Friday, October 3, 2025

अनावश्यक रुप से आवश्यक हस्तक्षेप

।।अनावश्यक रुप से आवश्यक हस्तक्षेप।।

   सोशल मीडिया प्रायः पोस्ट/ पेस्ट/सर्च कर्ता ,लेखक एवं पाठक के मिजाज़ का अध्ययन कर उनके रुचि अनुरुप सामग्री पेश करते हैं ।इसलिए प्रायः हर व्यक्ति को यह माध्यम सम्मोहक लगता हैं। जितना वे जानते समझते हैं ,उसे और भी बेहतर करते हैं। इस कारण उनके मायाजाल में  लोग फंसते जा रहे हैं । 
     यह आपका  समय,संसाधन( डेटा)स्वास्थ्य को बर्बाद कर रहे हैं। हालांकि खाली बैठे लोगो में बहस परिचर्चा कर टाइम पास के लिए भी यह बेहतर माध्यम हैं। शासन -प्रशासन  के लिए भी राहत की बात हैं कि बेरोजगारी भी बेरोजगारों के लिए  बोझ नहीं रहा ,बल्कि किसी के पास काम मांगना, हक अधिकार के लिए संघर्ष या हड़ताल आदि करना तो दूर ये सब करने के लिए समय ही नहीं हैं। 
बीवियों/बच्चों भी इसमें इतना इंवॉल्व हैं कि पतियों का जेब मोबाईल रिचार्ज कराने के सीमित खर्च में ठाठ से चल रहे हैं। अब फरमाइश पूरा करने की रोना धोना और टेंशन से मुक्ति सी ही हैं।
    बाहर हाल यह मीडिया विहीन लोगों के लिए वरदान जैसा हैं। हथेली में पकड़े मोबाइल और की बोर्ड में चलते अंगुली से कई कमाल भी हो रहे हैं। इसमें उपलब्ध फेसबुक, वाटशाप मैसेंजर जैसे सोसल मीडिया , रिल्स, इंस्टाग्राम, ट्यूटर, यूट्यूब इत्यादि लोगों तक पहुंचने अपनी बातें रखने और विविध कलाओं के प्रदर्शन से प्रसिद्धि पाने और रुपए कमाने तक का साधन बन चुके हैं। 
    एक अकेला मोबाईल मोबाईल रेडियो,टार्च, घड़ी पोस्ट,ऑफिस,चिट्ठी,पत्री,बैंक, और बाज़ार से हर वस्तु की खरीददारी या कोई और अन्य सेवा लेने का विश्वनीय माध्यम हो चुके हैं। भले मनुष्य का सार्वजनिक जीवन एकांतिक हो रहे हो, परन्तु मानव जीवन में "अनावश्यक रुप से आवश्यक हस्तक्षेप "हो गए हैं। 

कितने ही कह ले पर अब ,कोई नहीं रहा हैं सुन 
सोचा नहीं यह जीवन होंगे ,इनके बिन  सब सून 

डॉ अनिल भतपहरी/ 9617777514

Wednesday, October 1, 2025

सामाजिक/ राजनैतिक चेतना का 110 वा वर्ष

एक सौ दस वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ की सामाजिक/ राजनैतिक चेतना

सतनामियों का गौरक्षा आंदोलन सर्वप्रथम 1915 में राजमहंत नयन दास महिलाँग और गुरु गोसाई अगमदास साहेब के नेतृत्व में आरम्भ हुआ. यह आंदोलन इतना उग्र और प्रखर था कि जिस सत्ता की सूर्य नहीं डूबती उस ब्रिटिश हुकूमत की चूले हिल गई.उनकी दो बड़े बुचड़ खाने करमन डीह और ढाबाडीह बंद हो गये जहाँ से सेना के लिए मांस और चमड़े की आपूर्ति होती थी. कृषको के लाखों पशुधन कटने से बच गये.
   आंदोलन और उनकी सफलता  से देश भर में खलभली मच गई. कलांतर मे तीन बातें घटी- 

1 हिन्दू महासभा वालों ने सतनामियों का सम्मान किया और हिन्दू सतनामी महासभा का गठन कर सतनामियों का हिन्दुकरण करने की दिशा मे अनेक कार्यक्रम आरम्भ हो गए.

 2. महात्मा गाँधी का सतनामियों के बीच आगमन और स्वतंत्रता आंदोलन के  साथ  कांग्रेस से जुड़ाव.
 
