Saturday, September 26, 2026

राजभाषा मास पर

राजभाषा मास के अवसर में
पिरथी म पहली मनखे आइन तेकर पाछू उनकर बोली/भाखा फूटिन अउ मुहावांही होय लगिन। लोगन मन भोजन, रोजी-रोजगार सेती बगरिन अउ एक दूसर संग मिंझरिन। धीरे-धीरे कुछेक लोगन धनवंता/गुनवंता होगिन राज-पाट मठ मंदिर आश्रम बनाइन इहा के भाखा बोली मन प्रसंस्करण (मानक पन) होय लगिन लिपि के बने ले यही हर राज काज अउ शास्त्र आदि के भाखा बनिस।

माने कि लोक भाखा आदिम काल से उद्धरित हवे उही हर छन के प्रसंस्करण होके लिपिबद्ध होय लगिस पाली प्राकृत संस्कृत फारसी लेटिन इंग्लिश चाइनीज अउ अन्य शास्त्रीय (क्लासिक) भाखा बनिस। ये मन उद्भव ले अवतरे के बाद पछा भागे बर लगे अइसें निथे भलुक धीरे-धीरे इनकर बढ़ोतरी होय लगिन ते पाय के गुनवंता मन कहिथे —

'भाखा के क्रमिक विकास ल समझे अउ समझाय ल परथे कोन्हो भी रुढ़-मुढ़ मान्यता ल माने से बूता न इ बनय।'

सिरतों कहे तो कोनो भी भाखा हर अलौकिक या दैवीय नोहय। ओहर इही लौकिक अउ जमौनी जिनिस होथे। जेन लोक म नान्ही नायक होथे ओकर चरित प्रेरक हो जथे ओकर गुनगान होय लगथे या जो समुदाय शासक वर्ग होथे ओकर आचार विचार बनथे लिखित म आथे ओहर समरिद्ध हो जथे। तहां ले ओकर महिमामय बरनन करे के रिवाज तको बन जाथे।

भाखा के प्रसंस्करण अउ समरिद्धी हर सतत चलैया प्रक्रिया आय। हमर हिन्दी हर दिल्ली अउ मेरठ के बीच राज काज में लगे मनसे मन के स्थानीय बोली अउ शासक वर्ग के भाखा के मिंझरे हुए सरूप आय। एकर सरूप हमन ल अमीर खुसरो ले ले के मध्यकालीन संत कवि परंपरा में दिखथे। फेर सच कहे त हिन्दी हर 1857 के क्रांति के बाद संपर्क भाखा के रूप म स्थानीय शासक अउ प्रभावशाली लोगन के बीच बौराय से आइस।

भारतेन्दु से लेकर प्रेमचंद तक उत्तरोत्तर विकास होय लगिन हमर छायावाद से लेकर प्रयोगवाद तक के नामी कवि लेखक मन बड़ सुघ्घर सरूप दिस। संगे सजग अनेक पत्र-पत्रिका अउ आकाशवाणी फिल्म मन हिन्दी सात समुन्दर पार पहुंचाइन। आज हिन्दी सर्वाधिक बोले जाने वाली भाखा के रूप म प्रतिष्ठित होय के अवस्था म हवय। फेर येहर अब भी राष्ट्र भाखा के रूप म ग्राह्य न इ होय पाय हे ए हर बड़ दुःख के बात आय।

असल में हर राज्य के भाखा ल राजभाखा अउ बहुसंख्यक समुदाय अउ स्वतंत्रता संग्राम के समय संपर्क के भाखा हिन्दी ल राष्ट्रीय भाखा घोषित करे के गंभीर प्रयास होना चाही। अंग्रेजी वैश्विक अउ आधुनिक ज्ञान विज्ञान के भाखा के रूप म प्रतिष्ठित हवय त ओला उही सरूप म अंगीकार करे जा सकत हे भलुक कर चुके हन।

अब पाठ्यक्रम में राष्ट्रीय स्तर म तीन भाखाई सिद्धान्त हवय त एमा राष्ट्रीय भाखा हिन्दी, राजभाखा (जैसे पंजाबी तमिल मलयालम मराठी उड़िया छत्तीसगढ़ी असमिया हर राज के भाखा) अउ अंतरराष्ट्रीय संपर्क भाखा अंग्रेजी म बनाय जाय। प्राचीन क्लासिक भाखा पाली प्राकृत संस्कृत अरबी फारसी आदि ल ऐच्छिक रखना चाहिए।

ऐसे करे से स्थानीय राजकीय भाखा मन के साथ संस्कृति हर तको जतनाही अउ प्रतिभा के समुचित विकास होही। नहि ते मातृभाखा (राजभाखा) ल छोड़ अन्य भाखा म नान्हे लइका मन शिक्षा दे जाही त अपन सीखे समझे उमर 14-15 साल तक ओहर भाखा के चक्कर म फदगे पड़े रही। स्कूल अउ घर के भाखा के चक्रव्यूह म फंस के रहि जाही।

छत्तीसगढ़ के संदर्भ म देखे जाय अबतक इहा ने छात्र मन न हिन्दी के होय सकय न संस्कृत के न अंग्रेजी के। तेन पाय के अखिल भारतीय स्तर म प्रतिभा के कमती केवल भाखाई रूप म ही झलकथे अउ आत्मविश्वास के कमती के सेती शासन प्रशासन म पिछवाय सरीख नजर आथे।

सच तो ए हवय कि — 'जोन समुदाय सचेत रहिथे ओकर सम्हला अउ जनता जथे अउ जोन समुदाय अचेत रथे ओकर भाखा बोली मन नंदावत चले जाथे।'

भाखा-बोली से संस्कृति तको प्रभावित होथे। वर्तमान म छत्तीसगढ़ी संस्कृति शहरी अउ मध्यमवर्गीय परिवार से विदाई होय के कगार म खड़े हवय। एला बचाय खातिर हमर शासन-प्रशासन ल पोठलग्गा अउ ठोसलग्गा बूता करेच ल परही।

डॉ. अनिल भतपहरी, सत श्री ऊँजियार सदन अमलीडीह, रायपुर

राजभाषा मास पर

राजभाषा मास के अवसर में

पिरथी म पहली मनखे आइन तेकर पाछू उनकर बोली/भाखा फूटिन अउ मुहावांही होय लगिन। लोगन मन भोजन, रोजी-रोजगार सेती बगरिन अउ एक दूसर संग मिंझरिन। धीरे-धीरे कुछेक लोगन धनवंता/गुनवंता होगिन राज-पाट मठ मंदिर आश्रम बनाइन इहा के भाखा बोली मन प्रसंस्करण (मानक पन) होय लगिन लिपि के बने ले यही हर राज काज अउ शास्त्र आदि के भाखा बनिस।

