Saturday, August 29, 2026

मोतीमहल गुरुद्वारा भण्डारपुरी जीर्णोद्वार

मोती महल सतनाम गुरुद्वारा, भंडारपुरी : 1962 से जीर्णोद्धार की प्रतीक्षा

भंडारपुरी धाम स्थित मोती महल सतनाम गुरुद्वारा के जीर्णोद्धार की चर्चा आज की नहीं है। नीलेश अनंत जी के दादा जी के पास सुरक्षित एक जयंती सूचना पम्पलेट से यह स्पष्ट होता है कि इसकी बातें 1962 से ही होती रही हैं।

1962 में तत्कालीन सांसद मिनीमाता जी के आह्वान पर भंडारपुरी में तृतीय गुरु घासीदास जयंती का भव्य आयोजन किया गया था। उल्लेखनीय है कि 1960 के पूर्व गुरुद्वारा परिसर में जयंती पर्व नहीं मनाया जाता था।

गुरुपर्व की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

18 दिसंबर जयंती की परम्परा का शुभारंभ 1936 में भोरिंग और जुनवानी से हुआ था। इसकी शुरुआत मंत्री नकुल देव ढीढी एवं महंत नंदू नारायण भतपहरी ने की थी, जो आज "गुरुपर्व" के रूप में प्रतिष्ठित है।

जीर्णोद्धार के प्रयास और राजनीतिक उतार-चढ़ाव

अनेक उतार-चढ़ावों के पश्चात वर्ष 1992 में भंडारपुरी मेला सभा में तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने गुरुद्वारा को पुरातत्व विभाग के अधीन लेकर जीर्णोद्धार की घोषणा की। इस अवसर पर भाजपा की वरिष्ठ नेत्री एवं ग्वालियर राजमाता विजयाराजे सिंधिया जी भी उपस्थित थीं। गुरु मनमोहन दास जी ने उन्हें गुरुद्वारा के जीर्ण-शीर्ण स्थलों को दिखाकर जीर्णोद्धार की मांग रखी थी। इस क्षण का मैं (अनिल भतपहरी) स्वयं साक्षी रहा हूँ।

कुछ समय पश्चात बाबरी मस्जिद कांड के बाद उक्त सरकार गिर गई। इसके बाद कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार के कार्यकाल में पुराने ढांचे को ध्वस्त कर पुनर्निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई, जो आज तक अपूर्ण है।

65 वर्षों से उपेक्षित आस्था का केंद्र

वस्तुतः लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र "मोती महल सतनाम गुरुद्वारा" पिछले 65 वर्षों से क्षत-विक्षत अवस्था में है। दोनों प्रमुख सत्तादलों की अनेक सरकारें आईं और गईं, परंतु स्थिति जस की तस बनी रही।

वर्तमान से अपेक्षा

वर्तमान सरकार से बड़ी अपेक्षा है कि उसके शेष कार्यकाल में गुरुद्वारा का लोकार्पण हो सके। इससे हम जैसे प्रणधारियों का यह प्रण पूर्ण होगा कि गुरुद्वारा के पूर्ण होने पर ही मेले में सम्मिलित होंगे। छठवीं पीढ़ी के गुरुवंशज खुशवंत साहेब वर्तमान में कैबिनेट मंत्री हैं, अतः स्वाभाविक है कि वे इस दिशा में सार्थक पहल करेंगे। वर्तमान सरकार धर्म और संस्कृति के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध भी है, इसलिए वर्षों पुरानी यह चाह साकार हो सकती है।

लेखक गुरुद्वारा ढहने के बाद से समीपस्थ ग्राम जुनवानी का निवासी होने तथा शोध कार्यों के कारण वहां जाता रहता है, परंतु प्रण के कारण मेले में सम्मिलित नहीं हुआ है।

संदर्भ : चित्र - नीलेश अनंत जी की फेसबुक वॉल से साभार प्राप्त, यह पम्पलेट उनके दादा जी द्वारा संरक्षित है।

- डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
जुनवानी, आरंग
मो. 9617777514
नवीनतम जानकारी : 21 अगस्त को छत्तीसगढ़ शासन द्वारा भंडारपुरी धाम में गुरुद्वारा (मोती महल) निर्माण हेतु 17 करोड़ 11 लाख 22 हजार रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति प्रदान की गई है।

