Monday, August 17, 2026

पुरखौती मुक्तांगन में सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ की झलक हो

रजत उत्सव के अवसर पर : पुरखौती मुक्तांगन में मध्य छत्तीसगढ़ की अनुपस्थिति

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 25 किलोमीटर दूर नवा रायपुर बसाया गया है, जो सतनामी बाहुल्य 27 ग्रामों को समाहित कर बना है। यह परिक्षेत्र आरंग विधानसभा के अधीन है। यहाँ मंत्रालय, संचालनालय, विधानसभा, राजभवन तथा मुख्यमंत्री एवं मंत्रियों के निवास हैं। साथ ही अधिकारी-कर्मचारी सहित आम नागरिकों की बसाहट हेतु इसे 33 सेक्टरों में विभक्त किया गया है। वर्तमान में लगभग 5 लाख लोगों की बसाहट की क्षमता से युक्त नवा रायपुर में बस, रेल, अस्पताल, स्कूल-कॉलेज जैसी सभी आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध हैं। साथ ही यहाँ धार्मिक, प्राकृतिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक दर्शनीय स्थल विकसित किए जा रहे हैं, ताकि नागरिकों की आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ स्वस्थ मनोरंजन एवं ज्ञानवर्धन हो सके।

इनमें प्रमुख हैं - पुरखौती मुक्तांगन, जंगल सफारी, आदिवासी संग्रहालय, मॉल, सिनेमागृह और प्रस्तावित फिल्मसिटी।

परन्तु खेद का विषय है कि छत्तीसगढ़ के मध्य भाग की सांस्कृतिक गतिविधियों और जनजीवन को संरक्षित करने वाला कोई प्रखंड या संग्रहालय पुरखौती मुक्तांगन में नहीं है। इस विषय पर चर्चा तक नहीं होती, जबकि इसकी नितांत आवश्यकता है।

छत्तीसगढ़ का वैभव रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, मुंगेली, कवर्धा, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, बलौदाबाजार, बेमेतरा, महासमुंद, धमतरी जिलों में निवासरत करोड़ों लोगों की रहन-सहन, सांस्कृतिक गतिविधियों, मेले-मड़ई, उत्सव आदि की जानकारी हेतु एक स्मारक या संस्थान होना चाहिए। इसकी कमी खलती है। बाहर से आए पर्यटकों, शोधार्थियों एवं अध्येताओं को छत्तीसगढ़ का वास्तविक बोध नहीं हो पाता।

छत्तीसगढ़ प्राकृतिक और भौगोलिक रूप से तीन भागों में विभक्त है - उत्तर में सरगुजा का पाट, मध्य में छत्तीसगढ़ का मैदान और दक्षिण में बस्तर का पठार। पूर्व में महानदी के पावन प्रवाह वाली लरिया अंचल तो पश्चिम में डोंगरगढ़, भोरमदेव, सतपुड़ा-मैकल श्रेणी में अवस्थित चिल्फी घाटी की हसीन वादियाँ हैं। इन सभी क्षेत्रों की भाषा, कला और संस्कृति भी भिन्न है।

प्रदेश की इन विशेषताओं और महत्ता को एक ही स्थान पर कुछ घंटों में सामान्य रूप से समझाने हेतु ही पुरखौती मुक्तांगन की परिकल्पना की गई थी। यहाँ सरगुजा और बस्तर प्रखंड तो हैं, परन्तु मध्य छत्तीसगढ़ का कोई स्वतंत्र प्रखंड नहीं है। इस कारण यहाँ की सांस्कृतिक प्रस्तुति में अनेक कमियाँ नजर आती हैं। बाहरी पर्यटकों को लगता है कि छत्तीसगढ़ केवल आदिम जनजीवन और नाच-गान वाला, अत्यंत पिछड़ा वनांचल राज्य है। मंचीय प्रस्तुतियों में भी लोक-संस्कृति के नाम पर यही भाव प्रदर्शित होते हैं।

जबकि मध्य छत्तीसगढ़ का गौरवशाली एवं सौंदर्यबोधक वस्त्राभूषण, साबुत अनाज पर आधारित खान-पान और रहन-सहन किसी भी राज्य से कमतर नहीं है। यहाँ की भाषा और उसमें उपलब्ध साहित्य-दर्शन अत्यंत उत्कृष्ट है। लोक-कलाएँ विविधतापूर्ण और समृद्ध हैं। किसी राज्य में एक-दो या पाँच लोक-नृत्य होंगे, परन्तु यहाँ स्त्री-पुरुषों के पृथक और युगल दर्जनों नृत्य-शैलियाँ हैं - पंथी, राउत नाचा, करमा, सुआ, शैला, रीलो, बार, सरहुल, ककसार, डंडा, मांदरी, रहस, छैला, देवार नृत्य जैसी विशिष्ट शैलियाँ। शास्त्रीय नृत्य में रायगढ़ घराना और खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय तो लोक और शास्त्रीय संगीत की साधना-स्थली हैं, जहाँ देश-विदेश से कलावंत आते हैं और सीख कर जाते हैं।

