Friday, September 11, 2026

व्याकरणाचार्य हीरालाल चंद्रनाहु काव्योपाध्याय

छत्तीसगढ़ी भाषा के अमर पुरखा : हीरालाल चंद्रनाहु काव्योपाध्याय

(जनम अउ परिवार : एक परिचयात्मक अध्ययन)

An Immortal Forefather of Chhattisgarhi Language : Pandit Hiralal Kavyopadhyay (Birth and Family: An Introductory Study)

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी, प्राध्यापक, वीरांगना रमौतीन माड़िया आदर्श महिला महाविद्यालय, नारायणपुर (छत्तीसगढ़)

ईमेल : anilbhatpahari@gmail.com

सारांश

प्रस्तुत शोध पत्र छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रथम व्याकरणाचार्य पंडित हीरालाल काव्योपाध्याय (1856–1890) के जनम, परिवार, शिक्षा, नौकरी, साहित्य सृजन अउ अमर कृति ‘छत्तीसगढ़ी व्याकरण’ के परिचयात्मक अध्ययन हे। मात्र 34 बरस के अल्प आयु में ओमन सात कृतियों के सृजन करिन, जेकर में ‘छत्तीसगढ़ी व्याकरण’ (1890) अइसे ऐतिहासिक ग्रंथ हे जेकर अनुवाद महान भाषाशास्त्री सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने ‘जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल’ में प्रकाशित कराइन। शोध पत्र में ओमन के बहुभाषी प्रतिभा, राजा सौरेंद्र मोहन टैगोर अउ बंगाल संगीत अकादमी ले मिले सम्मान, ‘काव्योपाध्याय’ उपाधि के प्रसंग अउ आज के संदर्भ में छत्तीसगढ़ी भाषा के स्थिति के विवेचन करे गे हे।

मुख्य शब्द : हीरालाल काव्योपाध्याय, छत्तीसगढ़ी व्याकरण, जॉर्ज ग्रियर्सन, काव्योपाध्याय उपाधि, छत्तीसगढ़ी भाषा

1. प्रस्तावना:  हिंदी ले पहिली छत्तीसगढ़ी म व्याकरण लिख के छत्तीसगढ़ी ल देश दुनियां एक अलगे पहचान देय के बड़का उदीम आज़ादी के पहली होय रहिस। यदि भाषा विज्ञानी मन के अनुसार शासन- प्रशासन चले त लोकतंत्र म जनता के सच म भला हो सकत हे। फेर ब्यूरोक्रेट और सत्तापक्ष  अपन पार्टी नीति के प्रतिबद्धता के कारण देश में हिंदी/ अंग्रेजी ल थोप देय से जन भाषा धिरलघहा महत्व हीन होके नन्दा जाही । 

उही ल बचाय सेती हीरालाल जैसे हीरा होईन आज ओकर जयंती हावय तब तारीख


2. जनम अउ परिवार

हीरालाल जी के जनम सन् 1856 में होइस। ओमन के मूलगांव राखी (भाठागांव), तहसील कुरुद, जिला धमतरी माने जात हे। ओमन के पिता के नाम बालाराम अउ माता के नाम राधाबाई रहिन। चंद्रनाहु कुर्मी अर्थात चंद्राकर परिवार में जनमे हीरालाल जी अपन विद्वता अउ साहित्य साधना से अइसे ऊँचाई पाइन कि ओमन के नाम संग जाति नहीं, बल्कि ओमन के काम जुड़थे।

3. पढ़ई अउ नौकरी

हीरालाल जी के प्राथमिक शिक्षा रायपुर से होइस अउ सन् 1874 में जबलपुर से मैट्रिक के शिक्षा उत्तीर्ण करिन। सन् 1875 में मात्र उन्नीस साल के उमर में जिला स्कूल में सहायक शिक्षक नियुक्त हो गइन। धमतरी के एंग्लो वर्नाकुलर टाउन स्कूल में ओमन ल हेडमास्टर के स्थायी नौकरी मिलिस। एकर पहिले कुछ दिन वो बिलासपुर में भी पदस्थ रहिन। वो धमतरी नगरपालिका अउ डिस्पेंसरी कमेटी के अध्यक्ष भी रहिन। अपन मेहनत से वो खुद उर्दू, उड़िया, बंगला, मराठी अउ गुजराती भाषा के अभ्यास करिन।

