अनुसूचित जाति वर्ग में सतनामी को सम्मिलित करने से जो पेशागत भ्रम निर्मित हुआ हैं और सामाजिक भेदभाव के साथ बहुसंख्यकों द्वारा प्रायोजित दमन दलन हुआ हैं उन्हें समझे बिना सामाजिक न्याय अधूरा है
भारतीय समाज में ‘अनुसूचित जाति’ को प्रायः एक समान वर्ग समझ लिया जाता है। आरक्षण और कल्याणकारी सुविधाओं के कारण यह भ्रम और गहरा हुआ है कि इस सूची में सम्मिलित सभी समुदायों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एक जैसी रही होगी। वस्तुतः सत्य इससे भिन्न है। ब्रिटिशकालीन जनगणनाओं और तत्कालीन आंदोलनों को ध्यान से देखें तो स्पष्ट दो धाराएं दिखाई देती हैं — एक अस्पृश्य (Untouchables) मानी गई जातियों की, और दूसरी दबाई गई (Depressed Classes) जातियों की।
ब्रिटिश काल में शब्दों का वर्गीकरण
1911 की जनगणना में अंग्रेजों ने पहली बार जातियों की गणना धर्म और सामाजिक स्थिति के आधार पर की। 1916 में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में यह स्पष्ट किया गया कि शासकीय दस्तावेजों में ‘Depressed Classes’ शब्द ‘Untouchables’ के पर्याय के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा है, क्योंकि ‘Untouchable’ शब्द से ठेस पहुँचती है।
कागज पर दोनों शब्द एक कर दिए गए, पर जमीनी सच्चाई दो प्रकार की थी।
1. अस्पृश्य माना गया वर्ग
ये वे जातियां थीं जो हिन्दू वर्ण-व्यवस्था के भीतर होते हुए भी अस्पृश्यता का दंश झेलती थीं। इनके पारंपरिक कार्यों को अशुद्ध माना गया — जैसे मैला और नाली की सफाई करने वाले मेहतर, भंगी, डोम; चमड़े का कार्य करने वाले चमार, मोची; वस्त्र धोने वाले धोबी; कुछ क्षेत्रों में केशकर्तन करने वाले नाई; शव उठाने और मृत पशु उठाने वाले समुदाय। इन्हें छूना पाप माना जाता था। इन्हें गांव के बाहर बसाया जाता था, कुएं से जल लेने और मंदिर में प्रवेश से वंचित रखा जाता था।
2. दबाया गया वर्ग — Depressed Class
ये समुदाय अस्पृश्यता वाले पेशे नहीं करते थे, फिर भी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से जानबूझकर दबा दिए गए। इसके दो प्रधान कारण थे।
पहला, वैचारिक अस्वीकृति। इन्होंने ब्राह्मणवादी रीति-नीति और पुरोहितवाद को मानने से इनकार कर दिया। इनकी अपनी उपासना-पद्धति, अपने देवी-देवता और अपने धर्मगुरु थे — जैसे आदिवासी मूल के अनेक समुदाय, कबीरपंथी, सतनामी। ये वेद-पुराण और पुरोहित की सत्ता को अंतिम प्रमाण नहीं मानते थे।
दूसरा, अधिकार की मांग पर दमन। जब इन समुदायों ने भूमि, मजदूरी और बराबरी की बात उठाई, तो गांव की प्रभावशाली जातियों ने मिलकर इनका सामाजिक बहिष्कार किया, बेदखल किया, मजदूरी बंद की और अमानवीय व्यवहार किया।
इसीलिए इन्हें ‘Depressed’ कहा गया — अर्थात् सुनियोजित रूप से दबाया गया वर्ग।
बाद में 1930 में स्टार्टे समिति और साइमन कमीशन ने इस वर्गीकरण को और उलझा दिया। कभी आदिवासियों को, कभी पिछड़ी जातियों को भी इसी श्रेणी में गिना गया। अंततः 1931 की जनगणना के आधार पर भारत शासन अधिनियम 1935 बना, जो 1937 में लागू हुआ। उसी अधिनियम की Depressed Classes की सूची ही आगे चलकर अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) कहलाई।
छत्तीसगढ़ में सतनामी : दलन के विरुद्ध स्वाभिमान का इतिहास
