Monday, September 15, 2025

हिंदी और राष्ट्रप्रेम

#anilbhattcg 

हिंदी और राष्ट्रप्रेम 

जम्बूद्वीप प्राचीन भारत की जनभाषा प्राकृत पालि और मध्यकाल से आयातित अरबी फ़ारसी की युति से 14 वीं सदी में हिंदी भाषा अस्तित्व में आई । इसके साधकों और प्रेमियों ने अपरिमित और अप्रतिम साहित्य रचकर इसे वैश्विक विस्तार दिया। परन्तु दुर्भाग्यवश ब्रिटिश औपनिवेशिक की अंग्रेजी भाषा और उससे रौब दाब से यहां के प्रशासक वर्ग  जिनकी संख्या महज 10% ,भी नहीं हैं के मोह के कारण तकनीकी शिक्षा तो दूर ऑफिस बैंक न्यायालय की भाषा भी आज पर्यंत नहीं बन पाई बल्कि अंग्रेजी के द्वारा ही देश वासियों के ऊपर हमारे ही लोग अंग्रेजों जैसा व्यवहार करते आ रहे हैं।
    आजादी के अमृतकाल में भी देश वासियों को उनकी अपनी मातृ भाषा में शिक्षा और न्याय नहीं मिल पाना कितना दुर्भाग्य हैं।
      लगभग सवा अरब वाली विशालकाय देश का अपना एक राष्ट्रीय भाषा तक नहीं हैं। संपर्क भाषा के रुप में चंद मुट्ठी भर लोगों द्वारा औपनिवेशिक भाषा अंग्रेजी को बनाएं रखना कौन सी देश भक्ति और राष्ट्रप्रेम हैं? 
   धर्म को राष्ट्र प्रेम से जोड़ने वाली बातें तो अक्सर सुनी जाती हैं पर भाषा को राष्ट्रप्रेम से जोड़ने की बातें क्यों सुनाई नहीं देती? 
    हिंदी दिवस पर निरीह जनता जनार्दन को बधाई जिन्हें उन्हें न्याय मांगने और फैसले जानने के लिए उनके हितार्थ कानून को समझने किसी अंग्रेजी दा वकील की सहारा लेने पड़ते हैं। यह देश वासियों का सौभाग्य हैं कि दुर्भाग्य हम जैसे मूढ़ मति को आज तक समझ नहीं आया।
  भले तकनीकी चिकित्सीय शिक्षा के पाठ्यक्रम बनाने और लागू करने में अक्षम हैं परंतु इनके अतिरिक्त न्यायालय और केंद्रीय कार्यालयों में बैंक व्यापारो में जनता की भाषा व्यवहृत नहीं कर पा रहें हैं यह कैसी विडंबना हैं।
सच कहे तो हिंदी विविध मातृभाषाओं की मेल से बनी हुई हैं ।यह भारतीय जनमानस को समन्वय भाव से बांध कर रखने वाली हैं परन्तु औपनिवेशिक अंग्रेजी भाषा और उनके आशिको ने इन्हें दासी बनाने पर तुले हुए हैं।
अंग्रेजी से हिंदी और सभी मातृभाषाओं को खतरा हैं।  यही हालत रहे तो 50 साल बाद अंग्रेजी  सबको निगल लेगी। ग्लोबल विलेज में  युवावर्ग अर्धनग्न हो रॉक _पॉप करते रहेंगे वृद्धाश्रमो में  वर्तमान अंग्रेजी प्रेमी जन सेवाएं गवार  ग्रामीणों से सेवाएं लेते अपने काबिल संतानों से चंद बातें करने तरसते रहेंगे।

     बहरहाल अमृतकाल में देशवासियों को हिंदी दिवस की हार्दिक बधाई। कृतज्ञ राष्ट्र की बिंदी हिंदी बने इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ...