माने कि लोक भाखा आदिम काल से उद्धरित हवे उही हर छन के प्रसंस्करण होके लिपिबद्ध होय लगिस पाली प्राकृत संस्कृत फारसी लेटिन इंग्लिश चाइनीज अउ अन्य शास्त्रीय (क्लासिक) भाखा बनिस। ये मन उद्भव ले अवतरे के बाद पछा भागे बर लगे अइसें निथे भलुक धीरे-धीरे इनकर बढ़ोतरी होय लगिन ते पाय के गुनवंता मन कहिथे —

'भाखा के क्रमिक विकास ल समझे अउ समझाय ल परथे कोन्हो भी रुढ़-मुढ़ मान्यता ल माने से बूता न इ बनय।'

सिरतों कहे तो कोनो भी भाखा हर अलौकिक या दैवीय नोहय। ओहर इही लौकिक अउ जमौनी जिनिस होथे। जेन लोक म नान्ही नायक होथे ओकर चरित प्रेरक हो जथे ओकर गुनगान होय लगथे या जो समुदाय शासक वर्ग होथे ओकर आचार विचार बनथे लिखित म आथे ओहर समरिद्ध हो जथे। तहां ले ओकर महिमामय बरनन करे के रिवाज तको बन जाथे।

भाखा के प्रसंस्करण अउ समरिद्धी हर सतत चलैया प्रक्रिया आय। हमर हिन्दी हर दिल्ली अउ मेरठ के बीच राज काज में लगे मनसे मन के स्थानीय बोली अउ शासक वर्ग के भाखा के मिंझरे हुए सरूप आय। एकर सरूप हमन ल अमीर खुसरो ले ले के मध्यकालीन संत कवि परंपरा में दिखथे। फेर सच कहे त हिन्दी हर 1857 के क्रांति के बाद संपर्क भाखा के रूप म स्थानीय शासक अउ प्रभावशाली लोगन के बीच बौराय से आइस।

भारतेन्दु से लेकर प्रेमचंद तक उत्तरोत्तर विकास होय लगिन हमर छायावाद से लेकर प्रयोगवाद तक के नामी कवि लेखक मन बड़ सुघ्घर सरूप दिस। संगे सजग अनेक पत्र-पत्रिका अउ आकाशवाणी फिल्म मन हिन्दी सात समुन्दर पार पहुंचाइन। आज हिन्दी सर्वाधिक बोले जाने वाली भाखा के रूप म प्रतिष्ठित होय के अवस्था म हवय। फेर येहर अब भी राष्ट्र भाखा के रूप म ग्राह्य न इ होय पाय हे ए हर बड़ दुःख के बात आय।

असल में हर राज्य के भाखा ल राजभाखा अउ बहुसंख्यक समुदाय अउ स्वतंत्रता संग्राम के समय संपर्क के भाखा हिन्दी ल राष्ट्रीय भाखा घोषित करे के गंभीर प्रयास होना चाही। अंग्रेजी वैश्विक अउ आधुनिक ज्ञान विज्ञान के भाखा के रूप म प्रतिष्ठित हवय त ओला उही सरूप म अंगीकार करे जा सकत हे भलुक कर चुके हन।

अब पाठ्यक्रम में राष्ट्रीय स्तर म तीन भाखाई सिद्धान्त हवय त एमा राष्ट्रीय भाखा हिन्दी, राजभाखा (जैसे पंजाबी तमिल मलयालम मराठी उड़िया छत्तीसगढ़ी असमिया हर राज के भाखा) अउ अंतरराष्ट्रीय संपर्क भाखा अंग्रेजी म बनाय जाय। प्राचीन क्लासिक भाखा पाली प्राकृत संस्कृत अरबी फारसी आदि ल ऐच्छिक रखना चाहिए।

ऐसे करे से स्थानीय राजकीय भाखा मन के साथ संस्कृति हर तको जतनाही अउ प्रतिभा के समुचित विकास होही। नहि ते मातृभाखा (राजभाखा) ल छोड़ अन्य भाखा म नान्हे लइका मन शिक्षा दे जाही त अपन सीखे समझे उमर 14-15 साल तक ओहर भाखा के चक्कर म फदगे पड़े रही। स्कूल अउ घर के भाखा के चक्रव्यूह म फंस के रहि जाही।

छत्तीसगढ़ के संदर्भ म देखे जाय अबतक इहा ने छात्र मन न हिन्दी के होय सकय न संस्कृत के न अंग्रेजी के। तेन पाय के अखिल भारतीय स्तर म प्रतिभा के कमती केवल भाखाई रूप म ही झलकथे अउ आत्मविश्वास के कमती के सेती शासन प्रशासन म पिछवाय सरीख नजर आथे।

सच तो ए हवय कि — 'जोन समुदाय सचेत रहिथे ओकर सम्हला अउ जनता जथे अउ जोन समुदाय अचेत रथे ओकर भाखा बोली मन नंदावत चले जाथे।'

भाखा-बोली से संस्कृति तको प्रभावित होथे। वर्तमान म छत्तीसगढ़ी संस्कृति शहरी अउ मध्यमवर्गीय परिवार से विदाई होय के कगार म खड़े हवय। एला बचाय खातिर हमर शासन-प्रशासन ल पोठलग्गा अउ ठोसलग्गा बूता करेच ल परही।

डॉ. अनिल भतपहरी, सत श्री ऊँजियार सदन अमलीडीह, रायपुर

Friday, September 25, 2026

गुरुगद्दी पूजा एवं गुरुदर्शन मेला

सतनाम धर्म-संस्कृति का मांगलिक अनुष्ठान:
गुरुगद्दी पूजा एवं गुरुदर्शन मेला महोत्सव (1825-2025 : 200वाँ वर्ष)


डॉ. अनिल भतपहरी
9617777514
सतश्री उंजियार-सदन, अमलीडीह, रायपुर (छ.ग.)

