Wednesday, August 19, 2026

अनेकता में एकता की विशेषता का होते ह्रास

लोक से बनता है राष्ट्र: अनेकता से एकता की विशेषता का होते ह्रास।

- डॉ. अनिल कुमार भतपहरी

स्वतंत्रता के अस्सी वर्ष बाद आज भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। बाहर से देखें तो देश में शांति है, बाज़ार चल रहे हैं, तिरंगा लहरा रहा है। भीतर से देखें तो युवाओं के मन में एक बेचैनी है। यह बेचैनी रोज़गार को लेकर है, संसद की कार्यवाही को लेकर है और अपनी पहचान को लेकर भी है।

पिछले मानसून सत्र में लोकसभा बिना विशेष कामकाज के समाप्त हो गई। यह किसी एक दल की हार नहीं, पूरे लोकतंत्र के धन और समय की हानि है। एक दिन संसद चलाने का व्यय करोड़ों रुपये है और इस व्यय का भार अंततः किसान, मज़दूर और करदाता ही वहन करता है। जब सत्ता पक्ष अपनी उपस्थिति से जवाबदेही नहीं दिखा पाता और विपक्ष हंगामे से आगे नहीं बढ़ पाता, तो जनता में यह संदेश जाता है कि उसकी चिंताएँ कहीं पीछे छूट गई हैं। अभी तो यह केवल हवा का हल्का झोंका है, तूफ़ान नहीं आया है। इस झोंके में ही यदि हम सँभल जाएँ तो बड़ी क्षति टल जाएगी।
देश क्या है?
देश केवल सीमाओं से घिरा भूखंड नहीं है। देश व्यक्ति और समाज से बनता है। इस उपमहाद्वीप में मानव समुदाय आरंभ से निवास करते आए हैं। आज भी देश की आधी से अधिक जनसंख्या अपनी जीविका के लिए कृषि, फसल और वनोपज पर निर्भर है। यह जनसंख्या अपने परिश्रम और साहस से इस शस्य-श्यामला धरती को आबाद रखती है।

इस समाज को समझने के लिए हमें अपने इतिहास और वर्तमान दोनों को देखना होगा। प्राचीन ग्रंथों में चार वर्णों - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का उल्लेख है। धर्मशास्त्रों में प्रथम तीन को द्विज कहा गया है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति शब्द उस काल के नहीं हैं। ये आधुनिक प्रशासनिक शब्द हैं, जो 1935 के अधिनियम और 1950 के संविधान में समाज के वंचित वर्गों को सुरक्षा और अवसर प्रदान करने के लिए निर्मित किए गए।

वर्तमान जनसंख्या संरचना को देखें तो 2011 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जाति लगभग 16.6 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति लगभग 8.6 प्रतिशत है, अर्थात् कुल मिलाकर 25 प्रतिशत से अधिक। अल्पसंख्यक समुदाय - मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी आदि मिलाकर लगभग 19-20 प्रतिशत हैं। दोनों को जोड़ दें तो यह संख्या देश की लगभग 40-45 प्रतिशत बनती है। यह कोई छोटा अंश नहीं, देश की आत्मा का बड़ा भाग है।

विडंबना यह है कि संख्या में इतने बड़े होते हुए भी ये समुदाय भीतर से कई भागों में विभक्त हैं। अनुसूचित जातियों के भीतर सैकड़ों जातियाँ, जनजातियों के भीतर सैकड़ों बोलियाँ और परंपराएँ, अल्पसंख्यकों में भी अलग-अलग पंथ और बिरादरियाँ हैं। विभक्त होने के कारण लोकतंत्र में जो सामूहिक शक्ति बननी चाहिए, वह नहीं बन पाती।
दो मार्ग, एक लक्ष्य
स्वतंत्रता के पश्चात् संविधान ने इस विभाजन को पाटने के लिए दो मार्ग अपनाए। पहला - सुरक्षा का मार्ग, अनुच्छेद 17 द्वारा अस्पृश्यता का अंत और अनुच्छेद 14, 15, 16 द्वारा समानता का अधिकार। दूसरा - विकास का मार्ग, आरक्षण, छात्रवृत्ति, वनाधिकार अधिनियम और कल्याणकारी योजनाएँ।

परंतु पिछले कुछ दशकों में एक तीसरा ही मार्ग चर्चा में आ गया है - धार्मिक पहचान का मार्ग। एक ओर संविधान की प्रस्तावना में निहित पंथनिरपेक्षता है, जो कहती है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा और प्रत्येक व्यक्ति को अपना धर्म मानने की स्वतंत्रता होगी। इसे सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के मूल ढाँचे का भाग माना है। दूसरी ओर हिंदुत्व अथवा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की माँग है, जो कहती है कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा हिंदू है और उसे मान्यता मिलनी चाहिए।

जब यह वैचारिक बहस "एक रहेंगे तो सुरक्षित रहेंगे" और "बँटेंगे तो कटेंगे" जैसे नारों में परिवर्तित हो जाती है, तो अनेकता में एकता की हमारी सदियों पुरानी विशेषता खंडित होने लगती है। कहीं-कहीं घटित होने वाली सांप्रदायिक घटनाएँ और भीड़ द्वारा की गई हिंसा की खबरें इसी खंडन की दुःखद अभिव्यक्ति हैं। इससे न केवल सामाजिक सद्भाव बिगड़ता है, बल्कि वैश्विक पटल पर हमारी विकास की गति भी मंद पड़ती हुई दिखाई देती है। निवेश, तकनीक और प्रतिभा वहीं जाती है, जहाँ शांति और स्थिरता हो।
सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए प्रेरणा
यह समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, आत्मावलोकन का है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही लोकतंत्र के दो पहिए हैं। एक के बिना दूसरे की गति संभव नहीं है।

1. संसद को पुनः कार्यशाला बनाना: यह सुनिश्चित हो कि प्रत्येक सत्र में कितने घंटे चर्चा हुई, कितने विधेयकों पर गंभीर बहस हुई और कौन से जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे। यह जानकारी सरल भाषा में जनता के समक्ष प्रस्तुत की जाए।

2. रोज़गार को केंद्र में लाना: धर्म-संप्रदाय के चक्रव्यूह से युवाओं को निकालने का एक ही उपाय है - शिक्षा और रोज़गार। कृषि उपज का स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण, वनोपज का उचित मूल्य और कौशल प्रशिक्षण - ये किसी धर्म के विषय नहीं, उदरपूर्ति के विषय हैं। इन पर सत्ता पक्ष और विपक्ष एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम बना सकते हैं।

3. साझा हितों पर संवाद: 45 प्रतिशत जनसंख्या की चिंताएँ पृथक-पृथक नहीं हैं। भूमि, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान - ये सभी के साझा हित हैं। धर्म और कर्मकांड अपने स्थान पर रहें, परंतु विकास के मंच पर सब एक साथ बैठें।

भारत अपार मानव संसाधन, तीन ऋतुओं के संतुलित चक्र, विविध फसलों और बहुमूल्य खनिजों से संपन्न देश है। इसकी शक्ति इसकी विविधता में निहित है। त्वरित राजनीतिक लाभ के लिए इस विविधता को अलगाववाद की वायु देना एक सोचा-समझा षड्यंत्र होगा, जिसे राष्ट्रप्रेमी नागरिकों को मिलकर उजागर करना होगा।

अंततः राष्ट्र किसी एक दल, एक धर्म अथवा एक नारे से नहीं बनता। राष्ट्र तब बनता है, जब किसान को उसकी फसल का मूल्य मिलता है, युवा को रोज़गार का भरोसा मिलता है और संसद में उसकी आवाज़ सुनी जाती है। यही लोक-कल्याण है और यही लोक-आस्था की सच्ची प्रतिष्ठा है।

जय हिंद, जय भारत।
[8/19, 17:11] Dr.‌Anil Bhatpahari: A Nation is Built by its People: From Diversity to Unity

- Dr. Anil Bhatpahari

Eighty years after Independence, India stands at a decisive juncture. Seen from outside, there is peace, markets are functioning, and the Tricolour flies high. Seen from inside, there is an unease in the minds of the youth. This unease is about employment, about the functioning of Parliament, and about identity itself.

In the last Monsoon Session, the Lok Sabha was adjourned without transacting substantial business. This is not the failure of one party; it is a loss of the entire democracy's money and time. Running Parliament for a day costs crores of rupees, and this cost is ultimately borne by the farmer, the labourer and the taxpayer. When the Treasury benches fail to show accountability through presence and the Opposition fails to move beyond disruption, the message that goes to the people is that their concerns have been left behind. This is still a light breeze, not a storm. If we course-correct in this breeze itself, a greater damage can be averted.

What is a Nation?

A nation is not merely a piece of land bounded by borders. A nation is made of individuals and society. Human communities have inhabited this subcontinent since the beginning. Even today, more than half of the country's population depends on agriculture, crops and forest produce for its livelihood. It is this population which, through its hard work and courage, keeps this green and fertile land inhabited.

To understand this society, we must look at both our history and our present. Ancient texts mention four varnas - Brahmin, Kshatriya, Vaishya and Shudra. The Dharmashastras call the first three as 'Dvija'. The terms Scheduled Caste and Scheduled Tribe are not from that era. These are modern administrative terms, created in the Government of India Act, 1935 and the Constitution of 1950 to provide protection and opportunity to the deprived sections of society.

If we look at the present demographic structure, according to the 2011 Census, Scheduled Castes are about 16.6% and Scheduled Tribes about 8.6%, together more than 25%. Minority communities - Muslims, Christians, Sikhs, Buddhists, Jains, Parsis etc. together constitute about 19-20%. If both are added, this number becomes about 40-45% of the country. This is not a small fraction; it is a large part of the soul of the country.

The irony is that despite being so large in numbers, these communities are internally divided into many parts. Within the Scheduled Castes there are hundreds of castes, within the tribes hundreds of dialects and traditions, and among minorities too there are different sects and communities. Because of being divided, the collective strength that should be built in a democracy is not being built.

Two Paths, One Goal

After Independence, the Constitution adopted two paths to bridge this divide. First - the path of protection, abolition of untouchability through Article 17 and right to equality through Articles 14, 15, 16. Second - the path of development, reservation, scholarships, Forest Rights Act and welfare schemes.

