Sunday, August 9, 2026

सनदई



सनदई 

अबूझमाड़ आज भी अबूझ ही है। ईरकभट्टी होकर सोनपुर से आगे कुतुल गाँव, जहाँ धूप भी साल के पत्तों से पूछ कर नीचे उतरती है। वहीं की है सनदई।
    माड़िया जनजाति की लड़की जिसने 12वीं पास की थी - 62%। मार्कशीट लेकर जब वह अपने बाबा सोमारू के पास गई, तो जवाब वही मिला जो प्रायः हर अबूझमाड़ की बेटी को मिलता है।

"बहुत पढ़ ली बेटी! अभी इमली का सीजन है, जंगल जाना है।" तेंदू पत्ता से कुछ पैसे जोड़ कर तेरी ब्याह रचाकर पितृ धर्म से उऋण हो,गंगा नहा लूँगा। 

माँ ने कहा - "कॉलेज अपने लोगों के लिए नहीं बना।" 

उस रात सनदई सोई नहीं। दीवार पर टंगी फटी नागरिक शास्त्र की किताब में एक लाइन चमक रही थी - 'शिक्षा हमारा अधिकार है।'

सुबह 4 बजे, जब गाँव सो रहा था, सनदई अपनी बड़े  पिता जी की बेटी और स्कूल में एक क्लास आगे  बुधनी के साथ निकल पड़ी । बुधनी की आठवीं के बाद शादी कर दी थी क्योंकि हाई स्कूल जंगल पहाड़ पार कर ईरकभट्टी जाना होता।  फिर उनके पिता दिन भर सल्फी मंद ताड़ी में चूर रहते थे , माई खेतों में और वनोपज एकत्र कर पास हाट में बेचकर आजीविका चलाती वह उसी में लगी रहती नहीं तो घर में चूल्हा नहीं जलता भला ऐसे में कौन फ़िक्र करता.? उनकी पढ़ाई रुक गई और फिर कुछ दिन बाद ताड़ी की चढ़ी हुई कर्ज़ उतारने ताड़ी वाले अधेड़ के साथ  ब्याह दिए । इस तरह उस भोली मुग्धा को पता ही नहीं कि उनकी जिंदगी कैसे जहन्नम बन गई। वह जोर से हांफती हुई कही- " बहन मैं हूं तेरे साथ ,जल्दी चलों. हाथ पकड़ गंत्वय की ओर बढ़ चली।

 नारायणपुर उनके लिए नया नहीं हैं वह अपने मर्द के साथ कई बार आ चुकी थी साईकिल में सौदा करने। रस्ते में किस्सा सुनाती आश्रम, बंगला पारा कुम्हार कोस्टा पारा और मावली माता मंदिर जिसके नाम पर हफ्ता भर मेला भरता हैं। ऊपर पहाड़ी पर बिराजे दंतेश्वरी और वहां की बड़े बाँध के पास इतवारी बाज़ार की जो इडताफ़ में प्रसिद्ध हैं। सौदागर दूर दूर से आते और वनोपज के बदले घरेलू उपयोग की वस्तुएं बेचते। उनकी बातों में खोई सनदई उत्साह से दौड़ी चली जा रही थी।
  कई किलोमीटर का जंगल, नदी, पगडंडी उखड़ी सड़के । नंगे पाँव, छालों भरे पैर। झोले में दो जोड़ी कपड़े, 12वीं की अंक सूची,जाति- निवास और आधार जो उनकी अपनी अदद पहचान हैं एक साड़ी दुकान की पॉली थीन पैकेट में डाल कर  जी जी अंतर रखी पैदल ही सड़क पर चली जा रही थी... छीन सल्फी का पेड़ और पंखी की कलरव के बीच घरघराती एक मेटाडोर  पास रुकी - जाना  कहां हैं?
नारायणपुर 
बैठो ,दाेनों का 100 रुपए लगेंगे। बुधनी उड़द दाल और घर के मुर्गे -मुर्गी बेचकर 500 की नोट यत्नपूर्वक बचा कर रखी थी ।वक्त जरूरत पर काम आए उसी के भरोसे  वह सनदई को साथ ले कर चल पड़ी थी। 