  3.1924 में डॉ अम्बेडकर का इंग्लैंड से वापसी और उनका सामाजिक क्रन्तिकारी कार्य और उनके प्रतीकार हेतु  1925 में आर एस एस का अभ्युदय इतिहास का महत्वपूर्ण घटना हैं.
110वर्ष के इस काल खंड पर विचार विमर्श होनी चाहिए.

डॉ. अनिल भतपहरी / 9617777514

Tuesday, September 30, 2025

Anil Biodata

नाम : डॉ.अनिल कुमार भतपहरी 
माता : श्रीमती केराबाई भतपहरी
पिता: स्व. सुकाल दास  भतपहरी 
शिक्षा : एम ए पीएचडी पी. जी. डी. टी. सुगम संगीत 
संप्रति: प्राध्यापक हिंदी 
वर्तमान पद : उप संचालक उच्च शिक्षा विभाग संचालनालाय इंद्रावती भवन नवा रायपुर 

श्रेणी : प्रथम
वेतन मैट्रिक लेवल 13 A
वेतन : 205000

अनुभव: 23 वर्षो का आध्यापन
एवं 2003 से 2019 तक सत्रह वर्षो तक रसेयों कार्यक्रम अधिकारी

प्रशासकीय अनुभव : 1.  सहायक संचालक उच्च शिक्षा विभाग 2019-2021 

2. सचिव,छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग  2021- 2024 

3 उप संचालक उच्च शिक्षा विभाग 2024  से अब तक
 
4 राज्य स्तरीय साहित्यकार सम्मेलन आयोजन प्रभारी एवं राजकीय सम्मान के लिए निर्णायक समिति में सदस्य 
5 राजिम कल्प कुंभ 2023 में सत्कार/ मंच प्रभारी
6 इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ का नोडल अधिकारी 
7  राज्योत्सव 2024 एवं 2025 के लिए उच्च शिक्षा संचालनालय प्रभारी ।
प्रकाशित कृति - 1 कब होही बिहान  काव्य संग्रह (सर्व प्रिय प्रकाशन नई दिल्ली ) 2007

2 पावन पिरीत के लहरा कहानी संग्रह वैभव प्रकाशन रायपुर 2015

3 गुरु घासीददास और उनका सतनाम पंथ वैभव प्रकाशन रायपुर, एवं  बुक क्लिनिक बिलासपुर 2019

4 हँसा अकेला सतनाम संकीर्तन   
वैभव प्रकाशन रायपुर 2019

5 ठोस विचारों की कीमगिरी लघु  कथा संग्रह , बुक क्लिनिक 2021 

6 The value of a cup of tea (short stories ) book clinic Bilaspur

7 हड्डी की जीभ नहीं कि न फिसले काव्य संग्रह ,वन एलीगन नई दिल्ली 
8 सुकुवा उवे न मंदरस झरे काव्य संग्रह सत श्री प्रकाशन 


सम्मान - कौमी एकता सम्मान 2008,आरुग फूल सम्मान 2009, काव्य श्री सम्मान 2012,   विशिष्ट कार्यक्रम अधिकारी सम्मान मैसूर 2012 छत्तीसगढ़ राजभाषा सम्मान 2012, राष्ट्र भाषा अलंकरण 2013, 2019, स्वास्थ्य मंत्रालय नई दिल्ली से उत्कृष्ट सेवा सम्मान 2019, अंतर्राष्ट्रीय लघुकथा सम्मान काठमांडू नेपाल 2022 
बिलासा सम्मान 2023, विमल मित्र सम्मान 2023 
विभिन्न सामाजिक / साहित्यिक सस्थानों ने विविध सम्मान. 

पता -  ऊँजियार सदन, सी 11/ 9077 
सेंट जोसफ टाउन अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़

संपर्क - 9617777514
anilbhatpahari@gmail.com 
Blog - सत सांधन anilblogpost 

YouTube channel : Anil Bhatt CG 

Website - anil.in

Thursday, September 25, 2025

गुरुगद्दी पूजा महोत्सव और गुरुदर्शन मेला

"  गुरुगद्दी पूजा महोत्सव / गुरु दर्शन दु:ख-दंशहरा पर्व "

