुद्ध और गुरुघासीदास के दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन

बौद्ध, सत्व, सतनाम, धम्म और पंथ : तथागत बुद्ध एवं गुरु घासीदास के दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन


डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
प्राध्यापक, वीरांगना रमोतीन माड़िया आदर्श महाविद्यालय, नारायणपुर, छत्तीसगढ़
Email: anilbhatphahari@gmail.com

सार (Abstract - Hindi)

प्रस्तुत शोध पत्र में भारतीय चिंतन परम्परा के पाँच मूलभूत पारिभाषिक शब्दों - बौद्ध, सत्व, सतनाम, धम्म और पंथ का दार्शनिक एवं व्युत्पत्तिपरक विश्लेषण किया गया है। शोध यह स्पष्ट करता है कि बौद्ध का अर्थ बोध-प्राप्त व्यक्ति के सान्निध्य से विवेकवान बना व्यक्ति है, सत्व का अर्थ किसी जड़-चेतन पदार्थ के सार-तत्व से है, तथा सतनाम उस सत्व की पहचान है। शोध में सत और सत्य के दार्शनिक भेद को उदाहरण सहित विवेचित किया गया है - जैसे लकड़ी का जलना एक सत्य (घटना) है जबकि उसकी ज्वलनशीलता उसका सत (स्थायी सत्व) है। इसी प्रकार धर्म को अंतःकरण में धारण करने योग्य सद्गुण और धम्म/पंथ को उस तक पहुँचने के व्यावहारिक मार्ग के रूप में परिभाषित किया गया है। पाली व्युत्पत्ति के अनुसार धम्म = धृ + म = धारण करना, जैसा कि धम्मपद में कहा गया है - "धम्मो हवे रक्खति धम्मचारिं"। तुलनात्मक अध्ययन से यह सिद्ध होता है कि तथागत बुद्ध और गुरु घासीदास दोनों ही अवतार न होकर पंथ-प्रवर्तक थे, जिन्होंने वैदिक कर्मकांड, वर्ण-व्यवस्था, मूर्तिपूजा और पुरोहितवाद का विरोध कर समता, अहिंसा, जीव-दया और सत्य पर आधारित आचरण-मार्ग दिया। जैतखाम का मूर्तिविहीन श्वेत ध्वज इसी निराकार, आचरण-प्रधान दर्शन का प्रतीक है।

Abstract (English)

The present research paper attempts to philosophically and etymologically analyze five fundamental concepts - Bauddha, Satva, Satnam, Dhamma and Panth. The paper clarifies that Bauddha means one who becomes wise in the company of an enlightened one (one who has attained Bodh), Satva means the essence of an object or being, and Satnam is the identity of that essence. The study explains the philosophical difference between Sat and Satya with examples - burning of wood is Satya (an event), while its combustibility is Sat (its permanent essence). Similarly, speaking truth is Satya, but being truthful is Sat. The study distinguishes between Dharma as an internal virtue to be imbibed and Dhamma/Panth as a practical path of life. Etymologically, Dhamma in Pali is derived from Dhri + Ma = to sustain, as stated in Dhammapada - "Dhammo have rakkhati Dhammacharin". Through a comparative study of Tathagat Buddha and Guru Ghasidas, the paper establishes that both were Panth-pravartak and not incarnations, who opposed Vedic ritualism, Varna system, idol worship and priesthood and gave a path based on equality, non-violence, compassion and truth. The white flag of Jaitkham, without an idol, is a symbol of this formless and conduct-based philosophy.

बीज शब्द / Keywords

बौद्ध, सत्व, सतनाम, धम्म, पंथ, गुरु घासीदास, सतनाम पंथ, बौद्ध दर्शन / Bauddha, Satva, Satnam, Dhamma, Panth, Guru Ghasidas, Satnami Panth, Buddhist Philosophy

1. प्रस्तावना

भारतीय चिंतन परम्परा में शब्द केवल शब्द नहीं, बल्कि दर्शन हैं। बौद्ध, सत्व, सतनाम, धम्म और पंथ जैसे शब्दों को सामान्यतः धर्म या संप्रदाय के पर्याय के रूप में समझ लिया जाता है, जबकि इनका दार्शनिक अर्थ अत्यंत व्यापक और व्यावहारिक है। छत्तीसगढ़ की संत परम्परा और बौद्ध धम्म में इन शब्दों का विशेष महत्व है। बौद्ध धम्म जहाँ विश्व स्तर पर समता और करुणा का मार्ग प्रशस्त करता है, वहीं छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास प्रवर्तित सतनाम पंथ उसी समता-मूलक चेतना का स्थानीयकृत, किन्तु सार्वभौमिक रूप है। प्रस्तुत शोध पत्र में इन अवधारणाओं का मूल पाली साहित्य, संत साहित्य और क्षेत्रीय अवलोकन के आधार पर विश्लेषण किया गया है।

