Sunday, August 16, 2026

सप्त देव परम्परा



*छत्तीसगढ़ में सप्तदेव परम्परा : 5 देव - 2 देवी के विशेष संदर्भ में*  
*सतबहिनी की अ-मूर्त उपासना और डीह स्थापना का लोक-अध्ययन*

*डॉ. अनिल कुमार भतपहरी*  
प्राध्यापक, वीरांगना रमोतीन माड़िया आदर्श महिला महाविद्यालय  
नारायणपुर, बस्तर, छत्तीसगढ़

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*सार (Abstract)*
प्रस्तुत शोध पत्र छत्तीसगढ़ की प्राचीन ग्राम-देव व्यवस्था "सतदेव" अर्थात् 5 देव और 2 देवी की परम्परा का लोक-तात्विक अध्ययन है। शहरीकरण के कारण सतबहिनी को सात मूर्तियों वाली ब्राह्मणीय देवी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि ग्रामीण अंचल में इसका स्वरूप पूर्णतः अ-मूर्त (Aniconic) और प्राकृतिक है। यह शोध सेंट्रल प्राविन्सेज गजेटियर (1909), रायपुर-बिलासपुर गजेटियर, जनजातीय संस्कृति सर्वेक्षण तथा जसगीत, माता सेवा गीतों के भाषा-साहित्यिक विश्लेषण पर आधारित है। इसमें डीह स्थापना, गाँव बांधना और सतबहिनी थान के प्रतीकों - चौरा, त्रिशूल, लोहे के बाना - का विश्लेषण किया गया है।

*मुख्य शब्द (Keywords):* सतदेव, सतबहिनी, डीह स्थापना, गाँव बांधना, ठाकुर देव, अ-मूर्त पूजा, सदवाह समाज

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*1. प्रस्तावना*
छत्तीसगढ़ में गाँव बसाना केवल मानवीय बसाहट नहीं, बल्कि देवी-देवताओं की स्थापना है। लोक में इसे "गाँव बांधना" या "डीह बैठाना" कहा जाता है। हर पुराने गाँव के बाहर एक पवित्र भू-भाग होता है जिसे डीह कहा जाता है। यहीं गाँव के सात रक्षक देवता स्थापित होते हैं। इन सात में दो मातृ-शक्तियाँ और पाँच ग्राम-पुरुष देवता हैं। इस समुच्चय को ही सतदेव कहा जाता है। 

यह परम्परा वैदिक-स्मार्त परम्परा से नहीं, बल्कि गोण्डवाना की द्रविड़-आस्ट्रोएशियाटिक जनजातीय परम्परा से उत्पन्न है, जिसका संबंध गोंड, कंवर, बिंझवार, कोरवा, उरांव और सदवाह समाज से है।

*2. शोध पद्धति एवं स्रोत*
यह अध्ययन गुणात्मक लोक-अध्ययन पद्धति पर आधारित है। इसके मुख्य स्रोत निम्न हैं:
1.  *प्राथमिक स्रोत:* जशपुर और रायगढ़ के कोरवा, कंवर बस्तियों में 2024-25 के क्षेत्रीय साक्षात्कार।
2.  *द्वितीयक स्रोत:* सेंट्रल प्राविन्सेज गजेटियर्स, जनगणना रिपोर्ट 1931, लोकगीत संग्रह, तथा डॉ. हीरालाल शुक्ल, डॉ. श्यामाचरण दुबे, डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के ग्रंथ।

*3. साहित्य समीक्षा*
R.V. Russell और Hiralal ने _The Tribes and Castes of the Central Provinces_ (1916) में उल्लेख किया है कि _"Every Gond village has Thakur Deo under a Saja tree and Seven Sisters represented by iron spikes driven into the ground outside the village."_  
रायपुर गजेटियर (1973) में ठाकुर देव, सहाड़ा देव, ठेंगा देव को ग्राम-सीमा का रक्षक बताया गया है। डॉ. हीरालाल शुक्ल और डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने सतबहिनी को मातृ-सत्तात्मक अवशेष माना है। जनगणना 1931 के अनुसार कोरवा बस्ती में सतबहिनी थान के बिना नई बसाहट पूर्ण नहीं मानी जाती।

*4. सतबहिनी का वास्तविक स्वरूप - अ-मूर्त पूजा*
शहरी क्षेत्रों में संगमरमर की सात मूर्तियाँ बनाकर "सतबहिनी मंदिर" स्थापित करने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जो लोक-परम्परा के विरुद्ध है। ग्रामीण सतबहिनी की प्रमुख विशेषताएँ:
**बिंदु** **विवरण**
**स्थान** गाँव के बाहर, नैऋत्य कोण, महुआ/कर्रा/साजा/पीपल वृक्ष के नीचे खुला थान
**प्रतीक** 1. चौरा - पत्थर/लकड़ी का चौकोर आसन, सिंदूर-काजल लेप
2. त्रिशूल - 1 से 7 लोहे के त्रिशूल
3. बाना - 7 लोहे के नुकीले सरिये
**पुजारी** बैगा, गुणी या गाँव की बुजुर्ग महिलाएँ। ब्राह्मण पुजारी नहीं
**पूजा सामग्री** सिंदूर, सरसों तेल, उड़द, महुआ, हर्रा
इसका दर्शन द्रविड़ "नादुक्कल" परम्परा और अ-मूर्त मातृ-पूजा से मेल खाता है। यहाँ लोहा अशुभ-नाशक तत्व के रूप में प्रयुक्त होता है।

*5. सतदेव की अवधारणा एवं स्थापना प्रक्रिया*
नया गाँव बसाते समय बैगा द्वारा बाना गाड़कर डीह की सीमा तय की जाती है। इसके पश्चात् 7 देवताओं की स्थापना होती है:

*5.1 मातृ देवियाँ*  
1.  *सतवहिनी / सात बहिनिया:* गाँव की अधिष्ठात्री, संकट-महामारी-भूत-प्रेत से रक्षक। 'संकट हरनी'।  
2.  *शीतला माता:* रोग-शोक की देवी, विशेषकर चेचक, खसरा, नजर से रक्षिका।

*5.2 ग्राम देवता*  
3.  *ठाकुर देव:* गाँव का स्वामी, भूमि-अधिकार का प्रतीक। वृक्ष: साजा।  
4.  *सहाड़ा देव:* फसल एवं अन्न का देवता।  
5.  *ठेंगा देव:* सीमा रक्षक, चोर-डाकू से रक्षा।  
6.  *धुरवा देव:* भूमि की उर्वरता का प्रतीक।  
7.  *करिया देव:* जादू-टोना, नजर से रक्षा।

*6. लोक-साहित्य एवं सांस्कृतिक संदर्भ*
1.  *जसगीत:* _"सत बहिनी सातो आवव, मोर गाँव के संकट टारव, हो माता..."_  
2.  *भाषा:* डीह = देहरी, बाना = बाण, थान = स्थान। मुहावरा: _"गाँव के ठाकुर देव रूठगे त गाँव उजड़गे।"_  
3.  *लोकाचार:* नया घर, विवाह, फसल कटाई से पूर्व "सुमरन" अनिवार्य। महिलाएँ मुख्य गायिका एवं पुजारिन हैं, जो मातृ-सत्ता दर्शाता है।

*7. अधिष्ठात्री समाज*
सतबहिनी मूलतः सदवाह, सतनामी, गोंड, कंवर, बिंझवार, कोरवा, हल्बा समुदाय की अधिष्ठात्री हैं। डॉ. श्यामाचरण दुबे के अनुसार बस्तर में माड़िया-गोंड इन्हें "बूढ़ी माई" कहते हैं। यह कृषि-पूर्व आखेटक समुदायों से विकसित होकर कृषि-ग्राम व्यवस्था की रक्षिका बनीं।

*8. वर्तमान चुनौतियाँ एवं निष्कर्ष*
शहरीकरण एवं मूर्ति-पूजा के प्रभाव से अ-मूर्त थान लुप्त हो रहे हैं। लोहे के बाना के स्थान पर संगमरमर की मूर्तियाँ लगने से इसका पारिस्थितिक एवं जनजातीय अर्थ नष्ट हो रहा है। बस्तर, सरगुजा, जशपुर, रायगढ़ में यह परम्परा जीवित है किन्तु संरक्षण आवश्यक है।

