सत-संधान
Tuesday, January 13, 2026
Thursday, January 8, 2026
नई शिक्षा नीति
नई शिक्षा नीति
स्थान ग्रामीण या मध्यम वर्गीय क़स्बाई परिवार. जहाँ रेडियो या टीवी में सुबह 8 बजे समाचार प्रसारण हो रहें हैं..इस पर किसी का ध्यान नहीं हैं और बेखबर दैनिक कार्यों मे लगे हुए हैं.. तभी पिता जी के कानो समाचार सुनाई पड़ता हैं - इस वर्ष हायर सेकेण्डरी 12 वीं की परीक्षा परिणाम घोषित कर दी गई. परिणाम 70%. हमेशा की तरह विगत एक दशकों से छात्राएं छात्रों से बाजी मारती आ रही हैं. मेरिट मे भी सर्वाधिक बालिकाएं हैं. परिणाम लोक शिक्षा विभाग के बेवसाईट मे अपलोड कर दी गई हैं.मान मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री ने उत्तीर्ण विद्यार्थियों को बधाई देते उनकी उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनायें दी. आगे का समाचार.... पिता उत्साह पूर्वक अरे बेटा अम्बा तुम्हारा रिजल्ट आ गया मोबाईल में देखों...
अम्बा: हा पापा वें झट आटे गुंथ रही थी को छोड़ उठ खड़ी हूई और वास बेसिन से हाथ धोने लगी...
माता जी: अरे महरानी जी पुरा गुंथ तो लेती भगी नहीं जा रही. अम्बा बिना कोई जवाब दिये जल्दी से मोबाईल लेकर बेवसाईट खोलकर अपना रोल नंबर डाली पर नामांकन नम्बर स्मृत नहीं होने पर वें अपना प्रवेश ढूंढने लगी... तब तक पड़ोसन अपने घर की बालकनी से आवाज लगाई.
अरे बधाई हो अम्बा मेरिट मे पास हो गई. बिट्टू के पापा बता रहें हैं.
तब तक अम्बा की धडकने सुनकर और बड़ गई पिता जी ख़ुशी से उछल खड़े हो गये और माता जी नमस्ते कर हाथ जोड़ने लगी... मोबाईल सर्च करतें अम्बा धन्यवाद देते दूर से प्रणाम कहीं.
थोड़ी देर बाद वो एकदम सी उच्चल पड़ी मेरिट मे सातवे स्थान प्राप्त की हैं सभी विषय मे डीकटेंशन हैं. सर्वाधिक अंक उन्हें हिंदी साहित्य मे मिली हैं. यह बड़े उत्साह से अपने पापा जी को बताई पास मे माता जी सट कर खड़ी मोबाईल को कौतूहल पूर्वक देख रही हैं.
पापा : बेटा नई शिक्षा नीति के तहत तुम्हे अब ऐसे विषय चयन करना हैं कि आगे चलकर एक अच्छा प्रशासनिक अफसर बनो. क्योंकि तुम्हे डॉक्टर बनना पसंद नहीं हैं क्यों सच कहाँ न?
हा पापा क्लास मे प्रवेश के समय वेलकम पार्टी मे मैंने दृढ़ता पूर्वक अपना एम बता दी थी कि मुझे डॉक्टर,इंजिनियर नहीं एक सक्षम प्रशासनिक अधिकारी बनकर देश और समाज सेवा करना हैं.
शाबास तभी तो बारहवीं मे इतिहास, नागरिक शास्त्र और अर्थशास्त्र ली थी. मैं तो तुम्हारी मैथस का अंक देख इंजीनियरिंग करने का सलाह दिया था. पर तुम्हारी माता श्री डॉक्टर बनाना चाहती थी.
खैर बेटा जाओ और मिठाई दुकान से कलाकंद लेते आना. जेब से रूपये निकलते.. ये लो पैसे.
माता: और हा,नाड़ीयल अगरबत्ती तो है, कपूर, सात बंगला पान जरुर लेते आना..
अम्बा चाबी ले बाहर पोर्च मे खड़ी स्कूटी को कपड़े से पोछने लगी.
दृश्य 2
दृश्य बाजार का चारों ओर चहल पहल है वहाँ एक मिठाई दुकान के पास अम्बा स्कूटी खड़ी कर ज्यो ही मुड़ी उनकी सहपाठी लडके लड़की मिल गये वें सभी मिठाई लेने आये थे कुछ ले चुके और हाथ मे मिठाई लटकाएं हुए एक दूसरे को खिलाने लगे.
अम्बा तुम्हे मिठाई के साथ साथ पी वी आर मे फ़िल्म भी दिखानी होगी. बड़ी छुपी रुस्तम निकली यार!
सहेलियां उन्हें गले से लगा ली माहौल खुशनुमा और चहकते हुए सभी एक -दूसरे को बधाई देते अपने अपने घर चली गई.
पान खरीदने ज्यो ही पनवाड़ी की दुकान गई अम्बा देख कर चौकी कि उनका भाई आरव कुछ दोस्तों के साथ गुटखा सिगरेट पीने मे उन्मत्त थे. दूर से आकाश सिगरेट फेकते लपकते हुए अम्बा के पास जाकर गुस्से से गरियाने लगे.