                  जय हिंद जय हिंदी 

चित्र: हिंदी की सुप्रसिद्ध लेखक नैमिशरॉय जी के साथ

डॉ.अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

Saturday, September 13, 2025

सतनाम साहित्य और दलित साहित्य

सतनाम साहित्य और दलित साहित्य 

जहां शोषण हुआ वहां प्रतिरोध हुआ हैं। कहीं मद्धिम तो कही प्रखर ! इनके विचारकों में दैन्य और रौद्र भाव प्रस्फुटित हुई ।दैन्य भाव से ही दलित साहित्य के उद्गम हुआ अपनी जन्म जाति भाग्य को कोसते भगवान से कृपा दया की याचना हुई  । एक तरह से भक्तिकाल के दास्य और दैन्य भाव को ही परिवर्धित कर बृज अवधि मराठी में यह लिखी गई।जबकि  रौद्र भाव ने कल्पित ईश्वर और उनकी व्यवस्था को खारिज कर दिए । इन्हें ज्ञानमार्गी निर्गुण संतो गुरुओं का संबल मिला।इस तरह अलग जीवन पद्धति /संस्कृति विकसित हुई और उससे अलगाव हुआ फिर वहीं द्वेष में बदल गए । जैसे पंजाब , छत्तीसगढ़ में सिख ,सतनाम पंथ और सतनामियों का सतत आंदोलन फिर उनसे निर्मित सतनाम साहित्य। जैसे_ मंदिरवा म का करें जइबोन पितर मनई बइहाय कस लगथे . तोर अंतस भीतरी म बिराजे हे सतनाम इत्यादि।  प्रवर्तनकारी और उदात्य भाव स्वर के कारण सतनाम साहित्य को दलित साहित्य की श्रेणी में नहीं लेते और न ही यह दलित साहित्य के मापदंड पर किसी तरह आते हैं।
   बाहर हाल समानता और मानवता पर केंद्रित छत्तीसगढ़ी भाषा में रचे सतनाम साहित्य पंथी गीतों, साखी, रामत रावटी वृतांत और गुरु घासीदास के उपदेशों सिद्धांत अमृतवाणियों का अनुवाद देश के क्षेत्रीय भाषा के साथ राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय भाषा में हो। इनपर मिली जुली राष्ट्रीय संगोष्ठी परिचर्चाये हो तो जनमानस में आत्मबल स्वाभिमान जागृत होगा और  भय भाग्य भगवान से मुक्ति मिलेगी। यह बदलाव ही सतनाम संस्कृति का अभिष्ट हैं। सक्षम और प्रज्ञावान लोगों को इस दिशा में मिलकर काम करना चाहिए। गुरु घासीदास शोध पीठ जैसे संस्थान बेहतर कार्य कर सकती हैं इसके लिए शासन/ प्रशासन को संज्ञान लेना चाहिए।
     जय सतनाम

डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

Monday, September 1, 2025

महानदी से महाकल्याण

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स्वागतेय पहल : बशर्तें नीयत और नज़रिया सही हो 

