#anilbhatpahari
किस्सा बहराम चोट्टे का
उक्त उपन्यास का लोकार्पण समारोह का आमंत्रण पत्र और शीर्षक देख मुझे "चरणदास चोर "स्मृत हुआ कि कही "महंत जुगुलदास गाथा" जैसा छत्तीसगढ़िया रॉबिन हुड किरदार तो नहीं होगा? जिसे नाचा गम्मत से लेकर हबीब साहब ने सत्य के प्रति अटूट निष्ठा से अमर हुए पात्र को "चरणदास चोर" बनाकर प्रतिष्ठित एवं सम्मानित कराया। एक तरह से उन्होंने नया थियेटर के माध्यम से छत्तीसगढ़ी कला ,संस्कृति ,धर्म और मान्यता को वैश्विक मंच प्रदान किया। उसी चरणदास को पिताश्री के निर्देशन में नवरंग नाट्य कला मंच 1975 से हम लोग भी करते रहे हैं। इस कारण भी बिलासपुर की अनिवार्य सा प्रवास को स्थगित कर कथानक के मोह वश भी जाना हुआ।
बहरहाल कार्यक्रम के उद्बोधनों में जाना कि यह तो एकदम से अलग पात्र हैं एक ऐसा बहराम जो लोगों को खूबसूरती से लूटते रहा / उनका हर चीज यहां तक विश्वास /मत चुराते रहे ,नेतृत्व करते रहा. पर वह अपना सा लगा और जाना भी तो चाहकर विद्रोह भी नहीं कर पाया।
समीक्षक प्रथम वक्ता डॉ सुधीर शर्मा पते की बात कहे कि ऐसे बहराम अब छत्तीसगढ़ में लाखों की संख्या हैं। जो हर क्षेत्र में मौजूद हैं। सचमुच उपन्यास बिना पढ़े प्रासंगिक लगने लगा।
आज़ादी के महज 10 साल बाद 1958 में मोहभंग से ऊपजे मनोदशा कथानक के रुप में ,पहले धारावाहिक आया। उसके 4 साल बाद 1962 में प्रकाशित " किस्सा बहराम चोट्टे का" संभवतः हिंदी के प्रथम हास्य व्यंग्य उपन्यास हैं जो "राग दरबारी "की पूर्व पीठिका सा हैं।
उक्त उपन्यास के लेखक विश्वेन्द्र ठाकुर के परिजनों ने 65 वर्ष बाद लगभग विस्मृत कर चुके और बमुश्किल लतीफ घोंघी जी के घर उनके सुपुत्र प्रो करीम साहब के सौजन्य से एक प्रति मिले । इस प्रसंग को महासमुंद से पधारे लेखक शर्मा जी ने रोचक आपबीती बताते भावुक होते ऐसे बताए कि परिजन खो चुके पुस्तक की एक प्रति को दिवंगत "पिता के अस्थि कलश " प्राप्त करते हुए सा कंपकपी हाथों से धारण किए... खचाखच भरा विमतारा हाल भाव विह्वल हो उठे।
उनके समकालीन वरिष्ठ साहित्यकार रवि श्रीवास्तव ने उपन्यास की एक पंक्ति सुनाते कहे कि बहराम किसी नदी के बाढ़ की तरह बस्ती में चढ़ा जा रहा हैं। क्या विलक्षण उपमान हैं। ऐसा तो आजकल गांवों को निगलते अनेक भू माफिया और कॉर्पोरेट घराने के लोग सर्वत्र मिलने क्या दिखने लगे हैं। नव धनाढ्यों की बढ़ती बाढ़ से तबाह होते गांव और जनजीवन सहज ही द्रष्टव्य हैं।
इस महत्वपूर्ण उपन्यास को उनके सुपुत्र संकेत/ सरल ठाकुर एवं अन्य सभी मिलकर पुनर्प्रकाशित कर साहित्य जगत के लिए अप्रतिम व स्वागतेय कार्य किया हैं।
सतलोकी लेखक विश्वेंद्र ठाकुर जी को विनम्र श्रद्धांजलि सहित परिजनों को बधाई कि उन्होंने मिलकर पिताश्री की कृति और उन्हें चीर स्मरणीय बनाएं हैं। यह उपलब्धि हमारे छत्तीसगढ़ राज्य और कथानक क्षेत्र महासमुंद के लिए ही नहीं बल्कि हिंदी जगत के लिए गर्व का विषय हैं। अनेक साहित्यिक और स्वनाम धन्य लोगों के साथ मुझे आमंत्रित कर इस ऐतिहासिक पल का साक्षी बनाने के लिए ठाकुर परिवार के प्रति आभार।
जय हिंदी जय भारत
डॉ अनिल भतपहरी/ 9617777514
No comments:
Post a Comment