Friday, August 28, 2026

सतनाम पंथ में सूर्य- चंद्र उपासना और जोड़ा जैतखाम की अवधारणा

सतनाम पंथ में सूर्य-चंद्र उपासना और जोड़ा जैतखाम की अवधारणा : एक सांस्कृतिक अध्ययन
लेखक : डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
सार (Abstract)
सतनाम पंथ केवल एक धार्मिक सम्प्रदाय नहीं, बल्कि सत्य, समानता और प्रकाश की साधना है। इस शोध पत्र में सतनामी समाज में प्रचलित सूर्योपासना, पूर्णिमा को चंद्र-वंदना, और भंडारपुरी-गिरौदपुरी में स्थापित सूरज-चंदा नामक जोड़ा जैतखाम के आध्यात्मिक, योगिक और सामाजिक अर्थों का विश्लेषण किया गया है। 1908 में E.M. Gordon द्वारा लिखित Indian Folk Tales में मिले प्रत्यक्ष अवलोकन को आधार बनाकर यह सिद्ध किया गया है कि सतनाम पंथ की प्रकाश-उपासना निर्गुण निराकार सतनाम की ही अभिव्यक्ति है।
1. प्रस्तावना
भारतीय संस्कृति में सूर्य, चंद्र और तारा मंडल आदिकाल से मानव के प्रेरक और रहनुमा रहे हैं। वे अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं, इसलिए विश्व भर में कई स्वरूपों में पूज्यनीय हैं। गुरु घासीदास बाबा (1756-1836) ने इसी नैसर्गिक प्रकाश-पूंज की आराधना को जाति-पाति और मूर्ति-भेद से मुक्त कर सीधे 'सतनाम' से जोड़ दिया।
2. ऐतिहासिक प्रमाण : 1908 का अवलोकन
इस परम्परा की सबसे पुरानी लिखित गवाही ब्रिटिश मिशनरी और नृविज्ञानी E.M. Gordon की पुस्तक Indian Folk Tales: Being Side-Lights on Village Life in Bilaspore, Central Provinces (1908) के Chapter II - Objects of Worship and Festivals में मिलती है।  

लेखक लिखता है :
"Passing a certain Satnami village early one morning, I noticed an old woman seated at the doorway of her hut facing east. As the sun appeared above the horizon I observed her bowing her head to the ground three times, and repeating the words of salutation enjoined by Ghassi Das - 'Satnam, Satnam, Satnam'; 'True name' she said three times, and this alone was her morning worship."
अर्थात नित्य सुबह शाम सूर्य की ओर मुख कर सतनाम उच्चारण ही सतनामियों की मूल उपासना थी। यही परम्परा आज भी जीवित है।
3. सतनामी उपासना के दो प्रमुख स्वरूप
अ) नित्य सूर्योपासना: प्रातः और सायं सूर्याभिमुख होकर तीन बार सतनाम का उच्चारण। यह मूर्ति पूजा नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष प्रकृति में सत को देखना है। सतनाम का अर्थ ही है - जो सत्य है वही ईश्वर है, और सूर्य उस सत्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

ब) पूर्णिमा में चंदा उपासना: सतनामी समाज में चौका-आरती, भजन प्रायः चौदस और पुन्नी (पूर्णिमा) को ही कराए जाते हैं। पूर्णिमा की रात चंद्रमा की ओर मुख कर सतनाम उच्चारण किया जाता है। यह शीतल प्रकाश की साधना है, जो मन को शांत और स्थिर करती है।
4. जैतखाम का योगिक और सामाजिक दर्शन
आपके द्वारा बताया गया यह चिंतन इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।

सतनामी मान्यता में जैतखाम केवल स्तंभ नहीं है, वह सत्य का खाम (Satya-Stambh) है, सेतखाम, ज्योतिखाम भी कहलाता है।
• योगिक अर्थ: जैतखाम एक ज्योति-पुंज है। जैसे सिद्ध योग साधक में कुंडलिनी जागरण होता है तो वह दीये की ज्योत के समान प्रकाशवान और ऊर्ध्वगामी होता है, उसी के प्रतीकार्थ एक हाथ का निसाना घर के आँगन में स्थापित किया जाता है, जिससे घर आलोकित हो और कल्मष / बुरी शक्ति का दुष्प्रभाव न पड़े। • सामाजिक अर्थ: उसी एक से इक्कीस की बढ़ोत्तरी ही गाँव की गली में विराट 21 हाथ का जैतखाम होता है, ताकि पूरा गाँव प्रकाशवान हो और कल्मष / बुरी शक्ति का असर न हो। अर्थात व्यक्ति से समष्टि तक प्रकाश का विस्तार।  5. सूरज-चंदा जोड़ा जैतखाम : भंडारपुरी मोतीमहल का विशेष महत्व
जोड़ा जैतखाम का अर्थ है - एक ही चबूतरे पर दो स्तंभों की स्थापना। गुरु घासीदास बाबा ने स्वयं भंडारपुरी मोतीमहल गुरुद्वारा में सूर्य और चंद्रमा नाम के दो जोड़ा जैतखाम स्थापित कराए थे, ताकि इस पावन धाम से सर्वत्र लोक-मंगल का भाव मानव समुदाय में विस्तारित हो।  

गिरौदपुरी और भंडारपुरी दोनों ही आज सतनामी आस्था के मुख्य केंद्र हैं, जहाँ जोड़ा जैतखाम स्थापित हैं। यह गुरु की दूरदर्शिता थी कि उन्होंने दिन और रात, दोनों के प्रकाश-स्रोतों को सतनाम का प्रतीक बना दिया।
6. लोक-आरती में अभिव्यक्ति
इसी दर्शन की अभिव्यक्ति पारंपरिक जैतखाम आरती में होती है:
जगमग जोती खाम के, सूरज चंदा नाम हे
आरती मनावव जोड़ा जैतखाम के...
भावार्थ - जैतखाम की ज्योति जगमगा रही है, जिसके दो नाम हैं - सूरज और चंदा। दोनों ही काल के साक्षी हैं, दोनों ही सतनाम के प्रतीक हैं। एक दिन को प्रकाश देता है, दूसरा रात को, पर सत्य अखंड है।
7. निष्कर्ष
सतनाम पंथ में सूर्य-चंद्र की पूजा किसी ग्रह-शांति के लिए नहीं, बल्कि मानव को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने की प्रेरणा के लिए है। गुरु घासीदास जी ने इन नैसर्गिक प्रकाश-पुंजों की आराधना को उनके प्रतीक जैतखाम से जोड़कर एक ऐसा मार्ग दिया जहाँ स्वयं येऔर समुदाय दोनों का कल्याण हो सके।

भंडारपुरी का जोड़ा जैतखाम इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सतनाम पंथ प्रकृति, योग और सामाजिक समता को एक ही सूत्र में पिरोता है।

डॉ.अनिल कुमार भतपहरी 
9617777514

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