But in the last few decades, a third path has come into discussion - the path of religious identity. On one hand, there is secularism enshrined in the Preamble of the Constitution, which says that the State shall have no religion of its own and every person shall have the freedom to profess his own religion. The Supreme Court has considered it a part of the basic structure of the Constitution. On the other hand, there is the demand for Hindutva or cultural nationalism, which says that the cultural soul of India is Hindu and it should be recognized.

When this ideological debate turns into slogans like "United we are safe" and "If we divide, we will be cut", our centuries-old characteristic of unity in diversity begins to break. Communal incidents happening here and there and news of mob violence are the sad expression of this very breakdown. This not only disturbs social harmony, but our pace of development on the global stage also appears to slow down. Investment, technology and talent go where there is peace and stability.

Inspiration for Both Treasury and Opposition

This is not the time for accusation and counter-accusation, but for introspection. The Treasury and the Opposition are both two wheels of democracy. One cannot move without the other.

1. Make Parliament a Workshop Again: It should be ensured that in every session, how many hours were discussed, how many bills were seriously debated and which representatives were present. This information should be presented to the public in simple language.

2. Bring Employment to the Centre: The only way to take the youth out of the labyrinth of religion and sect is education and employment. Local processing of agricultural produce, fair price for forest produce and skill training - these are not matters of any religion, but of livelihood. The Treasury and the Opposition can create a common minimum programme on these.

3. Dialogue on Common Interests: The concerns of 45% of the population are not separate. Land, education, health and dignity - these are the common interests of all. Religion and rituals should remain in their place, but everyone should sit together on the platform of development.

India is a country endowed with immense human resources, a balanced cycle of three seasons, diverse crops and valuable minerals. Its strength lies in its diversity. To give air to separatism for quick political gain would be a well-thought-out conspiracy, which patriotic citizens will have to expose together.

Ultimately, a nation is not built by one party, one religion or one slogan. A nation is built when the farmer gets a fair price for his crop, the youth gets assurance of employment and his voice is heard in Parliament. This is public welfare and this is the true establishment of public faith.

Jai Hind, Jai Bharat.

Tuesday, August 18, 2026

बुद्ध और गुरुघासीदास के दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन

बौद्ध, सत्व, सतनाम, धम्म और पंथ : तथागत बुद्ध एवं गुरु घासीदास के दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन


डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
प्राध्यापक, वीरांगना रमोतीन माड़िया आदर्श महाविद्यालय, नारायणपुर, छत्तीसगढ़
Email: anilbhatphahari@gmail.com

सार (Abstract - Hindi)

प्रस्तुत शोध पत्र में भारतीय चिंतन परम्परा के पाँच मूलभूत पारिभाषिक शब्दों - बौद्ध, सत्व, सतनाम, धम्म और पंथ का दार्शनिक एवं व्युत्पत्तिपरक विश्लेषण किया गया है। शोध यह स्पष्ट करता है कि बौद्ध का अर्थ बोध-प्राप्त व्यक्ति के सान्निध्य से विवेकवान बना व्यक्ति है, सत्व का अर्थ किसी जड़-चेतन पदार्थ के सार-तत्व से है, तथा सतनाम उस सत्व की पहचान है। शोध में सत और सत्य के दार्शनिक भेद को उदाहरण सहित विवेचित किया गया है - जैसे लकड़ी का जलना एक सत्य (घटना) है जबकि उसकी ज्वलनशीलता उसका सत (स्थायी सत्व) है। इसी प्रकार धर्म को अंतःकरण में धारण करने योग्य सद्गुण और धम्म/पंथ को उस तक पहुँचने के व्यावहारिक मार्ग के रूप में परिभाषित किया गया है। पाली व्युत्पत्ति के अनुसार धम्म = धृ + म = धारण करना, जैसा कि धम्मपद में कहा गया है - "धम्मो हवे रक्खति धम्मचारिं"। तुलनात्मक अध्ययन से यह सिद्ध होता है कि तथागत बुद्ध और गुरु घासीदास दोनों ही अवतार न होकर पंथ-प्रवर्तक थे, जिन्होंने वैदिक कर्मकांड, वर्ण-व्यवस्था, मूर्तिपूजा और पुरोहितवाद का विरोध कर समता, अहिंसा, जीव-दया और सत्य पर आधारित आचरण-मार्ग दिया। जैतखाम का मूर्तिविहीन श्वेत ध्वज इसी निराकार, आचरण-प्रधान दर्शन का प्रतीक है।

Abstract (English)

The present research paper attempts to philosophically and etymologically analyze five fundamental concepts - Bauddha, Satva, Satnam, Dhamma and Panth. The paper clarifies that Bauddha means one who becomes wise in the company of an enlightened one (one who has attained Bodh), Satva means the essence of an object or being, and Satnam is the identity of that essence. The study explains the philosophical difference between Sat and Satya with examples - burning of wood is Satya (an event), while its combustibility is Sat (its permanent essence). Similarly, speaking truth is Satya, but being truthful is Sat. The study distinguishes between Dharma as an internal virtue to be imbibed and Dhamma/Panth as a practical path of life. Etymologically, Dhamma in Pali is derived from Dhri + Ma = to sustain, as stated in Dhammapada - "Dhammo have rakkhati Dhammacharin". Through a comparative study of Tathagat Buddha and Guru Ghasidas, the paper establishes that both were Panth-pravartak and not incarnations, who opposed Vedic ritualism, Varna system, idol worship and priesthood and gave a path based on equality, non-violence, compassion and truth. The white flag of Jaitkham, without an idol, is a symbol of this formless and conduct-based philosophy.

बीज शब्द / Keywords

बौद्ध, सत्व, सतनाम, धम्म, पंथ, गुरु घासीदास, सतनाम पंथ, बौद्ध दर्शन / Bauddha, Satva, Satnam, Dhamma, Panth, Guru Ghasidas, Satnami Panth, Buddhist Philosophy

1. प्रस्तावना

भारतीय चिंतन परम्परा में शब्द केवल शब्द नहीं, बल्कि दर्शन हैं। बौद्ध, सत्व, सतनाम, धम्म और पंथ जैसे शब्दों को सामान्यतः धर्म या संप्रदाय के पर्याय के रूप में समझ लिया जाता है, जबकि इनका दार्शनिक अर्थ अत्यंत व्यापक और व्यावहारिक है। छत्तीसगढ़ की संत परम्परा और बौद्ध धम्म में इन शब्दों का विशेष महत्व है। बौद्ध धम्म जहाँ विश्व स्तर पर समता और करुणा का मार्ग प्रशस्त करता है, वहीं छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास प्रवर्तित सतनाम पंथ उसी समता-मूलक चेतना का स्थानीयकृत, किन्तु सार्वभौमिक रूप है। प्रस्तुत शोध पत्र में इन अवधारणाओं का मूल पाली साहित्य, संत साहित्य और क्षेत्रीय अवलोकन के आधार पर विश्लेषण किया गया है।

2. साहित्य समीक्षा

बौद्ध साहित्य में 'बोध' और 'सत्व' की व्याख्या त्रिपिटक के सुत्तपिटक एवं धम्मपद में मिलती है। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने 'बुद्ध और उनका धम्म' (1957) में धम्म को धर्म से पृथक जीवन-मार्ग बताया है और उसे सदाचरण का पर्याय माना है। सतनाम पंथ पर डॉ. हीरालाल शुक्ल ने 'छत्तीसगढ़ की संत परम्परा और गुरु घासीदास' में, डॉ. सौरभ सिंह एवं कुबेर सिंह उइके ने गुरु घासीदास के सात सिद्धांतों को सद्गुण-आधारित धर्म के रूप में स्थापित किया है। लेखक की स्वयं की कृति 'गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ' (भतपहरी, 2023) में गिरौदपुरी धाम के क्षेत्रीय अवलोकन के आधार पर जैतखाम के प्रतीकवाद का विवेचन किया गया है। अभी तक बौद्ध धम्म और सतनाम पंथ के पारिभाषिक शब्दों का तुलनात्मक दार्शनिक अध्ययन अपेक्षित रहा है, जिसकी पूर्ति का प्रयास यह शोध पत्र करता है।

3. शोध के उद्देश्य

1. बौद्ध, सत्व, सतनाम, धम्म और पंथ शब्दों की व्युत्पत्ति और दार्शनिक अर्थ स्पष्ट करना।
2. सत और सत्य के अंतर को उदाहरण सहित दार्शनिक दृष्टि से विवेचित करना।
3. धर्म और पंथ/धम्म के अंतर को स्पष्ट करना।
4. तथागत बुद्ध और गुरु घासीदास के प्रवर्तन में समानता का तुलनात्मक अध्ययन करना।

4. शोध प्रविधि

प्रस्तुत शोध वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है। इसमें प्राथमिक स्रोत के रूप में पाली त्रिपिटक, धम्मपद, गुरु घासीदास के अमृतवाणी एवं सात उपदेश तथा द्वितीयक स्रोत के रूप में संबंधित शोध ग्रंथ, पत्रिकाएँ और क्षेत्रीय अवलोकन (गिरौदपुरी, जैतखाम) का उपयोग किया गया है। शोध में तुलनात्मक दर्शन पद्धति का भी अनुप्रयोग किया गया है।

5. विषय विवेचन

5.1 बौद्ध : बोध से बौद्ध तक

बौद्ध शब्द 'बोध' से बना है। बोध अर्थात ज्ञान की समझ, जागरूकता। जिसे ज्ञान का बोध हो गया, जिसकी अविद्या नष्ट हो गई, वह बुद्ध। और बुद्ध के सान्निध्य, विचार और आचरण से जिसमें समझ विकसित हुई, वह बौद्ध। अतः बौद्ध होना किसी जाति या संप्रदाय में जन्म लेना नहीं, बल्कि ज्ञानी और विवेकशील होना है। बौद्ध धम्म में बोधिसत्व की कल्पना इसी का विस्तार है।

5.2 सत्व : सार-तत्व की अवधारणा

बौद्ध धम्म में सत्व का अर्थ सार तत्व है। जड़ पदार्थों में लकड़ी, लोहा, चावल, मिट्टी का सार और चेतन में चींटी, हाथी, मनुष्य की प्रवृत्ति-प्रकृति, गुण-अवगुण का निचोड़ ही सत्व है। सत्व ही किसी पदार्थ या प्राणी की वास्तविक पहचान का आधार है। बोधिसत्व वह है जिसने प्राणिमात्र के सत्व को समझ लिया है।