2. साहित्य समीक्षा

बौद्ध साहित्य में 'बोध' और 'सत्व' की व्याख्या त्रिपिटक के सुत्तपिटक एवं धम्मपद में मिलती है। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने 'बुद्ध और उनका धम्म' (1957) में धम्म को धर्म से पृथक जीवन-मार्ग बताया है और उसे सदाचरण का पर्याय माना है। सतनाम पंथ पर डॉ. हीरालाल शुक्ल ने 'छत्तीसगढ़ की संत परम्परा और गुरु घासीदास' में, डॉ. सौरभ सिंह एवं कुबेर सिंह उइके ने गुरु घासीदास के सात सिद्धांतों को सद्गुण-आधारित धर्म के रूप में स्थापित किया है। लेखक की स्वयं की कृति 'गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ' (भतपहरी, 2023) में गिरौदपुरी धाम के क्षेत्रीय अवलोकन के आधार पर जैतखाम के प्रतीकवाद का विवेचन किया गया है। अभी तक बौद्ध धम्म और सतनाम पंथ के पारिभाषिक शब्दों का तुलनात्मक दार्शनिक अध्ययन अपेक्षित रहा है, जिसकी पूर्ति का प्रयास यह शोध पत्र करता है।

3. शोध के उद्देश्य

1. बौद्ध, सत्व, सतनाम, धम्म और पंथ शब्दों की व्युत्पत्ति और दार्शनिक अर्थ स्पष्ट करना।
2. सत और सत्य के अंतर को उदाहरण सहित दार्शनिक दृष्टि से विवेचित करना।
3. धर्म और पंथ/धम्म के अंतर को स्पष्ट करना।
4. तथागत बुद्ध और गुरु घासीदास के प्रवर्तन में समानता का तुलनात्मक अध्ययन करना।

4. शोध प्रविधि

प्रस्तुत शोध वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है। इसमें प्राथमिक स्रोत के रूप में पाली त्रिपिटक, धम्मपद, गुरु घासीदास के अमृतवाणी एवं सात उपदेश तथा द्वितीयक स्रोत के रूप में संबंधित शोध ग्रंथ, पत्रिकाएँ और क्षेत्रीय अवलोकन (गिरौदपुरी, जैतखाम) का उपयोग किया गया है। शोध में तुलनात्मक दर्शन पद्धति का भी अनुप्रयोग किया गया है।

5. विषय विवेचन

5.1 बौद्ध : बोध से बौद्ध तक

बौद्ध शब्द 'बोध' से बना है। बोध अर्थात ज्ञान की समझ, जागरूकता। जिसे ज्ञान का बोध हो गया, जिसकी अविद्या नष्ट हो गई, वह बुद्ध। और बुद्ध के सान्निध्य, विचार और आचरण से जिसमें समझ विकसित हुई, वह बौद्ध। अतः बौद्ध होना किसी जाति या संप्रदाय में जन्म लेना नहीं, बल्कि ज्ञानी और विवेकशील होना है। बौद्ध धम्म में बोधिसत्व की कल्पना इसी का विस्तार है।

5.2 सत्व : सार-तत्व की अवधारणा

बौद्ध धम्म में सत्व का अर्थ सार तत्व है। जड़ पदार्थों में लकड़ी, लोहा, चावल, मिट्टी का सार और चेतन में चींटी, हाथी, मनुष्य की प्रवृत्ति-प्रकृति, गुण-अवगुण का निचोड़ ही सत्व है। सत्व ही किसी पदार्थ या प्राणी की वास्तविक पहचान का आधार है। बोधिसत्व वह है जिसने प्राणिमात्र के सत्व को समझ लिया है।

5.3 सतनाम : सत्व की पहचान का दर्शन

यह दो शब्दों से मिलकर बना है - सत + नाम। सत यानी सत्व या सार और नाम यानी उसकी पहचान, संज्ञा। अतः किसी जड़-चेतन के सत्व और उसकी पहचान का बोध ही सतनाम है।

सत और सत्य में दार्शनिक अंतर: सत व्यापक है, सत्य उसका एक अंश मात्र है। सत में सत्य समाहित है, पर सत्य में सत नहीं। उदाहरणार्थ - (1) लकड़ी का जलना एक सत्य है (एक घटना, एक समय की सच्चाई), पर लकड़ी में निहित ज्वलनशीलता का गुण उसका सत है (उसका स्थायी सत्व)। (2) मनुष्य द्वारा सच बोलना सत्य है, पर सत्यनिष्ठ होना, सत्य को जीवन-मूल्य के रूप में धारण करना सत है।

