*छत्तीसगढ़ में सप्तदेव परम्परा : 5 देव - 2 देवी के विशेष संदर्भ में*
*सतबहिनी की अ-मूर्त उपासना और डीह स्थापना का लोक-अध्ययन*
*शोध पत्र - प्रारूप*
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*सार (Abstract):*
प्रस्तुत शोध पत्र छत्तीसगढ़ की प्राचीन ग्राम-देव व्यवस्था "सतदेव" अर्थात् 5 देव और 2 देवी की परम्परा का लोक-तात्विक अध्ययन है। शहरीकरण के कारण सतबहिनी को सात मूर्तियों वाली ब्राह्मणीय देवी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि ग्रामीण अंचल में इसका स्वरूप पूर्णतः अ-मूर्त (Aniconic) और प्राकृतिक है। यह शोध सेंट्रल प्राविन्सेज गजेटियर (1909), रायपुर-बिलासपुर गजेटियर, जनजातीय संस्कृति सर्वेक्षण तथा जसगीत, माता सेवा गीतों के भाषा-साहित्यिक विश्लेषण पर आधारित है। इसमें डीह स्थापना, गाँव बांधना और सतबहिनी थान के प्रतीकों - चौरा, त्रिशूल, लोहे के बाना - का विश्लेषण किया गया है।
*मुख्य शब्द (Keywords):* सतदेव, सतबहिनी, सतवहिनी, डीह स्थापना, गाँव बांधना, ठाकुर देव, अ-मूर्त पूजा, सदवाह समाज
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*1. प्रस्तावना*
छत्तीसगढ़ में गाँव बसाना केवल मानवीय बसाहट नहीं, बल्कि देवी-देवताओं की स्थापना है। लोक में इसे "गाँव बांधना" या "डीह बैठाना" कहा जाता है। हर पुराने गाँव के बाहर एक पवित्र भू-भाग होता है जिसे डीह कहा जाता है। यहीं गाँव के सात रक्षक देवता स्थापित होते हैं। इन सात में दो मातृ-शक्तियाँ और पाँच ग्राम-पुरुष देवता हैं। इस समुच्चय को ही सतदेव कहा जाता है। यह परम्परा वैदिक-स्मार्त परम्परा से नहीं, बल्कि गोण्डवाना की द्रविड़-आस्ट्रोएशियाटिक जनजातीय परम्परा से उत्पन्न है, जिसका संबंध गोंड, कंवर, बिंझवार, कोरवा, उरांव और सदवाह समाज से है।
*2. साहित्य समीक्षा एवं गजेटियर संदर्भ*
*अ.* सेंट्रल प्राविन्सेज डिस्ट्रिक्ट गजेटियर्स - रायपुर (1909), बिलासपुर (1910) में R.V. Russell और Hiralal ने लिखा है - _"Every Gond village has Thakur Deo under a Saja tree and Seven Sisters represented by iron spikes driven into the ground outside the village."_
*ब.* रायपुर गजेटियर (1973 पुनः प्रकाशित) में ठाकुर देव, सहाड़ा देव, ठेंगा देव का उल्लेख ग्राम-सीमा के रक्षक के रूप में मिलता है।
*स.* डॉ. हीरालाल शुक्ल (छत्तीसगढ़ का जनजातीय इतिहास), डॉ. रमेन्द्र नाथ मिश्र (छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य का अध्ययन) और डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने सतबहिनी को मातृ-सत्तात्मक अवशेष माना है।
*द.* जनगणना रिपोर्ट 1931, कोरवा जनजाति खण्ड में स्पष्ट लिखा है - _"Every Korwa hamlet has Satbahini than, without which no new settlement is considered complete."_
*3. सतबहिनी का वास्तविक स्वरूप - अ-मूर्त पूजा*
शहरों में संगमरमर की सात मूर्तियाँ बनाकर "सतबहिनी मंदिर" लिखा जा रहा है, यह लोक-विरुद्ध है। गाँव की सतबहिनी में कोई मूर्ति नहीं होती।
- *स्थान:* गाँव के बाहर, नैऋत्य कोण में, महुआ, कर्रा, साजा या पीपल के नीचे खुला थान।
- *प्रतीक:* (i) चौरा - पत्थर या कर्रा की लकड़ी का चौकोर आसन, जिस पर सिंदूर और काजल का लेप, (ii) त्रिशूल - लोहे के 1 से 7 तक त्रिशूल जमीन में गड़े हुए, (iii) बाना / बाण - लोहे के नुकीले सरिये, 7 की संख्या में। यही सात बहनों के प्रतीक हैं।
- *पूजा सामग्री:* सिंदूर, सरसों का तेल, उड़द, महुआ, हर्रा, सिन्दूर। ब्राह्मण पुजारी नहीं, बल्कि बैगा, गुणी या गाँव की बुजुर्ग महिलाएँ पूजा करती हैं।
इसका दर्शन द्रविड़ परम्परा के "नादुक्कल" (वीर-पत्थर) और अ-मूर्त मातृ-पूजा से मिलता है। लोहा यहाँ अशुभ-नाशक तत्व है।
*4. सतदेव की अवधारणा - नया गाँव बसाने की प्रक्रिया*
नया गाँव बसाते समय बैगा सबसे पहले डांड या लोहा-लकड़ के बाना को जमीन में गाड़कर डीह की सीमा तय करता है। फिर क्रमशः सात देवताओं की स्थापना होती है:
*2 मातृ देवियाँ :*
