प्रसंग महानदी जल विवाद
"जाके पाँव न फटे बिवाई ओ क्या जाने पीर पराई "
महानदी छत्तीसगढ़ और ओडिशा की जीवनरेखा है।
इसके तट पर बसे प्राचीन दक्षिण कोसल की राजधानी सिरपुर के ठीक सामने चिखली-जुनवानी मेरा गाँव है। हमारी घाट में भव्यतम लक्ष्मण देवालय के दर्शन होते हैं तो बाबा गंधेश्वरनाथ के शंख-घंटे की आवाज़ सुनते हुए हम बड़े हुए हैं। अपने खेत में बैठकर नदी को देखना - यह सिर्फ भूगोल नहीं है, यह हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है। नाव से नदी पार करते जीवन बीत रहा हैं। दो तीन बार तो नाव में डूबते डूबते बचे हैं। उलट धार एवं बाढ़ से अनेक जहरीले सांप घरों में घुस जाते हैं। मेरे बड़े पिताजी के सुपुत्र होनहार चंद्र कुमार सर्पदंश का शिकार हो गए। कई बार फसल डूब गए मुआवजा भी बड़ी मुश्किल से मिलते हैं इस तरह के अनेक दुर्घटनाओं से बचकर यहाँ तक आए हैं।
बाल्यावस्था में हमलोग दोनो भाई महानदी में बह गए थे। सुनील एक पेड़ की टहनी पकड़ लिए और इस तरह बचे। वे आगे चलकर पानी पंचायत अध्यक्ष, सरपंच और जिला पंचायत अध्यक्ष बना। दूरद्रष्टा पिताश्री की चिंतन,भाई बंधु के अदम्य प्रयास , उत्साह से ही क्षेत्र के जनप्रतिनिधि गणों खासकर विधायक चाचा श्री रामलाल भारद्वाज के सार्थक पहल द्वारा जुनवानी से आगे समोदा ग्राम में महानदी में "समोदा डायवर्शन" बनाने जैसी सोच विकसित हुई।
महानदी तटवर्ती जुनवानी-चिखली घाट के कृषक होने का सुख और दुःख हम एक साथ भोगते आ रहे हैं।
भारी बारिश में बाढ़ का तांडव और पानी नहीं गिरा तो गाँवों के जलस्रोतों को खींच लेना - यह दारुण दुःख था। जोगी जी की नीति, जोगी-डबरी योजना से प्रदेश में हैंडपंप उत्खनन हेतु बोर मशीन आई और तब कहीं जाकर राहत मिली।
इस तरह सुख यह है कि नदी पास है तो जीवन उत्सव है।
दुःख यह कि गर्मी में जब महानदी की जलधारा कम होती है तो वह आसपास के कुओं, तालाबों और हैंडपंपों का पानी भी खींच लेती है। नदी किनारे होकर भी प्यासे रह जाना - जीवन बेहद कष्टमय है। इससे बड़ा विरोधाभास क्या होगा?
मध्य प्रदेश में रहने और इस तरह की राजनैतिक चेतना का अभाव या उपेक्षा का दंश प्रदेश वासी तटवर्ती लोग झेलते रहे हैं। संभवतः इसीलिए महानदी के प्रति जनमानस की आस्था गंगा-नर्मदा जैसी पनप नहीं पाई, जबकि यहाँ का जनजीवन बेहद सरल और आस्थावान है। परंतु नदी का महिमा-मंडन कर उससे लाभ लेना या पर्यटन आदि के लिए व्यावसायिक उपयोग करना यहाँ की सरलतम संस्कृति का अंग नहीं रहा। इसलिए कभी संरक्षण, संवर्धन एवं सौंदर्य के लिए स्थानीय लोगों में विचार भी नहीं पनप सका।
परंतु छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पड़े अकाल और उनसे निपटने के लिए कमर कसे प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी जी को हमारे पिताजी स्वर्गीय शिक्षक सुकाल दास भतपहरी, पानी पंचायत अध्यक्ष भाई सुनील एवं पिताजी के सहपाठी यशस्वी विधायक रामलाल भारद्वाज (भतपहरी) के माध्यम से महानदी के जल को डायवर्ट कर क्षेत्र के कृषकों के लिए योजना बनाने की सलाह दी गई। इसमें किंचित हमारा भी सोच और सहयोग रहा है। बाद में तत्कालीन पलारी विधायक शिव डहरिया जी का प्रयास रंग लाया फलस्वरूप समोदा डायवर्शन जैसी परियोजना ने आकार लिया और हमारे पलारी कॉलेज के प्रांगण में हुई विशाल जनसभा में माननीय अजीत जोगी जी ने इसकी घोषणा की। तब हमारा मन उल्लास और हर्ष से भर गया कि वर्षों का सपना साकार हो उठेगा। उस कार्यक्रम का मैं चश्मदीद गवाह रहा हूँ।
