शोध-पत्र
हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर: गजानन माधव मुक्तिबोध
- डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
सार
यह शोध-पत्र मुक्तिबोध के काव्य-व्यक्तित्व को उनकी तीन केन्द्रीय कृतियों - भूल-गलती, अंधेरे में तथा एक साहित्यिक की डायरी के आलोक में परखने का प्रयास है। मुक्तिबोध केवल कवि नहीं, एक संपूर्ण वैचारिक प्रक्रिया हैं। उनके यहाँ कविता आत्म-संघर्ष, आत्म-साक्षात्कार और युग-चेतना का त्रिकोण है। प्रस्तुत पत्र में उनकी फैंटेसी, बिम्ब-विधान, आत्म-आलोचना और मार्क्सवादी चेतना का विश्लेषण किया गया है।
बीज शब्द: मुक्तिबोध, फैंटेसी, द्वंद्व, आत्म-संघर्ष, अंधेरे में, एक साहित्यिक की डायरी, मार्क्सवाद, अभिव्यक्ति
प्रस्तावना
हिंदी कविता में मुक्तिबोध का आगमन एक घटना है। तारसप्तक के प्रथम कवि के रूप में आए मुक्तिबोध को उनका वास्तविक स्थान उनके जीवनकाल में नहीं, निधन के बाद मिला। 11 सितंबर 1964 को उनका देहावसान हुआ और उसके बाद श्रीकांत वर्मा, अशोक वाजपेयी, नामवर सिंह जैसे आलोचकों ने उन्हें हिंदी की नई कविता का केंद्रीय हस्ताक्षर सिद्ध किया।
मुक्तिबोध की कविता सहज नहीं, सायास अर्जित कविता है। वह पाठक से श्रम माँगती है। जैसा कि उन्होंने स्वयं एक साहित्यिक की डायरी में लिखा है - "साहित्य में जीवन की वास्तविकता का चित्रण नहीं, जीवन की वास्तविकता की खोज होती है।" यही खोज उन्हें विशिष्ट बनाती है।
1. भूल-गलती : आत्म-स्वीकृति का काव्य
मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता भूल-गलती उनके काव्य-दर्शन का प्रवेश-द्वार है।
भूल-गलती
आज बैठी है
छाती पर
जिरह करती है...
यहाँ भूल-गलती कोई अमूर्त नैतिक अवधारणा नहीं, एक जीवित चरित्र है। मुक्तिबोध मध्यवर्गीय मन के अपराध-बोध को मूर्त कर देते हैं। कवि एक जिरह के कठघरे में खड़ा है। यह जिरह बाहर की अदालत नहीं, भीतर की अदालत है।
इस कविता में दो महत्वपूर्ण बातें हैं। पहली, आत्मालोचना। मुक्तिबोध किसी दूसरे पर आरोप नहीं लगाते, स्वयं को कटघरे में खड़ा करते हैं। दूसरी, इतिहास-बोध। भूल-गलती कहती है -
तूने क्या किया जीवन भर?
यह प्रश्न केवल व्यक्तिगत नहीं, ऐतिहासिक है। स्वतंत्रता के बाद के बुद्धिजीवी की निष्क्रियता पर यह सीधा प्रहार है। यही कारण है कि मुक्तिबोध की कविता में मैं हमेशा हम में बदल जाता है।
भाषा की दृष्टि से देखें तो इस कविता में भी वही मुक्तिबोधी लंबी, क्लॉज-दर-क्लॉज चलने वाली वाक्य-संरचना है जो पाठक को भटकाती नहीं, उलझाती है ताकि वह सोचे।
2. अंधेरे में : फैंटेसी और युग-चेतना का महाकाव्य
यदि हिंदी में कोई एक कविता आधुनिक समय का डिवाइन कॉमेडी कहलाने योग्य है तो वह अंधेरे में है। यह लगभग 300 से अधिक पंक्तियों की लंबी कविता है जो आठ खंडों में विभाजित है।
कथानक और फैंटेसी:
रात के अंधेरे में कवि के कमरे में एक रहस्यमय व्यक्ति आता है - तिलक लगाए, मस्तक पर खून का टीका। वह गांधी का प्रतिरूप लगता है पर साथ ही वह विद्रोह का प्रतीक भी है। शहर में मार्शल लॉ लगा है। कवि भागता है, एक जुलूस देखता है, पहाड़, खोह, बरगद का पेड़, सैनिक, गुहान्धकार - सब एक स्वप्न-क्रम में आते-जाते हैं। अंत में वह आत्म-रूपांतरण की घोषणा करता है।
यह फैंटेसी पलायन नहीं है, जैसा कि अक्सर समझा जाता है। मुक्तिबोध के लिए फैंटेसी यथार्थ को अधिक सच बनाने का औजार है। वे एक साहित्यिक की डायरी में लिखते हैं - "फैंटेसी में मन की निगूढ़ वृत्तियों का उद्घाटन होता है।"
अंधेरे में की फैंटेसी के तीन स्तर हैं:
क. मनोवैज्ञानिक स्तर - यह कवि के अंतर्मन का अपराध-बोध, भय और मुक्ति की इच्छा का प्रक्षेपण है।