महानदी से महाकल्याण 

छत्तीसगढ़ से निकलने वाली सभी छोटी बड़ी नदी नाले महानदी में समाहित हो जाती हैं। राज्य के जल प्रवाह को एकत्र कर  सारंगढ़ जिला मुख्यालय से सटे जिला संबलपुर (उड़ीसा) तक महानदी ले जाती हैं जहां पर "हीराकुंड " एशिया का सबसे बड़ी बांध हैं। इसका उपयोग उड़ीसा करती आ रही हैं। बाढ़ से उलट जल चिल्का झील बनती हुई बंगाल की खाड़ी (सागर)में समा जाती हैं।
     मतलब छत्तीसगढ़ में महानदी केवल गंगरेल बांध, वह भी भिलाई स्टील प्लांट के लिए बनी हैं। केवल रुद्री बराज से धमतरी,रायपुर, बलौदाबाजार मात्र 3जिला जो कि बांध निर्माण के समय एक ही जिला रायपुर  ही था । इसके महज 30 %ही सिंचित होते हैं कम वर्षा हो तो रुद्री बराज के लिए पानी नहीं देते क्योंकि भिलाई के लिए अनिवार्य पानी चाहिए । यहां बिजली भी कोयला से ताप विद्युत केंद्रों में बनाए जाते हैं। मतलब हमारे घरों की छानी से टपका ओरवाती के पानी खेतों, जंगलों से बहती हुई जल हमारा ही नहीं, कैसी विडंबना हैं? 
    छत्तीसगढ़ में , इंद्रावती, शंखनी डंकनी, पैरी, तेल,
सोढूंर, शिवनाथ, अरपा,हाफ , सेत गंगा, आगर, हसदेव, केलो, लीलागर, जोंक , सोन जैसी महानदी की सहायक नदियां और  सैकड़ों उनकी सहायक नाले और झोरकिया हैं।
    हमलोग महानदी तटवर्ती सिरपुर के समीप चिखली जुनवानी के कृषक हैं । जो कि आरंग पलारी ( कसडोल )विधान सभा के मूल निवासी हैं।बरसात में  खरीफ फसल  धान, उड़द तील आदि बाढ़ की डूबान में तबाह हो जाते हैं।  और रबी फसल के लिए जल स्रोत नहीं हैं,सारा भूजल नदी खींच ले जाती हैं। फलस्वरूप पूरा नदी तटवर्ती इलाका भीषण गरीबी और पलायन की पीड़ा झेलते आ रहे है। 3 दशक पूर्व चितावर और नाले की चुहरी यानि झिरिया के पानी पीने विवश थे। जल स्रोत के लिए छोटी नाला में कच्ची बधानी बांध खेती बाड़ी के लिए हमारे पूर्वजों ने उपाय किए । मै स्वयं हमारे गांव जुनवानी के पतालू नाला को पिता श्री के मार्गदर्शन में श्रमदान करते कच्चा बधानी बांधे और निस्तार करते थे। कछार क्षेत्र में झरिया कुआं बनाकर  टेड़ा बाडी (अब सौर पंप लगाकर) अक्टू से फरवरी 5 महीने कठोर परिश्रम कर जीवन निर्वहन करते आ रहे हैं। मतलब नदी हमारे लिए वरदान होते वह  उचित प्रबंधन स्टॉप डेम आदि नहीं होने से अभिशाप टाइप ही रहा।
     अब वर्षा कम होने से बाढ़ की दंश से जरूर बचे लेकिन भूजल नहीं होने से हालात यथावत हैं। नदी तीर रहकर प्यासा हैं। हमलोग हर दस किमी में स्टॉप डेम खासकर सिरपुर जैसे ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी बार अभ्यारण  को छत्तीसगढ़ और उड़ीसा सीमांचल को जोड़ने पुल और रुद्री बराज जैसे ही समोदा डायवर्शन बनवाने प्रस्ताव हेतु जनजागरण चलाते रहे। समकालीन समय में पलारी विधायक  रामलाल भारद्वाज (भवानीपुर )और हमारे शिक्षक पिताश्री सुकालदास भतपहरी (जुनवानीसहपाठी थे) बिसौहा गुरुजी चिखली इत्यादि लोगों ने प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी को समोदा डायवर्शन के लिए सलाह दिए तब  मेरे अनुज सुनील भतपहरी पानी पंचायत कनकी ( खरोरा)सब डिविजन का अध्यक्ष था। इन प्रतिनिधियों