4. साहित्य सृजन अउ सम्मान

सन् 1881 में ओमन के कृति ‘शाला गीत चंद्रिका’ के नवल किशोर प्रेस, लखनऊ ने प्रकाशित करिस। ये कृति बर बंगाल के राजा सौरेंद्र मोहन टैगोर ने ओमन ल सम्मानित करिन। 11 सितंबर 1884 के राजा टैगोर ने फिर स्वर्ण पदक देकर ओमन ल सम्मानित करिस। ये सम्मान ओमन के कृति ‘दुर्गायन’ बर मिलिस। दुर्गा सप्तशती ल दोहा में प्रस्तुत करे के ये विशिष्ट काम बर ही राजा टैगोर ने स्वर्ण पदक दिस। ये कृति बर बंगाल संगीत अकादमी के द्वारा ओमन ल ‘काव्योपाध्याय’ के उपाधि से विभूषित करे गिस। बच्चन बर ओमन ‘बालोपयोगी गीत’ भी लिखिन जे संगीतबद्ध रहिस, जेला भी बंगाल संगीत अकादमी ने पुरस्कृत करिस। रोगग्रस्त रहत-रहत भी ओमन ‘गीत रसिक’ कृति के रचना करिन। अंग्रेजी में ओमन के कृति ‘रॉयल रीडर क्रमांक 1 अउ 2’ भी प्रकाशित होइस।

5. अमर कृति : छत्तीसगढ़ी व्याकरण

ओमन के सातवीं अउ अंतिम कृति ‘छत्तीसगढ़ी व्याकरण’ हे। कहे जात हे कि रचनाकार मन में से अधिकांश ने जीवन के संध्या में अपन श्रेष्ठतम कृति के सृजन करे हें। हीरालाल जी जीवन भर के अनुभव के ताकत से छत्तीसगढ़ी व्याकरण ल तैयार करत रहिन। ये कृति जब 1885 में लिखे गिस, तब खड़ी बोली के कोई सर्वमान्य अउ प्रामाणिक व्याकरण नहीं रहिस। सन् 1890 में प्रकाशित ‘छत्तीसगढ़ी व्याकरण’ ऐसी कृति हे जेकर अनुवाद महान भाषाशास्त्री सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने ‘जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल’ के जिल्द तीस, भाग 1 में प्रकाशित कराइन। ओमन के अभिमत रहिस कि ये ग्रंथ भारतीय भाषाओं पर प्रकाश डाले के प्रयास करे वाला मन बर प्रेरणास्पद हे। बाद में ये कृति के संशोधन करके पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय ने मध्यप्रदेश शासन से प्रकाशित कराइन। ग्रियर्सन ने ये कृति ल दो भाग में प्रकाशित करिस — एक में विशुद्ध व्याकरण अउ दूसर में मुहावरे, कहावतें, पहेलियां, लोकगीत, कथा, कहानी इत्यादि। ग्रियर्सन ने आभार व्यक्त करत हुए लिखिस कि हीरालाल जी जैसे विद्वान मन के कारण ही वो भिन्न-भिन्न भाषाओं के बीच सेतु बनाए के अपन प्रयास में सफल हो पाथें। हरि ठाकुर ने लिखे हे कि ओमन के कुछ कविताओं के इटालियन भाषा में सिग्नोर कैनिनी ने अनुवाद भी करे हे।

6. अल्प आयु में महान काम

मात्र 34 साल के उमर में अक्टूबर 1890 में ओमन के देहांत हो गिस। मगर हीरालाल काव्योपाध्याय अपन रचनाओं के कारण अमर हें। छत्तीसगढ़ी भाषा के जउन व्याकरण आज अंग्रेजी में अनुवादित होके लगातार चर्चा में हे, वो एक ऐसे छत्तीसगढ़िया महापुरुष के देन हे जेकर नाम संग ओमन के जाति नहीं जुड़थे, बल्कि ओमन के काम जुड़थे।