(1) *सतवहिनी / सतबहिनी / सात बहिनिया* - गाँव की बड़ी माता, समस्त बाहरी बाधा, महामारी, भूत-प्रेत से रक्षा। इन्हें 'संकट हरनी' कहा जाता है।
(2) *शीतला माता* - रोग-शोक की देवी, विशेषतः बच्चों की चेचक, खसरा, नजर से रक्षिका।
*5 ग्राम देवता :*
(3) *ठाकुर देव* - गाँव का राजा, मालिक। सबसे बड़ा पेड़ (साजा) उसी का। भूमि-अधिकार उसी के नाम।
(4) *सहाड़ा देव / सहारा देव* - खेत-खलिहान, फसल और अन्न का देवता।
(5) *ठेंगा देव / लाठी देव* - हाथ में लाठी लिए सीमा का रक्षक, चोर-डाकू और विवाद से बचाने वाला।
(6) *धुरवा देव / धूल्हा देव* - गाँव की धूल, माटी और जमीन का देवता, भूमि की उर्वरता का प्रतीक।
(7) *करिया देव / कड़िया देव* - काला देव, जो अंधकार, जादू-टोना, नजर-गुन से बचाता है।
*5. संस्कृति, भाषा-साहित्य और लोकगीतों में सतबहिनी*
*अ.* जसगीत: छत्तीसगढ़ी नवरात्रि जस में सतबहिनी का अनिवार्य उल्लेख है - _"सत बहिनी सातो आवव, मोर गाँव के संकट टारव, हो माता..."_
*ब.* माता सेवा गीत: कोरवा, कंवर समाज में "डीह के माता" के नाम से गीत।
*स.* भाषा: "डीह" (देहली से बना, गाँव की देहरी), "बाना" (बाण से), "थान" (स्थान से)। छत्तीसगढ़ी मुहावरा - _"गाँव के ठाकुर देव रूठगे त गाँव उजड़गे।"_
*द.* लोक मान्यता: नया घर, शादी, फसल कटाई से पहले सतबहिनी को "सुमरन" देना अनिवार्य है। बिना सुमरने कोई शुभ कार्य नहीं होता। महिलाएँ प्रमुख गायिका और पुजारिन होती हैं, जो मातृ-सत्ता का प्रमाण है।
*6. अधिष्ठात्री समाज - सदवाह और जनजातीय संबंध*
आपने सदवाह / सतवहन समाज की ओर संकेत किया, वह अत्यंत महत्वपूर्ण है। सतबहिनी मूलतः सदवाह, सतनामी, गोंड, कंवर, बिंझवार, कोरवा, हल्बा समुदाय की अधिष्ठात्री देवी हैं। डॉ. श्यामाचरण दुबे के अनुसार बस्तर में हर माड़िया-गोंड गाँव में सतबहिनी को "बूढ़ी माई" कहा जाता है। हर कोरवा बस्ती में थान अनिवार्य है। यह इस बात का प्रमाण है कि यह कृषि-पूर्व आखेटक-संग्राहक समुदायों की देवी है, जो बाद में स्थायी कृषि ग्राम-व्यवस्था की रक्षिका बन गई।
*7. वर्तमान स्थिति और निष्कर्ष*
आज शहरीकरण और मूर्ति-पूजा के प्रभाव से अ-मूर्त थान लुप्त हो रहे हैं। लोहे के बाना को हटाकर संगमरमर की मूर्तियाँ लगाई जा रही हैं, जिससे उसका मूल पारिस्थितिक और जनजातीय अर्थ नष्ट हो रहा है। बस्तर, सरगुजा, जशपुर, रायगढ़, बिलासपुर, रायपुर और दुर्ग के पुराने डीह वाले गाँवों में यह परम्परा अभी भी जीवित है, पर संरक्षण की आवश्यकता है।
*निष्कर्षतः* सतदेव परम्परा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की ग्राम-प्रशासन, न्याय और पर्यावरण-रक्षा की प्राचीन व्यवस्था है। 5 देव गाँव के भौतिक पक्ष (जमीन, फसल, सीमा) के प्रतीक हैं और 2 देवियाँ जैविक-सामाजिक सुरक्षा (रोग, संकट) की प्रतीक हैं। इसे सहेजना छत्तीसगढ़ की आत्मा को सहेजना है।
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*संदर्भ ग्रंथ सूची*
1. Russell, R.V. & Hiralal - _The Tribes and Castes of the Central Provinces of India_, Vol. IV, 1916.
2. _Central Provinces District Gazetteers_ - Raipur (1909), Bilaspur (1910).
3. _Raipur District Gazetteer_ (Govt. of M.P., 1973 Reprint).
4. शुक्ल, हीरालाल - _छत्तीसगढ़ का जनजातीय इतिहास_, 2001.
5. वर्मा, नरेन्द्र देव - _छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य का अध्ययन_, म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी.
6. दुबे, श्यामाचरण - _छत्तीसगढ़ के आदिवासी_, 1949.
7. लोकगीत संग्रह - जसगीत, माता सेवा, ददरिया (इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ प्रकाशन).
8. क्षेत्रीय साक्षात्कार - कोरवा बस्ती (जशपुर), कंवर बस्ती (रायगढ़), 2024-25.
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*डॉ. अनिल कुमार भतपहरी*
प्राध्यापक
वीरांगना रमोतीन माड़िया आदर्श महिला महाविद्यालय
नारायणपुर, बस्तर (छ.ग.)
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