Saturday, September 19, 2026

अक्षुण्य पुण्यम ( हास्य व्यंग्य एकांकी)

[पर्दा उठता है। मंच दो भागों में बँटा है। एक ओर चित्रगुप्त का दफ्तर, बड़ी बही। दूसरी ओर "स्वर्ग चखना सेंटर" का बोर्ड लगा ठेका-स्टाइल ढाबा। सूत्रधार आता है।]

सूत्रधार : देवियों और सज्जनों! आज का विषय है गूढ़ दर्शन — क्षुण्य क्या, अक्षुण्य क्या? हमारे ऋषियों ने कहा — जो क्षय न हो, वही अक्षुण्य। और हमारे व्हाट्सऐप ऋषियों ने इसका नव-भाष्य किया है। प्रस्तुत है — चार्वाक पुनरागमनम्!

[अंक 1 : चित्रगुप्त का दफ्तर]

चित्रगुप्त : भोलाराम! तुम्हारे खाते में पुण्य शून्य है। न दान, न तप, न विद्या। सिर्फ उधारी है!

भोलाराम : (हाथ जोड़कर) हुजूर, पर मैंने सुना है — जो अक्षुण्य है, वही पुण्य है।

चित्रगुप्त : किसने कहा?

भोलाराम : नवल शर्मा जी ने कहा — धन अकलंक है, अप्सरा अकलंक है। फिर एक और ज्ञानी पधारे, बोले द्विमूर्ति में मजा नहीं, देवता भी तीन होते हैं — उन्होंने उसमें सुरा जोड़ दी!

यमदूत-1 : (हँसकर) ये कौन-सा शास्त्र है? व्हाट्सऐप पुराण?

भोलाराम : शास्त्र नया है हुजूर, पर तर्क पुराना है। चार्वाक कह गए हैं — यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्! सुनिए मेरा तर्क —

सुरा छीजती है, बोतल खाली होती है। सुंदरी छीजती है, उम्र ढलती है। धन छीजता है, खर्च होता है।

चित्रगुप्त : तो ये अक्षुण्य कैसे हुए?

भोलाराम : हुजूर, चीजें छीजती हैं, पर उनकी लत नहीं छीजती! बोतल खत्म, लत बाकी। नोट खत्म, लालच बाकी। सुंदरी बूढ़ी, नज़र बाकी। सिद्ध हुआ — असली अक्षुण्य आनंद है, और आनंद की लत ही पुण्य है!

[अंक 2 : स्वर्ग की मार्केटिंग]

[नवल प्रवेश करता है। हाथ में पम्पलेट — "स्वर्ग में आइए, सब अक्षुण्य पाइए"]

नवल : भोलाराम जी, एकदम सही पकड़े हैं! इसीलिए तो लोग स्वर्ग की लाइन में लगे हैं। पृथ्वी पर ट्रेलर देख लिया, अब पूरी फिल्म देखनी है!

स्वर्ग में —
• अप्सराएँ अमरत्व प्राप्त हैं — कभी बूढ़ी नहीं होंगी, कभी "मूड नहीं है" नहीं कहेंगी! • इंद्रासन का वैभव अक्षुण्य — कुर्सी छिनने का डर नहीं, चुनाव नहीं, विपक्ष नहीं! • और सोम की नदी बह रही है — बार बंद होने का टेंशन नहीं, ड्राई डे नहीं, पुलिस का छापा नहीं! 
यमदूत-2 : मतलब स्वर्ग एक परमानेंट चखना सेंटर है?

नवल : बिल्कुल! पृथ्वी पर क्षुद्र मानव जीवन का संताप भी क्या है? यहाँ बीवी का ताना, बॉस की डाँट, महँगाई की मार। वहाँ नो टेंशन, ओनली अटेंशन — अप्सराओं का!

भोलाराम : (आँखों में चमक) तो मेरा पुण्य यही हुआ कि मैंने पृथ्वी पर अभ्यास किया?

चित्रगुप्त : अभ्यास? तुमने तो उधारी में पी थी!

भोलाराम : हुजूर, उधारी में पीना भी तपस्या है! साहूकार का ताना सहकर भी नशा कायम रखना — क्या यह तप नहीं? पत्नी की गालियाँ सुनकर भी सौंदर्य निहारना — क्या यह साधना नहीं?

[अंक 3 : चखना सेंटर में दर्शन]

[रोशनी मंच के दूसरे हिस्से पर। टेबल पर मसाला पापड़। प्रबुद्ध-1, प्रबुद्ध-2 बैठे हैं।]

प्रबुद्ध-1 : (पापड़ तोड़ते हुए) देखो भाई, नवल जी ने कहा — धन अकलंक, अप्सरा अकलंक। तुमने बेकार में सुरा घसीट ली।

प्रबुद्ध-2 : घसीटा नहीं, न्याय दिलाया है। बिना सुरा के ज्ञान अधूरा है। चखना सेंटर में बैठकर तुम चाय पर ज्ञान दोगे?

वेटर : सर, दो कटिंग?