7. आज के संदर्भ

आज छत्तीसगढ़ी के पहली व्याकरणाचार्य हीरालाल चंद्रनाहु काव्योपाध्याय जी के जयंती हे। हिंदी ले पहली छत्तीसगढ़ी के व्याकरण बना के उन्मन इतिहास रचिस, फेर देवनागरी लिपि के कारण छत्तीसगढ़ी के अलग पहचान नई बन पाइस, ये हर बड़ दुःख के बात आय। जबकि देवनागरी में संस्कृत, हिंदी, मराठी, यहाँ तक की विदेश के नेपाली तकों अपन पहचान बना लिस। शब्द-ध्वनि, प्रवृत्ति, प्रकृति अलगे होय के बाद भी ब्रज-अवधी कस हिंदी में संघेर के इहा भाषाई उपनिवेश उदीम प्रायोजित ढंग से चलत हे। एकरे सेती राजभाषा होय के बाद भी छत्तीसगढ़ी में न राजकाज होत हे, न शिक्षा के माध्यम बन सकत हे। रोजी-रोजगार तो बढ़ दूर के बात हे। पुरखा के सुरता करत प्रदेश के भाषा, कला अउ साहित्य के माध्यम ले मान-सम्मान बर सबझन ल उमिहाये ल परही। जय छत्तीसगढ़, जय जोहार!

8. निष्कर्ष

हीरालाल काव्योपाध्याय छत्तीसगढ़ी भाषा के अमर पुरखा हें। मात्र 34 बरस के जीवन में ओमन सात कृतियों के सृजन करिन अउ ‘छत्तीसगढ़ी व्याकरण’ जइसे ऐतिहासिक ग्रंथ देके छत्तीसगढ़ी ल भाषाशास्त्रीय प्रतिष्ठा दिलाइन। ग्रियर्सन जइसे विश्वविख्यात भाषाशास्त्री के द्वारा ओमन के कृति के अनुवाद अउ प्रशंसा ये साबित करत हे कि छत्तीसगढ़ी एक समृद्ध अउ स्वतंत्र भाषा हे। आज ओमन के जयंती के अवसर में ये संकल्प लेना जरूरी हे कि पुरखा के सुरता ल जीवंत रखत छत्तीसगढ़ी भाषा, कला अउ साहित्य के मान-सम्मान बर सबझन मिलके उमिहाहीं।

प्रमुख रचनाएं

शाला गीत चंद्रिका (1881)

दुर्गायन

बालोपयोगी गीत

रॉयल रीडर भाग 1 (अंग्रेजी में)

रॉयल रीडर भाग 2 (अंग्रेजी में)

गीत रसिक

छत्तीसगढ़ी व्याकरण (1890)

संदर्भ

हीरालाल काव्योपाध्याय, छत्तीसगढ़ी व्याकरण, 1890 (संशोधित संस्करण : पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय, मध्यप्रदेश शासन)।

ग्रियर्सन, जॉर्ज, जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल, जिल्द 30, भाग 1 (छत्तीसगढ़ी व्याकरण के अनुवाद सहित)।

ठाकुर, हरि, छत्तीसगढ़ी साहित्य संबंधी लेखन (सिग्नोर कैनिनी द्वारा इटालियन अनुवाद के उल्लेख सहित)।

Wednesday, September 9, 2026

भिक्षुक मुक्त स्वाभिमानी शहर: नारायणपुर

नारायणपुर : भिक्षुक मुक्त स्वाभिमानी शहर 
डॉ. अनिल भतपहरी

नववर्ष 2026 की जनवरी से मैं नारायणपुर में निवासरत हूँ। राजधानी रायपुर की भागमभाग और शोरगुल से मुक्त, चारों ओर पहाड़ियों एवं रम्य वनों से आच्छादित यह शहर वास्तव में "नेचर सिटी" है।

यहाँ की अनेक विशेषताओं में एक बात मैंने इन आठ-नौ माह में महसूस की कि यहाँ कोई भिखारी नहीं है। मेरी वैगन आर कार की ड्राइविंग सीट वाली खिड़की में एक डिब्बी है। पता नहीं, कार कंपनी ने उसे किस उद्देश्य से बनाया होगा, शायद पान, सिगरेट, गुटका या अन्य आवश्यक दवाई आदि रखने के लिए! परंतु मेरी पान-गुटका जैसे किसी व्यसन की लत नहीं है, और सद्गुरु की कृपा से अब तक निरोगी, औषधि-मुक्त जीवन व्यतीत करते हुए 56 वर्ष बीत गए। इसलिए मैं उस डिब्बी में प्रायः हमेशा चिल्लर ही रखता आया हूँ। दरवाज़ा खोलने पर सिक्कों की खनक से परेशान पत्नी-बच्चे वहाँ पैसे रखने से मना भी करते थे, पर मेरी यह आदत अब तक नहीं छूटी। हाँ, इतना अवश्य है कि सिक्कों की वह खनक मुझे धन-लक्ष्मी की पायल जैसी लगती है।