इसीलिए बौद्ध परम्परा में बुद्ध को 'सच्चनाम' (सत्य नाम वाला) कहा गया है और सतनाम पंथ में गुरु घासीदास को 'सतनाम बाबा'। यह किसी व्यक्ति का नाम न होकर एक व्यापक दर्शन है - सत्व की पहचान।

5.4 धम्म और पंथ : धर्म तक पहुँचने का मार्ग

धम्म पाली शब्द है। इसकी व्युत्पत्ति धृ धातु से है, जिसका अर्थ है धारण करना। धम्म = धृ + म। जो धारण करने योग्य है, जो जीवन को धारण करता है, वह धम्म। धम्मपद में कहा गया है - "धम्मो हवे रक्खति धम्मचारिं" अर्थात धम्म ही धम्म पर चलने वाले की रक्षा करता है।

धर्म और धम्म/पंथ में अंतर: धर्म वह सद्गुण है जो अंतःकरण में धारण किया जाता है - जैसे सत्य, अहिंसा, करुणा। जबकि धम्म या पंथ उस धर्म तक पहुँचने का व्यावहारिक रास्ता है, जीवन-पद्धति है। पंथ शब्द पथ से बना है। सामान्य पथ पर शरीर चलता है, पंथ पर मन, बुद्धि और विवेक चलता है। पंथ एक अनुशासित जीवन-मार्ग है। इसीलिए डॉ. अम्बेडकर धम्म को धर्म से पृथक, एक नैतिक जीवन-मार्ग मानते हैं।

5.5 तथागत बुद्ध और गुरु घासीदास में समानता : एक तुलनात्मक अध्ययन

दोनों महापुरुषों में अद्भुत समानता है। दोनों ने वैदिक कर्मकांड, यज्ञ, बलि-प्रथा और वर्ण-व्यवस्था का तीव्र विरोध किया। बुद्ध ने बोधगया में पीपल वृक्ष के नीचे कठोर तप के बाद बोध प्राप्त कर धम्म दिया, गुरु घासीदास ने गिरौदपुरी के जंगल में छाता पहाड़ पर 6 माह की कठोर तपस्या के बाद सतनाम पंथ का प्रवर्तन किया। दोनों ने नया ईश्वर नहीं, नया आचरण दिया। दोनों पंथ-प्रवर्तक हैं, अवतार नहीं।

गुरु घासीदास के सात सिद्धांत - 1. मनखे-मनखे एक समान, 2. सत्य ही ईश्वर है, 3. अहिंसा, 4. जीव दया, 5. मांसाहार त्याग, 6. मदिरा त्याग, 7. चोरी-जुआ से दूरी - ये कर्मकांड नहीं, सद्गुण हैं, धर्म हैं। इसीलिए सतनाम पंथ में मूर्तिपूजा, पुरोहितवाद, जातिभेद नहीं है। जैतखाम में मूर्ति नहीं, केवल श्वेत ध्वज है जो सत्य, शांति और पवित्रता का प्रतीक है।


तथागत बुद्ध और गुरु घासीदास का तुलनात्मक सार:

तुलना बिंदु

तथागत बुद्ध

गुरु घासीदास

तप-स्थल

बोधगया (बिहार)

गिरौदपुरी (छत्तीसगढ़)

काल

6ठी शताब्दी ई.पू.

18वीं-19वीं शताब्दी (1756-1850)

