Saturday, August 8, 2026

स्वाभिमान की सुगंध

*मूलनिवासी दिवस जनजातीय गौरव पर विशेष*  
*स्वाभिमान की सुगंध*

व्यापक अर्थ में देखें तो हम सभी के पूर्वज आदिवासी ही थे। धरती के किसी भी कोने में मनुष्य का विकास इसी रूप में हुआ। कालांतर में भोजन और आजीविका की तलाश में उसका आव्रजन हुआ, इतना ही।

पर जब हम विशिष्ट अर्थ में 'आदिवासी' कहते हैं, तो अभिप्राय उन समुदायों से होता है जिन्होंने आरंभ से एक ही अंचल में निवास किया। एक जैसी भाषा, कला, संस्कृति और रहन-सहन को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजा और बाहरी हस्तक्षेप से अपने को बचाए रखा।

विडंबना यह है कि 'आदिवासी' शब्द का प्रयोग अक्सर दूरी बनाने के लिए किया जाता है। उनके प्रति दिखाई जाने वाली दया या सहानुभूति भी क्षणिक होती है, जैसे किसी पशु-पक्षी के प्रति उमड़ता स्नेह। मैले-कुचैले और अभावग्रस्त जीवन की छवि तथा खान-पान को लेकर एक हिकारत का भाव गढ़ दिया गया है। इसी कारण यह शब्द कई बार उस वर्ग को भी चुभता है। कोई टाई-कोट पहना उच्च शिक्षित अधिकारी भी, यदि उसे 'आदिवासी' कहा जाए तो असहज हो जाता है। यह मेरे कई ST मित्रों का निजी अनुभव है, चाहे मंचों से 'गर्व से कहो' का उद्घोष कितना भी हो।

इसीलिए डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा दिया गया संवैधानिक शब्द - *'जनजाति' या 'अनुसूचित जनजाति'* - अधिक सार्थक और सर्वग्राह्य है। कुछ वर्षों से 'वनवासी' शब्द भी प्रचलन में आया। पर वन में रहने मात्र से कोई जनजाति नहीं हो जाता, यह तो सभी समझते हैं। 'Tribal' का सबसे सटीक हिंदी पर्याय 'जनजाति' ही है। 'अनुसूचित' का आशय उस सूची से है जिसमें वे समुदाय शामिल हैं जो आरंभ से एक ही भू-भाग में निवासरत रहे और जिन्होंने पलायन नहीं किया।

मैदानी क्षेत्रों में अनुसूचित वर्गों के महापुरुषों द्वारा चलाई गई सतत सामाजिक क्रांति का प्रभाव जनजातीय समाज पर भी पड़ा। यहाँ से भी नया नेतृत्व उभरा। जल, जंगल, जमीन के साथ-साथ भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए जन-आंदोलन हुए। यह चेतना शोषण के विरुद्ध थी, अस्तित्व की रक्षा के लिए थी।

छत्तीसगढ़ के संदर्भ में देखें तो अठारहवीं सदी में सतगुरु घासीदास के नवजागरण से प्रेरणा लेकर वीर नारायण सिंह ने अस्मिता की रक्षा हेतु स्थानीय शोषण के विरुद्ध बगावत की। *10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जय स्तंभ चौक में ब्रिटिश सत्ता ने उन्हें तोप से उड़ा दिया।* 

ठीक 3 वर्ष बाद, *27 मार्च 1860 की रात्रि* को उनके बाल-सखा, गुरु-पुत्र राजा गुरु बालक दास को भोजन के बहाने आमंत्रित कर निहत्थे गुरु पर सशस्त्र ठाकुरों की टोली ने हमला कर दिया। अंगरक्षक सरहा जोधाई ने लोटे के जल को उछालकर उसी को हथियार बनाकर विकट युद्ध किया और घायल गुरु को छप्पर फाड़कर खेत तक ले गए। घनघोर युद्ध के बाद *28 मार्च 1860 को गुरु की शहादत* हुई। 