बहरहाल, उन चिल्लरों को मैं रायपुर के सिंगल बत्ती चौक या कहीं राह चलते भिक्षुओं को देकर थोड़ी खुशी पाता था। लेकिन यहाँ नारायणपुर में वह खुशी मिल नहीं रही है, क्योंकि मेरी कार की डिब्बी भर गई, पर कोई भिक्षुक मिला नहीं। इसलिए अब उन एक-दो-पाँच-दस के सिक्कों से मिर्ची, नींबू, धनिया खरीद रहा हूँ। किराए के मकान, बुधवारी बाज़ार के कमरे में स्वपाकी जीवन व्यतीत करते हुए, पाताल चटनी हाथों से मसलकर ग्रहण करते हुए सेहतमंद हो रहा हूँ। भले ही हथेली हरी मिर्च की झार से भरभरा जाती है, परंतु खलबत्ते या मिक्सी में ज़रा-सी दो मिर्च, टमाटर, धनिया पीसने और अनावश्यक बर्तन निकालने से बेहतर है कि थोड़ा सह लिया जाए।

मैंने भिक्षुक तलाशने के उद्देश्य से शहर के कुछ धार्मिक स्थलों की ओर सैर के निमित्त जाकर देखा। आश्चर्य कि वहाँ भी कोई नहीं मिला! यहाँ मंदिर, मस्जिद, चर्च, जिनालय, देवताला कुटी, गुड़ी, आश्रम इत्यादि तो हैं, पर बाहर कोई भिक्षुक नहीं। यही यहाँ की बड़ी खूबसूरती और स्वाभिमानी ज़िंदगी लगी। इसलिए इसे छत्तीसगढ़ का अनूठा शहर कहने में मुझे कोई दिक्कत नहीं।

यहाँ भिखारी न देख पाने और उसे दान न कर पाने की नाममात्र की रंज के स्थान पर अपार खुशी गुरु घासीदास के कथन से हुई :

"दान के देवइया पापी, दान के लेवइया पापी।"

गुरुजी की परिकल्पना को साकार करता यह शहर मुझे अब भाने लगा है।

मेरी इस बात पर कुछ बौद्धिक मित्रों से चर्चा हुई तो उन्होंने दो-तीन बातें जोड़ीं। उनमें एक युवा रचनाकार दिलीप निषाद (बालोद) हैं, जो मेरे प्रिय पाठक हैं और विवेकानंद आश्रम में सेवारत हैं। वे मुझे वर्षों से पढ़ रहे हैं। एक दिन वे मेरा काव्य-संग्रह "हड्डी की जीभ नहीं कि न फिसले" पढ़कर वापस देने अपने एक सहकर्मी मित्र के साथ आए थे। प्रसंगवश उन्होंने कहा, "हाँ सर, भिखारी ही नहीं, यहाँ कोई विक्षिप्त भी मैंने आज तक सड़क पर लावारिस-सा घूमते नहीं देखा।" सच में, अब मुझे भी यह ऑब्ज़र्व करना पड़ेगा। यहाँ की नैसर्गिक सुंदरता और स्वच्छंद फुरहर हवाएँ लोगों के मन के विचलन को थामे रहती हैं। इसलिए महत्वाकांक्षा के स्थान पर आत्म-संतुष्टि का भाव भरा हुआ है। तभी तो सुविधाविहीन इस अबूझमाड़ में वेरियर एल्विन अड्डा जमाकर अनेक कालजयी कार्य कर विख्यात हो गए। टाइगर बॉय चेंदरू को एक साहसी अंग्रेज़ फिल्मकार ने ढूँढ़ निकाला और इतिहास बना लिया।

