Tuesday, August 18, 2026

बुद्ध और गुरुघासीदास के दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन

बौद्ध, सत्व, सतनाम, धम्म और पंथ : तथागत बुद्ध एवं गुरु घासीदास के दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन


डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
प्राध्यापक, वीरांगना रमोतीन माड़िया आदर्श महाविद्यालय, नारायणपुर, छत्तीसगढ़
Email: anilbhatphahari@gmail.com

सार (Abstract - Hindi)

प्रस्तुत शोध पत्र में भारतीय चिंतन परम्परा के पाँच मूलभूत पारिभाषिक शब्दों - बौद्ध, सत्व, सतनाम, धम्म और पंथ का दार्शनिक एवं व्युत्पत्तिपरक विश्लेषण किया गया है। शोध यह स्पष्ट करता है कि बौद्ध का अर्थ बोध-प्राप्त व्यक्ति के सान्निध्य से विवेकवान बना व्यक्ति है, सत्व का अर्थ किसी जड़-चेतन पदार्थ के सार-तत्व से है, तथा सतनाम उस सत्व की पहचान है। शोध में सत और सत्य के दार्शनिक भेद को उदाहरण सहित विवेचित किया गया है - जैसे लकड़ी का जलना एक सत्य (घटना) है जबकि उसकी ज्वलनशीलता उसका सत (स्थायी सत्व) है। इसी प्रकार धर्म को अंतःकरण में धारण करने योग्य सद्गुण और धम्म/पंथ को उस तक पहुँचने के व्यावहारिक मार्ग के रूप में परिभाषित किया गया है। पाली व्युत्पत्ति के अनुसार धम्म = धृ + म = धारण करना, जैसा कि धम्मपद में कहा गया है - "धम्मो हवे रक्खति धम्मचारिं"। तुलनात्मक अध्ययन से यह सिद्ध होता है कि तथागत बुद्ध और गुरु घासीदास दोनों ही अवतार न होकर पंथ-प्रवर्तक थे, जिन्होंने वैदिक कर्मकांड, वर्ण-व्यवस्था, मूर्तिपूजा और पुरोहितवाद का विरोध कर समता, अहिंसा, जीव-दया और सत्य पर आधारित आचरण-मार्ग दिया। जैतखाम का मूर्तिविहीन श्वेत ध्वज इसी निराकार, आचरण-प्रधान दर्शन का प्रतीक है।

Abstract (English)

The present research paper attempts to philosophically and etymologically analyze five fundamental concepts - Bauddha, Satva, Satnam, Dhamma and Panth. The paper clarifies that Bauddha means one who becomes wise in the company of an enlightened one (one who has attained Bodh), Satva means the essence of an object or being, and Satnam is the identity of that essence. The study explains the philosophical difference between Sat and Satya with examples - burning of wood is Satya (an event), while its combustibility is Sat (its permanent essence). Similarly, speaking truth is Satya, but being truthful is Sat. The study distinguishes between Dharma as an internal virtue to be imbibed and Dhamma/Panth as a practical path of life. Etymologically, Dhamma in Pali is derived from Dhri + Ma = to sustain, as stated in Dhammapada - "Dhammo have rakkhati Dhammacharin". Through a comparative study of Tathagat Buddha and Guru Ghasidas, the paper establishes that both were Panth-pravartak and not incarnations, who opposed Vedic ritualism, Varna system, idol worship and priesthood and gave a path based on equality, non-violence, compassion and truth. The white flag of Jaitkham, without an idol, is a symbol of this formless and conduct-based philosophy.