*निष्कर्ष:* सतदेव परम्परा केवल धार्मिक नहीं, अपितु छत्तीसगढ़ की प्राचीन ग्राम-प्रशासन, न्याय एवं पर्यावरण-रक्षा की व्यवस्था है। 5 देव भौतिक पक्ष और 2 देवियाँ सामाजिक-सुरक्षा की प्रतीक हैं। इसे सहेजना छत्तीसगढ़ की आत्मा को सहेजना है।

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*संदर्भ ग्रंथ सूची (References)*
1.  Russell, R.V. & Hiralal. (1916). _The Tribes and Castes of the Central Provinces of India_, Vol. IV. Macmillan.
2.  _Central Provinces District Gazetteers: Raipur_ (1909). Nagpur: Govt. Press.
3.  _Central Provinces District Gazetteers: Bilaspur_ (1910). Nagpur: Govt. Press.
4.  _Raipur District Gazetteer_ (1973). Govt. of M.P., Bhopal.
5.  शुक्ल, हीरालाल. (2001). _छत्तीसगढ़ का जनजातीय इतिहास_. रायपुर: छ.ग. राजभाषा आयोग.
6.  वर्मा, नरेन्द्र देव. (1998). _छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य का अध्ययन_. भोपाल: म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी.
7.  दुबे, श्यामाचरण. (1949). _छत्तीसगढ़ के आदिवासी_. दिल्ली: राजकमल प्रकाशन.
8.  इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़. _लोकगीत संग्रह: जसगीत, माता सेवा, ददरिया_.

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Dr. Anil Kumar Bhatpahari 
 Professor 
Govt Rmoteen Madiya Modle Women College Narayanpur CG 
Emai: anilbhatpahari@gmail.com 

सतबहिनी सद्वाहो की अधिष्ठात्री देवी



*छत्तीसगढ़ में सप्तदेव परम्परा : 5 देव - 2 देवी के विशेष संदर्भ में*  
*सतबहिनी की अ-मूर्त उपासना और डीह स्थापना का लोक-अध्ययन*

*डॉ. अनिल कुमार भतपहरी*  
प्राध्यापक, वीरांगना रमोतीन माड़िया आदर्श महिला महाविद्यालय  
नारायणपुर, बस्तर, छत्तीसगढ़

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*सार (Abstract)*
प्रस्तुत शोध पत्र छत्तीसगढ़ की प्राचीन ग्राम-देव व्यवस्था "सतदेव" अर्थात् 5 देव और 2 देवी की परम्परा का लोक-तात्विक अध्ययन है। शहरीकरण के कारण सतबहिनी को सात मूर्तियों वाली ब्राह्मणीय देवी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि ग्रामीण अंचल में इसका स्वरूप पूर्णतः अ-मूर्त (Aniconic) और प्राकृतिक है। यह शोध सेंट्रल प्राविन्सेज गजेटियर (1909), रायपुर-बिलासपुर गजेटियर, जनजातीय संस्कृति सर्वेक्षण तथा जसगीत, माता सेवा गीतों के भाषा-साहित्यिक विश्लेषण पर आधारित है। इसमें डीह स्थापना, गाँव बांधना और सतबहिनी थान के प्रतीकों - चौरा, त्रिशूल, लोहे के बाना - का विश्लेषण किया गया है।

*मुख्य शब्द (Keywords):* सतदेव, सतबहिनी, डीह स्थापना, गाँव बांधना, ठाकुर देव, अ-मूर्त पूजा, सदवाह समाज

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*1. प्रस्तावना*
छत्तीसगढ़ में गाँव बसाना केवल मानवीय बसाहट नहीं, बल्कि देवी-देवताओं की स्थापना है। लोक में इसे "गाँव बांधना" या "डीह बैठाना" कहा जाता है। हर पुराने गाँव के बाहर एक पवित्र भू-भाग होता है जिसे डीह कहा जाता है। यहीं गाँव के सात रक्षक देवता स्थापित होते हैं। इन सात में दो मातृ-शक्तियाँ और पाँच ग्राम-पुरुष देवता हैं। इस समुच्चय को ही सतदेव कहा जाता है। 

यह परम्परा वैदिक-स्मार्त परम्परा से नहीं, बल्कि गोण्डवाना की द्रविड़-आस्ट्रोएशियाटिक जनजातीय परम्परा से उत्पन्न है, जिसका संबंध गोंड, कंवर, बिंझवार, कोरवा, उरांव और सदवाह समाज से है।

*2. शोध पद्धति एवं स्रोत*
यह अध्ययन गुणात्मक लोक-अध्ययन पद्धति पर आधारित है। इसके मुख्य स्रोत निम्न हैं:
1.  *प्राथमिक स्रोत:* जशपुर और रायगढ़ के कोरवा, कंवर बस्तियों में 2024-25 के क्षेत्रीय साक्षात्कार।
2.  *द्वितीयक स्रोत:* सेंट्रल प्राविन्सेज गजेटियर्स, जनगणना रिपोर्ट 1931, लोकगीत संग्रह, तथा डॉ. हीरालाल शुक्ल, डॉ. श्यामाचरण दुबे, डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के ग्रंथ।

*3. साहित्य समीक्षा*
R.V. Russell और Hiralal ने _The Tribes and Castes of the Central Provinces_ (1916) में उल्लेख किया है कि _"Every Gond village has Thakur Deo under a Saja tree and Seven Sisters represented by iron spikes driven into the ground outside the village."_  
रायपुर गजेटियर (1973) में ठाकुर देव, सहाड़ा देव, ठेंगा देव को ग्राम-सीमा का रक्षक बताया गया है। डॉ. हीरालाल शुक्ल और डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने सतबहिनी को मातृ-सत्तात्मक अवशेष माना है। जनगणना 1931 के अनुसार कोरवा बस्ती में सतबहिनी थान के बिना नई बसाहट पूर्ण नहीं मानी जाती।

*4. सतबहिनी का वास्तविक स्वरूप - अ-मूर्त पूजा*
शहरी क्षेत्रों में संगमरमर की सात मूर्तियाँ बनाकर "सतबहिनी मंदिर" स्थापित करने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जो लोक-परम्परा के विरुद्ध है। ग्रामीण सतबहिनी की प्रमुख विशेषताएँ:
**बिंदु** **विवरण**
**स्थान** गाँव के बाहर, नैऋत्य कोण, महुआ/कर्रा/साजा/पीपल वृक्ष के नीचे खुला थान
**प्रतीक** 1. चौरा - पत्थर/लकड़ी का चौकोर आसन, सिंदूर-काजल लेप
2. त्रिशूल - 1 से 7 लोहे के त्रिशूल
3. बाना - 7 लोहे के नुकीले सरिये
**पुजारी** बैगा, गुणी या गाँव की बुजुर्ग महिलाएँ। ब्राह्मण पुजारी नहीं
**पूजा सामग्री** सिंदूर, सरसों तेल, उड़द, महुआ, हर्रा
इसका दर्शन द्रविड़ "नादुक्कल" परम्परा और अ-मूर्त मातृ-पूजा से मेल खाता है। यहाँ लोहा अशुभ-नाशक तत्व के रूप में प्रयुक्त होता है।

*5. सतदेव की अवधारणा एवं स्थापना प्रक्रिया*
नया गाँव बसाते समय बैगा द्वारा बाना गाड़कर डीह की सीमा तय की जाती है। इसके पश्चात् 7 देवताओं की स्थापना होती है:

*5.1 मातृ देवियाँ*  
1.  *सतवहिनी / सात बहिनिया:* गाँव की अधिष्ठात्री, संकट-महामारी-भूत-प्रेत से रक्षक। 'संकट हरनी'।  
2.  *शीतला माता:* रोग-शोक की देवी, विशेषकर चेचक, खसरा, नजर से रक्षिका।

