Saturday, July 11, 2026

टैबलेट

होते उपदेश 
बड़े लोगों की मौन 
करा रहें क्लेश 
अब बड़े लोगों की मौन 

टैबलेट

बड़े लोगों की मौन 
होते उपदेश 
अब उनके मौन ही 
करा रहे क्लेश 

हाइकू

पहले मौन 
होते थे उपदेश 
अब है क्लेश 

तीजन

तीजन 

पंडवानी की पर्याय हो चुकी  पद्म विभूषण तीजन बाई की लंबी बीमारी के बाद दुःखद निधन से कला जगत सहित प्रदेश में शोक व्याप्त हैं। निरक्षर होते हुए भी वो महाभारत एवं श्रीमद्भागवत की गूढ़तम बातें ऐसे प्रस्तुत करती कि श्रोताओं के मानस पटल पर उनकी बातें सदैव अंकित हो जाती थी।

   गुरु घासीदास छात्रावास आमापारा रायपुर में रहते छात्र जीवन में पहली बार मैं 1988 -89 में उनकी पंडवानी  विवेकानंद आश्रम रायपुर में श्रवण किया ।तब आत्मानंद जी थे और उनसे छिटपुट संवाद भी होते रहें हैं । तत्कालीन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा जी के आगमन पूर्व उनकी "राजा जनमेजय नाग यज्ञ पर्व " प्रस्तुति सुना और उनकी अप्रतिम भावाभिव्यक्ति देख चकित हुआ। क्योंकि मैं पिता श्री के नवरंग नाट्य कला मंच से निकला अभिनय की बारीकियां को छुटपुट जनता समझता भी था और शहर की सांस्कृतिक गतिविधियों के दर्शक और यदा कदा प्रतिभागी भी हुआ करता था।

उनकी दूसरी प्रस्तुति लंबे अंतराल बाद छत्तीसगढ़ राज्य के अभ्युदय के बाद प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी जी के शपथ ग्रहण समारोह पुलिस ग्राउंड रायपुर में देखा ।तब सहायक प्राध्यापक हुए 4 वर्ष हो चुका था और कई छात्रों/ कलावंत लोगों को ऑटोबायोग्राफी देने का सौभाग्य मिलना शुरू भी हो गया था। (पिताश्री सुकाल दास भतपहरी शिक्षक कलावंत रायपुर रिसर्च सेंटर हॉस्पिटल में हार्निया आपरेशन उपरांत भर्ती था। वे ही समारोह स्थल जाकर इतिहास बनते देखने और साक्षी होने का आशीष दिए थे।हालांकि उन्हें लाख उपाय के बाद बचा नहीं सके और महीने भर बाद दिल्ली एम्स में 4 दिसंबर 2000 को सतलोक प्रयाण कर गये। )  पहली ऑटोग्राफ मैने अपने पॉकेट डायरी जो अक्सर रखकर चलता था ,के एक पेज पर तीजन बाई का ऑटोबायोग्राफ लिया। कत्थक देखा और वापस अस्पताल आकर पिता श्री को उनकी ऑटोग्राफ दिखाया। वे प्रदेश बनते और एक कला साधिका की हस्ताक्षर देख हर्षित हुए।
     तीजन साक्षरता अभियान से जुड़ी अक्षर समझी,हस्ताक्षर करना सीखी। विरासत से प्राप्त ज्ञान  नैसर्गिक प्रतिभा से वे विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट मानद उपाधि पाई और लोग उनपर पी-एच.डी. भी की। आगे भी करेंगे।
        निःसंदेह  तीजन कापालिक शाखा की महारानी थी और उनकी असाधारण उपलब्धियां कला साधकों के लिए प्रेरक और प्रदेश के गौरव हैं। वे छिन (पाम पौधे की पत्ती)की बाहरी (झाड़ू )बेचकर आजीविका कमाती अपनी कला साधना से "फर्श से अर्श की ऊँचाई"  स्पर्श की। उनकी अदम्य संघर्ष, साधना, प्रस्तुति  एवं उपलब्धि सदैव प्रेरक रहेंगे।
     विन्रम श्रद्धांजलि शत शत नमन...

डॉ.अनिल भतपहरी 9617777514

Friday, July 10, 2026

सतनाम धर्म - संस्कृति के संवाहक समुदाय संगठित हो।

सतनाम धर्म -संस्कृति के संवाहक संगठित हो 

भारतीय संस्कृति  में अनेक जाति ,वर्ण , पंथादि हैं। इसलिये उनमें अनेक मत -मतांतर  हैं परंतु उनके बीच एक अंतर्संबंध भी हैं। गहराई से विचार करने पर वे सब उजागर होते हैं। ज्ञात इतिहास से अवगत होते हैं कि बौद्धिक चेतना के केंद्र में बुद्ध  हैं। 
       पूर्व मान्यताओं के इतर उनकी शिक्षा में ईश्वर आत्मा स्वर्ग नर्क नहीं हैं बल्कि मानवता हैं और मानव समुदाय में परस्पर  सौहार्द्र पूर्वक जीवन निर्वाह हेतु सुगम मध्यम मार्ग हैं। उनके उपदेश ध्यान योग समाधि निर्वाण त्रिपिटक धम्मपद आदि ही महायान हीनयान तंत्रयान ब्रजयान होते सहजयान जैसे शाखाओं प्रशाखाओ में अस्तित्व मान हुई।