____________________________________________________________

सारांश

प्रस्तुत शोध-पत्र में सतनाम धर्म-संस्कृति के सर्वाधिक प्राचीन एवं वृहद् मांगलिक अनुष्ठान — गुरुगद्दी पूजा महोत्सव एवं गुरुदर्शन मेला — का ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सामाजिक विश्लेषण किया गया है। क्वार शुक्ल एकम से दशमी तक आयोजित दस दिवसीय इस महापर्व की परंपरा 1825 में मोती महल गुरुद्वारा, भंडारपुरी के उद्घाटन एवं राजा गुरु बालकदास के राज्याभिषेक से जुड़ी है। 1860 के बाद बाधित हुई इस परंपरा का 1985 में ग्राम जुनवानी से पुनरुद्धार हुआ। यह अध्ययन इस आयोजन को दुःख-दशहरा पर्व के रूप में व्याख्यायित करते हुए इसके समाज-संगठन, ज्ञान-हस्तांतरण एवं लोककल्याणकारी आयामों को रेखांकित करता है।

1. प्रस्तावना

सतनाम धर्म-संस्कृति में क्वार शुक्ल एकम से दशमी तक आयोजित 'गुरुगद्दी पूजा महोत्सव' और समापन पर भव्य शोभायात्रा का आयोजन, गुरुघासीदास के पुत्र राजा गुरु बालकदास के राज्याभिषेक और उनकी शान में मनाए जाने वाले राज दशहरा पर्व की शोभायात्रा का मांगलिक अनुष्ठान है।

2. आयोजन विधि

क्वार शुक्ल एकम से दशमी तक यह आयोजन होता है। दशमी को सतधरा स्नान कर गुरुगद्दी व सतनाम ज्योत कलश को शोभायात्रा द्वारा सतनाम भवन में स्थापित जोत में समाहित कर देते हैं। दूसरे दिन पंथी नर्तक दल और अखाड़े वाले क्वार एकादशी को गुरुदर्शन मेला, भंडारपुरी जाते हैं। वहाँ हाथी-घोड़ों के भव्य जुलूस, अनेक करतब, पंथी नृत्य और अखाड़ों का प्रदर्शन होता है।

दसवें दिन 'सद्गुरु आसन' की प्रातः शोभायात्रा निकालकर ग्राम की गलियों की परिक्रमा कराई जाती है। सदानीरा नदी-सरोवर के समीप जल-परछन कराकर वापस गुरुद्वारा में अथवा श्रद्धालु अपने घर में आगामी उत्सव तक नित्य पूजा-अर्चना हेतु स्थापित करता है। शाम को तेलासी, अमसेना, खपरी, बोड़सरा, खडुआ आदि गुरु-वंशजों के दर्शनार्थ शोभायात्रा जाती है।

3. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

कुछ विद्वानों के अनुसार यह परंपरा अशोक दशहरा है, जो सतनाम संस्कृति में आंशिक संशोधन के बाद 1820 के बाद प्रचलित हुई। तब साक्षात् गुरुघासीदास इस आयोजन के सूत्रधार थे।

छत्तीसगढ़ में स्थापित सतनाम धर्म का यह उत्सव 1825 से चला आ रहा है, जब मोती महल गुरुद्वारा का उद्घाटन हुआ और राजा घोषित होने के बाद चतुरंगी सेना सजाकर सद्गुरु घासीदास के मंझले पुत्र राजा गुरु बालकदास, भाई आगरदास, पुत्र साहेबदास हाथी पर सवार होकर आमजन के बीच आए और गुरु-उपदेशना व पंथ-संचालन हेतु दिशा-निर्देशन किया।

सन् 1860 में राजा गुरु बालकदास की हत्या, नेतृत्व-शून्यता, भीषण अकाल तथा बोड़सरा बाड़ा व तेलासी बाड़ा के महाजनों के आधिपत्य एवं सामाजिक उथल-पुथल के कारण यह आयोजन स्थगित हो गया। केवल राज-दशहरा, गुरुदर्शन मेले के नाम पर भंडारपुरी में एक दिवसीय होता रहा।

4. पुनरुद्धार (1985)

इसे पूर्ववत तेजस्वी स्वरूप देते हुए नवकलेवर के साथ, भंडारपुरी के समीपस्थ ग्राम जुनवानी में शिक्षक सुकालदास भतपहरी एवं मध्य बाल समाज व युवा जागृति मंच के संयुक्त तत्वावधान में 1985 में दस दिवसीय आयोजन किया गया। उसके बाद गाँव-गाँव में दस दिवसीय गुरुगद्दी पूजा महोत्सव का व्यवस्थित पुनरारंभ हुआ, जो आज सैकड़ों ग्रामों/कस्बों/शहरों में उत्साहपूर्वक मनाया जा रहा है। गुरुगद्दी पूजा महोत्सव के 42वें वर्ष का आयोजन इस वर्ष ग्राम जुनवानी में हो रहा है।

5. गुरुगद्दी पूजा समापन और दुःख-दशहरा पर्व

सतनाम धर्म की चारों शाखाओं और देश-विदेश में निवासरत सतनामियों में गुरुगद्दी पूजा विधान प्रचलित है। गुरुगद्दी सद्गुरु का आसन है, जिस पर आसीन होकर वे अनुयायियों को धर्मोपदेश देते हैं और उनके तमाम उलझनों, परेशानियों और दसों तरह के दुःख-व्याधि के हरण का उपाय बताते हैं — इसलिए यह दुःख-दशहरा पर्व भी है।

दस दिवसीय महापर्व में नित्य प्रातः-सायं आरती-पूजा के साथ संत-महंत-गुरुओं द्वारा ज्ञानवर्धक व्याख्यान, सत्संग-प्रवचन, गुरु ग्रंथ व चरित का पाठ एवं लोक कलाकारों द्वारा प्रेरक व मनोरंजक नाट्य-मंचन, गायन व नर्तन होता है। कहीं-कहीं हर शाम सामूहिक भोग-भंडारा होता है। इस विकट समय में जब फसलें खेत में हैं और अन्नागार खाली होते हैं, साधन-सक्षम लोग अन्नदान कर भंडारा चलाते हैं ताकि गरीब, वृद्ध, महिलाओं व बच्चों को गुरुप्रसादी मिल सके।

6. गुरुदर्शन मेला, भंडारपुरी

दूसरे दिन जगप्रसिद्ध भंडारपुरी गुरुदर्शन दशहरा पर्व हर्षोल्लासपूर्वक मनाया जाता है। इस दिन हाथी, घोड़े, ऊँट, पैदल चतुरंगी शोभायात्रा, गुरु-वंशजों व गुरुगद्दी नशीन धर्मगुरु का उपदेश व प्रवचन होता है। सतनामियों का यह सबसे बड़ा और प्राचीन महोत्सव है, जहाँ गुरुवंशज के घर से गुरुप्रसादी भोग-भंडारा पाकर श्रद्धालुगण धन्य हो जाते हैं। देशभर के लाखों श्रद्धालु एकत्र होते हैं।

7. सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व

इस महाआयोजन से समाज सुसंगठित होता है। उपस्थित गाँवों के मुखिया/प्रतिनिधिगण यहाँ से सीखी-समझी बातों को अपने-अपने ग्रामों में संचालित करते हैं। इसलिए सतनाम संस्कृति में 'गुरुदर्शन मेला' का अतिशय महत्व है। गुरुगद्दी पूजा महोत्सव का आयोजन प्रत्येक सतनामी ग्राम में होना चाहिए। दस दिनों तक सामूहिक आयोजन से लोग सामाजिक व धार्मिक कार्यों में प्रवृत्त होते हैं, संगठित होते हैं और वर्षभर की कटुताओं का समापन होता है। नई पीढ़ी को समृद्धशाली संस्कृति का हस्तांतरण होता है — यही इस आयोजन का प्रमुख उद्देश्य है।

8. निष्कर्ष

1825 से 2025 तक 200 वर्षों की यह परंपरा सतनाम धर्म की जीवंतता, संगठन-शक्ति एवं लोकमंगलकारी चेतना का प्रमाण है। 1985 के पुनरुद्धार के बाद यह महोत्सव पुनः जन-जन का पर्व बन गया है।

संदर्भ / चित्र सूची

चित्र-1: मोती महल गुरुद्वारा, भंडारपुरी (लेखक द्वारा 1993 में स्वकैमरे से ली गई फोटो)

चित्र-2: सद्गुरु आसन, गुरुगद्दी पूजा महोत्सव, अमलीडीह

चित्र-3: गुरुगद्दी पूजा महोत्सव स्थल में गुरु सतखोजन साहेब के साथ आयोजक मंडल, रायपुर

।। जय सतनाम ।।

Thursday, September 24, 2026

बदरिया बरसे भादों में रिमझिम

लेव, पूरा गीत बना दे हौं - पुराना लोकगीत के रंग म -

"बदरवा बरसे भादो म"

- स्थायी -
बदरवा बरसे भादो म रिमझिम
सुरता सजनवा के आए पल छीन
कास फूल फुले सकल महि छाई
बरसा बीते बेगी सजन घर आई

- अंतरा 1 -
ताल-तलैया भर गए, डहर डुबान
पंछी तको जोड़ी म, मोर सुनसान
अंखियां थक गे मोर, राह निहारे
कब ले अइहौ कहिके, दिन ल गिनारे

- अंतरा 2 -
भादो के अंधियारी, बिजुरी चमके
पिया-पिया बोले पपिहा, जिया तरसे
महुआ मोर महके, मन मोर बहके
सपना म आके सजना, काबर छलके

- अंतरा 3 -
धान के बाली झूमे, खेत लहराए
संगी-सहेली सबके, पिया घर आए
मोरो आंगना सूना, तुंही बिन सजना
बेगि आ जा रे, तोर बिन जिया न लागे सजना

 दादरा - कहरवा ताल म

Wednesday, September 23, 2026

अमृतवाणी का परीक्षण एवं संशोधन

सतनामी अमृतवाणी में प्रक्षिप्त अंशों का परीक्षण और संशोधन

कार्यकारी सारांश

प्रचलित 42 अमृतवाणियों की सूची में सम्मिलित वाणी क्रमांक 14 — "ज्ञान पंथ कृपाण के धारा" — गुरु घासीदास की मौलिक वाणी नहीं है। यह गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में दोहा 114 के बाद की चौपाई "ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा" का रूपांतरण है 1 2। इसका भावार्थ मानस में ज्ञानमार्ग की कठिनता के संदर्भ में है, जबकि सतनाम सिद्धांत में ज्ञान का अर्थ समता, सत्याचरण और अंधविश्वास-खंडन है। अतः इसे अमृतवाणी संग्रह से पृथक कर स्रोत-टिप्पणी के साथ परिशिष्ट में रखना उचित है। इसी कसौटी पर कई अन्य प्रचलित वाणियों में भी परवर्ती प्रक्षेप, ब्राह्मणीकरण और भाषिक विकृति के लक्षण मिलते हैं, जिनका प्रगतिशील सतनामी समाज के साहित्य प्रकोष्ठ द्वारा सर्वसम्मत पाठ-संशोधन आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

1. "ज्ञान पंथ कृपाण के धारा" का मूल स्रोत

1.1 मानस में प्रसंग

उत्तरकाण्ड में काकभुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं:

ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा॥
जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई॥

भावार्थ: ज्ञान का मार्ग दोधारी तलवार की धार के समान है; इस पर गिरते देर नहीं लगती 1 2।

यह संवाद भक्ति बनाम ज्ञान की तुलसीदासीय मीमांसा का भाग है, जिसमें अंततः भक्ति की सुगमता प्रतिपादित की गई है।

1.2 सतनामी सूची में प्रवेश कैसे हुआ

प्रचलित 42 अमृतवाणियों की सूची में क्रमांक 14 पर "गियान के पंथ किरपान के धार ये" दर्ज है 3। छत्तीसगढ़ी मौखिक परंपरा में पंथी गायकों और कथा-वाचकों के माध्यम से मानस की पंक्तियाँ लोक में घुल गईं। उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में मुद्रित गुटकों में बिना स्रोत-परीक्षण के इसका समावेश हो गया।

1.3 सैद्धांतिक विरोधाभास

गुरु घासीदास का ज्ञान बौद्ध-सहज परंपरा का "सतबोध" है — पाली "एस धम्मो सनंतनो" की अनुगूंज, अर्थात बैर को अबैर से, अंधकार को प्रकाश से काटना 4। यह ज्ञान दुर्गम तलवार-धार नहीं, बल्कि आचरण में उतारने योग्य सरल सत्य है: "सतनाम ल अपन आचरण में उतारव" और "अंधविश्वास, रूढ़िवाद ल झन मानव" 3। अतः मानस की ज्ञान-भय वाली पंक्ति सतनाम दर्शन के अनुकूल नहीं है।