इस प्रसंग में छत्तीसगढ़ के सतनामी समुदाय का उदाहरण अत्यंत महत्वपूर्ण है।
गुरु घासीदास जी ने घोर तपस्या से प्राप्त आत्मज्ञान के बाद गिरौदपुरी के वन्य ग्राम से सतनाम के सप्त सिद्धांतों का उपदेश दिया। यहीं छत्तीसगढ़ की धरती पर प्रथम जातिविहीन समुदाय ‘सतनाम पंथ’ की स्थापना हुई।
इतिहासकारों के अनुसार सतनामी मूलतः खेतिहर कृषक थे। उन्होंने जाति-व्यवस्था का त्याग कर हिन्दू व्यवस्था के भीतर ही एक नये पंथ का निर्माण किया। उनका उद्देश्य श्रमिकों और भूमिदासों की सामाजिक स्थिति सुधारना तथा उन्हें बहुदेववाद, पुरोहितवाद और अनेक कर्मकांडों से मुक्त कर एकेश्वरवादी ‘सतनाम’ की उपासना से जोड़ना था।
जिसने पूर्व मान्यताओं को नहीं माना, उसे दबाया गया, बहिष्कृत और तिरस्कृत किया गया। यह ‘Depressed’ की परिभाषा में पूर्णतः बैठता है।
यही कारण है कि जब सतनामियों को उनके मूल कृषि-कर्म के स्थान पर पौनी-पेशा कार्य करने वाला कहकर संबोधित किया जाता है, तो समुदाय प्रखर विरोध करता है। आजादी के बाद भी जब कभी गजेटियरों या दस्तावेजों में भ्रामक जानकारी के आधार पर नये रचनाकार या शोधार्थी ऐसा लिखते हैं, तो भावनाएं आहत होती हैं। उल्लेखनीय है कि 1926 में ही विवादित जाति-संज्ञा को शासकीय दस्तावेजों से विलोपित करने का आदेश तत्कालीन गवर्नर बटलर एवं विल्सन के हस्ताक्षर से जारी हो चुका था, जिसकी प्रतियां सर्वत्र उपलब्ध हैं और उसी आधार पर शासकीय कार्य संपादित होते आ रहे हैं।
इतिहास का एक मार्मिक मोड़ यह भी है कि सतनामी दबाने से दबे नहीं, बल्कि उनके प्रभाव में कुछ अस्पृश्य मानी जाने वाली जातियां आने लगीं। तब सभी हिन्दू जातियों ने मिलकर सतनामियों से ही छुआछूत का व्यवहार करना आरंभ कर दिया।
जनगणना की राजनीति और हिन्दू महासभा
ब्रिटिश काल में जब मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा का गठन हुआ और संख्या-बल के आधार पर बड़े नेतृत्व उभरने लगे, तब हिन्दू महासभा ने दबाए गए समुदायों को साथ लेने की रणनीति अपनाई। अंग्रेजों के समक्ष हिन्दुओं की जनसंख्या न घटे, इस उद्देश्य से सिख हिन्दू महासभा, सतनामी हिन्दू महासभा जैसे संगठन बनाए गए।
1932 के कम्युनल अवार्ड और उसके बाद हुए पूना समझौते (यरवदा पैक्ट) में Depressed Classes के लिए पृथक निर्वाचक मंडल का प्रश्न उठा था। उसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में यह संगठनात्मक प्रयास हुआ था।
निष्कर्ष
आज अनुसूचित जाति एक कानूनी-प्रशासनिक श्रेणी है, जिसका आधार 1935 का अधिनियम है। उसके अंतर्गत कल्याण और मुख्यधारा में लाने हेतु विशेष प्रावधान किए गए हैं। परंतु उसके भीतर दो ऐतिहासिक धाराएं स्पष्ट हैं — एक वह जिसे पेशे के कारण अशुद्ध ठहराकर अस्पृश्य माना गया, और दूसरी वह जिसे स्वतंत्र विचार और अधिकार की मांग के कारण जानबूझकर दबाया गया।
छत्तीसगढ़ के सतनामी दूसरी धारा के सबसे बड़े और जीवंत उदाहरण हैं। इस भेद को समझे बिना न तो इतिहास का सही मूल्यांकन संभव है, न ही सामाजिक न्याय की सार्थक बहस।
डॉ.अनिल कुमार भतपहरी
9617777514
जुनवानी अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़
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