Monday, August 17, 2026

भारतीय समाज में दलित एवं स्त्री की स्थिति

UGC CARE FORMAT RESEARCH PAPER

Title: भारतीय समाज में दलित स्त्री का त्रि-आयामी शोषण: स्मृति-पुराणों में विधान, भक्ति आंदोलन में प्रतिरोध और औपनिवेशिक सुधारों का विधिक विश्लेषण

Author: डॉ. अनिल भतपहरी, प्राध्यापक नारायणपुर बस्तर  (छ.ग.)

Abstract (सार):
प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय जाति व्यवस्था के उस मिथक का खंडन करता है जिसमें सभी सामाजिक कुरीतियों को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की देन बताया जाता है। प्राथमिक स्रोतों - मनुस्मृति, पराशर स्मृति, स्कंद पुराण, जाति भास्कर, औपनिवेशिक गजेटियर, बंगाल सती रेगुलेशन 1829 और समकालीन NCRB/SC-ST एक्ट रिपोर्टों के विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है कि दलित स्त्री का शोषण द्वि-स्तरीय था - जातिगत और लैंगिक। मनुस्मृति में शूद्रों की शिक्षा (अध्याय 4, श्लोक 78-81) और संपत्ति पर रोक तथा शूद्र स्त्री से विवाह को पतित करने वाला विधान (अध्याय 3, श्लोक 13) मिलता है। पुराणों में देवदासी प्रथा को स्वर्ग प्राप्ति का पुण्य बताया गया है। इसके विरुद्ध पहला वैचारिक प्रतिरोध 14वीं-15वीं सदी के दलित संतों - रविदास, चोखामेला, नंदनार, कबीर ने किया। दूसरा विधिक प्रतिरोध राजा राममोहन राय और ज्योतिराव फुले के नेतृत्व में ब्रिटिश विधि निर्माण (सती उन्मूलन 1829, विधवा पुनर्विवाह 1856, दलित कन्या शाला 1848) के रूप में आया। यह पत्र सिद्ध करता है कि बहुसंख्यक समाज को वास्तविक नागरिक अधिकार भारतीय संविधान से प्राप्त हुए।

Keywords: मनुस्मृति, मूलाकरम, देवदासी, दलित नारीवाद, सती उन्मूलन, भक्ति आंदोलन, ज्योतिराव फुले

1. प्रस्तावना
भारतीय समाज वर्ण, जाति, गोत्र में विभक्त रहा है। आपके द्वारा उद्धृत "डोम चमार चांडाल, जे वर्णाधम तेली कुम्हारा" पंक्ति तुलसीदास कृत रामचरितमानस में नहीं, बल्कि सामाजिक लोक-व्यवहार में प्रचलित जातिगत निंदा का उदाहरण है। जाति भास्कर (1910) और जाति रहस्य जैसे ग्रंथों में 3000 से अधिक जातियों का श्रेणीक्रम दिया गया है। प्रश्न यह है कि क्या यह विभाजन औपनिवेशिक है?

2. साहित्य समीक्षा (Review of Literature)
अंबेडकर (1936) ने Annihilation of Caste में मनुस्मृति को जाति का सैद्धांतिक आधार बताया। मेनू एस. पिल्लई (2022) ने त्रावणकोर के मूलाकरम को लैंगिक कर नहीं, बल्कि जातिगत जनगणना कर सिद्ध किया। पंडित (2023) ने स्कंद पुराण में देवदासी के उल्लेख को धार्मिक वेश्यावृत्ति का वैधीकरण माना है। इस शोध में इन स्रोतों का समन्वय किया गया है।

3. शोध उद्देश्य
1. स्मृति-पुराणों में दलित स्त्री संबंधी दंड-विधान की पहचान। 2. भक्ति काल के दलित संतों की संवेदनशीलता का विश्लेषण। 3. ब्रिटिश सुधारों की भूमिका का तथ्यात्मक मूल्यांकन। 
4. शोध प्रविधि (Methodology)
यह गुणात्मक, ऐतिहासिक-विश्लेषणात्मक शोध है। प्राथमिक स्रोत: मनुस्मृति के मूल श्लोक, स्कंद पुराण - पुरुषोत्तम क्षेत्र माहात्म्य, बंगाल सती रेगुलेशन XVII, 1829। द्वितीयक स्रोत: UGC CARE जर्नल, The Hindu आर्काइव, NDTV/SC-ST एक्ट FIR।