नारायणपुर पहुँच कर पहला काम मूल अंक सूची आदि  फोटो कॉपी कराई और फोटो भी खिंचाई। पता चला कि वहीं कम्पूटर में आन लाईन  प्रवेश हेतु फॉर्म रजिस्ट्रेशन कराना हैं और उसके लिए करीब 1500 रुपए चाहिए।  अब  विकट संकट कि अजनबी शहर में किससे और कैसे मांगे! असमंजस सी खड़ी रहीं तभी फोटो धूल कर आई देखा कि कलर फ़ोटो में नाक की फुल्ली सुनहरी आभा लिए चमक रही थीं। बुधनी कही कित्ती सुंदर फब रही हो गिया! और उसके कंधे को दबाई..वह बहन ही नहीं सहेली जो थी।
       सनदई हाथ से फुल्ली को छूकर देखी और अपनी नानी की याद न में पल भर खो गई... जब वह सज्ञान हुई तभी उसे वह खुशी खुशी तोहफा दी क्योंकि रजस्वला के समय उत्सव मनाने की प्रथा थी। 
  थोड़ी देर असमंजस सी शून्य में रही.. बुधनी कही क्या हुआ? उसने कही - दीदी मुझे इसे बेचकर पढ़ना हैं और नानी का मान रखना हैं वह चाहती थी कि मैं पढू और मास्टरनी डॉक्टरनी बनू ।उसने बिना पल गंवाए कही तू तो जानती होगी सुनार की दुकान कहां हैं? वे दोनों चल पड़ी 

"इसे बेचना है।"

 एक ग्राम की थी तो 7000 रुपये मिले। आँख में आँसू थे, पर हाथ नहीं कांपे। उसने गहना नहीं बेचीं बल्कि अपनी  खुशी खरीदी थी। 

वीरांगना रमोतीन महिला महाविद्यालय, नारायणपुर में एडमिशन की आखिरी तारीख थी। लाइन बहुत लंबी। काउंटर पर बाबू ने फॉर्म देखा - दो टके कहे क्योंकि एक सा ही जवाब बिना प्रश्न पूछे उन्हें कहना हैं "आदिवासी छात्रावास फुल है, जनरल हॉस्टल में जगह नहीं। अभिभावक को लाओ।"

ऐसे हताश सनदई वहीं जमीन पर बैठ गई। बुधनी अन्य अभिभावक के साथ महाविद्यालय के प्रांगण में लगे काजू पेड़ के छाँव में बैठी हुई थी।तभी हिंदी विभाग के प्रो. भट्ट सर उधर से गुजरे... उन्होंने देखा - एक लड़की, फटे चप्पल, पैरों में छाले, पर गोद में मार्कशीट को ऐसे पकड़े है जैसे कोई ग्रंथ हो।

"कहाँ से आई हो बेटा?"

"कुतुल से सर "
"अच्छा "

"किसके साथ?"

"अकेली, सहेली के साथ।"

सनदई ने सब बता दिया - माता-पिता का मना करना, विद्रोह कर आना बड़ी दीदी का साथ इतनी दूर  आना, नाक की फुल्ली बेचना इत्यादि।

प्रो. भट्ट सर हिंदी पढ़ाते थे, पर उन्होंने सनदई के भीतर की कविता पढ़ ली। वे कुछ बोले नहीं, सीधे उसका हाथ पकड़ कर प्राचार्य कक्ष में ले गए।

"सर, ये बच्ची नहीं, अबूझमाड़ का  सवाल है ।इसका जवाब हमें देना है।"
प्राचार्य भी दयालू थे भले वह प्रशासनिक कठोरता का आवरण ओढ़े होते थे पर है तो इंसान ही।
प्रो. भट्ट सर के सहयोग से ही उसका प्रवेश हुआ। उन्होंने अपने पास के टेबल में फॉर्म की अधूरी जानकारियां  भरी, विषय दिलाए, और खुद अपने हस्ताक्षर से उसकी गारंटी ली।

फिर वे उसे महिला छात्रावास ले गए। अधीक्षिका ने कहा - "भट्ट सर, एक भी कमरा खाली नहीं।"

