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महानदी से महाकल्याण
छत्तीसगढ़ से निकलने वाली सभी छोटी बड़ी नदी नाले महानदी में समाहित हो जाती हैं। राज्य के जल प्रवाह को एकत्र कर सारंगढ़ जिला मुख्यालय से सटे जिला संबलपुर (उड़ीसा) तक महानदी ले जाती हैं जहां पर "हीराकुंड " एशिया का सबसे बड़ी बांध हैं। इसका उपयोग उड़ीसा करती आ रही हैं। बाढ़ से उलट जल चिल्का झील बनती हुई बंगाल की खाड़ी (सागर)में समा जाती हैं।
मतलब छत्तीसगढ़ में महानदी केवल गंगरेल बांध, वह भी भिलाई स्टील प्लांट के लिए बनी हैं। केवल रुद्री बराज से धमतरी,रायपुर, बलौदाबाजार मात्र 3जिला जो कि बांध निर्माण के समय एक ही जिला रायपुर ही था । इसके महज 30 %ही सिंचित होते हैं कम वर्षा हो तो रुद्री बराज के लिए पानी नहीं देते क्योंकि भिलाई के लिए अनिवार्य पानी चाहिए । यहां बिजली भी कोयला से ताप विद्युत केंद्रों में बनाए जाते हैं। मतलब हमारे घरों की छानी से टपका ओरवाती के पानी खेतों, जंगलों से बहती हुई जल हमारा ही नहीं, कैसी विडंबना हैं?
छत्तीसगढ़ में , इंद्रावती, शंखनी डंकनी, पैरी, तेल,
सोढूंर, शिवनाथ, अरपा,हाफ , सेत गंगा, आगर, हसदेव, केलो, लीलागर, जोंक , सोन जैसी महानदी की सहायक नदियां और सैकड़ों उनकी सहायक नाले और झोरकिया हैं।
हमलोग महानदी तटवर्ती सिरपुर के समीप चिखली जुनवानी के कृषक हैं । जो कि आरंग पलारी ( कसडोल )विधान सभा के मूल निवासी हैं।बरसात में खरीफ फसल धान, उड़द तील आदि बाढ़ की डूबान में तबाह हो जाते हैं। और रबी फसल के लिए जल स्रोत नहीं हैं,सारा भूजल नदी खींच ले जाती हैं। फलस्वरूप पूरा नदी तटवर्ती इलाका भीषण गरीबी और पलायन की पीड़ा झेलते आ रहे है। 3 दशक पूर्व चितावर और नाले की चुहरी यानि झिरिया के पानी पीने विवश थे। जल स्रोत के लिए छोटी नाला में कच्ची बधानी बांध खेती बाड़ी के लिए हमारे पूर्वजों ने उपाय किए । मै स्वयं हमारे गांव जुनवानी के पतालू नाला को पिता श्री के मार्गदर्शन में श्रमदान करते कच्चा बधानी बांधे और निस्तार करते थे। कछार क्षेत्र में झरिया कुआं बनाकर टेड़ा बाडी (अब सौर पंप लगाकर) अक्टू से फरवरी 5 महीने कठोर परिश्रम कर जीवन निर्वहन करते आ रहे हैं। मतलब नदी हमारे लिए वरदान होते वह उचित प्रबंधन स्टॉप डेम आदि नहीं होने से अभिशाप टाइप ही रहा।
अब वर्षा कम होने से बाढ़ की दंश से जरूर बचे लेकिन भूजल नहीं होने से हालात यथावत हैं। नदी तीर रहकर प्यासा हैं। हमलोग हर दस किमी में स्टॉप डेम खासकर सिरपुर जैसे ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी बार अभ्यारण को छत्तीसगढ़ और उड़ीसा सीमांचल को जोड़ने पुल और रुद्री बराज जैसे ही समोदा डायवर्शन बनवाने प्रस्ताव हेतु जनजागरण चलाते रहे। समकालीन समय में पलारी विधायक रामलाल भारद्वाज (भवानीपुर )और हमारे शिक्षक पिताश्री सुकालदास भतपहरी (जुनवानीसहपाठी थे) बिसौहा गुरुजी चिखली इत्यादि लोगों ने प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी को समोदा डायवर्शन के लिए सलाह दिए तब मेरे अनुज सुनील भतपहरी पानी पंचायत कनकी ( खरोरा)सब डिविजन का अध्यक्ष था। इन प्रतिनिधियों ने निवेदन किया कि इससे ट्रांस महानदी क्षेत्र में