ने निवेदन किया कि इससे ट्रांस महानदी क्षेत्र में खुशहाली आएगी पर्यटन बढ़ेगा । सब्जी बाड़ी, डेयरी,मत्स्याखेट जैसे उद्यम बढ़ेगा और लाखों लोगों को रोजी_ रोजगार मिलेगा । परिक्षेत्र में प्रतिवर्ष दीपावली के बाद  पलायन कर जाते हैं वह थमेगा,परन्तु समकालीन सत्ता समोदा में स्टॉप डेम बनाकर  महानदी का पानी निजी पॉवर प्लांट खरोरा को पानी बेच दिया गया। जनता ठगे से रह गए ! समोदा बराज डायवर्शन (निसदा आरंग) से आज पर्यन्त इस दिशा कार्य नहीं हुआ ताकि क्षेत्र के कृषकों को लाभ मिल सकें। बल्कि यहां से नवा रायपुर के लिए पानी जाएगा यह बातें हो रही हैं।
  सच कहे इस अनु जाति वर्गों के लिए सुरक्षित क्षेत्र में ढंग से नेतृत्व नहीं पनप सका या पनपने नहीं दिया गया। आरम्भ से विधानसभा क्षेत्र होने के बाद कोई मंत्री नहीं बन सका। और तो और कोई उद्योग व्यापार भी नहीं स्थापित हो सका। लोक सभा भी सारंगढ़ (वर्तमान जांजगीर) रहा जो जितने उपेक्षित दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्र था उन्हें मिलकर 3_4 जिलों में विस्तारित क्षेत्र को हास्यास्पद टाइप का सीमांकन कर लोकसभा के लिए आरक्षित कर दिया गया ताकि गुरु घासीदास बाबा और वीर नारायण सिंह की जन्मभूमि वाला भूभाग विकास से कोसो दूर रहे। जहां सामाजिक क्रांति और अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध बिगुल फूंका गया आजादी के बाद उन रण बांकुरों के वंशज अकाल और बाढ़ का दंश झेलते पलायन करने बेबश रहे। दुर्भाग्य से आजादी के बाद आज तक लोकसभा का प्रतिनिधि निष्क्रिय और प्रभावहीन रहा या उन्हें ऐसा रहने पार्टी प्रमुखों ने निर्देशित कर रखा हैं कि क्षेत्र के विकास हेतु राष्ट्रीय परिदृश्य कोई स्वर ही नहीं गूंजता। इसलिए आजतक यह परिक्षेत्र उपेक्षित हैं।
            उड़ीसा सरकार नहीं चाहती की महानदी में बराज या स्टॉप डेम बने ।वो महानदी को खासकर छत्तीसगढ़ के आंतरिक जल प्रवाह को निचोड़ ले रहा हैं। यह कैसे संभव  हुआ ? कौन दोषी हैं?छत्तीसगढ़ से समृद्ध  और प्राचीन उड़ीसा राज्य अपने विशाल सागर तट से विशाल जलराशि से आधुनिक तकनीक से बिजली सिंचाई की व्यवस्था कर सकते है । अंतराष्ट्रीय सामुद्रिक व्यवसाय हैं और अरबों की कमाई हैं वे लोग पीने के लिए प्लाट लगा कर समुद्र की जल को नल जल योजना से सुदूर क्षेत्र तक पहुंचा सकते हैं। कृषि में उपयोग कर सकते हैं परन्तु छत्तीसगढ़ के पास महानदी को छोड़कर क्या विकल्प हैं? इनके बिना तो हमारा संसार ही प्यासा और सुनसान वीरान हैं। उस पर पूरा हक जताना और तमाम योजनाओं पर रोक लगवाना क्या उचित हैं? 
   छत्तीसगढ़ शासन_ प्रशासन को चाहिए कि राज्य के लिए वरदान नदी_ नाले के जल प्रवाह को अच्छी तरह प्रयोग करे, यूं ही समुद्र में बहाने न छोड़ दे। सर्वाधिक पलायन नदी क्षेत्र लोग क्यों करते हैं ? इन पर गंभीरता पूर्वक विचार कर उस क्षेत्र के नागरिकों से सलाह मशविरा कर जन कल्याणकारी योजना बनावे। क्योंकि छत्तीसगढ़ का लाईफ लाईन महानदी हैं और महानदी से ही छत्तीसगढ़ का महाकल्याण होना हैं। उड़ीसा का लाईफ लाईन तो महासागर हैं उनका उचित दोहन करें।