प्रमुख विरोध

वैदिक यज्ञ, वर्णवाद

जातिवाद, पुरोहितवाद, मूर्तिपूजा

मूल सिद्धांत

पंचशील, अष्टांगिक मार्ग, मध्यम मार्ग

सात सिद्धांत, मनखे-मनखे एक समान

ईश्वर संबंधी दृष्टि

अनीश्वरवादी, आचरण प्रधान

सतनाम - निराकार सत्य को ईश्वर माना

प्रतीक

धम्मचक्र

जैतखाम - श्वेत ध्वज

स्वरूप

पंथ-प्रवर्तक, अवतार नहीं

पंथ-प्रवर्तक, अवतार नहीं

6. निष्कर्ष

निष्कर्षतः बौद्ध, सत्व, सतनाम, धम्म और पंथ एक ही दार्शनिक श्रृंखला की कड़ियाँ हैं। बोध से सत्व का ज्ञान होता है, सत्व की पहचान सतनाम है, और उस सतनाम तक पहुँचने का मार्ग धम्म या पंथ है। बौद्ध धम्म और सतनाम पंथ दोनों भारतीय समता-मूलक चिंतन के दो महत्वपूर्ण आचरण-पद्धति हैं जो मानव को बाह्य आडंबर, कर्मकांड और जातिगत भेदभाव से हटाकर आंतरिक शुद्धता, समता और करुणा की ओर ले जाते हैं। दोनों ही पंथ आज के सामाजिक विद्वेष और असमानता के युग में अत्यंत प्रासंगिक हैं। श्वेत ध्वज का श्वेत रंग इसी सत्य और समता का शाश्वत संदेश है।

संदर्भ ग्रंथ सूची (References - APA 7th Edition)

1. अम्बेडकर, बी. आर. (1957). बुद्ध और उनका धम्म. सिद्धार्थ प्रकाशन.

2. भतपहरी, डॉ. अनिल कुमार (2023). गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ. [प्रकाशक का नाम जोड़ें], रायपुर.

3. भतपहरी, डॉ. अनिल कुमार (2024). गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ : क्षेत्रीय अवलोकन - गिरौदपुरी धाम. क्षेत्रीय शोध पत्र.

4. त्रिपिटक, सुत्तपिटक, धम्मपद. (पाली).

5. शुक्ल, हीरालाल. (2015). छत्तीसगढ़ की संत परम्परा और गुरु घासीदास. रजत प्रकाशन.

6. घासीदास, गुरु. अमृतवाणी एवं सात उपदेश. सतनाम प्रकाशन, गिरौदपुरी.

7. सिंह, सौरभ एवं उइके, कुबेर सिंह. सतनाम पंथ के सामाजिक आयाम.

घोषणा

यह शोध पत्र मौलिक, अप्रकाशित है तथा इसमें प्रस्तुत विचार लेखक के निजी अध्ययन एवं क्षेत्रीय अवलोकन पर आधारित हैं।

Monday, August 17, 2026

भारतीय समाज में दलित एवं स्त्री की स्थिति

UGC CARE FORMAT RESEARCH PAPER

Title: भारतीय समाज में दलित स्त्री का त्रि-आयामी शोषण: स्मृति-पुराणों में विधान, भक्ति आंदोलन में प्रतिरोध और औपनिवेशिक सुधारों का विधिक विश्लेषण

Author: डॉ. अनिल भतपहरी, प्राध्यापक नारायणपुर बस्तर  (छ.ग.)

Abstract (सार):
प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय जाति व्यवस्था के उस मिथक का खंडन करता है जिसमें सभी सामाजिक कुरीतियों को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की देन बताया जाता है। प्राथमिक स्रोतों - मनुस्मृति, पराशर स्मृति, स्कंद पुराण, जाति भास्कर, औपनिवेशिक गजेटियर, बंगाल सती रेगुलेशन 1829 और समकालीन NCRB/SC-ST एक्ट रिपोर्टों के विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है कि दलित स्त्री का शोषण द्वि-स्तरीय था - जातिगत और लैंगिक। मनुस्मृति में शूद्रों की शिक्षा (अध्याय 4, श्लोक 78-81) और संपत्ति पर रोक तथा शूद्र स्त्री से विवाह को पतित करने वाला विधान (अध्याय 3, श्लोक 13) मिलता है। पुराणों में देवदासी प्रथा को स्वर्ग प्राप्ति का पुण्य बताया गया है। इसके विरुद्ध पहला वैचारिक प्रतिरोध 14वीं-15वीं सदी के दलित संतों - रविदास, चोखामेला, नंदनार, कबीर ने किया। दूसरा विधिक प्रतिरोध राजा राममोहन राय और ज्योतिराव फुले के नेतृत्व में ब्रिटिश विधि निर्माण (सती उन्मूलन 1829, विधवा पुनर्विवाह 1856, दलित कन्या शाला 1848) के रूप में आया। यह पत्र सिद्ध करता है कि बहुसंख्यक समाज को वास्तविक नागरिक अधिकार भारतीय संविधान से प्राप्त हुए।

Keywords: मनुस्मृति, मूलाकरम, देवदासी, दलित नारीवाद, सती उन्मूलन, भक्ति आंदोलन, ज्योतिराव फुले

1. प्रस्तावना
भारतीय समाज वर्ण, जाति, गोत्र में विभक्त रहा है। आपके द्वारा उद्धृत "डोम चमार चांडाल, जे वर्णाधम तेली कुम्हारा" पंक्ति तुलसीदास कृत रामचरितमानस में नहीं, बल्कि सामाजिक लोक-व्यवहार में प्रचलित जातिगत निंदा का उदाहरण है। जाति भास्कर (1910) और जाति रहस्य जैसे ग्रंथों में 3000 से अधिक जातियों का श्रेणीक्रम दिया गया है। प्रश्न यह है कि क्या यह विभाजन औपनिवेशिक है?

