Monday, August 24, 2026

अनेकता में एकता हमारी विशेषता का होते ह्रास

अनेकता में एकता के ह्रास का सर्वव्यापी संकट और सुसंस्कृत समुदाय की पुनर्रचना

भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र रहा है - अनेकता में एकता। अलग भाषा, अलग धर्म, अलग खान-पान, अलग वेश और अलग उपासना पद्धति के बावजूद एक ही चेतना में गूंथे रहना। यह केवल नारा नहीं था, यह हमारे जीने की पद्धति थी। आज उसी पद्धति में क्षरण स्पष्ट दिख रहा है और यह क्षरण अब किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं, सर्वव्यापी हो चला है।

1. ह्रास के लक्षण कैसे दिखते हैं?

यह ह्रास अचानक नहीं आया, इसके लक्षण धीरे-धीरे गहरे हुए हैं।

पहला लक्षण है - पहचान का संकुचन। पहले व्यक्ति स्वयं को पहले भारतीय मानता था, फिर बंगाली, मराठी, छत्तीसगढ़ी या पंजाबी। अब यह क्रम उलटता जा रहा है।

दूसरा लक्षण है - सहिष्णुता से असहिष्णुता की ओर बढ़ना। पहले मतभेद पर संवाद होता था। कबीर, नानक, तुलसी, तिरुवल्लुवर और सूफी संत अलग-अलग मार्गों से एक ही मानवता की बात करते थे। अब संवाद की जगह बहिष्कार और ट्रोलिंग ने ले ली है।

तीसरा लक्षण है - उत्सवों का बंटवारा। होली, ईद, पोंगल, क्रिसमस सबके उत्सव थे। अब कई स्थानों पर उत्सव भी 'हमारा-तुम्हारा' में बंट गए हैं।

2. ह्रास का विस्तार - घर से राष्ट्र तक

क) परिवार: जहाँ कभी साझा चूल्हा, साझा निर्णय और साझा भविष्य था, वहाँ अब हर सदस्य अपनी व्यक्तिगत अस्मिता में सिमट गया है। साथ रहना है, पर साथ सोचना नहीं।

ख) समाज और मतावलंबी: हम व्यक्ति को उसके विचार से नहीं, उसके लेबल से पहचानने लगे हैं। मत ही पहचान बन गया है।

ग) शासकीय, अशासकीय और निजी संस्थाएँ: यह सबसे चिंताजनक रूप है। जिस संस्था का लक्ष्य एक होना चाहिए, वह भीतर से बंटी हुई है। निजी क्षेत्र का उदाहरण बहुत सटीक है। जहाँ मालिक और मजदूर का हित एक-दूसरे पर टिका है, वहाँ भी एकता नहीं है। कारखाने में मजदूरों में ही एकता नहीं, क्योंकि उन्हें भीतर ही जाति, प्रदेश, ठेका-स्थायी, कुशल-अकुशल में बांट दिया गया है। परिणाम यह कि मालिक को उत्पादन बढ़ाने के लिए कम और रोज की खींचतान संभालने के लिए अधिक जद्दोजहद करनी पड़ती है। जब श्रमिक ही बंटा हो तो न तो उसका कल्याण होता है, न उद्योग का विकास।

3. मूल कारण - छद्म अस्मिता का सुनियोजित प्रसार

इस रोग की जड़ में आपने जिस शब्द का प्रयोग किया है - छद्म अस्मिता - वही सबसे सटीक है।

मनुष्य की असली पहचान उसके कर्म, कौशल, चरित्र और परिश्रम से बनती है। पर पिछले कुछ दशकों में एक सुनियोजित तरीके से इस असली पहचान को पीछे धकेल कर जन्म-आधारित पहचान - जाति, धर्म, क्षेत्र, आर्थिक स्तर - को ही अंतिम सत्य बना दिया गया है।

यह प्रसार अनायास नहीं, प्रयोजन से हुआ है। जब दो साथ काम करने वाले व्यक्तियों को बार-बार यह बताया जाए कि तुम्हारी सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक प्रगति में बाधा दूसरा व्यक्ति है, क्योंकि वह दूसरी जाति या धर्म का है, तो स्वाभाविक रूप से अविश्वास जन्म लेगा।

इसके प्रमुख कारक हैं:

1. वोट और सत्ता की राजनीति: अनेकता को जोड़ने के बजाय अलगाव को तेज करना। व्यक्ति को यह समझाने के बजाय कि तुम्हारा विकास तुम्हारे परिश्रम और सबके सहयोग से होगा, उसे यह समझाया गया कि तुम्हारा अस्तित्व ही खतरे में है। डरा हुआ व्यक्ति कभी सुसंस्कृत समुदाय नहीं बना सकता।

2. सोशल मीडिया का एल्गोरिदम: एक जैसा सोचने वालों को एक साथ जोड़ना और दूसरे पक्ष को शत्रु की तरह दिखाना। हम वही सुनते हैं जो हम पहले से मानते हैं।

3. आर्थिक असमानता और पलायन: जब संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, तो 'बाहरी बनाम स्थानीय' की भावना तेज होती है।

