Monday, December 29, 2025

सरकार

जीताएन तब ले भैरा हो गईन 
साहेब ल हमर गोठ नइ भाईन 
बिन भाषा के मूक हो गईन 
बटन चपक का चूक हो गईन 


करय तो अब भल का करय 
ले मांदर मंजीरा भजन करय 
बिगड़े हे इहलोक हमरे अब 
परलोक सुधारे जतन करय 

तउन खातिर आए सरग़ दूत 
दरस परस बर भारी जटाजूट 
जे भीखास के उवे नवा सुरुज 
चका चौंधा देख भारी अचरूज 

धरमे करमे बर बनाएं उन ल 
वोट दे के तय कमाएं पुन ल 
कटय जंगल के खीरय धरती 
चाहे परिया परे रहय तोर खेती 

बनगे मंदिर सज के दरबार 
फेर उजरे लगिन खेती खार 
न कहूं रोजी न कछु रोजगार
कोंदा भैरा अंधरा सरकार ...

नवा रायपुर में संपूर्ण छत्तीसगढ़ का स्मारक हो


रजत उत्सव के अवसर पर 

पुरखौती मुक्तांगन में मध्य छत्तीसगढ़  

  छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर से 25 किमी दूर नवा रायपुर बसाया गया हैं जो सतनामी बाहुल्य 27 ग्रामों को हस्तगत किया गया हैं। यह परिक्षेत्र आरंग विधान सभा के अधीन हैं। मंत्रालय, संचालनालय, विधानसभा ,राजभवन मुख्यमंत्री, एवं मंत्रियों के निवास हैं। साथ ही अधिकारी कर्मचारी सहित आम लोगों के बसाहट हेतु 33  सेक्टरों में विभक्त हैं। वर्तमान में करीब 5 लाख लोगों की बसाहट की क्षमता से युक्त नवा रायपुर में बस, रेल, स्वास्थ सुविधा हेतु हॉस्पिटल, स्कूल कॉलेज हैं। साथ ही अनेक धार्मिक, प्राकृतिक  एवं सांस्कृतिक दर्शनीय स्थल विकसित किए जा रहे हैं। ताकि लोगों को आध्यात्मिक / धार्मिक आवश्यकताओं के पूर्ति के साथ साथ स्वस्थ मनोरंजन एवं ज्ञानवर्धन हो सकें।
इनमें प्रमुखत: पुरखौती मुक्तांगन, जंगल सफारी, आदिवासी संग्रहालय, मॉल सिनेमागृह और फिल्मसिटी बनाए जाएंगे।
परन्तु छत्तीसगढ़ के मध्य भाग की सांस्कृतिक गतिविधियों और जनजीवन को संरक्षित करने का कोई खास संग्रहालय आदि के बारे में पता नहीं क्यों चर्चाएं नहीं होती। जबकि छत्तीसगढ़ की वैभव रायपुर दुर्ग राजनांदगांव मुंगेली कवर्धा , बिलासपुर, जांजगीर,बलौदाबाजार ,महासमुंद धमतरी जिलों में निवासरत करोड़ों लोगों की रहन सहन,सांस्कृतिक गतिविधियों, मेले,व्रत ,उत्सव आदि की जानकारी के लिए  स्मारक या संस्थान होनी चाहिए। इसकी कमी खलती हैं।
   बाहर से आए शैलानी एवं अन्वेषकों अध्येताओं को छत्तीसगढ़ का वास्तविक बोध नहीं हो पाता।

    छत्तीसगढ़ प्राकृतिक और भौगोलिक रुप से तीन भागों में विभक्त हैं। उत्तर में सरगुजा का पाट, मध्य छत्तीसगढ़ का मैदान और दक्षिण में बस्तर का पठार । पूर्व में महानदी का पावन प्रवाह वाली लारियांचल तो पश्चिम में डोंगरगढ़ भोरमदेव सतपुड़ा मैकल श्रेणी में अवस्थित चिल्फी घाटी की हसीन वादियां हैं ।इन  जगहों की भाषा कला संस्कृति भी अलग हैं। प्रदेश की इन जगहों की विशेषताओं और महत्ता को बताने हेतु पुरखौती मुक्तांगन की परिकल्पना की गई ताकि प्रदेश की प्राचीन धरोहरों और जीवन स्तर लोक मान्यताओं को पर्यटन करते एक ही जगह उपस्थित होकर कुछ घंटों में  आधारभूत ढंग से सामान्य (मोटे )तौर पर समझा जा सके।
   यहां सरगुजा ,बस्तर प्रखंड तो हैं जहां परन्तु मध्य छत्तीसगढ़ नहीं। इस कारण यहां की सांस्कृतिक वैभव में अनेक कमियां नज़र आती हैं। बाह्य पर्यटकों को लगता हैं छत्तीसगढ़ आदिम जनजीवन और संस्कृति के ही संवाहक अत्यंत पिछड़ा  वनांचल राज्य हैं। जहां स्त्री पुरुष अर्ध विवृत जीवन जीने विवश और केवल नाच- गाने में मंद मऊहा सल्फी ताड़ी हड़िया कोसना में उन्मत लोग हैं।  मंचीय प्रस्तुतियों में भी लोक संस्कृति के नाम पर यहीं भाव प्रदर्शित होते हैं।
   जबकि मध्य छत्तीसगढ़ की गौरव शाली एवं सौंदर्यबोधक वस्त्राभूषण, साबुत अनाज (बिना सड़े गले खमीर आदि उठाएं) की खान पान ,रहन सहन किसी भी राज्य से कमतर नहीं। यहां की भाषा और उनमें उपलब्ध साहित्य दर्शन उत्कृष्ट हैं। लोक कलाएं विविधतापूर्ण और समृद्ध हैं। किसी राज्य की एक दो या पांच लोक नृत्य होंगे पर यहां स्त्री पुरुषों की पृथक और युगल दर्जनों नृत्य  शैलियां  है जिसमें पंथी,राउत,कर्मा, सुआ,शैला, रीलों,बार, सरहुल, ककसार ,डंडा, मांदरी, हरे राम हरे कृष्णा, रमसत्ता, रहस,  छैला नाच, देवार नृत्य जैसी विशिष्ट शैलियां हैं। शास्त्रीय नृत्य में रायगढ़ घराना और खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय तो लोक और शास्त्रीय संगीत विविध ललित कलाओं की  साधना स्थली हैं जहां देश विदेश से कलावंत आते और सीख समझ कर जाते हैं।
     अनेक पर्व उत्सव मेले मड़ाई हाट बाजार पसरा हैं ।और जनजीवन तो अन्य जगहों के अपेक्षा  थोड़े में संतुष्ट संत संस्कृति के संवाहक हैं। जिनमें प्राचीन सहज यान महायान नाथ सिद्ध  शैव शाक्त वैष्णव बौद्ध जैन संस्कृति की समन्वय स्थली हैं जहां आर्य अनार्य संस्कृति का समागम होते हैं। दक्षिणा पथ के नाम से विख्यात सद्वाहों सतवहनो की धरती में अनेक ख्यातिनाम भट्ट प्रहरी हुए हैं। जिसमें सम्राट विजयस जिसके समय में बुद्ध का आगमन राजधानी सिरपुर में हुआ। वहीं नागार्जुन आनंद प्रभु, जैसे आचार्य हुए। वल्लभाचार्य,कबीर धर्मदास गुरुघासीदास, अमरदास ,विवेकानंद महेश योगी , संत गहिरा गुरु , ओशो ,स्वामी आत्मानंद , पवन दीवान  जैसे संत को जन्म और आकार देने वाली शस्य श्यामला धरती हैं ।इसलिए इसे उत्तराखंड  हिमाचल को जैसे देवभूमि कहते हैं ठीक यह संतो की धरती छत्तीसगढ़ को " संतभूमि"  कहते हैं। 
   सिरपुर राजिम, शिवरीनारायण गिरौदपुरी दामाखेड़ा तुम्मान, ताला,मल्हार चैतुरगढ़, डमरू खरचा, आरंग रीवा, खल्लारी, चंद्रपुर, डोंगरगढ़ भोरमदेव  रतनपुर दल्हा, जलेश्वर,  जैसे ऐतिहासिक धार्मिक नगरी आस्था के केंद्र हैं। छत्तीसगढ़ में तीन साक्षात् त्रिवेणी संगम राजिम , पंजनी पैसर और शिवरीनारायण हैं जहां कल्प कुंभ किए जा सकते हैं जो कि अन्यत्र दुर्लभ हैं। कोरबा भिलाई, चिरमिरी ,नगरनार, तमनार जैसे औद्योगिक तीर्थ नगरी और गंगरेल हसदेव जैसे विशालकाय बांध सागर जैसे दर्शनीय हैं।रायपुर बिलासपुर दुर्ग राजनांदगांव जगदलपुर  अंबिकापुर जैसे प्रशासनिक संवैधानिक और सांस्कृतिक नगर देश के अन्य नगरों से सदृश्य हैं।
     इनके संरक्षक बलिदानी राजाओं में कल्याण साय,गुरु बालकदास, गेंद सिंह, वीर नारायण सिंह,  गुण्डाधुर मूंदरा मांझी प्रवीण चंद्र भंजदेव जैसे रत्न हैं। 
  गौरक्षा आंदोलन 1915 के प्रणेता राजमहंत नयन दास महिलांग गुरु गोसाई अगमदास जंगल सत्याग्रह के नायकों में बूढ़ान शाह रामचरण दयावती कंवर , तो नहर सत्याग्रह में नारायण मेघवाले, छोटेलाल सामाजिक क्रांति और मंदिर प्रवेश के लिए प सुंदरलाल शर्मा, पंमिलऊ दास कोसरिया, प. तुलम तुलाई लोगों के कारण स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि बनी। जिसमें मिनीमाता राधाबाई दयावती कंवर राजमोहिनी देवी जैसी मातृ शक्तियां भी बढ़ चढ़ हिस्सा ली और समाज / देश सेवा  के लिए स्वयं को समर्पित की 
   कला जगत में  मंदराजी, रामचंद्र देशमुख, महासिंह चंद्राकर ,दानी दरवन, चम्पा बरसन हबीब तनवीर, शेख हुसैन, देवा दास बंजारे, सुकालदास भतपहरी, मेहतर साहू,  गंगाराम शिवारे नारायण वर्मा  झाडूराम देवागन,  सहित पंडवानी की पुरखिन दाई सुखबती, लक्ष्मी बंजारे तीजन बाई सुरुजबाई फ़िदाबाई, मालाबाई जैसी मौलिक सितारा कलाकार हैं। जिसकी अनुशरण कर लोग प्रसिद्धि की शिखर स्पर्श करते आ रहे हैं।
साहित्यकारों में  ठाकुर जगमोहन पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पद्म श्री मुकुटधर पाण्डेय, लोचनप्रसाद, मुक्तिबोध,मनोहरदास नृसिंह, द्वारिका प्रसाद तिवारी, हरि ठाकुर , प्रमोद वर्मा केयूर भूषण मदनलाल गुप्त प सुकुल दास घृतलहरे, शाखा प्रसाद बघेल, शानी ,सुकाल दास भतपहरी , लक्ष्मण मस्तूरिया,  सुशील यदु श्यामलाल चतुर्वेदी लाल जगदलपुरी,हरिहर वैष्णव,इत्यादि अनेक साधक हैं। इन सबकी की यादें, मध्य छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण  ऐतिहासिक घटनाओं  और जीवन स्तर की झलकियां भी उक्त ओपन म्यूजियम / खुला संग्रहालय  "पुरखौती मुक्तांगन" में होना चाहिए। ताकि लोगों को छत्तीसगढ़ की विविधता और एक साथ आदिम जीवन और आधुनिक जीवन शैली का साक्षात्कार हो सके। प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी के अनुसार एक  साथ 10 वी और 21 के जीवन शैली को देखना हो तो और उन्हीं के तकिया कलाम अमीर धरती के गरीब लोगों की धरती छत्तीसगढ़ में स्वागत हैं।
    राज्य के पच्चीसवें वर्ष में रजत जयंती के पावन अवसर में राज्य की सर्वाधिक बसाहट वाले मध्य क्षेत्र की  सांस्कृतिक तत्व की जाने- अनजाने में अनदेखी न हो और देश के नागरिकों को राज्य की तीनों प्रखंडों की सांस्कृतिक वैभव का झलक पुरखौती मुक्तांगन प्रांगण में सहज दर्शनीय हो इनकी व्यवस्था होनी चाहिए। ताकि अनेक विरोधाभासों का सम्यक समाधान तलाशा जा सकें। सुखी और समृद्ध छत्तीसगढ़ गढ़ा जा सकें।

      जय छत्तीसगढ़ 

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

सेंट जोसेफ टाऊन अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़ 

Wednesday, December 17, 2025

सतनाम शोभायात्रा

गुरु घासीदास जयंती पूर्व सतनाम शोभायात्रा की बाहर 

समाज में समानता एवं सौहार्द्र स्थापित करने सद्गुरु घासीदास बाबा जी की अमृतवाणियों /उपदेशों पर आधारित सार्वजनिक रुप से राजधानी रायपुर में 1995 से आरम्भ यह आयोजन देश के अनेक जगहों पर हर्षोल्लास पूर्वक आयोजित होने लगे हैं। आयोजको एवं सहभागियों के प्रति आभार एवं मानव समाज को हार्दिक बधाई।