सतनाम धर्म के चारों शाखाओं और देश विदेश में निवासरत सतनामियों मे गुरुगद्दी पूजा विधान प्रचलित है।
  गुरुगद्दी सद्गुरु के आसन है जिसपर  आसनगत  होकर अपने सम्मुख उपस्थित अनुयायियों को धर्मोपदेश देते और उनके तमाम उलझनो परेशानियों और दसो तरह  दु:ख व्याधि के हरन का उपाय बताते इसलिए भी यह दु:ख दंशहरा परब है।
   क्वार शुक्ल एकम से  दशमी तक दस दिवसीय इस महापर्व का आयोजन होते है नित्य प्रात: शाम आरती पूजा के साथ साथ संत महंत गुरुओ द्वारा  ग्यान वर्धक व्यख्यान्न सत्संग प्रवचन गुरु ग्रंथ व चरित का पाठ एंव लोक कलाकारों द्वारा प्रेरक व मनोरंजक नाट्य मंचन गायन व नर्तन होते है।कही कही हर शाम सामूहिक भोग भंडारा होते है जिससे इस विकट समय टुटवारो के दिन में परस्पर मिलजुल कर सहभोज कर आत्मिक आनंदोत्सव मनाते है ।यह सब सद्गुरु के समछ  होते है।ताकि पुरी पवित्रता और महत्ता कायम रहे उनका सदैव आशीष मिलता रहे।इस कठिन वक्त जब फसलें खेत मे है और लगभग जन साधारण के अन्नागार कोठी खाली हो उस समय साधन सछम लोग जन कल्याणार्थ इस महा पर्व मे अन्नदान कर सामूहिक भोग भंडारा चलाते है ताकि गरीब गुरबा बडे बुजुर्ग महिलाओं  व बच्चो  को  गुरुप्रसादी के रुप मे भोजन मिल सके।और रात्रिकालीन होने वाले ग्यान वर्धक व मनोरंजक कार्यक्रमों का लाभ उठाकर सुखमय जीवन निर्वाहन कर सके।इसी  प्रयोजनार्थ  सतनाम संस्कृति मे यह महत्वपूर्ण आयोजन है।
    दसवें दिन "सदगुरुआसन" का  प्रात: शोभायात्रा निकाल ग्राम गलियों की परिक्रमा कराते है।और सदानीरा नदी सरोवर के समीप जल परछन कराकर वापस गुरुद्वारा या कोई श्रद्धालु अपने घर नित्य आगामी उत्सव तक पूजा अर्चन करने स्थापित करते है।
   शाम को तेलासी अमसेना खपरी बोडसरा ( वर्तमान मे स्थगित) खडुआ गुरु वंशजो के दर्शनार्थ जाते है शोभायात्रा और उनके सम्मुख श्री मुख से सद्गुरु की अमृतवाणी श्रवण करते कृतार्थ होते है।गुरु उपदेश सिद्धान्त रावटी महात्म से परिपूर्ण संत महंत की उपदेशना चौका आरती भजन पंथी एव ग्यान व मनोरंजन पूर्ण कार्यक्रम देख सुन कृतार्थ होते है।
    दूसरे दिन जग प्रसिद्ध भंडारपुरी गुरुदर्शन दशहरा पर्व का आयोजन हर्षोल्लास पूर्वक होते है।इस दिन हाथी घोडे ऊट पैदल चतुरंगी शोभायात्रा गुरु वंशजो व गुरुगद्दी नशीन धर्मगुरु का उपदेश व प्रवचन होते है।
   सतनामियो का यह सबसे बडा और प्राचीन महोत्सव है। जहां गुरुवंशज के घर से गुरु प्रसादी भोग भंडारा पाकर श्रद्धालु गण लोग धन्य-धन्य हो जाते है।
     छग मे स्थापित सतनामधर्म का यह उत्सव १८२५ में जब मोती महल गुरुद्वारा का उद्धाटन हुआ और राजा घोषित होने बाद चतुरंगी सेना साजकर आम‌जन मानस को दर्शनार्थ सद्गुरु घासीदास के मंझले पूत्र राजा गुरु बालकदास  भाई आगरदास पुत्र साहेब दास हाथी मे संवार आमजनमानस के बीच आकर गुरु उपदेशना व पंथ संचालन हेतु आवश्यक दिशा निर्देशन किए।
  तब से यह विशिष्ट आयोजन परंपरागत आन बान से हर्षोल्लास पूर्वक मनाते आ रहे हैं।

डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ ९६१७७७७५१४

Thursday, September 18, 2025

पुरखौती मुक्तांगन में मध्य छत्तीसगढ़

रजत उत्सव के अवसर पर 

पुरखौती मुक्तांगन में मध्य छत्तीसगढ़  

    छत्तीसगढ़ प्राकृतिक और भौगोलिक रुप से तीन भागों में विभक्त हैं। उत्तर में सरगुजा का पाट, मध्य छत्तीसगढ़ का मैदान और दक्षिण में बस्तर का पठार । पूर्व में महानदी का पावन प्रवाह वाली लारियांचल तो पश्चिम में डोंगरगढ़ भोरमदेव सतपुड़ा मैकल श्रेणी में अवस्थित चिल्फी घाटी की हसीन वादियां हैं ।इन  जगहों की भाषा कला संस्कृति भी अलग हैं। प्रदेश की इन जगहों की विशेषताओं और महत्ता को बताने हेतु पुरखौती मुक्तांगन की परिकल्पना की गई ताकि प्रदेश की प्राचीन धरोहरों और जीवन स्तर लोक मान्यताओं को पर्यटन करते एक ही जगह उपस्थित होकर कुछ घंटों में  आधारभूत ढंग से सामान्य (मोटे )तौर पर समझा जा सके।
   यहां सरगुजा ,बस्तर प्रखंड तो हैं जहां परन्तु मध्य छत्तीसगढ़ नहीं। इस कारण यहां की सांस्कृतिक वैभव में अनेक कमियां नज़र आती हैं। बाह्य पर्यटकों को लगता हैं छत्तीसगढ़ आदिम जनजीवन और संस्कृति के ही संवाहक अत्यंत पिछड़ा  वनांचल राज्य हैं। जहां स्त्री पुरुष अर्ध विवृत जीवन जीने विवश और केवल नाच- गाने में मंद मऊहा सल्फी ताड़ी हड़िया कोसना में उन्मत लोग हैं।  मंचीय प्रस्तुतियों में भी लोक संस्कृति के नाम पर यहीं भाव प्रदर्शित होते हैं।
   जबकि मध्य छत्तीसगढ़ की गौरव शाली एवं सौंदर्यबोधक वस्त्राभूषण, साबुत अनाज (बिना सड़े गले खमीर आदि उठाएं) की खान पान ,रहन सहन किसी भी राज्य से कमतर नहीं। यहां की भाषा और उनमें उपलब्ध साहित्य दर्शन उत्कृष्ट हैं। लोक कलाएं विविधतापूर्ण और समृद्ध हैं। किसी राज्य की एक दो या पांच लोक नृत्य होंगे पर यहां स्त्री पुरुषों की पृथक और युगल दर्जनों नृत्य  शैलियां  है जिसमें पंथी,राउत,कर्मा, सुआ,शैला, रीलों,बार, सरहुल, ककसार ,डंडा, मांदरी, हरे राम हरे कृष्णा, रमसत्ता, रहस,  छैला नाच, देवार नृत्य जैसी विशिष्ट शैलियां हैं। शास्त्रीय नृत्य में रायगढ़ घराना और खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय तो लोक और शास्त्रीय संगीत विविध ललित कलाओं की  साधना स्थली हैं जहां देश विदेश से कलावंत आते और सीख समझ कर जाते हैं।
     अनेक पर्व उत्सव मेले मड़ाई हाट बाजार पसरा हैं ।और जनजीवन तो अन्य जगहों के अपेक्षा  थोड़े में संतुष्ट संत संस्कृति के संवाहक हैं। जिनमें प्राचीन सहज यान महायान नाथ सिद्ध  शैव शाक्त वैष्णव बौद्ध जैन संस्कृति की समन्वय स्थली हैं जहां आर्य अनार्य संस्कृति का समागम होते हैं। दक्षिणा पथ के नाम से विख्यात सद्वाहों सतवहनो की धरती में अनेक ख्यातिनाम भट्ट प्रहरी हुए हैं। जिसमें सम्राट विजयस जिसके समय में बुद्ध का आगमन राजधानी सिरपुर में हुआ। वहीं नागार्जुन आनंद प्रभु, जैसे आचार्य हुए। वल्लभाचार्य,कबीर धर्मदास गुरुघासीदास, अमरदास ,विवेकानंद महेश योगी , संत गहिरा गुरु , ओशो ,स्वामी आत्मानंद , पवन दीवान  जैसे संत को जन्म और आकार देने वाली शस्य श्यामला धरती हैं ।इसलिए इसे उत्तराखंड  हिमाचल को जैसे देवभूमि कहते हैं ठीक यह संतो की धरती छत्तीसगढ़ को " संतभूमि"  कहते हैं। 