भट्ट सर ने कहा - "मैडम, एक बेटी जंगल से अपनी जड़ उखाड़ कर आई है ताकि वह पेड़ बन सके। इसे बरामदे में भी जगह दे दीजिए, ये खुद अपनी जगह बना लेगी।"

उनके मार्गदर्शन और जिद के कारण ही उस शाम सनदई को कमरा नंबर 7 में एक बेड मिला। साथ ही एक नियम छात्रावास में बनाई गई कि बिना हॉस्टल में सलेक्शन के जरूरत मंद छात्राओं को एक हाल में रखें और उनसे भोजन आदि बनाने में पारिश्रमिक ले या फिर स्कूल छात्रवृत्ति से किस्त अनुसार न्यूनतम शुल्क ले। 
  

आज सनदई बी.ए. प्रथम वर्ष में है। प्रो. भट्ट सर की कक्षा में वह सबसे आगे बैठती है। उसकी नाक आज सूनी है, पर उसकी कॉपी शब्दों से भरी है।

महाविद्यालय में दीक्षारंभ के दिन प्रो. भट्ट सर ने शिक्षा के महत्व को समझते हुए व्याख्यान देते  अचानक सनदई की ओर देखते हुए कहे  - तुमने अपनी फुल्ली बेची नहीं, बोई है। एक दिन पूरा माड़ तुम्हारी नाक की उस फुल्ली जैसा चमकेगा।"
     हाल तालियों से गूँज उठी ... आवाक सनदई  हतप्रभ सी हुई  ओ समझ नहीं पा रही थी क्या और कैसी प्रतिक्रिया दे कि सहज होती धीरे से मुस्कुरा दी और विनीत भाव से सिर झुका ली। 
     अबूझमाड़ की सनदई ने बता दिया कि उनकी  विद्रोह अंधेरे के खिलाफ हैं और रौशनी के लिए पढ़ रही हैं। दोपहर हो गए थे उन्हें पता हैं कि साल वन से सूर्य किरण छनकर पगडंडी में पड़ रही हैं और पास ही लता लहलहाती हुई साल पेड़ में चढ़ रही हैं।

       डॉ अनिल कुमार भतपहरी
           9617777514  
           नारायणपुर बस्तर 

Saturday, August 8, 2026

स्वाभिमान की सुगंध

*मूलनिवासी दिवस जनजातीय गौरव पर विशेष*  
*स्वाभिमान की सुगंध*

व्यापक अर्थ में देखें तो हम सभी के पूर्वज आदिवासी ही थे। धरती के किसी भी कोने में मनुष्य का विकास इसी रूप में हुआ। कालांतर में भोजन और आजीविका की तलाश में उसका आव्रजन हुआ, इतना ही।

पर जब हम विशिष्ट अर्थ में 'आदिवासी' कहते हैं, तो अभिप्राय उन समुदायों से होता है जिन्होंने आरंभ से एक ही अंचल में निवास किया। एक जैसी भाषा, कला, संस्कृति और रहन-सहन को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजा और बाहरी हस्तक्षेप से अपने को बचाए रखा।

विडंबना यह है कि 'आदिवासी' शब्द का प्रयोग अक्सर दूरी बनाने के लिए किया जाता है। उनके प्रति दिखाई जाने वाली दया या सहानुभूति भी क्षणिक होती है, जैसे किसी पशु-पक्षी के प्रति उमड़ता स्नेह। मैले-कुचैले और अभावग्रस्त जीवन की छवि तथा खान-पान को लेकर एक हिकारत का भाव गढ़ दिया गया है। इसी कारण यह शब्द कई बार उस वर्ग को भी चुभता है। कोई टाई-कोट पहना उच्च शिक्षित अधिकारी भी, यदि उसे 'आदिवासी' कहा जाए तो असहज हो जाता है। यह मेरे कई ST मित्रों का निजी अनुभव है, चाहे मंचों से 'गर्व से कहो' का उद्घोष कितना भी हो।

इसीलिए डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा दिया गया संवैधानिक शब्द - *'जनजाति' या 'अनुसूचित जनजाति'* - अधिक सार्थक और सर्वग्राह्य है। कुछ वर्षों से 'वनवासी' शब्द भी प्रचलन में आया। पर वन में रहने मात्र से कोई जनजाति नहीं हो जाता, यह तो सभी समझते हैं। 'Tribal' का सबसे सटीक हिंदी पर्याय 'जनजाति' ही है। 'अनुसूचित' का आशय उस सूची से है जिसमें वे समुदाय शामिल हैं जो आरंभ से एक ही भू-भाग में निवासरत रहे और जिन्होंने पलायन नहीं किया।