   ज्ञात हो कि गुरु घासीदास जयंती की शुरुआत में ही धर्म ध्वज "पालो " जिसे संत /महंत/ भंडारी के घर तैयार करते हैं को परघा कर पंथी अखाड़ा सजाते हर्षोल्लास पूर्वक  जैतखाम तक शोभायात्रा करते आते हैं।उसी परंपरा को अब सार्वजनिक रुप से बड़े पैमाने पर मनाने की शुरुआत 1995 से हुई।

चित्र १आयोजन की परिकल्पना के समय का छायाचित्र गुरु घासीदास छात्रावास आमापरा रायपुर 
२ प्रथम आयोजन का विज्ञापन गुरु घासीदास का रेखाचित्र ( मेरे द्वारा रेखांकन)

Friday, November 21, 2025

बाघ

#anilbhattcg 

बाघ 

हिमालय की ऊंचाई 
में ढूंढते यति याक 
तराई में विचरण करते बाघ 
रहते शिकारी फिराक 

बसा लिए वे अपना घर 
उजाड़ कर स्वर्ग 
रचकर छद्म विचार 
सिरजा रहा औपनिवेशिक नर्क

बुर्ज खलीफा सा 
साधन हैं तो सुख हैं 
निराहार साधनहीन 
भूख से मरते कितना दुःख हैं 

जंगल में कोई मरते नहीं भूख से 
न ले जाने होते हैं साधन 
जितना हो बल शरीर में 
उतने में कट जाते जीवन 

इसलिए तो संतभूमि में 
चल पड़ा हैं कथन 
हो अगर मुश्किल या जटिल 
तो वन में जी जीवन 

वानप्रस्थ की परिकल्पनाएं 
सुंदर मोहक व्यवस्थाएं 
हाथी की दांत की तरह दिखाने 
या कितने हुए सभ्य यह बताने 

अरावली के जंगल में 
शेर का शिकार करते 
शमशीर लहराए गए 
कितने ही निरीह पशुओं को 
मार कर पकाएं खाएं गए 

उजड़ गए जंगल ,हो गए मरूस्थल 
सुखी नदियां जो बहती रहती 
करती कल कल 

रेवांचल में मारकर बाघ 
बघमार हुंकारते रहें 
सतपुड़ा से सहयाद्रि तक 
कथित अनेक शूरमा आखेट कर 
छावां मारते रहें 
इधर सरगुजा हसदेव बार के बघवा
जमींदारों राजाओं के दर्प से 
बिना गुर्राए चुपचाप मरते रहे..

 
उधर नीलगिरी के सत्यमंगलम में 
गजराजों के सौजन्य से 
शेर शिकार होते रहें 
कितने वीरप्पन पलते मरते खपते रहें 

परन्तु चेंदरू दंडकारण्य में शेर नचाते रहें 
बच गए रे बाबा इंद्रावती कछार 
आबो हवा साल वनों का रवार

सगर्व कहते रहे कई सदियों को साथ जीते हैं 
सुख और दुःख को महुवें के संग पीते हैं
 परीकथाओं सा रहस्यमय संसार 
कोई बूझ न सका दुःख-सुख 
तभी तो रहा अबूझमाड़ 

कुछ लालबुझक्कड़ों के बारूद बम गोली से 
दहलता रहा दण्डकारण्य 
निरीह पशु -पक्षी के साथ 
मरते रहे बाघ अकारण्य

जंगल में शेर का न रहना 
शहर में कानून के न रहने जैसा हैं 
तभी तो दोनों उजड़ रहे हैं 
अराजकताएं फैलती जा रही हैं
इसी में जीने रहने की कलाएं 
पीढ़ियां सीखती जा रहीं हैं...

डॉ.अनिल भतपहरी / 9617777514

Saturday, November 15, 2025

पंडित मिलऊ दास कोसरिया

#daqument 

देश का गौरव 

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. मिलऊ दास  कोसरिया 

   गुरुघासीदास के उपदेश, बोध कथाओं और उनकी अमृतवाणियों के जानकार पं. मिलऊ दास कोसरिया  जी कौंदकेरा राजिम के निवासी  थें। वे सत्संग प्रवचन के लिए पुरे राजिम परिक्षेत्र में प्रसिद्ध थे।  चमसुर निवासी पं सुन्दरलाल शर्मा  जी आपसे प्रभावित होकर गुरुघासीदास व  सतनाम संस्कृति को जाने -समझे। तथा सतनामियों के साथ सत -संगत करने लगें। दोनों मे धार्मिक सद्भाव व समझ के चलते ही गहरी मित्रता रही।
     इस बीच देश मे चल रहे स्वतंत्रता आन्दोलन मे दोनो सम्मलित होने रायपुर अन्य जगहों पर आने - जाने लगे। जंगल सत्याग्रह का नेतृत्व पं कोसरिया जी ने किया और अपने साथ अनेक सहयोगियों  को राष्ट्र सेवा मे संलग्न किए। 
    बलौदाबाजार - भाटापारा परिक्षेत्र मे सतनामियों का महंत नयन दास महिलांग द्वारा आरंभ  किये गये गोरक्षा आन्दोलन पुरे देश भर मे चर्चित रहा । पं. मिलऊ दास जी को उनकी जानकारी और उन आन्दोलन कारियों से संपर्क रहा है। कलान्तर में गुरु अगमदास गोसाई  व महंत नयन दास महिलांग सहित  अनेक संत -महंत से उन्होने पं. सुन्दरलाल शर्मा जी का परिचय करवाया । उन सबसे मिलकर पं.  शर्मा जी  सतनाम संस्कृति से बहुत गहराई से  प्रभावित हुआ और वे "सतनामी पुराण"  की रचना 1907 में की।  आगे चलकर 1921 मे सतनामी आश्रम और कटोरी प्रथा ( धान मंडी मे  प्रति बोरा एक कटोरी धान की चंदा  )  चलाकर सतनामी स्कूल / छात्रावास भी  अमीन पारा बुढापारा पुरानी बस्ती रायपुर  से आरंभ किए गये।

    इस तरह वर्तमान अवस्था से सुधार व निजात पाने की चाह लिए सतनामी समाज भारतीय  कांग्रेस  पार्टी / डा अम्बेडकर की शेड्युल कास्ट फेडरेशन आदि संगठनो से जुड़कर उनके राष्ट्रीय कार्यक्रम में सहभागिता निभाने लगे।  इस बीच वे राजिम मंदिर में सतनामियों सहित वंचित वर्गों के सुत ,सारथी, गाड़ा घसिया, कहार , महार आदि समुदाय को एकत्रित कर  मंदिर प्रवेश का ऐतिहासिक कार्यक्रम चलाया। कहते है कट्टर पंथियों के विरोध और रैली बहिष्कार से शासन- प्रशासन चाक- चौबंद हो गये। मंदिर प्रवेश के बहाने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध अभियान समझ  सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने का आरोप लगा कर  प्रशासनिक  प्रतिरोध पैदा किए गये। फलस्वरुप   राजिम लोचन परिसर मे स्थित  राम- जानकी मंदिर में  प्रवेश कर कार्यक्रम सम्पन्न किए गये।
     इनसे इन दोनो  की ख्याति सर्वत्र फैल गई। फलस्वरुप रायपुर की एक सभा मे महात्मा गांधी ने सुन्दरलाल शर्मा जी को अपना गुरु माना -

    गांधी ले पहिली सुन्दर लाल करिस  शुरु 
    भरे  सभा म  उन ल  मानिस  अपन  गुरु 

     एक तरफ पं सुन्दरलाल शर्मा को उनके समाज वाले बहिष्कृत कर दिए।तो दूसरे तरफ कट्टर पंथ जहरिया सतनामी  मंदिर मूर्ति पूजा पर पं मिलऊ दास  कोसरिया जी को भी समाज दंडित किए गये। फिर भी दोनो मित्र आजीवन  देश व समाज सेवा में जुड़कर सामाजिक सद्भाव और स्वतंत्रता आन्दोलन व सभा सोसायटी में सक्रिय रहें।
      
           ऐसे साहसी शूरवीर और समाज व देश सेवा के सर्वस्व समर्पित रहने  वाले इस  मनीषी को सादर नमन ।

 चित्र - पं. मिलऊ दास कोसरिया जी का प्रतिमा कौंदकेरा राजिम 
  
            - डा. अनिल कुमार भतपहरी / 9617777514

Friday, November 14, 2025

राज्य में बदलते फिज़ा और उनका दूरगामी परिणाम

#anilbhattcg 

संदर्भ : राज्य की पच्चीसवीं वर्षगांठ पर 

    राज्य में बदलते फिज़ा और उनका दूरगामी परिणाम 

    
     25 वर्ष के युवा में अनेक बदलाव आते हैं और उनके मन के न हो तो वह आक्रोशित ,उद्वेलित और आक्रामक तक हो जाते हैं। ऐसा होना ही तो युवा होना हैं। स्वाभाविक युवा है ,तो जोश रहेगा ही। इसलिए हमारे योजनाकारों को चाहिए कि युवा छत्तीसगढ़ में हो रहे नव निर्माण को देख, यहाँ की युवावर्ग में  बढ़ रहे उत्साह और जोश को रचनात्मक कार्य की ओर मोड़ कर उनमें सकारात्मक ऊर्जा का संचार करें। परोसे थाली देखकर भूख बढ़ना ही हैं ।यदि इस बीच कोई थाली छीन ले तो वर्ग संघर्ष होना भी लाज़िमी हैं। वर्तमान छत्तीसगढ़ में प्रायः यही हो रहे हैं। निर्माण एजेंसियों, रेत घाटों,खदानों से लेकर उद्योग जगत में बाहरी हस्तक्षेप सर्वाधिक हैं। ऐसी अवस्था में स्थानीय लोगों के लिए अपेक्षित रोजी- रोजगार की व्यवस्था शासन -प्रशासन को करना चाहिए।
   वैसे भी  छत्तीसगढ़िया बेहद उदार और धैर्यवान 
हैं। महत्वकांक्षा से मुक्त संत भाव को गृहित कर सादगी पूर्ण जीवन निर्वाह करते  हैं। खेतों में अपनी संपूर्ण पूंजी लगाकर 6 माह तक अच्छी फसल की प्रतीक्षा करते कर्ज़ में डूबकर भी अनेक  प्रायोजित वाणिज्यिक तीज त्यौहार  मनाकर पर प्रांतिक मूल के सेठ महाजन व्यापारी के तिजौरी भी भरते रहते हैं। 
   स्थानीय लोगों की यह भलमनसाहत हैं कि बाहरी लोगों को आश्रय देकर उनके नेतृत्व को भी स्वीकारा हैं।
परन्तु दुर्भाग्य से उनकी इस संतत्व वृत्ति का मखौल उड़ाते उन्हें जोजोवा, भोकवा समझते हैं। यहां की लोक मान्यताओं धर्म ,भाषा कला ,रीति -नीति ,संस्कृति को अपेक्षित महत्व और मान सम्मान नहीं करते।
इसके साथ यहां प्रायोजित ढंग से सांप्रदायिक उन्माद फैलाएं जा रहे यह बेहद चिंतनीय हैं।
     भाषाई दृष्टि से राज्य  गठन हो जाने के बाद भी यहां की भाषा और संस्कृति की उपेक्षा चिंतनीय हैं। फलस्वरूप जनमानस में आक्रोश फैलते जा रहे हैं और बड़ी तेजी से छत्तीसगढ़िया उद्वेलित हो रहे हैं। शासन- प्रशासन को चाहिए कि संत भूमि छत्तीसगढ़ की समरस और सौहार्द्र भाव को कायम करने सार्थक पहल करें। 

  डॉ अनिल भतपहरी/ 9617777514

Tuesday, November 11, 2025

आरक्षण से हुनर को बढ़ावा

आरक्षण से हुनर वाले और उत्कृष्ट लोग ही जा रहे हैं। इसलिए तो हर तरफ क्वॉलिटी बढ़ रहे हैं। पूरा देश ग्रोथिंग में हैं।
  आरक्षण के पूर्व तो ऐसा नहीं था।

भाग्य और भगवान भरोसे रहने वाले लोगो को, विरासत से सुविधाभोगियो को जब कमेरा वर्ग देश सम्हाल रहे हैं तकलीफ हो रहे हैं।
द्रोणाचार्य संस्कृति के संवाहक लोगों का स्कूल कॉलेज में मेरिट कैसे बनते हैं सबको पता हैं।

एक देश एक एजुकेशन क्यों नही।

जबकि एक देश एक इलेक्शन अव्यवहारिक हैं (क्योंकि इस महादेश की भौगोलिक और प्राकृतिक परिस्थितया भिन्न भिन्न हैं।
गर्मी में चुनाव होगा राजस्थान की लू मतदान कैसे होगा और ठंडी में चुनाव हो तो हिमाचल जम्मू कश्मीर उत्तराखंड के बर्फबारी में कैसे मतदान होगा? इसी तरह वर्षाकाल में केरल और चेरापूंजी छत्तीसगढ़ बस्तर के नदी नाले के उफान और मूसलाधार बारिश में कैसे सम्पन्न होगा? ) फिर भी इसके लिए कानून पास कराए जा रहे हैं।

सच तो यह हैं देश में एक समान पाठ्यक्रम हो।
(सारे प्राइवेट  स्कूल जो पब्लिक नाम देकर चंद लोगों के लिए चला रहे हैं वह बंद हों।)
जिसमें मंत्रियों अफसरों और रिक्शा चालक मजदूर के बच्चे समान विषय पढ़े इसके लिए संसद मौन हैं।
   पूरे देश में समान शिक्षा हो और उनका माध्यम राज्यों की राजभाषाओं में हो।
देश भर में परिचर्चा हो और कड़े कदम उठाए जाएं। जिसमें कितनी प्रतिभा हैं सब सामने आ जाएंगे।

