Wednesday, September 9, 2026

भिक्षुक मुक्त स्वाभिमानी शहर: नारायणपुर

नारायणपुर : भिक्षुक मुक्त स्वाभिमानी शहर 
डॉ. अनिल भतपहरी

नववर्ष 2026 की जनवरी से मैं नारायणपुर में निवासरत हूँ। राजधानी रायपुर की भागमभाग और शोरगुल से मुक्त, चारों ओर पहाड़ियों एवं रम्य वनों से आच्छादित यह शहर वास्तव में "नेचर सिटी" है।

यहाँ की अनेक विशेषताओं में एक बात मैंने इन आठ-नौ माह में महसूस की कि यहाँ कोई भिखारी नहीं है। मेरी वैगन आर कार की ड्राइविंग सीट वाली खिड़की में एक डिब्बी है। पता नहीं, कार कंपनी ने उसे किस उद्देश्य से बनाया होगा, शायद पान, सिगरेट, गुटका या अन्य आवश्यक दवाई आदि रखने के लिए! परंतु मेरी पान-गुटका जैसे किसी व्यसन की लत नहीं है, और सद्गुरु की कृपा से अब तक निरोगी, औषधि-मुक्त जीवन व्यतीत करते हुए 56 वर्ष बीत गए। इसलिए मैं उस डिब्बी में प्रायः हमेशा चिल्लर ही रखता आया हूँ। दरवाज़ा खोलने पर सिक्कों की खनक से परेशान पत्नी-बच्चे वहाँ पैसे रखने से मना भी करते थे, पर मेरी यह आदत अब तक नहीं छूटी। हाँ, इतना अवश्य है कि सिक्कों की वह खनक मुझे धन-लक्ष्मी की पायल जैसी लगती है।

बहरहाल, उन चिल्लरों को मैं रायपुर के सिंगल बत्ती चौक या कहीं राह चलते भिक्षुओं को देकर थोड़ी खुशी पाता था। लेकिन यहाँ नारायणपुर में वह खुशी मिल नहीं रही है, क्योंकि मेरी कार की डिब्बी भर गई, पर कोई भिक्षुक मिला नहीं। इसलिए अब उन एक-दो-पाँच-दस के सिक्कों से मिर्ची, नींबू, धनिया खरीद रहा हूँ। किराए के मकान, बुधवारी बाज़ार के कमरे में स्वपाकी जीवन व्यतीत करते हुए, पाताल चटनी हाथों से मसलकर ग्रहण करते हुए सेहतमंद हो रहा हूँ। भले ही हथेली हरी मिर्च की झार से भरभरा जाती है, परंतु खलबत्ते या मिक्सी में ज़रा-सी दो मिर्च, टमाटर, धनिया पीसने और अनावश्यक बर्तन निकालने से बेहतर है कि थोड़ा सह लिया जाए।

मैंने भिक्षुक तलाशने के उद्देश्य से शहर के कुछ धार्मिक स्थलों की ओर सैर के निमित्त जाकर देखा। आश्चर्य कि वहाँ भी कोई नहीं मिला! यहाँ मंदिर, मस्जिद, चर्च, जिनालय, देवताला कुटी, गुड़ी, आश्रम इत्यादि तो हैं, पर बाहर कोई भिक्षुक नहीं। यही यहाँ की बड़ी खूबसूरती और स्वाभिमानी ज़िंदगी लगी। इसलिए इसे छत्तीसगढ़ का अनूठा शहर कहने में मुझे कोई दिक्कत नहीं।

यहाँ भिखारी न देख पाने और उसे दान न कर पाने की नाममात्र की रंज के स्थान पर अपार खुशी गुरु घासीदास के कथन से हुई :

"दान के देवइया पापी, दान के लेवइया पापी।"

गुरुजी की परिकल्पना को साकार करता यह शहर मुझे अब भाने लगा है।

मेरी इस बात पर कुछ बौद्धिक मित्रों से चर्चा हुई तो उन्होंने दो-तीन बातें जोड़ीं। उनमें एक युवा रचनाकार दिलीप निषाद (बालोद) हैं, जो मेरे प्रिय पाठक हैं और विवेकानंद आश्रम में सेवारत हैं। वे मुझे वर्षों से पढ़ रहे हैं। एक दिन वे मेरा काव्य-संग्रह "हड्डी की जीभ नहीं कि न फिसले" पढ़कर वापस देने अपने एक सहकर्मी मित्र के साथ आए थे। प्रसंगवश उन्होंने कहा, "हाँ सर, भिखारी ही नहीं, यहाँ कोई विक्षिप्त भी मैंने आज तक सड़क पर लावारिस-सा घूमते नहीं देखा।" सच में, अब मुझे भी यह ऑब्ज़र्व करना पड़ेगा। यहाँ की नैसर्गिक सुंदरता और स्वच्छंद फुरहर हवाएँ लोगों के मन के विचलन को थामे रहती हैं। इसलिए महत्वाकांक्षा के स्थान पर आत्म-संतुष्टि का भाव भरा हुआ है। तभी तो सुविधाविहीन इस अबूझमाड़ में वेरियर एल्विन अड्डा जमाकर अनेक कालजयी कार्य कर विख्यात हो गए। टाइगर बॉय चेंदरू को एक साहसी अंग्रेज़ फिल्मकार ने ढूँढ़ निकाला और इतिहास बना लिया।

इसी तरह विगत कई वर्षों से संवैधानिक दायित्व के निर्वहन में लगे अधिवक्ता मेरसा जी ने चर्चा में कहा कि यहाँ रायपुर की तरह फुटपाथ पर रहने वाले, कबाड़ बीनकर जीवन-यापन करने वाले और हर शाम नशे में धुत्त होकर गाली-गलौज करते हुए राहगीरों को शर्मसार करने वाले समुदाय भी नहीं हैं, जबकि ऐसे लोग रायपुर के कई क्षेत्रों में गुलज़ार हैं। उनका पुनर्वास आज तक प्रशासन कर नहीं सका।

खैर, आज पोरा तिहार है। बच्चे कह रहे हैं, "घर नहीं आ रहे हैं?" मैंने कहा, "छुट्टी नहीं है; शनिवार की रात आऊँगा, रविवार और गणेश चतुर्थी मनाकर वापस जाऊँगा।" तो वे संतुष्ट हुए। श्रीमती जी का मानना है कि सब छूट जाए, पर तीजा-पोरा मायके का न छूटे। अब बच्चे बड़े हो गए हैं और वे तो दूर हैं, तो बच्चों से आज्ञा लेकर वे कल ही अपने भैया के साथ चली गईं। पहली बार ऐसा संयोग आया है कि मेरे घर आज नदिया-बैला की पूजा नहीं होगी। हाँ, उनके स्थान पर घर में दोनों बाइक और यहाँ मेरी मारुति 'छकड़ा' गाड़ी की ज़रूर सेवा-जतन होगी।

हालाँकि गणेश चतुर्थी में बच्चे इन्वॉल्व रहते हैं, पर उस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है। जिस पोरा त्यौहार में बहन-बेटियाँ आती हैं, और जो हरेली के बाद दूसरा बड़ा कृषि पर्व है, उसकी छुट्टी न होने से मन में विचार आया कि सांस्कृतिक रूप से प्रशासकीय कैलेंडर की समीक्षा आवश्यक है।

जय नारायणपुर! जय सेवा! जोहार! आमचो सुग्घर बस्तर!

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