इस प्रकार ट्रांस-महानदी क्षेत्र के ये दोनों महानायक षड्यंत्र के शिकार हुए। उनकी शहादत की गाथा आज भी जनमानस के हृदय-पटल पर स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है।

आज 'मूलनिवासी' शब्द भी तेजी से प्रचलन में है। इस पर अनावश्यक भ्रम फैलाना ठीक नहीं। मूल भावना एक ही है - इस महादेश के मूल निवासियों में स्वाभिमान की सुगंध बनी रहे। इसके लिए उनकी भाषा, कला, संस्कृति, रीति-नीति के साथ-साथ उनके जल, जंगल, जमीन और उनके गाँव, घर, खेत-खलिहान यानी उनकी संपूर्ण 'अस्मिता' का संरक्षण जरूरी है। वे हैं तो हम हैं, और तभी यह दुनिया है।

*जनजातीय गौरव दिवस की हार्दिक बधाई*  
*जय सेवा, जय सतनाम, जय भारत*


 डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
    प्राध्यापक 
वीरांगना रमौतीन माड़िया महिला महाविद्यालय नारायणपुर 

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Thursday, August 6, 2026

असहिष्णुता

प्रायः सहिष्णुता की पाठ पढ़ाते  हैं 
पर अमल में असहिष्णुता लाते  हैं

Sunday, August 2, 2026

गुरु अम्मर दास

#anilbhattcg 

गुरु अम्मरदास जयंती की हार्दिक बधाई -

सतनाम धर्म संस्कृति में गुरु घासीदास एवम् गुरु अम्मरदास द्वारा प्रवर्तित -
           
          अइटका -परब ( असाढ़ गुरु पूर्णिमा )

