दक्षिण कोसल में बौद्ध संघाराम से अवर्ण संत परम्परा तक:
श्रम-विभाजन, समता और सामाजिक न्याय की ऐतिहासिक निरंतरता
लेखक: डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
रायपुर, छत्तीसगढ़ (दक्षिण कोसल)
Email: dranil.bhatpahari.2025@facebook.com
सार (Abstract)
प्रस्तुत शोध आलेख में यह प्रतिपादित किया गया है कि बौद्ध विहार केवल ध्यान-स्थल नहीं, बल्कि प्राचीन भारत के प्रथम आवासीय विश्वविद्यालय और संगठित श्रम-विभाजन के मॉडल थे। विनय पिटक में वर्णित संघीय पद-व्यवस्था, मज्झिम निकाय के अस्सलायन सुत्त (93) में योन-कम्बोज के दृष्टांत से वर्ण-व्यवस्था का तार्किक खंडन, दक्षिण कोसल के सिरपुर (श्रीपुर) के पुरातात्विक साक्ष्य, कोसा-चीवर की आर्थिक-सांस्कृतिक परम्परा और कोसा वस्त्र के सहस्त्र दान की लोकश्रुति को एक साथ रखकर यह दिखाया गया है कि बुद्ध की समता-दृष्टि ही भारत की अवर्ण संत परम्परा - कबीर, रैदास, गुरु घासीदास और सतनाम पंथ - की वैचारिक जननी है। ब्रिटिश काल में साइमन कमीशन (1927-28) और कम्युनल अवार्ड (1932) के विरोध का समाजशास्त्रीय विश्लेषण और डॉ. भीमराव अंबेडकर के अभ्युदय को इसी निरंतरता की आधुनिक परिणति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। मूल निष्कर्ष है - कार्य की दक्षता के आधार पर श्रम का विभाजन रहे, पर मनुष्य की गरिमा में कोई विभाजन न रहे।
मुख्य शब्द
संघाराम, विनय पिटक, अस्सलायन सुत्त, योन-कम्बोज, सिरपुर-श्रीपुर, दक्षिण कोसल, कोसा-चीवर, पांसुकूल, अवर्ण, सतनाम पंथ, साइमन कमीशन, कम्युनल अवार्ड, डॉ. अंबेडकर
1. प्रस्तावना: विहार को विश्वविद्यालय के रूप में देखना
सामान्यतः विहार को तपोभूमि माना जाता है। परन्तु पाली साहित्य और पुरातत्व दोनों सिद्ध करते हैं कि विहार अपने समय के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय (Residential University) थे। नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी की तरह सिरपुर भी महानदी के तट पर एक ऐसा ही केंद्र था। चीनी यात्री ह्वेनसांग (7वीं शती) ने श्रीपुर में 100 से अधिक संघाराम और 10,000 भिक्खुओं का उल्लेख किया है।
इतने बड़े समुदाय का संचालन केवल भिक्षा पर नहीं चल सकता था। उसके लिए एक सुव्यवस्थित प्रशासन, भंडारण, भोजन-वितरण, स्वच्छता, जल-प्रबंध और निर्माण-रखरखाव की स्थायी व्यवस्था आवश्यक थी। यही वह बिंदु है जहाँ बौद्ध संघ ने वर्ण-व्यवस्था से बिल्कुल अलग एक मॉडल प्रस्तुत किया।
2. संघाराम में श्रम-विभाजन और समानता: विनय पिटक के साक्ष्य
विनय पिटक के महावग्ग और चुल्लवग्ग में संघीय कार्यों का विस्तृत उल्लेख है:
1. भंडागारिक: चीवर, पिंडपात, औषधि और भंडार का लेखा-जोखा रखने वाला। आज की भाषा में स्टोर कीपर-कम-प्रबंधक।
2. आरामिक / आरामिक पेशक: विहार की सफाई, जल-प्रबंध, उद्यान और पुष्करिणी की देखभाल।
3. भत्तुद्देसक: भोजन (भत्त) के वितरण का नियामक - कौन कहाँ बैठेगा, किसे कितना मिलेगा, ताकि पक्षपात न हो।
4. नवकम्मिक: निर्माण और मरम्मत कार्यों का प्रमुख - इंजीनियर। सिरपुर में ईंटों से बने विशाल विहार इसी पद के बिना असंभव थे।