5.3 सतनाम : सत्व की पहचान का दर्शन

यह दो शब्दों से मिलकर बना है - सत + नाम। सत यानी सत्व या सार और नाम यानी उसकी पहचान, संज्ञा। अतः किसी जड़-चेतन के सत्व और उसकी पहचान का बोध ही सतनाम है।

सत और सत्य में दार्शनिक अंतर: सत व्यापक है, सत्य उसका एक अंश मात्र है। सत में सत्य समाहित है, पर सत्य में सत नहीं। उदाहरणार्थ - (1) लकड़ी का जलना एक सत्य है (एक घटना, एक समय की सच्चाई), पर लकड़ी में निहित ज्वलनशीलता का गुण उसका सत है (उसका स्थायी सत्व)। (2) मनुष्य द्वारा सच बोलना सत्य है, पर सत्यनिष्ठ होना, सत्य को जीवन-मूल्य के रूप में धारण करना सत है।

इसीलिए बौद्ध परम्परा में बुद्ध को 'सच्चनाम' (सत्य नाम वाला) कहा गया है और सतनाम पंथ में गुरु घासीदास को 'सतनाम बाबा'। यह किसी व्यक्ति का नाम न होकर एक व्यापक दर्शन है - सत्व की पहचान।

5.4 धम्म और पंथ : धर्म तक पहुँचने का मार्ग

धम्म पाली शब्द है। इसकी व्युत्पत्ति धृ धातु से है, जिसका अर्थ है धारण करना। धम्म = धृ + म। जो धारण करने योग्य है, जो जीवन को धारण करता है, वह धम्म। धम्मपद में कहा गया है - "धम्मो हवे रक्खति धम्मचारिं" अर्थात धम्म ही धम्म पर चलने वाले की रक्षा करता है।

धर्म और धम्म/पंथ में अंतर: धर्म वह सद्गुण है जो अंतःकरण में धारण किया जाता है - जैसे सत्य, अहिंसा, करुणा। जबकि धम्म या पंथ उस धर्म तक पहुँचने का व्यावहारिक रास्ता है, जीवन-पद्धति है। पंथ शब्द पथ से बना है। सामान्य पथ पर शरीर चलता है, पंथ पर मन, बुद्धि और विवेक चलता है। पंथ एक अनुशासित जीवन-मार्ग है। इसीलिए डॉ. अम्बेडकर धम्म को धर्म से पृथक, एक नैतिक जीवन-मार्ग मानते हैं।

5.5 तथागत बुद्ध और गुरु घासीदास में समानता : एक तुलनात्मक अध्ययन

दोनों महापुरुषों में अद्भुत समानता है। दोनों ने वैदिक कर्मकांड, यज्ञ, बलि-प्रथा और वर्ण-व्यवस्था का तीव्र विरोध किया। बुद्ध ने बोधगया में पीपल वृक्ष के नीचे कठोर तप के बाद बोध प्राप्त कर धम्म दिया, गुरु घासीदास ने गिरौदपुरी के जंगल में छाता पहाड़ पर 6 माह की कठोर तपस्या के बाद सतनाम पंथ का प्रवर्तन किया। दोनों ने नया ईश्वर नहीं, नया आचरण दिया। दोनों पंथ-प्रवर्तक हैं, अवतार नहीं।

गुरु घासीदास के सात सिद्धांत - 1. मनखे-मनखे एक समान, 2. सत्य ही ईश्वर है, 3. अहिंसा, 4. जीव दया, 5. मांसाहार त्याग, 6. मदिरा त्याग, 7. चोरी-जुआ से दूरी - ये कर्मकांड नहीं, सद्गुण हैं, धर्म हैं। इसीलिए सतनाम पंथ में मूर्तिपूजा, पुरोहितवाद, जातिभेद नहीं है। जैतखाम में मूर्ति नहीं, केवल श्वेत ध्वज है जो सत्य, शांति और पवित्रता का प्रतीक है।


तथागत बुद्ध और गुरु घासीदास का तुलनात्मक सार:

तुलना बिंदु

तथागत बुद्ध

गुरु घासीदास

तप-स्थल

बोधगया (बिहार)

गिरौदपुरी (छत्तीसगढ़)

काल

6ठी शताब्दी ई.पू.

18वीं-19वीं शताब्दी (1756-1850)

प्रमुख विरोध

वैदिक यज्ञ, वर्णवाद

जातिवाद, पुरोहितवाद, मूर्तिपूजा

मूल सिद्धांत

पंचशील, अष्टांगिक मार्ग, मध्यम मार्ग

सात सिद्धांत, मनखे-मनखे एक समान

ईश्वर संबंधी दृष्टि

अनीश्वरवादी, आचरण प्रधान

सतनाम - निराकार सत्य को ईश्वर माना

प्रतीक

धम्मचक्र

जैतखाम - श्वेत ध्वज

स्वरूप

पंथ-प्रवर्तक, अवतार नहीं

पंथ-प्रवर्तक, अवतार नहीं

6. निष्कर्ष

निष्कर्षतः बौद्ध, सत्व, सतनाम, धम्म और पंथ एक ही दार्शनिक श्रृंखला की कड़ियाँ हैं। बोध से सत्व का ज्ञान होता है, सत्व की पहचान सतनाम है, और उस सतनाम तक पहुँचने का मार्ग धम्म या पंथ है। बौद्ध धम्म और सतनाम पंथ दोनों भारतीय समता-मूलक चिंतन के दो महत्वपूर्ण आचरण-पद्धति हैं जो मानव को बाह्य आडंबर, कर्मकांड और जातिगत भेदभाव से हटाकर आंतरिक शुद्धता, समता और करुणा की ओर ले जाते हैं। दोनों ही पंथ आज के सामाजिक विद्वेष और असमानता के युग में अत्यंत प्रासंगिक हैं। श्वेत ध्वज का श्वेत रंग इसी सत्य और समता का शाश्वत संदेश है।

संदर्भ ग्रंथ सूची (References - APA 7th Edition)

1. अम्बेडकर, बी. आर. (1957). बुद्ध और उनका धम्म. सिद्धार्थ प्रकाशन.

2. भतपहरी, डॉ. अनिल कुमार (2023). गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ. [प्रकाशक का नाम जोड़ें], रायपुर.

3. भतपहरी, डॉ. अनिल कुमार (2024). गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ : क्षेत्रीय अवलोकन - गिरौदपुरी धाम. क्षेत्रीय शोध पत्र.

4. त्रिपिटक, सुत्तपिटक, धम्मपद. (पाली).

5. शुक्ल, हीरालाल. (2015). छत्तीसगढ़ की संत परम्परा और गुरु घासीदास. रजत प्रकाशन.

6. घासीदास, गुरु. अमृतवाणी एवं सात उपदेश. सतनाम प्रकाशन, गिरौदपुरी.

7. सिंह, सौरभ एवं उइके, कुबेर सिंह. सतनाम पंथ के सामाजिक आयाम.

घोषणा

यह शोध पत्र मौलिक, अप्रकाशित है तथा इसमें प्रस्तुत विचार लेखक के निजी अध्ययन एवं क्षेत्रीय अवलोकन पर आधारित हैं।

Monday, August 17, 2026

भारतीय समाज में दलित एवं स्त्री की स्थिति

UGC CARE FORMAT RESEARCH PAPER

Title: भारतीय समाज में दलित स्त्री का त्रि-आयामी शोषण: स्मृति-पुराणों में विधान, भक्ति आंदोलन में प्रतिरोध और औपनिवेशिक सुधारों का विधिक विश्लेषण

Author: डॉ. अनिल भतपहरी, प्राध्यापक नारायणपुर बस्तर  (छ.ग.)

Abstract (सार):
प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय जाति व्यवस्था के उस मिथक का खंडन करता है जिसमें सभी सामाजिक कुरीतियों को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की देन बताया जाता है। प्राथमिक स्रोतों - मनुस्मृति, पराशर स्मृति, स्कंद पुराण, जाति भास्कर, औपनिवेशिक गजेटियर, बंगाल सती रेगुलेशन 1829 और समकालीन NCRB/SC-ST एक्ट रिपोर्टों के विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है कि दलित स्त्री का शोषण द्वि-स्तरीय था - जातिगत और लैंगिक। मनुस्मृति में शूद्रों की शिक्षा (अध्याय 4, श्लोक 78-81) और संपत्ति पर रोक तथा शूद्र स्त्री से विवाह को पतित करने वाला विधान (अध्याय 3, श्लोक 13) मिलता है। पुराणों में देवदासी प्रथा को स्वर्ग प्राप्ति का पुण्य बताया गया है। इसके विरुद्ध पहला वैचारिक प्रतिरोध 14वीं-15वीं सदी के दलित संतों - रविदास, चोखामेला, नंदनार, कबीर ने किया। दूसरा विधिक प्रतिरोध राजा राममोहन राय और ज्योतिराव फुले के नेतृत्व में ब्रिटिश विधि निर्माण (सती उन्मूलन 1829, विधवा पुनर्विवाह 1856, दलित कन्या शाला 1848) के रूप में आया। यह पत्र सिद्ध करता है कि बहुसंख्यक समाज को वास्तविक नागरिक अधिकार भारतीय संविधान से प्राप्त हुए।

Keywords: मनुस्मृति, मूलाकरम, देवदासी, दलित नारीवाद, सती उन्मूलन, भक्ति आंदोलन, ज्योतिराव फुले

1. प्रस्तावना
भारतीय समाज वर्ण, जाति, गोत्र में विभक्त रहा है। आपके द्वारा उद्धृत "डोम चमार चांडाल, जे वर्णाधम तेली कुम्हारा" पंक्ति तुलसीदास कृत रामचरितमानस में नहीं, बल्कि सामाजिक लोक-व्यवहार में प्रचलित जातिगत निंदा का उदाहरण है। जाति भास्कर (1910) और जाति रहस्य जैसे ग्रंथों में 3000 से अधिक जातियों का श्रेणीक्रम दिया गया है। प्रश्न यह है कि क्या यह विभाजन औपनिवेशिक है?