खुशहाली आएगी पर्यटन बढ़ेगा । सब्जी बाड़ी, डेयरी,मत्स्याखेट जैसे उद्यम बढ़ेगा और लाखों लोगों को रोजी_ रोजगार मिलेगा । परिक्षेत्र में प्रतिवर्ष दीपावली के बाद पलायन कर जाते हैं वह थमेगा,परन्तु समकालीन सत्ता समोदा में स्टॉप डेम बनाकर महानदी का पानी निजी पॉवर प्लांट खरोरा को पानी बेच दिया गया। जनता ठगे से रह गए ! समोदा बराज डायवर्शन (निसदा आरंग) से आज पर्यन्त इस दिशा कार्य नहीं हुआ ताकि क्षेत्र के कृषकों को लाभ मिल सकें। बल्कि यहां से नवा रायपुर के लिए पानी जाएगा यह बातें हो रही हैं।
सच कहे इस अनु जाति वर्गों के लिए सुरक्षित क्षेत्र में ढंग से नेतृत्व नहीं पनप सका या पनपने नहीं दिया गया। आरम्भ से विधानसभा क्षेत्र होने के बाद कोई मंत्री नहीं बन सका। और तो और कोई उद्योग व्यापार भी नहीं स्थापित हो सका। लोक सभा भी सारंगढ़ (वर्तमान जांजगीर) रहा जो जितने उपेक्षित दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्र था उन्हें मिलकर 3_4 जिलों में विस्तारित क्षेत्र को हास्यास्पद टाइप का सीमांकन कर लोकसभा के लिए आरक्षित कर दिया गया ताकि गुरु घासीदास बाबा और वीर नारायण सिंह की जन्मभूमि वाला भूभाग विकास से कोसो दूर रहे। जहां सामाजिक क्रांति और अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध बिगुल फूंका गया आजादी के बाद उन रण बांकुरों के वंशज अकाल और बाढ़ का दंश झेलते पलायन करने बेबश रहे। दुर्भाग्य से आजादी के बाद आज तक लोकसभा का प्रतिनिधि निष्क्रिय और प्रभावहीन रहा या उन्हें ऐसा रहने पार्टी प्रमुखों ने निर्देशित कर रखा हैं कि क्षेत्र के विकास हेतु राष्ट्रीय परिदृश्य कोई स्वर ही नहीं गूंजता। इसलिए आजतक यह परिक्षेत्र उपेक्षित हैं।
उड़ीसा सरकार नहीं चाहती की महानदी में बराज या स्टॉप डेम बने ।वो महानदी को खासकर छत्तीसगढ़ के आंतरिक जल प्रवाह को निचोड़ ले रहा हैं। यह कैसे संभव हुआ ? कौन दोषी हैं?छत्तीसगढ़ से समृद्ध और प्राचीन उड़ीसा राज्य अपने विशाल सागर तट से विशाल जलराशि से आधुनिक तकनीक से बिजली सिंचाई की व्यवस्था कर सकते है । अंतराष्ट्रीय सामुद्रिक व्यवसाय हैं और अरबों की कमाई हैं वे लोग पीने के लिए प्लाट लगा कर समुद्र की जल को नल जल योजना से सुदूर क्षेत्र तक पहुंचा सकते हैं। कृषि में उपयोग कर सकते हैं परन्तु छत्तीसगढ़ के पास महानदी को छोड़कर क्या विकल्प हैं? इनके बिना तो हमारा संसार ही प्यासा और सुनसान वीरान हैं। उस पर पूरा हक जताना और तमाम योजनाओं पर रोक लगवाना क्या उचित हैं?
छत्तीसगढ़ शासन_ प्रशासन को चाहिए कि राज्य के लिए वरदान नदी_ नाले के जल प्रवाह को अच्छी तरह प्रयोग करे, यूं ही समुद्र में बहाने न छोड़ दे। सर्वाधिक पलायन नदी क्षेत्र लोग क्यों करते हैं ? इन पर गंभीरता पूर्वक विचार कर उस क्षेत्र के नागरिकों से सलाह मशविरा कर जन कल्याणकारी योजना बनावे। क्योंकि छत्तीसगढ़ का लाईफ लाईन महानदी हैं और महानदी से ही छत्तीसगढ़ का महाकल्याण होना हैं। उड़ीसा का लाईफ लाईन तो महासागर हैं उनका उचित दोहन करें।
जय छत्तीसगढ़ ,जय भारत
जय छत्तीसगढ़
डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514
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