5. उपज्झाय, आचरिय, भाणक: शैक्षणिक पद - उपाध्याय, आचार्य और त्रिपिटक का पाठ करने वाले।
महत्वपूर्ण बात - इन पदों पर नियुक्ति का आधार जन्मगत जाति नहीं, बल्कि दक्खता (दक्षता), रुचि और अनुभव था।
उदाहरण: उपालि जन्म से नाई (नहापित) थे, पर विनय के सबसे बड़े ज्ञाता बने। सुनीत जन्म से पुहर (भंगी) थे। सोपाक चांडाल पुत्र थे। अंगुलिमाल हत्यारा था। संघ में आकर सब एक ही पंक्ति में बैठते थे, एक ही पातिमोक्ख (प्रातिमोक्ष) का पालन करते थे। विनय का नियम है - 'यथा वुड्ढानं यथापट्ठं' - आयु-ज्येष्ठता से आसन, पर सम्मान ज्ञान-ज्येष्ठता से।
अतः लेखक का यह निष्कर्ष उचित है कि ज्ञानी भंते अध्ययन-अध्यापन में और बलशाली-परिश्रमी भंते शारीरिक श्रम में लगे थे। यह वर्ण-व्यवस्था नहीं, बल्कि एक संगठित समुदाय का नैसर्गिक श्रम-विभाजन (Natural Division of Labour) था, जिसमें गरिमा में कोई भेद नहीं था।
3. अस्सलायन सुत्त: वर्ण की कृत्रिमता का सबसे तार्किक खंडन
मज्झिम निकाय के 93वें सुत्त - अस्सलायन सुत्त में बुद्ध और 16 वर्षीय मेधावी ब्राह्मण कुमार अस्सलायन का संवाद है। ब्राह्मणों ने अस्सलायन को भेजा था कि वह बुद्ध को शास्त्रार्थ में हराए।
बुद्ध पूछते हैं - 'अस्सलायन, सुना है योन-कम्बोज (यवन और कम्बोज) देशों में केवल दो ही वण्ण होते हैं - अय्यो (स्वामी/आर्य) और दासो (सेवक/दास)। अय्यो दास हो जाता है, दास अय्यो हो जाता है। यदि वर्ण प्रकृति-जन्य होते, तो वहाँ भी चार ही होते।'
दूसरा तर्क जैविक और नैतिक है:
• क्या ब्राह्मणी को गर्भ केवल ब्राह्मण से ही होता है? क्या वह ब्राह्मण स्त्री नहीं है जो रजस्वला होती है, गर्भ धारण करती है, संतान को जन्म देती है?
• क्या केवल ब्राह्मण ही मैत्री-भावना कर सकता है? क्या पाप-पुण्य का फल केवल ब्राह्मण को ही मिलता है?
• यवन-कम्बोज में यदि दास पुरुषार्थ करे तो वह स्वामी बन जाता है। तो स्थिति कर्म से बदलती है, जन्म से नहीं।
इसलिए बुद्ध का अंतिम सूत्र है - 'कम्मुना वसलो होति, कम्मुना होति ब्राह्मणो'।
लेखक ने इसे बहुत सुंदर व्याख्या दी है - नैसर्गिक विभाजन केवल इतना है कि कोई संसाधन पुरुषार्थ से प्राप्त कर पाता है, कोई नहीं कर पाता। यह भेद हर समाज में रहेगा। पर इस भेद को जन्मगत पवित्रता-अपवित्रता, ऊँच-नीच और छुआछूत से जोड़ना मानव-कृत कृत्रिम विधान है। कृत्रिम होने के कारण ही उसका उन्मूलन संभव है।
4. सिरपुर और कोसा: दक्षिण कोसल का बौद्ध वैभव
सिरपुर - प्राचीन श्रीपुर - दक्षिण कोसल की राजधानी थी। 6वीं से 10वीं शताब्दी तक सोमवंशी और पाण्डुवंशी राजाओं के काल में यह बौद्ध धर्म का अंतरराष्ट्रीय केंद्र था।
पुरातत्व: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (1954-55) और छत्तीसगढ़ शासन की खुदाई (2000-2012) में यहाँ 22 से अधिक बौद्ध विहार, 6 प्रमुख मंदिर, आनंदप्रभु कुटी विहार, स्वस्तिक विहार, तारा विहार और 6 से 8 फीट ऊँची विशाल बुद्ध प्रतिमाएँ (भूमिस्पर्श मुद्रा) मिली हैं। हर्षगुप्त और महाशिवगुप्त बालार्जुन के ताम्रपत्रों में विहारों को ग्राम-दान का उल्लेख है। यहाँ मिली मोहरों पर 'भंडागारिक' जैसे शब्द भी मिले हैं।