मैदानी क्षेत्रों में अनुसूचित वर्गों के महापुरुषों द्वारा चलाई गई सतत सामाजिक क्रांति का प्रभाव जनजातीय समाज पर भी पड़ा। यहाँ से भी नया नेतृत्व उभरा। जल, जंगल, जमीन के साथ-साथ भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए जन-आंदोलन हुए। यह चेतना शोषण के विरुद्ध थी, अस्तित्व की रक्षा के लिए थी।

छत्तीसगढ़ के संदर्भ में देखें तो अठारहवीं सदी में सतगुरु घासीदास के नवजागरण से प्रेरणा लेकर वीर नारायण सिंह ने अस्मिता की रक्षा हेतु स्थानीय शोषण के विरुद्ध बगावत की। *10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जय स्तंभ चौक में ब्रिटिश सत्ता ने उन्हें तोप से उड़ा दिया।* 

ठीक 3 वर्ष बाद, *27 मार्च 1860 की रात्रि* को उनके बाल-सखा, गुरु-पुत्र राजा गुरु बालक दास को भोजन के बहाने आमंत्रित कर निहत्थे गुरु पर सशस्त्र ठाकुरों की टोली ने हमला कर दिया। अंगरक्षक सरहा जोधाई ने लोटे के जल को उछालकर उसी को हथियार बनाकर विकट युद्ध किया और घायल गुरु को छप्पर फाड़कर खेत तक ले गए। घनघोर युद्ध के बाद *28 मार्च 1860 को गुरु की शहादत* हुई। 

इस प्रकार ट्रांस-महानदी क्षेत्र के ये दोनों महानायक षड्यंत्र के शिकार हुए। उनकी शहादत की गाथा आज भी जनमानस के हृदय-पटल पर स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है।

आज 'मूलनिवासी' शब्द भी तेजी से प्रचलन में है। इस पर अनावश्यक भ्रम फैलाना ठीक नहीं। मूल भावना एक ही है - इस महादेश के मूल निवासियों में स्वाभिमान की सुगंध बनी रहे। इसके लिए उनकी भाषा, कला, संस्कृति, रीति-नीति के साथ-साथ उनके जल, जंगल, जमीन और उनके गाँव, घर, खेत-खलिहान यानी उनकी संपूर्ण 'अस्मिता' का संरक्षण जरूरी है। वे हैं तो हम हैं, और तभी यह दुनिया है।

*जनजातीय गौरव दिवस की हार्दिक बधाई*  
*जय सेवा, जय सतनाम, जय भारत*


 डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
    प्राध्यापक 
वीरांगना रमौतीन माड़िया महिला महाविद्यालय नारायणपुर 

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Thursday, August 6, 2026

असहिष्णुता

प्रायः सहिष्णुता की पाठ पढ़ाते  हैं 
पर अमल में असहिष्णुता लाते  हैं

Sunday, August 2, 2026

गुरु अम्मर दास

#anilbhattcg 

गुरु अम्मरदास जयंती की हार्दिक बधाई -

सतनाम धर्म संस्कृति में गुरु घासीदास एवम् गुरु अम्मरदास द्वारा प्रवर्तित -
           
          अइटका -परब ( असाढ़ गुरु पूर्णिमा )

