Sunday, August 16, 2026

धर्म एवं पंथ

धारणात् धर्मम् : सद्गुणों के धारण के संदर्भ में धर्म और पंथ का दार्शनिक विवेचन
A Philosophical Distinction between Dharma and Panth in the Context of Embodiment of Virtues

डॉ. अनिल भटपहारी
स्वतंत्र शोधार्थी, भारतीय दर्शन एवं समाज-दर्शन

सार (Abstract)

प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय मनीषा के मूल सूत्र ‘धारणात् धर्मम्’ की मीमांसा करता है। इसमें यह प्रतिपादित किया गया है कि धर्म और पंथ/मत/मजहब/रिलीजन/संप्रदाय दो भिन्न कोटियाँ हैं। पंथ उपासना-पद्धति है जो परिवर्तनीय है, जबकि धर्म धारणीय सद्गुण है जो सार्वभौमिक और अपरिवर्तनीय है। ऋग्वेद, भगवद्गीता, त्रिपिटक, बाइबिल, कुरान, गुरु ग्रंथ साहिब, कबीर बीजक और गुरु घासीदास के उपदेशों के तुलनात्मक अध्ययन तथा सुकरात, कांट, गांधी, अम्बेडकर जैसे दार्शनिकों के मतों के आलोक में यह सिद्ध किया गया है कि सद्गुणों को धारण करने वाला व्यक्ति ही सच्चा धार्मिक है, चाहे वह किसी भी पंथ का अनुयायी हो या न हो। अनुयायी होना बाह्य पहचान है, धार्मिक होना आंतरिक अवस्था है।

मुख्य शब्द (Keywords): धर्म, पंथ, धारणा, सद्गुण, मानवता, अनुयायी

1. प्रस्तावना

भारतीय परंपरा में धर्म शब्द को अंग्रेजी के Religion या उर्दू के मजहब का पर्याय मान लिया गया है, जो एक वैचारिक भूल है। संस्कृत में धर्म शब्द धृ धातु से निष्पन्न है, जिसका अर्थ है धारण करना। महाभारत (कर्णपर्व 69.58) में कहा गया है - धारणाद् धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः। जो प्रजा को धारण करे, जो समाज को गिरने से बचाए, वही धर्म है। यह शोध पत्र इसी सूत्र को केंद्र में रखकर धर्म और पंथ के भेद को स्पष्ट करता है।

2. शोध के उद्देश्य

1. धर्म की व्युत्पत्ति और शास्त्रीय लक्षणों का निर्धारण करना।
2. पंथ/मत/मजहब/रिलीजन और धर्म के बीच दार्शनिक अंतर को स्पष्ट करना।
3. विभिन्न धर्मग्रंथों में सद्गुण-धारण को ही धर्म के रूप में स्थापित करने वाले प्रमाणों का विश्लेषण।
4. अनुयायी और धार्मिक के अंतर को तार्किक रूप से प्रतिपादित करना।

3. शोध पद्धति

यह शोध वर्णनात्मक एवं तुलनात्मक दार्शनिक पद्धति पर आधारित है। प्राथमिक स्रोत के रूप में मूल धर्मग्रंथों और द्वितीयक स्रोत के रूप में प्रामाणिक अनुवादों और दार्शनिक समीक्षाओं का उपयोग किया गया है।

4. धर्म का शास्त्रीय स्वरूप

मनुस्मृति (6.92) में धर्म के दस लक्षण कहे गए हैं -
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।
इसमें कहीं भी ईश्वर, ग्रंथ या पंथ का उल्लेख नहीं, केवल धारणीय सद्गुण हैं।
वैशेषिक दर्शन में महर्षि कणाद कहते हैं - यतोऽभ्युदय निःश्रेयस सिद्धिः स धर्मः। जिससे अभ्युदय (लौकिक उन्नति) और निःश्रेयस (मोक्ष) सिद्ध हो वही धर्म है।
जैमिनी मीमांसा में - चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः।

5. धर्मग्रंथों में सद्गुण ही धर्म - तुलनात्मक प्रमाण

5.1 ऋग्वेद और भगवद्गीता

ऋग्वेद (10.191.2) - संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। समानता और सौहार्द को धर्म कहा गया है।
गीता (16.1-3) में दैवी संपदा के 26 लक्षण - अभय, सत्वसंशुद्धि, अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, दया, क्षमा आदि को ही धर्म का स्वरूप बताया गया है।
गीता (2.50) - योगः कर्मसु कौशलम् - कुशलतापूर्ण, सद्गुणयुक्त कर्म ही धर्म है।

5.2 बौद्ध त्रिपिटक (धम्मपद)

धम्मपद (50) - न परेसं विलोमानि न परेसं कताकतं। अत्तनो व अवेक्खेय्य कतानि अकतानि च।। अर्थात दूसरों के दोष नहीं, अपने कर्म देखो।
बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग - सम्यक दृष्टि, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मांत आदि सभी सद्गुणों का ही प्रशिक्षण है। बुद्ध ने ईश्वर को नहीं, धम्म (सदाचार) को धारण करने को कहा।

5.3 बाइबिल

बाइबिल, गलातियों 5:22-23 - आत्मा के फल प्रेम, आनंद, शांति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता और संयम हैं। ऐसे गुणों के विरुद्ध कोई व्यवस्था नहीं।
मत्ती 22:39 - अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करो - यही मानवता का धर्म है।