Friday, August 28, 2026

सतनाम पंथ में सूर्य- चंद्र उपासना और जोड़ा जैतखाम की अवधारणा

सतनाम पंथ में सूर्य-चंद्र उपासना और जोड़ा जैतखाम की अवधारणा : एक सांस्कृतिक अध्ययन
लेखक : डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
सार (Abstract)
सतनाम पंथ केवल एक धार्मिक सम्प्रदाय नहीं, बल्कि सत्य, समानता और प्रकाश की साधना है। इस शोध पत्र में सतनामी समाज में प्रचलित सूर्योपासना, पूर्णिमा को चंद्र-वंदना, और भंडारपुरी-गिरौदपुरी में स्थापित सूरज-चंदा नामक जोड़ा जैतखाम के आध्यात्मिक, योगिक और सामाजिक अर्थों का विश्लेषण किया गया है। 1908 में E.M. Gordon द्वारा लिखित Indian Folk Tales में मिले प्रत्यक्ष अवलोकन को आधार बनाकर यह सिद्ध किया गया है कि सतनाम पंथ की प्रकाश-उपासना निर्गुण निराकार सतनाम की ही अभिव्यक्ति है।
1. प्रस्तावना
भारतीय संस्कृति में सूर्य, चंद्र और तारा मंडल आदिकाल से मानव के प्रेरक और रहनुमा रहे हैं। वे अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं, इसलिए विश्व भर में कई स्वरूपों में पूज्यनीय हैं। गुरु घासीदास बाबा (1756-1836) ने इसी नैसर्गिक प्रकाश-पूंज की आराधना को जाति-पाति और मूर्ति-भेद से मुक्त कर सीधे 'सतनाम' से जोड़ दिया।
2. ऐतिहासिक प्रमाण : 1908 का अवलोकन
इस परम्परा की सबसे पुरानी लिखित गवाही ब्रिटिश मिशनरी और नृविज्ञानी E.M. Gordon की पुस्तक Indian Folk Tales: Being Side-Lights on Village Life in Bilaspore, Central Provinces (1908) के Chapter II - Objects of Worship and Festivals में मिलती है।  

लेखक लिखता है :
"Passing a certain Satnami village early one morning, I noticed an old woman seated at the doorway of her hut facing east. As the sun appeared above the horizon I observed her bowing her head to the ground three times, and repeating the words of salutation enjoined by Ghassi Das - 'Satnam, Satnam, Satnam'; 'True name' she said three times, and this alone was her morning worship."
अर्थात नित्य सुबह शाम सूर्य की ओर मुख कर सतनाम उच्चारण ही सतनामियों की मूल उपासना थी। यही परम्परा आज भी जीवित है।
3. सतनामी उपासना के दो प्रमुख स्वरूप
अ) नित्य सूर्योपासना: प्रातः और सायं सूर्याभिमुख होकर तीन बार सतनाम का उच्चारण। यह मूर्ति पूजा नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष प्रकृति में सत को देखना है। सतनाम का अर्थ ही है - जो सत्य है वही ईश्वर है, और सूर्य उस सत्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

ब) पूर्णिमा में चंदा उपासना: सतनामी समाज में चौका-आरती, भजन प्रायः चौदस और पुन्नी (पूर्णिमा) को ही कराए जाते हैं। पूर्णिमा की रात चंद्रमा की ओर मुख कर सतनाम उच्चारण किया जाता है। यह शीतल प्रकाश की साधना है, जो मन को शांत और स्थिर करती है।
4. जैतखाम का योगिक और सामाजिक दर्शन
आपके द्वारा बताया गया यह चिंतन इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।

सतनामी मान्यता में जैतखाम केवल स्तंभ नहीं है, वह सत्य का खाम (Satya-Stambh) है, सेतखाम, ज्योतिखाम भी कहलाता है।
• योगिक अर्थ: जैतखाम एक ज्योति-पुंज है। जैसे सिद्ध योग साधक में कुंडलिनी जागरण होता है तो वह दीये की ज्योत के समान प्रकाशवान और ऊर्ध्वगामी होता है, उसी के प्रतीकार्थ एक हाथ का निसाना घर के आँगन में स्थापित किया जाता है, जिससे घर आलोकित हो और कल्मष / बुरी शक्ति का दुष्प्रभाव न पड़े। • सामाजिक अर्थ: उसी एक से इक्कीस की बढ़ोत्तरी ही गाँव की गली में विराट 21 हाथ का जैतखाम होता है, ताकि पूरा गाँव प्रकाशवान हो और कल्मष / बुरी शक्ति का असर न हो। अर्थात व्यक्ति से समष्टि तक प्रकाश का विस्तार।  5. सूरज-चंदा जोड़ा जैतखाम : भंडारपुरी मोतीमहल का विशेष महत्व
जोड़ा जैतखाम का अर्थ है - एक ही चबूतरे पर दो स्तंभों की स्थापना। गुरु घासीदास बाबा ने स्वयं भंडारपुरी मोतीमहल गुरुद्वारा में सूर्य और चंद्रमा नाम के दो जोड़ा जैतखाम स्थापित कराए थे, ताकि इस पावन धाम से सर्वत्र लोक-मंगल का भाव मानव समुदाय में विस्तारित हो।  

गिरौदपुरी और भंडारपुरी दोनों ही आज सतनामी आस्था के मुख्य केंद्र हैं, जहाँ जोड़ा जैतखाम स्थापित हैं। यह गुरु की दूरदर्शिता थी कि उन्होंने दिन और रात, दोनों के प्रकाश-स्रोतों को सतनाम का प्रतीक बना दिया।
6. लोक-आरती में अभिव्यक्ति
इसी दर्शन की अभिव्यक्ति पारंपरिक जैतखाम आरती में होती है:
जगमग जोती खाम के, सूरज चंदा नाम हे
आरती मनावव जोड़ा जैतखाम के...
भावार्थ - जैतखाम की ज्योति जगमगा रही है, जिसके दो नाम हैं - सूरज और चंदा। दोनों ही काल के साक्षी हैं, दोनों ही सतनाम के प्रतीक हैं। एक दिन को प्रकाश देता है, दूसरा रात को, पर सत्य अखंड है।
7. निष्कर्ष
सतनाम पंथ में सूर्य-चंद्र की पूजा किसी ग्रह-शांति के लिए नहीं, बल्कि मानव को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने की प्रेरणा के लिए है। गुरु घासीदास जी ने इन नैसर्गिक प्रकाश-पुंजों की आराधना को उनके प्रतीक जैतखाम से जोड़कर एक ऐसा मार्ग दिया जहाँ स्वयं येऔर समुदाय दोनों का कल्याण हो सके।