   सिरपुर राजिम, शिवरीनारायण गिरौदपुरी दामाखेड़ा तुम्मान, ताला,मल्हार चैतुरगढ़, डमरू खरचा, आरंग रीवा, खल्लारी, चंद्रपुर, डोंगरगढ़ भोरमदेव  रतनपुर दल्हा, जलेश्वर,  जैसे ऐतिहासिक धार्मिक नगरी आस्था के केंद्र हैं। छत्तीसगढ़ में तीन साक्षात् त्रिवेणी संगम राजिम , पंजनी पैसर और शिवरीनारायण हैं जहां कल्प कुंभ किए जा सकते हैं जो कि अन्यत्र दुर्लभ हैं। कोरबा भिलाई, चिरमिरी ,नगरनार, तमनार जैसे औद्योगिक तीर्थ नगरी और गंगरेल हसदेव जैसे विशालकाय बांध सागर जैसे दर्शनीय हैं।रायपुर बिलासपुर दुर्ग राजनांदगांव जगदलपुर  अंबिकापुर जैसे प्रशासनिक संवैधानिक और सांस्कृतिक नगर देश के अन्य नगरों से सदृश्य हैं।
     इनके संरक्षक बलिदानी राजाओं में कल्याण साय,गुरु बालकदास, गेंद सिंह, वीर नारायण सिंह,  गुण्डाधुर मूंदरा मांझी प्रवीण चंद्र भंजदेव जैसे रत्न हैं। 
  गौरक्षा आंदोलन 1915 के प्रणेता राजमहंत नयन दास महिलांग गुरु गोसाई अगमदास जंगल सत्याग्रह के नायकों में बूढ़ान शाह रामचरण दयावती कंवर , तो नहर सत्याग्रह में नारायण मेघवाले, छोटेलाल सामाजिक क्रांति और मंदिर प्रवेश के लिए प सुंदरलाल शर्मा, पंमिलऊ दास कोसरिया, प. तुलम तुलाई लोगों के कारण स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि बनी। जिसमें मिनीमाता राधाबाई दयावती कंवर राजमोहिनी देवी जैसी मातृ शक्तियां भी बढ़ चढ़ हिस्सा ली और समाज / देश सेवा  के लिए स्वयं को समर्पित की 
   कला जगत में  मंदराजी, रामचंद्र देशमुख, महासिंह चंद्राकर ,दानी दरवन, चम्पा बरसन हबीब तनवीर, शेख हुसैन, देवा दास बंजारे, सुकालदास भतपहरी, मेहतर साहू,  गंगाराम शिवारे नारायण वर्मा  झाडूराम देवागन,  सहित पंडवानी की पुरखिन दाई सुखबती, लक्ष्मी बंजारे तीजन बाई सुरुजबाई फ़िदाबाई, मालाबाई जैसी मौलिक सितारा कलाकार हैं। जिसकी अनुशरण कर लोग प्रसिद्धि की शिखर स्पर्श करते आ रहे हैं।
साहित्यकारों में  ठाकुर जगमोहन पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पद्म श्री मुकुटधर पाण्डेय, लोचनप्रसाद, मुक्तिबोध,मनोहरदास नृसिंह, द्वारिका प्रसाद तिवारी, हरि ठाकुर , प्रमोद वर्मा केयूर भूषण मदनलाल गुप्त प सुकुल दास घृतलहरे, शाखा प्रसाद बघेल, शानी ,सुकाल दास भतपहरी , लक्ष्मण मस्तूरिया,  सुशील यदु श्यामलाल चतुर्वेदी लाल जगदलपुरी,हरिहर वैष्णव,इत्यादि अनेक साधक हैं। इन सबकी की यादें, मध्य छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण  ऐतिहासिक घटनाओं  और जीवन स्तर की झलकियां भी उक्त ओपन म्यूजियम / खुला संग्रहालय  "पुरखौती मुक्तांगन" में होना चाहिए। ताकि लोगों को छत्तीसगढ़ की विविधता और एक साथ आदिम जीवन और आधुनिक जीवन शैली का साक्षात्कार हो सके। प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी के अनुसार एक  साथ 10 वी और 21 के जीवन शैली को देखना हो तो और उन्हीं के तकिया कलाम अमीर धरती के गरीब लोगों की धरती छत्तीसगढ़ में स्वागत हैं।
    राज्य के पच्चीसवें वर्ष में रजत जयंती के पावन अवसर में राज्य की सर्वाधिक बसाहट वाले मध्य क्षेत्र की  सांस्कृतिक तत्व की जाने- अनजाने में अनदेखी न हो और देश के नागरिकों को राज्य की तीनों प्रखंडों की सांस्कृतिक वैभव का झलक पुरखौती मुक्तांगन प्रांगण में सहज दर्शनीय हो इनकी व्यवस्था होनी चाहिए। ताकि अनेक विरोधाभासों का सम्यक समाधान तलाशा जा सकें। सुखी और समृद्ध छत्तीसगढ़ गढ़ा जा सकें।