सतनाम धर्म के प्रवर्तक गुरु घासीदास बाबा  के ज्येष्ठ पुत्र गुरु अम्मरदास जी का जन्म असाढ़ पुन्नी को 1780 के आसपास गिरौदपुरी मे हुआ।वे बाल्यकाल से ही अपने पिता के सदृश्य विलछण. और तेजस्वी  थे। अत्यन्त  प्रतिभाशाली अम्मरदास जी  ७-८ वर्ष के उम्र मे अपनी माता सफूरा के साथ जलाऊ लकडी लाने वन  गये।एकाएक वे वन मे खो गये।किवदन्ती है कि उन्हे शेर उठाकर ले गये।आज भी शेर पन्जा मन्दिर गिरौदपुरी मे स्थित है।जहा सतपुरष या कोई महान योगी या साधक  के भी चरणचिन्ह है कहते है वह शेर पर सवार योग्य बालक के तलाश मे आये और बालक  अम्मरदास को अपने साथ बिठाकर गहन वन मे  चले गये। सफुरा और उनके साथ गई ग्राम्य महिलायें ढूंढती रही पर बालक  नही मिले।पुत्र वियोग से व्याकुल बेसुध हो गई ।
     वही तेजस्वी बालक गिरौदपुरी के आगे महकोनी जंगल स्थित बाघिन गुफा में साधनारत रहें ।१५ -१६वर्ष बाद २१-२२ वर्ष के उम्र मे साधू वेष मे ग्राम तेलासी मे रामत करते गुरु दम्पत्ति को छिन्दहा तालाब पार मे  मिले।
      तब गुरु अम्मरदास अपनी योग साधना की सिद्धी उपरान्त अपने माता-पिता को तलाशते हुये तेलासी पहुचे थे। पुत्र मिलन जगह होने के कारण सद्गुरु को बडा प्रिय लगा और वे यहा दु:खी पीड़ित लोगों की सेवा और उपचार करने लगे। आसपासके अनेक गाँव जिसमें जुनवानी , गिघपुरी मोहगांव,देवगांव ,गैतरा ,भंडार ,कोडापार अमसेना  आदि के लोगों ने गुरु परिवार को बसाने में अपेक्षित सहयोग किए।
      गुरु दम्पति  की ख्याति उनके योग साधना और अनेक दिव्य औषधियों  से असाध्य रोगो के उपचार आदि से सर्वत्र फैलने लगे।दूर -दूर से लोग उनके दर्शन और अपनी दु:ख -पीड़ा  के निदान के लिये आने लगे।
    उपकृत श्रद्धालुओ   द्वारा भेट स्वरूप भूमि अन्न आदि के संरक्षण हेतु तेलासी भन्डार मे बस गये।कलान्तर मे इन दोनो जगहों पर भव्य बाड़ा, मोती  महल व गढी किला नुमा परकोटा  बनवाये गये।जो  सतनाम धर्म का ऐतिहासिक स्मारक है।
         गुरु अम्मरदास जी  तेलासी वासियों के लिये अत्यधिक प्रिय रहे है।कहते है एक व्यक्ति मान्साहार हेतु कपड़े मे लपेटकर मांस ले जा रहे थे।लोग शिकायत किये।गुरु अम्मरदास ने योग बल से लोगो की दृष्टि बदले और जब पोटली खोले तो वह नाड़ियल प्रसाद के रुप मे लोगो को दिखाई दिये ।सभी चमत्कृत हो  गुरु चरण  मे नत हो  क्षमा -याचना किये। गुरु कृपा से अभिभूत तेलासी व अनेक ग्राम के लोग सतनाम दीक्षा लेकर सतनामी बने। यहाँ महासंगम हुआ।
       और उन सभी वर्गो ,जातियो को गुरु ने तस्मई- चीला  बनवाकर एक परात या बर्तन से बटवाये।यही अइटका है।इसके लिये विधान बनाये।बहते जलधारा से चावल दूध घी  गुड़ और मेवा डालकर सात्विक तस्मई ( खीर )बनाकर परस्पर बाटकर खाना।सत्सन्ग प्रवचन सुनना, पन्थी  नृत्य मन्गल करना यहां तक कि‌ सतनाम संस्कृति से संदर्भित लीला व नाट्य मंचन तक होते  रहे हैं।यह तेलासी सहित आसपास के कई ग्रामो मे तब से प्रचलन मे है।
     सफूरा माता  की अनुनय- विनय और बडे़ के रहते छोटे भाई विवाह कैसे करे के चलते न चाहते   प्रतापपुर मे अन्गारमति से अम्मरदास जी का विवाह हुआ।गौना लाए पर वे ब्रम्हचर्य का ही अनुपालन करते रहे और  सतनाम की आध्यात्मिक गुरु के रुप मे ख्यातिनाम हुए।
        ब्रम्हचारिणी  अन्गारमति भी  साध्वी जीवन अन्गीकृत की । आगे चलकर  माता प्रतापपुरहीन के नाम से विख्यात हुई ।आज उनकी शैय्या दर्शनीय है।
    गुरु अम्मरदास सेत सुमन  घोडे़ मे सेत वसन धारण कर चलते और लोगो मे सतनाम की अलख जगाते।पन्थी मन्गल भजन सत्सन्ग का प्रचलन  समाज मे गुरु अम्मरदास जी ने किया।
       एक दिन शिवनाथ नदी के तट पर  चटुआ घाट के समीप मनोरम स्थल पर अपने अनुयायियों को सतनाम समाधि का रहस्य बताते  अउठ दिन (साढे तीन दिन  )की  समाधि मे चले गये। 
     आसपास से बहुत से लोग आ गये।उन भीड़ मे कुछ विरोधी कहने लगे वो मृत हो गये है।उन्हे बाहर लाओ ।अनुयायी भीड़ के आगे बेबस अधुरी साधाना मे उन्हें वापस तन्द्रा मे लाने लगे।पर गुरु नही जगे।
        अन्तत: उन्हे पूर्ण समाधि दे दी गई ।
      जनश्रूति है जब गुरु की समाधि अवधि पूरी हुई तो लोग  देखे कि एक ज्योति पुन्ज समाधि को चीरती ऊर्ध्वगामी आकाश मे विलीन हो गई ।
       कई वर्षों के अन्तराल मे समीपस्थ ग्राम हरिनभठ्ठा के मालगुजार आधार दास सोनवानी अपने पुत्र मनोकामना पूर्ण होने पर गुरु अम्मरदास की समाधि मे भव्य मन्दिर बनवाये।
         आज यह सतनामिओ को  का प्रमुख धाम है जहां पर पौष - छेरछेरा पुन्नी को विशालकाय मेला गुरु के पुण्य स्मरण मे लगते आ रहे है।
          सतनाम आध्यात्मिक चेतना और साहित्य के प्रणेता गुरु अम्मरदास अम्मर रहे।