Sunday, November 9, 2025

अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का नाम रिकॉर्ड में दर्ज नहीं

अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का नाम रिकॉर्ड में दर्ज नहीं 

    कितने ही अनगिनत स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का नाम  शासकीय दस्तावेज दर्ज  नहीं , या लोगों को पता नहीं. उस समय के अनेक मुजरिम जो जेल गए उसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उनके परिजन घोषित कर नाम जुड़वा कर लाभ ले रहे हैं। बकायदा जनप्रतिनिधि बन गए। दुर्भाग्य तो हैं कि अंग्रेजों के सेवादारों, जासूसो, मुखबिरों और उनके कृपा पात्र रायबहादुरों, सरो, ताल्लुकादारों जमींदारों और राजाओं का राज चल रहा हैं। समाज में आज भी लोकतंत्र और आजादी का आना शेष हैं।
 बाहरहाल हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दादा सतलोकी नंदू नारायण भतपहरी, सतलोकी प्यारे लाल टंडन, जुनवानी देवगांव  एवं  जरवे निवासी स्व पटेल जी, सतलोकी नाना कोंदा प्रसाद बघेल कोसरंगी  खरोरा प्रथम अध्यक्ष सतनाम महासभा प क 65 के संस्मरण पर आधारित मेरी वर्षों पूर्व प्रकाशित कहानी 'सुम्मत के सुकुवा' हैं।
 उक्त , कहानी छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग  द्वारा प्रकाशित कहानी संग्रह  "पावन पिरीत के लहरा"  2015 में संगृहीत हैं।

Friday, November 7, 2025

ॐ श्री सतनाम साक्षी

सतनाम 

सिंधु घाटी सभ्यता में भी सतनाम हैं.इसके अनेक चीजें साक्ष्य सदृश्य उपलब्ध हैं. सदियों से जमींदोज चीजें बाहर आ जायेंगे यदि वहाँ की लिपि को पढ़ सके.

  ज्ञात इतिहास में श्रमण संस्कृति के संवाहक एवं सत्य के अनवेशक तथागत बुद्ध ने गहन तपस्या और  उत्कट साधना से प्रकृति के रहस्य  को उजागर किया. व्यक्ति एवं समाज कल्याण के लिए बौद्ध धम्म का प्रवर्तन करके, सत्य सनातन सतनाम को ही प्रतिष्ठित किया.
उसके पश्चात् भंते गण सिद्ध  साधु नाथ पाद संत जिसमें आनंद महामोदग्लयायन, सरहपाद, इंद्रभूति, 84 सिद्ध, गोरखनाथ मत्स्येन्द्रनाथ, रैदास कबीर नानक गुरु घासीदास जैसे संतो गुरुओं ने अलग अलग जगहों एवं परिस्थितियों मे  सतनाम का सुमरन एवं लोकाचरण कर आत्मिक एवं आध्यात्मिक शक्ति से उसी आदि अजर अमर सतनाम धर्म के अंतर्गत अपने अपने मतों,पंथों का प्रवर्तन किया.इसकी एक सुदीर्घ ऐतिहासिक  निर्गुण उपासना में  प्रत्यक्ष सतनाम परम्परा हैं.इसी को ही "एतो धम्मों संनतनो " कह बुद्ध ने सनातन संस्कृति की नींव रखी.
   तो दूसरी ओर हमारे  मैथिलॉजिकल पौराणिक परम्परा मे भी सतनाम की यश गान हैं. उन्ही की अनुसंधान करते वेद उपनिषद पुराण रामायण  श्रीमद भागवत आदि हमारे धार्मिक ही नहीं दार्शनिक  एवं साहित्यिक धरोहर हैं.इनमें ईश्वर की परिकल्पना करके उनके सगुण स्वरुप अवतार एवं लीलालो द्वारा जनमानस को सत्यचारण करते सतनाम को मानने की  अप्रत्यक्ष संदेश समादृत हैं. जिसके अंतर्गत शैव शाक्त वैष्णव की परंपरा हैं.
   इन दोनों धाराओ एवं कृषि वृत्ति से भारतीय संस्कृति का विकास हुआ है.
भगवान शंकर द्वारा माता पार्वती को सतनाम अमर कथा श्रवण कराने की प्रसंग हो या राजा हरीशचंद्र द्वारा सतनाम की मार्ग का अनुशरण का प्रेरक वृतांत हो या फिर भगवान विष्णु का  सत्यनारायण कथा हो जो घर घर मांगलिक अनुष्ठान की तरह आयोजित होते हैं.
राम की संघर्ष और अपेक्षित सफलता न मिल पाने की संदेश त्रिजटा से सुनकर बेबस और व्यथित सीता का रुदन अत्यंत कारुणिक हैं...और जब कोई सहारा न हो तो एक "सतनाम "तो हैं! जिसे स्मृत कर मन हल्का कर सकते हैं, आत्मबल भर सकते हैं।
"सत्यनाम नाम करु हरु मम सोका"
इस तरह  सतनाम की बातें उनके अनुगमन कर मानव जीवन को सुखमय बनाने की  महत्वपूर्ण सूत्र समाहित हैं।

भारतवर्ष के कण कण मे सतनाम समाहित हैं. सिंधु घाटी सभ्यता की प्राचीनतम धर्म आधात्म से लेकर अर्वाचीन ज्ञान विज्ञान के केंद्र में सतनाम परिव्याप्त हैं. 
 उत्तर हिमालय मे सतनाम साधना के  उतुंग शिखर हैं तो दक्षिण मे हिन्द महासागर की गहराई मे वह विद्यमान हैं.
 सागर तट रामेश्वरम में स्थापित सतनाम साक्षी द्वार इसी सतनाम केंद्रित धर्म संस्कृति की सनातन विशेषता को प्रदर्शित कर रहा हैं.

डॉ अनिल भतपहरी / 9617777514

C-11, ऊँजियार सदन सेंट जोसेफ टाउन  अमलीडीह, रायपुर छत्तीसगढ़

Monday, November 3, 2025

महात्मा गाँधी के अभिनंदन पत्र 1933

#daqument 

महात्मा गाँधी का अभिनंदन पत्र 1933 

"चार लाख सतनामी अन्य साधारण सवर्ण हिंदुओं से श्रेष्ठ सदाचरण जीवन व्यतीत कर रहे हैं।"
 महात्मा गाँधी जी को राजिम नवापारा कमेटी द्वारा 19-11-1933 को प्रदान किए गए अभिनंदन पत्र की टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। तभी तो हमलोग बचपन से सुनते रहे हैं कि कुछेक जहरिया सतनामी (कट्टरपंथी)हाट बाजार के केवटिन चना मुर्रा और रउत ,गहिरा के हाथों होटल के चाय पानी तक नहीं पीते। झोले में लोटे/गिलास पकड़ कर यात्रा करते और तालाब नदी नाले के पानी पीते थे। तब कुआं आदि भी बहुधा कम ही था।

 मेहराई का कार्य मेहर मोची का हैं जो पौनी जाति हैं और सतनामियों से बिल्कुल अलग हैं। हालांकि सतनामियों में अनेक जातियों की तरह वह भी सम्मिलित हुए और अपना पूर्व पेशा मान्यता का परित्याग कर दिए। पर जो सम्मिलित नहीं हुए वे लोग आज भी पारंपरिक पेशा करते हैं और वे लोग पांच पौनी में शामिल हर मेहर मोची का गांव आजीविका हेतु बटा हैं। जैसे नाई धोबी राउत ब्राह्मण के गांव आजीविका हेतु हैं।

कृषक जाति कुर्मी तेली सतनामी अघरिया लोधी राठौर हैं इनमें बड़ी जोत कुर्मी तेली और सतनामी के पास मैदानी क्षेत्र में हैं। वनांचल में आदिवासी हैं जो उत्तर में सरगुजा  उरांव, कोरवा बैगा भैना, राठिया आदि है। दक्षिण बस्तर में गोड़ कवर बिझवार माडिया मुरिया भतरा धुर्वा इत्यादि हैं।

ज्ञात हो कि भारत में सर्व प्रथम 1915 में गौरक्षा आंदोलन सतनामियों ने महंत नयन दास महिलांग एवं गुरु गोसाई ने बलौदाबाजार से आरम्भ किया और ब्रिटिश सरकार द्वारा संचालित बूचड़ खाना को सफलतापूर्वक लंबे संघर्ष के बाद बंद करवाए। पं सुंदरलाल शर्मा को पं मिलऊदास सतनामी ने ही सतनाम पंथ की आधारभूत जानकारी दी फलस्वरूप 1907 में वे सतनामी पुराण की सृजन किया। दोनो समवयस्क एवं कौंदकेरा और चमसुर राजिम क्षेत्र के प्रमुख स्वतंत्रता सग्राम सेनानी  महान हुतात्मा हैं ।
    समाज प्रमुखों द्वारा 1921 में सतनामी आश्रम की स्थापना गंज मंडी में कृषकों से एक बोरा धान में एक कटोरी बरार लेकर संचालित किए गए। यह भी सामाजिक जागरूकता की दिशा में मील का पत्थर हैं।
  वैसे भी रायपुर में सतनाम पंथ के तीन प्रमुख बाड़ा था जिसमें गोसाई बाड़ा गुढियारी, मांगडा बाड़ा जवाहर नगर एवं साहेब बाड़ा मोवा जहां  गुरु अगमदास गोसाई मिनीमाता जी का निवास थी और सामाजिक जनो/ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के लिए शरण स्थली व धर्मशाला थी। यही पर जवाहर लाल नेहरु के सचिव बाबा रामचंद्र जी रहकर अंग्रेज भारत छोड़ो आंदोलन का संचालन किए।

डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

   चित्र: नवापारा राजिम नगर कमेटी द्वारा महात्मा गाँधी जी को 19-11-1933 को प्रदान किए गए अभिनंदन पत्र में सतनामियों के संदर्भ में दी गई जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण एवं रेखांकनीय हैं।

Sunday, October 26, 2025

किस्सा बहराम चोट्टे का

#anilbhatpahari 

किस्सा बहराम चोट्टे का 

उक्त उपन्यास का लोकार्पण समारोह का आमंत्रण पत्र और शीर्षक देख मुझे "चरणदास चोर "स्मृत हुआ कि कही "महंत जुगुलदास गाथा" जैसा  छत्तीसगढ़िया रॉबिन हुड किरदार तो नहीं होगा? जिसे  नाचा गम्मत से लेकर हबीब साहब ने सत्य के प्रति अटूट निष्ठा से अमर हुए पात्र को "चरणदास चोर" बनाकर  प्रतिष्ठित एवं सम्मानित कराया। एक तरह से उन्होंने नया थियेटर के माध्यम से छत्तीसगढ़ी कला ,संस्कृति ,धर्म और मान्यता को वैश्विक मंच प्रदान किया। उसी चरणदास को पिताश्री के निर्देशन में  नवरंग नाट्य कला मंच 1975 से हम लोग भी करते रहे हैं। इस कारण भी बिलासपुर की अनिवार्य सा प्रवास को स्थगित कर कथानक के मोह वश भी जाना हुआ।

बहरहाल कार्यक्रम के उद्बोधनों में जाना कि यह तो एकदम से अलग पात्र हैं एक ऐसा बहराम जो लोगों को खूबसूरती से लूटते रहा / उनका हर चीज यहां तक विश्वास /मत चुराते रहे ,नेतृत्व करते रहा. पर वह अपना सा लगा और जाना भी तो चाहकर विद्रोह भी नहीं कर पाया।
    समीक्षक प्रथम वक्ता डॉ सुधीर शर्मा पते की बात कहे कि ऐसे बहराम अब छत्तीसगढ़ में लाखों की संख्या हैं। जो हर क्षेत्र में मौजूद हैं। सचमुच उपन्यास बिना पढ़े प्रासंगिक लगने लगा।

   आज़ादी के महज 10 साल बाद 1958 में मोहभंग से ऊपजे मनोदशा कथानक के रुप में ,पहले धारावाहिक  आया। उसके 4 साल बाद 1962 में  प्रकाशित " किस्सा बहराम चोट्टे का" संभवतः हिंदी के प्रथम हास्य व्यंग्य उपन्यास हैं जो "राग दरबारी "की पूर्व पीठिका सा हैं।
   उक्त उपन्यास के लेखक विश्वेन्द्र ठाकुर के  परिजनों ने 65 वर्ष बाद लगभग विस्मृत कर चुके और बमुश्किल लतीफ घोंघी जी के घर उनके सुपुत्र प्रो करीम साहब के सौजन्य से एक प्रति मिले । इस प्रसंग को महासमुंद से पधारे लेखक  शर्मा जी ने रोचक आपबीती बताते भावुक होते ऐसे बताए कि परिजन खो चुके पुस्तक की एक प्रति को दिवंगत "पिता के अस्थि कलश " प्राप्त करते हुए सा कंपकपी हाथों से धारण किए... खचाखच भरा विमतारा हाल भाव विह्वल हो उठे।
 उनके समकालीन वरिष्ठ साहित्यकार रवि श्रीवास्तव ने उपन्यास की एक पंक्ति सुनाते कहे कि बहराम किसी नदी  के बाढ़ की तरह बस्ती में चढ़ा जा रहा हैं। क्या विलक्षण उपमान हैं। ऐसा तो आजकल गांवों को निगलते अनेक भू माफिया और कॉर्पोरेट घराने के लोग सर्वत्र मिलने क्या दिखने लगे हैं। नव धनाढ्यों की बढ़ती बाढ़ से तबाह होते गांव और जनजीवन सहज ही द्रष्टव्य हैं।