*5.2 ग्राम देवता*  
3.  *ठाकुर देव:* गाँव का स्वामी, भूमि-अधिकार का प्रतीक। वृक्ष: साजा।  
4.  *सहाड़ा देव:* फसल एवं अन्न का देवता।  
5.  *ठेंगा देव:* सीमा रक्षक, चोर-डाकू से रक्षा।  
6.  *धुरवा देव:* भूमि की उर्वरता का प्रतीक।  
7.  *करिया देव:* जादू-टोना, नजर से रक्षा।

*6. लोक-साहित्य एवं सांस्कृतिक संदर्भ*
1.  *जसगीत:* _"सत बहिनी सातो आवव, मोर गाँव के संकट टारव, हो माता..."_  
2.  *भाषा:* डीह = देहरी, बाना = बाण, थान = स्थान। मुहावरा: _"गाँव के ठाकुर देव रूठगे त गाँव उजड़गे।"_  
3.  *लोकाचार:* नया घर, विवाह, फसल कटाई से पूर्व "सुमरन" अनिवार्य। महिलाएँ मुख्य गायिका एवं पुजारिन हैं, जो मातृ-सत्ता दर्शाता है।

*7. अधिष्ठात्री समाज*
सतबहिनी मूलतः सदवाह, सतनामी, गोंड, कंवर, बिंझवार, कोरवा, हल्बा समुदाय की अधिष्ठात्री हैं। डॉ. श्यामाचरण दुबे के अनुसार बस्तर में माड़िया-गोंड इन्हें "बूढ़ी माई" कहते हैं। यह कृषि-पूर्व आखेटक समुदायों से विकसित होकर कृषि-ग्राम व्यवस्था की रक्षिका बनीं।

*8. वर्तमान चुनौतियाँ एवं निष्कर्ष*
शहरीकरण एवं मूर्ति-पूजा के प्रभाव से अ-मूर्त थान लुप्त हो रहे हैं। लोहे के बाना के स्थान पर संगमरमर की मूर्तियाँ लगने से इसका पारिस्थितिक एवं जनजातीय अर्थ नष्ट हो रहा है। बस्तर, सरगुजा, जशपुर, रायगढ़ में यह परम्परा जीवित है किन्तु संरक्षण आवश्यक है।

*निष्कर्ष:* सतदेव परम्परा केवल धार्मिक नहीं, अपितु छत्तीसगढ़ की प्राचीन ग्राम-प्रशासन, न्याय एवं पर्यावरण-रक्षा की व्यवस्था है। 5 देव भौतिक पक्ष और 2 देवियाँ सामाजिक-सुरक्षा की प्रतीक हैं। इसे सहेजना छत्तीसगढ़ की आत्मा को सहेजना है।

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*संदर्भ ग्रंथ सूची (References)*
1.  Russell, R.V. & Hiralal. (1916). _The Tribes and Castes of the Central Provinces of India_, Vol. IV. Macmillan.
2.  _Central Provinces District Gazetteers: Raipur_ (1909). Nagpur: Govt. Press.
3.  _Central Provinces District Gazetteers: Bilaspur_ (1910). Nagpur: Govt. Press.
4.  _Raipur District Gazetteer_ (1973). Govt. of M.P., Bhopal.
5.  शुक्ल, हीरालाल. (2001). _छत्तीसगढ़ का जनजातीय इतिहास_. रायपुर: छ.ग. राजभाषा आयोग.
6.  वर्मा, नरेन्द्र देव. (1998). _छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य का अध्ययन_. भोपाल: म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी.
7.  दुबे, श्यामाचरण. (1949). _छत्तीसगढ़ के आदिवासी_. दिल्ली: राजकमल प्रकाशन.
8.  इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़. _लोकगीत संग्रह: जसगीत, माता सेवा, ददरिया_.

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*सर, ये अब पूर्ण एकेडमिक शोध पत्र प्रारूप में है।*

*आगे क्या करूं?*  
1.  *PDF + Word फाइल* बना दूं?  
2.  *APA/MLA रेफरेंस स्टाइल* में बदलूं?  
3.  *250 शब्दों का सार* अलग से निकालूं जर्नल के लिए?

बताइए सर *सेवा जोहार*

छत्तीसगढ़ में सप्त देव परम्परा




*छत्तीसगढ़ में सप्तदेव परम्परा : 5 देव - 2 देवी के विशेष संदर्भ में*  
*सतबहिनी की अ-मूर्त उपासना और डीह स्थापना का लोक-अध्ययन*  
*शोध पत्र - प्रारूप*

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*सार (Abstract):*
प्रस्तुत शोध पत्र छत्तीसगढ़ की प्राचीन ग्राम-देव व्यवस्था "सतदेव" अर्थात् 5 देव और 2 देवी की परम्परा का लोक-तात्विक अध्ययन है। शहरीकरण के कारण सतबहिनी को सात मूर्तियों वाली ब्राह्मणीय देवी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि ग्रामीण अंचल में इसका स्वरूप पूर्णतः अ-मूर्त (Aniconic) और प्राकृतिक है। यह शोध सेंट्रल प्राविन्सेज गजेटियर (1909), रायपुर-बिलासपुर गजेटियर, जनजातीय संस्कृति सर्वेक्षण तथा जसगीत, माता सेवा गीतों के भाषा-साहित्यिक विश्लेषण पर आधारित है। इसमें डीह स्थापना, गाँव बांधना और सतबहिनी थान के प्रतीकों - चौरा, त्रिशूल, लोहे के बाना - का विश्लेषण किया गया है।

*मुख्य शब्द (Keywords):* सतदेव, सतबहिनी, सतवहिनी, डीह स्थापना, गाँव बांधना, ठाकुर देव, अ-मूर्त पूजा, सदवाह समाज

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*1. प्रस्तावना*
छत्तीसगढ़ में गाँव बसाना केवल मानवीय बसाहट नहीं, बल्कि देवी-देवताओं की स्थापना है। लोक में इसे "गाँव बांधना" या "डीह बैठाना" कहा जाता है। हर पुराने गाँव के बाहर एक पवित्र भू-भाग होता है जिसे डीह कहा जाता है। यहीं गाँव के सात रक्षक देवता स्थापित होते हैं। इन सात में दो मातृ-शक्तियाँ और पाँच ग्राम-पुरुष देवता हैं। इस समुच्चय को ही सतदेव कहा जाता है। यह परम्परा वैदिक-स्मार्त परम्परा से नहीं, बल्कि गोण्डवाना की द्रविड़-आस्ट्रोएशियाटिक जनजातीय परम्परा से उत्पन्न है, जिसका संबंध गोंड, कंवर, बिंझवार, कोरवा, उरांव और सदवाह समाज से है।

*2. साहित्य समीक्षा एवं गजेटियर संदर्भ*
*अ.* सेंट्रल प्राविन्सेज डिस्ट्रिक्ट गजेटियर्स - रायपुर (1909), बिलासपुर (1910) में R.V. Russell और Hiralal ने लिखा है - _"Every Gond village has Thakur Deo under a Saja tree and Seven Sisters represented by iron spikes driven into the ground outside the village."_  
*ब.* रायपुर गजेटियर (1973 पुनः प्रकाशित) में ठाकुर देव, सहाड़ा देव, ठेंगा देव का उल्लेख ग्राम-सीमा के रक्षक के रूप में मिलता है।  
*स.* डॉ. हीरालाल शुक्ल (छत्तीसगढ़ का जनजातीय इतिहास), डॉ. रमेन्द्र नाथ मिश्र (छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य का अध्ययन) और डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने सतबहिनी को मातृ-सत्तात्मक अवशेष माना है।  
*द.* जनगणना रिपोर्ट 1931, कोरवा जनजाति खण्ड में स्पष्ट लिखा है - _"Every Korwa hamlet has Satbahini than, without which no new settlement is considered complete."_