टीप - सतनाम अइटका परब प्रथम सार्वजनिक आयोजन हैं। कृपया इस पावन पर्व का सार्वजनिक आयोजन अपने अपने ग्राम मुहल्ले व जैतखाम परिसर पर करें। और तस्म ई बनाकार सत्संग प्रवचन व मंगल पंथी आदि‌ का आयोजन करें।
निम्न लिंक पर भावप्रवण मंगल भजन श्रवण कीजिए 
https://youtu.be/N_tROFeLlKQ?si=EwVgnh4B9AlfuhIT

              जय सतनाम।

गुरु पूर्णिमा की मंगलमय‌ मंगलकामनाएं 
 
     डाॅ. अनिल कुमार भतपहरी 
        9617777514 
            संपादक 
        सतनाम संदेश 
प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज

Friday, July 31, 2026

प्रेमचंद: बेहतर व्यक्ति, समाज और देश

प्रेमचंद : बेहतर व्यक्ति से बेहतर समाज और बेहतर देश

                              - डॉ. अनिल कुमार भतपहरी

गोदान, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि, प्रेमाश्रम जैसे दर्जनों उपन्यास और कफ़न, नमक का दरोगा, ईदगाह, पंच परमेश्वर, पूस की रात, ठाकुर का कुआँ जैसी तीन सौ से अधिक कहानियों के रचयिता, बीसवीं सदी के आरंभिक उत्तर भारतीय जन-जीवन के कुशल चितेरे, कथा सम्राट प्रेमचंद को उनकी जयंती पर सादर नमन।

प्रेमचंद की जयंती केवल एक स्मरण नहीं, आत्मावलोकन का अवसर है। प्रश्न यह है कि उनकी भाषा और भाव के निरंतर हो रहे क्षरण को हम कैसे रोकें?

आज हिंदी के सामने दोहरा संकट है। एक ओर उसे जानबूझकर इतना क्लिष्ट बनाया जा रहा है कि वह जन-विमुख हो जाए, दूसरी ओर वैश्विक होने के नाम पर टपोरी हिंग्लिश में गुड़गुड़ाया जा रहा है। प्रेमचंद ने इन दोनों अतियों के बीच का मध्यम मार्ग दिखाया था। उनकी भाषा सरल थी, पर सस्ती नहीं थी। उसमें उर्दू की रवानी, हिंदी की गरिमा और देशज की ठेठकता का अद्भुत संगम था, जिसे किसान भी समझ लेता था और विद्वान भी नकार नहीं पाता था। आज वही मध्यम मार्ग टूट रहा है।

दूसरा बड़ा प्रश्न यह है कि हम उनके यथार्थ-चित्रण से आदर्श गढ़ने में कहाँ चूक रहे हैं? प्रेमचंद यथार्थ दिखाकर छोड़ते नहीं थे। वे उस यथार्थ में से करुणा, परोपकार, सौहार्द और सहिष्णुता का आदर्श निकालते थे। पंच परमेश्वर में स्वार्थी व्यक्ति भी पंच की कुर्सी पर बैठते ही न्यायी हो जाता है। आज हम यथार्थ के चित्रण पर ही अटक गए हैं। मीडिया और बाजार के लिए विद्रूपता को और चटख बनाकर परोसा जाता है, पर उसमें सुधार का भाव गायब है।