इस महत्वपूर्ण उपन्यास को उनके सुपुत्र संकेत/ सरल ठाकुर एवं अन्य सभी मिलकर पुनर्प्रकाशित कर साहित्य जगत के लिए अप्रतिम व स्वागतेय कार्य किया हैं।
   सतलोकी लेखक विश्वेंद्र ठाकुर जी को विनम्र श्रद्धांजलि सहित परिजनों को बधाई कि उन्होंने मिलकर  पिताश्री की कृति और उन्हें चीर स्मरणीय बनाएं हैं। यह उपलब्धि हमारे छत्तीसगढ़ राज्य और कथानक क्षेत्र महासमुंद के लिए ही नहीं बल्कि हिंदी जगत के लिए गर्व का विषय हैं। अनेक साहित्यिक और स्वनाम धन्य लोगों के साथ मुझे आमंत्रित कर इस ऐतिहासिक  पल का साक्षी बनाने के लिए ठाकुर परिवार के प्रति आभार।

   जय हिंदी जय भारत 

डॉ अनिल भतपहरी/ 9617777514

Tuesday, October 21, 2025

दीपावली

#anilbhattcg 

दीपावली की हार्दिक बधाई 

दीपावली का आशय अनेक दीपों की पंक्तियां हैं जिसे कतारबद्ध रखा गया हो।  ऐतिहासिक तथ्य यह है कि सम्राट अशोक अपने अधिकार वाले इस महादेश जिसकी सीमाएं सुदूर कंधार (गंधार)कजाकिस्तान से लेकर श्याम देश बाली सुमात्रा तक नेपाल से सिंहल द्वीप श्रीलंका तक 84 हजार बौद्ध स्तूप बनवाए और एक ही तिथि कार्तिक अमावस्या को इन स्तूपों में दीप प्रज्वलित करवाकर उद्घाटन कराए। 
  रामायण महाकाव्य के अनुसार भगवान राम वनवास से अयोध्या लौटे उनकी स्वागत में लोग अपने घरों में दीप जलाएं। 
पौराणिक वृतांत के अनुसार समुद्र मंथन में धनवंतरी और लक्ष्मी प्रगट हुई उनके स्वागत में दीप जलाएं।
      छत्तीसगढ़ में कृषि संस्कृति का यह पावन पर्व हैं फसलों  के खासकर धान का घर, कोठी,खलिहान में आने उनके स्वागत में ग्राम देवताओं में दीप जलाने, रात्रि को पशु पालक भैंस के कोठे में सुअर, गाय के कोठे में मुर्गा कबूतर आदि के बलि चढ़ाने, मांस मदिरा पान कर सामूहिक नृत्य गान करते खुशियां मनाने का प्राकृतिक पर्व हैं ।
 रात्रि में गौरा गौरी विवाह उत्सव का भी आयोजन बड़ी धूमधाम से किए जाते हैं। इसके लिए सुवा नृत्य कर पंद्रह दिनों तक महिलाएं तैयारी करती हैं।प्रातः विसर्जन कर सुख संपदा की कामना की जाती हैं।

जब से मानव समाज में कृषि संस्कृति विकसित हुईं गांव बनाकर एक जगह बसाहट हुई  तब से यह प्रथा प्रचलन हैं। कालांतर में इस दिन लोग अपनी अपनी धर्म मत की कथा कहानियों को जोड़ दिए गए। फिर मूल बातें विस्तृत कर कथाओं को ही सच मानने लगे।

१सुरहुत्ती / देवारी= ग्राम देवताओं में दीप चढ़ना/ बलि देना 
 २गोवर्धन  पशुओ को खिचड़ी खिलाने कोठी में टीका देना धन की बढ़वार की कामना का पर्व।

३ मातर भूदेवी की पूजा लोग सामूहिक नृत्य गान करते गौठान में एकत्र होते हैं और खेल शौर्य का प्रदर्शन करते हैं। मातृका पूजन का अवशेष सिंधु घाटी सभ्यता में भी मिलती है।
यह लोक पर्व हैं न कि शास्त्रीय पर्व।
व्यापारियों/ धार्मिकों/ ने इसे अपने अपने ढंग से व्याख्यायित कर इस लोक पर्व को अपना लिए हैं और उसी तरह प्रचार प्रसार करते हैं।
मुगलों ने बारूद से तोप पटाखे फोड़े कर परीक्षण किए आवाज से हर्ष प्रगट किए , बिजली आई तो रौशनी करने बल्बों की झालर बने। 
। पुष्य नक्षत्र में सोने चांदी  खरीदी हेतु शुभ मुहूर्त घोषित किए गए। बर्तन लेने धन तेरस गढ़े गए इस तरह अनेक चीजें जुड़ती गई। इस तरह यह दीपोत्सव देश का  महापर्व हो गया।
  
सबके अंत: करण में परिव्याप्त अज्ञान अभाव रुपी कष्ट कलुष कटे, सर्वत्र उजियारा फैले। मंगलकामनाएं ।

डॉ .अनिल भतपहरी/9617777514

फ़कत

आपके वास्ते छकड़ी हमरी
        "फ़कत"
खेल रेखाओं का नही
और न तक़दीर का है
भाग्य,भगवान-खुदा
न कोई पीर-फ़कीर का है
ये तो 0फ़कत आपके चुनाव
और उनकी ज़मीर का है...

बिंदास कहें- डा.अनिल भतपहरी

Friday, October 10, 2025

बीरन माला

Gopikrishnasoni Soni 
मुखड़ा 

रुप तोर मोहिनी मोर मन झाला हो मन झाला 
मैं तोर बर भेजव बीरन माला ओ बीरन माला...
मोरो मन भाए तय बतावव काला ग बतावव काला 
महु तोर भेजहु बीरन माला ग बीरन माला 

डोंगरी तीर म तितुर बोले ओ तितुर बोले 
तोर आरो ल पाके मोर मन डोले ओ बीरन माला 

सेमी के मड़वा  अबड गहिदे ग अबड गहिदे 
तोर बोली बचन म मोर अरिझे 


Sunday, October 5, 2025

गुनान गोष्ठी

#anilbhatpahari

छत्तीसगढ़ी साहित्यकार सम्मेलन म गुनान गोष्ठी

राज मिले २५ बछर होगे बड़ उछाह हे !
फेर इहां के भाषा,कला संस्कृति
अउ अस्मिता के संगे संग
जल जंगल जमीन ख़िरात हे!
छत्तीसगढ़ी गीत संगीत सनीमा संग
पठन पाठन लेखन म छत्तीसगढ़ नदात हे!
ये संसो कि खरही लेसत अउ कोठी के धान हेर
हमरे छानी म होरा भुजंत हमीं ल बिलेर मिझेर
अतेक मान देवन  कि उन ल डरान
चिटकोन नइये कोनो ल काही भान
का संत भूमि के रहैया संते कस संतई करत रही जाबोन
तियाग तपस्या करतेच रहिबोन कि कभू राजपाट पाबोंन
मंद माखुर के निशा पानी,देव धामी के पूजई आनी बानी
यहीच मोकाय बोकाय जम्मो जिनीस ल लुटाय नंगाय
का मुड़ी धर गुनत रहि जाबोन सरी जिनगी ल पहाबोन

कइसे कही कछु कहत नइअस ग सियान
चीटिक मने मन भंजा ले कब होही बिहान

   डॉ. अनिल भतपहरी/ 9617777514

Friday, October 3, 2025

अनावश्यक रुप से आवश्यक हस्तक्षेप

।।अनावश्यक रुप से आवश्यक हस्तक्षेप।।

   सोशल मीडिया प्रायः पोस्ट/ पेस्ट/सर्च कर्ता ,लेखक एवं पाठक के मिजाज़ का अध्ययन कर उनके रुचि अनुरुप सामग्री पेश करते हैं ।इसलिए प्रायः हर व्यक्ति को यह माध्यम सम्मोहक लगता हैं। जितना वे जानते समझते हैं ,उसे और भी बेहतर करते हैं। इस कारण उनके मायाजाल में  लोग फंसते जा रहे हैं । 
     यह आपका  समय,संसाधन( डेटा)स्वास्थ्य को बर्बाद कर रहे हैं। हालांकि खाली बैठे लोगो में बहस परिचर्चा कर टाइम पास के लिए भी यह बेहतर माध्यम हैं। शासन -प्रशासन  के लिए भी राहत की बात हैं कि बेरोजगारी भी बेरोजगारों के लिए  बोझ नहीं रहा ,बल्कि किसी के पास काम मांगना, हक अधिकार के लिए संघर्ष या हड़ताल आदि करना तो दूर ये सब करने के लिए समय ही नहीं हैं। 
बीवियों/बच्चों भी इसमें इतना इंवॉल्व हैं कि पतियों का जेब मोबाईल रिचार्ज कराने के सीमित खर्च में ठाठ से चल रहे हैं। अब फरमाइश पूरा करने की रोना धोना और टेंशन से मुक्ति सी ही हैं।
    बाहर हाल यह मीडिया विहीन लोगों के लिए वरदान जैसा हैं। हथेली में पकड़े मोबाइल और की बोर्ड में चलते अंगुली से कई कमाल भी हो रहे हैं। इसमें उपलब्ध फेसबुक, वाटशाप मैसेंजर जैसे सोसल मीडिया , रिल्स, इंस्टाग्राम, ट्यूटर, यूट्यूब इत्यादि लोगों तक पहुंचने अपनी बातें रखने और विविध कलाओं के प्रदर्शन से प्रसिद्धि पाने और रुपए कमाने तक का साधन बन चुके हैं। 
    एक अकेला मोबाईल मोबाईल रेडियो,टार्च, घड़ी पोस्ट,ऑफिस,चिट्ठी,पत्री,बैंक, और बाज़ार से हर वस्तु की खरीददारी या कोई और अन्य सेवा लेने का विश्वनीय माध्यम हो चुके हैं। भले मनुष्य का सार्वजनिक जीवन एकांतिक हो रहे हो, परन्तु मानव जीवन में "अनावश्यक रुप से आवश्यक हस्तक्षेप "हो गए हैं। 

कितने ही कह ले पर अब ,कोई नहीं रहा हैं सुन 
सोचा नहीं यह जीवन होंगे ,इनके बिन  सब सून 

डॉ अनिल भतपहरी/ 9617777514

Wednesday, October 1, 2025

सामाजिक/ राजनैतिक चेतना का 110 वा वर्ष

एक सौ दस वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ की सामाजिक/ राजनैतिक चेतना

सतनामियों का गौरक्षा आंदोलन सर्वप्रथम 1915 में राजमहंत नयन दास महिलाँग और गुरु गोसाई अगमदास साहेब के नेतृत्व में आरम्भ हुआ. यह आंदोलन इतना उग्र और प्रखर था कि जिस सत्ता की सूर्य नहीं डूबती उस ब्रिटिश हुकूमत की चूले हिल गई.उनकी दो बड़े बुचड़ खाने करमन डीह और ढाबाडीह बंद हो गये जहाँ से सेना के लिए मांस और चमड़े की आपूर्ति होती थी. कृषको के लाखों पशुधन कटने से बच गये.
   आंदोलन और उनकी सफलता  से देश भर में खलभली मच गई. कलांतर मे तीन बातें घटी- 

1 हिन्दू महासभा वालों ने सतनामियों का सम्मान किया और हिन्दू सतनामी महासभा का गठन कर सतनामियों का हिन्दुकरण करने की दिशा मे अनेक कार्यक्रम आरम्भ हो गए.

 2. महात्मा गाँधी का सतनामियों के बीच आगमन और स्वतंत्रता आंदोलन के  साथ  कांग्रेस से जुड़ाव.
 
  3.1924 में डॉ अम्बेडकर का इंग्लैंड से वापसी और उनका सामाजिक क्रन्तिकारी कार्य और उनके प्रतीकार हेतु  1925 में आर एस एस का अभ्युदय इतिहास का महत्वपूर्ण घटना हैं.
110वर्ष के इस काल खंड पर विचार विमर्श होनी चाहिए.