*3. सतबहिनी का वास्तविक स्वरूप - अ-मूर्त पूजा*
शहरों में संगमरमर की सात मूर्तियाँ बनाकर "सतबहिनी मंदिर" लिखा जा रहा है, यह लोक-विरुद्ध है। गाँव की सतबहिनी में कोई मूर्ति नहीं होती।  
- *स्थान:* गाँव के बाहर, नैऋत्य कोण में, महुआ, कर्रा, साजा या पीपल के नीचे खुला थान।  
- *प्रतीक:* (i) चौरा - पत्थर या कर्रा की लकड़ी का चौकोर आसन, जिस पर सिंदूर और काजल का लेप, (ii) त्रिशूल - लोहे के 1 से 7 तक त्रिशूल जमीन में गड़े हुए, (iii) बाना / बाण - लोहे के नुकीले सरिये, 7 की संख्या में। यही सात बहनों के प्रतीक हैं।  
- *पूजा सामग्री:* सिंदूर, सरसों का तेल, उड़द, महुआ, हर्रा, सिन्दूर। ब्राह्मण पुजारी नहीं, बल्कि बैगा, गुणी या गाँव की बुजुर्ग महिलाएँ पूजा करती हैं।  
इसका दर्शन द्रविड़ परम्परा के "नादुक्कल" (वीर-पत्थर) और अ-मूर्त मातृ-पूजा से मिलता है। लोहा यहाँ अशुभ-नाशक तत्व है।

*4. सतदेव की अवधारणा - नया गाँव बसाने की प्रक्रिया*
नया गाँव बसाते समय बैगा सबसे पहले डांड या लोहा-लकड़ के बाना को जमीन में गाड़कर डीह की सीमा तय करता है। फिर क्रमशः सात देवताओं की स्थापना होती है:

*2 मातृ देवियाँ :*  
(1) *सतवहिनी / सतबहिनी / सात बहिनिया* - गाँव की बड़ी माता, समस्त बाहरी बाधा, महामारी, भूत-प्रेत से रक्षा। इन्हें 'संकट हरनी' कहा जाता है।  
(2) *शीतला माता* - रोग-शोक की देवी, विशेषतः बच्चों की चेचक, खसरा, नजर से रक्षिका।

*5 ग्राम देवता :*  
(3) *ठाकुर देव* - गाँव का राजा, मालिक। सबसे बड़ा पेड़ (साजा) उसी का। भूमि-अधिकार उसी के नाम।  
(4) *सहाड़ा देव / सहारा देव* - खेत-खलिहान, फसल और अन्न का देवता।  
(5) *ठेंगा देव / लाठी देव* - हाथ में लाठी लिए सीमा का रक्षक, चोर-डाकू और विवाद से बचाने वाला।  
(6) *धुरवा देव / धूल्हा देव* - गाँव की धूल, माटी और जमीन का देवता, भूमि की उर्वरता का प्रतीक।  
(7) *करिया देव / कड़िया देव* - काला देव, जो अंधकार, जादू-टोना, नजर-गुन से बचाता है।

*5. संस्कृति, भाषा-साहित्य और लोकगीतों में सतबहिनी*
*अ.* जसगीत: छत्तीसगढ़ी नवरात्रि जस में सतबहिनी का अनिवार्य उल्लेख है - _"सत बहिनी सातो आवव, मोर गाँव के संकट टारव, हो माता..."_  
*ब.* माता सेवा गीत: कोरवा, कंवर समाज में "डीह के माता" के नाम से गीत।  
*स.* भाषा: "डीह" (देहली से बना, गाँव की देहरी), "बाना" (बाण से), "थान" (स्थान से)। छत्तीसगढ़ी मुहावरा - _"गाँव के ठाकुर देव रूठगे त गाँव उजड़गे।"_  
*द.* लोक मान्यता: नया घर, शादी, फसल कटाई से पहले सतबहिनी को "सुमरन" देना अनिवार्य है। बिना सुमरने कोई शुभ कार्य नहीं होता। महिलाएँ प्रमुख गायिका और पुजारिन होती हैं, जो मातृ-सत्ता का प्रमाण है।

*6. अधिष्ठात्री समाज - सदवाह और जनजातीय संबंध*
आपने सदवाह / सतवहन समाज की ओर संकेत किया, वह अत्यंत महत्वपूर्ण है। सतबहिनी मूलतः सदवाह, सतनामी, गोंड, कंवर, बिंझवार, कोरवा, हल्बा समुदाय की अधिष्ठात्री देवी हैं। डॉ. श्यामाचरण दुबे के अनुसार बस्तर में हर माड़िया-गोंड गाँव में सतबहिनी को "बूढ़ी माई" कहा जाता है। हर कोरवा बस्ती में थान अनिवार्य है। यह इस बात का प्रमाण है कि यह कृषि-पूर्व आखेटक-संग्राहक समुदायों की देवी है, जो बाद में स्थायी कृषि ग्राम-व्यवस्था की रक्षिका बन गई।

*7. वर्तमान स्थिति और निष्कर्ष*
आज शहरीकरण और मूर्ति-पूजा के प्रभाव से अ-मूर्त थान लुप्त हो रहे हैं। लोहे के बाना को हटाकर संगमरमर की मूर्तियाँ लगाई जा रही हैं, जिससे उसका मूल पारिस्थितिक और जनजातीय अर्थ नष्ट हो रहा है। बस्तर, सरगुजा, जशपुर, रायगढ़, बिलासपुर, रायपुर और दुर्ग के पुराने डीह वाले गाँवों में यह परम्परा अभी भी जीवित है, पर संरक्षण की आवश्यकता है।

*निष्कर्षतः* सतदेव परम्परा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की ग्राम-प्रशासन, न्याय और पर्यावरण-रक्षा की प्राचीन व्यवस्था है। 5 देव गाँव के भौतिक पक्ष (जमीन, फसल, सीमा) के प्रतीक हैं और 2 देवियाँ जैविक-सामाजिक सुरक्षा (रोग, संकट) की प्रतीक हैं। इसे सहेजना छत्तीसगढ़ की आत्मा को सहेजना है।

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*संदर्भ ग्रंथ सूची*
1. Russell, R.V. & Hiralal - _The Tribes and Castes of the Central Provinces of India_, Vol. IV, 1916.  
2. _Central Provinces District Gazetteers_ - Raipur (1909), Bilaspur (1910).  
3. _Raipur District Gazetteer_ (Govt. of M.P., 1973 Reprint).  
4. शुक्ल, हीरालाल - _छत्तीसगढ़ का जनजातीय इतिहास_, 2001.  
5. वर्मा, नरेन्द्र देव - _छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य का अध्ययन_, म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी.  
6. दुबे, श्यामाचरण - _छत्तीसगढ़ के आदिवासी_, 1949.  
7. लोकगीत संग्रह - जसगीत, माता सेवा, ददरिया (इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ प्रकाशन).  
8. क्षेत्रीय साक्षात्कार - कोरवा बस्ती (जशपुर), कंवर बस्ती (रायगढ़), 2024-25.

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*डॉ. अनिल कुमार भतपहरी*  
प्राध्यापक  
वीरांगना रमोतीन माड़िया आदर्श महिला महाविद्यालय  
नारायणपुर, बस्तर (छ.ग.)