यह सोचना भी जरूरी है कि क्या आज का लेखक स्वतंत्र है? क्या वह प्रेस और पत्रिका मालिकों की कृपा से ही छपेगा और उनके इशारे पर ही रचेगा? प्रेमचंद ने स्वयं सरस्वती प्रेस चलाते हुए घाटा सहा, पर समझौते से इनकार किया। आज जब लेखक को छपने से पहले यह सोचना पड़े कि प्रायोजक को यह बर्दाश्त होगा या नहीं, तो साहित्य सम्मेलन विलुप्ति की कगार पर पहुँचेंगे ही।

आज की स्थिति और भी चिंताजनक है। गुलामी के दौर में जब प्रेमचंद ने समाज की विद्रूपताओं को उजागर किया, तब उद्देश्य सुधार था। आजादी के सौ वर्षों के भीतर वह करुणा और सहिष्णुता धनीभूत होनी चाहिए थी, पर वह क्षीण क्यों हो रही है? समाहार की जगह छंटने, कटने और बंटने की नौबत क्यों आ रही है? क्यों हमारा यथार्थ-बोध और प्रगतिशील दृष्टिकोण इतनी जल्दी कथित धार्मिक, सांप्रदायिक और जातीय विद्वेष की गिरफ्त में आ जाता है? हम सीमा पार के खतरे को तो देखते हैं, पर धार्मिक अंतर्कलह और जातीय वैमनस्य के भीतर के खतरे से अनभिज्ञ क्यों हैं?

एक और द्वंद्व हमारे सामने है - आधुनिक विज्ञान और तकनीक बनाम पारंपरिक मिथकीय अवधारणाएँ। क्या उन्नत विचार लोक-परलोक की कहानियों के समक्ष घुटने टेक देंगे? आज का सृजनशील कथाकार पारंपरिक कथावाचकों के भव्य पंडालों में मूक दर्शक बना भजन-कीर्तन में रमा है, इहलोक की चिंता छोड़ परलोक सुधारने में निमग्न है, क्योंकि वहाँ भीड़ है, भव्य आयोजन हैं और बड़े प्रायोजक हैं।

साहित्यकारों के सम्मेलन के कोई आयोजक-प्रायोजक नहीं हैं, क्योंकि वहाँ यथार्थ बर्दाश्त नहीं होता, सत्य लिखने-पढ़ने-बोलने का साहस नहीं होता। प्रायोजित हास्य-व्यंग्य कवि सम्मेलन मंच पर आयोजकों के प्रशस्ति-वाचन और चुटकुलेबाजी को कतई साहित्य नहीं कहा जा सकता। उनसे कोई अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ता। वहाँ भी 20-20 क्रिकेट की तरह केवल ताली और आह-वाह है। वहाँ भी टीमें हैं और कॉरपोरेट घराने कवियों की क्रिकेटरों की तरह खरीद-फरोख्त कर रहे हैं।

ऐसे में डिजिटल माध्यम ने एक नई आशा जगाई है। उसने प्रकाशक की दहलीज वाला पुराना ताला तोड़ दिया है। आज कोई भी युवा गाँव में बैठकर सीधे पाठक से जुड़ सकता है। पर यहाँ भी सेंसरशिप का रूप बदल गया है। पहले संपादक रोकता था, अब एल्गोरिदम रोकता है। एल्गोरिदम को सन्नाटा बर्दाश्त नहीं, उसे तुरंत हँसी या गुस्सा चाहिए। प्रेमचंद का साहित्य धीरे पकने वाला साहित्य है। पूस की रात में हल्कू और जबरा का खेत में ठंड से सिकुड़ना किसी रील में फिट नहीं होता। उसे पढ़ने के बाद सन्नाटा चाहिए।

इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम डिजिटल को केवल छापने की मशीन न समझें, बल्कि उसे अड्डा बनाएँ, जहाँ बहस हो, टोका-टाकी हो, और एक पाठक के खत को हजार लाइक्स से बड़ा माना जाए।

अंततः प्रेमचंद का संदेश अत्यंत सरल है और वही इस आलेख का निष्कर्ष भी है - बेहतर व्यक्ति से बेहतर समाज बनता है और बेहतर समाज से बेहतर देश। प्रेमचंद जयंती पर यही संकल्प हमें करना है।