संशोधन प्रस्ताव: इस पंक्ति को अमृतवाणी की मुख्य सूची से हटाकर "परवर्ती लोक-प्रचलित सूक्ति (स्रोत: रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड)" शीर्षक से परिशिष्ट में रखा जाए।

2. संदिग्ध वाणियों की पहचान की कसौटी

प्रगतिशील सतनामी समाज के साहित्य प्रकोष्ठ की सर्वसम्मति को आगे बढ़ाने हेतु निम्नलिखित पाठालोचन कसौटियाँ प्रस्तावित हैं:

कसौटीविवरण
स्रोत-संगतिवाणी गुरु घासीदास के समकालीन शिष्यों, पंथी गीतों के प्राचीन रूपों या विश्वसनीय पांडुलिपियों में मिलती है या नहीं
सिद्धांत-संगतिसप्त सिद्धांत — सतनाम-निष्ठा, मूर्तिपूजा-निषेध, जातिभेद-खंडन, जीव-हिंसा निषेध, नशा-निषेध, परस्त्री-मातृभाव, चोरी-जुआ त्याग — के अनुकूल है या नहीं 5
भाषा-संगतिछत्तीसगढ़ी/पाली-प्राकृत मूल की सहज छटा बनाम खड़ी बोली-सanskritनिष्ठ परवर्ती शब्दावली
दर्शन-संगतिपुनर्जन्म-खंडन, पुरोहित-माध्यम निषेध और श्रम-प्रतिष्ठा जैसे सतनामी वैशिष्ट्य के अनुरूपता

3. अन्य संदिग्ध वाणियों का विश्लेषण

प्रचलित पाठसमस्याविश्लेषण और प्रस्तावित संशोधन
पानी पीहू छान के, गुरु बनाहू जान केकबीरपंथी दोहा "पानी पीवै छान के" का स्पष्ट अनुकरण; गुरु-महिमा का ब्राह्मणवादी अतिरेकसतनाम में गुरु का अर्थ सतबोध देने वाला मार्गदर्शक है, अवतारी मध्यस्थ नहीं। प्रस्तावित पाठ: "सतनाम ल जानव, समझव, परखव तब मानव" को ही प्रामाणिक रखा जाए 3। इस दोहे को परिशिष्ट में "कबीर-साहब की परंपरा से आई लोकसूक्ति" टिप्पणी सहित रखा जाए
इही जनम ल सुधारना साँचा ये (पुनर्जन्म के गोठ झूठ आय) — विकृत व्याख्या सहितकुछ संस्करणों में इसे कर्मकांडीय पुनर्जन्म-स्वीकृति से जोड़ा गयागुरु घासीदास की मूल स्थापना इहलोकवादी है: इसी जीवन का सुधार ही सत्य है। ब्राह्मणवादी परलोक-भय जोड़ने वाले अंश हटाए जाएँ। मूल भाव: "इही जनम ल सुधारव, सतकर्म ही पूजा आय"
मोर ह सब्बो संत के आय अउ तोर ह मोर बर कीरा येसंत-महिमा के नाम पर गुरु को ईश्वर-तुल्य अतिमानव बनानासप्त सिद्धांत में सतनाम पर अडिग विश्वास है, व्यक्ति-पूजा नहीं 5। यह पंक्ति मूर्तिपूजा-निषेध और समता-सिद्धांत के विरुद्ध जाती है। इसे हटाकर "जतेक हव सब मोर संत आव" के समतावादी पाठ को रखा जाए
तरिया बनावव, कुआँ बनावव... फेर मंदिर बनई मोर मन नई आवयउत्तरार्ध में कुछ मुद्रणों में "मंदिर" को "धर्मशाला" से बदलनामूल निषेध मंदिर-संस्कृति का है, जो सतनाम के निराकार-सत्य बोध के अनुकूल है 3। प्रक्षिप्त नरम पाठ ("धर्मशाला") हटाकर मूल कठोर पाठ पुनः स्थापित किया जाए
जइसे खाहु अन्न वैसे बनही मनआयुर्वेदीय-वर्णाश्रमी आहार-शुद्धि सिद्धांत का प्रवेशगुरु घासीदास का बल श्रम के रोटी ("मेहनत के रोटी ह सुख के आधार आय") और मद्य-मांस निषेध पर है, आहार-जातिवाद पर नहीं। इसे सीमित टिप्पणी के साथ रखा जाए, सिद्धांत न बनाया जाए

4. साहित्य प्रकोष्ठ की सर्वसम्मति को आगे बढ़ाने हेतु सुझाव

  1. त्रिस्तरीय संग्रह प्रकाशित हो: (क) प्रामाणिक अमृतवाणी — सप्त सिद्धांत से सत्यापित; (ख) परिशिष्ट — लोकप्रचलित पर संदिग्ध सूक्तियाँ स्रोत-टिप्पणी सहित; (ग) त्याज्य प्रक्षेप — सिद्धांत-विरुद्ध अंश।
  2. पांडुलिपि सर्वेक्षण: गिरौदपुरी, भंडारपुरी और पंथी गायकों के घरानों से पुरानी पोथियों, पंथी गीतों के बोल और ब्रिटिश-कालीन गजेटियर विवरणों का तुलनात्मक संकलन किया जाए।
  3. भाषा-परिशोधन: खड़ी बोली में संस्कृतनिष्ठ किए गए पाठों को छत्तीसगढ़ी मूल की ओर लौटाया जाए, क्योंकि छत्तीसगढ़ी पाली-प्राकृत का ही स्वरूप है और शिलालेखों में इसका साक्ष्य सुरक्षित है 4।
  4. पाठ्यपुस्तक टिप्पणी: प्रत्येक अमृतवाणी के साथ सप्त सिद्धांत से संबंध, स्रोत और प्रक्षेप-आशंका की संक्षिप्त टिप्पणी दी जाए ताकि आगामी पीढ़ी अंधानुकरण न करे।

निष्कर्ष

"ज्ञान पंथ कृपाण के धारा" निस्संदेह रामचरितमानस की पंक्ति है, गुरु घासीदास की अमृतवाणी नहीं। इसे हटाना किसी परंपरा का अपमान नहीं, बल्कि सतनाम परंपरा की शुद्धि है। यही दृष्टि अन्य संदिग्ध वाणियों पर लागू होने से सतनाम साहित्य अपने मूल इहलोकवादी, समतावादी और अंधविश्वास-विरोधी स्वरूप में पुनः प्रतिष्ठित होगा — जैसा प्रगतिशील सतनामी समाज के साहित्य प्रकोष्ठ ने वर्षों पूर्व सर्वसम्मति से स्वीकार किया था। उस सर्वसम्मति को मुद्रित, प्रचारित और पाठ्यक्रमों में स्थापित करना ही इस समय का कर्तव्य है।