आकाश - यहाँ क्या कर रही हो सुना है इधर लड़कियां नहीं आती?
अम्बा - अच्छा ताकि तुम लडके गुलछर्रे उड़ाओ.
आकाश - उंगली दिखाते देखोंsss
क्या देखों ! मैं यहाँ पूजा के लिए पान लेने आई हूँ.
आकाश - तो घर मे मुझे क्यों नहीं कहाँ?
अम्बा - तुम थे ही कहाँ और रहते भी हो?
आकाश - अच्छा तुम क्या कहना चाहती हो देखों बहस मत करो सभी इधर देख रहें है. अच्छा जाओ मैं लेते आ रहा हूँ.
अम्बा - नहीं लेकर ही जाउंगी या तुम्ही लाकर दे दो और घर चलो. तुम्हे पता होनी चाहिए कि मेरी रिजल्ट की ख़ुशी मे पापा मिठाई और मम्मी पूजन सामग्री मंगाई है. बात को चेंज करती हूई कहीं ताकि कोई बखेड़ा खड़ा न कर दे क्योंकि आकाश के स्वाभाव को अम्बा अच्छी तरह जानती समझती है. इस वर्ष आकाश भी इंजिनियर बनने कॉलेज ड्राफ कर PET दिया है और उनका रिजल्ट नहीं आया है.सो कुछ दोस्तों के साथ शहर के बाजार के आसपास यु ही घूमते फिरते रहते है.
3 दृश्य कॉलेज परिसर
चारों तरफ छात्रों का शोर और सूचना पटल पर प्रवेश सूची की लिस्ट देखने उद्द्त है पंजे के एड़ी उठाकर या जम्प लगाकर उचक उचक कर नाम देखें जा रहें है.
अम्बा का नाम लिस्ट मे सबसे ऊपर था. इस बार आकाश भी प्रवेश हेतु फार्म भरा तो है पर नाम आने की भरोसा नहीं है.
भीड़ को चिरते अम्बा के पास गया जो अपनी स्कूटी के पास एक सहेली रेणु के साथ खड़ी थी.
आकाश - तुम दोनों का नाम फस्ट लिस्ट मे है. पर मेरा नहीं सेकेण्ड लिस्ट मे आएगा क्योंकि अभी कटाफ 65% है.
मेरा 61 है और एक वर्ष का गैप तो सेकेड लिस्ट मे आना तय है.
चलो घर एक सप्ताह के अंदर फीस पटाना है.
दृश्य 4
क्लास रूम बी ए प्रथम
प्रोफ़ेसर का कॉलेज प्रवेश
छात्रों का समवेत स्वर -गुड मार्निग सर
प्रोफेसर- गुड मार्निग, अच्छा आपलोग सुप्रभात और नमस्कार भी कहना सीखो क्योंकि हमें अपनी संस्कृति भूलना नहीं चाहिए
छात्रों- जी सर
प्रोफेसर - तो बच्चों आप लोगो को पता है अपना अपना मुख्य विषय और सहायक विषय क्योंकि आप लोग नई शिक्षा नीति के तहत नए पाठ्यक्रम पढ़ रहें है.
अम्बा - जी सर इनकी जानकारी बेबसाईट मे अपलोड है और चवाइस सेंटर में फार्म भरते पता है.
प्रो वेरी गुड क्या नाम है बेटा
अम्बा - जी अम्बा पर बेटा क्यों सर मैं तो बेटी हूँ.
प्रो - वो इसलिए की कोई फर्क न हो
अम्बा - जी ऐसा कहने मे ही फर्क या भेद सा हमें चुभता है. हमें बेटी या छात्रों कहें.
प्रो अच्छा ऐसा क्यों?
अम्बा - क्योंकि ऐसा हमारे पिताजी अक्सर कहते है पर मुझे उनका बेटा अच्छा नहीं लगता. अच्छा और सफलता के काम करे तो भी क्रेडिट बेटा को बेटियों को नहीं ऐसा ना हो सर.
प्रो- ए बात है पर मुझे क्या आजकल सभी जगहों घर आफिस बाज़ार सभी... बात काटते हुए अम्बा जो है वहीं कहीं जाय.
रेणु :जी सर हम बेटियों का वजूद और प्रभाव तो कुछ हो सके. साहसिक कार्य और सफलता का मतलब लडके/ बेटे यह तो न हो
प्रो- झेपते हुए ठीक है, ठीक है
नेपथ्य स्वर - राज्य के 12 बोर्ड मे अधिकतर छात्र संख्या पास हुए है लेकिन सबके लिए उच्च शिक्षा संभव नहीं. इस बार इस महाविद्याल मे बी ए फस्ट ईयर का 200 सीट, बीएससी का 70 और बी काम का 50 सीट पुरा भर गया.और अनेक छात्र कम मार्क्स के कारण प्रवेश से वंचित भी गये उन्हें मौका मिलना चाहिए
दृश्य 5
नेपथ्य स्वर - हा जी हा अनेक व्यवसायिक/ तकनीकी शिक्षा है आई आई टी पालिटेक्निक, इंजिनियरिंग नर्सिंग मेडिकल कृषि डेयरी मत्स्य इत्यादि इन जगहों पर छात्र बट जाते है बाकी डिग्री / पोस्ट डिग्री कॉलेज जिनकी प्रदेश मे 335 महाविद्यालय और 9 विश्वविद्यालय है
फिर उसके बाद अशासकीय विश्वविद्यालय 11 और 350 महाविद्याल है. इसके बाद स्वाध्यायी परीक्षा और मुक्त और दूरस्थ विश्वविद्यालय के ऑप्शन भी है कोई भी अपने सुविधा अनुसार चयन कर सकते है.