जय छत्तीसगढ़ ,जय भारत 

   जय छत्तीसगढ़

डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

Sunday, August 31, 2025

जय गणराजा

#anilbhattcg 

    * जय हो गणराजा *

जय हो गणराजा भरे सभा म आजा 
हर लव बिघन बाधा करव सुख काजा 
जय जय जय हो गणपति गण राजा...

रीत नीत ये दुनियां दारी म चभके हवन  
का करबे हमन निंदा चारी म बुड़े हवन 
दुर्बुद्धि मति ल हरन करके ले जा ...

मंद माखुर के निशा पानी में बुडत हवय देस 
अतलंग जवानी के सेती होवत हवय कलेस 
भटकत मति ल चिटिक सद्बुद्धि दे जा...

करमइता बर काम नहीं,न गुणवंता के दाम 
सिरावत हे सबों अंग, जम्मो बुता अउ काम 
कोंदा बौउला बने बैठे हवे जम्मों जनता गा...

जात पात धरम करम बर सबों झन लड़ कट मरय 
सत बिस्वास दया मया बर इकर जांगर नई चलय 
बोट के राजनीति बढ़ावे ईरखा जात पात गा ...

अंधरा सरकार भैरा  होगे हवय  साहेब  मन 
चोरहा संग मितानी बदे बइठे हवय सबों झन 
कोढीन बेवस्था बदले बर  बरदान दे जा ...

डॉ अनिल भतपहरी / 9617777514

Sunday, July 27, 2025

कविता की सोता फूटती हैं

#anilbhatpahari 

।।कविता की सोता फूटती हैं ।।

कहने से समझ आए 
ऐसी बात ही नहीं 
जो समझ नहीं आए 
उसे कहना ही नहीं 
इस तरह कही -अनकही में
बातें निकल ही जाती हैं
वे कहां आती कहां जाती हैं
यह तो पता नहीं 
पर मन में तो वही बसती हैं 
जो दिल से निकलती
या दिल में  रहती हैं
जैसे मच्छी जल में रहती हैं
पंछी गगन विचरती हैं
फूल पें तितली मंडराती हैं
शरद में शीत झरती हैं
बसंत में मीत के कंठ से 
प्रेम गीत गुंजती  हैं
और बारिस में
नदियों पर नाव चलती हैं 
चकित अनिल के जेहन से  
अनायस कविता की सोता फूटती हैं   

     डाॅ. अनिल भतपहरी / 9617777514

Friday, July 25, 2025

सूरज चंदा नाम जैतखाम

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जोड़ा जैतखाम में से एक  अब तक नहीं ऐसा क्यो ? 

 जय सतनाम 

सतनाम धर्म संस्कृति के प्रवर्तक गुरु घासीदास जी के सामाज सुधार व नव जागरण से प्रेरित हो ब्रिटिश शासन उनके  मंझले पुत्र गुरु बालकदास  जी को  1820 में राजा घोषित कर सोने की मूठ वाली तलवार भेंट किये और भंडारपुरी में में  भव्यतम  मोती महल ,गुरुद्वारा बाड़ा संतद्वारा बनवाकर सतनाम पंथ का सर्वत्र प्रचार -प्रसार करने लगे। महल के ठीक सामने चांद +सुरुज नाम का जोड़ा जैतखाम गड़ाए और धर्म ध्वज पालो चढ़ाकर प्रतिवर्ष भंडारपुरी में दशहरा के दूसरे दिन गुरु दर्शन मेला विजया एकादशी को  "भंडार दशहरा "के नाम से   गुरु दर्शन मेला की शुरुआत 1830 में किये गये । 
     इस पावन अवसर पर मार्गदर्शक  गुरुघासीदास सेत सुमन घोड़ा , प्रबंधक राजा गुरुबालकदास ,पुत्र गुरु साहेबदास  हाथी दुलरवा और संचालकअनुज गुरु आगरदास साहेब  सांवल घोड़ा मे में सवार निकलते। आसपास के अनेक एंव  दल आखाड़ा दलों  का भव्य प्रदर्शन के साथ बाजे- गाजे से शोभायात्रा निकलतेऔर उपस्थित हजारों लोगो को गुरुओ द्वारा धार्मिक उपदेशनाएं थे। यह प्रथा अब भी यथावत चला रहा हैं।
   मोती महल की उपदेशात्मक रुप शिल्पांकन विश्व में एकमात्र और अनुठा है। मंदिर के शिखर पर स्थित चारों कंगुरे पर  तीन बन्दरों एंव एक पर गरजते शेर का शिल्पांकन और सहस्त्र कमल दल के ऊपर स्वर्ण कलश , त्रिशरण का प्रतीक सात ज्योतिर्पुनज और  आकाश में अनिहर्श फहरते हुए  धर्म ध्वज पालो  सतनाम दर्शन की व्याख्या करते एक दृटाष्ट के रुप में चौखंडा महल रहा है । इसे हमलोग बचपन से देखते और उससे प्रेरणा लेते आ रहे हैं।
हालांकि आकाशीय बिजली से उक्त ऐतिहासिक ईमारत क्षतिग्रस्त हुआ और सुन्दरलाल पटवा सरकार के समय इसके जिर्णोद्धार हेतु पुरातत्च विभाग के अधीन किये गये। 
    आगे चलकर पुरी तरह नव निर्माण किया जाएगा ऐसा निर्णय से गुरुद्वारा को ध्वस्त कर नीचे का तलघर बनाया गया और ऊपर एक मंजिल काष्ट शिल्प से युक्त भारवट खंभे के अनुरुप पहला मंजिल बना कर युं ही छोड़ दिये गये हैं‌।  वर्तमान में  तो आधे -अधुरे निर्माण इन 35 वर्षो से जीर्ण -शीर्ण हो चूका हैं। पुरी एक पीढ़ी सतनाम दर्शन एंव दृष्टान्त से युक्त उस भव्य ईमारत के दर्शन से वंचित हैं।
बहरहाल महल जब बने तब बने ( सुनने मे आया है कि‌  छत्तीसगढ़ शासन इसके लिए सत्रह करोड़ राशि स्वीकृत भी कर दिये हैं।) कम से कम वहां स्थापित जोड़ा जैतखाम में सुरुजनाम का अकेला जैतखाम हैं। चांदनाम जैतखाम अबतक स्थापित नही हो सका हैं। प्रतिवर्ष भव्यतम दशहरा मेला लगता पर पालो एक जैतखाम में चढाये जाते है और दूसरा जैतखाम मे पालो‌ को चांदनाम जैतखाम के चबुतरे में खोच दिये जाते हैं। अन्यन्त पीड़ादायक हैं।

