सतनाम साहित्य और दलित साहित्य
जहां शोषण हुआ वहां प्रतिरोध हुआ हैं। कहीं मद्धिम तो कही प्रखर ! इनके विचारकों में दैन्य और रौद्र भाव प्रस्फुटित हुई ।दैन्य भाव से ही दलित साहित्य के उद्गम हुआ अपनी जन्म जाति भाग्य को कोसते भगवान से कृपा दया की याचना हुई । एक तरह से भक्तिकाल के दास्य और दैन्य भाव को ही परिवर्धित कर बृज अवधि मराठी में यह लिखी गई।जबकि रौद्र भाव ने कल्पित ईश्वर और उनकी व्यवस्था को खारिज कर दिए । इन्हें ज्ञानमार्गी निर्गुण संतो गुरुओं का संबल मिला।इस तरह अलग जीवन पद्धति /संस्कृति विकसित हुई और उससे अलगाव हुआ फिर वहीं द्वेष में बदल गए । जैसे पंजाब , छत्तीसगढ़ में सिख ,सतनाम पंथ और सतनामियों का सतत आंदोलन फिर उनसे निर्मित सतनाम साहित्य। जैसे_ मंदिरवा म का करें जइबोन पितर मनई बइहाय कस लगथे . तोर अंतस भीतरी म बिराजे हे सतनाम इत्यादि। प्रवर्तनकारी और उदात्य भाव स्वर के कारण सतनाम साहित्य को दलित साहित्य की श्रेणी में नहीं लेते और न ही यह दलित साहित्य के मापदंड पर किसी तरह आते हैं।
बाहर हाल समानता और मानवता पर केंद्रित छत्तीसगढ़ी भाषा में रचे सतनाम साहित्य पंथी गीतों, साखी, रामत रावटी वृतांत और गुरु घासीदास के उपदेशों सिद्धांत अमृतवाणियों का अनुवाद देश के क्षेत्रीय भाषा के साथ राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय भाषा में हो। इनपर मिली जुली राष्ट्रीय संगोष्ठी परिचर्चाये हो तो जनमानस में आत्मबल स्वाभिमान जागृत होगा और भय भाग्य भगवान से मुक्ति मिलेगी। यह बदलाव ही सतनाम संस्कृति का अभिष्ट हैं। सक्षम और प्रज्ञावान लोगों को इस दिशा में मिलकर काम करना चाहिए। गुरु घासीदास शोध पीठ जैसे संस्थान बेहतर कार्य कर सकती हैं इसके लिए शासन/ प्रशासन को संज्ञान लेना चाहिए।
जय सतनाम
डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514
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