महाविद्याल परिसर दो सहेली परस्पर चर्चा करतें हुए
अम्बा- 12 वीं के अनुसार विषय तो ले लिए पर रुची के अनुरुप वैकल्पिक विषय मेरा साइस का होता तो अच्छा रहता क्योंकि माता जी मुझे डॉक्टर बनाना चाहती थी और पिताजी इंजिनियर.
रेणु :- अच्छा तो तुम्हारी इच्छा? हाई स्कूल तक तो कोई लक्ष्य या समझ नहीं था और फिर हमारे इर्द गिर्द 12 वीं मे ओ विषय नहीं मिले अन्य जगह पढ़ने भेजा नहीं तो आर्ट ही ले ली..
तो फिर रूचि किसमे मे है?
ओ तो इच्छा डॉक्टर बनने की थी पर...
तो अभी भी आप्सन मे जुलाजी ग्रुप ले लीजिये. आगे चलकर काम आएगा. हो सके तो नर्सिंग कॉलेज चुन लेना.
क्या ऐसा संभव है क्यों नहीं? चलिए महाविद्याल में स्थापित हेल्प डेक्स मे जाये.. ओके चलिए
दृश्य 6
हेल्प डेक्स टेबल एक्सपर्ट लोग उस पार बैठे हुए कुछेक सामने बैठे/ खड़े
एन ई पी के तहत प्रत्येक छात्रों को मुख्य विषय के साथ ऐच्छीक विषय और रोजगार एवं मूल्य आधारित कोर्स ले सकते है. भारतीय ज्ञान परम्परा पृथक से जो रुचिकर हो. मतलब कम्प्लीट ऐजुकेशन का पाठ्यक्रम नए केरीकुलम के आधार पर निर्मित है और हमारा प्रदेश दो वर्ष पूर्व लागु कर देश मे चर्चित है.
आकाश: अच्छा सर लेकिन पूरी तरह स्पष्ट समझ नहीं आ रहा हैं ।
आप ध्यान से सुनिए और इसे समझने सामने स्क्रीन बोर्ड देखिए उसमें सारे ऑप्शन प्ले हो रहे हैं। वेबसाइट और गुगल भी देख समझ सकते हैं।
फिर भी समझिए_
हेल्प डेक्स _ किसी भी संकाय के मुख्य तीन विषय DSC है दूसरे संकाय से किसी एक विषय को लेगा वह DSE होता है।पर्यावरण और भाषा सिर्फ एक सेमेस्टर मे पढ़ना होगा वहAEC है।बाकी के संवैधानिक मूल्य /भारतीय पंरपरा आदि का अध्ययन है वह और कौसल विकास से संबंधित कोर्स है।
अम्बा _ जी सर बहुत अच्छा समझ आ गया।
हेल्प डेक्स _ और हा आसपास के उद्योग जगत से आगे चर्चा और अनुबंधन किया जाएगा कि संबंधित छात्रों को अप्रेंटिश करवाया जाय ताकि उन्हें सैद्धांतिक और व्यवहारिक ज्ञान हो सके। और यह सब सेमेस्टर पद्धति में होगा।
सेमेस्टर पद्वति के कोर्स भविष्य में विद्वार्थियों के लिए उपयोगी है सभी विषयों की जानकारी होगी किंतु खासकर।प्रतियोगिता.परीक्षाओं के लिए उपयोगी है।
लेकिन विद्वार्थियों की नियमित उपस्थिति होना होगा । उनके लिए सरकार योजना बना रहे है जैसे बस किराया साइकिल या स्कूटी वितरण इत्यादि।
विभाग का प्रयास रहेगा कि सभी विद्वार्थी सेमेस्टर पद्वति को बारीकी से समझ सकें हैं।
नई शिक्षा नीति केवल सरकारी नौकरी पर ही ध्यान केंद्रित नहीं करेगी बल्कि छात्र को सामान्यतः ज्ञान और व्यवहार यानि लोकाचार से अवगत कराएगी। उन्हें हर तरह से दक्ष करने प्रतिबद्ध होगी।
इसके लिए प्राध्यापकों को भी प्रशिक्षित करने योजना बनाई जाएगी ताकि हमारे देश के होनहार युवाओं को समय परिस्थिति के अनुरूप पढ़ा सके।
आजकल मोबाइल नेट में गुगल e-book सोसल,मीडिया, मेटा फेसबुक A I जैसे अत्यधिक टेक्नोलॉजी हैं E लाइब्रेरी है ।परन्तु इन सबको कैसे अनुप्रयोग करे और महत्वपूर्ण चीजों इत्यादि को समझाए इसलिए हमारे प्राध्यापकों को सामग्री उपलब्ध करवा रहे हैं।
जी सर धन्यवाद आभार
दृश्य 7
सभी छात्र संतुष्ट होकर क्लास रुम में प्रवेश करते हैं। और नई शिक्षा नीति की प्रशंसा करते हुए
महाविद्यालय में स्मार्ट कक्ष, लैब लाइब्रेरी और स्वच्छ परिसर के साथ केंटिंग लिए महाविद्यालय प्रशासन और उच्च शिक्षा विभाग का प्रशंसा करते विद्यार्थी गीत गाते हुए नृत्य करते हैं ।
