दक्षिणापथ कोसल का वस्त्र कोसा : सिरपुर से कषाय तक की यात्रा
- डॉ. अनिल भतपहरी
प्रस्तावना:
छत्तीसगढ़ का इतिहास केवल राजवंशों का इतिहास नहीं, वस्त्र और संस्कृति का भी इतिहास है। मेरे अध्ययन का एक सूत्र कहता है -
सिरपुर नरेश सद्वाह विज्जस भट्टप्रहरी ने राजकीय अतिथि बुद्ध को एक सहस्त्र कोसा वस्त्र भेंट किए। तब कोसा ही बौद्ध भिक्षुओं के वस्त्र कषाय के नाम से विख्यात हुई।
इस एक पंक्ति में राजनीति, आतिथ्य और अध्यात्म तीनों गुंथे हैं।
1. सिरपुर - श्रीपुर - दक्षिण कोसल की राजधानी
महानदी के तट पर बसा सिरपुर, जिसका प्राचीन नाम श्रीपुर है, एक विशाल नगर हुआ करता था तथा यह दक्षिण कोसल की राजधानी थी। यहाँ पाँचवी से आठवीं शताब्दी के मध्य हिंदू, बौद्ध और जैन स्थापत्य एक साथ फले-फूले। सिरपुर को इसीलिए सांस्कृतिक समन्वय की राजधानी कहा जाता है।
पुरावंशावली के अनुसार इस श्रीपुर पर सोमवंशी और पाण्डुवंशी नरेशों के साथ-साथ स्थानीय भट्टप्रहरी कुल के सद्वाह विज्जस जैसे धर्मपरायण राजाओं ने शासन किया।
2. राजकीय अतिथि बुद्ध का आगमन
बौद्ध ग्रंथों में बुद्ध के दक्षिणापथ गमन के उल्लेख मिलते हैं। जब तथागत सिरपुर पधारे, तो वे यहाँ राजकीय अतिथि के रूप में रहे। उस काल में अतिथि को राज्य की सर्वोत्तम वस्तु भेंट करने की परम्परा थी। दक्षिण कोसल की सर्वोत्तम वस्तु थी - **कोसा**।
3. कोसा ही क्यों?
कोसा सामान्य रेशम नहीं है। यह जंगल के साल, साजा और अर्जुन वृक्षों पर पलने वाले टसर कीट के कोये से बनता है। इसका प्राकृतिक रंग ही हल्का सुनहरा-भूरा, गेरुआ होता है। इसे रसायन से रंगना नहीं पड़ता।
बौद्ध विनय में भिक्षु के वस्त्र के लिए कहा गया है - वह ऐसा हो जो गृहस्थ के भोग-वस्त्र जैसा न लगे, जो त्याग का प्रतीक हो। इसी रंग को कषाय कहा गया - अर्थात जो रंजित, शोधित और वैराग्य का द्योतक हो।
सिरपुर नरेश ने बुद्ध और उनके संघ को एक सहस्त्र कोसा वस्त्र भेंट किए। कोसा का वह प्राकृतिक कषाय रंग, उसकी सादगी और उसकी टिकाऊपन - तीनों बौद्ध चीवर के आदर्श के अनुरूप थे। तभी से -
दक्षिणापथ कोसल का वस्त्र कोसा, बौद्ध जगत में कषाय के नाम से विख्यात हुआ।
निष्कर्ष:
इस प्रकार कोसा केवल एक वस्त्र नहीं रहा, वह एक विचार बन गया। वह राजा के दान, बुनकर के श्रम और भिक्षु के त्याग को एक ही ताने-बाने में जोड़ता है। आज जब हम छत्तीसगढ़ के कोसा को देखते हैं, तो हमें उसी सिरपुर की राजसभा और उसी अतिथि-सत्कार की गंध आती है।
राजा ने दिया, मुनि ने लिया, रंग वही रहा - त्याग का।
यह परम्परा सिद्ध करती है कि छत्तीसगढ़ का कोसा बाजार की वस्तु बाद में है, धर्म-संस्कृति की पहचान पहले है।
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