इसी तरह विगत कई वर्षों से संवैधानिक दायित्व के निर्वहन में लगे अधिवक्ता मेरसा जी ने चर्चा में कहा कि यहाँ रायपुर की तरह फुटपाथ पर रहने वाले, कबाड़ बीनकर जीवन-यापन करने वाले और हर शाम नशे में धुत्त होकर गाली-गलौज करते हुए राहगीरों को शर्मसार करने वाले समुदाय भी नहीं हैं, जबकि ऐसे लोग रायपुर के कई क्षेत्रों में गुलज़ार हैं। उनका पुनर्वास आज तक प्रशासन कर नहीं सका।

खैर, आज पोरा तिहार है। बच्चे कह रहे हैं, "घर नहीं आ रहे हैं?" मैंने कहा, "छुट्टी नहीं है; शनिवार की रात आऊँगा, रविवार और गणेश चतुर्थी मनाकर वापस जाऊँगा।" तो वे संतुष्ट हुए। श्रीमती जी का मानना है कि सब छूट जाए, पर तीजा-पोरा मायके का न छूटे। अब बच्चे बड़े हो गए हैं और वे तो दूर हैं, तो बच्चों से आज्ञा लेकर वे कल ही अपने भैया के साथ चली गईं। पहली बार ऐसा संयोग आया है कि मेरे घर आज नदिया-बैला की पूजा नहीं होगी। हाँ, उनके स्थान पर घर में दोनों बाइक और यहाँ मेरी मारुति 'छकड़ा' गाड़ी की ज़रूर सेवा-जतन होगी।

हालाँकि गणेश चतुर्थी में बच्चे इन्वॉल्व रहते हैं, पर उस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है। जिस पोरा त्यौहार में बहन-बेटियाँ आती हैं, और जो हरेली के बाद दूसरा बड़ा कृषि पर्व है, उसकी छुट्टी न होने से मन में विचार आया कि सांस्कृतिक रूप से प्रशासकीय कैलेंडर की समीक्षा आवश्यक है।

जय नारायणपुर! जय सेवा! जोहार! आमचो सुग्घर बस्तर!

Tuesday, September 8, 2026

सिरपुर - चिखली जुनवानी घाट महानदी में स्टॉप डैम पुल

सिरपुर -चिखली-जुनवानी  घाट महानदी में स्टॉप डैम : ट्रांस-महानदी परिक्षेत्र के सर्वांगीण विकास का द्वार
महानदी के तट पर स्थित सिरपुर -चिखली (जुनवानी) घाट, में यदि स्टॉप डैम का निर्माण हो जाए, तो यह केवल एक जल संरचना नहीं, बल्कि पूरे अंचल के भाग्य को बदलने वाली विकास-रेखा सिद्ध होगी।
आवागमन और संपर्क क्रांति
स्टॉप डैम बनने से महासमुंद, पिथौरा होते हुए उड़ीसा से सीधा संपर्क खरोरा, तिल्दा, सिमगा, कवर्धा और मध्यप्रदेश तक जुड़ जाएगा। लाखों लोगों का दैनिक आवागमन सुगम होगा, व्यापार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की दूरी घटेगी।
धार्मिक–सांस्कृतिक पर्यटन का महासंगम • प्राचीन नगरी सिरपुर का वैभव और बार अभ्यारण्य की प्राकृतिक समृद्धि एक ही परिपथ में जुड़ जाएंगे। • चार धामों में से दो धाम — जगन्नाथपुरी से उज्जैन–द्वारका तक का सांस्कृतिक सेतु इसी मार्ग से सशक्त होगा। • बौद्ध, जैन, शैव, वैष्णव परंपराओं की त्रिवेणी सिरपुर को राष्ट्रीय तीर्थाटन मानचित्र पर नई पहचान दिलाएगी।  जल, कृषि और रोजगार • नदी किनारे भूजल स्रोत बढ़ेगा, जिससे सब्जी-बाड़ी, मछली पालन (मस्तखेट) को स्थायी आधार मिलेगा। • पर्यटन, नौका विहार, घाट विकास, हाट-बाजार, होम-स्टे जैसे विविध रोजगार के सुनहरे अवसर विकसित होंगे। • किसान, मछुआरे, कारीगर, युवा — सभी के लिए वर्षभर आजीविका की नई धारा बहेगी।  ट्रांस-महानदी परिक्षेत्र का नवोत्थान
यह स्टॉप डैम ट्रांस-महानदी परिक्षेत्र के सर्वांगीण विकास — सड़क, जल, कृषि, पर्यटन, संस्कृति और रोजगार — का केंद्रबिंदु बनेगा।
यह मांग केवल एक घाट की नहीं, आने वाली पीढ़ियों के समृद्ध भविष्य की है।