पटाक्षेप
डॉ अनिल कुमार भतपहरी
9617777514
[1/8, 16:52] Dr. Anil Bhatt: सात दृश्य रहेगा मेडम
प्रमुख पात्र
2माता पिता
3 छात्र
1प्राध्यापक
1प्राचार्य
3हेल्प डेक्स
कुल 10 पात्र
यही लोग आरम्भ और अंत में नृत्य गीत प्रस्तुत करते रोचक और इंटरटेनमेंट करेंगे। क्योपकथन में रिहर्सल के वक्त चुटिले संवाद भी जोड़ सकते हैं।
[1/8, 16:52] Dr. Anil Bhatt: नृत्य गान के बाद कुछ महीने और टेस्ट परीक्षा के बाद
छात्रों और अध्यापकों की समस्या और निदान पर तीन दृश्य और लिखा जाएगा।
फिर यह स्क्रिप्ट 10 दृश्यों में समाप्त हो जाएगी।
Sunday, January 4, 2026
सुरता केयूर भूषण
सुरता केयूर भूषण
सम्मति कब होही बिहान
सतनाम धर्म एंव संस्कृति पर अगाध श्रद्धा रखने वाले श्रद्धेय केयूर भूषण जी से १९८७-८८ में महाविद्यालयीन शिक्षा ग्रहण करने रायपुर आते ही मिलन - भेटन हो गये। कारक रहे हमारे पूज्य पिता सुकालदास भतपहरी के साहित्यिक मित्र पं. सरयू कांत झा जी जो कि मूर्धन्य साहित्यकार विचारक और प्राचार्य छत्तीसगढ महाविद्यालय रायपुर थे । झा साहब कोसरंगी स्कूल में प्राथमिक शिक्षा लिए थे और जब वहाँ हाई स्कूल खुले तब वहाँ के प्र प्राचार्य हमारे पिता जी रहे।जब- जब वे रायपुर से अपने गृहग्राम परसदा आते तो अक्सर मुझे उन्हे अपनी राजदूत मोटर साइकिल से पहुचाने का सौभाग्य मिलता। इस बहाने हमें उनकी आशीष व प्रेम मिला।वे बाल्यकाल से ही हमारी काव्य व गीत लेखन पठन को प्रोत्साहित ही नहीं दो -तीन बार सम्मानित भी किए थे। वे कोसरंगी स्कूल के विभिन्न समारोह में मुख्य या विशिष्ट अतिथि के रुप से आमंत्रित होते ही रहते थे। और अक्सर जब वे गांव में होते तो हमे ही लाने या ले जाने होते थे।
गुरु घासीदास छात्रावास आमापारा रायपुर में रहकर दुर्गा महाविद्यालय में अध्ययन रत रहे। हमारे संरक्षक व पिता श्री के दूर के पर सगे मामा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व मंत्री कन्हैयालाल कोसरिया जी रहे।वे और वार्डन रामाधार बंजारे जो कि अमीन पारा छात्रावास संचालित करते अक्सर केयूर भूषण जी गुरुघासीदास जयंती या अन्य समारोह मे आते । मंत्री कोसरिया जी के शिक्षक व कवि पुत्र रामप्रसाद कोसरिया व उनके मित्र सुशील यदु जी वही सब मिलकर ही हमे काव्य गोष्ठी में ले गये जहां स्वनाम धन्य रचनाकारों जिनमें हरिठाकुर बंसत दीवान सरयुकांत झा मन्नुलाल यदु रामेश्वर शर्मा त्यागी जी जागेश्वर प्रसाद जी एस दिल्लीवार जैसे अनेक छत्तीसगढी प्रेमी साहित्यकारों /चिन्तको से हमारा परिचय हुआ और लेखन- प्रकाशन का दौर चल पडा। हमें समिति में कार्यकारिणी सदस्य बनाएं गये ।
इस बीच केयूर भूषण का बुढा- नाती वाला दुलार मिलते रहा। हमारी कृति" जय छत्तीसगढ" को वंदना सदृश्य छत्तीसगढी सेवक द्वारा दी जा रही अखंड धरना गुरु घासीदास चौक के समीप कलेक्टर परिसर में २-३ बार गान करने का अवसर आया। जागेश्वर दीनदयाल वर्मा चन्द्रशेखर वर्मा सुखदास बंजारे श्यामराव वंडलकर डाॅ सीताराम साहू आदि हम लोग वहां बैठते और काव्यपाठ आदि करते । इस दरम्यान पृथक छत्तीसगढ हेतु लेख कविता लिखे छपे और फिर १९९५ -९६ में प्रध्यापकी की नौकरी करने पेन्ड्रारोड जाना हो गया और रायपुर की साहित्यिक मित्र मंडली से दूर भी ।