सतनाम धर्म के प्रवर्तक गुरु घासीदास बाबा  के ज्येष्ठ पुत्र गुरु अम्मरदास जी का जन्म असाढ़ पुन्नी को 1780 के आसपास गिरौदपुरी मे हुआ।वे बाल्यकाल से ही अपने पिता के सदृश्य विलछण. और तेजस्वी  थे। अत्यन्त  प्रतिभाशाली अम्मरदास जी  ७-८ वर्ष के उम्र मे अपनी माता सफूरा के साथ जलाऊ लकडी लाने वन  गये।एकाएक वे वन मे खो गये।किवदन्ती है कि उन्हे शेर उठाकर ले गये।आज भी शेर पन्जा मन्दिर गिरौदपुरी मे स्थित है।जहा सतपुरष या कोई महान योगी या साधक  के भी चरणचिन्ह है कहते है वह शेर पर सवार योग्य बालक के तलाश मे आये और बालक  अम्मरदास को अपने साथ बिठाकर गहन वन मे  चले गये। सफुरा और उनके साथ गई ग्राम्य महिलायें ढूंढती रही पर बालक  नही मिले।पुत्र वियोग से व्याकुल बेसुध हो गई ।
     वही तेजस्वी बालक गिरौदपुरी के आगे महकोनी जंगल स्थित बाघिन गुफा में साधनारत रहें ।१५ -१६वर्ष बाद २१-२२ वर्ष के उम्र मे साधू वेष मे ग्राम तेलासी मे रामत करते गुरु दम्पत्ति को छिन्दहा तालाब पार मे  मिले।
      तब गुरु अम्मरदास अपनी योग साधना की सिद्धी उपरान्त अपने माता-पिता को तलाशते हुये तेलासी पहुचे थे। पुत्र मिलन जगह होने के कारण सद्गुरु को बडा प्रिय लगा और वे यहा दु:खी पीड़ित लोगों की सेवा और उपचार करने लगे। आसपासके अनेक गाँव जिसमें जुनवानी , गिघपुरी मोहगांव,देवगांव ,गैतरा ,भंडार ,कोडापार अमसेना  आदि के लोगों ने गुरु परिवार को बसाने में अपेक्षित सहयोग किए।
      गुरु दम्पति  की ख्याति उनके योग साधना और अनेक दिव्य औषधियों  से असाध्य रोगो के उपचार आदि से सर्वत्र फैलने लगे।दूर -दूर से लोग उनके दर्शन और अपनी दु:ख -पीड़ा  के निदान के लिये आने लगे।
    उपकृत श्रद्धालुओ   द्वारा भेट स्वरूप भूमि अन्न आदि के संरक्षण हेतु तेलासी भन्डार मे बस गये।कलान्तर मे इन दोनो जगहों पर भव्य बाड़ा, मोती  महल व गढी किला नुमा परकोटा  बनवाये गये।जो  सतनाम धर्म का ऐतिहासिक स्मारक है।
         गुरु अम्मरदास जी  तेलासी वासियों के लिये अत्यधिक प्रिय रहे है।कहते है एक व्यक्ति मान्साहार हेतु कपड़े मे लपेटकर मांस ले जा रहे थे।लोग शिकायत किये।गुरु अम्मरदास ने योग बल से लोगो की दृष्टि बदले और जब पोटली खोले तो वह नाड़ियल प्रसाद के रुप मे लोगो को दिखाई दिये ।सभी चमत्कृत हो  गुरु चरण  मे नत हो  क्षमा -याचना किये। गुरु कृपा से अभिभूत तेलासी व अनेक ग्राम के लोग सतनाम दीक्षा लेकर सतनामी बने। यहाँ महासंगम हुआ।
       और उन सभी वर्गो ,जातियो को गुरु ने तस्मई- चीला  बनवाकर एक परात या बर्तन से बटवाये।यही अइटका है।इसके लिये विधान बनाये।बहते जलधारा से चावल दूध घी  गुड़ और मेवा डालकर सात्विक तस्मई ( खीर )बनाकर परस्पर बाटकर खाना।सत्सन्ग प्रवचन सुनना, पन्थी  नृत्य मन्गल करना यहां तक कि‌ सतनाम संस्कृति से संदर्भित लीला व नाट्य मंचन तक होते  रहे हैं।यह तेलासी सहित आसपास के कई ग्रामो मे तब से प्रचलन मे है।
     सफूरा माता  की अनुनय- विनय और बडे़ के रहते छोटे भाई विवाह कैसे करे के चलते न चाहते   प्रतापपुर मे अन्गारमति से अम्मरदास जी का विवाह हुआ।गौना लाए पर वे ब्रम्हचर्य का ही अनुपालन करते रहे और  सतनाम की आध्यात्मिक गुरु के रुप मे ख्यातिनाम हुए।
        ब्रम्हचारिणी  अन्गारमति भी  साध्वी जीवन अन्गीकृत की । आगे चलकर  माता प्रतापपुरहीन के नाम से विख्यात हुई ।आज उनकी शैय्या दर्शनीय है।
    गुरु अम्मरदास सेत सुमन  घोडे़ मे सेत वसन धारण कर चलते और लोगो मे सतनाम की अलख जगाते।पन्थी मन्गल भजन सत्सन्ग का प्रचलन  समाज मे गुरु अम्मरदास जी ने किया।
       एक दिन शिवनाथ नदी के तट पर  चटुआ घाट के समीप मनोरम स्थल पर अपने अनुयायियों को सतनाम समाधि का रहस्य बताते  अउठ दिन (साढे तीन दिन  )की  समाधि मे चले गये। 
     आसपास से बहुत से लोग आ गये।उन भीड़ मे कुछ विरोधी कहने लगे वो मृत हो गये है।उन्हे बाहर लाओ ।अनुयायी भीड़ के आगे बेबस अधुरी साधाना मे उन्हें वापस तन्द्रा मे लाने लगे।पर गुरु नही जगे।
        अन्तत: उन्हे पूर्ण समाधि दे दी गई ।
      जनश्रूति है जब गुरु की समाधि अवधि पूरी हुई तो लोग  देखे कि एक ज्योति पुन्ज समाधि को चीरती ऊर्ध्वगामी आकाश मे विलीन हो गई ।
       कई वर्षों के अन्तराल मे समीपस्थ ग्राम हरिनभठ्ठा के मालगुजार आधार दास सोनवानी अपने पुत्र मनोकामना पूर्ण होने पर गुरु अम्मरदास की समाधि मे भव्य मन्दिर बनवाये।
         आज यह सतनामिओ को  का प्रमुख धाम है जहां पर पौष - छेरछेरा पुन्नी को विशालकाय मेला गुरु के पुण्य स्मरण मे लगते आ रहे है।
          सतनाम आध्यात्मिक चेतना और साहित्य के प्रणेता गुरु अम्मरदास अम्मर रहे।