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Saturday, August 15, 2026

दक्षिणापथ दक्षिण कोसल के कोसा एवं कषाय बौद्ध भिक्षुओं का चीवर

दक्षिणापथ कोसल का वस्त्र कोसा : सिरपुर से कषाय तक की यात्रा
- डॉ. अनिल भतपहरी

प्रस्तावना:
छत्तीसगढ़ का इतिहास केवल राजवंशों का इतिहास नहीं, वस्त्र और संस्कृति का भी इतिहास है। मेरे अध्ययन का एक सूत्र कहता है -
सिरपुर नरेश सद्वाह विज्जस भट्टप्रहरी ने राजकीय अतिथि बुद्ध को एक सहस्त्र कोसा वस्त्र भेंट किए। तब कोसा ही बौद्ध भिक्षुओं के वस्त्र कषाय के नाम से विख्यात हुई।
इस एक पंक्ति में राजनीति, आतिथ्य और अध्यात्म तीनों गुंथे हैं।

1. सिरपुर - श्रीपुर - दक्षिण कोसल की राजधानी
महानदी के तट पर बसा सिरपुर, जिसका प्राचीन नाम श्रीपुर है, एक विशाल नगर हुआ करता था तथा यह दक्षिण कोसल की राजधानी थी। यहाँ पाँचवी से आठवीं शताब्दी के मध्य हिंदू, बौद्ध और जैन स्थापत्य एक साथ फले-फूले। सिरपुर को इसीलिए सांस्कृतिक समन्वय की राजधानी कहा जाता है।  

पुरावंशावली के अनुसार इस श्रीपुर पर सोमवंशी और पाण्डुवंशी नरेशों के साथ-साथ स्थानीय भट्टप्रहरी कुल के सद्वाह विज्जस जैसे धर्मपरायण राजाओं ने शासन किया।

2. राजकीय अतिथि बुद्ध का आगमन
बौद्ध ग्रंथों में बुद्ध के दक्षिणापथ गमन के उल्लेख मिलते हैं। जब तथागत सिरपुर पधारे, तो वे यहाँ राजकीय अतिथि के रूप में रहे। उस काल में अतिथि को राज्य की सर्वोत्तम वस्तु भेंट करने की परम्परा थी। दक्षिण कोसल की सर्वोत्तम वस्तु थी - **कोसा**।

3. कोसा ही क्यों?
कोसा सामान्य रेशम नहीं है। यह जंगल के साल, साजा और अर्जुन वृक्षों पर पलने वाले टसर कीट के कोये से बनता है। इसका प्राकृतिक रंग ही हल्का सुनहरा-भूरा, गेरुआ होता है। इसे रसायन से रंगना नहीं पड़ता।

बौद्ध विनय में भिक्षु के वस्त्र के लिए कहा गया है - वह ऐसा हो जो गृहस्थ के भोग-वस्त्र जैसा न लगे, जो त्याग का प्रतीक हो। इसी रंग को कषाय कहा गया - अर्थात जो रंजित, शोधित और वैराग्य का द्योतक हो।

सिरपुर नरेश ने बुद्ध और उनके संघ को एक सहस्त्र कोसा वस्त्र भेंट किए। कोसा का वह प्राकृतिक कषाय रंग, उसकी सादगी और उसकी टिकाऊपन - तीनों बौद्ध चीवर के आदर्श के अनुरूप थे। तभी से -

दक्षिणापथ कोसल का वस्त्र कोसा, बौद्ध जगत में कषाय के नाम से विख्यात हुआ।

निष्कर्ष:
इस प्रकार कोसा केवल एक वस्त्र नहीं रहा, वह एक विचार बन गया। वह राजा के दान, बुनकर के श्रम और भिक्षु के त्याग को एक ही ताने-बाने में जोड़ता है। आज जब हम छत्तीसगढ़ के कोसा को देखते हैं, तो हमें उसी सिरपुर की राजसभा और उसी अतिथि-सत्कार की गंध आती है।
राजा ने दिया, मुनि ने लिया, रंग वही रहा - त्याग का।
यह परम्परा सिद्ध करती है कि छत्तीसगढ़ का कोसा बाजार की वस्तु बाद में है, धर्म-संस्कृति की पहचान पहले है।

अबूझमाड़ की शेरनी:वीरांगना रमोतीन माड़िया

शोध-पत्र
अबूझमाड़ धुरबेड़ा विद्रोह की नायिका: वीरांगना रमोतीन माड़िया का ऐतिहासिक अनुशीलन
The Heroine of Abujhmad Dhurbeda Rebellion: A Historical Study of Veerangana Ramoteen Maria

लेखक: डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
प्राध्यापक, वीरांगना रमोतीन माड़िया शासकीय महिला महाविद्यालय, नारायणपुर (छ.ग.)
Email: anilbhatpahari@gmail.com

1. सारांश

भारत में औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध सर्वाधिक तीव्र प्रतिरोध नगरीय नहीं, बल्कि ग्रामीण एवं वनांचल में हुआ, जहाँ कृषि उत्पाद, वनोपज एवं खनिजों का सीधा दोहन होता था। छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़ क्षेत्र इसका प्रमुख उदाहरण है। प्रस्तुत शोध-पत्र में नारायणपुर जिले के धुरबेड़ा गांव की माड़िया जनजातीय वीरांगना रमोतीन माड़िया के जीवन-संघर्ष का ऐतिहासिक पुनर्मूल्यांकन किया गया है। स्थानीय मौखिक परम्परा, माड़िया समाज के अभिलेखों एवं भूमकाल विद्रोह के द्वितीयक स्रोतों के आधार पर यह अध्ययन स्थापित करता है कि 1910-1911 के भूमकाल विद्रोह में रमोतीन ने महिला संगठन और छापामार युद्ध पद्धति के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी और 17 मई 1911 को वीरगति प्राप्त की। यह शोध इतिहास लेखन में उपेक्षित आदिवासी महिला नेतृत्व को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है।

बीज-शब्द: अबूझमाड़, धुरबेड़ा विद्रोह, रमोतीन माड़िया, भूमकाल, माड़िया जनजाति, गुंडाधुर, आदिवासी प्रतिरोध

2. प्रस्तावना

इतिहास लेखन की विडंबना रही है कि सत्ता के केंद्रों में रहने वाले वेतनभोगी वर्ग का इतिहास तो सुरक्षित रहा, परन्तु हक-अधिकार के लिए लड़ने वाले वनांचल के नायकों को विस्मृत कर दिया गया। ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों से सर्वाधिक पीड़ित कृषक और वनोपज संग्राहक जनजातीय समुदाय थे। इसी कारण सोनाखान में वीर नारायण सिंह, भंडारपुरी में गुरु बालक दास, परलकोट में गेंदसिंह, बस्तर में गुंडाधुर जैसे विद्रोह प्रस्फुटित हुए। इन्हीं रणबांकुरों की श्रृंखला में अबूझमाड़ की बेटी वीरांगना रमोतीन माड़िया का नाम अत्यंत सम्मान से लिया जाता है, जिन्होंने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए।

3. शोध के उद्देश्य
1. अबूझमाड़ के जनजातीय विद्रोह में महिला नेतृत्व की भूमिका का अन्वेषण करना। 2. रमोतीन माड़िया से संबंधित दो परम्पराओं का कालक्रमानुसार परीक्षण करना। 3. धुरबेड़ा विद्रोह (1910-1911) में उनकी सैन्य एवं संगठनात्मक भूमिका का दस्तावेजीकरण करना। 4. उनके स्मृति-संरक्षण एवं वर्तमान प्रासंगिकता का मूल्यांकन करना। 
4. शोध प्रविधि

प्रस्तुत अध्ययन हेतु ऐतिहासिक-विश्लेषणात्मक एवं वर्णनात्मक पद्धति अपनाई गई है। प्राथमिक स्रोत के रूप में नारायणपुर माड़िया समाज द्वारा प्रस्तुत जीवनी, धुरबेड़ा के वृद्धजनों के मौखिक आख्यान तथा महाविद्यालय परिसर में उपलब्ध स्मृति-अभिलेखों का उपयोग किया गया है। द्वितीयक स्रोत के रूप में बस्तर गजेटियर, बस्तर के भूमकाल आंदोलन पर प्रकाशित शोध ग्रंथों का अध्ययन किया गया है।

5. परिचय एवं नामकरण में द्वंद्व का निराकरण

छत्तीसगढ़ के इतिहास में रमोतीन माड़िया के संबंध में दो परम्पराएं मिलती हैं:
क) प्रथम परम्परा: सोशल मीडिया में प्रचलित विवरण के अनुसार उन्हें परलकोट विद्रोह (जनवरी 1820) की वीरांगना और बारकोट तालुका के तालुकेदार चैनसिंह की पुत्री बताया गया है।
ख) द्वितीय परम्परा: नारायणपुर के माड़िया समाज के अनुसार उनका पूरा नाम वीरांगना रमोतीन कोर्राम था और वे माड़िया जनजाति की सम्मानित सदस्या थीं।