5. विश्लेषण और विवेचना

5.1 स्मृति साहित्य में दलित स्त्री का शोषण
• मनुस्मृति 1.91: "एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् - एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया" अर्थात शूद्र का एक ही कर्म है - तीन वर्णों की सेवा। • मनुस्मृति 4.78-81: "न शूद्राय मतिं दद्यात्... शूद्र शिक्षा के अयोग्य है"।   • मनुस्मृति 8.270: "एकजातिर्द्विजातींस्तु वाचा दारुणया क्षिपन् जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदम्" अर्थात शूद्र यदि द्विज को अपशब्द कहे तो जीभ काट दी जाए।   • मनुस्मृति 3.13: "शूद्रैव भार्या शूद्रस्य" - शूद्र की पत्नी केवल शूद्रा ही हो। अंतर्जातीय विवाह निषेध से दलित स्त्री का विवाह विकल्प सीमित हुआ। • स्त्री के प्रति: "स्वभाव एष नारिणां नराणामिह दूषणम्" - स्त्रियों का स्वभाव पुरुषों को दूषित करना है, अतः उन्हें स्वतंत्र न छोड़ा जाए। 
5.2 पुराण और लोक में शोषण के रूप
• देवदासी: स्कंद पुराण में उल्लेख है कि मंदिर में नाचने वाली कन्या दान करने से स्वर्ग प्राप्त होता है। इसका आरंभ 5वीं सदी में माना जाता है। आधुनिक अध्ययनों में इसे "अनुसूचित जाति की नाबालिग लड़कियों का मंदिर पुजारियों द्वारा यौन शोषण" कहा गया है।   • मूलाकरम (Breast Tax): त्रावणकोर में थलाकरम (पुरुषों से सिर कर) और मूलाकरम (महिलाओं से) नामक जनगणना कर था। निचली जाति की महिलाओं को स्तन ढकने पर यह कर देना पड़ता था। नंगेली ने 19वीं सदी में इसका विरोध करते हुए अपने स्तन काट दिए।   • काशी करवट, गंगावतरण, रथयात्रा: औपनिवेशिक विवरणों में इन आत्मघाती धार्मिक प्रथाओं का उल्लेख मिलता है। 
5.3 संतों की संवेदना - प्रतिरोध का स्वदेशी स्वर
• संत रविदास (चमार), संत चोखामेला (महार) - 14वीं सदी में महाराष्ट्र में चोखामेला ने 70 से अधिक अभंग लिखे जो दलित अनुभव की प्रथम साहित्यिक अभिव्यक्ति हैं।   • कबीर (जुलाहा), नंदनार (परैयर), बसवन्ना - भक्ति आंदोलन में इन्होंने जाति पदानुक्रम को नकारा और आध्यात्मिक समानता का प्रचार किया। डॉ. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक The Untouchables इन्हीं संतों को समर्पित की।   
5.4 अंग्रेजी सुधार - मिथक बनाम तथ्य
• सती उन्मूलन 1829: 1815-18 में बंगाल में सती 378 से 839 हो गई थी। लार्ड विलियम बेंटिक ने राजा राममोहन राय के दबाव में 4 दिसंबर 1829 को रेगुलेशन XVII द्वारा इसे हत्या घोषित किया।   • शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह: ज्योतिराव फुले ने 1848 में शूद्र-अतिशूद्र कन्याओं के लिए और 1852 में महार-मांग बच्चों के लिए स्कूल खोले। उन्होंने सती और बाल विवाह के विरुद्ध अभियान चलाया। ब्रिटिश कानून ने 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित किया।   • घोड़ी-निषेध का वर्तमान: 2026 में भी दमोह (MP) में दिव्यांग दलित दूल्हे को घोड़ी से खींच कर पीटा गया और गुजरात में तलवारों से हमला हुआ। यह सिद्ध करता है कि जातिगत हिंसा औपनिवेशिक नहीं, संरचनात्मक है।   
6. निष्कर्ष
1. भारत में छुआछूत, अशिक्षा, देवदासी, मूलाकरम, सती जैसी कुरीतियाँ शास्त्र-प्रसूत हैं, औपनिवेशिक नहीं। 2. संतों ने सामाजिक चेतना दी, पर विधिक समाप्ति सुधार आंदोलन + औपनिवेशिक विधि से हुई। 3. रेल, डाक, आधुनिक शिक्षा की नींव औपनिवेशिक प्रशासन ने रखी, पर समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व भारतीय संविधान की देन है। 4. समृद्ध राष्ट्र का निर्माण मंदिर नहीं, अस्पताल, स्कूल और रोजगार से होगा। 
7. संदर्भ सूची (References - APA 7th Edition)
• Ambedkar, B. R. (1936). Annihilation of Caste. • Government of India. (1829). Bengal Sati Regulation XVII. Calcutta. • Manu. (2004). Manusmriti (Trans. G. Bühler). Sacred Books of the East, Vol. 25. • Pillai, M. S. (2022). Breast tax debate and Nangeli. The Hindu. • Velivada. (2021). Casteist Verses from Manusmriti. Retrieved from velivada.com • Times Now News. (2023). The Breast Tax That Enforced Caste in Travancore. • NDTV, The Print, Indian Express (2024-2026). Reports on Dalit groom horse-riding attacks in MP and Gujarat. 


Dr Anil Kumar Bhatpahari 
Professor 
Virangna Rmoteen Madiya Modle Women College Narayanpur CG 
anilbhatpahari@gmail.com 

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