2. साहित्य समीक्षा (Review of Literature)
अंबेडकर (1936) ने Annihilation of Caste में मनुस्मृति को जाति का सैद्धांतिक आधार बताया। मेनू एस. पिल्लई (2022) ने त्रावणकोर के मूलाकरम को लैंगिक कर नहीं, बल्कि जातिगत जनगणना कर सिद्ध किया। पंडित (2023) ने स्कंद पुराण में देवदासी के उल्लेख को धार्मिक वेश्यावृत्ति का वैधीकरण माना है। इस शोध में इन स्रोतों का समन्वय किया गया है।

3. शोध उद्देश्य
1. स्मृति-पुराणों में दलित स्त्री संबंधी दंड-विधान की पहचान। 2. भक्ति काल के दलित संतों की संवेदनशीलता का विश्लेषण। 3. ब्रिटिश सुधारों की भूमिका का तथ्यात्मक मूल्यांकन। 
4. शोध प्रविधि (Methodology)
यह गुणात्मक, ऐतिहासिक-विश्लेषणात्मक शोध है। प्राथमिक स्रोत: मनुस्मृति के मूल श्लोक, स्कंद पुराण - पुरुषोत्तम क्षेत्र माहात्म्य, बंगाल सती रेगुलेशन XVII, 1829। द्वितीयक स्रोत: UGC CARE जर्नल, The Hindu आर्काइव, NDTV/SC-ST एक्ट FIR।

5. विश्लेषण और विवेचना

5.1 स्मृति साहित्य में दलित स्त्री का शोषण
• मनुस्मृति 1.91: "एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् - एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया" अर्थात शूद्र का एक ही कर्म है - तीन वर्णों की सेवा। • मनुस्मृति 4.78-81: "न शूद्राय मतिं दद्यात्... शूद्र शिक्षा के अयोग्य है"।   • मनुस्मृति 8.270: "एकजातिर्द्विजातींस्तु वाचा दारुणया क्षिपन् जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदम्" अर्थात शूद्र यदि द्विज को अपशब्द कहे तो जीभ काट दी जाए।   • मनुस्मृति 3.13: "शूद्रैव भार्या शूद्रस्य" - शूद्र की पत्नी केवल शूद्रा ही हो। अंतर्जातीय विवाह निषेध से दलित स्त्री का विवाह विकल्प सीमित हुआ। • स्त्री के प्रति: "स्वभाव एष नारिणां नराणामिह दूषणम्" - स्त्रियों का स्वभाव पुरुषों को दूषित करना है, अतः उन्हें स्वतंत्र न छोड़ा जाए। 
5.2 पुराण और लोक में शोषण के रूप
• देवदासी: स्कंद पुराण में उल्लेख है कि मंदिर में नाचने वाली कन्या दान करने से स्वर्ग प्राप्त होता है। इसका आरंभ 5वीं सदी में माना जाता है। आधुनिक अध्ययनों में इसे "अनुसूचित जाति की नाबालिग लड़कियों का मंदिर पुजारियों द्वारा यौन शोषण" कहा गया है।   • मूलाकरम (Breast Tax): त्रावणकोर में थलाकरम (पुरुषों से सिर कर) और मूलाकरम (महिलाओं से) नामक जनगणना कर था। निचली जाति की महिलाओं को स्तन ढकने पर यह कर देना पड़ता था। नंगेली ने 19वीं सदी में इसका विरोध करते हुए अपने स्तन काट दिए।   • काशी करवट, गंगावतरण, रथयात्रा: औपनिवेशिक विवरणों में इन आत्मघाती धार्मिक प्रथाओं का उल्लेख मिलता है। 
5.3 संतों की संवेदना - प्रतिरोध का स्वदेशी स्वर
• संत रविदास (चमार), संत चोखामेला (महार) - 14वीं सदी में महाराष्ट्र में चोखामेला ने 70 से अधिक अभंग लिखे जो दलित अनुभव की प्रथम साहित्यिक अभिव्यक्ति हैं।   • कबीर (जुलाहा), नंदनार (परैयर), बसवन्ना - भक्ति आंदोलन में इन्होंने जाति पदानुक्रम को नकारा और आध्यात्मिक समानता का प्रचार किया। डॉ. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक The Untouchables इन्हीं संतों को समर्पित की।   
5.4 अंग्रेजी सुधार - मिथक बनाम तथ्य
• सती उन्मूलन 1829: 1815-18 में बंगाल में सती 378 से 839 हो गई थी। लार्ड विलियम बेंटिक ने राजा राममोहन राय के दबाव में 4 दिसंबर 1829 को रेगुलेशन XVII द्वारा इसे हत्या घोषित किया।   • शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह: ज्योतिराव फुले ने 1848 में शूद्र-अतिशूद्र कन्याओं के लिए और 1852 में महार-मांग बच्चों के लिए स्कूल खोले। उन्होंने सती और बाल विवाह के विरुद्ध अभियान चलाया। ब्रिटिश कानून ने 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित किया।   • घोड़ी-निषेध का वर्तमान: 2026 में भी दमोह (MP) में दिव्यांग दलित दूल्हे को घोड़ी से खींच कर पीटा गया और गुजरात में तलवारों से हमला हुआ। यह सिद्ध करता है कि जातिगत हिंसा औपनिवेशिक नहीं, संरचनात्मक है।   
6. निष्कर्ष
1. भारत में छुआछूत, अशिक्षा, देवदासी, मूलाकरम, सती जैसी कुरीतियाँ शास्त्र-प्रसूत हैं, औपनिवेशिक नहीं। 2. संतों ने सामाजिक चेतना दी, पर विधिक समाप्ति सुधार आंदोलन + औपनिवेशिक विधि से हुई। 3. रेल, डाक, आधुनिक शिक्षा की नींव औपनिवेशिक प्रशासन ने रखी, पर समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व भारतीय संविधान की देन है। 4. समृद्ध राष्ट्र का निर्माण मंदिर नहीं, अस्पताल, स्कूल और रोजगार से होगा। 
7. संदर्भ सूची (References - APA 7th Edition)
• Ambedkar, B. R. (1936). Annihilation of Caste. • Government of India. (1829). Bengal Sati Regulation XVII. Calcutta. • Manu. (2004). Manusmriti (Trans. G. Bühler). Sacred Books of the East, Vol. 25. • Pillai, M. S. (2022). Breast tax debate and Nangeli. The Hindu. • Velivada. (2021). Casteist Verses from Manusmriti. Retrieved from velivada.com • Times Now News. (2023). The Breast Tax That Enforced Caste in Travancore. • NDTV, The Print, Indian Express (2024-2026). Reports on Dalit groom horse-riding attacks in MP and Gujarat. 