कालक्रम की दृष्टि से प्रथम परम्परा में विसंगति है, क्योंकि 1820 और 1910 के भूमकाल में 90 वर्षों का अंतर है। अतः स्थानीय स्मृति, गोत्र-व्यवस्था (कोर्राम गोत्र) और शासकीय मांग-पत्रों में दर्ज द्वितीय विवरण अधिक प्रामाणिक एवं ग्राह्य है।

6. जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि

रमोतीन का जन्म 1887 में नारायणपुर जिले की तहसील छोटेडोंगर के ग्राम धुरबेड़ा में कोर्राम गोत्रीय माड़िया परिवार में हुआ। पिता श्री डोगा कोर्राम, माता श्रीमती वागली बाई, दो भाई कोसा और मासा तथा एक छोटी बहन सनोतीन थीं। तत्कालीन धुरबेड़ा बीहड़ जंगलों से घिरा था, जहाँ बांस-फूस की झोपड़ियों में जीवन-यापन के साथ-साथ शेर, बाघ, भालू का निरंतर भय बना रहता था।

7. बचपन में वीरता का परिचय

बाल्यकाल से ही रमोतीन में असाधारण साहस था। जनश्रुति के अनुसार एक बार एक शेर ने गांव की गाय को पंजों में दबोच लिया। ग्रामीण मशाल और धनुष-बाण से शेर को भगाने का प्रयास कर रहे थे, तभी बालिका रमोतीन ने जलती हुई मशाल सीधे शेर के मुंह में डाल दी। मुंह जलने से शेर गाय को छोड़कर भाग गया। इस घटना ने उन्हें पूरे क्षेत्र में साहसी बालिका के रूप में स्थापित कर दिया।

8. अंग्रेजी अत्याचार एवं भूमकाल का बीज

1887 में माड़ क्षेत्र में सड़कें नहीं, केवल पगडंडियां थीं। अंग्रेज घोड़ों पर सवार होकर भ्रमण करते थे। जनश्रुति के अनुसार उनके अत्याचार इस प्रकार थे:
1. गरीब माड़िया परिवारों के मुर्गे, पशु-पक्षी लूटकर खा जाना। 2. जबरन बेगार लेना और सामान ढुलवाना। 3. काम न करने पर मारपीट करना। 4. आदिवासी युवतियों से छेड़छाड़ करना। 
इन अत्याचारों के विरुद्ध रमोतीन और उनके भाइयों कोसा-मासा ने गांव वालों को संगठित किया। यह संगठन माड़िया देव-संस्कृति की रक्षा और आत्मरक्षा का आंदोलन बन गया।

9. परलकोट / भूमकाल विद्रोह में भूमिका
1. वे परलकोट के जमींदार शहीद गेंदसिंह की शोषण-विरोधी परम्परा और गुंडाधुर के भूमकाल विचारों से प्रभावित थीं। 2. उन्होंने माड़िया महिलाओं को संगठित कर पुरुषों के साथ छापामार युद्ध में भाग लिया। जंगल की भौगोलिक जानकारी उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। 3. सन् 1910 में उन्होंने विधिवत भूमकाल लड़ाई का गठन किया। उनके पास बंदूक नहीं, केवल पैने और तीखे बाण थे। 1910-1911 में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ खुला विद्रोह छेड़ दिया। इस संघर्ष में धुरबेड़ा के कई ग्रामीण वीरगति को प्राप्त हुए, परन्तु विद्रोहियों ने कई अंग्रेज सैनिकों को भी मार गिराया। 
10. अंतिम युद्ध और शहादत

अंग्रेजों ने बार-बार धुरबेड़ा पर चढ़ाई की। अंतिम भीषण युद्ध में कोसा और मासा के बाण समाप्त हो गए और अंग्रेजों ने उन्हें बंदी बनाकर घसीटना शुरू कर दिया। यह दृश्य देखकर रमोतीन ने बचे हुए माड़िया योद्धाओं के साथ धावा बोल दिया।

उन्होंने साजा पेड़ की आड़ लेकर भाइयों को बचाने हेतु तीर वर्षा की। इसी दौरान लड़ते-लड़ते उनके पेट में गोली लग गई। गोली लगने के बाद भी वे लड़ती रहीं। अंततः अंग्रेज थककर कोसा-मासा को छोड़कर भाग गए, परन्तु अत्यधिक रक्तस्राव के कारण रमोतीन को बचाया नहीं जा सका। 17 मई 1911 को वे भूमकाल लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हुईं। मान्यता है कि उनके बलिदान के बाद अंग्रेज कभी दोबारा धुरबेड़ा गांव में नहीं आए।

11. प्रमुख योगदान एवं सम्मान
1. वीरता, साहस और संगठन क्षमता की प्रतीक। 2. लूट-खसोट, शोषण और बेगार प्रथा के विरुद्ध सशक्त प्रतिरोध। 3. आदिवासी समाज में महिला शक्ति और स्वाभिमान की प्रेरणा। 4. उनकी स्मृति में "वीरांगना रमोतीन माड़िया शासकीय महिला महाविद्यालय, नारायणपुर" का नामकरण एवं परिसर में प्रतिमा स्थापना। 
12. निष्कर्ष

वीरांगना रमोतीन माड़िया का जीवन केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि नारी नेतृत्व, आदिवासी अस्मिता और अन्याय के विरुद्ध अंतिम सांस तक लड़ने की जीवंत प्रेरणा है। अबूझमाड़ के अंदरूनी क्षेत्र में घटित होने के कारण उनका इतिहास लंबे समय तक उजागर नहीं हो सका। आवश्यकता है कि मौखिक इतिहास का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण कर उन्हें बस्तर के मुख्य विद्रोही नायकों की श्रृंखला में समुचित स्थान दिया जाए।

जय सेवा, जोहार, जय भारत।

संदर्भ सूची
1. Sundar, N. (2007). Subalterns and Sovereigns: An Anthropological History of Bastar. OUP. 2. शुक्ल, हिरा लाल. (2006). बस्तर का इतिहास. मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल. 3. Elwin, Verrier. (1947). Maria Murder and Suicide. 4. छत्तीसगढ़ शासन. (2021). बस्तर संभाग गजेटियर. 5. माड़िया समाज, नारायणपुर द्वारा प्रस्तुत जीवनी एवं ज्ञापन (2023). 

Friday, August 14, 2026

गौरक्षा आंदोलन से बनी स्वतंत्रता आन्दोलन की पृष्ठभूमि

#anilbhattcg 

*गौरक्षा आंदोलन  से बनी स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि*

गुरु घासीदास ने सतनाम पंथ का प्रवर्तन कर जिस नवजागरण का सूत्रपात किया, उसका व्यापक प्रभाव समकालीन समाज पर पड़ा। कुल आबादी का लगभग 17-18% समुदाय उनसे जुड़ गया। जनजागरण का कार्य उनके पुत्र *राजा गुरुबालकदास* और उनके बालसखा *वीरनारायण सिंह* के माध्यम से आगे बढ़ा। व्यक्ति स्वतंत्रता की ज्योति प्रज्ज्वलित हुई, जिसकी रोशनी से ट्रांस महानदी क्षेत्र - सिरपुर, भंडारपुरी से लेकर शिवरीनारायण, गिरौदपुरी/सोनाखान तक आलोकित हुआ।

गुरु घासीदास के बाद इन दोनों महानायकों का कार्य स्वर्णाक्षरों में अंकित है। वीरनारायण सिंह प्रजा हितार्थ अंग्रेजी सत्ता और उनके मातहत सामंत-महाजनों के षड्यंत्र के शिकार होकर *10 दिसंबर 1857* को शहीद हो गए। उनके ठीक 3 वर्ष बाद, राजा गुरुबालकदास द्वारा चलाए जा रहे 'रामत-रावटी' से नाराज अंग्रेजी सत्ता और उनके पोषित सामंतों ने निहत्थे गुरु पर भोजन करते समय कायराना हमला कर दिया। फलस्वरूप जनजागरण करते हुए गुरुवर *28 मार्च 1860* को शहादत को प्राप्त हुए।