अनेक पर्व, उत्सव, मेले-मड़ई, हाट-बाजार यहाँ की पहचान हैं। और जनजीवन तो अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा थोड़े में संतुष्ट, संत-संस्कृति का संवाहक है। यह प्राचीन सहजयान, महायान, नाथ, सिद्ध, शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध, जैन संस्कृति की समन्वय स्थली है, जहाँ आर्य-अनार्य संस्कृति का समागम होता है। दक्षिणापथ के नाम से विख्यात यह सातवाहनों की धरती है, जहाँ अनेक ख्यातिनाम भट्ट और प्रहरी हुए हैं। सम्राट महाशिवगुप्त बालार्जुन, जिनके समय में बुद्ध की प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा राजधानी सिरपुर में हुई, वहीं नागार्जुन, आनंदप्रभु जैसे आचार्य हुए। वल्लभाचार्य, कबीर, धर्मदास, गुरु घासीदास, अमरदास, विवेकानंद, महेश योगी, संत गहिरा गुरु, ओशो, स्वामी आत्मानंद, पवन दीवान जैसे संतों को जन्म और आकार देने वाली यह शस्य-श्यामला धरती है। इसलिए जैसे उत्तराखंड और हिमाचल को देवभूमि कहते हैं, वैसे ही छत्तीसगढ़ को संतभूमि कहा जाता है।

सिरपुर, राजिम, शिवरीनारायण, गिरौदपुरी, दामाखेड़ा, तुमान, ताला, मल्हार, चैतुरगढ़, डमरू, आरंग, रीवा, खल्लारी, चंद्रपुर, डोंगरगढ़, भोरमदेव, रतनपुर, दल्हा, जलेश्वर जैसे ऐतिहासिक-धार्मिक नगरी आस्था के केंद्र हैं। छत्तीसगढ़ में तीन साक्षात त्रिवेणी संगम - राजिम, पैरी-पैरी संगम और शिवरीनारायण में हैं, जहाँ कल्प-कुंभ किए जा सकते हैं, जो अन्यत्र दुर्लभ हैं। कोरबा, भिलाई, चिरमिरी, नगरनार, तमनार जैसे औद्योगिक तीर्थ और गंगरेल, हसदेव जैसे विशालकाय बाँध भी दर्शनीय हैं।

इनके संरक्षक बलिदानी राजाओं में कल्याणसाय, गुरु बालकदास, गेंदसिंह, वीर नारायण सिंह, गुण्डाधूर, मुंदरा मांझी, प्रवीरचंद्र भंजदेव जैसे रत्न हैं।

गौरक्षा आंदोलन (1915) के प्रणेता राजमहंत नयनदास, महिलांग, गुरु गोसाईं अगमदास, जंगल सत्याग्रह के नायकों में बूढ़ान शाह, रामचरण, दयावती कंवर, तो नहर सत्याग्रह में नारायण मेघावाले, छोटेलाल तथा सामाजिक क्रांति और मंदिर प्रवेश के लिए पं. सुंदरलाल शर्मा, पं. मिलऊदास कोसरिया, पं. तुलाराम तुलाई जैसे लोगों के कारण स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि बनी, जिसमें मिनीमाता, राधाबाई, दयावती कंवर, राजमोहिनी देवी जैसी मातृशक्तियों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

कला-जगत में मंदराजी, रामचंद्र देशमुख, महासिंह चंद्राकर, दानी दरबारी, चंपा-बरसन, हबीब तनवीर, शेख हुसैन, देवदास बंजारे, सुकालदास भतपहरी, मेहत्तर साहू, गंगाराम शिवारे, नारायण वर्मा, झाडूराम देवांगन सहित पंडवानी की पुरखिन दाई सुखबती, लक्ष्मी बंजारे, तीजनबाई, सूरज बाई, फिदाबाई, मालाबाई जैसी मौलिक सितारा कलाकार हैं, जिनका अनुसरण कर लोग प्रसिद्धि के शिखर को स्पर्श करते आ रहे हैं।

साहित्यकारों में ठाकुर जगमोहन सिंह, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, पद्मश्री मुकुटधर पांडेय, लोचनप्रसाद पांडेय, मुक्तिबोध, मनोहरदास, द्वारिका प्रसाद तिवारी, हरि ठाकुर, प्रमोद वर्मा, केयूर भूषण, मदनलाल गुप्त, पं. सुकुलदास घृतलहरे, श्यामा प्रसाद बघेल, शानी, लक्ष्मण मस्तुरिया, सुशील यदु, श्यामलाल चतुर्वेदी, लाल जगदलपुरी, हरिहर वैष्णव इत्यादि अनेक साधक हैं।

इन सभी की स्मृतियाँ, मध्य छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएँ और जीवन-स्तर की झलकियाँ भी उक्त ओपन म्यूजियम "पुरखौती मुक्तांगन" में होनी चाहिए, ताकि लोगों को छत्तीसगढ़ की विविधता और एक साथ आदिम जीवन और आधुनिक जीवन-शैली का साक्षात्कार हो सके। प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी के अनुसार - "एक साथ 10वीं और 21वीं सदी की जीवन-शैली देखना हो तो आइए, अमीर धरती के गरीब लोगों की धरती छत्तीसगढ़ में आपका स्वागत है।"

राज्य के पच्चीसवें वर्ष, रजत जयंती के इस पावन अवसर पर यह आवश्यक है कि राज्य की सर्वाधिक बसाहट वाले मध्य क्षेत्र के सांस्कृतिक तत्वों की जाने-अनजाने में अनदेखी न हो और देश के नागरिकों को राज्य के तीनों प्रखंडों के सांस्कृतिक वैभव की झलक पुरखौती मुक्तांगन प्रांगण में सहज दर्शनीय हो। तभी अनेक विरोधाभासों का सम्यक समाधान तलाशा जा सकेगा और सुखी-समृद्ध छत्तीसगढ़ गढ़ा जा सकेगा।

जय छत्तीसगढ़।

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