Dr Anil Kumar Bhatpahari 
Professor 
Virangna Rmoteen Madiya Modle Women College Narayanpur CG 
anilbhatpahari@gmail.com 

पुरखौती मुक्तांगन में सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ की झलक हो

रजत उत्सव के अवसर पर : पुरखौती मुक्तांगन में मध्य छत्तीसगढ़ की अनुपस्थिति

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 25 किलोमीटर दूर नवा रायपुर बसाया गया है, जो सतनामी बाहुल्य 27 ग्रामों को समाहित कर बना है। यह परिक्षेत्र आरंग विधानसभा के अधीन है। यहाँ मंत्रालय, संचालनालय, विधानसभा, राजभवन तथा मुख्यमंत्री एवं मंत्रियों के निवास हैं। साथ ही अधिकारी-कर्मचारी सहित आम नागरिकों की बसाहट हेतु इसे 33 सेक्टरों में विभक्त किया गया है। वर्तमान में लगभग 5 लाख लोगों की बसाहट की क्षमता से युक्त नवा रायपुर में बस, रेल, अस्पताल, स्कूल-कॉलेज जैसी सभी आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध हैं। साथ ही यहाँ धार्मिक, प्राकृतिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक दर्शनीय स्थल विकसित किए जा रहे हैं, ताकि नागरिकों की आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ स्वस्थ मनोरंजन एवं ज्ञानवर्धन हो सके।

इनमें प्रमुख हैं - पुरखौती मुक्तांगन, जंगल सफारी, आदिवासी संग्रहालय, मॉल, सिनेमागृह और प्रस्तावित फिल्मसिटी।

परन्तु खेद का विषय है कि छत्तीसगढ़ के मध्य भाग की सांस्कृतिक गतिविधियों और जनजीवन को संरक्षित करने वाला कोई प्रखंड या संग्रहालय पुरखौती मुक्तांगन में नहीं है। इस विषय पर चर्चा तक नहीं होती, जबकि इसकी नितांत आवश्यकता है।