भंडारपुरी का जोड़ा जैतखाम इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सतनाम पंथ प्रकृति, योग और सामाजिक समता को एक ही सूत्र में पिरोता है।

डॉ.अनिल कुमार भतपहरी 
9617777514

जुनवानी: ब्रिटिश काल से जन जागरण की गौरव- गाथा

ग्राम जुनवानी : सामाजिक चेतना से राजनैतिक चेतना तक
ब्रिटिश काल से जनजागरण की गौरव-गाथा (1937-2026)

लेखक : डॉ. अनिल कुमार भतपहरी (9617777514)
प्राध्यापक, जुनवानी, रायपुर (छत्तीसगढ़)

प्रस्तावना : चार भाइयों का बसाया ग्राम और उसका विशिष्ट महत्व

भतपहरी एवं परिवार जुनवानी - ललवा, नोहरा, भारत, बंशी चार भाइयों द्वारा बसाया गया ऐतिहासिक ग्राम जुनवानी, विकासखंड पलारी, जिला रायपुर आज प्रदेश में विशिष्ट महत्व रखता है।

इस ग्राम में सतनाम पंथ प्रवर्तक गुरु घासीदास, शहीद वीर नारायण सिंह, अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पं. विद्याचरण शुक्ल, छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री श्री अजीत जोगी जैसी प्रसिद्ध हस्तियों का आगमन हुआ है। वहीं डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी के पुण्य स्मरण एवं परिनिर्वाण दिवस पर आयोजन कर दो विपरीत विचारधाराओं में समन्वय की परम्परा भी विकसित हुई है। इनके सूत्रधार रहे ग्राम के बड़े-बुजुर्ग, जिनके आशीष से यह छोटा सा ग्राम आज भी जीवंत है।

किसी आयोजन के समाप्त होने के बाद हम पर्चे, पोस्टर, बैज को बेकार समझकर फेंक देते हैं। लेकिन यही संभालकर रखे जाएँ तो ऐतिहासिक दस्तावेज बन जाते हैं। लगभग 1995 का यह पर्चा - महंत स्व. श्री नंदू नारायण भतपहरी जी की 5वीं पुण्यतिथि (10-11-1995) के अवसर पर आयोजित आमसभा का है (सिन्हा प्रिंटर्स, मोवा, रायपुर द्वारा मुद्रित) - जुनवानी के 90 वर्षीय जनजागरण का साक्ष्य है।

खंड 1 : प्रथम जागरण - बाल समाज (1937)

आजादी के पूर्व 1937 में 'बाल समाज' की स्थापना हुई। प्रणेता द्वय थे - डेढ़ शाला मंत्री नकुल देव ढीढी जी और **महंत नंदू नारायण भतपहरी जी (जन्म 1916)**।

भतपहरी जी एक साधारण कृषक परिवार में जन्मे। ब्रिटिश काल में गीधपुरी मिडिल स्कूल से सातवीं कक्षा में उन्होंने सम्पूर्ण रायपुर जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया। वे अखिल भारतीय सतनामी महासभा (पंजीयन क्र. 65) के प्रथम अध्यक्ष और बाबा साहब के सान्निध्य में शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन, महाकौशल प्रांत के प्रथम अध्यक्ष बने। उनका परिनिर्वाण 1990 में हुआ।

खंड 2 : संसाधन का अनूठा मॉडल (1938-39)

जयंती हेतु 1938-39 में प्रति घर एक बोरा धान एकत्र किया गया - कुल लगभग 50 बोरा। उसे बेचकर रायपुर से बैटरी वाला माइक सेट खरीदा गया, जिसे बैलगाड़ी से भैंसा बस स्टैंड से ग्राम लाया गया। यही माइक क्रांति का साधन बना - आसपास सभाएँ, रैलियाँ, पंथी नृत्य, भजन-कीर्तन, कव्वाली होने लगीं। अंत में मंत्री जी और महंत जी का उद्बोधन होता। रात्रि में पेट्रोमैक्स लगाकर गम्मत-नाच होते थे।

खंड 3 : पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकास

प्रथम पीढ़ी (बाल समाज): चैतू, चैतराम, मनोहर लाल, भुवनलाल, बिहारी लाल, जीवनलाल (सुकालदास), किशन लाल, किसलाल, जोहन लाल, फत्तेलाल, बुधेलाल, राधेलाल, मनीराम, जमुना, साधुराम, कार्तिक, बरातू। ये आगे चलकर वकील, शिक्षक, फौज, बीएसपी जैसी सेवाओं में गए - नवजागरण के असल सिपाही।