Friday, September 4, 2026

सतनामी रहस


Sahapedia • छत्तीसगढ़ अध्ययन
KNOWLEDGE TRADITIONSPERFORMING ARTSPRACTICES AND RITUALSHISTORIES
FIELD DOCUMENTATION • CHHATTISGARH • JUNE 2018

छत्तीसगढ़ी सतनामी रहस

The 'Rahas' of the Satnamis in Chhattisgarh

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
प्राध्यापक, हिंदी
शासकीय बृजलाल वर्मा महाविद्यालय, पलारी (छ.ग.)निर्गुण संत साहित्य पर शोध एवं लेखनProfessor, Hindi
Govt. Brijlal Verma College, Palari (C.G.)
Research & writing on Nirgun Sant literature
10 July 2018ग्राम रहंगी, कबीरधाम
#CHHATTISGARH#SATNAMI#RAS LILA#GURU GHASIDAS
सार / ABSTRACT

यह आलेख छत्तीसगढ़ के सतनामी समाज में प्रचलित रहस परंपरा का प्रलेखन है। रहस वस्तुतः ब्रज की रासलीला का छत्तीसगढ़ी रूपांतरण है, जिसमें कृष्ण-चरित्र का दस दिवसीय मंचन, मिट्टी की मूर्तिकला, सामूहिक भक्ति और लोक-रंजन एक साथ घटित होते हैं। जून 2018 में कबीरधाम जिले के ग्राम रहंगी में आयोजित सामाजिक रहस के क्षेत्र-अध्ययन के आधार पर इसकी संरचना, प्रकारों और सांस्कृतिक अर्थों को समझने का प्रयास किया गया है।

This article documents the Rahas tradition among Satnamis in Chhattisgarh — a ten-day ritual theatre of Krishna Lila, blending devotion, folk art, and collective celebration. Based on fieldwork in Rahangi village, Kabirdham (June 2018), it traces its origins, forms and performative structure.

प्रस्तावना

रासलीला ही छत्तीसगढ़ी जनमानस में रहस कहलाती है। ब्रज क्षेत्र की रासलीला जब सतनामी पंथ के माध्यम से छत्तीसगढ़ के मैदानी अंचल में पहुँची, तो उसने यहाँ की भाषा, भक्ति और लोककला में घुलकर एक विशिष्ट रूप ले लिया। 'रहस' शब्द स्वयं 'रास' का ही तद्भव है — पर अर्थ विस्तार में यह केवल नृत्य नहीं, संपूर्ण अनुष्ठान बन जाता है।

छत्तीसगढ़ में रहस केवल मंचीय प्रस्तुति नहीं, बल्कि बेड़ा है — अर्थात् कई दिनों तक चलने वाला व्रत-संकल्पित आयोजन, जिसमें गाँव भर का सहयोग, मूर्तिकारों की साधना, गायकों-वादकों की संगत और दर्शकों की निरंतर उपस्थिति अनिवार्य है।

सतनामी समाज और ब्रज संस्कृति का प्रभाव

ऐतिहासिक रूप से सतनामी पंथ का संबंध उत्तर भारत के साधु-परंपराओं से रहा है। नारनौल (हरियाणा), दिल्ली और मथुरा के क्षेत्रों में वीरभान, जोगीदास, उदास दास जैसे संतों ने निर्गुण-सगुण के समन्वय की परंपरा विकसित की। इसी परंपरा के प्रवाह में रासलीला का बीज छत्तीसगढ़ पहुँचा।

स्थानीय साक्ष्यों के अनुसार प्रारंभ में यह परंपरा अहीर (यादव) और तेली समुदायों में अधिक प्रचलित थी, जो कृष्ण को अपना वंश-आराध्य मानते थे। कालांतर में सतनामी समाज ने इसे अपनाकर इसमें गुरु घासीदास के सत्य, अहिंसा और समता के उपदेशों का समावेश किया। इस प्रकार रहस आज सतनामी अस्मिता का एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रतीक है — जहाँ कृष्ण-भक्ति और सतनाम-चेतना एक साथ गुंथी हुई दिखती है।