      जय छत्तीसगढ़ 

डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

Tuesday, September 16, 2025

भाषाई श्रेणी क ख ग के चिखला म चभके छत्तीसगढ़ी

 ।।भाषाई श्रेणी क ख ग के चिखला म चभके छत्तीसगढ़ी।

  एक नवंबर ईस्वी सन 2000 में देश के 26 वें राज्य के रुप में  छत्तीसगढ़ बनिस। हिंदी भाषी राज्य मध्यप्रदेश ले छत्तीसगढ़ी भाषा के विस्तार क्षेत्र ल भाषाई  अउ सांस्कृतिक आधार पर चिन्हांकित करके  छत्तीसगढ़ राज अलग होइस। हालांकि बालाघाट, अमरकंटक अनूपपुर  के कुछेक एरिया तकों आतिस।फेर जतेक आइस ओहर अनेक  विशेषता से परिपूर्ण हवय। ते पाय के  छत्तीसगढ़ हर झटकुन  देश भर अपन पहचान बनालिस. 
  अब तो छत्तीसगढ़ महतारी हर 25 बछर के होगिस जइसन ये उमर मे बेटी माई मन के सुघरई बाढ़ जाथे उही रकम के हमर छत्तीसगढ़ के सुघरई अउ महमई चारों खुट बगरत हवय.
   ते पाय के सबो डहन ले  इहा लोगन के आय जाय के रेम लगे हवय. स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, रेल कल कारखाना सहित उद्योग बाईपार के बढ़वार होवत हवे. फेर कोजनी इंहा के मनखे मन कमाए- खाय बर परदेस जवई छूटत नइहे. देवारी मान खलक उजरे कस गांव के गली सुना पर जाथे। इंहचे येमन बर कोन्हो बुता_ काम काबर नइहे? खांती कुदारी ,रापा गैती के सिवाय कोनो दूसर कराज नइहे का? जब ले जेसीबी, हाइवा ,हाइड्रा आये अब झउहा रापा कुदारी मन नंदा गय. बनिहार मन अब बनी नई मिलय ते पाय के ठल्हा बैठे चौरा मे बीड़ी गांजा मंद माखूर खात -पियत,लड़त- झगरत,थाना -पुलुस,कोरट- कचहरी मे मुंशी,वकील कना लुटात दिख थे.सालपुट खेत बेचत किसान बनिहार होगे.
गाँव मन मे तो अंधियारी छाय हे ,भले शहर पहर मन दगदगात हे.गवई के कुछेक पढ़े लिखें नौकरी चाकरी,हुनर वाला हे ओमन तकों शहर धरे हे अउ अपन सुग्घर रोजी रोजगार मे मगन हवे. फेर कतको झन मन गरु जांगर धरे गरुआत बैठे हे उनकर मन बर कोनो उद्योग बाईपार रोजी रोटी के बेवस्था नइहे तेन हर बड़ संसो अउ गुनान  गोठ आय. इनकर बिन सजोर उपाय करें छत्तीसगढ़ के उद्धार नइहे.