११-१२ वर्ष बाद २००७ में हमारी काव्य संग्रह " कब होही बिहान " प्रकाशित करवाने सुधीर शर्मा भैय्या के वैभव प्रकाशन में बलौदाबाजर से आकर बैठे परिचर्चा कर ही रहे थे कि आदरणीय केयूर भूषण जी का दर्शनलाभ हुआ। प्रणाम करके अपना परिचय दिया ।थोड़ा सा स्मृत करने के उपरान्त प्रफूल्लित हो कहने लगे बड दिन बाद मिलत हस अनिल.. कहां हस. अउ का करत हस ? एक साथ प्रश्नों के घेरे में संक्षेप में सबकुछ बताया और कहा कि यह काव्य संग्रह प्रकाशित करवाने आया हूं ।तब सुधीर भैय्या से उतना परिचय नही था जितना केयूर भूषण जी से रहा .... वे कहे दिखाव ..वे टाइप की हुई पांडुलिपि देखे ... और कहे एखर भूमिका या सम्मति कोन्हो कना लिखवाय हस? मे कहेंव नहीं ... फेर का गुनत कहीस मय लिख दंव ? ... सच कहे तो मुझे ऐसा कुछ लिखवाने की ईच्छा ही नही था ।सो .... तभी सुधीर भैय्या कहे लिखवा लो ,अच्छा ही होगा ।.फिर वे उस पांडुलिपि को ले गये । हरेली त्योहार छुट्टी के दिन सम्मति और पांडुलिपी को घर आकर ले जाने की बाते तय हुआ और वापस बलौदाबाजर आ गया।
उनके घर गया बडा ही आत्मीय भाव व प्रेम मिला और सतनाम संस्कृति मिनीमाता के अनुभव और हमारी काव्य संग्रह में वर्णित भावो पर गहन व सार्थक विचार धन्टो चला।
सम्मति में उनके एक शब्द बाल्मिकी वाली वाक्य को हटाने का निवेदन किया कि यह शायद कोई स्वीकृत करे न करे आपत्तिजन्य व कही आगे हमारे लिए अन्यान्न अर्थ न ले कोई वे कहे- " नहीं ! मोला ज इसे लगिस ओसने लिखे हंव झन हटा ।हटाबे त मोर सम्मति ल मत रखवा।"
प्रकाशन के बाद उन्हे भेट करने गया वह बहुत ही खुश हुआ।और अपने अनुभव सागर से हमे अनेक मोतियां निकाल देते रहें .... ऐसे सहज पर अनुभव के सागर ,सरल हृदय ,पीयर पीपर के पाके पाना ...हम जैसों को अपनी वृहत्त धरोहर से चंद मोतिया सौप कर जाना ....माटी के चोला माटी मे मिलना ही नहीं .बल्कि उसके बाद भी सदैव चमक बिखेरते रहना ही हैं ..... विनम्र श्रद्धांजलि सत सत नमन
-डॉ॰ अनिल भतपहरी/ 9617777514
Saturday, January 3, 2026
बेनामी शादी में
लघु कथा
बेनामी शादी में ...
आजकल वे कही कोई गोष्ठी- संगोष्ठी में आमंत्रित नहीं होते।पता नहीं कैसे अलग -थलग होते जा रहे हैं? एक समय था जब इनकी पुछ -परख व आव भगत होते ही रहते थे ! पर इतनी जल्दी सब एकाएक बंद हो जाएन्गे ,यह सोचा नहीं था! हालांकि अब पहले से अधिक सोच-समझकर बोलने लगे थे।
"प्रगतिशील क्या है? पहले यह निर्धारण हो।तब व्यक्ति के प्रगतिशील होने का मूल्यांकन, स्वत: या उनके जानने वाले लोग उस आधार पर कर सकते हैं।"
आगे जोर देते हुए कहे -
"असल में भारतीय मध्यम वर्ग में प्रगतिशीलता आयी ही नहीं हैं।
निम्न वर्ग की स्वच्छंदता,उनकी मजबुरी हैं और उच्च वर्ग की स्वच्छंदता उनकी ऐय्याशी हैं। "
छिटपुट तालियां गूंजी।
थोड़ा जोश में भरकर कहा-
"विचार भले प्रगतिशील हो जाय पर प्रवृत्ति में आदमी जड़वत ही रहता हैं। बिना जड़ के वे लहलहा भी नहीं सकते।"
ये क्या? सभागार में सन्नाटा पसर गया।
अर्सा़ बाद उन्हें तथाकथित प्रगतिशील लोगों की एक संगोष्ठी में व्याख्यान के लिए आमंत्रित किए गये थे। उनकी बातें सुन तमाम लब्ध प्रतिष्ठित अतिथियों सहित मुख्य अतिथि व आयोजक हतप्रभ सा रह गये। भौंचक एक- दूसरे से स्वयं को छिपाते पर दूसरे में कुछ तलाशते भोजन में भीड़ गये ।
कुछ बिना जड़ वाले उन्हे कोसने लगे कि "प्रगतिशील मंच पर इस तरह पुरातन पंथी जड़ वाली दकियानूसी बातें नहीं होनी चाहिए ।" कुछ कह उठे - प्रगतिवादी मंच पर ऐसी आलोचनात्मक टिप्पणियाँ आखिर कैसे कोई कर सकते हैं। अभिव्यक्ति का आजादी का मतलब यह तो नहीं कि हमारी अस्मिता पर प्रश्न खडे किए जाय .. !