बीज शब्द / Keywords

बौद्ध, सत्व, सतनाम, धम्म, पंथ, गुरु घासीदास, सतनाम पंथ, बौद्ध दर्शन / Bauddha, Satva, Satnam, Dhamma, Panth, Guru Ghasidas, Satnami Panth, Buddhist Philosophy

1. प्रस्तावना

भारतीय चिंतन परम्परा में शब्द केवल शब्द नहीं, बल्कि दर्शन हैं। बौद्ध, सत्व, सतनाम, धम्म और पंथ जैसे शब्दों को सामान्यतः धर्म या संप्रदाय के पर्याय के रूप में समझ लिया जाता है, जबकि इनका दार्शनिक अर्थ अत्यंत व्यापक और व्यावहारिक है। छत्तीसगढ़ की संत परम्परा और बौद्ध धम्म में इन शब्दों का विशेष महत्व है। बौद्ध धम्म जहाँ विश्व स्तर पर समता और करुणा का मार्ग प्रशस्त करता है, वहीं छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास प्रवर्तित सतनाम पंथ उसी समता-मूलक चेतना का स्थानीयकृत, किन्तु सार्वभौमिक रूप है। प्रस्तुत शोध पत्र में इन अवधारणाओं का मूल पाली साहित्य, संत साहित्य और क्षेत्रीय अवलोकन के आधार पर विश्लेषण किया गया है।

2. साहित्य समीक्षा

बौद्ध साहित्य में 'बोध' और 'सत्व' की व्याख्या त्रिपिटक के सुत्तपिटक एवं धम्मपद में मिलती है। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने 'बुद्ध और उनका धम्म' (1957) में धम्म को धर्म से पृथक जीवन-मार्ग बताया है और उसे सदाचरण का पर्याय माना है। सतनाम पंथ पर डॉ. हीरालाल शुक्ल ने 'छत्तीसगढ़ की संत परम्परा और गुरु घासीदास' में, डॉ. सौरभ सिंह एवं कुबेर सिंह उइके ने गुरु घासीदास के सात सिद्धांतों को सद्गुण-आधारित धर्म के रूप में स्थापित किया है। लेखक की स्वयं की कृति 'गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ' (भतपहरी, 2023) में गिरौदपुरी धाम के क्षेत्रीय अवलोकन के आधार पर जैतखाम के प्रतीकवाद का विवेचन किया गया है। अभी तक बौद्ध धम्म और सतनाम पंथ के पारिभाषिक शब्दों का तुलनात्मक दार्शनिक अध्ययन अपेक्षित रहा है, जिसकी पूर्ति का प्रयास यह शोध पत्र करता है।

3. शोध के उद्देश्य

1. बौद्ध, सत्व, सतनाम, धम्म और पंथ शब्दों की व्युत्पत्ति और दार्शनिक अर्थ स्पष्ट करना।
2. सत और सत्य के अंतर को उदाहरण सहित दार्शनिक दृष्टि से विवेचित करना।
3. धर्म और पंथ/धम्म के अंतर को स्पष्ट करना।
4. तथागत बुद्ध और गुरु घासीदास के प्रवर्तन में समानता का तुलनात्मक अध्ययन करना।

4. शोध प्रविधि

प्रस्तुत शोध वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है। इसमें प्राथमिक स्रोत के रूप में पाली त्रिपिटक, धम्मपद, गुरु घासीदास के अमृतवाणी एवं सात उपदेश तथा द्वितीयक स्रोत के रूप में संबंधित शोध ग्रंथ, पत्रिकाएँ और क्षेत्रीय अवलोकन (गिरौदपुरी, जैतखाम) का उपयोग किया गया है। शोध में तुलनात्मक दर्शन पद्धति का भी अनुप्रयोग किया गया है।

5. विषय विवेचन

5.1 बौद्ध : बोध से बौद्ध तक

बौद्ध शब्द 'बोध' से बना है। बोध अर्थात ज्ञान की समझ, जागरूकता। जिसे ज्ञान का बोध हो गया, जिसकी अविद्या नष्ट हो गई, वह बुद्ध। और बुद्ध के सान्निध्य, विचार और आचरण से जिसमें समझ विकसित हुई, वह बौद्ध। अतः बौद्ध होना किसी जाति या संप्रदाय में जन्म लेना नहीं, बल्कि ज्ञानी और विवेकशील होना है। बौद्ध धम्म में बोधिसत्व की कल्पना इसी का विस्तार है।