जय हिंद, जय हिंदी।

     - डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
            प्राध्यापक हिंदी 
वीरांगना रमौतीन माड़िया आदर्श महिला महाविद्यालय नारायणपुर 

चूल और हुदेसना

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चूल और हुदेसना 

पांच हांडी में भात तीन हांडी में दाल पक रहें हैं एक उतर गया हैं या चढ़ाए नहीं हैं। यह नौ मुंहा चूल हैं इसमें लंबी पतली लकड़ी एवं छेना (कंडा) डाला गया हैं। एक लंबी सीधी लकड़ी जिसे हुदेसना कहते हैं बीच- बीच में हुदेसते रहते हैं ताकि आगी रमरम जलता रहें। हुदेसना का आगे का सिरा भी आग से दहकता रहता हैं । इसके द्वारा चूल के किनारे एवं दूर तक जहां आग या आँच न पहुँचे वहां भी ले जाकर जलाया जाता हैं। अधजले छेने को अलटे -पलटे जाते हैं।
       गुरु घासीदास की अंतिम अमृतवाणी इसी हुदेसना के दृष्टांत से जुड़ा हुआ हैं-
     "कोनों मोला कारकों ले बड़े झन कइहा,काबर ओहा मोला हुदेसना म हुदेसन आय।"

चित्र: चूल अब यह विलुप्ति की ओर  हैं हाड़ी तो नंदा ही गए हैं ।इसमें एल्मुनियम की बांगा चढ़े हैं।बचपन में अपने गाँव जुनवानी के बाड़ी में यह चूल  भंडार तेलासी दसरहा,सिरपुर मेला ,शादी ब्याह के समय सगा आने और दादी की दशगात्र ( 1981) पिताश्री के दशगात्र( 2000 )में  देखते रहें हैं। मिट्टी की काली हाड़ी में तेल चुपर कर अंधना देते थे , पके  चावल ( भात)को झौंहा में उलेड़ कर पसाते फिर फरहर भात का झाल बनते थे। इसकी अनुष्ठानिक पूजा कर झाल से  भात वितरण किए जाते थे।
    वैसे झाल के भात का प्रहरी (रखवार) भतप्रहरी हुआ इस तरह गोत्र आया ऐसा एक लोक मान्यता हैं परन्तु भट्टप्रहरी ही अपभ्रंश होकर भतपहरी हुआ हैं।

