Saturday, September 26, 2026

राजभाषा मास पर

राजभाषा मास के अवसर में
पिरथी म पहली मनखे आइन तेकर पाछू उनकर बोली/भाखा फूटिन अउ मुहावांही होय लगिन। लोगन मन भोजन, रोजी-रोजगार सेती बगरिन अउ एक दूसर संग मिंझरिन। धीरे-धीरे कुछेक लोगन धनवंता/गुनवंता होगिन राज-पाट मठ मंदिर आश्रम बनाइन इहा के भाखा बोली मन प्रसंस्करण (मानक पन) होय लगिन लिपि के बने ले यही हर राज काज अउ शास्त्र आदि के भाखा बनिस।

माने कि लोक भाखा आदिम काल से उद्धरित हवे उही हर छन के प्रसंस्करण होके लिपिबद्ध होय लगिस पाली प्राकृत संस्कृत फारसी लेटिन इंग्लिश चाइनीज अउ अन्य शास्त्रीय (क्लासिक) भाखा बनिस। ये मन उद्भव ले अवतरे के बाद पछा भागे बर लगे अइसें निथे भलुक धीरे-धीरे इनकर बढ़ोतरी होय लगिन ते पाय के गुनवंता मन कहिथे —

'भाखा के क्रमिक विकास ल समझे अउ समझाय ल परथे कोन्हो भी रुढ़-मुढ़ मान्यता ल माने से बूता न इ बनय।'

सिरतों कहे तो कोनो भी भाखा हर अलौकिक या दैवीय नोहय। ओहर इही लौकिक अउ जमौनी जिनिस होथे। जेन लोक म नान्ही नायक होथे ओकर चरित प्रेरक हो जथे ओकर गुनगान होय लगथे या जो समुदाय शासक वर्ग होथे ओकर आचार विचार बनथे लिखित म आथे ओहर समरिद्ध हो जथे। तहां ले ओकर महिमामय बरनन करे के रिवाज तको बन जाथे।

भाखा के प्रसंस्करण अउ समरिद्धी हर सतत चलैया प्रक्रिया आय। हमर हिन्दी हर दिल्ली अउ मेरठ के बीच राज काज में लगे मनसे मन के स्थानीय बोली अउ शासक वर्ग के भाखा के मिंझरे हुए सरूप आय। एकर सरूप हमन ल अमीर खुसरो ले ले के मध्यकालीन संत कवि परंपरा में दिखथे। फेर सच कहे त हिन्दी हर 1857 के क्रांति के बाद संपर्क भाखा के रूप म स्थानीय शासक अउ प्रभावशाली लोगन के बीच बौराय से आइस।

भारतेन्दु से लेकर प्रेमचंद तक उत्तरोत्तर विकास होय लगिन हमर छायावाद से लेकर प्रयोगवाद तक के नामी कवि लेखक मन बड़ सुघ्घर सरूप दिस। संगे सजग अनेक पत्र-पत्रिका अउ आकाशवाणी फिल्म मन हिन्दी सात समुन्दर पार पहुंचाइन। आज हिन्दी सर्वाधिक बोले जाने वाली भाखा के रूप म प्रतिष्ठित होय के अवस्था म हवय। फेर येहर अब भी राष्ट्र भाखा के रूप म ग्राह्य न इ होय पाय हे ए हर बड़ दुःख के बात आय।

असल में हर राज्य के भाखा ल राजभाखा अउ बहुसंख्यक समुदाय अउ स्वतंत्रता संग्राम के समय संपर्क के भाखा हिन्दी ल राष्ट्रीय भाखा घोषित करे के गंभीर प्रयास होना चाही। अंग्रेजी वैश्विक अउ आधुनिक ज्ञान विज्ञान के भाखा के रूप म प्रतिष्ठित हवय त ओला उही सरूप म अंगीकार करे जा सकत हे भलुक कर चुके हन।

अब पाठ्यक्रम में राष्ट्रीय स्तर म तीन भाखाई सिद्धान्त हवय त एमा राष्ट्रीय भाखा हिन्दी, राजभाखा (जैसे पंजाबी तमिल मलयालम मराठी उड़िया छत्तीसगढ़ी असमिया हर राज के भाखा) अउ अंतरराष्ट्रीय संपर्क भाखा अंग्रेजी म बनाय जाय। प्राचीन क्लासिक भाखा पाली प्राकृत संस्कृत अरबी फारसी आदि ल ऐच्छिक रखना चाहिए।

ऐसे करे से स्थानीय राजकीय भाखा मन के साथ संस्कृति हर तको जतनाही अउ प्रतिभा के समुचित विकास होही। नहि ते मातृभाखा (राजभाखा) ल छोड़ अन्य भाखा म नान्हे लइका मन शिक्षा दे जाही त अपन सीखे समझे उमर 14-15 साल तक ओहर भाखा के चक्कर म फदगे पड़े रही। स्कूल अउ घर के भाखा के चक्रव्यूह म फंस के रहि जाही।

छत्तीसगढ़ के संदर्भ म देखे जाय अबतक इहा ने छात्र मन न हिन्दी के होय सकय न संस्कृत के न अंग्रेजी के। तेन पाय के अखिल भारतीय स्तर म प्रतिभा के कमती केवल भाखाई रूप म ही झलकथे अउ आत्मविश्वास के कमती के सेती शासन प्रशासन म पिछवाय सरीख नजर आथे।

सच तो ए हवय कि — 'जोन समुदाय सचेत रहिथे ओकर सम्हला अउ जनता जथे अउ जोन समुदाय अचेत रथे ओकर भाखा बोली मन नंदावत चले जाथे।'

भाखा-बोली से संस्कृति तको प्रभावित होथे। वर्तमान म छत्तीसगढ़ी संस्कृति शहरी अउ मध्यमवर्गीय परिवार से विदाई होय के कगार म खड़े हवय। एला बचाय खातिर हमर शासन-प्रशासन ल पोठलग्गा अउ ठोसलग्गा बूता करेच ल परही।

डॉ. अनिल भतपहरी, सत श्री ऊँजियार सदन अमलीडीह, रायपुर

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