ज्ञात हो कि महल का बाह्य और आतंरिक संरचना की पुरी विडियोग्राफी  पुरातत्व  विभाग द्वारा किया गया । संबंधित अधिकारी सेवानिवृत हो गये है और वह कहां किसके पास संरक्षित है अज्ञात हैं। मै जानने का प्रयास किया पर नही पता चला और अब तक सार्वजनिक नही हो सका हैं। ऐसा भी हो सकता है कि रख रखाव या बदलते  टेक्नालांजी के कारण वह खराब हो चुका हो।
शुक्र है एक पुरानी फोटो एम्बेसेटर वाली सोसल मीडिया में है ।और दूसरी मेरे द्वारा 1993 में खिची फोटो हैं।
मंदिर का कलश कंगुरा , और गुरुगद्दी का चरण पादुका  डा  सोनी कृत सतनाम के अनुयाई किताब में संरक्षित हैं।
सोसल मीडिया में न ई पीढ़ी को अवगत कराने इन चित्रों को  सभी वायरल करते आ रहे हैं। अन्यथा वह भी दर्शन करने नही मिलता ।

पोष्ट का उद्देश्य कि एक अदद  चांदनाम जैतखाम‌ के  खाली चबुतरे में  जैतखाम स्थापित हो और धर्म ध्वज पालों चढे। ताकि लाखों- करोड़ो लोगों की आस्था यथावत बनी रहें।  इस ओर सभी का  ध्यान आकृष्ट होनी  चाहिये और सार्थक पहल होनी चाहिये ।आखिर ऐसा क्यो है और किस प्रयोजन के लिए हैं दूसरा चांदनाम जैतखाम स्थापित नही हो पा रहा हैं?  
    कृपया इसे शेयर कीजिए और संबंधितों तक पहुचाएं ताकि सार्थक पहल और हल हो सकें।
      जय सतनाम 
     - डा. अनिल भतपहरी / 9617777514