Sources

1 Bhavpath Seva Sansthan — Uttar Kand PDF
2 Scribd — Uttarkand in Hindi Chaupaai With Meaning
3 Lalluram — Guru Ghasidas Jaynti: 7 principles and 42 Amritvani
4 Anil Bhatpahari — Satnam hi Sanatan hain
5 Wikipedia — Guru Ghasidas


Saturday, September 19, 2026

सतनामी अनुसूचित जाति के श्रेणी में: एक अध्ययन

अनुसूचित जाति वर्ग में सतनामी को सम्मिलित करने से जो पेशागत भ्रम  निर्मित हुआ हैं और सामाजिक भेदभाव के साथ बहुसंख्यकों द्वारा प्रायोजित दमन दलन हुआ हैं उन्हें  समझे बिना सामाजिक न्याय अधूरा है
भारतीय समाज में ‘अनुसूचित जाति’ को प्रायः एक समान वर्ग समझ लिया जाता है। आरक्षण और कल्याणकारी सुविधाओं के कारण यह भ्रम और गहरा हुआ है कि इस सूची में सम्मिलित सभी समुदायों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एक जैसी रही होगी। वस्तुतः सत्य इससे भिन्न है। ब्रिटिशकालीन जनगणनाओं और तत्कालीन आंदोलनों को ध्यान से देखें तो स्पष्ट दो धाराएं दिखाई देती हैं — एक अस्पृश्य (Untouchables) मानी गई जातियों की, और दूसरी दबाई गई (Depressed Classes) जातियों की।
ब्रिटिश काल में शब्दों का वर्गीकरण
1911 की जनगणना में अंग्रेजों ने पहली बार जातियों की गणना धर्म और सामाजिक स्थिति के आधार पर की। 1916 में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में यह स्पष्ट किया गया कि शासकीय दस्तावेजों में ‘Depressed Classes’ शब्द ‘Untouchables’ के पर्याय के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा है, क्योंकि ‘Untouchable’ शब्द से ठेस पहुँचती है।

कागज पर दोनों शब्द एक कर दिए गए, पर जमीनी सच्चाई दो प्रकार की थी।

1. अस्पृश्य माना गया वर्ग
ये वे जातियां थीं जो हिन्दू वर्ण-व्यवस्था के भीतर होते हुए भी अस्पृश्यता का दंश झेलती थीं। इनके पारंपरिक कार्यों को अशुद्ध माना गया — जैसे मैला और नाली की सफाई करने वाले मेहतर, भंगी, डोम; चमड़े का कार्य करने वाले चमार, मोची; वस्त्र धोने वाले धोबी; कुछ क्षेत्रों में केशकर्तन करने वाले नाई; शव उठाने और मृत पशु उठाने वाले समुदाय। इन्हें छूना पाप माना जाता था। इन्हें गांव के बाहर बसाया जाता था, कुएं से जल लेने और मंदिर में प्रवेश से वंचित रखा जाता था।

2. दबाया गया वर्ग — Depressed Class
ये समुदाय अस्पृश्यता वाले पेशे नहीं करते थे, फिर भी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से जानबूझकर दबा दिए गए। इसके दो प्रधान कारण थे।

पहला, वैचारिक अस्वीकृति। इन्होंने ब्राह्मणवादी रीति-नीति और पुरोहितवाद को मानने से इनकार कर दिया। इनकी अपनी उपासना-पद्धति, अपने देवी-देवता और अपने धर्मगुरु थे — जैसे आदिवासी मूल के अनेक समुदाय, कबीरपंथी, सतनामी। ये वेद-पुराण और पुरोहित की सत्ता को अंतिम प्रमाण नहीं मानते थे।

दूसरा, अधिकार की मांग पर दमन। जब इन समुदायों ने भूमि, मजदूरी और बराबरी की बात उठाई, तो गांव की प्रभावशाली जातियों ने मिलकर इनका सामाजिक बहिष्कार किया, बेदखल किया, मजदूरी बंद की और अमानवीय व्यवहार किया।

इसीलिए इन्हें ‘Depressed’ कहा गया — अर्थात् सुनियोजित रूप से दबाया गया वर्ग।

बाद में 1930 में स्टार्टे समिति और साइमन कमीशन ने इस वर्गीकरण को और उलझा दिया। कभी आदिवासियों को, कभी पिछड़ी जातियों को भी इसी श्रेणी में गिना गया। अंततः 1931 की जनगणना के आधार पर भारत शासन अधिनियम 1935 बना, जो 1937 में लागू हुआ। उसी अधिनियम की Depressed Classes की सूची ही आगे चलकर अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) कहलाई।
छत्तीसगढ़ में सतनामी : दलन के विरुद्ध स्वाभिमान का इतिहास
इस प्रसंग में छत्तीसगढ़ के सतनामी समुदाय का उदाहरण अत्यंत महत्वपूर्ण है।

गुरु घासीदास जी ने घोर तपस्या से प्राप्त आत्मज्ञान के बाद गिरौदपुरी के वन्य ग्राम से सतनाम के सप्त सिद्धांतों का उपदेश दिया। यहीं छत्तीसगढ़ की धरती पर प्रथम जातिविहीन समुदाय ‘सतनाम पंथ’ की स्थापना हुई।

इतिहासकारों के अनुसार सतनामी मूलतः खेतिहर कृषक थे। उन्होंने जाति-व्यवस्था का त्याग कर हिन्दू व्यवस्था के भीतर ही एक नये पंथ का निर्माण किया। उनका उद्देश्य श्रमिकों और भूमिदासों की सामाजिक स्थिति सुधारना तथा उन्हें बहुदेववाद, पुरोहितवाद और अनेक कर्मकांडों से मुक्त कर एकेश्वरवादी ‘सतनाम’ की उपासना से जोड़ना था।

जिसने पूर्व मान्यताओं को नहीं माना, उसे दबाया गया, बहिष्कृत और तिरस्कृत किया गया। यह ‘Depressed’ की परिभाषा में पूर्णतः बैठता है।