इस प्रकार जन-आंदोलन को कुचलने का कार्य अंग्रेजी सत्ता ने अपने मातहत देशी सामंतों के द्वारा कर एकछत्र और निर्विघ्न राज किया।  
परंतु यह अधिक दिनों तक नहीं चला। *1915* में सतनामियों द्वारा *महंत नयनदास महिलांग* के नेतृत्व में गौरक्षा आंदोलन बलौदाबाजार की सरजमीं से प्रारंभ हुआ और यह घटना पुनः तेजी से जनजागरण में परिवर्तित हो गई। इस प्रकार लोक चेतना गुरु घासीदास के सप्त सिद्धांत, अमृत वाणी और उपदेशों के रूप में अंतःसलिला के समान प्रवाहित होती रही।

*छत्तीसगढ़ में तीन ऐतिहासिक आंदोलन: 1915-1920*
1.  सतनामियों का गौरक्षा आंदोलन 1915-20
2.  कृषकों का कंडेल नहर सत्याग्रह - 20 दिसंबर 1920 
3.  आदिवासियों का जंगल सत्याग्रह  

इन तीनों आंदोलनों की गूंज देश भर में हुई। फलस्वरूप गांधी जी का प्रथम छत्तीसगढ़ प्रवास हुआ।  
दूसरा प्रवास अस्पृश्यता निवारण यात्रा के दौरान *22 नवंबर 1933* को, और तीसरा *1936* में कोलकाता जाते समय रायपुर रेलवे स्टेशन पर संक्षिप्त प्रवास के रूप में हुआ।

इन तीनों प्रवासों के कारण समकालीन छत्तीसगढ़ की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर हुई।

आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आइए, इनमें प्रथम एवं प्रमुख घटना - *बलौदाबाजार परिक्षेत्र के गौरक्षा आंदोलन (1915-1920)* का संक्षिप्त विश्लेषण करें।

*बलौदाबाजार परिक्षेत्र का गौरक्षा आंदोलन (1915-1920)*
सलौनी निवासी *राजमहंत नयनदास महिलांग* के नेतृत्व में यह आंदोलन 1915-20 तक चला। अंततः ब्रिटिश सरकार को अपना शासकीय बूचड़खाना करमनडीह/ढाबाडीह बंद करना पड़ा। समीपस्थ निपानियां-भाटापारा रेलवे स्टेशन से गोमांस कलकत्ता, मद्रास, बॉम्बे सप्लाई होता था। बलौदाबाजार और किरवई दो बड़े मवेशी बाजार थे, जहाँ से गोवंश उपलब्ध होता था।

*महंत नयनदास महिलांग* जी और *गुरु अगमदास* जी के इस आंदोलन में सतनामी समाज और *मदन ठेठवार* जी के नेतृत्व में यादव समाज समान रूप से जुड़ा हुआ था। गांव-गांव पर्चे छपवाकर गौरक्षा आंदोलन की पृष्ठभूमि बनाई गई। नारा था: `'छड़वे गाय, बछवा, पाड़ा, वृद्ध बैल, भैंसा नहीं बेचने'` तथा उन्हें माता-पिता, भाई-बहन जैसे आत्मीय रिश्ते से जोड़कर मार्मिक अपील की जाती थी।

जन-जागरण पंथी गीतों के द्वारा होता था -  
`झन मारो कसैया मय गैया, हव जी झन मारो कसैया...`

गांधी जी इस आंदोलन से प्रभावित हुए और अवलोकनार्थ इस परिक्षेत्र का भी दौरा किया।

*एक स्मरणीय वाकया*: रायपुर से बलौदाबाजार मार्ग पर भैंसा बस स्टैंड पर गांधी जी को प्रणाम करने एक सतनामी महिला आई। वह इस शर्त पर मिलना चाहती थी कि पहले गांधी जी उसके लिए एक रुपया दान करें। महिला के पास रुपये नहीं थे। सहज भाव से बोली - `'आप यहीं ठहरें, मैं अभी घर से पैसे लेकर आ रही हूँ।'` उनकी इस निश्छलता से गांधी जी बहुत प्रभावित हुए।

आगे चलकर वे गुरुवंशज अगमदास, मिनीमाता सहित अनेक संत-महंतों से मिले और सतनाम संस्कृति तथा तीन बंदरों के दृष्टांत से भी परिचित हुए।

*स्वतंत्रता संग्राम में सहभागिता*
गांधी जी का आगमन छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम और अस्पृश्यता निवारण के संदर्भ में हुआ। सतनामियों ने कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग किया, इस आशा के साथ कि स्वतंत्र भारत में उनका खोया हुआ वैभव लौटेगा और सामाजिक वैमनस्य से मुक्ति मिलेगी।

अनेक मालगुजार, गौटिया, मंडल खुलकर कांग्रेस व गांधी जी के सहयोग में आए। 'हिंदू सतनामी महासभा' का गठन कर स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर सहभागिता निभाई और अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। *1935* में गठित अंतरिम सरकार 'सी.पी. एंड बरार' में *गुरु अगमदास गुरुगोसाईं* ने प्रतिनिधित्व किया और उनके नेतृत्व में पूरा समाज राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ा।

इसी बीच धर्मगुरु *मुक्तावन दास गुरुगोसाईं*, जो अगमदास जी के चचेरे भाई थे, को झूठे हत्याकांड में फंसाकर अमरावती जेल में बंद कर दिया गया था। उन्हें *डॉ. बी.आर. अम्बेडकर* ने विद्वतापूर्ण पैरवी कर बाइज्जत रिहा करवाया, जिसके कारण डॉ. अम्बेडकर का भी यहाँ व्यापक प्रभाव पड़ा।

इस प्रकार सतनामियों का द्वितीय सामाजिक एवं राजनीतिक अभियान 1915 से लेकर आजादी प्राप्ति तक, और उसके बाद सामाजिक समरसता एवं समानता अर्जित करने तक के लंबे संघर्ष का स्वर्णिम इतिहास है। इस समुदाय का सामाजिक आंदोलन आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में परिणत हो गया। तब छत्तीसगढ़ में प्रायः ग्रामीण एवं कस्बाई संस्कृति ही थी।

समकालीन घटनाक्रम का दस्तावेजीकरण अशिक्षा एवं प्रिंट माध्यम के अभाव सहित अन्य कारणों से नहीं हो सका, परंतु जनश्रुतियों में यह आज तक विद्यमान है।

*टिप्पणी*: ज्ञात हो कि तीन बंदरों का शिल्पांकन मोती महल गुरुद्वारा भंडारपुरी के कंगूरे पर अपने निर्माण काल 1820-25 से ही अंकित है और उसका समाज में गहरा प्रभाव है।

*जय हिंद, जय सतनाम*  

_डॉ. अनिल कुमार भतपहरी_  
_anilbhatpahari@gmail.com_

Wednesday, August 12, 2026

हरेली अमावस्या: तंत्र साधना की रात्रि और कौरु नगर का मिथक

हरेली अमावस्या: तंत्र साधना की रात्रि और कौरुनगर का मिथक
- डॉ. अनिल कुमार भतपहरी

हरेली अमावस्या। छत्तीसगढ़ में आज की रात्रि को लेकर लोक-मान्यता है कि यह टोनही की सिद्धि-रात्रि है। कहा जाता है कि इस रात वे ढाई अक्षर के मारण मंत्र को सिद्ध करती हैं और पुरुष को बैल-बकरा बनाकर अपने वश में रखती हैं।

ग्रामीण परिवेश में दादा-नाना, दादी-नानी से ऐसी ही रहस्य, रोमांच और तिलिस्म से भरी कथाएँ सुनते हुए हम बड़े हुए हैं। ऐसा ही एक मथने वाला मिथक है - **'कौरुनगर'**। मनोरंजनार्थ ही नहीं, लोक-मनोविज्ञान को समझने के लिए भी इस पर बात करना आवश्यक लगता है।
कौरुनगर : एक अलंकारिक व्यंजना
व्यक्ति के जीवन में एक पड़ाव ऐसा आता है जब घर-गृहस्थी, बाल-बच्चों पर प्रभावी नियंत्रण घर की स्वामिनी का हो जाता है और स्वामी उसके निर्देशित कर्म में बाहर रत रहता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो हर किसी का अपना-अपना कौरुनगर है। वर्तमान सुखमय गृहस्थ जीवन पर भी इसका प्रभावी असर है - व्यंग्य ही सही, पर यह सच है।