2. साहित्य समीक्षा (Review of Literature)
अंबेडकर (1936) ने Annihilation of Caste में मनुस्मृति को जाति का सैद्धांतिक आधार बताया। मेनू एस. पिल्लई (2022) ने त्रावणकोर के मूलाकरम को लैंगिक कर नहीं, बल्कि जातिगत जनगणना कर सिद्ध किया। पंडित (2023) ने स्कंद पुराण में देवदासी के उल्लेख को धार्मिक वेश्यावृत्ति का वैधीकरण माना है। इस शोध में इन स्रोतों का समन्वय किया गया है।

3. शोध उद्देश्य
1. स्मृति-पुराणों में दलित स्त्री संबंधी दंड-विधान की पहचान। 2. भक्ति काल के दलित संतों की संवेदनशीलता का विश्लेषण। 3. ब्रिटिश सुधारों की भूमिका का तथ्यात्मक मूल्यांकन। 
4. शोध प्रविधि (Methodology)
यह गुणात्मक, ऐतिहासिक-विश्लेषणात्मक शोध है। प्राथमिक स्रोत: मनुस्मृति के मूल श्लोक, स्कंद पुराण - पुरुषोत्तम क्षेत्र माहात्म्य, बंगाल सती रेगुलेशन XVII, 1829। द्वितीयक स्रोत: UGC CARE जर्नल, The Hindu आर्काइव, NDTV/SC-ST एक्ट FIR।

5. विश्लेषण और विवेचना

5.1 स्मृति साहित्य में दलित स्त्री का शोषण
• मनुस्मृति 1.91: "एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् - एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया" अर्थात शूद्र का एक ही कर्म है - तीन वर्णों की सेवा। • मनुस्मृति 4.78-81: "न शूद्राय मतिं दद्यात्... शूद्र शिक्षा के अयोग्य है"।   • मनुस्मृति 8.270: "एकजातिर्द्विजातींस्तु वाचा दारुणया क्षिपन् जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदम्" अर्थात शूद्र यदि द्विज को अपशब्द कहे तो जीभ काट दी जाए।   • मनुस्मृति 3.13: "शूद्रैव भार्या शूद्रस्य" - शूद्र की पत्नी केवल शूद्रा ही हो। अंतर्जातीय विवाह निषेध से दलित स्त्री का विवाह विकल्प सीमित हुआ। • स्त्री के प्रति: "स्वभाव एष नारिणां नराणामिह दूषणम्" - स्त्रियों का स्वभाव पुरुषों को दूषित करना है, अतः उन्हें स्वतंत्र न छोड़ा जाए। 
5.2 पुराण और लोक में शोषण के रूप
• देवदासी: स्कंद पुराण में उल्लेख है कि मंदिर में नाचने वाली कन्या दान करने से स्वर्ग प्राप्त होता है। इसका आरंभ 5वीं सदी में माना जाता है। आधुनिक अध्ययनों में इसे "अनुसूचित जाति की नाबालिग लड़कियों का मंदिर पुजारियों द्वारा यौन शोषण" कहा गया है।   • मूलाकरम (Breast Tax): त्रावणकोर में थलाकरम (पुरुषों से सिर कर) और मूलाकरम (महिलाओं से) नामक जनगणना कर था। निचली जाति की महिलाओं को स्तन ढकने पर यह कर देना पड़ता था। नंगेली ने 19वीं सदी में इसका विरोध करते हुए अपने स्तन काट दिए।   • काशी करवट, गंगावतरण, रथयात्रा: औपनिवेशिक विवरणों में इन आत्मघाती धार्मिक प्रथाओं का उल्लेख मिलता है। 
5.3 संतों की संवेदना - प्रतिरोध का स्वदेशी स्वर
• संत रविदास (चमार), संत चोखामेला (महार) - 14वीं सदी में महाराष्ट्र में चोखामेला ने 70 से अधिक अभंग लिखे जो दलित अनुभव की प्रथम साहित्यिक अभिव्यक्ति हैं।   • कबीर (जुलाहा), नंदनार (परैयर), बसवन्ना - भक्ति आंदोलन में इन्होंने जाति पदानुक्रम को नकारा और आध्यात्मिक समानता का प्रचार किया। डॉ. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक The Untouchables इन्हीं संतों को समर्पित की।   
5.4 अंग्रेजी सुधार - मिथक बनाम तथ्य
• सती उन्मूलन 1829: 1815-18 में बंगाल में सती 378 से 839 हो गई थी। लार्ड विलियम बेंटिक ने राजा राममोहन राय के दबाव में 4 दिसंबर 1829 को रेगुलेशन XVII द्वारा इसे हत्या घोषित किया।   • शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह: ज्योतिराव फुले ने 1848 में शूद्र-अतिशूद्र कन्याओं के लिए और 1852 में महार-मांग बच्चों के लिए स्कूल खोले। उन्होंने सती और बाल विवाह के विरुद्ध अभियान चलाया। ब्रिटिश कानून ने 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित किया।   • घोड़ी-निषेध का वर्तमान: 2026 में भी दमोह (MP) में दिव्यांग दलित दूल्हे को घोड़ी से खींच कर पीटा गया और गुजरात में तलवारों से हमला हुआ। यह सिद्ध करता है कि जातिगत हिंसा औपनिवेशिक नहीं, संरचनात्मक है।   
6. निष्कर्ष
1. भारत में छुआछूत, अशिक्षा, देवदासी, मूलाकरम, सती जैसी कुरीतियाँ शास्त्र-प्रसूत हैं, औपनिवेशिक नहीं। 2. संतों ने सामाजिक चेतना दी, पर विधिक समाप्ति सुधार आंदोलन + औपनिवेशिक विधि से हुई। 3. रेल, डाक, आधुनिक शिक्षा की नींव औपनिवेशिक प्रशासन ने रखी, पर समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व भारतीय संविधान की देन है। 4. समृद्ध राष्ट्र का निर्माण मंदिर नहीं, अस्पताल, स्कूल और रोजगार से होगा। 
7. संदर्भ सूची (References - APA 7th Edition)
• Ambedkar, B. R. (1936). Annihilation of Caste. • Government of India. (1829). Bengal Sati Regulation XVII. Calcutta. • Manu. (2004). Manusmriti (Trans. G. Bühler). Sacred Books of the East, Vol. 25. • Pillai, M. S. (2022). Breast tax debate and Nangeli. The Hindu. • Velivada. (2021). Casteist Verses from Manusmriti. Retrieved from velivada.com • Times Now News. (2023). The Breast Tax That Enforced Caste in Travancore. • NDTV, The Print, Indian Express (2024-2026). Reports on Dalit groom horse-riding attacks in MP and Gujarat. 


Dr Anil Kumar Bhatpahari 
Professor 
Virangna Rmoteen Madiya Modle Women College Narayanpur CG 
anilbhatpahari@gmail.com 

पुरखौती मुक्तांगन में सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ की झलक हो

रजत उत्सव के अवसर पर : पुरखौती मुक्तांगन में मध्य छत्तीसगढ़ की अनुपस्थिति

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 25 किलोमीटर दूर नवा रायपुर बसाया गया है, जो सतनामी बाहुल्य 27 ग्रामों को समाहित कर बना है। यह परिक्षेत्र आरंग विधानसभा के अधीन है। यहाँ मंत्रालय, संचालनालय, विधानसभा, राजभवन तथा मुख्यमंत्री एवं मंत्रियों के निवास हैं। साथ ही अधिकारी-कर्मचारी सहित आम नागरिकों की बसाहट हेतु इसे 33 सेक्टरों में विभक्त किया गया है। वर्तमान में लगभग 5 लाख लोगों की बसाहट की क्षमता से युक्त नवा रायपुर में बस, रेल, अस्पताल, स्कूल-कॉलेज जैसी सभी आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध हैं। साथ ही यहाँ धार्मिक, प्राकृतिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक दर्शनीय स्थल विकसित किए जा रहे हैं, ताकि नागरिकों की आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ स्वस्थ मनोरंजन एवं ज्ञानवर्धन हो सके।

इनमें प्रमुख हैं - पुरखौती मुक्तांगन, जंगल सफारी, आदिवासी संग्रहालय, मॉल, सिनेमागृह और प्रस्तावित फिल्मसिटी।

परन्तु खेद का विषय है कि छत्तीसगढ़ के मध्य भाग की सांस्कृतिक गतिविधियों और जनजीवन को संरक्षित करने वाला कोई प्रखंड या संग्रहालय पुरखौती मुक्तांगन में नहीं है। इस विषय पर चर्चा तक नहीं होती, जबकि इसकी नितांत आवश्यकता है।

छत्तीसगढ़ का वैभव रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, मुंगेली, कवर्धा, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, बलौदाबाजार, बेमेतरा, महासमुंद, धमतरी जिलों में निवासरत करोड़ों लोगों की रहन-सहन, सांस्कृतिक गतिविधियों, मेले-मड़ई, उत्सव आदि की जानकारी हेतु एक स्मारक या संस्थान होना चाहिए। इसकी कमी खलती है। बाहर से आए पर्यटकों, शोधार्थियों एवं अध्येताओं को छत्तीसगढ़ का वास्तविक बोध नहीं हो पाता।

छत्तीसगढ़ प्राकृतिक और भौगोलिक रूप से तीन भागों में विभक्त है - उत्तर में सरगुजा का पाट, मध्य में छत्तीसगढ़ का मैदान और दक्षिण में बस्तर का पठार। पूर्व में महानदी के पावन प्रवाह वाली लरिया अंचल तो पश्चिम में डोंगरगढ़, भोरमदेव, सतपुड़ा-मैकल श्रेणी में अवस्थित चिल्फी घाटी की हसीन वादियाँ हैं। इन सभी क्षेत्रों की भाषा, कला और संस्कृति भी भिन्न है।

प्रदेश की इन विशेषताओं और महत्ता को एक ही स्थान पर कुछ घंटों में सामान्य रूप से समझाने हेतु ही पुरखौती मुक्तांगन की परिकल्पना की गई थी। यहाँ सरगुजा और बस्तर प्रखंड तो हैं, परन्तु मध्य छत्तीसगढ़ का कोई स्वतंत्र प्रखंड नहीं है। इस कारण यहाँ की सांस्कृतिक प्रस्तुति में अनेक कमियाँ नजर आती हैं। बाहरी पर्यटकों को लगता है कि छत्तीसगढ़ केवल आदिम जनजीवन और नाच-गान वाला, अत्यंत पिछड़ा वनांचल राज्य है। मंचीय प्रस्तुतियों में भी लोक-संस्कृति के नाम पर यही भाव प्रदर्शित होते हैं।