द्वितीय पीढ़ी (पंथी पीढ़ी): प्रेमदास, कनकदास, चरणदास, आशा, सुनहर दास, भोकवा, बाठुल, जयनंद, जितेंद्र, पवन, अशोक, सुधारण, कार्तिक, सराधु, हरिश्चन्द्र, मदन। इनकी पंथी पार्टी प्रसिद्ध थी, गिरौदपुरी के मंच पर सम्मानित हुई। इसी पीढ़ी ने दस दिवसीय गुरु गद्दी पूजा की नींव रखी।

तृतीय पीढ़ी - युवा जागृति मंच (1984): 1984 में इंदिरा गांधी जी की हत्या के बाद जनरल प्रमोशन से खाली समय में शिक्षक श्री सुकालदास भतपहरी जी ने पुत्र अनिल भतपहरी के नेतृत्व में 'युवा जागृति मंच' बनाया। सदस्य - चेतन, आत्मा, उभे, शिवकुमार, जैनेंद्र, सुमरन, उजेन, चित्रांगद, नारायण, आजुराम, राजकुमार, संतोष, अरुण, गजाधर, लक्ष्मण, माधो, दिलीप, इतवारी। इन्होंने पाम्पलेट प्रकाशित कर गुरु गद्दी पूजा को व्यवस्थित किया। संचालन सुकालदास जी ने ही किया।

इसी दौर में सुनील भतपहरी (एम.एड) ने जय सतनाम कबड्डी टीम व सतनाम क्रिकेट क्लब बनाया। छोटे भाई सुशील भतपहरी 'क्लोन सचिन तेंदुलकर' के नाम से प्रसिद्ध शानदार बल्लेबाज थे। डॉ. अनिल भतपहरी के मैनेजरशिप में अनेक प्रतियोगिताएँ जीती गईं। सतनाम भवन मेडल-शील्ड से सजा प्रेरणा स्थल बना।

खंड 4 : सामाजिक चेतना से राजनैतिक चेतना

ग्राम में प्राचीन समय से काली फर्शी खदान के व्यवसाय से आर्थिक समृद्धि थी, अतएव नवाचार हुए। सतनाम धर्म के चतुर्थ उत्तराधिकारी धर्मगुरु अगमदास और गुरु महंत नयनदास के गौरक्षा आंदोलन से उत्साहित होकर श्री प्यारी टंडन स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुए और उन्हें आजीवन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पेंशन मिली। वहीं दूसरी ओर डॉ. अम्बेडकर की विचारधारा से समता सैनिक दल का गठन हुआ।

1952 के प्रथम आम चुनाव में मंत्री नकुल देव ढीढी रायपुर लोकसभा से SCF प्रत्याशी बने - पूरा गाँव प्रचार में उमड़ा। बाद में RPI गठन पर महंत नंदू नारायण महाकौशल प्रांत अध्यक्ष बने, पलारी विधानसभा से लड़े और पलारी जनपद पंचायत के उपाध्यक्ष रहे (अध्यक्ष - तिलक वर्मा जी)। उनके बाद एड. भीष्म देव ढीढी महासमुंद लोकसभा और एड. मनोहर लाल भतपहरी रायपुर लोकसभा से RPI प्रत्याशी रहे। म.प्र. शासन में एड. भुवनलाल भतपहरी अनु. जाति आयोग में राज्य मंत्री दर्जा के अध्यक्ष बने।

इसी प्रतिष्ठा से अनेक प्रतिष्ठित परिवारों की रिश्तेदारी जुड़ी। डॉ. शिवकुमार डहरिया जी का ससुराल जुनवानी बना - वे पलारी विधायक और बाद में छत्तीसगढ़ के कैबिनेट मंत्री बने। सुनील भतपहरी जिला पंचायत सदस्य, सरपंच, पानी पंचायत अध्यक्ष रहे। वर्तमान में कैबिनेट मंत्री श्री दयालदास बघेल जी की सुपुत्री भी यहाँ की बहू हैं।

उपसंहार

गुरु घासीदास जयंती, अइटका तिहार, गुरु गद्दी पूजा, पंथी, कबड्डी और क्रिकेट टीमों ने सामाजिक एकता का उदाहरण प्रस्तुत किया। इसी निरंतर शैक्षिक जागरूकता का परिणाम है कि आज ग्राम के प्रायः हर घर से स्नातक, शिक्षक, शासकीय सेवक रायपुर, बलौदाबाजार, महासमुंद, आरंग, खरोरा में फैले हुए हैं।

जुनवानी की यात्रा बताती है - एक बोरा धान से माइक आया, माइक से आवाज आई और आवाज से अधिकार की चेतना जगी।

डॉ अनिल कुमार भतपहरी

Thursday, August 27, 2026

मोतीमहल गुरुद्वारा भण्डारपुरी जीर्णोद्वार की मांग 1962 से

दस्तावेजी संस्मरणक आलेख 

मोती महल सतनाम गुरुद्वारा, भंडारपुरी के जीर्णोद्धार की बातें - 1962 से...