इहि तरा इहाँ के  राजभाषा अउ दाई भाखा छत्तीसगढ़ी के तको कोनो पुछन्ता नइहे. अतेक बड़ राज अउ दू करोड़ मनखे के बोले बतियाये समझे के भाषा मे कोनो दैनिक समाचार पत्र नइहे. टीवी चैनल नईए न खोल चला सके कोनो मूल छत्तीसगढ़िया के हैसियत हवे।  स्कूल कॉलेज मे  न पढ़ाई चलत हे ,न मास्टर गुरुजी के भर्ती हे. तब भाषा हर कबतक बाचे रही. गांव गवई ल छोड़ दे शहर मे बसे छत्तीसगढ़िया परिवार मे अब छत्तीसगढ़ी नंदा गे  हवय. अउ यही हाल रही त छत्तीसगढ़ी हर झटकुन गाँव - गवई ले तको नंदा जाही. ये हर बड़ दुःख के बात हवय. तेहि पाय के पर प्रांतिक मूल के गैर छत्तीसगढ़ी भाषी छत्तीसगढ़िया मन जेन सियानी करत हे उकरे चलथे ओमन हमारे लोगन ल भरमाए हवे कि छत्तीसगढ़ी में का रखे हे। अपन बाल बच्चा ल हिंदी अंग्रेजी पढ़ा और देश दुनियां भेज कहके मूल संस्कृति के जुड़ाव ल जर सहित उखानत हे काबर कि भाषा नई रही त संस्कृति तो अपने आप विलुप्त हो जाही। बहुत अकन लोक परब लोक कथा कहनी गीत भजन सब नंदावते जात हे। नवा पीढ़ी मन टीवी रेडियो पेपर में जोन देखथे ओला ही अपना लेथे। संस्कृति विभाग कुछेक लोक कलाकार मन के नाचा गम्मत बाजा रुजी के प्रदर्शन कराथे फेर ओकर आरो पता बने  नई होय। आजकल विभाग के मेहरबानी में ही चंट कलाकार चलत हे।बाकी लोक कलाकार ल काम तकों नई मिलय जबकि एक समें अइसे रहीस कि साल में चार महीना किसानी आठ महीना कलाकारी म निकल जाय। मेला मड़ई जयंती परब छठी बिहाव मरनी हरनी तकों म तरह तरह के लोक कलाकार मन काम अउ मान सम्मान मिलय टीवी सीडी फिलिम सनीमा अब तो मोबाईल बैरी हर सब ल निगल लिस। सार्वजनिक मनोरंजन हर पारिवारिक अब तो मोबाईल हर एकल मनोरंजन के रुप मे लोक तत्व ल पूरा खतम कर डारिस।

छत्तीसगढ़ी ल 2007 मे राजभाषा बनाय के  18 बछर बीत गे फेर कोनो बढ़वार नई हे. पुरा राजभर म 18 ठन आवेदन आदेश घलाव छत्तीसगढ़ी म दिखऊ सुनउ नई हे. लोगन तको लिखें पढ़े बर कनउर मरथे अइसे कइसे अपन मनोदशा ल बनाय राखे हे ओकर गम नई मिलय. जबकि राजभाषा आयोग हर सरलग सभा सुसाटी के करत जनता मन सो गिलौली करत आवत हे. मय अपन सचिव छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के कार्यकाल म कतको घाँव जोजिया डारे हव फेर सब कोजनी का सेती बौरे नहीं न कोनो समस्या बताय. का साहेब मन छत्तीसगढ़ी आवेदन ल स्वीकारे नहीं या उकर ऊपर कार्यवाही नई करय कोनो पच परगट बताय घलो नहीं.तब करन त करन इंहा के भाषा बर बाना बांधे मनखे मन तको कठुवाय रहिथे. भाषा बर रोजी रोटी पाय के आस म 2013 ले छत्तीसगढ़ी म एम ए करे एक हजार बेरोजगार छात्र मन संगठन बना के संघर्षरत जरुर हवे फेर उनकर  बात हर जिहा पहुंचना चाही उहाँ तक पहुँच नई पात हे. काबर अइसे हे एकरो गुनान करे जा सकत हे. 