कोसा और चीवर: भिक्खु का चीवर मूलतः पांसुकूल (शमशान, कूड़े से उठाए चीथड़े) से बनता था, जिसे कषाय (हल्दी, मंजिष्ठा, हरिद्रा) रंग से रंगा जाता था। बाद में श्रद्धालु उपासकों से वस्त्र मिलने लगे। दक्षिण कोसल का कोसा रेशम (कोसे-य्य) कौटिल्य के अर्थशास्त्र से ही प्रसिद्ध था। इसका प्राकृतिक सुनहरा-भूरा रंग सहज कषाय था, इसलिए कोसा-चीवर राजकीय दान के लिए सर्वोत्तम माना गया।
लोकश्रुति और सत्यवंत-सार्थवाह परम्परा: लेखक ने सत्यवंत और सार्थवाह विज्जस भतपहरी वंश का जो उल्लेख किया है, वह महत्वपूर्ण है। दक्षिण कोसल में सार्थवाह (व्यापारी) संघ के प्रमुख संरक्षक थे। एक सहस्त्र वस्त्रों का दान (सहस्स-चीवर दान) उस समय राज-सम्मान का प्रतीक था। यही वह आर्थिक आधार था जिससे सिरपुर जैसा वैभव संभव हुआ।
5. अवर्ण संत परम्परा: बौद्ध समता की लोक-निरंतरता
बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद जब वैदिक वर्णाश्रम ने पुनः प्रभुत्व स्थापित किया, तो बौद्ध समता की धारा लुप्त नहीं हुई, उसने रूप बदला।
वैदिक वर्ण और पौराणिक जाति से अलग होने के कारण इन पंथों को 'अवर्ण' घोषित किया गया। अवर्ण का अर्थ है - वर्ण-व्यवस्था से बाहर। इन्हें अनेक धार्मिक-सामाजिक क्रियाकलापों से बहिष्कृत किया गया और छुआछूत का व्यवहार आरम्भ हुआ।
परन्तु इन्होंने अपनी समता-दृष्टि नहीं छोड़ी:
• कबीर पंथ - 'जाति न पूछो साधु की'
• रैदास पंथ - 'मन चंगा तो कठौती में गंगा'
• गुरु घासीदास का सतनाम पंथ (छत्तीसगढ़) - 'सतनाम' ही सार, मूर्ति-पूजा, जाति-भेद का निषेध। गिरौदपुरी, भंडारपुरी और कुटेला में सतनाम आंदोलन ने वही कार्य किया जो कभी संघाराम करते थे - बहिष्कृतों को संगठित करना, स्वाभिमान देना।
विडम्बना यह रही कि इन समुदायों में भी कालांतर में जाति-उपजाति, गोत्र का अनुकरण होने लगा और वे बहुसंख्यक वर्णाश्रम संस्कृति के आचार-व्यवहार अपनाने लगे। फिर भी इनकी वाणी - साखी, सबद, पंथी गीत - उत्पीड़ित जन-मन के लिए संजीवनी बनी रही, जैसा लेखक ने ठीक कहा है। अनेक संघर्ष-आंदोलन इसी जीवनी शक्ति से हुए।
6. औपनिवेशिक काल: साइमन कमीशन, कम्युनल अवार्ड और प्रभुवर्ग का विरोध
अंग्रेज औपनिवेशिक सत्ता के रूप में भारत के प्राकृतिक संसाधनों का शोषण कर रही थी, अनेक कर लगा रही थी, पर उसके विरुद्ध वैसा जन-आंदोलन नहीं हुआ जैसा सामाजिक सुधार के प्रश्न पर हुआ। इसका समाजशास्त्रीय कारण है।
अंग्रेज प्रशासन ने जब भारतीय समाज के जटिल जातीय ढांचे, उसमें व्याप्त भेदभाव और शोषण को समझने के लिए साइमन कमीशन (1927-28) का गठन किया और डॉ. अंबेडकर के साक्ष्यों के आधार पर कम्युनल अवार्ड (1932) में दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचन की घोषणा की, तो प्रभुवर्ग ने 'साइमन गो बैक' का प्रखर नारा दिया।
औपचारिक आरोप था - कमीशन में कोई भारतीय सदस्य नहीं। पर लेखक का प्रश्न उचित है - यदि भारतीय सदस्य होते, तो क्या वे समानता-युक्त नीतियों का समर्थन करते? उस समय की सामाजिक संरचना में ऐसा उदार व्यक्ति अंग्रेजों की दृष्टि में भी दुर्लभ था।