Thursday, July 30, 2026

वर्षा गीत

येति ओती चारो कोती
 बरसय पानी बन मोती 

घुरगे खपरा चुहत हे छानी
झन पूछ खदर के कहानी 
रदरद रेला बोहे टीपटीप चले ओरवाती 

डोली धनहा  छलकन लागे 
नरवा तरिया उफनन लागे 
चोरोबोरो चारोंमुड़ा होगे चारोंकोती 
 
 बरसा म भींजे आठों अंग 
तन मन म छाए हवे उमंग 
रोपा बियासी मगन माते सवनाही 
 

Thursday, July 23, 2026

बौद्ध भिक्षुणी साधना स्थली: तुरतुरिया

बौद्ध भिक्षुणी साधना स्थली: तुरतुरिया 

सतनाम पंथ में एक साखी हैं। साखी वह जो कि मंगल भजन या पंथी भजन गाने के पूर्व सखियाए जाते हैं। साखी प्रमुखत: मुख्य गायक, पंडित, कड़िहार या कोई वादक भी हो सकते हैं। यह दो पंक्ति के होते हैं और उसके बाद क्षेपक गाकर सबकी मंगल कामना करते मंगल भजन/ पंथी भजन गाये जाते हैं।
उन्हीं अनगिनत साखियों में एक महत्वपूर्ण एवं पारंपरिक साखी हैं -
लक्ष्य कोस म गुरु बसे, सुरता  दिहव पठाय 
ज्ञान तुरी असवार हैं,गुरु छिन आवै पल जाय 
इसमें ज्ञान तुरी शब्द क्या हैं? इसे जानने समझने मेरा मन मथते रहा। कई लोग कहे यह तोर हैं तुरी नहीं।
गुरु ज्ञान में चढ़कर आते जाते हैं। कुछ विद्वान इसे ज्ञान तुरय यानि ज्ञान रूपी अश्व/ घोड़े पर चढ़कर सद्गुरु आते हैं।
तब मुझे बौद्ध धर्म के सहजानी सिद्धों की वाणियों में तुरी का मतलब समझ आया।  सिद्ध सरहपाद सहजयान के प्रवर्तक थे। प्राचीन पंथी निर्गुण और सिद्धवानी में हमें अनेक सिद्धों संतो की दोहा साखी शबद मंत्र उलट बासी आदि मिलते हैं। इन्हें कबीर से भी जोड़ते हैं।
(झारा खल्लारी महासमुंद निवासी भिक्षु रामेश्वरम जिनके दोनों पाँव रेलगाड़ी से कटे थे। वे युवावस्था में अपनी  माता जी की अस्थियां विसर्जन हेतु इलाहाबाद प्रयाग से वापस लौटते दुर्घटना ग्रस्त हो गए। जब स्वस्थ हुआ तब चेतना जागृत हो गए और वे बौद्ध धम्म अपनाकर भिक्षु होकर आजीवन गुरुघासीदास और तथागत बुद्ध की चेतना को प्रसारित करते रहे। वे हमारे दादा महंत नंदू नारायण भतपहरी और नाना द्वय नकुल देव ढीढी एवं कोंदा प्रसाद बघेल के मित्र रिश्तेदार और सहयोगी थे। उनसे मेरा साक्षात्कार वार्तालाप होते थे वे साधु वेश में नेपाल भूटान सिक्किम दार्जलिंग नागपुर इत्यादि बौद्ध स्थलों पर परिभ्रमण करते और बौद्ध विद्वानों से सत्संग वार्तालाप करते थे। उन्होंने ही मुझे पाली भाषा अक्षर इत्यादि की आरंभिक जानकारी दिए थे।
वे ज्ञान तुरी साधना के साधक और निर्भय एवं तटस्थ सा हो गए थे। उनकी पाली संस्कृत भाषा में अथ गुरु घासीदास चरितम अप्रकाशित पांडुलिपि था। जब मैं अध्यापक बना और पुस्तक आदि प्रकाशन की ओर ध्यान आकृष्ट हुआ तो उनके परिजनों से उक्त पांडुलिपि के बारे में जानकारियां ली परन्तु अपेक्षित जानकारी नहीं मिली। अन्यथा उनका प्रकाशन या सतनाम संदेश में किस्त में प्रकाशित करने की योजना असफल रहा।
   बाहरहाल तुरी साधना की एक अवस्था हैं। कबीर इस भाव को उन्मनी कहते हैं। मुझे लगता हैं यह तुरी साधना सिद्धि के कारण ही सिरपुर समीप सुरम्य तुरतुरिया का नाम हुआ। जहां बौद्ध भिक्षुणियां रहती और तुरी तंत्र साधना करती लोक कल्याण करती थी।)

   तुरतुरिया छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण परन्तु कम चर्चित प्राचीन बौद्ध स्थलों में से एक है। साधना में तुरी एक अवस्था हैं इसे सहज प्राप्त करने का सिद्ध स्थल तुरतुरिया हैं। 
कहाँ स्थित है?
तुरतुरिया रायपुर से लगभग 84 किमी और बलौदाबाजार जिला मुख्यालय से 29 किमी दूर, कसडोल तहसील के बहरिया गाँव के पास बलभद्री नाले पर स्थित है । छत्तीसगढ़ के इतिहासकार/ साहित्यकार हरि ठाकुर जी ने इसे बालमदेही नदी नाम देकर तुरतुरिया को वाल्मीकि आश्रम और लवकुश जन्म स्थली लिखें हैं। यह सिरपुर से मात्र 23 किमी दूर है और बारनवापारा अभयारण्य के पास पहाड़ियों से घिरा एक मनोरम स्थल है। इसे स्थानीय लोग सुरसुरी गंगा भी कहते हैं।  
नाम तुरतुरिया क्यों पड़ा?
इसका नाम बलभद्री नाले के कारण पड़ा। नाले का जल चट्टानों के माध्यम से निकलता है तो बुलबुलों से तुरतुर की ध्वनि निकलती है, इसलिए नाम तुरतुरिया पड़ा। जल एक लंबी संकरी सुरंग से होकर प्राचीन ईंटों से बने कुंड में गिरता है, जहाँ गोमुख बना हुआ है।  
बौद्ध भिक्षुणी साधना स्थली क्यों कहा जाता है?
यही इसका सबसे खास पक्ष है।