जनमानस में कौरुनगर वह स्थान है जहाँ स्त्रियों का राज है, जो पुरुषों को पशु-पक्षी - बैल, भेड़, बकरी, तोता, कबूतर - बनाकर रखती हैं। बीहड़ और रहस्यमय होने के कारण असम के कामरूप-कामाख्या देवी स्थल को कौरुनगर कहा जाता है।

मेरी दृष्टि में यह शब्द-शक्ति की अलंकारिक व्यंजना है। यह पुरुष-प्रधान समाज द्वारा स्त्रियों पर किए गए अत्याचारों के प्रत्युत्तर में रचा गया एक सशक्त लोक-मिथक है।

देश में हर अंचल का अपना कौरुनगर है - चाहे वह रेवा-परेवा वाली राजस्थान की ढोला-मारू रा दूहा लोक-काव्य हो या सुदूर बंगाल-केरल में वशीकरण करती मोहिनी या चौंसठ जोगिनी की कथाएँ। स्त्री-पुरुष के अंतर्संबंध, प्रेम-घृणा के नवरस भाव की यह मुग्धकारी साहित्य-परम्परा तोता-मैना से लेकर आधुनिक सिनेमा तक रहस्य-रोमांच से भरी है। गीत, कविता, ग़ज़ल, सजल आज तक मानव-मन की गहराई को पूरी तरह नाप नहीं सके हैं। यह विडंबना ही है कि मनुष्य दूसरों को तो क्या, अपनों को भी रत्ती भर समझ नहीं सका है। स्त्री-पुरुष आज तक एक-दूसरे के लिए पहेली हैं, वैसे ही जातियाँ और समुदाय भी।

लोक में अब भी विश्वास है कि मंत्रों में शक्ति है - 'नाम साँचा, पिंड काँचा'। यह मनोविज्ञान का विषय है। दादी-नानी ने दूध की घुट्टी के साथ जो तिलिस्म, रहस्य, रोमांच की लोककथाएँ हमारे दिल-दिमाग में भरी हैं, उसी कारण गाँव-शहर का कोई पेड़, कोई खंडहर, आज के भारतीय प्रोफेसर, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक को भी एकांत और रात्रि-काल में भयभीत करता है।
छत्तीसगढ़ का कौरुनगर : उड़ियान परिक्षेत्र
छत्तीसगढ़ का कौरुनगर उड़ियान परिक्षेत्र है, जो छत्तीसगढ़ और ओडिशा के सीमावर्ती भाग में स्थित है। इस क्षेत्र में प्राचीन काल में जनजीवन में सहजयान और साधकों-सिद्धों में वज्रयान, तंत्रयान का प्रचलन रहा है। सिरपुर में इससे संदर्भित बौद्ध विहार हैं।

सिरपुर बौद्ध विहार के प्रवेश द्वार पर भट्टप्रहरी - राज्य के श्रेष्ठ रक्षक - सदृश खड़ा होकर मैं अक्सर छठी सदी और वर्तमान की सांस्कृतिक कड़ियों को जोड़ने का प्रयास करता हूँ। क्योंकि ये हमारे पुरखों का गाँव और जन्मभूमि है। जुनवानी और सिरपुर के मध्य महानदी का विशाल पाट है। गाँव जाने पर समय निकालकर इन प्राचीन नगरियों में अपनी जड़ तलाशने और परिजनों की अंतर्ध्वनि सुनने आ जाता हूँ। इससे सुकून मिलता है।

कहा जाता है कि तुरतुरिया में भिक्षुणियाँ और योगिनियाँ रहकर मंत्र-सिद्धि, योग और प्रकृतिस्थ जीवन जीती थीं। नागार्जुन गुफा में अनेक साधक मंत्र जागृत करते थे। विगत वर्ष यहाँ आकर दलाई लामा जी ने ध्यान किया था।

आज भी सिरपुर और उसके आसपास का जनजीवन आवरणबद्ध है। एक ऐसे अन्वेषक की आवश्यकता है जो यहाँ की लोक-प्रचलित संस्कृति से प्राचीन संस्कृति का अनावरण कर सके। जनजीवन में अब भी अनगिनत मंत्र-सूक्त प्रचलन में हैं जो अलेखन के कारण धीरे-धीरे विलुप्ति के कगार पर हैं।
अखाड़ा, मंत्र और स्मृतियाँ
आज से चालीस वर्ष पूर्व जब हम कक्षा ३-४ में पढ़ते थे, तो अमावस और नागपंचमी पर हमारे बुजुर्ग गाँव में धान मीजने के लिए जब बयारा छोलते - खलिहान तैयार करते - तो उसी जगह हम बच्चों को अमोल असवा, महंत नंदू नारायण, भरोस, छोटू, तनगू बाबा शस्त्र चलाने और अखाड़ा सिखाते थे। रात्रि में शोभित और दयालु सलेनदरा भगेला बाबा सहज मंत्र सिखाते थे। बड़ों को मारण-उच्चाटन आदि घोर गंभीर मंत्र सिखाकर नाम-पान देते थे।

उन्हीं में से एक शरीर बाँधने का मंत्र आज स्मृत हो रहा है -
आसन बाँधेव सिंहासन बाँधेव
आई बाँधेव डाई बाँधेव
डायनी के चक्र बाँधेव
सेत गुरु के चलत फिरत
मरी-मसान बाँधेव
घाट अवघट समसान बाँधेव
बारा ब इला के फेर बाँधेव
मोर गुरु अउ महादेव पारबत्ती के कहे से
आसन अउ सिंहासन बंधा जा...
साहेब गुरु सतनाम
मंत्र कितना प्रभावशाली है और उसकी क्या उपयोगिता है, यह बाद की बात है। असल बात यह है कि जब कोई साधन नहीं था, पहुँच-मार्ग नहीं थे, साँप-बिच्छू से भरे बीहड़ स्थानों पर इन्हीं साधकों - चाहे वह बैगा, बैद, सिद्ध, नाथ, योगी, जपी, तपी हो - ने बेबस और दुखी जनमानस को धैर्य धारण कराया, जीना सिखाया और जीवन-यात्रा के पथ-प्रदर्शक रहे। इन्हें यूँ ही खारिज या विस्मृत कर देना कैसे संभव है? 

फिर 'सेत गुरु' शब्द आना और अंत में 'साहेब गुरु सतनाम' का उच्चारण और महादेव पार्वती के नाम अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। शैव और सतनाम - महादेव और सतनाम। शिव-पार्वती की अमरकथा में सतनाम का जाप ऐसे प्रसंग हैं जो सतनाम की व्यापकता और अति प्राचीनता को व्यक्त तो करते ही हैं, सतनाम ही सनातन है यह भी प्रमाणित होता है। लोक भजनों-मंत्रों में "चारों जुग हे सतनाम के पूजा, तोर छोड़ सुमरन नहीं दूजा" जैसी बातें स्वयं सिद्ध और प्रमाणित जान पड़ती हैं।

लोक-मंत्र साहित्य भाषा-विज्ञान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि यह लिपिबद्ध हो तो अनेक नई जानकारियाँ सामने आएँगी और जो सम्मोहन कथित अभिजात्यों ने संस्कृत में रचा है, उससे यह किसी भी दृष्टि से कमतर नहीं होगा।

चित्र संकेत -
1. सिरपुर बौद्ध विहार प्रवेश द्वार पर लेखक भट्टप्रहरी के रूप में 2-3. तुरतुरिया स्थित बौद्ध भिक्षुणियों से संबंधित स्थल
4. जुनवानी का प्रसिद्ध लीम चौरा जहाँ रात्रि में मंत्र-पाठ सहित लोक-चर्चाएँ होती थीं। 
- डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
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