टीप - सतनाम अइटका परब प्रथम सार्वजनिक आयोजन हैं। कृपया इस पावन पर्व का सार्वजनिक आयोजन अपने अपने ग्राम मुहल्ले व जैतखाम परिसर पर करें। और तस्म ई बनाकार सत्संग प्रवचन व मंगल पंथी आदि‌ का आयोजन करें।
निम्न लिंक पर भावप्रवण मंगल भजन श्रवण कीजिए 
https://youtu.be/N_tROFeLlKQ?si=EwVgnh4B9AlfuhIT

              जय सतनाम।

गुरु पूर्णिमा की मंगलमय‌ मंगलकामनाएं 
 
     डाॅ. अनिल कुमार भतपहरी 
        9617777514 
            संपादक 
        सतनाम संदेश 
प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज

Friday, July 31, 2026

प्रेमचंद: बेहतर व्यक्ति, समाज और देश

प्रेमचंद : बेहतर व्यक्ति से बेहतर समाज और बेहतर देश

                              - डॉ. अनिल कुमार भतपहरी

गोदान, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि, प्रेमाश्रम जैसे दर्जनों उपन्यास और कफ़न, नमक का दरोगा, ईदगाह, पंच परमेश्वर, पूस की रात, ठाकुर का कुआँ जैसी तीन सौ से अधिक कहानियों के रचयिता, बीसवीं सदी के आरंभिक उत्तर भारतीय जन-जीवन के कुशल चितेरे, कथा सम्राट प्रेमचंद को उनकी जयंती पर सादर नमन।

प्रेमचंद की जयंती केवल एक स्मरण नहीं, आत्मावलोकन का अवसर है। प्रश्न यह है कि उनकी भाषा और भाव के निरंतर हो रहे क्षरण को हम कैसे रोकें?