आयोजक चिल्ला उठे - क्या करे भाई "पुरा महौल खराब कर दिए !"
सुटेट -बुटेट ,सजे- धजे इत्र से महकते व चहकते महफ़िल से वह बेचारा ... ऐसे निकले जैसे ....बेनामी शादी में अब्दुल्ला दीवाना ! ...तभी गेट पर खड़े चौकी दार ने कहा- " साब जी ! आपकी बातें एकदम सही हैं। बिना जड़ के जीवन कटी पतंग सा है!" ...साब जी निकास इस तरफ हैं साब जी... जय हिन्द !
-डॉ. अनिल भतपहरी 9617777514
Monday, December 29, 2025
सरकार
जीताएन तब ले भैरा हो गईन
साहेब ल हमर गोठ नइ भाईन
बिन भाषा के मूक हो गईन
बटन चपक का चूक हो गईन
करय तो अब भल का करय
ले मांदर मंजीरा भजन करय
बिगड़े हे इहलोक हमरे अब
परलोक सुधारे जतन करय
तउन खातिर आए सरग़ दूत
दरस परस बर भारी जटाजूट
जे भीखास के उवे नवा सुरुज
चका चौंधा देख भारी अचरूज
धरमे करमे बर बनाएं उन ल
वोट दे के तय कमाएं पुन ल
कटय जंगल के खीरय धरती
चाहे परिया परे रहय तोर खेती
बनगे मंदिर सज के दरबार
फेर उजरे लगिन खेती खार
न कहूं रोजी न कछु रोजगार
कोंदा भैरा अंधरा सरकार ...
नवा रायपुर में संपूर्ण छत्तीसगढ़ का स्मारक हो
रजत उत्सव के अवसर पर
पुरखौती मुक्तांगन में मध्य छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर से 25 किमी दूर नवा रायपुर बसाया गया हैं जो सतनामी बाहुल्य 27 ग्रामों को हस्तगत किया गया हैं। यह परिक्षेत्र आरंग विधान सभा के अधीन हैं। मंत्रालय, संचालनालय, विधानसभा ,राजभवन मुख्यमंत्री, एवं मंत्रियों के निवास हैं। साथ ही अधिकारी कर्मचारी सहित आम लोगों के बसाहट हेतु 33 सेक्टरों में विभक्त हैं। वर्तमान में करीब 5 लाख लोगों की बसाहट की क्षमता से युक्त नवा रायपुर में बस, रेल, स्वास्थ सुविधा हेतु हॉस्पिटल, स्कूल कॉलेज हैं। साथ ही अनेक धार्मिक, प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक दर्शनीय स्थल विकसित किए जा रहे हैं। ताकि लोगों को आध्यात्मिक / धार्मिक आवश्यकताओं के पूर्ति के साथ साथ स्वस्थ मनोरंजन एवं ज्ञानवर्धन हो सकें।
इनमें प्रमुखत: पुरखौती मुक्तांगन, जंगल सफारी, आदिवासी संग्रहालय, मॉल सिनेमागृह और फिल्मसिटी बनाए जाएंगे।
परन्तु छत्तीसगढ़ के मध्य भाग की सांस्कृतिक गतिविधियों और जनजीवन को संरक्षित करने का कोई खास संग्रहालय आदि के बारे में पता नहीं क्यों चर्चाएं नहीं होती। जबकि छत्तीसगढ़ की वैभव रायपुर दुर्ग राजनांदगांव मुंगेली कवर्धा , बिलासपुर, जांजगीर,बलौदाबाजार ,महासमुंद धमतरी जिलों में निवासरत करोड़ों लोगों की रहन सहन,सांस्कृतिक गतिविधियों, मेले,व्रत ,उत्सव आदि की जानकारी के लिए स्मारक या संस्थान होनी चाहिए। इसकी कमी खलती हैं।
बाहर से आए शैलानी एवं अन्वेषकों अध्येताओं को छत्तीसगढ़ का वास्तविक बोध नहीं हो पाता।
छत्तीसगढ़ प्राकृतिक और भौगोलिक रुप से तीन भागों में विभक्त हैं। उत्तर में सरगुजा का पाट, मध्य छत्तीसगढ़ का मैदान और दक्षिण में बस्तर का पठार । पूर्व में महानदी का पावन प्रवाह वाली लारियांचल तो पश्चिम में डोंगरगढ़ भोरमदेव सतपुड़ा मैकल श्रेणी में अवस्थित चिल्फी घाटी की हसीन वादियां हैं ।इन जगहों की भाषा कला संस्कृति भी अलग हैं। प्रदेश की इन जगहों की विशेषताओं और महत्ता को बताने हेतु पुरखौती मुक्तांगन की परिकल्पना की गई ताकि प्रदेश की प्राचीन धरोहरों और जीवन स्तर लोक मान्यताओं को पर्यटन करते एक ही जगह उपस्थित होकर कुछ घंटों में आधारभूत ढंग से सामान्य (मोटे )तौर पर समझा जा सके।