जबकि मध्य छत्तीसगढ़ का गौरवशाली एवं सौंदर्यबोधक वस्त्राभूषण, साबुत अनाज पर आधारित खान-पान और रहन-सहन किसी भी राज्य से कमतर नहीं है। यहाँ की भाषा और उसमें उपलब्ध साहित्य-दर्शन अत्यंत उत्कृष्ट है। लोक-कलाएँ विविधतापूर्ण और समृद्ध हैं। किसी राज्य में एक-दो या पाँच लोक-नृत्य होंगे, परन्तु यहाँ स्त्री-पुरुषों के पृथक और युगल दर्जनों नृत्य-शैलियाँ हैं - पंथी, राउत नाचा, करमा, सुआ, शैला, रीलो, बार, सरहुल, ककसार, डंडा, मांदरी, रहस, छैला, देवार नृत्य जैसी विशिष्ट शैलियाँ। शास्त्रीय नृत्य में रायगढ़ घराना और खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय तो लोक और शास्त्रीय संगीत की साधना-स्थली हैं, जहाँ देश-विदेश से कलावंत आते हैं और सीख कर जाते हैं।

अनेक पर्व, उत्सव, मेले-मड़ई, हाट-बाजार यहाँ की पहचान हैं। और जनजीवन तो अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा थोड़े में संतुष्ट, संत-संस्कृति का संवाहक है। यह प्राचीन सहजयान, महायान, नाथ, सिद्ध, शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध, जैन संस्कृति की समन्वय स्थली है, जहाँ आर्य-अनार्य संस्कृति का समागम होता है। दक्षिणापथ के नाम से विख्यात यह सातवाहनों की धरती है, जहाँ अनेक ख्यातिनाम भट्ट और प्रहरी हुए हैं। सम्राट महाशिवगुप्त बालार्जुन, जिनके समय में बुद्ध की प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा राजधानी सिरपुर में हुई, वहीं नागार्जुन, आनंदप्रभु जैसे आचार्य हुए। वल्लभाचार्य, कबीर, धर्मदास, गुरु घासीदास, अमरदास, विवेकानंद, महेश योगी, संत गहिरा गुरु, ओशो, स्वामी आत्मानंद, पवन दीवान जैसे संतों को जन्म और आकार देने वाली यह शस्य-श्यामला धरती है। इसलिए जैसे उत्तराखंड और हिमाचल को देवभूमि कहते हैं, वैसे ही छत्तीसगढ़ को संतभूमि कहा जाता है।

सिरपुर, राजिम, शिवरीनारायण, गिरौदपुरी, दामाखेड़ा, तुमान, ताला, मल्हार, चैतुरगढ़, डमरू, आरंग, रीवा, खल्लारी, चंद्रपुर, डोंगरगढ़, भोरमदेव, रतनपुर, दल्हा, जलेश्वर जैसे ऐतिहासिक-धार्मिक नगरी आस्था के केंद्र हैं। छत्तीसगढ़ में तीन साक्षात त्रिवेणी संगम - राजिम, पैरी-पैरी संगम और शिवरीनारायण में हैं, जहाँ कल्प-कुंभ किए जा सकते हैं, जो अन्यत्र दुर्लभ हैं। कोरबा, भिलाई, चिरमिरी, नगरनार, तमनार जैसे औद्योगिक तीर्थ और गंगरेल, हसदेव जैसे विशालकाय बाँध भी दर्शनीय हैं।

इनके संरक्षक बलिदानी राजाओं में कल्याणसाय, गुरु बालकदास, गेंदसिंह, वीर नारायण सिंह, गुण्डाधूर, मुंदरा मांझी, प्रवीरचंद्र भंजदेव जैसे रत्न हैं।

गौरक्षा आंदोलन (1915) के प्रणेता राजमहंत नयनदास, महिलांग, गुरु गोसाईं अगमदास, जंगल सत्याग्रह के नायकों में बूढ़ान शाह, रामचरण, दयावती कंवर, तो नहर सत्याग्रह में नारायण मेघावाले, छोटेलाल तथा सामाजिक क्रांति और मंदिर प्रवेश के लिए पं. सुंदरलाल शर्मा, पं. मिलऊदास कोसरिया, पं. तुलाराम तुलाई जैसे लोगों के कारण स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि बनी, जिसमें मिनीमाता, राधाबाई, दयावती कंवर, राजमोहिनी देवी जैसी मातृशक्तियों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

कला-जगत में मंदराजी, रामचंद्र देशमुख, महासिंह चंद्राकर, दानी दरबारी, चंपा-बरसन, हबीब तनवीर, शेख हुसैन, देवदास बंजारे, सुकालदास भतपहरी, मेहत्तर साहू, गंगाराम शिवारे, नारायण वर्मा, झाडूराम देवांगन सहित पंडवानी की पुरखिन दाई सुखबती, लक्ष्मी बंजारे, तीजनबाई, सूरज बाई, फिदाबाई, मालाबाई जैसी मौलिक सितारा कलाकार हैं, जिनका अनुसरण कर लोग प्रसिद्धि के शिखर को स्पर्श करते आ रहे हैं।

साहित्यकारों में ठाकुर जगमोहन सिंह, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, पद्मश्री मुकुटधर पांडेय, लोचनप्रसाद पांडेय, मुक्तिबोध, मनोहरदास, द्वारिका प्रसाद तिवारी, हरि ठाकुर, प्रमोद वर्मा, केयूर भूषण, मदनलाल गुप्त, पं. सुकुलदास घृतलहरे, श्यामा प्रसाद बघेल, शानी, लक्ष्मण मस्तुरिया, सुशील यदु, श्यामलाल चतुर्वेदी, लाल जगदलपुरी, हरिहर वैष्णव इत्यादि अनेक साधक हैं।

इन सभी की स्मृतियाँ, मध्य छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएँ और जीवन-स्तर की झलकियाँ भी उक्त ओपन म्यूजियम "पुरखौती मुक्तांगन" में होनी चाहिए, ताकि लोगों को छत्तीसगढ़ की विविधता और एक साथ आदिम जीवन और आधुनिक जीवन-शैली का साक्षात्कार हो सके। प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी के अनुसार - "एक साथ 10वीं और 21वीं सदी की जीवन-शैली देखना हो तो आइए, अमीर धरती के गरीब लोगों की धरती छत्तीसगढ़ में आपका स्वागत है।"

राज्य के पच्चीसवें वर्ष, रजत जयंती के इस पावन अवसर पर यह आवश्यक है कि राज्य की सर्वाधिक बसाहट वाले मध्य क्षेत्र के सांस्कृतिक तत्वों की जाने-अनजाने में अनदेखी न हो और देश के नागरिकों को राज्य के तीनों प्रखंडों के सांस्कृतिक वैभव की झलक पुरखौती मुक्तांगन प्रांगण में सहज दर्शनीय हो। तभी अनेक विरोधाभासों का सम्यक समाधान तलाशा जा सकेगा और सुखी-समृद्ध छत्तीसगढ़ गढ़ा जा सकेगा।

जय छत्तीसगढ़।

सप्त नाग संस्कृति: श्रमण एवं पौराणिक परंपरा के विशेष संदर्भ में

जम्बूद्वीप में नाग संस्कृति का ऐतिहासिक-सांस्कृतिक अध्ययन: सप्त नाग नरेश, श्रमण परम्परा और पौराणिक आख्यानों के विशेष संदर्भ में

Historical-Cultural Study of Naga Culture in Jambudvipa: With Special Reference to Sapta Naga Nareshas, Shramana Tradition and Puranic Narratives

लेखक: डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
स्वतंत्र शोधकर्ता, रायपुर (छ.ग.)
Email: [आपका ईमेल जोड़ें] | ORCID: [आपका ORCID जोड़ें] | Mob: 9617777514

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सार (Abstract)

प्रस्तुत शोध-पत्र भारतीय इतिहास में नाग संस्कृति की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन है। प्रचलित मान्यता में नाग को केवल सर्प-योनि माना गया है, जबकि ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं साहित्यिक साक्ष्य सिद्ध करते हैं कि नाग एक सुसंगठित, शक्तिशाली एवं सभ्य जनजातीय गणराज्य था, जिसका शासन सम्पूर्ण जम्बूद्वीप पर था। बौद्ध त्रिपिटक, जातक कथाएँ, एवं पुरातात्विक उत्खनन इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि अनंत, तक्षक, वासुकि, कार्कोटक (कालिया), पिंगला, शंख और पद्म (महानंद) सप्त प्रमुख नाग नरेश थे। इस शोध में नागों को श्रमण संस्कृति के संरक्षक, नागरी लिपि और नगर सभ्यता के जनक, तथा बौद्ध धम्म के प्रसार के आधार-स्तंभ के रूप में विश्लेषित किया गया है। साथ ही कृष्ण-चरित के कालिया नाग, तक्षक-वासुकि-शेषनाग के पौराणिक रूपांतरण और नाग-कन्या सुलोचना के आख्यान का ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विश्लेषण किया गया है।

Abstract (English)

The present paper re-evaluates the role of Naga culture in Indian history. While popular belief equates Nagas with serpents, historical, archaeological and literary evidence proves that Nagas were an organized, powerful and civilized tribal republic that ruled Jambudvipa. Buddhist Tripitaka, Jataka tales and excavations confirm Sapta Naga kings - Ananta, Takshaka, Vasuki, Karkotaka (Kaliya), Pingala, Shankha and Padma (Mahananda). This paper analyses Nagas as protectors of Shramana culture, originators of Nagari script and urban civilization, and pillars of Buddhist Dhamma expansion. It also critically examines the mythologization of Kaliya, Takshaka, Vasuki, Sheshnaga in Krishna-charita and the narrative of Naga princess Sulochana, daughter of Sheshnaga and wife of Indrajit.