डॉ. अनिल भतपहरी / 9617777514

Tuesday, September 30, 2025

Anil Biodata

नाम : डॉ.अनिल कुमार भतपहरी 
माता : श्रीमती केराबाई भतपहरी
पिता: स्व. सुकाल दास  भतपहरी 
शिक्षा : एम ए पीएचडी पी. जी. डी. टी. सुगम संगीत 
संप्रति: प्राध्यापक हिंदी 
वर्तमान पद : उप संचालक उच्च शिक्षा विभाग संचालनालाय इंद्रावती भवन नवा रायपुर 

श्रेणी : प्रथम
वेतन मैट्रिक लेवल 13 A
वेतन : 205000

अनुभव: 23 वर्षो का आध्यापन
एवं 2003 से 2019 तक सत्रह वर्षो तक रसेयों कार्यक्रम अधिकारी

प्रशासकीय अनुभव : 1.  सहायक संचालक उच्च शिक्षा विभाग 2019-2021 

2. सचिव,छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग  2021- 2024 

3 उप संचालक उच्च शिक्षा विभाग 2024  से अब तक
 
4 राज्य स्तरीय साहित्यकार सम्मेलन आयोजन प्रभारी एवं राजकीय सम्मान के लिए निर्णायक समिति में सदस्य 
5 राजिम कल्प कुंभ 2023 में सत्कार/ मंच प्रभारी
6 इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ का नोडल अधिकारी 
7  राज्योत्सव 2024 एवं 2025 के लिए उच्च शिक्षा संचालनालय प्रभारी ।
प्रकाशित कृति - 1 कब होही बिहान  काव्य संग्रह (सर्व प्रिय प्रकाशन नई दिल्ली ) 2007

2 पावन पिरीत के लहरा कहानी संग्रह वैभव प्रकाशन रायपुर 2015

3 गुरु घासीददास और उनका सतनाम पंथ वैभव प्रकाशन रायपुर, एवं  बुक क्लिनिक बिलासपुर 2019

4 हँसा अकेला सतनाम संकीर्तन   
वैभव प्रकाशन रायपुर 2019

5 ठोस विचारों की कीमगिरी लघु  कथा संग्रह , बुक क्लिनिक 2021 

6 The value of a cup of tea (short stories ) book clinic Bilaspur

7 हड्डी की जीभ नहीं कि न फिसले काव्य संग्रह ,वन एलीगन नई दिल्ली 
8 सुकुवा उवे न मंदरस झरे काव्य संग्रह सत श्री प्रकाशन 


सम्मान - कौमी एकता सम्मान 2008,आरुग फूल सम्मान 2009, काव्य श्री सम्मान 2012,   विशिष्ट कार्यक्रम अधिकारी सम्मान मैसूर 2012 छत्तीसगढ़ राजभाषा सम्मान 2012, राष्ट्र भाषा अलंकरण 2013, 2019, स्वास्थ्य मंत्रालय नई दिल्ली से उत्कृष्ट सेवा सम्मान 2019, अंतर्राष्ट्रीय लघुकथा सम्मान काठमांडू नेपाल 2022 
बिलासा सम्मान 2023, विमल मित्र सम्मान 2023 
विभिन्न सामाजिक / साहित्यिक सस्थानों ने विविध सम्मान. 

पता -  ऊँजियार सदन, सी 11/ 9077 
सेंट जोसफ टाउन अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़

संपर्क - 9617777514
anilbhatpahari@gmail.com 
Blog - सत सांधन anilblogpost 

YouTube channel : Anil Bhatt CG 

Website - anil.in

Thursday, September 25, 2025

गुरुगद्दी पूजा महोत्सव और गुरुदर्शन मेला

"  गुरुगद्दी पूजा महोत्सव / गुरु दर्शन दु:ख-दंशहरा पर्व "

सतनाम धर्म के चारों शाखाओं और देश विदेश में निवासरत सतनामियों मे गुरुगद्दी पूजा विधान प्रचलित है।
  गुरुगद्दी सद्गुरु के आसन है जिसपर  आसनगत  होकर अपने सम्मुख उपस्थित अनुयायियों को धर्मोपदेश देते और उनके तमाम उलझनो परेशानियों और दसो तरह  दु:ख व्याधि के हरन का उपाय बताते इसलिए भी यह दु:ख दंशहरा परब है।
   क्वार शुक्ल एकम से  दशमी तक दस दिवसीय इस महापर्व का आयोजन होते है नित्य प्रात: शाम आरती पूजा के साथ साथ संत महंत गुरुओ द्वारा  ग्यान वर्धक व्यख्यान्न सत्संग प्रवचन गुरु ग्रंथ व चरित का पाठ एंव लोक कलाकारों द्वारा प्रेरक व मनोरंजक नाट्य मंचन गायन व नर्तन होते है।कही कही हर शाम सामूहिक भोग भंडारा होते है जिससे इस विकट समय टुटवारो के दिन में परस्पर मिलजुल कर सहभोज कर आत्मिक आनंदोत्सव मनाते है ।यह सब सद्गुरु के समछ  होते है।ताकि पुरी पवित्रता और महत्ता कायम रहे उनका सदैव आशीष मिलता रहे।इस कठिन वक्त जब फसलें खेत मे है और लगभग जन साधारण के अन्नागार कोठी खाली हो उस समय साधन सछम लोग जन कल्याणार्थ इस महा पर्व मे अन्नदान कर सामूहिक भोग भंडारा चलाते है ताकि गरीब गुरबा बडे बुजुर्ग महिलाओं  व बच्चो  को  गुरुप्रसादी के रुप मे भोजन मिल सके।और रात्रिकालीन होने वाले ग्यान वर्धक व मनोरंजक कार्यक्रमों का लाभ उठाकर सुखमय जीवन निर्वाहन कर सके।इसी  प्रयोजनार्थ  सतनाम संस्कृति मे यह महत्वपूर्ण आयोजन है।
    दसवें दिन "सदगुरुआसन" का  प्रात: शोभायात्रा निकाल ग्राम गलियों की परिक्रमा कराते है।और सदानीरा नदी सरोवर के समीप जल परछन कराकर वापस गुरुद्वारा या कोई श्रद्धालु अपने घर नित्य आगामी उत्सव तक पूजा अर्चन करने स्थापित करते है।
   शाम को तेलासी अमसेना खपरी बोडसरा ( वर्तमान मे स्थगित) खडुआ गुरु वंशजो के दर्शनार्थ जाते है शोभायात्रा और उनके सम्मुख श्री मुख से सद्गुरु की अमृतवाणी श्रवण करते कृतार्थ होते है।गुरु उपदेश सिद्धान्त रावटी महात्म से परिपूर्ण संत महंत की उपदेशना चौका आरती भजन पंथी एव ग्यान व मनोरंजन पूर्ण कार्यक्रम देख सुन कृतार्थ होते है।
    दूसरे दिन जग प्रसिद्ध भंडारपुरी गुरुदर्शन दशहरा पर्व का आयोजन हर्षोल्लास पूर्वक होते है।इस दिन हाथी घोडे ऊट पैदल चतुरंगी शोभायात्रा गुरु वंशजो व गुरुगद्दी नशीन धर्मगुरु का उपदेश व प्रवचन होते है।
   सतनामियो का यह सबसे बडा और प्राचीन महोत्सव है। जहां गुरुवंशज के घर से गुरु प्रसादी भोग भंडारा पाकर श्रद्धालु गण लोग धन्य-धन्य हो जाते है।
     छग मे स्थापित सतनामधर्म का यह उत्सव १८२५ में जब मोती महल गुरुद्वारा का उद्धाटन हुआ और राजा घोषित होने बाद चतुरंगी सेना साजकर आम‌जन मानस को दर्शनार्थ सद्गुरु घासीदास के मंझले पूत्र राजा गुरु बालकदास  भाई आगरदास पुत्र साहेब दास हाथी मे संवार आमजनमानस के बीच आकर गुरु उपदेशना व पंथ संचालन हेतु आवश्यक दिशा निर्देशन किए।
  तब से यह विशिष्ट आयोजन परंपरागत आन बान से हर्षोल्लास पूर्वक मनाते आ रहे हैं।

डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ ९६१७७७७५१४

Thursday, September 18, 2025

पुरखौती मुक्तांगन में मध्य छत्तीसगढ़

रजत उत्सव के अवसर पर 

पुरखौती मुक्तांगन में मध्य छत्तीसगढ़  

    छत्तीसगढ़ प्राकृतिक और भौगोलिक रुप से तीन भागों में विभक्त हैं। उत्तर में सरगुजा का पाट, मध्य छत्तीसगढ़ का मैदान और दक्षिण में बस्तर का पठार । पूर्व में महानदी का पावन प्रवाह वाली लारियांचल तो पश्चिम में डोंगरगढ़ भोरमदेव सतपुड़ा मैकल श्रेणी में अवस्थित चिल्फी घाटी की हसीन वादियां हैं ।इन  जगहों की भाषा कला संस्कृति भी अलग हैं। प्रदेश की इन जगहों की विशेषताओं और महत्ता को बताने हेतु पुरखौती मुक्तांगन की परिकल्पना की गई ताकि प्रदेश की प्राचीन धरोहरों और जीवन स्तर लोक मान्यताओं को पर्यटन करते एक ही जगह उपस्थित होकर कुछ घंटों में  आधारभूत ढंग से सामान्य (मोटे )तौर पर समझा जा सके।
   यहां सरगुजा ,बस्तर प्रखंड तो हैं जहां परन्तु मध्य छत्तीसगढ़ नहीं। इस कारण यहां की सांस्कृतिक वैभव में अनेक कमियां नज़र आती हैं। बाह्य पर्यटकों को लगता हैं छत्तीसगढ़ आदिम जनजीवन और संस्कृति के ही संवाहक अत्यंत पिछड़ा  वनांचल राज्य हैं। जहां स्त्री पुरुष अर्ध विवृत जीवन जीने विवश और केवल नाच- गाने में मंद मऊहा सल्फी ताड़ी हड़िया कोसना में उन्मत लोग हैं।  मंचीय प्रस्तुतियों में भी लोक संस्कृति के नाम पर यहीं भाव प्रदर्शित होते हैं।
   जबकि मध्य छत्तीसगढ़ की गौरव शाली एवं सौंदर्यबोधक वस्त्राभूषण, साबुत अनाज (बिना सड़े गले खमीर आदि उठाएं) की खान पान ,रहन सहन किसी भी राज्य से कमतर नहीं। यहां की भाषा और उनमें उपलब्ध साहित्य दर्शन उत्कृष्ट हैं। लोक कलाएं विविधतापूर्ण और समृद्ध हैं। किसी राज्य की एक दो या पांच लोक नृत्य होंगे पर यहां स्त्री पुरुषों की पृथक और युगल दर्जनों नृत्य  शैलियां  है जिसमें पंथी,राउत,कर्मा, सुआ,शैला, रीलों,बार, सरहुल, ककसार ,डंडा, मांदरी, हरे राम हरे कृष्णा, रमसत्ता, रहस,  छैला नाच, देवार नृत्य जैसी विशिष्ट शैलियां हैं। शास्त्रीय नृत्य में रायगढ़ घराना और खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय तो लोक और शास्त्रीय संगीत विविध ललित कलाओं की  साधना स्थली हैं जहां देश विदेश से कलावंत आते और सीख समझ कर जाते हैं।
     अनेक पर्व उत्सव मेले मड़ाई हाट बाजार पसरा हैं ।और जनजीवन तो अन्य जगहों के अपेक्षा  थोड़े में संतुष्ट संत संस्कृति के संवाहक हैं। जिनमें प्राचीन सहज यान महायान नाथ सिद्ध  शैव शाक्त वैष्णव बौद्ध जैन संस्कृति की समन्वय स्थली हैं जहां आर्य अनार्य संस्कृति का समागम होते हैं। दक्षिणा पथ के नाम से विख्यात सद्वाहों सतवहनो की धरती में अनेक ख्यातिनाम भट्ट प्रहरी हुए हैं। जिसमें सम्राट विजयस जिसके समय में बुद्ध का आगमन राजधानी सिरपुर में हुआ। वहीं नागार्जुन आनंद प्रभु, जैसे आचार्य हुए। वल्लभाचार्य,कबीर धर्मदास गुरुघासीदास, अमरदास ,विवेकानंद महेश योगी , संत गहिरा गुरु , ओशो ,स्वामी आत्मानंद , पवन दीवान  जैसे संत को जन्म और आकार देने वाली शस्य श्यामला धरती हैं ।इसलिए इसे उत्तराखंड  हिमाचल को जैसे देवभूमि कहते हैं ठीक यह संतो की धरती छत्तीसगढ़ को " संतभूमि"  कहते हैं। 
   सिरपुर राजिम, शिवरीनारायण गिरौदपुरी दामाखेड़ा तुम्मान, ताला,मल्हार चैतुरगढ़, डमरू खरचा, आरंग रीवा, खल्लारी, चंद्रपुर, डोंगरगढ़ भोरमदेव  रतनपुर दल्हा, जलेश्वर,  जैसे ऐतिहासिक धार्मिक नगरी आस्था के केंद्र हैं। छत्तीसगढ़ में तीन साक्षात् त्रिवेणी संगम राजिम , पंजनी पैसर और शिवरीनारायण हैं जहां कल्प कुंभ किए जा सकते हैं जो कि अन्यत्र दुर्लभ हैं। कोरबा भिलाई, चिरमिरी ,नगरनार, तमनार जैसे औद्योगिक तीर्थ नगरी और गंगरेल हसदेव जैसे विशालकाय बांध सागर जैसे दर्शनीय हैं।रायपुर बिलासपुर दुर्ग राजनांदगांव जगदलपुर  अंबिकापुर जैसे प्रशासनिक संवैधानिक और सांस्कृतिक नगर देश के अन्य नगरों से सदृश्य हैं।
     इनके संरक्षक बलिदानी राजाओं में कल्याण साय,गुरु बालकदास, गेंद सिंह, वीर नारायण सिंह,  गुण्डाधुर मूंदरा मांझी प्रवीण चंद्र भंजदेव जैसे रत्न हैं। 
  गौरक्षा आंदोलन 1915 के प्रणेता राजमहंत नयन दास महिलांग गुरु गोसाई अगमदास जंगल सत्याग्रह के नायकों में बूढ़ान शाह रामचरण दयावती कंवर , तो नहर सत्याग्रह में नारायण मेघवाले, छोटेलाल सामाजिक क्रांति और मंदिर प्रवेश के लिए प सुंदरलाल शर्मा, पंमिलऊ दास कोसरिया, प. तुलम तुलाई लोगों के कारण स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि बनी। जिसमें मिनीमाता राधाबाई दयावती कंवर राजमोहिनी देवी जैसी मातृ शक्तियां भी बढ़ चढ़ हिस्सा ली और समाज / देश सेवा  के लिए स्वयं को समर्पित की 
   कला जगत में  मंदराजी, रामचंद्र देशमुख, महासिंह चंद्राकर ,दानी दरवन, चम्पा बरसन हबीब तनवीर, शेख हुसैन, देवा दास बंजारे, सुकालदास भतपहरी, मेहतर साहू,  गंगाराम शिवारे नारायण वर्मा  झाडूराम देवागन,  सहित पंडवानी की पुरखिन दाई सुखबती, लक्ष्मी बंजारे तीजन बाई सुरुजबाई फ़िदाबाई, मालाबाई जैसी मौलिक सितारा कलाकार हैं। जिसकी अनुशरण कर लोग प्रसिद्धि की शिखर स्पर्श करते आ रहे हैं।
साहित्यकारों में  ठाकुर जगमोहन पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पद्म श्री मुकुटधर पाण्डेय, लोचनप्रसाद, मुक्तिबोध,मनोहरदास नृसिंह, द्वारिका प्रसाद तिवारी, हरि ठाकुर , प्रमोद वर्मा केयूर भूषण मदनलाल गुप्त प सुकुल दास घृतलहरे, शाखा प्रसाद बघेल, शानी ,सुकाल दास भतपहरी , लक्ष्मण मस्तूरिया,  सुशील यदु श्यामलाल चतुर्वेदी लाल जगदलपुरी,हरिहर वैष्णव,इत्यादि अनेक साधक हैं। इन सबकी की यादें, मध्य छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण  ऐतिहासिक घटनाओं  और जीवन स्तर की झलकियां भी उक्त ओपन म्यूजियम / खुला संग्रहालय  "पुरखौती मुक्तांगन" में होना चाहिए। ताकि लोगों को छत्तीसगढ़ की विविधता और एक साथ आदिम जीवन और आधुनिक जीवन शैली का साक्षात्कार हो सके। प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी के अनुसार एक  साथ 10 वी और 21 के जीवन शैली को देखना हो तो और उन्हीं के तकिया कलाम अमीर धरती के गरीब लोगों की धरती छत्तीसगढ़ में स्वागत हैं।
    राज्य के पच्चीसवें वर्ष में रजत जयंती के पावन अवसर में राज्य की सर्वाधिक बसाहट वाले मध्य क्षेत्र की  सांस्कृतिक तत्व की जाने- अनजाने में अनदेखी न हो और देश के नागरिकों को राज्य की तीनों प्रखंडों की सांस्कृतिक वैभव का झलक पुरखौती मुक्तांगन प्रांगण में सहज दर्शनीय हो इनकी व्यवस्था होनी चाहिए। ताकि अनेक विरोधाभासों का सम्यक समाधान तलाशा जा सकें। सुखी और समृद्ध छत्तीसगढ़ गढ़ा जा सकें।