1. बौद्ध विहारों के प्रमाण: ऐसा माना जाता है कि यहाँ बौद्ध विहार थे जिनमें बौद्ध भिक्षुणियों का निवास था। सिरपुर के समीप होने के कारण इस बात को अधिक बल मिलता है कि यह स्थल कभी बौद्ध संस्कृति का केंद्र रहा होगा।  

2. मूर्तियाँ और अवशेष: यहाँ कुछ प्राचीन बुद्ध की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं, कुछ भग्न मंदिरों के अवशेष भी मिलते हैं। इस स्थल पर बौद्ध, वैष्णव तथा शैव धर्म से संबंधित मूर्तियों का मिलना यह सिद्ध करता है कि यहाँ कभी तीनों संप्रदायों की मिली-जुली संस्कृति रही होगी।  

3. समयकाल: यहाँ से प्राप्त शिलालेखों की लिपि से अनुमान है कि यहाँ की प्रतिमाओं का समय 8-9वीं शताब्दी है, यानी सिरपुर के बौद्ध उत्कर्ष काल के समकालीन।  

4. स्त्री परंपरा आज भी जीवित: आज भी यहाँ स्त्री पुजारिनों की नियुक्ति होती है, जो प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा है। यह सीधे तौर पर भिक्षुणी परंपरा से जुड़ा माना जाता है। कई विद्वान मानते हैं कि जो विशाल बुद्ध मूर्ति यहाँ है, उसे जनसाधारण वाल्मीकि ऋषि के रूप में पूजता है।  
रामायण से जुड़ी मान्यता
जनश्रुति है कि त्रेतायुग में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यही था और लव-कुश की यही जन्मस्थली थी। इसलिए यह स्थल वाल्मीकि आश्रम के नाम से भी प्रसिद्ध है।
  इसके साथ ही बौद्ध साधना स्थली के पार्श्व पहाड़ के शीर्ष में मातागढ़ स्थापित हैं जहाँ दुर्गा की नई प्रतिमा एवं मंदिर बनाई गई है बकरे की बलि होती हैं। खासकर पौष पूर्णिमा में यहाँ मेला लगता हैं।
   जीव हिंसा एवं बलि प्रथा को बंद कराने गुरुघासीदास ने सतनाम पंथ के माध्यम से जनजागरण चलाया इस कारण परिक्षेत्र के सतनामियों ने यहां जैतखाम स्थापित कर उनके विचारों को जनमानस में प्रसारित करते आ रहे हैं। यह भी दर्शनीय हैं।

कब जाएँ?

पौष माह में यहाँ तीन दिवसीय मेला लगता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। धार्मिक और पुरातात्विक महत्व के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी यह पर्यटकों को आकर्षित करता है।  

यदि आप सिरपुर जाते हैं तो तुरतुरिया को एक ही दिन में कवर किया जा सकता है, यह बौद्ध इतिहास में छत्तीसगढ़ की भिक्षुणी संघ की भूमिका को समझने के लिए सबसे प्रामाणिक स्थलों में से एक है।

उक्त जानकारी AI से जनरेटेड हैं कुछेक तथ्य फोटोग्राफ मैंने प्रसंगानुकूल संयोजन किया हूं।
    डॉ. अनिल भतपहरी/ 9617777514