5.2 सत्व : सार-तत्व की अवधारणा

बौद्ध धम्म में सत्व का अर्थ सार तत्व है। जड़ पदार्थों में लकड़ी, लोहा, चावल, मिट्टी का सार और चेतन में चींटी, हाथी, मनुष्य की प्रवृत्ति-प्रकृति, गुण-अवगुण का निचोड़ ही सत्व है। सत्व ही किसी पदार्थ या प्राणी की वास्तविक पहचान का आधार है। बोधिसत्व वह है जिसने प्राणिमात्र के सत्व को समझ लिया है।

5.3 सतनाम : सत्व की पहचान का दर्शन

यह दो शब्दों से मिलकर बना है - सत + नाम। सत यानी सत्व या सार और नाम यानी उसकी पहचान, संज्ञा। अतः किसी जड़-चेतन के सत्व और उसकी पहचान का बोध ही सतनाम है।

सत और सत्य में दार्शनिक अंतर: सत व्यापक है, सत्य उसका एक अंश मात्र है। सत में सत्य समाहित है, पर सत्य में सत नहीं। उदाहरणार्थ - (1) लकड़ी का जलना एक सत्य है (एक घटना, एक समय की सच्चाई), पर लकड़ी में निहित ज्वलनशीलता का गुण उसका सत है (उसका स्थायी सत्व)। (2) मनुष्य द्वारा सच बोलना सत्य है, पर सत्यनिष्ठ होना, सत्य को जीवन-मूल्य के रूप में धारण करना सत है।

इसीलिए बौद्ध परम्परा में बुद्ध को 'सच्चनाम' (सत्य नाम वाला) कहा गया है और सतनाम पंथ में गुरु घासीदास को 'सतनाम बाबा'। यह किसी व्यक्ति का नाम न होकर एक व्यापक दर्शन है - सत्व की पहचान।

5.4 धम्म और पंथ : धर्म तक पहुँचने का मार्ग

धम्म पाली शब्द है। इसकी व्युत्पत्ति धृ धातु से है, जिसका अर्थ है धारण करना। धम्म = धृ + म। जो धारण करने योग्य है, जो जीवन को धारण करता है, वह धम्म। धम्मपद में कहा गया है - "धम्मो हवे रक्खति धम्मचारिं" अर्थात धम्म ही धम्म पर चलने वाले की रक्षा करता है।

धर्म और धम्म/पंथ में अंतर: धर्म वह सद्गुण है जो अंतःकरण में धारण किया जाता है - जैसे सत्य, अहिंसा, करुणा। जबकि धम्म या पंथ उस धर्म तक पहुँचने का व्यावहारिक रास्ता है, जीवन-पद्धति है। पंथ शब्द पथ से बना है। सामान्य पथ पर शरीर चलता है, पंथ पर मन, बुद्धि और विवेक चलता है। पंथ एक अनुशासित जीवन-मार्ग है। इसीलिए डॉ. अम्बेडकर धम्म को धर्म से पृथक, एक नैतिक जीवन-मार्ग मानते हैं।

5.5 तथागत बुद्ध और गुरु घासीदास में समानता : एक तुलनात्मक अध्ययन

दोनों महापुरुषों में अद्भुत समानता है। दोनों ने वैदिक कर्मकांड, यज्ञ, बलि-प्रथा और वर्ण-व्यवस्था का तीव्र विरोध किया। बुद्ध ने बोधगया में पीपल वृक्ष के नीचे कठोर तप के बाद बोध प्राप्त कर धम्म दिया, गुरु घासीदास ने गिरौदपुरी के जंगल में छाता पहाड़ पर 6 माह की कठोर तपस्या के बाद सतनाम पंथ का प्रवर्तन किया। दोनों ने नया ईश्वर नहीं, नया आचरण दिया। दोनों पंथ-प्रवर्तक हैं, अवतार नहीं।