आज नीलेश अनंत जी के माध्यम से उनके दादा जी द्वारा संरक्षित एक ऐतिहासिक दस्तावेज प्राप्त हुआ। यह 18 दिसंबर 1962 को भंडारपुरी में मनाई गई तीसरी गुरुघासीदास जयंती का आम सूचना पाम्पलेट है।

इस पाम्पलेट से स्पष्ट होता है कि भंडारपुरी गुरुद्वारा (मोती महल) के जीर्णोद्धार की चर्चा आज से नहीं, बल्कि 65 वर्ष पूर्व से होती आ रही है।

इस पाम्पलेट की महत्वपूर्ण बातें -

1. तब मिनीमाता जी सांसद थीं। उन्हीं के आह्वान पर अखिल भारतीय सतनामी महासमिति एवं मध्यप्रदेश दलित वर्ग संघ द्वारा भंडारपुरी में तीसरी जयंती का भव्य आयोजन किया गया था। ज्ञात हो कि 1960 के पूर्व तक भंडारपुरी में जयंती नहीं मनाई जाती थी।  2. 18 दिसंबर जयंती की मूल परम्परा 1936 में भोरिंग-जुनवानी से मंत्री नकुल देव ढीढी एवं मेरे पूज्य पिताजी महंत नंदू नारायण भतपहरी ने प्रारंभ की थी, जो आज "गुरुपर्व" के रूप में प्रतिष्ठित है।  3. इस 1962 के पाम्पलेट में ही मुख्य एजेंडा था - "भंडार के मंदिर का जीर्णोद्धार"। 

मेरी आँखों देखी घटना - 1992

अनेक उतार-चढ़ाव के बाद अंततः 1992 में भंडारपुरी मेला सभा में तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा जी ने गुरुद्वारा को पुरातत्व विभाग के अधीन लेकर जीर्णोद्धार की घोषणा की थी। उस मंच पर भाजपा की वरिष्ठ नेत्री ग्वालियर राजमाता विजयाराजे सिंधिया जी भी उपस्थित थीं।

उस अवसर पर परम पूज्य गुरु मनमोहन दास जी ने उन्हें गुरुद्वारा की जीर्ण-शीर्ण स्थिति दिखाई और जीर्णोद्धार की मांग रखी, तब मैं स्वयं (अनिल भतपहरी) वहां उपस्थित था।

दुर्भाग्य से कुछ ही दिनों बाद बाबरी मस्जिद कांड के बाद उनकी सरकार गिर गई। फिर कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार आई और अंततः पुराने ढांचे को ध्वस्त कर पुनर्निर्माण की प्रक्रिया आरंभ हुई, जो आज तक अपूर्ण है।

यानि लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र "मोती महल सतनाम गुरुद्वारा" पिछले 65 वर्षों से क्षत-विक्षत अवस्था में है। दोनों दलों की अनेक सरकारें आईं-गईं, पर हालात वहीं के वहीं हैं।

वर्तमान सरकार से बड़ी उम्मीद है कि उसके शेष कार्यकाल  (जीर्णोद्वार हेतु 17 करोड़ की घोषणा हुई है)में गुरुद्वारा का लोकार्पण हो जाए, ताकि हम जैसे अनेक प्रणधारियों का यह प्रण कि "जब गुरुद्वारा पूर्ण होगा, तभी उस मेले में सम्मिलित होंगे" साकार हो सके। कार्य प्रगति पर हैं इनकी सूचनाएं सोसल मीडिया से मिली हैं।

जय सतनाम। जय गुरुदेव।

- डॉ. अनिल भतपहरी

चित्र: 1962 का मूल पाम्पलेट (नीलेश अनंत जी के वाल से साभार)

#Satnam #GuruGhasidas #BhandarpuriDham #MotiMahal #Chhattisgarh

Wednesday, August 26, 2026

सिरपुर बौद्ध विहार : अस्मिता की तलाश

तीवर देव बौद्ध विहार
Sirpur Heritage • Chhattisgarh • 7th Century
तीवर देव बौद्ध विहार प्रांगण, सिरपुर :
अस्मिता की तलाश 
एक विरासत शोध आलेख • जीरो ग्राउंड से
LIVE FIELD

दक्षिण कौशल के नाम से विख्यात वर्तमान छत्तीसगढ़ अपने सांस्कृतिक समन्वय के लिए भी जाने जाते हैं। ऐतरेय उपनिषद के अनुसार सत्यवंत प्रजाति का स्थली हैं।  जहां उत्तर दक्षिण की आर्य अनार्य संस्कृति की समागम हैं।  सतवहन वंश की शासन में सम्राट विज्जस  भट्टप्रहरी की यश गाथा बुद्ध से जुड़ते हैं। महात्मा बुद्ध का आगमन सिरपुर में हुआ उनके स्वागत में एक सहस्त्र कोसा वस्त्र भेंट किए गए जो भिक्षु संघ के चीवर कषाय नाम से विख्यात हैं। बुद्ध कालीन पाली भाषा और परिक्षेत्र की लोक भाषा कोसली (छत्तीसगढ़ी ) एवं कोसा वस्त्र के आलोक में सुरुचिपूर्ण अनुसंधानात्मक आलेख प्रस्तुत हैं।

A4 • Noto Devanagari
दक्षिण कोसल पुरातत्व शोध पत्रिका
Vol. 07 • 2025 • ISSN 3048-XXXX
Peer Reviewed Article
DOI: 10.XXXX/dk.2025.07.001
☸️ बौद्ध पुरातत्व • भाषिक मानवविज्ञान • सांस्कृतिक निरंतरता