      जय छत्तीसगढ़ 

डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

Tuesday, September 16, 2025

भाषाई श्रेणी क ख ग के चिखला म चभके छत्तीसगढ़ी

 ।।भाषाई श्रेणी क ख ग के चिखला म चभके छत्तीसगढ़ी।

  एक नवंबर ईस्वी सन 2000 में देश के 26 वें राज्य के रुप में  छत्तीसगढ़ बनिस। हिंदी भाषी राज्य मध्यप्रदेश ले छत्तीसगढ़ी भाषा के विस्तार क्षेत्र ल भाषाई  अउ सांस्कृतिक आधार पर चिन्हांकित करके  छत्तीसगढ़ राज अलग होइस। हालांकि बालाघाट, अमरकंटक अनूपपुर  के कुछेक एरिया तकों आतिस।फेर जतेक आइस ओहर अनेक  विशेषता से परिपूर्ण हवय। ते पाय के  छत्तीसगढ़ हर झटकुन  देश भर अपन पहचान बनालिस. 
  अब तो छत्तीसगढ़ महतारी हर 25 बछर के होगिस जइसन ये उमर मे बेटी माई मन के सुघरई बाढ़ जाथे उही रकम के हमर छत्तीसगढ़ के सुघरई अउ महमई चारों खुट बगरत हवय.
   ते पाय के सबो डहन ले  इहा लोगन के आय जाय के रेम लगे हवय. स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, रेल कल कारखाना सहित उद्योग बाईपार के बढ़वार होवत हवे. फेर कोजनी इंहा के मनखे मन कमाए- खाय बर परदेस जवई छूटत नइहे. देवारी मान खलक उजरे कस गांव के गली सुना पर जाथे। इंहचे येमन बर कोन्हो बुता_ काम काबर नइहे? खांती कुदारी ,रापा गैती के सिवाय कोनो दूसर कराज नइहे का? जब ले जेसीबी, हाइवा ,हाइड्रा आये अब झउहा रापा कुदारी मन नंदा गय. बनिहार मन अब बनी नई मिलय ते पाय के ठल्हा बैठे चौरा मे बीड़ी गांजा मंद माखूर खात -पियत,लड़त- झगरत,थाना -पुलुस,कोरट- कचहरी मे मुंशी,वकील कना लुटात दिख थे.सालपुट खेत बेचत किसान बनिहार होगे.
गाँव मन मे तो अंधियारी छाय हे ,भले शहर पहर मन दगदगात हे.गवई के कुछेक पढ़े लिखें नौकरी चाकरी,हुनर वाला हे ओमन तकों शहर धरे हे अउ अपन सुग्घर रोजी रोजगार मे मगन हवे. फेर कतको झन मन गरु जांगर धरे गरुआत बैठे हे उनकर मन बर कोनो उद्योग बाईपार रोजी रोटी के बेवस्था नइहे तेन हर बड़ संसो अउ गुनान  गोठ आय. इनकर बिन सजोर उपाय करें छत्तीसगढ़ के उद्धार नइहे.

इहि तरा इहाँ के  राजभाषा अउ दाई भाखा छत्तीसगढ़ी के तको कोनो पुछन्ता नइहे. अतेक बड़ राज अउ दू करोड़ मनखे के बोले बतियाये समझे के भाषा मे कोनो दैनिक समाचार पत्र नइहे. टीवी चैनल नईए न खोल चला सके कोनो मूल छत्तीसगढ़िया के हैसियत हवे।  स्कूल कॉलेज मे  न पढ़ाई चलत हे ,न मास्टर गुरुजी के भर्ती हे. तब भाषा हर कबतक बाचे रही. गांव गवई ल छोड़ दे शहर मे बसे छत्तीसगढ़िया परिवार मे अब छत्तीसगढ़ी नंदा गे  हवय. अउ यही हाल रही त छत्तीसगढ़ी हर झटकुन गाँव - गवई ले तको नंदा जाही. ये हर बड़ दुःख के बात हवय. तेहि पाय के पर प्रांतिक मूल के गैर छत्तीसगढ़ी भाषी छत्तीसगढ़िया मन जेन सियानी करत हे उकरे चलथे ओमन हमारे लोगन ल भरमाए हवे कि छत्तीसगढ़ी में का रखे हे। अपन बाल बच्चा ल हिंदी अंग्रेजी पढ़ा और देश दुनियां भेज कहके मूल संस्कृति के जुड़ाव ल जर सहित उखानत हे काबर कि भाषा नई रही त संस्कृति तो अपने आप विलुप्त हो जाही। बहुत अकन लोक परब लोक कथा कहनी गीत भजन सब नंदावते जात हे। नवा पीढ़ी मन टीवी रेडियो पेपर में जोन देखथे ओला ही अपना लेथे। संस्कृति विभाग कुछेक लोक कलाकार मन के नाचा गम्मत बाजा रुजी के प्रदर्शन कराथे फेर ओकर आरो पता बने  नई होय। आजकल विभाग के मेहरबानी में ही चंट कलाकार चलत हे।बाकी लोक कलाकार ल काम तकों नई मिलय जबकि एक समें अइसे रहीस कि साल में चार महीना किसानी आठ महीना कलाकारी म निकल जाय। मेला मड़ई जयंती परब छठी बिहाव मरनी हरनी तकों म तरह तरह के लोक कलाकार मन काम अउ मान सम्मान मिलय टीवी सीडी फिलिम सनीमा अब तो मोबाईल बैरी हर सब ल निगल लिस। सार्वजनिक मनोरंजन हर पारिवारिक अब तो मोबाईल हर एकल मनोरंजन के रुप मे लोक तत्व ल पूरा खतम कर डारिस।

छत्तीसगढ़ी ल 2007 मे राजभाषा बनाय के  18 बछर बीत गे फेर कोनो बढ़वार नई हे. पुरा राजभर म 18 ठन आवेदन आदेश घलाव छत्तीसगढ़ी म दिखऊ सुनउ नई हे. लोगन तको लिखें पढ़े बर कनउर मरथे अइसे कइसे अपन मनोदशा ल बनाय राखे हे ओकर गम नई मिलय. जबकि राजभाषा आयोग हर सरलग सभा सुसाटी के करत जनता मन सो गिलौली करत आवत हे. मय अपन सचिव छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के कार्यकाल म कतको घाँव जोजिया डारे हव फेर सब कोजनी का सेती बौरे नहीं न कोनो समस्या बताय. का साहेब मन छत्तीसगढ़ी आवेदन ल स्वीकारे नहीं या उकर ऊपर कार्यवाही नई करय कोनो पच परगट बताय घलो नहीं.तब करन त करन इंहा के भाषा बर बाना बांधे मनखे मन तको कठुवाय रहिथे. भाषा बर रोजी रोटी पाय के आस म 2013 ले छत्तीसगढ़ी म एम ए करे एक हजार बेरोजगार छात्र मन संगठन बना के संघर्षरत जरुर हवे फेर उनकर  बात हर जिहा पहुंचना चाही उहाँ तक पहुँच नई पात हे. काबर अइसे हे एकरो गुनान करे जा सकत हे. 

   शासन प्रशासन के मजबुरी हवे कि छगत्तीसगढ़ी हर आठवी अनुसूची म संघरे नइहे ते पाय के ये भाषा के शिक्षक अनुवादक अधिकारी कर्मचारी आदि बनाय बर विज्ञापन नई निकाल सकत हे. स्कूल मे हिंदी के सहायक भाषा बोली समझ कुछेक पाठ मिंझारे हवे ओला छत्तीसगढ़ी भाषी हिंदी के शिक्षक मन पढ़ा लेवत हे ते पाय के अलग से भर्ती नई होवत हे. ये हर बड़ बिचित्र बात आय.
   असल मे छत्तीसगढ़ हर ब्रिटिश काल मे आजादी के बाद 1950 तक सीपी एंड बरार के हिस्सा रहिस. तब अंग्रेजी / मराठी हर राजभाषा रहिस अउ सरकारी कामकाज उही भाषा के संग हिंदी मे होवत रहिन. काबर कि लॉर्ड माइकले के शिक्षा  नीति के चलते  स्कूल में मराठी के जगा  हिंदी में पढ़ाई लिखाई होईस.  जब 1 नव 1950 मे जब  मध्यप्रदेश के गठन होइस तब देश के मांझोत मे होय ले प्रमुख रुप से हिंदी भाषा राज्य "क "श्रेणी मे संघार दे गिस. घुन मे कीरा कस छत्तीसगढी रमजा गे. काबर कि अंग्रेजी मराठी जैसे भाषा ल कतको बच्छर ले संग रहें ले घलो आत्मसात नई करे रहेन. भलुक रामायन, महाभारत,  आल्हा रहस,  पंथी,सतनाम निर्गुण भजन,कबीर रैदास भजन के चालागन रहिस अउ लोगन ब्रज अवधि भोजपुरी ल छत्तीसगढ़ी कस आत्मसात कर ले रहिस. ये भाषा के कवि  गायक कलाकार मन नाचा गम्मत रहस लीला सत्संग प्रवचन करत जनजीवन म बड़ गहराई ले प्रभावित करे रहिन. ते पाय के यहीं भाषा विभाषा बोली के मिंझारा सरुप हिंदी ला अपना लेन अउ "क" श्रेणी जेकर मातृ भाषा अउ राजभाषा हिंदी  घोषित हो गई. इसमें उप बिहार मप्र संघरे हे ते पाय तछत्तीसगढ़ राज हर "क" श्रेणी मे अपने आप आ गे.अउ इंहा हिंदी भाषी उप बिहार मप्र वाले मन के शासन प्रशासन अउ उदयोग बाईपार मे एकतरफा एकाधिकार होगे. मतलब भाषा हर विकास के प्रमुख कारक बन गे.
   जबकि  छत्तीसगढ़ राज अलग होइस उही समे येला ख श्रेणी मे राखे के जरुरत रहिस.जैसे महाराष्ट्र गुजरात राजस्थान हरियाणा पंजाब आदि हवय.भले ओ समे नई हो पाईस फेर सबो झन ल उमिहा के  छत्तीसगढ़ ल "ख" श्रेणी मे  राखे बर उदिम करना चाही. काबर कि शिक्षा के सवा सौ साल के इतिहास अउ सतत प्रचार प्रसार के बाद भी ग्रामीण क्षेत्र मे हिंदी के व्यवहार चिटको नइहे. छत्तीसगढ़ी अपनाबो  तभेच मराठी गुजराती हरियाणवी /पंजाबी जइसे स्थिति छत्तीसगढी के होही अउ स्वतंत्र विकास के रास्ता खुलही. इंहा के संपर्क भाषा हिंदी रही .
   तीसरा श्रेणी" ग "आय जेन उड़ीसा बंगाल असम सेवन सिस्टर्स राज्य,आंध्रा कर्नाटक  तमिलनाडु केरल जैसे स्वतंत्र भाषाई राज्य हैं. ऊहा अपन अपन राज के भाषा म ही शिक्षा रोजी रोजगार दे जाथे। इहाँ सम्पर्क भाषा अंग्रेजी हवे. 
तेकरे सेती देश ले अंग्रेजी हट नई पात हे न अब ऐसे कोनो शक्ति नाईये कि ये औपनिवेशिक ब्रिटिश सत्ता के भाषा ल खारिज कर सके। काबर कि ज्ञान विज्ञान उद्योग व्यापार न्यायलय के भाषा अंग्रेजी हो चुके हे। 
   तब कम से कम राज्य के अस्मिता अंचल के सांस्कृतिक महक ल बचाएं सेती स्थानीय भाषा में शिक्षा राजकाज जैसे मानविकी समूह के विषय के पढ़ाई लिखाई कर के जतने तो जा सकत हे।
  जय छत्तीसगढ़ जय छत्तीसगढ़ी।

डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
    सेंट जोसेफ टाउन अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़

Monday, September 15, 2025

Panthi Nritya : Sahpidia

https://www.sahapedia.org/panthi-nritya-dance-of-devotion-of-the-satnamis?fbclid=IwdGRzaAM1GjhjbGNrAzUaCWV4dG4DYWVtAjExAAEeJRDaZivubS-nO7AICnZLc3LpGkpzMJ9ILIfiLw-dUr2oIUvJVnCzBldS1NU_aem_Sy3-LCG5xvA9pALl-SjY9Q&sfnsn=wiwspwa#lg=1&slide=0

हिंदी और राष्ट्रप्रेम

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हिंदी और राष्ट्रप्रेम 

जम्बूद्वीप प्राचीन भारत की जनभाषा प्राकृत पालि और मध्यकाल से आयातित अरबी फ़ारसी की युति से 14 वीं सदी में हिंदी भाषा अस्तित्व में आई । इसके साधकों और प्रेमियों ने अपरिमित और अप्रतिम साहित्य रचकर इसे वैश्विक विस्तार दिया। परन्तु दुर्भाग्यवश ब्रिटिश औपनिवेशिक की अंग्रेजी भाषा और उससे रौब दाब से यहां के प्रशासक वर्ग  जिनकी संख्या महज 10% ,भी नहीं हैं के मोह के कारण तकनीकी शिक्षा तो दूर ऑफिस बैंक न्यायालय की भाषा भी आज पर्यंत नहीं बन पाई बल्कि अंग्रेजी के द्वारा ही देश वासियों के ऊपर हमारे ही लोग अंग्रेजों जैसा व्यवहार करते आ रहे हैं।
    आजादी के अमृतकाल में भी देश वासियों को उनकी अपनी मातृ भाषा में शिक्षा और न्याय नहीं मिल पाना कितना दुर्भाग्य हैं।
      लगभग सवा अरब वाली विशालकाय देश का अपना एक राष्ट्रीय भाषा तक नहीं हैं। संपर्क भाषा के रुप में चंद मुट्ठी भर लोगों द्वारा औपनिवेशिक भाषा अंग्रेजी को बनाएं रखना कौन सी देश भक्ति और राष्ट्रप्रेम हैं? 
   धर्म को राष्ट्र प्रेम से जोड़ने वाली बातें तो अक्सर सुनी जाती हैं पर भाषा को राष्ट्रप्रेम से जोड़ने की बातें क्यों सुनाई नहीं देती? 
    हिंदी दिवस पर निरीह जनता जनार्दन को बधाई जिन्हें उन्हें न्याय मांगने और फैसले जानने के लिए उनके हितार्थ कानून को समझने किसी अंग्रेजी दा वकील की सहारा लेने पड़ते हैं। यह देश वासियों का सौभाग्य हैं कि दुर्भाग्य हम जैसे मूढ़ मति को आज तक समझ नहीं आया।
  भले तकनीकी चिकित्सीय शिक्षा के पाठ्यक्रम बनाने और लागू करने में अक्षम हैं परंतु इनके अतिरिक्त न्यायालय और केंद्रीय कार्यालयों में बैंक व्यापारो में जनता की भाषा व्यवहृत नहीं कर पा रहें हैं यह कैसी विडंबना हैं।
सच कहे तो हिंदी विविध मातृभाषाओं की मेल से बनी हुई हैं ।यह भारतीय जनमानस को समन्वय भाव से बांध कर रखने वाली हैं परन्तु औपनिवेशिक अंग्रेजी भाषा और उनके आशिको ने इन्हें दासी बनाने पर तुले हुए हैं।
अंग्रेजी से हिंदी और सभी मातृभाषाओं को खतरा हैं।  यही हालत रहे तो 50 साल बाद अंग्रेजी  सबको निगल लेगी। ग्लोबल विलेज में  युवावर्ग अर्धनग्न हो रॉक _पॉप करते रहेंगे वृद्धाश्रमो में  वर्तमान अंग्रेजी प्रेमी जन सेवाएं गवार  ग्रामीणों से सेवाएं लेते अपने काबिल संतानों से चंद बातें करने तरसते रहेंगे।

     बहरहाल अमृतकाल में देशवासियों को हिंदी दिवस की हार्दिक बधाई। कृतज्ञ राष्ट्र की बिंदी हिंदी बने इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ...

                  जय हिंद जय हिंदी 

चित्र: हिंदी की सुप्रसिद्ध लेखक नैमिशरॉय जी के साथ

डॉ.अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

Saturday, September 13, 2025

सतनाम साहित्य और दलित साहित्य

सतनाम साहित्य और दलित साहित्य 

जहां शोषण हुआ वहां प्रतिरोध हुआ हैं। कहीं मद्धिम तो कही प्रखर ! इनके विचारकों में दैन्य और रौद्र भाव प्रस्फुटित हुई ।दैन्य भाव से ही दलित साहित्य के उद्गम हुआ अपनी जन्म जाति भाग्य को कोसते भगवान से कृपा दया की याचना हुई  । एक तरह से भक्तिकाल के दास्य और दैन्य भाव को ही परिवर्धित कर बृज अवधि मराठी में यह लिखी गई।जबकि  रौद्र भाव ने कल्पित ईश्वर और उनकी व्यवस्था को खारिज कर दिए । इन्हें ज्ञानमार्गी निर्गुण संतो गुरुओं का संबल मिला।इस तरह अलग जीवन पद्धति /संस्कृति विकसित हुई और उससे अलगाव हुआ फिर वहीं द्वेष में बदल गए । जैसे पंजाब , छत्तीसगढ़ में सिख ,सतनाम पंथ और सतनामियों का सतत आंदोलन फिर उनसे निर्मित सतनाम साहित्य। जैसे_ मंदिरवा म का करें जइबोन पितर मनई बइहाय कस लगथे . तोर अंतस भीतरी म बिराजे हे सतनाम इत्यादि।  प्रवर्तनकारी और उदात्य भाव स्वर के कारण सतनाम साहित्य को दलित साहित्य की श्रेणी में नहीं लेते और न ही यह दलित साहित्य के मापदंड पर किसी तरह आते हैं।
   बाहर हाल समानता और मानवता पर केंद्रित छत्तीसगढ़ी भाषा में रचे सतनाम साहित्य पंथी गीतों, साखी, रामत रावटी वृतांत और गुरु घासीदास के उपदेशों सिद्धांत अमृतवाणियों का अनुवाद देश के क्षेत्रीय भाषा के साथ राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय भाषा में हो। इनपर मिली जुली राष्ट्रीय संगोष्ठी परिचर्चाये हो तो जनमानस में आत्मबल स्वाभिमान जागृत होगा और  भय भाग्य भगवान से मुक्ति मिलेगी। यह बदलाव ही सतनाम संस्कृति का अभिष्ट हैं। सक्षम और प्रज्ञावान लोगों को इस दिशा में मिलकर काम करना चाहिए। गुरु घासीदास शोध पीठ जैसे संस्थान बेहतर कार्य कर सकती हैं इसके लिए शासन/ प्रशासन को संज्ञान लेना चाहिए।
     जय सतनाम

डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

Monday, September 1, 2025

महानदी से महाकल्याण

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स्वागतेय पहल : बशर्तें नीयत और नज़रिया सही हो 

महानदी से महाकल्याण 

छत्तीसगढ़ से निकलने वाली सभी छोटी बड़ी नदी नाले महानदी में समाहित हो जाती हैं। राज्य के जल प्रवाह को एकत्र कर  सारंगढ़ जिला मुख्यालय से सटे जिला संबलपुर (उड़ीसा) तक महानदी ले जाती हैं जहां पर "हीराकुंड " एशिया का सबसे बड़ी बांध हैं। इसका उपयोग उड़ीसा करती आ रही हैं। बाढ़ से उलट जल चिल्का झील बनती हुई बंगाल की खाड़ी (सागर)में समा जाती हैं।
     मतलब छत्तीसगढ़ में महानदी केवल गंगरेल बांध, वह भी भिलाई स्टील प्लांट के लिए बनी हैं। केवल रुद्री बराज से धमतरी,रायपुर, बलौदाबाजार मात्र 3जिला जो कि बांध निर्माण के समय एक ही जिला रायपुर  ही था । इसके महज 30 %ही सिंचित होते हैं कम वर्षा हो तो रुद्री बराज के लिए पानी नहीं देते क्योंकि भिलाई के लिए अनिवार्य पानी चाहिए । यहां बिजली भी कोयला से ताप विद्युत केंद्रों में बनाए जाते हैं। मतलब हमारे घरों की छानी से टपका ओरवाती के पानी खेतों, जंगलों से बहती हुई जल हमारा ही नहीं, कैसी विडंबना हैं? 
    छत्तीसगढ़ में , इंद्रावती, शंखनी डंकनी, पैरी, तेल,
सोढूंर, शिवनाथ, अरपा,हाफ , सेत गंगा, आगर, हसदेव, केलो, लीलागर, जोंक , सोन जैसी महानदी की सहायक नदियां और  सैकड़ों उनकी सहायक नाले और झोरकिया हैं।
    हमलोग महानदी तटवर्ती सिरपुर के समीप चिखली जुनवानी के कृषक हैं । जो कि आरंग पलारी ( कसडोल )विधान सभा के मूल निवासी हैं।बरसात में  खरीफ फसल  धान, उड़द तील आदि बाढ़ की डूबान में तबाह हो जाते हैं।  और रबी फसल के लिए जल स्रोत नहीं हैं,सारा भूजल नदी खींच ले जाती हैं। फलस्वरूप पूरा नदी तटवर्ती इलाका भीषण गरीबी और पलायन की पीड़ा झेलते आ रहे है। 3 दशक पूर्व चितावर और नाले की चुहरी यानि झिरिया के पानी पीने विवश थे। जल स्रोत के लिए छोटी नाला में कच्ची बधानी बांध खेती बाड़ी के लिए हमारे पूर्वजों ने उपाय किए । मै स्वयं हमारे गांव जुनवानी के पतालू नाला को पिता श्री के मार्गदर्शन में श्रमदान करते कच्चा बधानी बांधे और निस्तार करते थे। कछार क्षेत्र में झरिया कुआं बनाकर  टेड़ा बाडी (अब सौर पंप लगाकर) अक्टू से फरवरी 5 महीने कठोर परिश्रम कर जीवन निर्वहन करते आ रहे हैं। मतलब नदी हमारे लिए वरदान होते वह  उचित प्रबंधन स्टॉप डेम आदि नहीं होने से अभिशाप टाइप ही रहा।
     अब वर्षा कम होने से बाढ़ की दंश से जरूर बचे लेकिन भूजल नहीं होने से हालात यथावत हैं। नदी तीर रहकर प्यासा हैं। हमलोग हर दस किमी में स्टॉप डेम खासकर सिरपुर जैसे ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी बार अभ्यारण  को छत्तीसगढ़ और उड़ीसा सीमांचल को जोड़ने पुल और रुद्री बराज जैसे ही समोदा डायवर्शन बनवाने प्रस्ताव हेतु जनजागरण चलाते रहे। समकालीन समय में पलारी विधायक  रामलाल भारद्वाज (भवानीपुर )और हमारे शिक्षक पिताश्री सुकालदास भतपहरी (जुनवानीसहपाठी थे) बिसौहा गुरुजी चिखली इत्यादि लोगों ने प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी को समोदा डायवर्शन के लिए सलाह दिए तब  मेरे अनुज सुनील भतपहरी पानी पंचायत कनकी ( खरोरा)सब डिविजन का अध्यक्ष था। इन प्रतिनिधियों ने निवेदन किया कि इससे ट्रांस महानदी क्षेत्र में खुशहाली आएगी पर्यटन बढ़ेगा । सब्जी बाड़ी, डेयरी,मत्स्याखेट जैसे उद्यम बढ़ेगा और लाखों लोगों को रोजी_ रोजगार मिलेगा । परिक्षेत्र में प्रतिवर्ष दीपावली के बाद  पलायन कर जाते हैं वह थमेगा,परन्तु समकालीन सत्ता समोदा में स्टॉप डेम बनाकर  महानदी का पानी निजी पॉवर प्लांट खरोरा को पानी बेच दिया गया। जनता ठगे से रह गए ! समोदा बराज डायवर्शन (निसदा आरंग) से आज पर्यन्त इस दिशा कार्य नहीं हुआ ताकि क्षेत्र के कृषकों को लाभ मिल सकें। बल्कि यहां से नवा रायपुर के लिए पानी जाएगा यह बातें हो रही हैं।
  सच कहे इस अनु जाति वर्गों के लिए सुरक्षित क्षेत्र में ढंग से नेतृत्व नहीं पनप सका या पनपने नहीं दिया गया। आरम्भ से विधानसभा क्षेत्र होने के बाद कोई मंत्री नहीं बन सका। और तो और कोई उद्योग व्यापार भी नहीं स्थापित हो सका। लोक सभा भी सारंगढ़ (वर्तमान जांजगीर) रहा जो जितने उपेक्षित दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्र था उन्हें मिलकर 3_4 जिलों में विस्तारित क्षेत्र को हास्यास्पद टाइप का सीमांकन कर लोकसभा के लिए आरक्षित कर दिया गया ताकि गुरु घासीदास बाबा और वीर नारायण सिंह की जन्मभूमि वाला भूभाग विकास से कोसो दूर रहे। जहां सामाजिक क्रांति और अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध बिगुल फूंका गया आजादी के बाद उन रण बांकुरों के वंशज अकाल और बाढ़ का दंश झेलते पलायन करने बेबश रहे। दुर्भाग्य से आजादी के बाद आज तक लोकसभा का प्रतिनिधि निष्क्रिय और प्रभावहीन रहा या उन्हें ऐसा रहने पार्टी प्रमुखों ने निर्देशित कर रखा हैं कि क्षेत्र के विकास हेतु राष्ट्रीय परिदृश्य कोई स्वर ही नहीं गूंजता। इसलिए आजतक यह परिक्षेत्र उपेक्षित हैं।
            उड़ीसा सरकार नहीं चाहती की महानदी में बराज या स्टॉप डेम बने ।वो महानदी को खासकर छत्तीसगढ़ के आंतरिक जल प्रवाह को निचोड़ ले रहा हैं। यह कैसे संभव  हुआ ? कौन दोषी हैं?छत्तीसगढ़ से समृद्ध  और प्राचीन उड़ीसा राज्य अपने विशाल सागर तट से विशाल जलराशि से आधुनिक तकनीक से बिजली सिंचाई की व्यवस्था कर सकते है । अंतराष्ट्रीय सामुद्रिक व्यवसाय हैं और अरबों की कमाई हैं वे लोग पीने के लिए प्लाट लगा कर समुद्र की जल को नल जल योजना से सुदूर क्षेत्र तक पहुंचा सकते हैं। कृषि में उपयोग कर सकते हैं परन्तु छत्तीसगढ़ के पास महानदी को छोड़कर क्या विकल्प हैं? इनके बिना तो हमारा संसार ही प्यासा और सुनसान वीरान हैं। उस पर पूरा हक जताना और तमाम योजनाओं पर रोक लगवाना क्या उचित हैं? 
   छत्तीसगढ़ शासन_ प्रशासन को चाहिए कि राज्य के लिए वरदान नदी_ नाले के जल प्रवाह को अच्छी तरह प्रयोग करे, यूं ही समुद्र में बहाने न छोड़ दे। सर्वाधिक पलायन नदी क्षेत्र लोग क्यों करते हैं ? इन पर गंभीरता पूर्वक विचार कर उस क्षेत्र के नागरिकों से सलाह मशविरा कर जन कल्याणकारी योजना बनावे। क्योंकि छत्तीसगढ़ का लाईफ लाईन महानदी हैं और महानदी से ही छत्तीसगढ़ का महाकल्याण होना हैं। उड़ीसा का लाईफ लाईन तो महासागर हैं उनका उचित दोहन करें।