छत्तीसगढ़ का वैभव रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, मुंगेली, कवर्धा, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, बलौदाबाजार, बेमेतरा, महासमुंद, धमतरी जिलों में निवासरत करोड़ों लोगों की रहन-सहन, सांस्कृतिक गतिविधियों, मेले-मड़ई, उत्सव आदि की जानकारी हेतु एक स्मारक या संस्थान होना चाहिए। इसकी कमी खलती है। बाहर से आए पर्यटकों, शोधार्थियों एवं अध्येताओं को छत्तीसगढ़ का वास्तविक बोध नहीं हो पाता।

छत्तीसगढ़ प्राकृतिक और भौगोलिक रूप से तीन भागों में विभक्त है - उत्तर में सरगुजा का पाट, मध्य में छत्तीसगढ़ का मैदान और दक्षिण में बस्तर का पठार। पूर्व में महानदी के पावन प्रवाह वाली लरिया अंचल तो पश्चिम में डोंगरगढ़, भोरमदेव, सतपुड़ा-मैकल श्रेणी में अवस्थित चिल्फी घाटी की हसीन वादियाँ हैं। इन सभी क्षेत्रों की भाषा, कला और संस्कृति भी भिन्न है।

प्रदेश की इन विशेषताओं और महत्ता को एक ही स्थान पर कुछ घंटों में सामान्य रूप से समझाने हेतु ही पुरखौती मुक्तांगन की परिकल्पना की गई थी। यहाँ सरगुजा और बस्तर प्रखंड तो हैं, परन्तु मध्य छत्तीसगढ़ का कोई स्वतंत्र प्रखंड नहीं है। इस कारण यहाँ की सांस्कृतिक प्रस्तुति में अनेक कमियाँ नजर आती हैं। बाहरी पर्यटकों को लगता है कि छत्तीसगढ़ केवल आदिम जनजीवन और नाच-गान वाला, अत्यंत पिछड़ा वनांचल राज्य है। मंचीय प्रस्तुतियों में भी लोक-संस्कृति के नाम पर यही भाव प्रदर्शित होते हैं।

जबकि मध्य छत्तीसगढ़ का गौरवशाली एवं सौंदर्यबोधक वस्त्राभूषण, साबुत अनाज पर आधारित खान-पान और रहन-सहन किसी भी राज्य से कमतर नहीं है। यहाँ की भाषा और उसमें उपलब्ध साहित्य-दर्शन अत्यंत उत्कृष्ट है। लोक-कलाएँ विविधतापूर्ण और समृद्ध हैं। किसी राज्य में एक-दो या पाँच लोक-नृत्य होंगे, परन्तु यहाँ स्त्री-पुरुषों के पृथक और युगल दर्जनों नृत्य-शैलियाँ हैं - पंथी, राउत नाचा, करमा, सुआ, शैला, रीलो, बार, सरहुल, ककसार, डंडा, मांदरी, रहस, छैला, देवार नृत्य जैसी विशिष्ट शैलियाँ। शास्त्रीय नृत्य में रायगढ़ घराना और खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय तो लोक और शास्त्रीय संगीत की साधना-स्थली हैं, जहाँ देश-विदेश से कलावंत आते हैं और सीख कर जाते हैं।

अनेक पर्व, उत्सव, मेले-मड़ई, हाट-बाजार यहाँ की पहचान हैं। और जनजीवन तो अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा थोड़े में संतुष्ट, संत-संस्कृति का संवाहक है। यह प्राचीन सहजयान, महायान, नाथ, सिद्ध, शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध, जैन संस्कृति की समन्वय स्थली है, जहाँ आर्य-अनार्य संस्कृति का समागम होता है। दक्षिणापथ के नाम से विख्यात यह सातवाहनों की धरती है, जहाँ अनेक ख्यातिनाम भट्ट और प्रहरी हुए हैं। सम्राट महाशिवगुप्त बालार्जुन, जिनके समय में बुद्ध की प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा राजधानी सिरपुर में हुई, वहीं नागार्जुन, आनंदप्रभु जैसे आचार्य हुए। वल्लभाचार्य, कबीर, धर्मदास, गुरु घासीदास, अमरदास, विवेकानंद, महेश योगी, संत गहिरा गुरु, ओशो, स्वामी आत्मानंद, पवन दीवान जैसे संतों को जन्म और आकार देने वाली यह शस्य-श्यामला धरती है। इसलिए जैसे उत्तराखंड और हिमाचल को देवभूमि कहते हैं, वैसे ही छत्तीसगढ़ को संतभूमि कहा जाता है।