यहां सरगुजा ,बस्तर प्रखंड तो हैं जहां परन्तु मध्य छत्तीसगढ़ नहीं। इस कारण यहां की सांस्कृतिक वैभव में अनेक कमियां नज़र आती हैं। बाह्य पर्यटकों को लगता हैं छत्तीसगढ़ आदिम जनजीवन और संस्कृति के ही संवाहक अत्यंत पिछड़ा वनांचल राज्य हैं। जहां स्त्री पुरुष अर्ध विवृत जीवन जीने विवश और केवल नाच- गाने में मंद मऊहा सल्फी ताड़ी हड़िया कोसना में उन्मत लोग हैं। मंचीय प्रस्तुतियों में भी लोक संस्कृति के नाम पर यहीं भाव प्रदर्शित होते हैं।
जबकि मध्य छत्तीसगढ़ की गौरव शाली एवं सौंदर्यबोधक वस्त्राभूषण, साबुत अनाज (बिना सड़े गले खमीर आदि उठाएं) की खान पान ,रहन सहन किसी भी राज्य से कमतर नहीं। यहां की भाषा और उनमें उपलब्ध साहित्य दर्शन उत्कृष्ट हैं। लोक कलाएं विविधतापूर्ण और समृद्ध हैं। किसी राज्य की एक दो या पांच लोक नृत्य होंगे पर यहां स्त्री पुरुषों की पृथक और युगल दर्जनों नृत्य शैलियां है जिसमें पंथी,राउत,कर्मा, सुआ,शैला, रीलों,बार, सरहुल, ककसार ,डंडा, मांदरी, हरे राम हरे कृष्णा, रमसत्ता, रहस, छैला नाच, देवार नृत्य जैसी विशिष्ट शैलियां हैं। शास्त्रीय नृत्य में रायगढ़ घराना और खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय तो लोक और शास्त्रीय संगीत विविध ललित कलाओं की साधना स्थली हैं जहां देश विदेश से कलावंत आते और सीख समझ कर जाते हैं।
अनेक पर्व उत्सव मेले मड़ाई हाट बाजार पसरा हैं ।और जनजीवन तो अन्य जगहों के अपेक्षा थोड़े में संतुष्ट संत संस्कृति के संवाहक हैं। जिनमें प्राचीन सहज यान महायान नाथ सिद्ध शैव शाक्त वैष्णव बौद्ध जैन संस्कृति की समन्वय स्थली हैं जहां आर्य अनार्य संस्कृति का समागम होते हैं। दक्षिणा पथ के नाम से विख्यात सद्वाहों सतवहनो की धरती में अनेक ख्यातिनाम भट्ट प्रहरी हुए हैं। जिसमें सम्राट विजयस जिसके समय में बुद्ध का आगमन राजधानी सिरपुर में हुआ। वहीं नागार्जुन आनंद प्रभु, जैसे आचार्य हुए। वल्लभाचार्य,कबीर धर्मदास गुरुघासीदास, अमरदास ,विवेकानंद महेश योगी , संत गहिरा गुरु , ओशो ,स्वामी आत्मानंद , पवन दीवान जैसे संत को जन्म और आकार देने वाली शस्य श्यामला धरती हैं ।इसलिए इसे उत्तराखंड हिमाचल को जैसे देवभूमि कहते हैं ठीक यह संतो की धरती छत्तीसगढ़ को " संतभूमि" कहते हैं।
सिरपुर राजिम, शिवरीनारायण गिरौदपुरी दामाखेड़ा तुम्मान, ताला,मल्हार चैतुरगढ़, डमरू खरचा, आरंग रीवा, खल्लारी, चंद्रपुर, डोंगरगढ़ भोरमदेव रतनपुर दल्हा, जलेश्वर, जैसे ऐतिहासिक धार्मिक नगरी आस्था के केंद्र हैं। छत्तीसगढ़ में तीन साक्षात् त्रिवेणी संगम राजिम , पंजनी पैसर और शिवरीनारायण हैं जहां कल्प कुंभ किए जा सकते हैं जो कि अन्यत्र दुर्लभ हैं। कोरबा भिलाई, चिरमिरी ,नगरनार, तमनार जैसे औद्योगिक तीर्थ नगरी और गंगरेल हसदेव जैसे विशालकाय बांध सागर जैसे दर्शनीय हैं।रायपुर बिलासपुर दुर्ग राजनांदगांव जगदलपुर अंबिकापुर जैसे प्रशासनिक संवैधानिक और सांस्कृतिक नगर देश के अन्य नगरों से सदृश्य हैं।
इनके संरक्षक बलिदानी राजाओं में कल्याण साय,गुरु बालकदास, गेंद सिंह, वीर नारायण सिंह, गुण्डाधुर मूंदरा मांझी प्रवीण चंद्र भंजदेव जैसे रत्न हैं।