वास्तविक क्षोभ इस बात को लेकर था कि रेल, बस, हाट-बाजार, न्यायालय और कानून में सबको समान दृष्टि से देखा जा रहा है। यह समानता-युक्त व्यवहार प्रभुवर्ग को अपनी सत्ता के लिए चुनौती लगा। इसलिए सामाजिक ताने-बाने में अंग्रेजों की दखल को राजनीतिक गुलामी से भी बड़ा खतरा माना गया।
7. डॉ. अंबेडकर: बहिष्कृत समुदाय के आधुनिक मसीहा और बुद्ध की ओर वापसी
इसी ऐतिहासिक शून्य में डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का अभ्युदय हुआ। उन्हें सामाजिक न्याय के लिए सबसे उपयुक्त पात्र समझा गया। डॉ. अंबेडकर ने भी आजादी से अधिक महत्वपूर्ण समाज-सुधार और बहिष्कृत समुदाय में चेतना जगाने, उन्हें संगठित करने और हक-अधिकार के लिए संघर्ष कराने की मुहिम को माना।
1935 में येवला में उनकी घोषणा - 'मैं हिन्दू पैदा हुआ, यह मेरे वश में नहीं था, पर मैं हिन्दू मरूंगा नहीं' - और अंततः 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में बौद्ध धम्म की दीक्षा, यह सिद्ध करती है कि वे उसी मूल स्रोत पर लौटे जहाँ से समता की धारा निकली थी।
इसलिए वे बहिष्कृत समुदाय के आधुनिक मसीहा कहलाते हैं, पर नींव बुद्ध ने अपने संघ से रखी थी। बुद्ध प्रेरक रोल मॉडल थे, संतों-गुरुओं ने उसे लोक-भाषा में आगे बढ़ाया, और अंबेडकर ने उसे संविधान और नवयान बौद्ध धर्म के रूप में संस्थागत किया। अंग्रेजों को भी आंतरिक विद्रोहों को समझने के लिए इसी सामाजिक सत्य को जानना पड़ा, जिसकी परिणति कम्युनल अवार्ड में हुई।
8. निष्कर्ष
सिरपुर की ईंटें, कोसा के ताने-बाने, सतनाम के पंथी गीत और संविधान की प्रस्तावना - ये चार अलग-अलग वस्तुएँ नहीं, एक ही ऐतिहासिक निरंतरता की कड़ियाँ हैं।
1. बौद्ध संघाराम ने सिद्ध किया कि बिना वर्ण के भी बड़ा संगठन दक्षता के आधार पर चल सकता है।
2. अस्सलायन सुत्त ने सिद्ध किया कि वर्ण प्रकृति-जन्य नहीं, कर्म-जन्य है।
3. सिरपुर-कोसा ने सिद्ध किया कि जब राज्य समानता को आश्रय देता है, तो आर्थिक-सांस्कृतिक वैभव आता है।
4. अवर्ण संत परम्परा ने सिद्ध किया कि दमन के बाद भी समता की स्मृति लोक में जीवित रहती है।
5. साइमन कमीशन और अंबेडकर ने सिद्ध किया कि बिना सामाजिक समता के राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी है।
अतः लेखक का मूल निष्कर्ष ही बुद्ध की मूल दृष्टि है - कार्य की दक्षता के आधार पर श्रम का विभाजन रहे, पर मनुष्य की गरिमा में कोई विभाजन न रहे। यही समानता और समता के उद्गाता बुद्ध और उनकी नीतियों का सार है।
संदर्भ ग्रंथ सूची
1. विनय पिटक - महावग्ग, चुल्लवग्ग, राहुल सांकृत्यायन द्वारा अनूदित
2. मज्झिम निकाय - अस्सलायन सुत्त (93), भिक्खु धर्मरक्षित अनुवाद
3. ह्वेनसांग - Si-Yu-Ki, सैमुएल बील अनुवाद
4. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण - Sirpur Excavation Reports 1954-55, 2000-2012
5. डॉ. भीमराव अंबेडकर - बुद्ध और उनका धम्म, Annihilation of Caste, येवला घोषणा 1935
6. गुरु घासीदास और सतनाम आंदोलन - डॉ. हीरालाल शुक्ल, डॉ. के. पी. वर्मा
7. दक्षिण कोसल का इतिहास - डॉ. रमेन्द्र नाथ मिश्र
8. Communal Award 1932 and Poona Pact - B.R. Ambedkar Writings Vol. 9
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