ख. सामाजिक स्तर - यह 60 के दशक के भारतीय जनतंत्र में उभरते फासीवाद, दमन और मध्यवर्ग की कायरता का चित्र है।
ग. दार्शनिक स्तर - यह अंधकार से प्रकाश की ओर, आत्म से परमात्म की ओर नहीं, बल्कि स्वार्थ से जन-पक्षधरता की ओर जाने की यात्रा है।
कविता की सबसे चर्चित पंक्तियाँ इसी द्वंद्व को व्यक्त करती हैं:
अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे
उठाने ही होंगे
तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब
यहाँ अभिव्यक्ति केवल काव्य की अभिव्यक्ति नहीं, जीवन-पक्षधरता की अभिव्यक्ति है। मुक्तिबोध मानते हैं कि बिना खतरा उठाए कोई सार्थक लेखन संभव नहीं।
3. एक साहित्यिक की डायरी : सृजन-प्रक्रिया का दस्तावेज
मुक्तिबोध को समझना हो तो उनकी डायरी पढ़ना अनिवार्य है। यह डायरी रोज़नामचा नहीं, साहित्यिक सिद्धांत की प्रयोगशाला है।
इसमें तीन सूत्र बहुत महत्वपूर्ण हैं:
पहला सूत्र - ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान: मुक्तिबोध कहते हैं कि ज्ञान केवल बुद्धि की चीज नहीं, वह संवेदना बनकर आता है। और संवेदना केवल भावुकता नहीं, वह ज्ञान बनकर ठोस होती है। इसी द्वंद्वात्मक प्रक्रिया से श्रेष्ठ कविता बनती है।
दूसरा सूत्र - आत्म-संघर्ष: वे लिखते हैं कि लेखक के भीतर दो वर्ग हैं - एक शोषक वर्ग के संस्कारों वाला मन और दूसरा शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति रखने वाला मन। इन दोनों के बीच निरंतर संघर्ष चलता है। जो लेखक इस संघर्ष से बचता है, वह समझौतावादी हो जाता है।
तीसरा सूत्र - साहित्य का उद्देश्य: उनके लिए साहित्य आत्म-शोभा नहीं, आत्म-खोज है। वे तीसरा क्षण नामक निबंध में कहते हैं कि सृजन का पहला क्षण जीवन-अनुभव है, दूसरा क्षण उस अनुभव से तटस्थ होकर चिंतन करना है, और तीसरा क्षण उस चिंतन को फिर से संवेदना में बदलकर अभिव्यक्त करना है।
यही कारण है कि मुक्तिबोध की भाषा में सौंदर्यता या सुखात्मकता जैसे प्रयोग मिलते हैं। वे भाषा के शास्त्रीय नहीं, प्रयोगधर्मी हैं। वे कबीर की परंपरा के कवि हैं जहाँ भाव की सचाई के सामने व्याकरण गौण हो जाता है।
4. बिम्ब-विधान और भाषा
मुक्तिबोध के बिम्ब घुटन, अंधकार, सीलन, ब्रह्मराक्षस, लकड़ी के रावण, चाँद का टेढ़ा मुँह जैसे हैं। ये बिम्ब सुंदर नहीं, सच्चे हैं।
उदाहरण के लिए ब्रह्मराक्षस कविता लें:
ब्रह्मराक्षस
शिष्य को पढ़ाता है
पछाड़ कर...
यह गुरु-शिष्य परंपरा, ज्ञान के व्यवसायीकरण और अधूरे आत्म-ज्ञान का बिम्ब है। ब्रह्मराक्षस स्वयं मुक्तिबोध ही हैं जो आत्म-ज्ञान के कुएँ में फँसे हैं।
इसी तरह चाँद का मुँह टेढ़ा है में चाँद पूँजीवादी संस्कृति का प्रतीक है जो टेढ़ा होकर देखता है।
मुक्तिबोध की भाषा लंबी साँस की भाषा है। वे छोटे-छोटे वाक्यों में नहीं, एक ही साँस में कई पंक्तियों तक चलते हैं। इससे कविता में एक बेचैनी, एक भाग-दौड़ पैदा होती है जो उनके युग की बेचैनी है।
निष्कर्ष
मुक्तिबोध हिंदी के ऐसे कवि हैं जो अपने पाठक को सुख नहीं दायित्व देते हैं। अंधेरे में का अंत निराशा में नहीं, एक संकल्प में होता है -
मुझे अपने आँसुओं का अर्घ्य
उस महाशक्ति को देना है
जो मेरे भीतर है
यह महाशक्ति कोई ईश्वर नहीं, जन-चेतना है।
मुक्तिबोध आज इसलिए प्रासंगिक हैं क्योंकि आज भी अभिव्यक्ति के खतरे वही हैं, अंधेरा वही है, और भूल-गलती आज भी हमारी छाती पर बैठी जिरह कर रही है। वे केवल कवि नहीं, एक नैतिक विवेक हैं। हिंदी कविता में उनका होना इस बात का प्रमाण है कि कविता केवल सजावट नहीं, आत्मा की मशाल भी हो सकती है।
डॉ.अनिल कुमार भतपहरी
प्राध्यापक
रमोतीन माड़िया आदर्श महिला महाविद्यालय नारायणपुर बस्तर।