बौद्ध भिक्षुणी साधना स्थली: तुरतुरिया
सतनाम पंथ में एक साखी हैं। साखी वह जो कि मंगल भजन या पंथी भजन गाने के पूर्व सखियाए जाते हैं। साखी प्रमुखत: मुख्य गायक, पंडित, कड़िहार या कोई वादक भी हो सकते हैं। यह दो पंक्ति के होते हैं और उसके बाद क्षेपक गाकर सबकी मंगल कामना करते मंगल भजन/ पंथी भजन गाये जाते हैं।
उन्हीं अनगिनत साखियों में एक महत्वपूर्ण एवं पारंपरिक साखी हैं -
लक्ष्य कोस म गुरु बसे, सुरता दिहव पठाय
ज्ञान तुरी असवार हैं,गुरु छिन आवै पल जाय
इसमें ज्ञान तुरी शब्द क्या हैं? इसे जानने समझने मेरा मन मथते रहा। कई लोग कहे यह तोर हैं तुरी नहीं।
गुरु ज्ञान में चढ़कर आते जाते हैं। कुछ विद्वान इसे ज्ञान तुरय यानि ज्ञान रूपी अश्व/ घोड़े पर चढ़कर सद्गुरु आते हैं।
तब मुझे बौद्ध धर्म के सहजानी सिद्धों की वाणियों में तुरी का मतलब समझ आया। सिद्ध सरहपाद सहजयान के प्रवर्तक थे। प्राचीन पंथी निर्गुण और सिद्धवानी में हमें अनेक सिद्धों संतो की दोहा साखी शबद मंत्र उलट बासी आदि मिलते हैं। इन्हें कबीर से भी जोड़ते हैं।
(झारा खल्लारी महासमुंद निवासी भिक्षु रामेश्वरम जिनके दोनों पाँव रेलगाड़ी से कटे थे। वे युवावस्था में अपनी माता जी की अस्थियां विसर्जन हेतु इलाहाबाद प्रयाग से वापस लौटते दुर्घटना ग्रस्त हो गए। जब स्वस्थ हुआ तब चेतना जागृत हो गए और वे बौद्ध धम्म अपनाकर भिक्षु होकर आजीवन गुरुघासीदास और तथागत बुद्ध की चेतना को प्रसारित करते रहे। वे हमारे दादा महंत नंदू नारायण भतपहरी और नाना द्वय नकुल देव ढीढी एवं कोंदा प्रसाद बघेल के मित्र रिश्तेदार और सहयोगी थे। उनसे मेरा साक्षात्कार वार्तालाप होते थे वे साधु वेश में नेपाल भूटान सिक्किम दार्जलिंग नागपुर इत्यादि बौद्ध स्थलों पर परिभ्रमण करते और बौद्ध विद्वानों से सत्संग वार्तालाप करते थे। उन्होंने ही मुझे पाली भाषा अक्षर इत्यादि की आरंभिक जानकारी दिए थे।
वे ज्ञान तुरी साधना के साधक और निर्भय एवं तटस्थ सा हो गए थे। उनकी पाली संस्कृत भाषा में अथ गुरु घासीदास चरितम अप्रकाशित पांडुलिपि था। जब मैं अध्यापक बना और पुस्तक आदि प्रकाशन की ओर ध्यान आकृष्ट हुआ तो उनके परिजनों से उक्त पांडुलिपि के बारे में जानकारियां ली परन्तु अपेक्षित जानकारी नहीं मिली। अन्यथा उनका प्रकाशन या सतनाम संदेश में किस्त में प्रकाशित करने की योजना असफल रहा।
बाहरहाल तुरी साधना की एक अवस्था हैं। कबीर इस भाव को उन्मनी कहते हैं। मुझे लगता हैं यह तुरी साधना सिद्धि के कारण ही सिरपुर समीप सुरम्य तुरतुरिया का नाम हुआ। जहां बौद्ध भिक्षुणियां रहती और तुरी तंत्र साधना करती लोक कल्याण करती थी।)
तुरतुरिया छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण परन्तु कम चर्चित प्राचीन बौद्ध स्थलों में से एक है। साधना में तुरी एक अवस्था हैं इसे सहज प्राप्त करने का सिद्ध स्थल तुरतुरिया हैं।
कहाँ स्थित है?