प्रबुद्ध-1 : नहीं, दो लस्सी। हम प्रबुद्ध हैं, सुरा-सुंदरी से ऊपर।

प्रबुद्ध-2 : वाह! चखना सेंटर में लस्सी? ये तो मंदिर में जाकर चिकन टिक्का माँगने जैसा है!

प्रबुद्ध-1 : धन अक्षुण्य है। जेब में हो तो इज्जत है, न हो तो प्रबुद्ध भी भिखारी।

प्रबुद्ध-2 : इसीलिए वेटर को पहले पेमेंट दिखाओ, तभी चखना आएगा। (सामने से स्कूटी वाली गुजरती है, प्रबुद्ध-1 की गर्दन घूमती है) अभी-अभी तुम्हारी गर्दन 90 डिग्री घूमी — ये अकलंक सौंदर्य का ही प्रभाव था! गर्दन का मोच पाप है, सौंदर्य नहीं।

प्रबुद्ध-1 : तुम अश्लील हो रहे हो। हम दार्शनिक वार्ता कर रहे हैं।

प्रबुद्ध-2 : और दार्शनिक वार्ता चखना सेंटर में? यही सबसे बड़ा व्यंग्य है भाई! जहाँ मूँगफली के दाने गिने जाते हैं, वहाँ मोक्ष के सिद्धांत बघारे जा रहे हैं।

प्रबुद्ध-1 : अच्छा बताओ, तुम्हारी सुरा अक्षुण्य कैसे?

प्रबुद्ध-2 : (धीमे स्वर में) धन तिजोरी में सड़ता है, अप्सरा फोटो में बूढ़ी होती है, पर सुरा? जितनी पुरानी, उतनी कीमती! 12 साल पुरानी स्कॉच... बुढ़ापा भी यहाँ पुण्य है!

वेटर : सर, चखना खत्म, और लाऊँ?

दोनों एक साथ : हाँ, अक्षुण्य है, लाते जाओ!

प्रबुद्ध-1 : (ज्ञान-मुद्रा में) वैसे सिद्धांत ये है — जो चीज चखने से घटे, वो क्षुण्य। जो ज्ञान बघारने से बढ़े, वो अक्षुण्य।

प्रबुद्ध-2 : मतलब?

प्रबुद्ध-1 : मतलब ये पापड़ क्षुण्य है — खत्म हो गया। पर इस पर हमारी बहस अक्षुण्य है — कल फिर करेंगे!

प्रबुद्ध-2 : वाह! तो सिद्ध हुआ — चखना क्षणभंगुर है, चखना-सेंटर का ज्ञान अक्षुण्य है, और...

दोनों : वेटर! बिल कौन देगा?

[सन्नाटा। दोनों एक-दूसरे को देखते हैं। यही असली दर्शन है।]

[अंक 4 : परसाईयाना मोड़]

[नारद प्रकट होते हैं, वीणा पर 'मोहब्बत' की धुन]

नारद : नारायण! नारायण! ये कैसा पुण्य-परिवर्तन हो रहा है!

नवल : देवर्षि, समय बदल गया है। अब पुण्य वह नहीं जो छीजता न हो। पुण्य वह है जिसकी लत छूटती न हो!

नारद : तो नरक में कौन जाएगा?

चित्रगुप्त : (बही पलटकर) जो सत्य बोलेगा, जो रिश्वत नहीं देगा, जो फाइल नहीं दबाएगा... वैसे मूर्ख अब बचे कहाँ हैं?

भोलाराम : हुजूर, मुझे स्वर्ग दीजिए। मैंने पृथ्वी पर दुख झेला है। अब मुझे अक्षुण्य आनंद चाहिए।

यमदूत-1 : पर भोलाराम, स्वर्ग में भी महँगाई है। एक अप्सरा के अभिसार के लिए 100 पुण्य चाहिए। तुम्हारे पास शून्य है।

भोलाराम : तो क्या मैं फिर से फाइल बनकर लटकूँ?

सब एक स्वर में : यही तुम्हारा असली अक्षुण्य है भोलाराम! पृथ्वी पर फाइल लटकी थी, अब आत्मा लटकेगी। लटकना ही अक्षुण्य है!

[पर्दा गिरता है। पीछे से आवाज — "सोम की नदी में स्नान करने वालों, कृपया अपने पुण्य का टिकट दिखाएँ..."]

सूत्रधार : (आगे आकर) तो देवियों और सज्जनों! सिद्ध हुआ —

सुरा छीजती है, सुंदरी छीजती है, धन छीजता है,
पर उनकी लत अक्षुण्य है!

चार्वाक कह गए — खाओ-पीओ मौज करो,
नवल कह गए — स्वर्ग में इसका एक्सटेंडेड वर्जन देखो,
और प्रबुद्ध कह गए — चखना खत्म हो सकता है,
पर बिल से बचना ही सबसे बड़ा मोक्ष है!

कहा भी गया है — जो अक्षुण्य हो, वही पुण्य है।
अब लत से बड़ा अक्षुण्य क्या होगा?

बोलो — भोलाराम के जीव की जय!

[पर्दा]

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