4. शिक्षा में जड़ों से दूरी: नई पीढ़ी को अपने पड़ोसी की संस्कृति, भाषा और इतिहास के बारे में बहुत कम पता है। अज्ञानता से दूरी बढ़ती है।

5. शहरीकरण में एकाकीपन: गांव में अनेकता रोज मिलती थी, शहर में हम अपने ही दायरे में सिमट गए हैं।

इसी कारण जो भारत 'विविधता में एकता' के लिए जाना जाता था, वह आज 'विविधता पर थोपी गई एकता' जैसा दिखने लगा है, जो तेजी से क्षरित हो रही है।

4. परिणाम - राष्ट्र की समृद्धि पर आघात

जब घर टूटता है तो संस्कार टूटते हैं। जब कार्यस्थल टूटता है तो उत्पादकता टूटती है। जब समाज टूटता है तो विश्वास टूटता है।

बिना विश्वास के कोई भी राष्ट्र समृद्ध नहीं बन सकता। समृद्धि केवल जीडीपी से नहीं आती, वह तब आती है जब एक मजदूर को लगे कि मेरे मालिक की समृद्धि में मेरी समृद्धि है, और मालिक को लगे कि मेरे मजदूर की सुरक्षा ही मेरी पूंजी है। जब अनेकता में एकता कमजोर होती है, तो समाज रचनात्मकता खो देता है, अविश्वास बढ़ने से विकास धीमा होता है और राष्ट्रीय शक्ति अंदरूनी खिंचाव में खर्च हो जाती है।

5. पुनर्निर्माण का मार्ग - सुगठित सुसंस्कृत समुदाय कैसे बने?

शासन नियम बना सकता है, पर समुदाय तो हमें ही बनाना होगा। इसके लिए तीन स्तरों पर काम करना होगा।

पहला स्तर - परिवार में 'हम' की पुनर्स्थापना:
रोज 15 मिनट बिना मोबाइल के केवल सुनने की परंपरा, निर्णय में सबकी भागीदारी। असहमत होना शत्रु होना नहीं है - इस एक वाक्य को यदि हम अपने परिवार और व्हाट्सएप समूह में लागू कर लें, तो बहुत कुछ सुधर जाएगा। यह छोटा अभ्यास ही अनेकता में एकता की पहली पाठशाला है।

दूसरा स्तर - निजी संस्थाओं में हित-आधारित एकता:
निजी क्षेत्र में ही इसका सबसे सुंदर प्रयोग हो सकता है।
1. पारदर्शी और समान नियम: वेतन, अवकाश, पदोन्नति के नियम लिखित और सबके लिए समान हों। जब नियम समान होगा तो छद्म अस्मिता का औचित्य स्वतः समाप्त होगा। 2. टीम पुरस्कार, व्यक्ति पुरस्कार नहीं: यदि लक्ष्य पूरा हो तो पुरस्कार पूरी टीम को मिले। इससे मजदूर आपस में सहयोग करना सीखेंगे। 3. कर्म-आधारित प्रतिष्ठा: संस्था में सबसे कुशल, सबसे ईमानदार व्यक्ति को सार्वजनिक सम्मान मिले, चाहे वह किसी भी पृष्ठभूमि का हो। जब प्रतिष्ठा काम से मिलेगी तो जाति-धर्म की कहानी कोई सुनना नहीं चाहेगा। 
तीसरा स्तर - समाज में संवाद के सेतु:
1. भाषा-सेतु: हर व्यक्ति को अपनी मातृभाषा के साथ एक और भारतीय भाषा का थोड़ा परिचय अवश्य हो। छत्तीसगढ़ में बैठा व्यक्ति तमिल का एक शब्द समझे तो दूरी घटती है। 2. साझा इतिहास की पढ़ाई: पाठ्यक्रम में राजाओं के युद्ध से अधिक संतों, कवियों, किसानों और शिल्पियों की साझा परंपरा पढ़ाई जाए। 3. स्थानीय स्तर पर मिलना: मोहल्ले, गांव, शहर में अलग-अलग मतों के लोग बिना किसी एजेंडा के, केवल चाय-पानी पर मिलें। एक-दूसरे के उत्सव में केवल औपचारिकता नहीं, भागीदारी हो। ज्ञान का आदान-प्रदान हो - छत्तीसगढ़ का किसान पंजाब की खेती समझे, तमिल का कारीगर बस्तर के शिल्प को समझे। 
निष्कर्ष

अनेकता भारत की कमजोरी नहीं, उसकी बनावट है। यह ह्रास स्थायी नहीं है। इतिहास साक्षी है कि जब-जब यह एकता कमजोर पड़ी है, समाज ने ही संतों, साहित्यकारों, शिक्षकों और उद्यमियों के माध्यम से इसे फिर से जोड़ा है।

आज आवश्यकता उसी सांस्कृतिक उद्यमिता की है। समुदाय तब बनेगा जब हम साथ रहने वाले दूसरे व्यक्ति को लेबल से नहीं, मनुष्य के रूप में देखना फिर से सीखेंगे। यही सुगठित और सुसंस्कृत समुदाय समृद्ध राष्ट्र की नींव बनेगा।
डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
anilbhatpahari@gmail.com

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