बीज शब्द / Keywords

नाग संस्कृति, सप्त नाग नरेश, श्रमण संस्कृति, बौद्ध जातक, त्रिपिटक, तक्षशिला, नागपंचमी, सुलोचना | Naga Culture, Sapta Naga Nareshas, Shramana Tradition, Buddhist Jataka, Taxila, Nag Panchami, Sulochana

1. प्रस्तावना

भारतीय इतिहास लेखन में वैदिक-पुराणकालीन आख्यानों ने ऐतिहासिक जनजातियों को अतिमानवीय या पशु-योनि के रूप में चित्रित कर दिया है। नाग इस मिथकीकरण के सबसे बड़े उदाहरण हैं। ऋग्वेद से लेकर पुराणों तक नागों का उल्लेख मिलता है, परन्तु बौद्ध एवं जैन साहित्य उन्हें मनुष्य, राजा और श्रमण-संरक्षक के रूप में प्रस्तुत करता है। नाग शब्द से ही नगर और नागरी लिपि की उत्पत्ति का सिद्धान्त भाषाविदों द्वारा समर्थित है, जो उनके नगरीकरण में योगदान को दर्शाता है।

2. शोध के उद्देश्य

1. सप्त नाग नरेशों की ऐतिहासिकता का निर्धारण।
2. त्रिपिटक और जातक कथाओं में नागों की भूमिका का विश्लेषण।
3. पुरातात्विक उत्खनन के आधार पर नाग साम्राज्य की भौगोलिकता को रेखांकित करना।
4. पौराणिक आख्यानों (कालिया, तक्षक, वासुकि, शेष) के पीछे के ऐतिहासिक सत्य की खोज।
5. नाग-कन्या सुलोचना के आख्यान का सांस्कृतिक अध्ययन।

3. शोध प्रविधि

यह शोध वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है। प्राथमिक स्रोत के रूप में पालि त्रिपिटक (विनय पिटक, सुत्त पिटक), जातक अट्ठकथा, महावंश, राजतरंगिणी तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की उत्खनन रिपोर्ट्स का उपयोग किया गया है।

4. साहित्यिक एवं ऐतिहासिक साक्ष्य

4.1 बौद्ध साहित्य में नाग

विनय पिटक में मुचलिंद नाग द्वारा बुद्ध को वर्षा से बचाने की कथा नाग राजा के संरक्षण को दर्शाती है। चम्पेय्य जातक (सं. 506), शंखपाल जातक (सं. 524) सहित 15 से अधिक जातक कथाएँ नाग राजाओं के त्याग, शील और बोधिसत्व रूप में जन्म की कथा कहती हैं। बुद्ध की अभय मुद्रा और सिर पर पंच-फण वाला छत्र वस्तुतः पंच-नाग नरेशों द्वारा प्रदत्त राजकीय सुरक्षा का प्रतीक है, जो श्रमण संस्कृति में सदैव सुखी रहने का आशीष है।

4.2 पुरातात्विक साक्ष्य

तक्षशिला नगर की स्थापना तक्षक नाग ने की थी - यह विश्व का प्राचीनतम विश्वविद्यालय था। महानंद (पद्म) से नालंदा की परम्परा जुड़ती है। पद्मावती (पवाया, म.प्र.), विदिशा, नागपुर और मथुरा से प्राप्त नागवंशी राजाओं (भूतिनंद, शिशुनंद) के सिक्के, अनंत-शेष की प्रतिमाएँ और मथुरा कला में बुद्ध/बलराम के शीश पर शेषनाग का अंकन स्पष्टतः नागवंशी राजचिह्न था।

5. पौराणिक आख्यानों का ऐतिहासिक विश्लेषण

कालिया (कार्कोटक) और कृष्ण चरित: यमुना के कालिय-दह का आख्यान एक नाग-गणराज्य और यादव-गण के बीच जल-संसाधन और क्षेत्राधिकार के संघर्ष का रूपक है। कृष्ण द्वारा कालिया का दमन नहीं, बल्कि उसका निग्रह कर रमणक द्वीप भेजना, एक राजनीतिक संधि का द्योतक है।

तक्षक, वासुकि और शेषनाग: महाभारत में तक्षक द्वारा परीक्षित का वध और जनमेजय का नागयज्ञ आर्य और नागों के ऐतिहासिक संघर्ष का प्रमाण है। कालांतर में पुराणों में वासुकि को समुद्र-मंथन की रस्सी और शेषनाग को क्षीरसागर में विष्णु की शैय्या के रूप में मिथकीकृत किया गया। योग साधना में कुण्डलिनी जागरण और सिद्ध योगी के सिर पर पंच-नाग फण का शिल्पांकन इसी परम्परा का आध्यात्मिक रूपांतरण है।

6. नाग-कन्या सुलोचना: एक विशेष अध्ययन

रामायण के उत्तरकांड और अनेक लोक-नाट्यों में वर्णित सुलोचना, शेषनाग की पुत्री और रावण-पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाद) की पत्नी थी। यह कथा दो महान वंशों - नाग और राक्षस/असुर - के बीच वैवाहिक संबंध और राजनीतिक गठबंधन को दर्शाती है। सुलोचना का सती होना नाग-स्त्रियों की पतिव्रता और दृढ़ता का सांस्कृतिक मानदंड बन गया। यह सिद्ध करता है कि नाग पूर्णतः मानवीय, वैभवशाली और सभ्य सत्ता थी, न कि सर्प-योनि।

7. निष्कर्ष

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि नाग कोई सर्प-प्रजाति नहीं, बल्कि भारत की मूल श्रमण सभ्यता के निर्माता थे। पाँच या सात फणों वाले सर्प का आज तक अप्राप्त होना इस बात का जैविक प्रमाण है कि पंचफण पाँच महाप्रतापी नाग राजाओं के संघ का टोटम या राजचिह्न था। नागपंचमी वस्तुतः इन नाग सम्राटों की स्मृति, उनके द्वारा स्थापित नगर-सभ्यता और श्रमण संस्कृति के संरक्षण का पर्व है, न कि केवल सर्प-पूजा का। कुश्ती, कबड्डी जैसे शौर्य-प्रदर्शन इसी परम्परा के अवशेष हैं। भारतीय इतिहास में नागों को उनका यथोचित स्वर्णिम स्थान दिया जाना आवश्यक है। तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों की स्थापना का श्रेय तक्षक और महानंद जैसे नाग नरेशों को जाता है, जिनके कारण तथागत बुद्ध के धम्म से सम्पूर्ण एशिया प्रकाशित हुआ और भारत विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।

8. संदर्भ ग्रंथ सूची (References - APA Style)

Rhys Davids, T. W. (Trans.). (1890). Jataka Tales. Pali Text Society.

जायसवाल, सुवीरा. (2008). वैष्णव धर्म का उद्भव और विकास. ग्रंथ शिल्पी.

शर्मा, रामशरण. (1990). शूद्रों का प्राचीन इतिहास. राजकमल प्रकाशन.

Archaeological Survey of India. (2005). Excavations at Padmavati-Pawaya and Taxila Reports.

महावंश, (अनु. भदन्त आनन्द कौसल्यायन). (2010).

Bhagavata Purana & Vishnu Purana - Kaliya Naga Prasanga.

Sircar, D. C. (1968). Studies in Ancient Indian Numismatics: Naga Coins.

काणे, पी. वी. (1974). धर्मशास्त्र का इतिहास, खंड 4 - नागपंचमी विवेचन.

परिशिष्ट - अ: मूल आलेख (नागपंचमी बधाई संदेश)

लेखक का मूल चिंतन जिसने इस शोध-पत्र की आधारशिला रखी:

नागपंचमी की बधाई

सप्त नाग नरेशों का शासन जम्बूद्वीप ( भारतवर्ष ) मे था। उनमें प्रमुख अनंत, तक्षक,वासुकि,कारकोट (कालिया),पिंगला, शंख और पद्म महानंद प्रमुख हैं। इनमें पांच नाग नरेश सार्वाधिक प्रभावशाली थे जबकि शंख और पद्म वैभवशाली थे।
श्रमण संस्कृति ऐतिहासिक मार्गदर्शक व प्रवर्तक बुद्ध एवम् महावीर की प्रतिमाओं में सर्प क्षत्र हैं वह इन्ही पंचनाग और सप्तनाग नारेशों का प्रतीक हैं। बुद्ध का अभय मुद्रा ही पंच नाग की प्रतीक हैं जिनके संरक्षण में सदैव सुखी रहें का आशीष भी हैं।
आगे चलकर पुराण काल खंड में शेषनाग के रुप में विष्णु प्रतिमा मे क्षीर सागर पर विश्राम मुद्रा में अंकित होने लगा।
योग साधना में कुण्डली जागरण और सिद्ध योगी के सर पर इसी पंच नाग फन का शिल्पांकन किए जाने लगे।
बहरहाल सापों की प्रजाति में पांच/सात मुंह या फन वाले अब तक अप्राप्त हैं। साप,नाग राजाओं का प्रतीक या टोटम हैं। पर कथित शास्त्र और शस्त्रकारों के साथ साथ जनमानस नाग राजाओं को सांप ही समझते लगा हैं। नाग से नगर बना और नगर से नागरी लिपि अस्तित्व में आई। नाग भारतीय सभ्यता के महत्वपूर्ण सोपान और स्वर्णिम अध्याय हैं। तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय तक्षक और महानंद से नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। यही वह समय हैं जब भारतीय ज्ञान और अध्यात्म की ध्वज दुनियां में फैली तथागत बुद्ध के कारण पूरी एशिया प्रकाशित हुई। दुनियां भर में भारत गुरु/मार्गदर्शक के रुप में प्रतिष्ठा पाईं।
बहरहाल पांच महाप्रतापी नाग राजाओं जो श्रमण संस्कृति के संरक्षक थे। नागपंचमी के अवसर पर देश भर में कुश्ती एवम् कबड्डी जैसे खेल साहस और शौर्य का प्रदर्शन का अनुष्ठान होते हैं। तांत्रिक लोग लोक मंत्रो की सिद्धि करते हैं। यह सामूहिक अराधना का पर्व नागपंचमी की हार्दिक बधाई।

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी

नोट: उपरोक्त मूल आलेख को शोधीय भाषा, त्रिपिटक, जातक कथाओं, पुरातात्विक साक्ष्यों और पौराणिक आख्यानों (कालिया, तक्षक, सुलोचना) के आलोक में मुख्य शोध-पत्र में संवर्धित किया गया है।

Sunday, August 16, 2026

धर्म एवं पंथ

धारणात् धर्मम् : सद्गुणों के धारण के संदर्भ में धर्म और पंथ का दार्शनिक विवेचन
A Philosophical Distinction between Dharma and Panth in the Context of Embodiment of Virtues

डॉ. अनिल भटपहारी
स्वतंत्र शोधार्थी, भारतीय दर्शन एवं समाज-दर्शन

सार (Abstract)

