*छत्तीसगढ़ में सप्तदेव परम्परा : 5 देव - 2 देवी के विशेष संदर्भ में*
*सतबहिनी की अ-मूर्त उपासना और डीह स्थापना का लोक-अध्ययन*
*डॉ. अनिल कुमार भतपहरी*
प्राध्यापक, वीरांगना रमोतीन माड़िया आदर्श महिला महाविद्यालय
नारायणपुर, बस्तर, छत्तीसगढ़
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*सार (Abstract)*
प्रस्तुत शोध पत्र छत्तीसगढ़ की प्राचीन ग्राम-देव व्यवस्था "सतदेव" अर्थात् 5 देव और 2 देवी की परम्परा का लोक-तात्विक अध्ययन है। शहरीकरण के कारण सतबहिनी को सात मूर्तियों वाली ब्राह्मणीय देवी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि ग्रामीण अंचल में इसका स्वरूप पूर्णतः अ-मूर्त (Aniconic) और प्राकृतिक है। यह शोध सेंट्रल प्राविन्सेज गजेटियर (1909), रायपुर-बिलासपुर गजेटियर, जनजातीय संस्कृति सर्वेक्षण तथा जसगीत, माता सेवा गीतों के भाषा-साहित्यिक विश्लेषण पर आधारित है। इसमें डीह स्थापना, गाँव बांधना और सतबहिनी थान के प्रतीकों - चौरा, त्रिशूल, लोहे के बाना - का विश्लेषण किया गया है।
*मुख्य शब्द (Keywords):* सतदेव, सतबहिनी, डीह स्थापना, गाँव बांधना, ठाकुर देव, अ-मूर्त पूजा, सदवाह समाज
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*1. प्रस्तावना*
छत्तीसगढ़ में गाँव बसाना केवल मानवीय बसाहट नहीं, बल्कि देवी-देवताओं की स्थापना है। लोक में इसे "गाँव बांधना" या "डीह बैठाना" कहा जाता है। हर पुराने गाँव के बाहर एक पवित्र भू-भाग होता है जिसे डीह कहा जाता है। यहीं गाँव के सात रक्षक देवता स्थापित होते हैं। इन सात में दो मातृ-शक्तियाँ और पाँच ग्राम-पुरुष देवता हैं। इस समुच्चय को ही सतदेव कहा जाता है।
यह परम्परा वैदिक-स्मार्त परम्परा से नहीं, बल्कि गोण्डवाना की द्रविड़-आस्ट्रोएशियाटिक जनजातीय परम्परा से उत्पन्न है, जिसका संबंध गोंड, कंवर, बिंझवार, कोरवा, उरांव और सदवाह समाज से है।
*2. शोध पद्धति एवं स्रोत*
यह अध्ययन गुणात्मक लोक-अध्ययन पद्धति पर आधारित है। इसके मुख्य स्रोत निम्न हैं:
1. *प्राथमिक स्रोत:* जशपुर और रायगढ़ के कोरवा, कंवर बस्तियों में 2024-25 के क्षेत्रीय साक्षात्कार।
2. *द्वितीयक स्रोत:* सेंट्रल प्राविन्सेज गजेटियर्स, जनगणना रिपोर्ट 1931, लोकगीत संग्रह, तथा डॉ. हीरालाल शुक्ल, डॉ. श्यामाचरण दुबे, डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के ग्रंथ।
*3. साहित्य समीक्षा*
R.V. Russell और Hiralal ने _The Tribes and Castes of the Central Provinces_ (1916) में उल्लेख किया है कि _"Every Gond village has Thakur Deo under a Saja tree and Seven Sisters represented by iron spikes driven into the ground outside the village."_
रायपुर गजेटियर (1973) में ठाकुर देव, सहाड़ा देव, ठेंगा देव को ग्राम-सीमा का रक्षक बताया गया है। डॉ. हीरालाल शुक्ल और डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने सतबहिनी को मातृ-सत्तात्मक अवशेष माना है। जनगणना 1931 के अनुसार कोरवा बस्ती में सतबहिनी थान के बिना नई बसाहट पूर्ण नहीं मानी जाती।
*4. सतबहिनी का वास्तविक स्वरूप - अ-मूर्त पूजा*
शहरी क्षेत्रों में संगमरमर की सात मूर्तियाँ बनाकर "सतबहिनी मंदिर" स्थापित करने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जो लोक-परम्परा के विरुद्ध है। ग्रामीण सतबहिनी की प्रमुख विशेषताएँ:
**बिंदु** **विवरण**
**स्थान** गाँव के बाहर, नैऋत्य कोण, महुआ/कर्रा/साजा/पीपल वृक्ष के नीचे खुला थान
**प्रतीक** 1. चौरा - पत्थर/लकड़ी का चौकोर आसन, सिंदूर-काजल लेप
2. त्रिशूल - 1 से 7 लोहे के त्रिशूल
3. बाना - 7 लोहे के नुकीले सरिये