   शासन प्रशासन के मजबुरी हवे कि छगत्तीसगढ़ी हर आठवी अनुसूची म संघरे नइहे ते पाय के ये भाषा के शिक्षक अनुवादक अधिकारी कर्मचारी आदि बनाय बर विज्ञापन नई निकाल सकत हे. स्कूल मे हिंदी के सहायक भाषा बोली समझ कुछेक पाठ मिंझारे हवे ओला छत्तीसगढ़ी भाषी हिंदी के शिक्षक मन पढ़ा लेवत हे ते पाय के अलग से भर्ती नई होवत हे. ये हर बड़ बिचित्र बात आय.
   असल मे छत्तीसगढ़ हर ब्रिटिश काल मे आजादी के बाद 1950 तक सीपी एंड बरार के हिस्सा रहिस. तब अंग्रेजी / मराठी हर राजभाषा रहिस अउ सरकारी कामकाज उही भाषा के संग हिंदी मे होवत रहिन. काबर कि लॉर्ड माइकले के शिक्षा  नीति के चलते  स्कूल में मराठी के जगा  हिंदी में पढ़ाई लिखाई होईस.  जब 1 नव 1950 मे जब  मध्यप्रदेश के गठन होइस तब देश के मांझोत मे होय ले प्रमुख रुप से हिंदी भाषा राज्य "क "श्रेणी मे संघार दे गिस. घुन मे कीरा कस छत्तीसगढी रमजा गे. काबर कि अंग्रेजी मराठी जैसे भाषा ल कतको बच्छर ले संग रहें ले घलो आत्मसात नई करे रहेन. भलुक रामायन, महाभारत,  आल्हा रहस,  पंथी,सतनाम निर्गुण भजन,कबीर रैदास भजन के चालागन रहिस अउ लोगन ब्रज अवधि भोजपुरी ल छत्तीसगढ़ी कस आत्मसात कर ले रहिस. ये भाषा के कवि  गायक कलाकार मन नाचा गम्मत रहस लीला सत्संग प्रवचन करत जनजीवन म बड़ गहराई ले प्रभावित करे रहिन. ते पाय के यहीं भाषा विभाषा बोली के मिंझारा सरुप हिंदी ला अपना लेन अउ "क" श्रेणी जेकर मातृ भाषा अउ राजभाषा हिंदी  घोषित हो गई. इसमें उप बिहार मप्र संघरे हे ते पाय तछत्तीसगढ़ राज हर "क" श्रेणी मे अपने आप आ गे.अउ इंहा हिंदी भाषी उप बिहार मप्र वाले मन के शासन प्रशासन अउ उदयोग बाईपार मे एकतरफा एकाधिकार होगे. मतलब भाषा हर विकास के प्रमुख कारक बन गे.
   जबकि  छत्तीसगढ़ राज अलग होइस उही समे येला ख श्रेणी मे राखे के जरुरत रहिस.जैसे महाराष्ट्र गुजरात राजस्थान हरियाणा पंजाब आदि हवय.भले ओ समे नई हो पाईस फेर सबो झन ल उमिहा के  छत्तीसगढ़ ल "ख" श्रेणी मे  राखे बर उदिम करना चाही. काबर कि शिक्षा के सवा सौ साल के इतिहास अउ सतत प्रचार प्रसार के बाद भी ग्रामीण क्षेत्र मे हिंदी के व्यवहार चिटको नइहे. छत्तीसगढ़ी अपनाबो  तभेच मराठी गुजराती हरियाणवी /पंजाबी जइसे स्थिति छत्तीसगढी के होही अउ स्वतंत्र विकास के रास्ता खुलही. इंहा के संपर्क भाषा हिंदी रही .
   तीसरा श्रेणी" ग "आय जेन उड़ीसा बंगाल असम सेवन सिस्टर्स राज्य,आंध्रा कर्नाटक  तमिलनाडु केरल जैसे स्वतंत्र भाषाई राज्य हैं. ऊहा अपन अपन राज के भाषा म ही शिक्षा रोजी रोजगार दे जाथे। इहाँ सम्पर्क भाषा अंग्रेजी हवे. 
तेकरे सेती देश ले अंग्रेजी हट नई पात हे न अब ऐसे कोनो शक्ति नाईये कि ये औपनिवेशिक ब्रिटिश सत्ता के भाषा ल खारिज कर सके। काबर कि ज्ञान विज्ञान उद्योग व्यापार न्यायलय के भाषा अंग्रेजी हो चुके हे। 
   तब कम से कम राज्य के अस्मिता अंचल के सांस्कृतिक महक ल बचाएं सेती स्थानीय भाषा में शिक्षा राजकाज जैसे मानविकी समूह के विषय के पढ़ाई लिखाई कर के जतने तो जा सकत हे।
  जय छत्तीसगढ़ जय छत्तीसगढ़ी।

डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
    सेंट जोसेफ टाउन अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़

Monday, September 15, 2025

Panthi Nritya : Sahpidia

https://www.sahapedia.org/panthi-nritya-dance-of-devotion-of-the-satnamis?fbclid=IwdGRzaAM1GjhjbGNrAzUaCWV4dG4DYWVtAjExAAEeJRDaZivubS-nO7AICnZLc3LpGkpzMJ9ILIfiLw-dUr2oIUvJVnCzBldS1NU_aem_Sy3-LCG5xvA9pALl-SjY9Q&sfnsn=wiwspwa#lg=1&slide=0