हम लोगों की चाह केवल इतनी थी -
1. स्टॉप डैम/एनीकट बने ताकि दोनों ओर फैले रिश्तेदारों का सुगमतापूर्वक आवागमन हो सके। कोई बड़ा बाँध नहीं। बस इतना कि थोड़ा पानी रुके।
2. उद्देश्य पानी रोकना नहीं, निस्तार है - ताकि दोनों तटों के बीच आवागमन बना रहे, जल-भराव से रिचार्ज हो, कुआँ-तालाब-हैंडपंप जिंदा रहें।
3. रोज़ी-रोज़गार से जुड़े - मत्स्याखेट हो, कछार-बाड़ी में फसलें लहलहाएँ, जीवन खुशहाल हो।
परंतु अन्यान्य कारणों या जल-भराव की स्थिति के चलते इसे आरंग के पास निसदा डायवर्शन के रूप में यशस्वी डॉ रमन सिंह के कार्यकाल में निर्मित किया गया।
समोदा में एनीकेट बना और उसे रायखेड़ा खरोरा के पॉवर प्लांट को पानी दिया जाने लगा।जो नहीं होना था, वह हो गया और संभवतः पानी के इस तरह व्यावसायिक उपयोग के कारण ओडिशा सरकार हस्तक्षेप कर रही है यह विचारणीय हैं। यही चंद्रपुर के समीप एनीकट का हुआ, जिसे निजी कंपनी को पानी सप्लाई की जा रही हैं। तब से ओडिशा जैसे मित्र और सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक रूप से एक रहे प्रदेश के साथ अनावश्यक तनाव निर्मित होने लगा।
तो क्या हम प्रदेशवासी, जिनकी सभी नदियों को अपने 280 किलोमीटर के बहाव क्षेत्र में निचोड़ कर ओडिशा ले जाती है, किंकर्तव्यविमूढ़ से देखते रहें और दुःख भोगते रहें? सवाल यह है।
4. हम प्रदेशवासी और सरकार कतई ओडिशा विरोधी नहीं हैं - महानदी 850 किलोमीटर लंबी है, जिसमें से 280 किलोमीटर ही छत्तीसगढ़ में बहती है। अरपा, पैरी, सोंढूर, शिवनाथ, हसदेव - छत्तीसगढ़ की लगभग सारी नदियों का पानी इसी 280 किलोमीटर में आकर महानदी में मिलता है और सीधे ओडिशा चला जाता है। सवाल वाजिब है कि क्या तटवर्ती छत्तीसगढ़ ही प्यासा रहे?
5. निस्तार प्राकृतिक हक है - जो पानी आपके क्षेत्र की बारिश और आपके नालों ने नदी में डाला है, उस पर तो स्थानीय लोगों का पहला अधिकार बनता है।
आपने अपने पिताजी के समय के नाला बाँधने वाले अभियानों का जिक्र किया - सामुदायिक सिंचाई, उद्वहन, बंधनी बाँधकर निस्तारी करना। वही सोच आज बड़े पैमाने पर स्टॉप डैम के रूप में चाहिए। पहले बारिश पर्याप्त थी, जागरूकता कम थी, पर अब बारिश घट रही है और सारा जल बहकर चला जा रहा है।
नदी वरदान बने, अभिशाप नहीं।
इसलिए प्रत्येक 10-15 किलोमीटर में डायवर्शन एनीकट, स्टॉप डैम होने से बाढ़-नियंत्रण, आवागमन, जलस्रोत, कछार-बाड़ी का पुनर्जीवन एवं पर्यटन विकास होगा और तटवर्ती लोगों को स्वरोजगार मिलेगा, पलायन थमेगा। अन्यथा ट्रांस-महानदी क्षेत्र पलायन के लिए छत्तीसगढ़ में अभिशप्त है। उसके दिन फिरेंगे।
गुरु घासीदास, वीर नारायण सिंह की यह धरती अपना प्राचीन वैभव प्राप्त करेगी, जहाँ चंद्रपुर, शिवरीनारायण, गिरौदपुरी, सोनाखान, सिरपुर, राजिम आबाद रहेंगे।
गर्मी में सूखी रेत देखकर जो अभिशाप जैसा लगता है, वही नदी अगर साल भर थोड़ी-थोड़ी भरी रहे तो वही वरदान बन जाएगी।
सरकार के लिए यह नीति का विषय है - छत्तीसगढ़ सरकार और ओडिशा सरकार दोनों को इस दृष्टि से सोचना होगा। पानी को रोकना नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व में उपयोग करना। स्वस्थ वातावरण में महानदी जल-विवाद का यही समाधान है।
डॉ. अनिल कुमार भतपहरी
जुनवानी चिखली, रायपुर छ ग
जय महानदी, जय छत्तीसगढ़।
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