तीवर देव बौद्ध विहार सिरपुर :
दक्षिण कोसल में बौद्ध धम्म, भाषा और लोक-संस्कृति की जीवित निरंतरता

Tivar Dev Bauddha Vihar Sirpur: Living Continuity of Buddhist Dhamma, Language and Folk Culture in Dakshin Kosal

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
ग्राम जुनवानी, सिरपुर समीप, महासमुंद (छत्तीसगढ़) • स्वतंत्र शोधकर्ता, पुरातत्व एवं पाली-छत्तीसगढ़ी भाषाविज्ञान
बालोदबाजार - महानदी तटईंट स्थापत्य
सार / Abstract

प्रस्तुत शोध आलेख में सिरपुर (प्राचीन श्रीपुर) स्थित तीवर देव बौद्ध विहार को केंद्र में रखकर दक्षिण कोसल की बौद्ध परम्परा की राजनीतिक, वास्तुगत, सामाजिक एवं भाषिक निरंतरता का विश्लेषण किया गया है। सोमवंशी राजा तीवरदेव (7-8वीं शताब्दी) के काल में सिरपुर राजधानी थी। ह्वेनसांग के विवरण में 100+ संघाराम एवं 10,000 भिक्षुओं का उल्लेख, पुरातत्व में 10+ विहारों का उत्खनन, और तीवर देव विहार की विशाल ईंट-संरचना इस क्षेत्र को महानदी घाटी के बौद्ध केंद्र के रूप में स्थापित करते हैं। शोध में भतपहरी वंश (शरभपुरीय धारा), सतनामी समाज के बौद्ध मूल्यों (समता, अहिंसा, श्रम-प्रतिष्ठा), और विशेषतः पाली-छत्तीसगढ़ी के 11 जीवित शब्द-प्रमाणों के माध्यम से यह प्रतिपादित किया गया है कि छत्तीसगढ़ी पाली की ही लोक-निरंतरता है। कोसा वस्त्र परम्परा एवं विवाह में भंवराही साड़ी का निर्वाह इस सांस्कृतिक डीएनए का जीवंत प्रमाण है।

मुख्य शब्द:तीवर देव विहारदक्षिण कोसलसोमवंशीह्वेनसांगभतपहरी वंशसतनामीपाली-छत्तीसगढ़ीकोसा परम्परा
“सिरपुर केवल ईंट-पत्थरों का समूह नहीं, यह दक्षिण कोसल की आत्मा है — जहाँ बुद्ध धम्म, स्थानीय लोक-संस्कृति और छत्तीसगढ़ी जनमानस एक ही प्रवाह में मिलते हैं।”— शोध की केंद्रीय अवधारणा

प्रस्तावना एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

दक्षिण कोसल का प्राचीन नगर सिरपुर (श्रीपुर) महानदी के तट पर स्थित है। 7वीं-8वीं शताब्दी ईस्वी में यह सोमवंशी राजाओं की राजधानी था। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग (युवान च्वांग) ने 639 ईस्वी के लगभग सिरपुर की यात्रा कर यहाँ 100 से अधिक संघाराम और लगभग 10,000 बौद्ध भिक्षुओं के निवास का उल्लेख किया है। यह विवरण सिरपुर को तत्कालीन भारत के प्रमुख बौद्ध शिक्षा-केन्द्रों में स्थापित करता है।

स्वतंत्र भारत में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एवं छत्तीसगढ़ राज्य पुरातत्व द्वारा किए गए उत्खननों में सिरपुर से अब तक 10 से अधिक बौद्ध विहार, अनेक स्तूप, ध्यान-कक्ष एवं बुद्ध प्रतिमाएँ प्रकाश में आई हैं। इनमें तीवर देव बौद्ध विहार आकार, विन्यास एवं ईंट-स्थापत्य की दृष्टि से दक्षिण कोसल का सबसे विशाल उत्खनित परिसर है। इसकी योजना — गर्भगृह, प्रदक्षिणा-पथ, भिक्षु-आवास, आँगन एवं प्रवेश-द्वार — बुद्धकालीन महाविहारों की क्लासिक संरचना को दर्शाती है।

महत्व सार (Significance)
  • दक्षिण कोसल का सबसे बड़ा उत्खनित बौद्ध विहार परिसर
  • 7वीं सदी के चीनी विवरण से प्रमाणित
  • सोमवंशी — शरभपुरीय राजनीतिक सांस्कृतिक निरंतरता
  • महानदी घाटी की बौद्ध परम्परा का केंद्र
Archaeological Evidence
तीवरदेव शिलालेख • बालोदबाजार-महानदी तट • विशाल ईंट स्थापत्य (Brick Architecture) • ध्यान कक्ष एवं स्तूप परिसर। उत्खनन से प्राप्त मुद्राएँ, अभिलेख एवं बुद्ध मूर्तियाँ सोमवंशी काल के वैभव को प्रमाणित करती हैं।
Ref: ASI Sirpur Excavation Reports, Hiuen-Tsang Si-Yu-Ki Book V

क्षेत्रीय अनुसंधान : सिरपुर विहार प्रांगण में लेखक एवं बौद्ध भिक्षु संघ

तीवर देव बौद्ध विहार सिरपुर में लेखक एवं बौद्ध भिक्षु
Field Documentation • 2024-25

