Friday, October 3, 2025

अनावश्यक रुप से आवश्यक हस्तक्षेप

।।अनावश्यक रुप से आवश्यक हस्तक्षेप।।

   सोशल मीडिया प्रायः पोस्ट/ पेस्ट/सर्च कर्ता ,लेखक एवं पाठक के मिजाज़ का अध्ययन कर उनके रुचि अनुरुप सामग्री पेश करते हैं ।इसलिए प्रायः हर व्यक्ति को यह माध्यम सम्मोहक लगता हैं। जितना वे जानते समझते हैं ,उसे और भी बेहतर करते हैं। इस कारण उनके मायाजाल में  लोग फंसते जा रहे हैं । 
     यह आपका  समय,संसाधन( डेटा)स्वास्थ्य को बर्बाद कर रहे हैं। हालांकि खाली बैठे लोगो में बहस परिचर्चा कर टाइम पास के लिए भी यह बेहतर माध्यम हैं। शासन -प्रशासन  के लिए भी राहत की बात हैं कि बेरोजगारी भी बेरोजगारों के लिए  बोझ नहीं रहा ,बल्कि किसी के पास काम मांगना, हक अधिकार के लिए संघर्ष या हड़ताल आदि करना तो दूर ये सब करने के लिए समय ही नहीं हैं। 
बीवियों/बच्चों भी इसमें इतना इंवॉल्व हैं कि पतियों का जेब मोबाईल रिचार्ज कराने के सीमित खर्च में ठाठ से चल रहे हैं। अब फरमाइश पूरा करने की रोना धोना और टेंशन से मुक्ति सी ही हैं।
    बाहर हाल यह मीडिया विहीन लोगों के लिए वरदान जैसा हैं। हथेली में पकड़े मोबाइल और की बोर्ड में चलते अंगुली से कई कमाल भी हो रहे हैं। इसमें उपलब्ध फेसबुक, वाटशाप मैसेंजर जैसे सोसल मीडिया , रिल्स, इंस्टाग्राम, ट्यूटर, यूट्यूब इत्यादि लोगों तक पहुंचने अपनी बातें रखने और विविध कलाओं के प्रदर्शन से प्रसिद्धि पाने और रुपए कमाने तक का साधन बन चुके हैं। 
    एक अकेला मोबाईल मोबाईल रेडियो,टार्च, घड़ी पोस्ट,ऑफिस,चिट्ठी,पत्री,बैंक, और बाज़ार से हर वस्तु की खरीददारी या कोई और अन्य सेवा लेने का विश्वनीय माध्यम हो चुके हैं। भले मनुष्य का सार्वजनिक जीवन एकांतिक हो रहे हो, परन्तु मानव जीवन में "अनावश्यक रुप से आवश्यक हस्तक्षेप "हो गए हैं। 

कितने ही कह ले पर अब ,कोई नहीं रहा हैं सुन 
सोचा नहीं यह जीवन होंगे ,इनके बिन  सब सून 

डॉ अनिल भतपहरी/ 9617777514

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