तुरतुरिया रायपुर से लगभग 84 किमी और बलौदाबाजार जिला मुख्यालय से 29 किमी दूर, कसडोल तहसील के बहरिया गाँव के पास बलभद्री नाले पर स्थित है । छत्तीसगढ़ के इतिहासकार/ साहित्यकार हरि ठाकुर जी ने इसे बालमदेही नदी नाम देकर तुरतुरिया को वाल्मीकि आश्रम और लवकुश जन्म स्थली लिखें हैं। यह सिरपुर से मात्र 23 किमी दूर है और बारनवापारा अभयारण्य के पास पहाड़ियों से घिरा एक मनोरम स्थल है। इसे स्थानीय लोग सुरसुरी गंगा भी कहते हैं।
नाम तुरतुरिया क्यों पड़ा?
इसका नाम बलभद्री नाले के कारण पड़ा। नाले का जल चट्टानों के माध्यम से निकलता है तो बुलबुलों से तुरतुर की ध्वनि निकलती है, इसलिए नाम तुरतुरिया पड़ा। जल एक लंबी संकरी सुरंग से होकर प्राचीन ईंटों से बने कुंड में गिरता है, जहाँ गोमुख बना हुआ है।
बौद्ध भिक्षुणी साधना स्थली क्यों कहा जाता है?
यही इसका सबसे खास पक्ष है।
1. बौद्ध विहारों के प्रमाण: ऐसा माना जाता है कि यहाँ बौद्ध विहार थे जिनमें बौद्ध भिक्षुणियों का निवास था। सिरपुर के समीप होने के कारण इस बात को अधिक बल मिलता है कि यह स्थल कभी बौद्ध संस्कृति का केंद्र रहा होगा।
2. मूर्तियाँ और अवशेष: यहाँ कुछ प्राचीन बुद्ध की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं, कुछ भग्न मंदिरों के अवशेष भी मिलते हैं। इस स्थल पर बौद्ध, वैष्णव तथा शैव धर्म से संबंधित मूर्तियों का मिलना यह सिद्ध करता है कि यहाँ कभी तीनों संप्रदायों की मिली-जुली संस्कृति रही होगी।
3. समयकाल: यहाँ से प्राप्त शिलालेखों की लिपि से अनुमान है कि यहाँ की प्रतिमाओं का समय 8-9वीं शताब्दी है, यानी सिरपुर के बौद्ध उत्कर्ष काल के समकालीन।
4. स्त्री परंपरा आज भी जीवित: आज भी यहाँ स्त्री पुजारिनों की नियुक्ति होती है, जो प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा है। यह सीधे तौर पर भिक्षुणी परंपरा से जुड़ा माना जाता है। कई विद्वान मानते हैं कि जो विशाल बुद्ध मूर्ति यहाँ है, उसे जनसाधारण वाल्मीकि ऋषि के रूप में पूजता है।
रामायण से जुड़ी मान्यता
जनश्रुति है कि त्रेतायुग में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यही था और लव-कुश की यही जन्मस्थली थी। इसलिए यह स्थल वाल्मीकि आश्रम के नाम से भी प्रसिद्ध है।
इसके साथ ही बौद्ध साधना स्थली के पार्श्व पहाड़ के शीर्ष में मातागढ़ स्थापित हैं जहाँ दुर्गा की नई प्रतिमा एवं मंदिर बनाई गई है बकरे की बलि होती हैं। खासकर पौष पूर्णिमा में यहाँ मेला लगता हैं।
जीव हिंसा एवं बलि प्रथा को बंद कराने गुरुघासीदास ने सतनाम पंथ के माध्यम से जनजागरण चलाया इस कारण परिक्षेत्र के सतनामियों ने यहां जैतखाम स्थापित कर उनके विचारों को जनमानस में प्रसारित करते आ रहे हैं। यह भी दर्शनीय हैं।
कब जाएँ?
पौष माह में यहाँ तीन दिवसीय मेला लगता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। धार्मिक और पुरातात्विक महत्व के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी यह पर्यटकों को आकर्षित करता है।
यदि आप सिरपुर जाते हैं तो तुरतुरिया को एक ही दिन में कवर किया जा सकता है, यह बौद्ध इतिहास में छत्तीसगढ़ की भिक्षुणी संघ की भूमिका को समझने के लिए सबसे प्रामाणिक स्थलों में से एक है।
उक्त जानकारी AI से जनरेटेड हैं कुछेक तथ्य फोटोग्राफ मैंने प्रसंगानुकूल संयोजन किया हूं।