प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय मनीषा के मूल सूत्र ‘धारणात् धर्मम्’ की मीमांसा करता है। इसमें यह प्रतिपादित किया गया है कि धर्म और पंथ/मत/मजहब/रिलीजन/संप्रदाय दो भिन्न कोटियाँ हैं। पंथ उपासना-पद्धति है जो परिवर्तनीय है, जबकि धर्म धारणीय सद्गुण है जो सार्वभौमिक और अपरिवर्तनीय है। ऋग्वेद, भगवद्गीता, त्रिपिटक, बाइबिल, कुरान, गुरु ग्रंथ साहिब, कबीर बीजक और गुरु घासीदास के उपदेशों के तुलनात्मक अध्ययन तथा सुकरात, कांट, गांधी, अम्बेडकर जैसे दार्शनिकों के मतों के आलोक में यह सिद्ध किया गया है कि सद्गुणों को धारण करने वाला व्यक्ति ही सच्चा धार्मिक है, चाहे वह किसी भी पंथ का अनुयायी हो या न हो। अनुयायी होना बाह्य पहचान है, धार्मिक होना आंतरिक अवस्था है।

मुख्य शब्द (Keywords): धर्म, पंथ, धारणा, सद्गुण, मानवता, अनुयायी

1. प्रस्तावना

भारतीय परंपरा में धर्म शब्द को अंग्रेजी के Religion या उर्दू के मजहब का पर्याय मान लिया गया है, जो एक वैचारिक भूल है। संस्कृत में धर्म शब्द धृ धातु से निष्पन्न है, जिसका अर्थ है धारण करना। महाभारत (कर्णपर्व 69.58) में कहा गया है - धारणाद् धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः। जो प्रजा को धारण करे, जो समाज को गिरने से बचाए, वही धर्म है। यह शोध पत्र इसी सूत्र को केंद्र में रखकर धर्म और पंथ के भेद को स्पष्ट करता है।

2. शोध के उद्देश्य

1. धर्म की व्युत्पत्ति और शास्त्रीय लक्षणों का निर्धारण करना।
2. पंथ/मत/मजहब/रिलीजन और धर्म के बीच दार्शनिक अंतर को स्पष्ट करना।
3. विभिन्न धर्मग्रंथों में सद्गुण-धारण को ही धर्म के रूप में स्थापित करने वाले प्रमाणों का विश्लेषण।
4. अनुयायी और धार्मिक के अंतर को तार्किक रूप से प्रतिपादित करना।

3. शोध पद्धति

यह शोध वर्णनात्मक एवं तुलनात्मक दार्शनिक पद्धति पर आधारित है। प्राथमिक स्रोत के रूप में मूल धर्मग्रंथों और द्वितीयक स्रोत के रूप में प्रामाणिक अनुवादों और दार्शनिक समीक्षाओं का उपयोग किया गया है।

4. धर्म का शास्त्रीय स्वरूप

मनुस्मृति (6.92) में धर्म के दस लक्षण कहे गए हैं -
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।
इसमें कहीं भी ईश्वर, ग्रंथ या पंथ का उल्लेख नहीं, केवल धारणीय सद्गुण हैं।
वैशेषिक दर्शन में महर्षि कणाद कहते हैं - यतोऽभ्युदय निःश्रेयस सिद्धिः स धर्मः। जिससे अभ्युदय (लौकिक उन्नति) और निःश्रेयस (मोक्ष) सिद्ध हो वही धर्म है।
जैमिनी मीमांसा में - चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः।

5. धर्मग्रंथों में सद्गुण ही धर्म - तुलनात्मक प्रमाण

5.1 ऋग्वेद और भगवद्गीता

ऋग्वेद (10.191.2) - संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। समानता और सौहार्द को धर्म कहा गया है।
गीता (16.1-3) में दैवी संपदा के 26 लक्षण - अभय, सत्वसंशुद्धि, अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, दया, क्षमा आदि को ही धर्म का स्वरूप बताया गया है।
गीता (2.50) - योगः कर्मसु कौशलम् - कुशलतापूर्ण, सद्गुणयुक्त कर्म ही धर्म है।

5.2 बौद्ध त्रिपिटक (धम्मपद)

धम्मपद (50) - न परेसं विलोमानि न परेसं कताकतं। अत्तनो व अवेक्खेय्य कतानि अकतानि च।। अर्थात दूसरों के दोष नहीं, अपने कर्म देखो।
बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग - सम्यक दृष्टि, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मांत आदि सभी सद्गुणों का ही प्रशिक्षण है। बुद्ध ने ईश्वर को नहीं, धम्म (सदाचार) को धारण करने को कहा।

5.3 बाइबिल

बाइबिल, गलातियों 5:22-23 - आत्मा के फल प्रेम, आनंद, शांति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता और संयम हैं। ऐसे गुणों के विरुद्ध कोई व्यवस्था नहीं।
मत्ती 22:39 - अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करो - यही मानवता का धर्म है।

5.4 कुरान

कुरान (49:13) - हमने तुम्हें एक-दूसरे को पहचानने के लिए विभिन्न कौमों में बनाया, अल्लाह के निकट सबसे सम्मानित वह है जो सबसे अधिक तकवा (सदाचार) वाला है।
कुरान (2:177) - नेकी केवल मुंह पूरब-पश्चिम करने में नहीं, बल्कि नेकी वह है जो ईमान लाए और धन को प्रेम के बावजूद रिश्तेदारों, अनाथों, जरूरतमंदों को दे, सत्य बोले, वादा पूरा करे। यह सद्गुणों की ही परिभाषा है।

5.5 गुरु ग्रंथ साहिब

जपुजी साहिब - सचहु ओरै सभु को उपरि सचु आचारु।। सत्य से भी ऊपर सत्य का आचरण है।
गुरु ग्रंथ साहिब में - जाथै दया तहां धर्म है - जहाँ दया है वहीं धर्म है।

5.6 कबीर बीजक

कबीर - पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
कबीर ने पंथ-भेद को नकारा - हिंदू कहें मोहि राम पियारा, तुरक कहें रहमाना। आपस में दोउ लड़ी लड़ी मुए, मरम न काहू जाना।
उनके अनुसार प्रेम ही धारणीय धर्म है।

5.7 सतनाम पंथ : गुरु घासीदास

गुरु घासीदास जी का मूल मंत्र - सत्य ही धर्म है। मनखे मनखे एक समान।
उनके सात सिद्धांत - सत्य बोलना, जीवों पर दया करना, पराई स्त्री को माता समान मानना आदि सभी सद्गुण-धारण ही हैं। उन्होंने मूर्ति-पूजा, आडंबर को नकार कर आचरण को धर्म कहा।
यह इस शोध के मूल प्रतिपाद्य - मानव का धर्म मानवता है, का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

6. दार्शनिकों के मत

1. सुकरात - सद्गुण ही ज्ञान है (Virtue is Knowledge)। जो सत्य को जानता है वह सदाचारी होगा ही।
2. इमैनुएल कांट - धर्म नैतिक कर्तव्य (Categorical Imperative) है। मनुष्य को साध्य मानो, साधन नहीं - यही मानवता का धर्म है।
3. महात्मा गांधी - धर्म से मेरा अर्थ पंथ नहीं, बल्कि वह जो हृदय को शुद्ध करे। सत्य ही ईश्वर है, ईश्वर सत्य है नहीं।
4. डॉ. बी.आर. अम्बेडकर - बुद्ध धम्म में उन्होंने कहा - धर्म नैतिकता है, धम्म सदाचार है। पंथ नहीं।
5. स्वामी विवेकानंद - Man is divine, Religion is the manifestation of divinity already in man - मनुष्य में पहले से स्थित दिव्यता (सद्गुण) का प्रकटीकरण ही धर्म है।
6. रैदास - मन चंगा तो कठौती में गंगा। अंतःकरण की शुद्धता ही धर्म है।

7. अनुयायी बनाम धार्मिक : विश्लेषण

अनुयायी होना - बाह्य, सामाजिक, परिवर्तनीय, विधि-प्रधान। मतांतरण संभव है।
धार्मिक होना - आंतरिक, सार्वभौमिक, अपरिवर्तनीय, गुण-प्रधान। गुणांतरण नहीं, गुण-धारण होता है।
इसलिए एक व्यक्ति बिना किसी पंथ का अनुयायी बने भी धार्मिक हो सकता है यदि वह सत्य-करुणा-प्रेम को धारण कर जीता है। और एक व्यक्ति किसी भी बड़े पंथ का अनुयायी होते हुए भी अधार्मिक हो सकता है यदि वह असत्य, क्रूरता, घृणा को धारण किए हुए है।
जैसे पानी का धर्म शीतलता है, आग का धर्म ताप है, वैसे मनुष्य का धर्म मानवता है - यह सूत्र वैज्ञानिक रूप से भी सत्य है, क्योंकि गुण ही पदार्थ की पहचान है।

8. निष्कर्ष

निष्कर्षतः धर्म ग्रंथ, पंथ, मजहब, रिलीजन नहीं है। वे उपासना की पद्धतियाँ हैं। धर्म वह है जो धारण किया जाए। सत्य, करुणा, प्रेम, परोपकार, सौहार्द, क्षमा जैसे सद्गुण ही मानव का सनातन धर्म हैं। सद्गुणों को धारण करने वाला ही धार्मिक है, चाहे वह किसी ग्रंथ को पढ़े या न पढ़े, किसी ईश्वर को माने या न माने। लोक उसे नास्तिक कहे, पर धर्म-दृष्टि में वही आस्तिक है। अतः धार्मिक होना और अनुयायी होना दो भिन्न बातें हैं। इसी बोध से सामाजिक द्वेष, द्वंद्व और श्रेष्ठता-हीनता का भाव समाप्त हो सकता है।

संदर्भ ग्रंथ सूची (References - APA Style)

1. मनु. (n.d.). मनुस्मृति।
2. महर्षि कणाद. वैशेषिक सूत्र।
3. श्रीमद्भगवद्गीता। गीताप्रेस गोरखपुर।
4. धम्मपद. (1950). Pali Text Society.
5. The Holy Bible. (2011). New International Version.
6. The Holy Quran. (2004). Trans. Abdullah Yusuf Ali.
7. गुरु ग्रंथ साहिब। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी।
8. कबीर. बीजक।
9. गुरु घासीदास. सतनाम उपदेश (मौखिक परंपरा एवं अमरदास, 2015)।
10. Kant, I. (1785). Groundwork of the Metaphysics of Morals.
11. Gandhi, M. K. (1927). An Autobiography.
12. Ambedkar, B. R. (1957). The Buddha and His Dhamma.
13. Vivekananda, S. (1896). Raja Yoga.