आज हिंदी के सामने दोहरा संकट है। एक ओर उसे जानबूझकर इतना क्लिष्ट बनाया जा रहा है कि वह जन-विमुख हो जाए, दूसरी ओर वैश्विक होने के नाम पर टपोरी हिंग्लिश में गुड़गुड़ाया जा रहा है। प्रेमचंद ने इन दोनों अतियों के बीच का मध्यम मार्ग दिखाया था। उनकी भाषा सरल थी, पर सस्ती नहीं थी। उसमें उर्दू की रवानी, हिंदी की गरिमा और देशज की ठेठकता का अद्भुत संगम था, जिसे किसान भी समझ लेता था और विद्वान भी नकार नहीं पाता था। आज वही मध्यम मार्ग टूट रहा है।

दूसरा बड़ा प्रश्न यह है कि हम उनके यथार्थ-चित्रण से आदर्श गढ़ने में कहाँ चूक रहे हैं? प्रेमचंद यथार्थ दिखाकर छोड़ते नहीं थे। वे उस यथार्थ में से करुणा, परोपकार, सौहार्द और सहिष्णुता का आदर्श निकालते थे। पंच परमेश्वर में स्वार्थी व्यक्ति भी पंच की कुर्सी पर बैठते ही न्यायी हो जाता है। आज हम यथार्थ के चित्रण पर ही अटक गए हैं। मीडिया और बाजार के लिए विद्रूपता को और चटख बनाकर परोसा जाता है, पर उसमें सुधार का भाव गायब है।

यह सोचना भी जरूरी है कि क्या आज का लेखक स्वतंत्र है? क्या वह प्रेस और पत्रिका मालिकों की कृपा से ही छपेगा और उनके इशारे पर ही रचेगा? प्रेमचंद ने स्वयं सरस्वती प्रेस चलाते हुए घाटा सहा, पर समझौते से इनकार किया। आज जब लेखक को छपने से पहले यह सोचना पड़े कि प्रायोजक को यह बर्दाश्त होगा या नहीं, तो साहित्य सम्मेलन विलुप्ति की कगार पर पहुँचेंगे ही।

आज की स्थिति और भी चिंताजनक है। गुलामी के दौर में जब प्रेमचंद ने समाज की विद्रूपताओं को उजागर किया, तब उद्देश्य सुधार था। आजादी के सौ वर्षों के भीतर वह करुणा और सहिष्णुता धनीभूत होनी चाहिए थी, पर वह क्षीण क्यों हो रही है? समाहार की जगह छंटने, कटने और बंटने की नौबत क्यों आ रही है? क्यों हमारा यथार्थ-बोध और प्रगतिशील दृष्टिकोण इतनी जल्दी कथित धार्मिक, सांप्रदायिक और जातीय विद्वेष की गिरफ्त में आ जाता है? हम सीमा पार के खतरे को तो देखते हैं, पर धार्मिक अंतर्कलह और जातीय वैमनस्य के भीतर के खतरे से अनभिज्ञ क्यों हैं?

एक और द्वंद्व हमारे सामने है - आधुनिक विज्ञान और तकनीक बनाम पारंपरिक मिथकीय अवधारणाएँ। क्या उन्नत विचार लोक-परलोक की कहानियों के समक्ष घुटने टेक देंगे? आज का सृजनशील कथाकार पारंपरिक कथावाचकों के भव्य पंडालों में मूक दर्शक बना भजन-कीर्तन में रमा है, इहलोक की चिंता छोड़ परलोक सुधारने में निमग्न है, क्योंकि वहाँ भीड़ है, भव्य आयोजन हैं और बड़े प्रायोजक हैं।

साहित्यकारों के सम्मेलन के कोई आयोजक-प्रायोजक नहीं हैं, क्योंकि वहाँ यथार्थ बर्दाश्त नहीं होता, सत्य लिखने-पढ़ने-बोलने का साहस नहीं होता। प्रायोजित हास्य-व्यंग्य कवि सम्मेलन मंच पर आयोजकों के प्रशस्ति-वाचन और चुटकुलेबाजी को कतई साहित्य नहीं कहा जा सकता। उनसे कोई अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ता। वहाँ भी 20-20 क्रिकेट की तरह केवल ताली और आह-वाह है। वहाँ भी टीमें हैं और कॉरपोरेट घराने कवियों की क्रिकेटरों की तरह खरीद-फरोख्त कर रहे हैं।