उद्गम
नारनौल – दिल्ली – मथुरा मार्ग
प्रवर्तक संत
वीरभान, जोगीदास, उदास दास
स्थानीय वाहक
अहीर, तेली, सतनामी समाज

रहस की विशेषताएँ

PERFORMATIVE FORM

लोक स्वरूप

शास्त्रीय रास की तरह नियम-बद्ध नहीं। बोली छत्तीसगढ़ी, गीत दोहा-भजन के ढांचे में, संवाद सहज और हास्य-विनोद से भरे। मंच खुला आंगन या बाड़ी।

ETHOS

भक्ति + आनंद + मनोरंजन

एक ही समय में तीन प्रयोजन — ईश्वर-स्मरण, सामूहिक उल्लास और लोक-शिक्षा। दर्शक केवल दर्शक नहीं, व्रती भी है।

समग्र कला-अनुभव

रहस में गायन, वादन (मृदंग, मंजीरा, हारमोनियम), नृत्य और मिट्टी की मूर्तिकला एक साथ उपस्थित रहते हैं। पृष्ठभूमि में बनी मिट्टी की मूर्तियाँ कथा-देश बनाती हैं — गोवर्धन, यमुना तट, मथुरा कारागार — और रात-भर चलने वाले अभिनय को दृश्य आधार देती हैं।

रहस के प्रकार

SOCIAL FORM

सामाजिक रहस

  • 3 वर्षीय परंपरा — एक बार संकल्प लेने पर लगातार तीन वर्ष तक आयोजन अनिवार्य
  • संपूर्ण ग्राम का सामूहिक चंदा और श्रमदान
  • बड़ा बेड़ा, 10 दिन, सैकड़ों दर्शक-व्रती
  • सुख-शांति-समृद्धि हेतु कामना
VOTIVE FORM

बदना / मानौती रहस

  • 1 वर्षीय, व्यक्तिगत — मनौती पूर्ण होने पर व्यक्ति/परिवार द्वारा आयोजन
  • छोटा बेड़ा, सीमित संसाधन पर पूर्ण निष्ठा से
  • अक्सर संतान-प्राप्ति, रोग-मुक्ति, फसल-समृद्धि हेतु
  • अधिक आत्मीय और घरेलू वातावरण

क्षेत्र अध्ययन : ग्राम रहंगी, कबीरधाम

छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले का एक सतनामी बहुल गाँवजून 2018, सामाजिक रहस

जून 2018 में लेखक ने रहंगी में आयोजित सामाजिक रहस का प्रत्यक्ष प्रलेखन किया। बेड़ा गाँव के बाहर खुले मैदान में बाँधा गया — पीछे मिट्टी की ऊँची पृष्ठभूमि पर गोवर्धन-यमुना-कारागार की मूर्तियाँ, सामने चूने से लिपा आंगन, चारों ओर बाँस-बल्लियों पर टाट-पंडाल। प्रत्येक रात्रि 8 बजे से भोर 4 बजे तक लीला चलती, दिन में मूर्तिकार मूर्तियों की मरम्मत और मंडली अगले प्रसंग का अभ्यास करती।

DAY 1

यदुवंश महात्म्य एवं वासुदेव-देवकी विवाह

प्रस्तावना गान, सृष्टि-वर्णन, यदुवंश की महिमा। कंस के अत्याचार की पृष्ठभूमि, वासुदेव-देवकी विवाह और आकाशवाणी — 'आठवाँ पुत्र तेरा वध करेगा'।

DAY 2

कृष्ण जन्म, नंद यशोदा आगमन, भविष्य फल वाचन

कारागार में चतुर्भुज रूप में जन्म, वसुदेव द्वारा गोकुल में पहुँचाना। नंद-यशोदा के घर आनंदोत्सव, गर्गाचार्य द्वारा नामकरण और भविष्य-वाणी।