तीवर देव बौद्ध विहार, सिरपुर के उत्खनित प्रांगण में लेखक डॉ. अनिल कुमार भतपहरी बौद्ध भिक्षुओं के साथ — प्राचीन ईंट संरचना पृष्ठभूमि में

चित्र में 3 बौद्ध भिक्षु (केसरिया/मरून चीवर) एवं 2 शोधकर्ता (कोसा-ताने की जैकेट में लेखक) सिरपुर की प्राचीन ईंट-संरचना के समक्ष। कोसा वस्त्र परम्परा एवं बौद्ध चीवर का यह संगम 1300 वर्षीय सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत प्रमाण है।

चित्र: लेखक का सिरपुर बौद्ध विहार में बौद्ध भिक्षुओं के साथ क्षेत्रीय सर्वेक्षण (2024-25) • Photo: Tivar Dev Vihar Excavated Complex

शोध उद्देश्य एवं पद्धति

उद्देश्य
सिरपुर के बौद्ध विहारों को केवल स्थापत्य अवशेष नहीं, बल्कि जीवित सांस्कृतिक निरंतरता के रूप में स्थापित करना।
पद्धति
पुरालेखीय साक्ष्य, चीनी यात्री विवरण, क्षेत्रीय मौखिक इतिहास, विवाह-परम्परा का सहभागी अवलोकन एवं तुलनात्मक भाषाविज्ञान।
क्षेत्र
सिरपुर-जुनवानी अंचल, सतनामी समाज, भतपहरी गोत्र, छत्तीसगढ़ी लोक-प्रयोग।

अनुसंधान दृष्टिकोण : तीन जीवित कड़ियाँ

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३.१ भतपहरी वंश निरंतरता — शरभपुरीय धारा से कोसा परम्परा तक

जुनवानी - सिरपुर क्षेत्र से जुड़ा भतपहरी वंश, शरभपुरीय वंश की धारा का वाहक माना जाता है। अभिलेखों में उल्लेख है कि सम्राट विज्जस भट्टप्रहरी द्वारा बुद्ध एवं उनके साथ आए भिक्षु संघ को एक सहस्त्र कोसा वस्त्र अर्पण किया गया था। यह केवल दान नहीं, राजसत्ता और बुद्ध धम्म के सह-अस्तित्व का राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रमाण है।

लोक-नृविज्ञान प्रमाण (Ethnographic Evidence)

सतनामियों में खासकर भट्टप्रहरी गोत्र के वैवाहिक रस्म में कोसा की भंवराही साड़ी के बिना विवाह सम्पन्न नहीं होते। यदि कोसा अनुपलब्ध हो तो सूती की सफेद साड़ी को हल्दी एवं सोडा से रंगकर कोसा रंग देकर रस्म अदा की जाती है। यह प्रथा आज तक जीवित है। लेखक के स्वयं के विवाह में भी सिंदूरी पीली कोसा साड़ी एवं कोसे की कुर्ता-पगड़ी-अल्फी धारण की गई थी। यह 1300 वर्ष पुरानी कोसा-दान परम्परा की अविच्छिन्न निरंतरता है।

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३.२ सतनामी समाज में बौद्ध मूल्य — समता, अहिंसा, श्रम-प्रतिष्ठा

सतनामी समाज के मूलभूत मूल्य — समता, अहिंसा, श्रम-प्रतिष्ठा, मानव-मानव एक समान — में बौद्ध धम्म की स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनाई देती है। बाबा घासीदास द्वारा प्रवर्तित ‘सतनाम’ को लेखक बुद्ध धम्म के छत्तीसगढ़ी स्वरूप के रूप में देखता है, जो सच्च (सत्य) और धम्म (कर्तव्य/धर्म) पर आधारित है। यह न केवल दार्शनिक साम्य है, बल्कि महानदी घाटी में बौद्ध से सतनामी तक की सामाजिक रूपांतरण प्रक्रिया का संकेत भी है।

समता = बौद्ध समताअहिंसा = अविहिंसाश्रम-प्रतिष्ठा = सम्मा आजीवसतनाम = सच्च + धम्म
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३.३ पाली-छत्तीसगढ़ी अंतर्संबंध — भाषा कभी मरती नहीं

भाषा केवल संवाद नहीं, सांस्कृतिक डीएनए है। छत्तीसगढ़ी में रोज़मर्रा प्रयुक्त सैकड़ों शब्द धम्म-लिपि पाली से सीधे निःसृत हैं। यह संबंध आकस्मिक नहीं, बल्कि ध्वनि-नियमों (महाप्राण-लोप, द्वित्व-सरलीकरण, स्वर-परिवर्तन) के अनुरूप व्यवस्थित है, जो 1500 वर्षों से जीवित है।

विशेष भाषिक अनुसंधान : पाली - छत्तीसगढ़ी जीवित प्रमाण

भाषा ही विरासत की सबसे बड़ी निरंतरता है। जब शब्द वही रहते हैं, तो संस्कृति भी वही रहती है।