गौरक्षा आंदोलन 1915 के प्रणेता राजमहंत नयन दास महिलांग गुरु गोसाई अगमदास जंगल सत्याग्रह के नायकों में बूढ़ान शाह रामचरण दयावती कंवर , तो नहर सत्याग्रह में नारायण मेघवाले, छोटेलाल सामाजिक क्रांति और मंदिर प्रवेश के लिए प सुंदरलाल शर्मा, पंमिलऊ दास कोसरिया, प. तुलम तुलाई लोगों के कारण स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि बनी। जिसमें मिनीमाता राधाबाई दयावती कंवर राजमोहिनी देवी जैसी मातृ शक्तियां भी बढ़ चढ़ हिस्सा ली और समाज / देश सेवा के लिए स्वयं को समर्पित की
कला जगत में मंदराजी, रामचंद्र देशमुख, महासिंह चंद्राकर ,दानी दरवन, चम्पा बरसन हबीब तनवीर, शेख हुसैन, देवा दास बंजारे, सुकालदास भतपहरी, मेहतर साहू, गंगाराम शिवारे नारायण वर्मा झाडूराम देवागन, सहित पंडवानी की पुरखिन दाई सुखबती, लक्ष्मी बंजारे तीजन बाई सुरुजबाई फ़िदाबाई, मालाबाई जैसी मौलिक सितारा कलाकार हैं। जिसकी अनुशरण कर लोग प्रसिद्धि की शिखर स्पर्श करते आ रहे हैं।
साहित्यकारों में ठाकुर जगमोहन पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पद्म श्री मुकुटधर पाण्डेय, लोचनप्रसाद, मुक्तिबोध,मनोहरदास नृसिंह, द्वारिका प्रसाद तिवारी, हरि ठाकुर , प्रमोद वर्मा केयूर भूषण मदनलाल गुप्त प सुकुल दास घृतलहरे, शाखा प्रसाद बघेल, शानी ,सुकाल दास भतपहरी , लक्ष्मण मस्तूरिया, सुशील यदु श्यामलाल चतुर्वेदी लाल जगदलपुरी,हरिहर वैष्णव,इत्यादि अनेक साधक हैं। इन सबकी की यादें, मध्य छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं और जीवन स्तर की झलकियां भी उक्त ओपन म्यूजियम / खुला संग्रहालय "पुरखौती मुक्तांगन" में होना चाहिए। ताकि लोगों को छत्तीसगढ़ की विविधता और एक साथ आदिम जीवन और आधुनिक जीवन शैली का साक्षात्कार हो सके। प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी के अनुसार एक साथ 10 वी और 21 के जीवन शैली को देखना हो तो और उन्हीं के तकिया कलाम अमीर धरती के गरीब लोगों की धरती छत्तीसगढ़ में स्वागत हैं।
राज्य के पच्चीसवें वर्ष में रजत जयंती के पावन अवसर में राज्य की सर्वाधिक बसाहट वाले मध्य क्षेत्र की सांस्कृतिक तत्व की जाने- अनजाने में अनदेखी न हो और देश के नागरिकों को राज्य की तीनों प्रखंडों की सांस्कृतिक वैभव का झलक पुरखौती मुक्तांगन प्रांगण में सहज दर्शनीय हो इनकी व्यवस्था होनी चाहिए। ताकि अनेक विरोधाभासों का सम्यक समाधान तलाशा जा सकें। सुखी और समृद्ध छत्तीसगढ़ गढ़ा जा सकें।
जय छत्तीसगढ़
डॉ. अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514
सेंट जोसेफ टाऊन अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़
Wednesday, December 17, 2025
सतनाम शोभायात्रा
गुरु घासीदास जयंती पूर्व सतनाम शोभायात्रा की बाहर
समाज में समानता एवं सौहार्द्र स्थापित करने सद्गुरु घासीदास बाबा जी की अमृतवाणियों /उपदेशों पर आधारित सार्वजनिक रुप से राजधानी रायपुर में 1995 से आरम्भ यह आयोजन देश के अनेक जगहों पर हर्षोल्लास पूर्वक आयोजित होने लगे हैं। आयोजको एवं सहभागियों के प्रति आभार एवं मानव समाज को हार्दिक बधाई।
ज्ञात हो कि गुरु घासीदास जयंती की शुरुआत में ही धर्म ध्वज "पालो " जिसे संत /महंत/ भंडारी के घर तैयार करते हैं को परघा कर पंथी अखाड़ा सजाते हर्षोल्लास पूर्वक जैतखाम तक शोभायात्रा करते आते हैं।उसी परंपरा को अब सार्वजनिक रुप से बड़े पैमाने पर मनाने की शुरुआत 1995 से हुई।
चित्र १आयोजन की परिकल्पना के समय का छायाचित्र गुरु घासीदास छात्रावास आमापरा रायपुर
२ प्रथम आयोजन का विज्ञापन गुरु घासीदास का रेखाचित्र ( मेरे द्वारा रेखांकन)
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