DAY 3

बाल महिमा, पूतना वध

बाल-कृष्ण की लीलाएँ, पूतना का छद्म मातृत्व और उसका वध। लोक-गीतों में 'पूतना मौसी' प्रसंग हास्य और भय दोनों जगाता है।

DAY 4

अन्नप्राशन, गोचारण, बकासुर वध

अन्नप्राशन संस्कार, ग्वाल-बालों के साथ गोचारण, वन-भोजन। बकासुर (बगुले रूपी असुर) का वध — पर्यावरणीय प्रतीक के रूप में भी व्याख्यायित।

DAY 5

माखन चोरी

सबसे प्रिय प्रसंग। गोपियों के घर माखन-चोरी, उखल से बाँधना, यशोदा का वात्सल्य। गीत — 'माखन चोर नंदकिशोर'। दर्शकों में हँसी और भावुकता।

DAY 6

कंदुक खेल, कालिया नाग नाथना, गोपिका-राधा मिलन

यमुना में गेंद खेलते हुए कालिया नाग का दमन — मूर्तिकला में यमुना का घुमावदार रूप विशेष। तत्पश्चात राधा और गोपिकाओं का प्रथम मिलन, श्रृंगार-गीत।

DAY 7

महारास

रहस का शिखर। चंद्र-रात्रि में महारास — कृष्ण का अनेक रूप धर प्रत्येक गोपी के साथ नृत्य। मंडलाकार नृत्य, पुष्प-वर्षा, दर्शक भाव-विभोर।

DAY 8

कृष्ण-बलराम मथुरा प्रवास

अक्रूर का आगमन, गोपियों का वियोग-गीत — 'मथुरा जाओगे तो क्या हमें भूल जाओगे'। रथ-प्रस्थान, यमुना तट का सूना होना।

DAY 9

चाणूर-मुष्टिक युद्ध

मथुरा में धनुष-यज्ञ, कुवलयापीड हाथी का वध, चाणूर-मुष्टिक जैसे मल्लों से कृष्ण-बलराम का युद्ध। अखाड़े का दृश्य मिट्टी से निर्मित।

DAY 10

कंस वध, गणेश विसर्जन एवं समापन

कंस वध, उग्रसेन का राज्याभिषेक, कारागार से माता-पिता की मुक्ति। अंत में बेड़ा के गणेश जी का विसर्जन, प्रसाद वितरण और अगले वर्ष के संकल्प के साथ समापन।

निष्कर्ष

रहस केवल नाटक नहीं, एक लंबा अनुष्ठान (बेड़ा) है। दस रातों तक गाँव जागता है, गाता है, बनाता और बिगाड़ता है — मिट्टी की मूर्तियाँ बनती हैं, टूटती हैं, फिर बनती हैं। इस क्रम में कृष्ण लीला केवल कथा नहीं रहती, वह सामूहिक स्मृति बन जाती है।

सतनामी समाज ने इस ब्रज-परंपरा को केवल अपनाया नहीं, उसे अपने जीवन-दर्शन से जोड़ा है। जहाँ एक ओर कृष्ण के जीवन-प्रसंग मंचित होते हैं, वहीं दूसरी ओर गुरु घासीदास के सत्य बोलना, समता रखना, जीवों पर दया करना जैसे उपदेश भजनों और दोहों में गूँजते हैं। इस संगम से रहस में भक्ति के साथ सामाजिक चेतना भी आती है।

अंततः रहस सुख, शांति और समृद्धि हेतु किया गया सामूहिक संकल्प है — जहाँ कला प्रार्थना बन जाती है और प्रार्थना उत्सव।

REFERENCES & FURTHER READING

  • Field notes, Rahangi village, Kabirdham, 12–22 June 2018
  • Interviews with Rahas mandali pramukh and murtikars
  • Guru Ghasidas and Satnami movement in Chhattisgarh — oral histories
  • Brj Raslila traditions — Narnaul to Chhattisgarh transmission
SAHAPEDIA
An open online resource on the arts, cultures and heritage of India.
© 2018 Sahapedia. Field documentation licensed under CC BY-NC-SA 4.0
Categories: Knowledge Traditions / Performing Arts
Tags: Chhattisgarh, Satnami, Ras Lila, Guru Ghasidas
Designed in warm earth tones with Chhattisgarhi folk border motifs.

Thursday, September 3, 2026

राजा गुरु बालक दास