Thursday, July 24, 2025

सतनाम पंथ न कि आंदोलन

सतनाम पंथ ( धर्म) के अनुयायियों का आंदोलन 

  हमारे बुद्धिजीवियों लेखकों विचारकों के साथ साथ सामाजिक पदाधिकारियों राजनेताओं गुरुओं साधु संतों महंतो द्वारा जाने अनजाने बात चित या संबोधन लेखन आदि में सतनाम पंथ धर्म को सतनाम आंदोलन या Satnam Movement कहे जाते हैं या साधारणतः झोंक या लहज़े में निकल आते हैं इसके कारण थोड़ी असमंजस की स्थिति निर्मित हो जाती हैं। फिर सतनाम पंथ में जातिप्रथा उच्च नीच जैसा भेदभाव जन्य परिस्थिति भी नहीं हैं। और यह एक तरह से सामाजिक क्रांति( social  revolution )के द्वारा प्रतिष्ठित हैं। आंदोलन शब्द संघर्षरत लोगों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हैं फलस्वरुप सतनाम को आंदोलन समझ लिए जाते हैं। जब हक अधिकार  लिए संघर्ष करते जनसमूह जय सतनाम का उदघोष करते नारा लगाते हैं तो एक बारगी बोलचाल में सतनाम आंदोलन कह बैठते और इस तरह सतनाम का व्यापक समावेशी अर्थ संकुचित और संकीर्ण हो जाते हैं।  
   वर्तमान समय में सतनाम आंदोलन शीर्षक लिए हुए कुछेक पुस्तकों के प्रकाशन और उनके प्रतिष्ठित लेखकों के कारण भी। बड़ी तेजी से अपने और गैर भी सतनाम को आंदोलन समझ रहे हैं हमारे लोगों की दृष्टि में व्यापक अर्थ तो हैं जैसा कि उनके मनो मस्तिष्क में बैठा है परन्तु जो गैर हैं वह उसे। स्वतंत्रता आंदोलन, राम जन्म भूमि आंदोलन, चिपको आंदोलन, किसान आंदोलन, मजदूर आंदोलन, रेल रोको आंदोलन जैसे अर्थों में लेने और समझने लगे हैं। इसलिए विनम्र आव्हान और निवेदन हैं महान युगांतरकारी समानता पर आधारित जाति वर्ण विहीन सतनाम  धर्म ( पंथ)को सतनाम आंदोलन नाम से संबोधित करने लिखने समझने की भूल न करें।

गुरु घासीदास ने तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था को देखते हुए  पुरी यात्रा की वहां संगत से प्रेरित वापसी में चंद्रसेनी की बलि प्रथा देख उद्वेलित हुए। गिरौदपुरी घर न आकर सीधे तप साधना हेतु सोनाखान जंगल चले गए। 
और जब  लौटे तो कुछ सिद्धिया/ सिद्धांत लेकर समाज के समक्ष रखें। उसी क्षण  सतनाम पंथ का प्रवर्तन हो गया। उन्होंने कुछेक नियम नीति बनाए और सतत प्रचार प्रसार करते  उपदेश वाणी दृष्टांत कहते जन जागरण किया। यह भी मानव समुदाय के लिए नवीन जीवन पद्धति यानि आध्यात्मिक मार्ग हैं। जैसे बुद्ध का बौद्ध धम्म, कबीर का कबीर पंथ,रैदास का रैदासी पंथ नानक का सिख खालसा पंथ।  ठीक गुरु घासीदास का सतनाम पंथ हैं न कि आंदोलन।
हा बौद्धों, जैनों ,हिंदुओं, ईसाइयों, कबीर पंथियों का आंदोलन हुआ,थमा, दबा और   फिर होगा। ठीक सतनामियो का आंदोलन हुआ थमा या दबा। फिर हुआ,हो रहा हैं । पर पंथ मत मजहब धम्म आदि सदैव रहेगा। वह आंदोलन नहीं हैं। यह दर्शन,पूजा पद्धति और जीवन निर्वाह का तरीका हैं। या कहे धर्म हैं यह कैसे आंदोलन होगा?
   विगत 25 वर्षों से यह कहते आ रहे हैं कि सतनाम पंथ या धर्म हैं। इनके माध्यम से जनजागरण हुआ और हक अधिकार के लिए समय समय पर अनुयायियों ने आंदोलन किए। यह आंदोलन सतनाम नहीं बल्कि सतनामियों का आंदोलन हैं।
इस महीन और सूक्ष्मतम परंतु आधार भूत अन्तर को समझना चाहिए।
एक 80_90 वर्ष का बुजुर्ग के लिए, अपाहिज  बीमार और कातर दुःखी लोगों के लिए सतनाम सुमरन आध्यात्मिक शांति सुख  और आत्मबल के लिए कामना करना हैं।  न कि हक _अधिकार के लिए आंदोलन। 
   इन सभी बातों को गहराई से समझना चाहिए।
सतनामियों का आंदोलन सतनामियों की क्रांति, सतनामियों का संघर्ष हैं। न कि सतनाम आंदोलन क्रांति या संघर्ष।
इस अन्तर को समझिए और लोगों को समझाये।
अन्यथा अच्छा खासा पंथ/धर्म sect & Relegin को आम लोग केवल आंदोलन या क्रांति movement & revalation मान लेंगे।

जय सतनाम