यही कारण है कि जब सतनामियों को उनके मूल कृषि-कर्म के स्थान पर पौनी-पेशा कार्य करने वाला कहकर संबोधित किया जाता है, तो समुदाय प्रखर विरोध करता है। आजादी के बाद भी जब कभी गजेटियरों या दस्तावेजों में भ्रामक जानकारी के आधार पर नये रचनाकार या शोधार्थी ऐसा लिखते हैं, तो भावनाएं आहत होती हैं। उल्लेखनीय है कि 1926 में ही विवादित जाति-संज्ञा को शासकीय दस्तावेजों से विलोपित करने का आदेश तत्कालीन गवर्नर बटलर एवं विल्सन के हस्ताक्षर से जारी हो चुका था, जिसकी प्रतियां सर्वत्र उपलब्ध हैं और उसी आधार पर शासकीय कार्य संपादित होते आ रहे हैं।

इतिहास का एक मार्मिक मोड़ यह भी है कि सतनामी दबाने से दबे नहीं, बल्कि उनके प्रभाव में कुछ अस्पृश्य मानी जाने वाली जातियां आने लगीं। तब सभी हिन्दू जातियों ने मिलकर सतनामियों से ही छुआछूत का व्यवहार करना आरंभ कर दिया।
जनगणना की राजनीति और हिन्दू महासभा
ब्रिटिश काल में जब मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा का गठन हुआ और संख्या-बल के आधार पर बड़े नेतृत्व उभरने लगे, तब हिन्दू महासभा ने दबाए गए समुदायों को साथ लेने की रणनीति अपनाई। अंग्रेजों के समक्ष हिन्दुओं की जनसंख्या न घटे, इस उद्देश्य से सिख हिन्दू महासभा, सतनामी हिन्दू महासभा जैसे संगठन बनाए गए।

1932 के कम्युनल अवार्ड और उसके बाद हुए पूना समझौते (यरवदा पैक्ट) में Depressed Classes के लिए पृथक निर्वाचक मंडल का प्रश्न उठा था। उसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में यह संगठनात्मक प्रयास हुआ था।
निष्कर्ष
आज अनुसूचित जाति एक कानूनी-प्रशासनिक श्रेणी है, जिसका आधार 1935 का अधिनियम है। उसके अंतर्गत कल्याण और मुख्यधारा में लाने हेतु विशेष प्रावधान किए गए हैं। परंतु उसके भीतर दो ऐतिहासिक धाराएं स्पष्ट हैं — एक वह जिसे पेशे के कारण अशुद्ध ठहराकर अस्पृश्य माना गया, और दूसरी वह जिसे स्वतंत्र विचार और अधिकार की मांग के कारण जानबूझकर दबाया गया।

छत्तीसगढ़ के सतनामी दूसरी धारा के सबसे बड़े और जीवंत उदाहरण हैं। इस भेद को समझे बिना न तो इतिहास का सही मूल्यांकन संभव है, न ही सामाजिक न्याय की सार्थक बहस।

  डॉ.अनिल कुमार भतपहरी 
       9617777514
जुनवानी अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़ 

अक्षुण्य पुण्यम ( हास्य व्यंग्य एकांकी)

[पर्दा उठता है। मंच दो भागों में बँटा है। एक ओर चित्रगुप्त का दफ्तर, बड़ी बही। दूसरी ओर "स्वर्ग चखना सेंटर" का बोर्ड लगा ठेका-स्टाइल ढाबा। सूत्रधार आता है।]

सूत्रधार : देवियों और सज्जनों! आज का विषय है गूढ़ दर्शन — क्षुण्य क्या, अक्षुण्य क्या? हमारे ऋषियों ने कहा — जो क्षय न हो, वही अक्षुण्य। और हमारे व्हाट्सऐप ऋषियों ने इसका नव-भाष्य किया है। प्रस्तुत है — चार्वाक पुनरागमनम्!

[अंक 1 : चित्रगुप्त का दफ्तर]

चित्रगुप्त : भोलाराम! तुम्हारे खाते में पुण्य शून्य है। न दान, न तप, न विद्या। सिर्फ उधारी है!

भोलाराम : (हाथ जोड़कर) हुजूर, पर मैंने सुना है — जो अक्षुण्य है, वही पुण्य है।

चित्रगुप्त : किसने कहा?

भोलाराम : नवल शर्मा जी ने कहा — धन अकलंक है, अप्सरा अकलंक है। फिर एक और ज्ञानी पधारे, बोले द्विमूर्ति में मजा नहीं, देवता भी तीन होते हैं — उन्होंने उसमें सुरा जोड़ दी!

यमदूत-1 : (हँसकर) ये कौन-सा शास्त्र है? व्हाट्सऐप पुराण?

भोलाराम : शास्त्र नया है हुजूर, पर तर्क पुराना है। चार्वाक कह गए हैं — यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्! सुनिए मेरा तर्क —

सुरा छीजती है, बोतल खाली होती है। सुंदरी छीजती है, उम्र ढलती है। धन छीजता है, खर्च होता है।

चित्रगुप्त : तो ये अक्षुण्य कैसे हुए?

भोलाराम : हुजूर, चीजें छीजती हैं, पर उनकी लत नहीं छीजती! बोतल खत्म, लत बाकी। नोट खत्म, लालच बाकी। सुंदरी बूढ़ी, नज़र बाकी। सिद्ध हुआ — असली अक्षुण्य आनंद है, और आनंद की लत ही पुण्य है!

[अंक 2 : स्वर्ग की मार्केटिंग]

[नवल प्रवेश करता है। हाथ में पम्पलेट — "स्वर्ग में आइए, सब अक्षुण्य पाइए"]

नवल : भोलाराम जी, एकदम सही पकड़े हैं! इसीलिए तो लोग स्वर्ग की लाइन में लगे हैं। पृथ्वी पर ट्रेलर देख लिया, अब पूरी फिल्म देखनी है!

स्वर्ग में —
• अप्सराएँ अमरत्व प्राप्त हैं — कभी बूढ़ी नहीं होंगी, कभी "मूड नहीं है" नहीं कहेंगी! • इंद्रासन का वैभव अक्षुण्य — कुर्सी छिनने का डर नहीं, चुनाव नहीं, विपक्ष नहीं! • और सोम की नदी बह रही है — बार बंद होने का टेंशन नहीं, ड्राई डे नहीं, पुलिस का छापा नहीं! 
यमदूत-2 : मतलब स्वर्ग एक परमानेंट चखना सेंटर है?

नवल : बिल्कुल! पृथ्वी पर क्षुद्र मानव जीवन का संताप भी क्या है? यहाँ बीवी का ताना, बॉस की डाँट, महँगाई की मार। वहाँ नो टेंशन, ओनली अटेंशन — अप्सराओं का!