गुरु घासीदास के सात सिद्धांत - 1. मनखे-मनखे एक समान, 2. सत्य ही ईश्वर है, 3. अहिंसा, 4. जीव दया, 5. मांसाहार त्याग, 6. मदिरा त्याग, 7. चोरी-जुआ से दूरी - ये कर्मकांड नहीं, सद्गुण हैं, धर्म हैं। इसीलिए सतनाम पंथ में मूर्तिपूजा, पुरोहितवाद, जातिभेद नहीं है। जैतखाम में मूर्ति नहीं, केवल श्वेत ध्वज है जो सत्य, शांति और पवित्रता का प्रतीक है।


तथागत बुद्ध और गुरु घासीदास का तुलनात्मक सार:

तुलना बिंदु

तथागत बुद्ध

गुरु घासीदास

तप-स्थल

बोधगया (बिहार)

गिरौदपुरी (छत्तीसगढ़)

काल

6ठी शताब्दी ई.पू.

18वीं-19वीं शताब्दी (1756-1850)

प्रमुख विरोध

वैदिक यज्ञ, वर्णवाद

जातिवाद, पुरोहितवाद, मूर्तिपूजा

मूल सिद्धांत

पंचशील, अष्टांगिक मार्ग, मध्यम मार्ग

सात सिद्धांत, मनखे-मनखे एक समान

ईश्वर संबंधी दृष्टि

अनीश्वरवादी, आचरण प्रधान

सतनाम - निराकार सत्य को ईश्वर माना

प्रतीक

धम्मचक्र

जैतखाम - श्वेत ध्वज

स्वरूप

पंथ-प्रवर्तक, अवतार नहीं

पंथ-प्रवर्तक, अवतार नहीं

6. निष्कर्ष

निष्कर्षतः बौद्ध, सत्व, सतनाम, धम्म और पंथ एक ही दार्शनिक श्रृंखला की कड़ियाँ हैं। बोध से सत्व का ज्ञान होता है, सत्व की पहचान सतनाम है, और उस सतनाम तक पहुँचने का मार्ग धम्म या पंथ है। बौद्ध धम्म और सतनाम पंथ दोनों भारतीय समता-मूलक चिंतन के दो महत्वपूर्ण आचरण-पद्धति हैं जो मानव को बाह्य आडंबर, कर्मकांड और जातिगत भेदभाव से हटाकर आंतरिक शुद्धता, समता और करुणा की ओर ले जाते हैं। दोनों ही पंथ आज के सामाजिक विद्वेष और असमानता के युग में अत्यंत प्रासंगिक हैं। श्वेत ध्वज का श्वेत रंग इसी सत्य और समता का शाश्वत संदेश है।

संदर्भ ग्रंथ सूची (References - APA 7th Edition)

1. अम्बेडकर, बी. आर. (1957). बुद्ध और उनका धम्म. सिद्धार्थ प्रकाशन.

2. भतपहरी, डॉ. अनिल कुमार (2023). गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ. [प्रकाशक का नाम जोड़ें], रायपुर.

3. भतपहरी, डॉ. अनिल कुमार (2024). गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ : क्षेत्रीय अवलोकन - गिरौदपुरी धाम. क्षेत्रीय शोध पत्र.

4. त्रिपिटक, सुत्तपिटक, धम्मपद. (पाली).

5. शुक्ल, हीरालाल. (2015). छत्तीसगढ़ की संत परम्परा और गुरु घासीदास. रजत प्रकाशन.

6. घासीदास, गुरु. अमृतवाणी एवं सात उपदेश. सतनाम प्रकाशन, गिरौदपुरी.

7. सिंह, सौरभ एवं उइके, कुबेर सिंह. सतनाम पंथ के सामाजिक आयाम.

घोषणा

यह शोध पत्र मौलिक, अप्रकाशित है तथा इसमें प्रस्तुत विचार लेखक के निजी अध्ययन एवं क्षेत्रीय अवलोकन पर आधारित हैं।

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