पाली (मूल)छत्तीसगढ़ी (वर्तमान)हिन्दी अर्थभाषावैज्ञानिक टिप्पणी
अग्गआगीआगद्वित्व-सरलीकरण: ग्ग > गी, महाप्राण लोप का अभाव
मनुक्ख / मनख्खमनखेमनुष्यख्ख > खे, उकार > एकार
सुग्गा / सुवसुवातोताग्गा > वा, मध्यम व्यंजन लोप
दईदईमाँपूर्ण संरक्षण, दोनों में समान
पानीयपानीजलअंत्य -य लोप, सीधा संरक्षण
हत्थहाथहाथत्थ > थ, द्वित्व-सरलीकरण
भत्तभातपका चावलत्त > त, अर्थ-विस्तार
घोटक / घोटघोड़ाअश्वप्रत्यय -ड़ा, तद्भव विकास
धम्मधरम / धम्मधर्म / कर्तव्यसतनामी प्रयोग में 'धरम' रूप सुरक्षित
सच्चसचसत्यच्च > च, सतनाम दर्शन का मूल
अप्पअप्पनअपना / आत्मअप्प > अप्पन, सतनाम 'अप्पन' का मूल
निष्कर्ष / अवलोकन

ये शब्द सिद्ध करते हैं कि छत्तीसगढ़ी, पाली की ही लोक-निरंतरता है — धम्म की भाषा आज भी हमारे घर-आँगन में बोली जाती है। पाली के महाप्राण-लोप, द्वित्व-सरलीकरण और स्वर-परिवर्तन के नियम आज भी छत्तीसगढ़ी उच्चारण में सक्रिय हैं। यह 1500 वर्षीय भाषिक अविच्छिन्नता सिरपुर को केवल पुरातत्व स्थल नहीं, जीवित भाषा-प्रयोगशाला बनाती है।

स्रोत एवं पद्धति
  • • पाली कोश (Pali Text Society)
  • • छत्तीसगढ़ी लोक-प्रयोग, सिरपुर अंचल सर्वे 2023-25
  • • क्षेत्रीय विवाह-रस्म अवलोकन
  • • ध्वनि-नियम: Turner, Grierson के तद्भव सिद्धांत

निष्कर्ष एवं विमर्श

तीवर देव बौद्ध विहार केवल अतीत नहीं, यह वर्तमान का दर्पण है। जब हम ‘आगी’, ‘पानी’, ‘हाथ’, ‘भात’ कहते हैं, तो हम अनजाने में उसी पाली को दोहराते हैं जो कभी इन्हीं विहारों में गूँजती थी। हमारी भाषा ही हमारी निरंतरता है — और सिरपुर ही उसका उद्गम। भतपहरी वंश की कोसा-परम्परा, सतनामी समाज के बौद्ध-मूल्य और छत्तीसगढ़ी की पाली-निरंतरता — तीनों मिलकर यह सिद्ध करते हैं कि दक्षिण कोसल में बौद्ध धम्म विलुप्त नहीं हुआ, बल्कि लोक-संस्कृति में रूपांतरित होकर जीवित रहा।

अतः सिरपुर का संरक्षण केवल ईंट-संरचनाओं का संरक्षण नहीं, बल्कि भाषा, रस्म और मूल्य-बोध की जीवित विरासत का संरक्षण है। भविष्य के शोध में आनुवंशिक (DNA), वस्त्र-तकनीक (कोसा बुनाई) और तुलनात्मक धर्म-दर्शन के अंतःविषय अध्ययन की आवश्यकता है।

☸धम्मं शरणं गच्छामि🙏 नमो बुद्धाय! जय सतनाम!

संदर्भ ग्रंथ सूची / References

  1. Hiuen-Tsang, Si-Yu-Ki, tr. Samuel Beal, Book V, Chap. on Kosala.
  2. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, सिरपुर उत्खनन रिपोर्ट 1956-62, 2000-2010.
  3. शरभपुरीय एवं सोमवंशी अभिलेख, छत्तीसगढ़ राज्य संग्रहालय, रायपुर।
  4. Pali Text Society, Pali-English Dictionary, Rhys Davids.
  5. भतपहरी, अनिल कुमार — क्षेत्रीय सर्वेक्षण डायरी, जुनवानी-सिरपुर 2023-25।
  6. सतनामी समाज — मौखिक इतिहास, विवाह-रस्म अवलोकन।
लेखक परिचय
डॉ. अनिल कुमार भतपहरी, ग्राम जुनवानी, सिरपुर समीप, महासमुंद। भतपहरी गोत्र, सतनामी समाज से संबद्ध। दक्षिण कोसल पुरातत्व, पाली-छत्तीसगढ़ी भाषाविज्ञान एवं लोक-संस्कृति के स्वतंत्र शोधकर्ता।
Heritage Research Article
Tivar Dev Vihar Sirpur • Dakshin Kosal
A4 • Noto Serif Devanagari • © 2025
चित्र: लेखक का सिरपुर बौद्ध विहार में बौद्ध भिक्षुओं के साथ क्षेत्रीय सर्वेक्षण (2024-25) • तीवर देव बौद्ध विहार उत्खनित ईंट प्रांगण, सिरपुर
व्यवस्थित शोध आलेख • सार, पद्धति, प्रमाण, निष्कर्ष एवं संदर्भ सहित • A4 प्रिंट-रेडी
Noto Serif Devanagari • Buddhist Heritage Design System