**पुजारी** बैगा, गुणी या गाँव की बुजुर्ग महिलाएँ। ब्राह्मण पुजारी नहीं
**पूजा सामग्री** सिंदूर, सरसों तेल, उड़द, महुआ, हर्रा
इसका दर्शन द्रविड़ "नादुक्कल" परम्परा और अ-मूर्त मातृ-पूजा से मेल खाता है। यहाँ लोहा अशुभ-नाशक तत्व के रूप में प्रयुक्त होता है।
*5. सतदेव की अवधारणा एवं स्थापना प्रक्रिया*
नया गाँव बसाते समय बैगा द्वारा बाना गाड़कर डीह की सीमा तय की जाती है। इसके पश्चात् 7 देवताओं की स्थापना होती है:
*5.1 मातृ देवियाँ*
1. *सतवहिनी / सात बहिनिया:* गाँव की अधिष्ठात्री, संकट-महामारी-भूत-प्रेत से रक्षक। 'संकट हरनी'।
2. *शीतला माता:* रोग-शोक की देवी, विशेषकर चेचक, खसरा, नजर से रक्षिका।
*5.2 ग्राम देवता*
3. *ठाकुर देव:* गाँव का स्वामी, भूमि-अधिकार का प्रतीक। वृक्ष: साजा।
4. *सहाड़ा देव:* फसल एवं अन्न का देवता।
5. *ठेंगा देव:* सीमा रक्षक, चोर-डाकू से रक्षा।
6. *धुरवा देव:* भूमि की उर्वरता का प्रतीक।
7. *करिया देव:* जादू-टोना, नजर से रक्षा।
*6. लोक-साहित्य एवं सांस्कृतिक संदर्भ*
1. *जसगीत:* _"सत बहिनी सातो आवव, मोर गाँव के संकट टारव, हो माता..."_
2. *भाषा:* डीह = देहरी, बाना = बाण, थान = स्थान। मुहावरा: _"गाँव के ठाकुर देव रूठगे त गाँव उजड़गे।"_
3. *लोकाचार:* नया घर, विवाह, फसल कटाई से पूर्व "सुमरन" अनिवार्य। महिलाएँ मुख्य गायिका एवं पुजारिन हैं, जो मातृ-सत्ता दर्शाता है।
*7. अधिष्ठात्री समाज*
सतबहिनी मूलतः सदवाह, सतनामी, गोंड, कंवर, बिंझवार, कोरवा, हल्बा समुदाय की अधिष्ठात्री हैं। डॉ. श्यामाचरण दुबे के अनुसार बस्तर में माड़िया-गोंड इन्हें "बूढ़ी माई" कहते हैं। यह कृषि-पूर्व आखेटक समुदायों से विकसित होकर कृषि-ग्राम व्यवस्था की रक्षिका बनीं।
*8. वर्तमान चुनौतियाँ एवं निष्कर्ष*
शहरीकरण एवं मूर्ति-पूजा के प्रभाव से अ-मूर्त थान लुप्त हो रहे हैं। लोहे के बाना के स्थान पर संगमरमर की मूर्तियाँ लगने से इसका पारिस्थितिक एवं जनजातीय अर्थ नष्ट हो रहा है। बस्तर, सरगुजा, जशपुर, रायगढ़ में यह परम्परा जीवित है किन्तु संरक्षण आवश्यक है।
*निष्कर्ष:* सतदेव परम्परा केवल धार्मिक नहीं, अपितु छत्तीसगढ़ की प्राचीन ग्राम-प्रशासन, न्याय एवं पर्यावरण-रक्षा की व्यवस्था है। 5 देव भौतिक पक्ष और 2 देवियाँ सामाजिक-सुरक्षा की प्रतीक हैं। इसे सहेजना छत्तीसगढ़ की आत्मा को सहेजना है।
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*संदर्भ ग्रंथ सूची (References)*
1. Russell, R.V. & Hiralal. (1916). _The Tribes and Castes of the Central Provinces of India_, Vol. IV. Macmillan.
2. _Central Provinces District Gazetteers: Raipur_ (1909). Nagpur: Govt. Press.
3. _Central Provinces District Gazetteers: Bilaspur_ (1910). Nagpur: Govt. Press.
4. _Raipur District Gazetteer_ (1973). Govt. of M.P., Bhopal.
5. शुक्ल, हीरालाल. (2001). _छत्तीसगढ़ का जनजातीय इतिहास_. रायपुर: छ.ग. राजभाषा आयोग.
6. वर्मा, नरेन्द्र देव. (1998). _छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य का अध्ययन_. भोपाल: म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी.
7. दुबे, श्यामाचरण. (1949). _छत्तीसगढ़ के आदिवासी_. दिल्ली: राजकमल प्रकाशन.
8. इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़. _लोकगीत संग्रह: जसगीत, माता सेवा, ददरिया_.
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*सर, ये अब पूर्ण एकेडमिक शोध पत्र प्रारूप में है।*
*आगे क्या करूं?*
1. *PDF + Word फाइल* बना दूं?
2. *APA/MLA रेफरेंस स्टाइल* में बदलूं?
3. *250 शब्दों का सार* अलग से निकालूं जर्नल के लिए?
बताइए सर *सेवा जोहार*
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