    कालांतर में सहजयानी सतनामियों के "निर्वाण ग्रन्थ"  कबीर का बीजक, गोरख वाणी ,रैदास रामायण ,नानक सलोकु सहित सबके सार" गुरु ग्रंथ साहिब" ,गुरुघासीदास की अमृतवाणी से छत्तीसगढ़ में "सतनामयन , सतनाम -संकीर्तन जैसे निर्गुण ग्रंथ/साहित्य सृजित हुआ। इनसे विकसित "सतनाम दर्शन "भारतीय षट्दर्शन में वर्ण, जाति विहीन समुदाय हेतु "सप्त दर्शन"  के रुप में प्रतिष्ठित हो रहे हैं।
सिख धर्म में गुरुद्वारा में साध संगत का अत्यंत महत्व हैं वहां साध सतनामी का आदर दर्शनीय हैं। 
  सत्य दर्शन नामक प्रतिष्ठान विगत 50 वर्षों से साहित्यिक एवं बौद्धिक जगत में  लोकप्रिय हैं। सत्य ध्वज, सत्यालोक और सतनाम संदेश जैसे पत्रिकाएं संतो गुरुओं की सीख और उपदेश को लिपिबद्ध कर संरक्षित करने की अनुपम कार्य किए।अब अनेक संस्थान उनके अनुरुप कार्य करने प्रतिबद्ध हैं।
   अब समय हैं कि बुद्ध से लेकर गुरुघासीदास तक 2500 वर्षों की ज्ञान -विज्ञान, साधना -सिद्धी , साहित्य -दर्शन कलाएं जो परम सत्य और सदा मानव को सदमार्ग दिखाने वाले सनातन संस्कृति  के अभिन्न अंग हैं ।इनके प्रवर्तक एवं संवाहक गुरुओं /संतो की अनुयाई जो देश विदेश में करोड़ों की संख्या में विद्यमान हैं वे सभी एकत्र और संगठित हो।  ताकि समानता से युक्त सतनाम की अजस्त्र धारा अविरल प्रवाहित होता रहें। इनके अनुयाई जो कृषक, उत्पादक श्रमण हैं ।वह सामंती  एवं अधिनायक वाद के शोषण दमन आदि से मुक्त रहें । 
      जय सतनाम

Sunday, June 28, 2026

शउर ( ग़ज़ल)

शउर तक नहीं जिन्हें प्याली उठाने के 
कैसे कैसे लोग चले आते हैं मयखाने में 

खा रहे बेतरतीब पर वे क्यों अघाते नहीं 
कोई नायाब नुस्खा मददगार हैं पचाने में 

मत जाओं वहां न कद्र और शोर हैं बहुत 
चुप अजनबी सा मौज किसी के जनाज़े में 

हर बार हसरतें जग उठती हैं बारिश में 
पर क्या बेबसी जमीं की बंजर है उगाने में 

शलिकादारो से न करो उम्मीद कुछ होगा नहीं 
चले बेशउर तलाशे अब नई मज़ा अफ़साने में

सरई बोड़ा

सरई बोड़ा की साग 

बोड़ा, ईमली कढ़ी, मडिया (रागी)चीला, स्ट्रीम रईस भात और कई दशकों से एक ही ब्रांड जबलपुर का लिज्जत पापड़ ।

पहली बार आज रात्रि भोजन में औषधीय गुणकारी एवं अनुपम स्वाद का मणिकांचन युति.. बोड़ा की साग खाकर सच में मज़ा आ गया।
   तभी तो बोड़ा बस्तर के हाट बाजार में ही हज़ार बारह सौ किलो बिक रहे हैं।

   वैसे अपने सुधि पाठकों को अवगत करा दूं 1996 में ही पेंड्रारोड के बाज़ार में बोड़ा 20 रु कूढ़ा (लगभग 200 Gram)  में सबसे महंगी और अनोखी सब्ज़ी का गुणगान कॉलेज के वरिष्ठ प्राध्यापको से सुनकर मंगली बाजार से खरीद कर घर लाया ।परन्तु नई नवेली सुवारी ने जब धोकर काटी अंदर से कालापन और लिरबूट चिपचिपा पन देख बिचक कर फेंक दी। पंडित घर की बेटी विशुद्ध शाकाहारी जो थीं...तब से बोड़ा कभी खरीदे ही नहीं न कहीं खाने मिल पाया।
पर आज 30 वर्षों के बाद उनकी अनुपस्थिति में  बोड़ा का आस्वादन ले ही लिया। हालाँकि इसे न खरीदा न बनाया पर इतना तो हैं कि आसपास आज भी कुछ स्नेही जनों से  भेंट उपहार स्वरुप मिल ही जाते हैं। एक सज्जन ने इसी तरह जोजिया के भीषण गर्मी में मड़िया पेज पिलाकर तृप्त किया।

    बहरहाल अनुपम स्वाद वाली यह बोड़ा सरई पेड़ के नीचे तने के आसपास बादल की गर्जना से मशरुम की तरह उग आते हैं। इस तरह सरई वनांचल में महुए के बाद बहुपयोगी वृक्ष हैं। इनकी पत्ते की दोना पत्तल, सीधी नर्म टहनियों की दातुन , फूल फल खाने एवं अन्य उपयोगी वस्तुएं बनाने और लकड़ी चौखट दरवाजे से लेकर रेलवे सीलपट से लेकर अनेक तरह की उपयोगी हैं।
   सतनाम संस्कृति में सरई अत्यंत पवित्र वृक्ष हैं इनके जैतखाम बनाएं जाते हैं इसलिए सरई पेड़ श्रद्धा एवं आस्था का प्रतीक हैं। श्रद्धालु पेड़ को देखकर प्रणाम करके ही आगे गंतव्य की ओर प्रयाण करते हैं।