भोलाराम : (आँखों में चमक) तो मेरा पुण्य यही हुआ कि मैंने पृथ्वी पर अभ्यास किया?

चित्रगुप्त : अभ्यास? तुमने तो उधारी में पी थी!

भोलाराम : हुजूर, उधारी में पीना भी तपस्या है! साहूकार का ताना सहकर भी नशा कायम रखना — क्या यह तप नहीं? पत्नी की गालियाँ सुनकर भी सौंदर्य निहारना — क्या यह साधना नहीं?

[अंक 3 : चखना सेंटर में दर्शन]

[रोशनी मंच के दूसरे हिस्से पर। टेबल पर मसाला पापड़। प्रबुद्ध-1, प्रबुद्ध-2 बैठे हैं।]

प्रबुद्ध-1 : (पापड़ तोड़ते हुए) देखो भाई, नवल जी ने कहा — धन अकलंक, अप्सरा अकलंक। तुमने बेकार में सुरा घसीट ली।

प्रबुद्ध-2 : घसीटा नहीं, न्याय दिलाया है। बिना सुरा के ज्ञान अधूरा है। चखना सेंटर में बैठकर तुम चाय पर ज्ञान दोगे?

वेटर : सर, दो कटिंग?

प्रबुद्ध-1 : नहीं, दो लस्सी। हम प्रबुद्ध हैं, सुरा-सुंदरी से ऊपर।

प्रबुद्ध-2 : वाह! चखना सेंटर में लस्सी? ये तो मंदिर में जाकर चिकन टिक्का माँगने जैसा है!

प्रबुद्ध-1 : धन अक्षुण्य है। जेब में हो तो इज्जत है, न हो तो प्रबुद्ध भी भिखारी।

प्रबुद्ध-2 : इसीलिए वेटर को पहले पेमेंट दिखाओ, तभी चखना आएगा। (सामने से स्कूटी वाली गुजरती है, प्रबुद्ध-1 की गर्दन घूमती है) अभी-अभी तुम्हारी गर्दन 90 डिग्री घूमी — ये अकलंक सौंदर्य का ही प्रभाव था! गर्दन का मोच पाप है, सौंदर्य नहीं।

प्रबुद्ध-1 : तुम अश्लील हो रहे हो। हम दार्शनिक वार्ता कर रहे हैं।

प्रबुद्ध-2 : और दार्शनिक वार्ता चखना सेंटर में? यही सबसे बड़ा व्यंग्य है भाई! जहाँ मूँगफली के दाने गिने जाते हैं, वहाँ मोक्ष के सिद्धांत बघारे जा रहे हैं।

प्रबुद्ध-1 : अच्छा बताओ, तुम्हारी सुरा अक्षुण्य कैसे?

प्रबुद्ध-2 : (धीमे स्वर में) धन तिजोरी में सड़ता है, अप्सरा फोटो में बूढ़ी होती है, पर सुरा? जितनी पुरानी, उतनी कीमती! 12 साल पुरानी स्कॉच... बुढ़ापा भी यहाँ पुण्य है!

वेटर : सर, चखना खत्म, और लाऊँ?

दोनों एक साथ : हाँ, अक्षुण्य है, लाते जाओ!

प्रबुद्ध-1 : (ज्ञान-मुद्रा में) वैसे सिद्धांत ये है — जो चीज चखने से घटे, वो क्षुण्य। जो ज्ञान बघारने से बढ़े, वो अक्षुण्य।

प्रबुद्ध-2 : मतलब?

प्रबुद्ध-1 : मतलब ये पापड़ क्षुण्य है — खत्म हो गया। पर इस पर हमारी बहस अक्षुण्य है — कल फिर करेंगे!

प्रबुद्ध-2 : वाह! तो सिद्ध हुआ — चखना क्षणभंगुर है, चखना-सेंटर का ज्ञान अक्षुण्य है, और...

दोनों : वेटर! बिल कौन देगा?

[सन्नाटा। दोनों एक-दूसरे को देखते हैं। यही असली दर्शन है।]

[अंक 4 : परसाईयाना मोड़]

[नारद प्रकट होते हैं, वीणा पर 'मोहब्बत' की धुन]

नारद : नारायण! नारायण! ये कैसा पुण्य-परिवर्तन हो रहा है!

नवल : देवर्षि, समय बदल गया है। अब पुण्य वह नहीं जो छीजता न हो। पुण्य वह है जिसकी लत छूटती न हो!

नारद : तो नरक में कौन जाएगा?

चित्रगुप्त : (बही पलटकर) जो सत्य बोलेगा, जो रिश्वत नहीं देगा, जो फाइल नहीं दबाएगा... वैसे मूर्ख अब बचे कहाँ हैं?

भोलाराम : हुजूर, मुझे स्वर्ग दीजिए। मैंने पृथ्वी पर दुख झेला है। अब मुझे अक्षुण्य आनंद चाहिए।

यमदूत-1 : पर भोलाराम, स्वर्ग में भी महँगाई है। एक अप्सरा के अभिसार के लिए 100 पुण्य चाहिए। तुम्हारे पास शून्य है।

भोलाराम : तो क्या मैं फिर से फाइल बनकर लटकूँ?

सब एक स्वर में : यही तुम्हारा असली अक्षुण्य है भोलाराम! पृथ्वी पर फाइल लटकी थी, अब आत्मा लटकेगी। लटकना ही अक्षुण्य है!

[पर्दा गिरता है। पीछे से आवाज — "सोम की नदी में स्नान करने वालों, कृपया अपने पुण्य का टिकट दिखाएँ..."]

सूत्रधार : (आगे आकर) तो देवियों और सज्जनों! सिद्ध हुआ —

सुरा छीजती है, सुंदरी छीजती है, धन छीजता है,
पर उनकी लत अक्षुण्य है!

चार्वाक कह गए — खाओ-पीओ मौज करो,
नवल कह गए — स्वर्ग में इसका एक्सटेंडेड वर्जन देखो,
और प्रबुद्ध कह गए — चखना खत्म हो सकता है,
पर बिल से बचना ही सबसे बड़ा मोक्ष है!

कहा भी गया है — जो अक्षुण्य हो, वही पुण्य है।
अब लत से बड़ा अक्षुण्य क्या होगा?

बोलो — भोलाराम के जीव की जय!

[पर्दा]