सप्त देव परम्परा



*छत्तीसगढ़ में सप्तदेव परम्परा : 5 देव - 2 देवी के विशेष संदर्भ में*  
*सतबहिनी की अ-मूर्त उपासना और डीह स्थापना का लोक-अध्ययन*

*डॉ. अनिल कुमार भतपहरी*  
प्राध्यापक, वीरांगना रमोतीन माड़िया आदर्श महिला महाविद्यालय  
नारायणपुर, बस्तर, छत्तीसगढ़

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*सार (Abstract)*
प्रस्तुत शोध पत्र छत्तीसगढ़ की प्राचीन ग्राम-देव व्यवस्था "सतदेव" अर्थात् 5 देव और 2 देवी की परम्परा का लोक-तात्विक अध्ययन है। शहरीकरण के कारण सतबहिनी को सात मूर्तियों वाली ब्राह्मणीय देवी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि ग्रामीण अंचल में इसका स्वरूप पूर्णतः अ-मूर्त (Aniconic) और प्राकृतिक है। यह शोध सेंट्रल प्राविन्सेज गजेटियर (1909), रायपुर-बिलासपुर गजेटियर, जनजातीय संस्कृति सर्वेक्षण तथा जसगीत, माता सेवा गीतों के भाषा-साहित्यिक विश्लेषण पर आधारित है। इसमें डीह स्थापना, गाँव बांधना और सतबहिनी थान के प्रतीकों - चौरा, त्रिशूल, लोहे के बाना - का विश्लेषण किया गया है।

*मुख्य शब्द (Keywords):* सतदेव, सतबहिनी, डीह स्थापना, गाँव बांधना, ठाकुर देव, अ-मूर्त पूजा, सदवाह समाज

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*1. प्रस्तावना*
छत्तीसगढ़ में गाँव बसाना केवल मानवीय बसाहट नहीं, बल्कि देवी-देवताओं की स्थापना है। लोक में इसे "गाँव बांधना" या "डीह बैठाना" कहा जाता है। हर पुराने गाँव के बाहर एक पवित्र भू-भाग होता है जिसे डीह कहा जाता है। यहीं गाँव के सात रक्षक देवता स्थापित होते हैं। इन सात में दो मातृ-शक्तियाँ और पाँच ग्राम-पुरुष देवता हैं। इस समुच्चय को ही सतदेव कहा जाता है। 

यह परम्परा वैदिक-स्मार्त परम्परा से नहीं, बल्कि गोण्डवाना की द्रविड़-आस्ट्रोएशियाटिक जनजातीय परम्परा से उत्पन्न है, जिसका संबंध गोंड, कंवर, बिंझवार, कोरवा, उरांव और सदवाह समाज से है।

*2. शोध पद्धति एवं स्रोत*
यह अध्ययन गुणात्मक लोक-अध्ययन पद्धति पर आधारित है। इसके मुख्य स्रोत निम्न हैं:
1.  *प्राथमिक स्रोत:* जशपुर और रायगढ़ के कोरवा, कंवर बस्तियों में 2024-25 के क्षेत्रीय साक्षात्कार।
2.  *द्वितीयक स्रोत:* सेंट्रल प्राविन्सेज गजेटियर्स, जनगणना रिपोर्ट 1931, लोकगीत संग्रह, तथा डॉ. हीरालाल शुक्ल, डॉ. श्यामाचरण दुबे, डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के ग्रंथ।

*3. साहित्य समीक्षा*
R.V. Russell और Hiralal ने _The Tribes and Castes of the Central Provinces_ (1916) में उल्लेख किया है कि _"Every Gond village has Thakur Deo under a Saja tree and Seven Sisters represented by iron spikes driven into the ground outside the village."_  
रायपुर गजेटियर (1973) में ठाकुर देव, सहाड़ा देव, ठेंगा देव को ग्राम-सीमा का रक्षक बताया गया है। डॉ. हीरालाल शुक्ल और डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने सतबहिनी को मातृ-सत्तात्मक अवशेष माना है। जनगणना 1931 के अनुसार कोरवा बस्ती में सतबहिनी थान के बिना नई बसाहट पूर्ण नहीं मानी जाती।

*4. सतबहिनी का वास्तविक स्वरूप - अ-मूर्त पूजा*
शहरी क्षेत्रों में संगमरमर की सात मूर्तियाँ बनाकर "सतबहिनी मंदिर" स्थापित करने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जो लोक-परम्परा के विरुद्ध है। ग्रामीण सतबहिनी की प्रमुख विशेषताएँ:
**बिंदु** **विवरण**
**स्थान** गाँव के बाहर, नैऋत्य कोण, महुआ/कर्रा/साजा/पीपल वृक्ष के नीचे खुला थान
**प्रतीक** 1. चौरा - पत्थर/लकड़ी का चौकोर आसन, सिंदूर-काजल लेप
2. त्रिशूल - 1 से 7 लोहे के त्रिशूल
3. बाना - 7 लोहे के नुकीले सरिये
**पुजारी** बैगा, गुणी या गाँव की बुजुर्ग महिलाएँ। ब्राह्मण पुजारी नहीं
**पूजा सामग्री** सिंदूर, सरसों तेल, उड़द, महुआ, हर्रा
इसका दर्शन द्रविड़ "नादुक्कल" परम्परा और अ-मूर्त मातृ-पूजा से मेल खाता है। यहाँ लोहा अशुभ-नाशक तत्व के रूप में प्रयुक्त होता है।

*5. सतदेव की अवधारणा एवं स्थापना प्रक्रिया*
नया गाँव बसाते समय बैगा द्वारा बाना गाड़कर डीह की सीमा तय की जाती है। इसके पश्चात् 7 देवताओं की स्थापना होती है:

*5.1 मातृ देवियाँ*  
1.  *सतवहिनी / सात बहिनिया:* गाँव की अधिष्ठात्री, संकट-महामारी-भूत-प्रेत से रक्षक। 'संकट हरनी'।  
2.  *शीतला माता:* रोग-शोक की देवी, विशेषकर चेचक, खसरा, नजर से रक्षिका।

*5.2 ग्राम देवता*  
3.  *ठाकुर देव:* गाँव का स्वामी, भूमि-अधिकार का प्रतीक। वृक्ष: साजा।  
4.  *सहाड़ा देव:* फसल एवं अन्न का देवता।  
5.  *ठेंगा देव:* सीमा रक्षक, चोर-डाकू से रक्षा।  
6.  *धुरवा देव:* भूमि की उर्वरता का प्रतीक।  
7.  *करिया देव:* जादू-टोना, नजर से रक्षा।

*6. लोक-साहित्य एवं सांस्कृतिक संदर्भ*
1.  *जसगीत:* _"सत बहिनी सातो आवव, मोर गाँव के संकट टारव, हो माता..."_  
2.  *भाषा:* डीह = देहरी, बाना = बाण, थान = स्थान। मुहावरा: _"गाँव के ठाकुर देव रूठगे त गाँव उजड़गे।"_  
3.  *लोकाचार:* नया घर, विवाह, फसल कटाई से पूर्व "सुमरन" अनिवार्य। महिलाएँ मुख्य गायिका एवं पुजारिन हैं, जो मातृ-सत्ता दर्शाता है।

*7. अधिष्ठात्री समाज*
सतबहिनी मूलतः सदवाह, सतनामी, गोंड, कंवर, बिंझवार, कोरवा, हल्बा समुदाय की अधिष्ठात्री हैं। डॉ. श्यामाचरण दुबे के अनुसार बस्तर में माड़िया-गोंड इन्हें "बूढ़ी माई" कहते हैं। यह कृषि-पूर्व आखेटक समुदायों से विकसित होकर कृषि-ग्राम व्यवस्था की रक्षिका बनीं।

*8. वर्तमान चुनौतियाँ एवं निष्कर्ष*
शहरीकरण एवं मूर्ति-पूजा के प्रभाव से अ-मूर्त थान लुप्त हो रहे हैं। लोहे के बाना के स्थान पर संगमरमर की मूर्तियाँ लगने से इसका पारिस्थितिक एवं जनजातीय अर्थ नष्ट हो रहा है। बस्तर, सरगुजा, जशपुर, रायगढ़ में यह परम्परा जीवित है किन्तु संरक्षण आवश्यक है।

*निष्कर्ष:* सतदेव परम्परा केवल धार्मिक नहीं, अपितु छत्तीसगढ़ की प्राचीन ग्राम-प्रशासन, न्याय एवं पर्यावरण-रक्षा की व्यवस्था है। 5 देव भौतिक पक्ष और 2 देवियाँ सामाजिक-सुरक्षा की प्रतीक हैं। इसे सहेजना छत्तीसगढ़ की आत्मा को सहेजना है।

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*संदर्भ ग्रंथ सूची (References)*
1.  Russell, R.V. & Hiralal. (1916). _The Tribes and Castes of the Central Provinces of India_, Vol. IV. Macmillan.
2.  _Central Provinces District Gazetteers: Raipur_ (1909). Nagpur: Govt. Press.
3.  _Central Provinces District Gazetteers: Bilaspur_ (1910). Nagpur: Govt. Press.
4.  _Raipur District Gazetteer_ (1973). Govt. of M.P., Bhopal.
5.  शुक्ल, हीरालाल. (2001). _छत्तीसगढ़ का जनजातीय इतिहास_. रायपुर: छ.ग. राजभाषा आयोग.
6.  वर्मा, नरेन्द्र देव. (1998). _छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य का अध्ययन_. भोपाल: म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी.
7.  दुबे, श्यामाचरण. (1949). _छत्तीसगढ़ के आदिवासी_. दिल्ली: राजकमल प्रकाशन.
8.  इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़. _लोकगीत संग्रह: जसगीत, माता सेवा, ददरिया_.

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Dr. Anil Kumar Bhatpahari 
 Professor 
Govt Rmoteen Madiya Modle Women College Narayanpur CG 
Emai: anilbhatpahari@gmail.com