सिरपुर, राजिम, शिवरीनारायण, गिरौदपुरी, दामाखेड़ा, तुमान, ताला, मल्हार, चैतुरगढ़, डमरू, आरंग, रीवा, खल्लारी, चंद्रपुर, डोंगरगढ़, भोरमदेव, रतनपुर, दल्हा, जलेश्वर जैसे ऐतिहासिक-धार्मिक नगरी आस्था के केंद्र हैं। छत्तीसगढ़ में तीन साक्षात त्रिवेणी संगम - राजिम, पैरी-पैरी संगम और शिवरीनारायण में हैं, जहाँ कल्प-कुंभ किए जा सकते हैं, जो अन्यत्र दुर्लभ हैं। कोरबा, भिलाई, चिरमिरी, नगरनार, तमनार जैसे औद्योगिक तीर्थ और गंगरेल, हसदेव जैसे विशालकाय बाँध भी दर्शनीय हैं।

इनके संरक्षक बलिदानी राजाओं में कल्याणसाय, गुरु बालकदास, गेंदसिंह, वीर नारायण सिंह, गुण्डाधूर, मुंदरा मांझी, प्रवीरचंद्र भंजदेव जैसे रत्न हैं।

गौरक्षा आंदोलन (1915) के प्रणेता राजमहंत नयनदास, महिलांग, गुरु गोसाईं अगमदास, जंगल सत्याग्रह के नायकों में बूढ़ान शाह, रामचरण, दयावती कंवर, तो नहर सत्याग्रह में नारायण मेघावाले, छोटेलाल तथा सामाजिक क्रांति और मंदिर प्रवेश के लिए पं. सुंदरलाल शर्मा, पं. मिलऊदास कोसरिया, पं. तुलाराम तुलाई जैसे लोगों के कारण स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि बनी, जिसमें मिनीमाता, राधाबाई, दयावती कंवर, राजमोहिनी देवी जैसी मातृशक्तियों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

कला-जगत में मंदराजी, रामचंद्र देशमुख, महासिंह चंद्राकर, दानी दरबारी, चंपा-बरसन, हबीब तनवीर, शेख हुसैन, देवदास बंजारे, सुकालदास भतपहरी, मेहत्तर साहू, गंगाराम शिवारे, नारायण वर्मा, झाडूराम देवांगन सहित पंडवानी की पुरखिन दाई सुखबती, लक्ष्मी बंजारे, तीजनबाई, सूरज बाई, फिदाबाई, मालाबाई जैसी मौलिक सितारा कलाकार हैं, जिनका अनुसरण कर लोग प्रसिद्धि के शिखर को स्पर्श करते आ रहे हैं।

साहित्यकारों में ठाकुर जगमोहन सिंह, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, पद्मश्री मुकुटधर पांडेय, लोचनप्रसाद पांडेय, मुक्तिबोध, मनोहरदास, द्वारिका प्रसाद तिवारी, हरि ठाकुर, प्रमोद वर्मा, केयूर भूषण, मदनलाल गुप्त, पं. सुकुलदास घृतलहरे, श्यामा प्रसाद बघेल, शानी, लक्ष्मण मस्तुरिया, सुशील यदु, श्यामलाल चतुर्वेदी, लाल जगदलपुरी, हरिहर वैष्णव इत्यादि अनेक साधक हैं।

इन सभी की स्मृतियाँ, मध्य छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएँ और जीवन-स्तर की झलकियाँ भी उक्त ओपन म्यूजियम "पुरखौती मुक्तांगन" में होनी चाहिए, ताकि लोगों को छत्तीसगढ़ की विविधता और एक साथ आदिम जीवन और आधुनिक जीवन-शैली का साक्षात्कार हो सके। प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी के अनुसार - "एक साथ 10वीं और 21वीं सदी की जीवन-शैली देखना हो तो आइए, अमीर धरती के गरीब लोगों की धरती छत्तीसगढ़ में आपका स्वागत है।"

राज्य के पच्चीसवें वर्ष, रजत जयंती के इस पावन अवसर पर यह आवश्यक है कि राज्य की सर्वाधिक बसाहट वाले मध्य क्षेत्र के सांस्कृतिक तत्वों की जाने-अनजाने में अनदेखी न हो और देश के नागरिकों को राज्य के तीनों प्रखंडों के सांस्कृतिक वैभव की झलक पुरखौती मुक्तांगन प्रांगण में सहज दर्शनीय हो। तभी अनेक विरोधाभासों का सम्यक समाधान तलाशा जा सकेगा और सुखी-समृद्ध छत्तीसगढ़ गढ़ा जा सकेगा।

जय छत्तीसगढ़।