5.4 कुरान

कुरान (49:13) - हमने तुम्हें एक-दूसरे को पहचानने के लिए विभिन्न कौमों में बनाया, अल्लाह के निकट सबसे सम्मानित वह है जो सबसे अधिक तकवा (सदाचार) वाला है।
कुरान (2:177) - नेकी केवल मुंह पूरब-पश्चिम करने में नहीं, बल्कि नेकी वह है जो ईमान लाए और धन को प्रेम के बावजूद रिश्तेदारों, अनाथों, जरूरतमंदों को दे, सत्य बोले, वादा पूरा करे। यह सद्गुणों की ही परिभाषा है।

5.5 गुरु ग्रंथ साहिब

जपुजी साहिब - सचहु ओरै सभु को उपरि सचु आचारु।। सत्य से भी ऊपर सत्य का आचरण है।
गुरु ग्रंथ साहिब में - जाथै दया तहां धर्म है - जहाँ दया है वहीं धर्म है।

5.6 कबीर बीजक

कबीर - पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
कबीर ने पंथ-भेद को नकारा - हिंदू कहें मोहि राम पियारा, तुरक कहें रहमाना। आपस में दोउ लड़ी लड़ी मुए, मरम न काहू जाना।
उनके अनुसार प्रेम ही धारणीय धर्म है।

5.7 सतनाम पंथ : गुरु घासीदास

गुरु घासीदास जी का मूल मंत्र - सत्य ही धर्म है। मनखे मनखे एक समान।
उनके सात सिद्धांत - सत्य बोलना, जीवों पर दया करना, पराई स्त्री को माता समान मानना आदि सभी सद्गुण-धारण ही हैं। उन्होंने मूर्ति-पूजा, आडंबर को नकार कर आचरण को धर्म कहा।
यह इस शोध के मूल प्रतिपाद्य - मानव का धर्म मानवता है, का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

6. दार्शनिकों के मत

1. सुकरात - सद्गुण ही ज्ञान है (Virtue is Knowledge)। जो सत्य को जानता है वह सदाचारी होगा ही।
2. इमैनुएल कांट - धर्म नैतिक कर्तव्य (Categorical Imperative) है। मनुष्य को साध्य मानो, साधन नहीं - यही मानवता का धर्म है।
3. महात्मा गांधी - धर्म से मेरा अर्थ पंथ नहीं, बल्कि वह जो हृदय को शुद्ध करे। सत्य ही ईश्वर है, ईश्वर सत्य है नहीं।
4. डॉ. बी.आर. अम्बेडकर - बुद्ध धम्म में उन्होंने कहा - धर्म नैतिकता है, धम्म सदाचार है। पंथ नहीं।
5. स्वामी विवेकानंद - Man is divine, Religion is the manifestation of divinity already in man - मनुष्य में पहले से स्थित दिव्यता (सद्गुण) का प्रकटीकरण ही धर्म है।
6. रैदास - मन चंगा तो कठौती में गंगा। अंतःकरण की शुद्धता ही धर्म है।

7. अनुयायी बनाम धार्मिक : विश्लेषण

अनुयायी होना - बाह्य, सामाजिक, परिवर्तनीय, विधि-प्रधान। मतांतरण संभव है।
धार्मिक होना - आंतरिक, सार्वभौमिक, अपरिवर्तनीय, गुण-प्रधान। गुणांतरण नहीं, गुण-धारण होता है।
इसलिए एक व्यक्ति बिना किसी पंथ का अनुयायी बने भी धार्मिक हो सकता है यदि वह सत्य-करुणा-प्रेम को धारण कर जीता है। और एक व्यक्ति किसी भी बड़े पंथ का अनुयायी होते हुए भी अधार्मिक हो सकता है यदि वह असत्य, क्रूरता, घृणा को धारण किए हुए है।
जैसे पानी का धर्म शीतलता है, आग का धर्म ताप है, वैसे मनुष्य का धर्म मानवता है - यह सूत्र वैज्ञानिक रूप से भी सत्य है, क्योंकि गुण ही पदार्थ की पहचान है।

8. निष्कर्ष

निष्कर्षतः धर्म ग्रंथ, पंथ, मजहब, रिलीजन नहीं है। वे उपासना की पद्धतियाँ हैं। धर्म वह है जो धारण किया जाए। सत्य, करुणा, प्रेम, परोपकार, सौहार्द, क्षमा जैसे सद्गुण ही मानव का सनातन धर्म हैं। सद्गुणों को धारण करने वाला ही धार्मिक है, चाहे वह किसी ग्रंथ को पढ़े या न पढ़े, किसी ईश्वर को माने या न माने। लोक उसे नास्तिक कहे, पर धर्म-दृष्टि में वही आस्तिक है। अतः धार्मिक होना और अनुयायी होना दो भिन्न बातें हैं। इसी बोध से सामाजिक द्वेष, द्वंद्व और श्रेष्ठता-हीनता का भाव समाप्त हो सकता है।

संदर्भ ग्रंथ सूची (References - APA Style)

1. मनु. (n.d.). मनुस्मृति।
2. महर्षि कणाद. वैशेषिक सूत्र।
3. श्रीमद्भगवद्गीता। गीताप्रेस गोरखपुर।
4. धम्मपद. (1950). Pali Text Society.
5. The Holy Bible. (2011). New International Version.
6. The Holy Quran. (2004). Trans. Abdullah Yusuf Ali.
7. गुरु ग्रंथ साहिब। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी।
8. कबीर. बीजक।
9. गुरु घासीदास. सतनाम उपदेश (मौखिक परंपरा एवं अमरदास, 2015)।
10. Kant, I. (1785). Groundwork of the Metaphysics of Morals.
11. Gandhi, M. K. (1927). An Autobiography.
12. Ambedkar, B. R. (1957). The Buddha and His Dhamma.
13. Vivekananda, S. (1896). Raja Yoga.

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