ऐसे में डिजिटल माध्यम ने एक नई आशा जगाई है। उसने प्रकाशक की दहलीज वाला पुराना ताला तोड़ दिया है। आज कोई भी युवा गाँव में बैठकर सीधे पाठक से जुड़ सकता है। पर यहाँ भी सेंसरशिप का रूप बदल गया है। पहले संपादक रोकता था, अब एल्गोरिदम रोकता है। एल्गोरिदम को सन्नाटा बर्दाश्त नहीं, उसे तुरंत हँसी या गुस्सा चाहिए। प्रेमचंद का साहित्य धीरे पकने वाला साहित्य है। पूस की रात में हल्कू और जबरा का खेत में ठंड से सिकुड़ना किसी रील में फिट नहीं होता। उसे पढ़ने के बाद सन्नाटा चाहिए।

इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम डिजिटल को केवल छापने की मशीन न समझें, बल्कि उसे अड्डा बनाएँ, जहाँ बहस हो, टोका-टाकी हो, और एक पाठक के खत को हजार लाइक्स से बड़ा माना जाए।

अंततः प्रेमचंद का संदेश अत्यंत सरल है और वही इस आलेख का निष्कर्ष भी है - बेहतर व्यक्ति से बेहतर समाज बनता है और बेहतर समाज से बेहतर देश। प्रेमचंद जयंती पर यही संकल्प हमें करना है।

जय हिंद, जय हिंदी।

     - डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
            प्राध्यापक हिंदी 
वीरांगना रमौतीन माड़िया आदर्श महिला महाविद्यालय नारायणपुर 

चूल और हुदेसना

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चूल और हुदेसना 

पांच हांडी में भात तीन हांडी में दाल पक रहें हैं एक उतर गया हैं या चढ़ाए नहीं हैं। यह नौ मुंहा चूल हैं इसमें लंबी पतली लकड़ी एवं छेना (कंडा) डाला गया हैं। एक लंबी सीधी लकड़ी जिसे हुदेसना कहते हैं बीच- बीच में हुदेसते रहते हैं ताकि आगी रमरम जलता रहें। हुदेसना का आगे का सिरा भी आग से दहकता रहता हैं । इसके द्वारा चूल के किनारे एवं दूर तक जहां आग या आँच न पहुँचे वहां भी ले जाकर जलाया जाता हैं। अधजले छेने को अलटे -पलटे जाते हैं।
       गुरु घासीदास की अंतिम अमृतवाणी इसी हुदेसना के दृष्टांत से जुड़ा हुआ हैं-
     "कोनों मोला कारकों ले बड़े झन कइहा,काबर ओहा मोला हुदेसना म हुदेसन आय।"

चित्र: चूल अब यह विलुप्ति की ओर  हैं हाड़ी तो नंदा ही गए हैं ।इसमें एल्मुनियम की बांगा चढ़े हैं।बचपन में अपने गाँव जुनवानी के बाड़ी में यह चूल  भंडार तेलासी दसरहा,सिरपुर मेला ,शादी ब्याह के समय सगा आने और दादी की दशगात्र ( 1981) पिताश्री के दशगात्र( 2000 )में  देखते रहें हैं। मिट्टी की काली हाड़ी में तेल चुपर कर अंधना देते थे , पके  चावल ( भात)को झौंहा में उलेड़ कर पसाते फिर फरहर भात का झाल बनते थे। इसकी अनुष्ठानिक पूजा कर झाल से  भात वितरण किए जाते थे।
    वैसे झाल के भात का प्रहरी (रखवार) भतप्रहरी हुआ इस तरह गोत्र आया ऐसा एक लोक मान्यता हैं परन्तु भट्टप्रहरी ही अपभ्रंश होकर भतपहरी हुआ हैं।

Thursday, July 30, 2026

वर्षा गीत

येति ओती चारो कोती
 बरसय पानी बन मोती 

घुरगे खपरा चुहत हे छानी
झन पूछ खदर के कहानी 
रदरद रेला बोहे टीपटीप चले ओरवाती 

डोली धनहा  छलकन लागे 
नरवा तरिया उफनन लागे 
चोरोबोरो चारोंमुड़ा होगे चारोंकोती 
 
 बरसा म भींजे आठों अंग 
तन मन म छाए हवे उमंग 
रोपा बियासी मगन माते सवनाही