जय छत्तीसगढ़ ,जय भारत 

   जय छत्तीसगढ़

डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

Sunday, August 31, 2025

जय गणराजा

#anilbhattcg 

    * जय हो गणराजा *

जय हो गणराजा भरे सभा म आजा 
हर लव बिघन बाधा करव सुख काजा 
जय जय जय हो गणपति गण राजा...

रीत नीत ये दुनियां दारी म चभके हवन  
का करबे हमन निंदा चारी म बुड़े हवन 
दुर्बुद्धि मति ल हरन करके ले जा ...

मंद माखुर के निशा पानी में बुडत हवय देस 
अतलंग जवानी के सेती होवत हवय कलेस 
भटकत मति ल चिटिक सद्बुद्धि दे जा...

करमइता बर काम नहीं,न गुणवंता के दाम 
सिरावत हे सबों अंग, जम्मो बुता अउ काम 
कोंदा बौउला बने बैठे हवे जम्मों जनता गा...

जात पात धरम करम बर सबों झन लड़ कट मरय 
सत बिस्वास दया मया बर इकर जांगर नई चलय 
बोट के राजनीति बढ़ावे ईरखा जात पात गा ...

अंधरा सरकार भैरा  होगे हवय  साहेब  मन 
चोरहा संग मितानी बदे बइठे हवय सबों झन 
कोढीन बेवस्था बदले बर  बरदान दे जा ...

डॉ अनिल भतपहरी / 9617777514

Sunday, July 27, 2025

कविता की सोता फूटती हैं

#anilbhatpahari 

।।कविता की सोता फूटती हैं ।।

कहने से समझ आए 
ऐसी बात ही नहीं 
जो समझ नहीं आए 
उसे कहना ही नहीं 
इस तरह कही -अनकही में
बातें निकल ही जाती हैं
वे कहां आती कहां जाती हैं
यह तो पता नहीं 
पर मन में तो वही बसती हैं 
जो दिल से निकलती
या दिल में  रहती हैं
जैसे मच्छी जल में रहती हैं
पंछी गगन विचरती हैं
फूल पें तितली मंडराती हैं
शरद में शीत झरती हैं
बसंत में मीत के कंठ से 
प्रेम गीत गुंजती  हैं
और बारिस में
नदियों पर नाव चलती हैं 
चकित अनिल के जेहन से  
अनायस कविता की सोता फूटती हैं   

     डाॅ. अनिल भतपहरी / 9617777514

Friday, July 25, 2025

सूरज चंदा नाम जैतखाम

#anilbhattcg 

जोड़ा जैतखाम में से एक  अब तक नहीं ऐसा क्यो ? 

 जय सतनाम 

सतनाम धर्म संस्कृति के प्रवर्तक गुरु घासीदास जी के सामाज सुधार व नव जागरण से प्रेरित हो ब्रिटिश शासन उनके  मंझले पुत्र गुरु बालकदास  जी को  1820 में राजा घोषित कर सोने की मूठ वाली तलवार भेंट किये और भंडारपुरी में में  भव्यतम  मोती महल ,गुरुद्वारा बाड़ा संतद्वारा बनवाकर सतनाम पंथ का सर्वत्र प्रचार -प्रसार करने लगे। महल के ठीक सामने चांद +सुरुज नाम का जोड़ा जैतखाम गड़ाए और धर्म ध्वज पालो चढ़ाकर प्रतिवर्ष भंडारपुरी में दशहरा के दूसरे दिन गुरु दर्शन मेला विजया एकादशी को  "भंडार दशहरा "के नाम से   गुरु दर्शन मेला की शुरुआत 1830 में किये गये । 
     इस पावन अवसर पर मार्गदर्शक  गुरुघासीदास सेत सुमन घोड़ा , प्रबंधक राजा गुरुबालकदास ,पुत्र गुरु साहेबदास  हाथी दुलरवा और संचालकअनुज गुरु आगरदास साहेब  सांवल घोड़ा मे में सवार निकलते। आसपास के अनेक एंव  दल आखाड़ा दलों  का भव्य प्रदर्शन के साथ बाजे- गाजे से शोभायात्रा निकलतेऔर उपस्थित हजारों लोगो को गुरुओ द्वारा धार्मिक उपदेशनाएं थे। यह प्रथा अब भी यथावत चला रहा हैं।
   मोती महल की उपदेशात्मक रुप शिल्पांकन विश्व में एकमात्र और अनुठा है। मंदिर के शिखर पर स्थित चारों कंगुरे पर  तीन बन्दरों एंव एक पर गरजते शेर का शिल्पांकन और सहस्त्र कमल दल के ऊपर स्वर्ण कलश , त्रिशरण का प्रतीक सात ज्योतिर्पुनज और  आकाश में अनिहर्श फहरते हुए  धर्म ध्वज पालो  सतनाम दर्शन की व्याख्या करते एक दृटाष्ट के रुप में चौखंडा महल रहा है । इसे हमलोग बचपन से देखते और उससे प्रेरणा लेते आ रहे हैं।
हालांकि आकाशीय बिजली से उक्त ऐतिहासिक ईमारत क्षतिग्रस्त हुआ और सुन्दरलाल पटवा सरकार के समय इसके जिर्णोद्धार हेतु पुरातत्च विभाग के अधीन किये गये। 
    आगे चलकर पुरी तरह नव निर्माण किया जाएगा ऐसा निर्णय से गुरुद्वारा को ध्वस्त कर नीचे का तलघर बनाया गया और ऊपर एक मंजिल काष्ट शिल्प से युक्त भारवट खंभे के अनुरुप पहला मंजिल बना कर युं ही छोड़ दिये गये हैं‌।  वर्तमान में  तो आधे -अधुरे निर्माण इन 35 वर्षो से जीर्ण -शीर्ण हो चूका हैं। पुरी एक पीढ़ी सतनाम दर्शन एंव दृष्टान्त से युक्त उस भव्य ईमारत के दर्शन से वंचित हैं।
बहरहाल महल जब बने तब बने ( सुनने मे आया है कि‌  छत्तीसगढ़ शासन इसके लिए सत्रह करोड़ राशि स्वीकृत भी कर दिये हैं।) कम से कम वहां स्थापित जोड़ा जैतखाम में सुरुजनाम का अकेला जैतखाम हैं। चांदनाम जैतखाम अबतक स्थापित नही हो सका हैं। प्रतिवर्ष भव्यतम दशहरा मेला लगता पर पालो एक जैतखाम में चढाये जाते है और दूसरा जैतखाम मे पालो‌ को चांदनाम जैतखाम के चबुतरे में खोच दिये जाते हैं। अन्यन्त पीड़ादायक हैं।

ज्ञात हो कि महल का बाह्य और आतंरिक संरचना की पुरी विडियोग्राफी  पुरातत्व  विभाग द्वारा किया गया । संबंधित अधिकारी सेवानिवृत हो गये है और वह कहां किसके पास संरक्षित है अज्ञात हैं। मै जानने का प्रयास किया पर नही पता चला और अब तक सार्वजनिक नही हो सका हैं। ऐसा भी हो सकता है कि रख रखाव या बदलते  टेक्नालांजी के कारण वह खराब हो चुका हो।
शुक्र है एक पुरानी फोटो एम्बेसेटर वाली सोसल मीडिया में है ।और दूसरी मेरे द्वारा 1993 में खिची फोटो हैं।
मंदिर का कलश कंगुरा , और गुरुगद्दी का चरण पादुका  डा  सोनी कृत सतनाम के अनुयाई किताब में संरक्षित हैं।
सोसल मीडिया में न ई पीढ़ी को अवगत कराने इन चित्रों को  सभी वायरल करते आ रहे हैं। अन्यथा वह भी दर्शन करने नही मिलता ।

पोष्ट का उद्देश्य कि एक अदद  चांदनाम जैतखाम‌ के  खाली चबुतरे में  जैतखाम स्थापित हो और धर्म ध्वज पालों चढे। ताकि लाखों- करोड़ो लोगों की आस्था यथावत बनी रहें।  इस ओर सभी का  ध्यान आकृष्ट होनी  चाहिये और सार्थक पहल होनी चाहिये ।आखिर ऐसा क्यो है और किस प्रयोजन के लिए हैं दूसरा चांदनाम जैतखाम स्थापित नही हो पा रहा हैं?  
    कृपया इसे शेयर कीजिए और संबंधितों तक पहुचाएं ताकि सार्थक पहल और हल हो सकें।
      जय सतनाम 
     - डा. अनिल भतपहरी / 9617777514

Thursday, July 24, 2025

सतनाम पंथ न कि आंदोलन

सतनाम पंथ ( धर्म) के अनुयायियों का आंदोलन 

  हमारे बुद्धिजीवियों लेखकों विचारकों के साथ साथ सामाजिक पदाधिकारियों राजनेताओं गुरुओं साधु संतों महंतो द्वारा जाने अनजाने बात चित या संबोधन लेखन आदि में सतनाम पंथ धर्म को सतनाम आंदोलन या Satnam Movement कहे जाते हैं या साधारणतः झोंक या लहज़े में निकल आते हैं इसके कारण थोड़ी असमंजस की स्थिति निर्मित हो जाती हैं। फिर सतनाम पंथ में जातिप्रथा उच्च नीच जैसा भेदभाव जन्य परिस्थिति भी नहीं हैं। और यह एक तरह से सामाजिक क्रांति( social  revolution )के द्वारा प्रतिष्ठित हैं। आंदोलन शब्द संघर्षरत लोगों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हैं फलस्वरुप सतनाम को आंदोलन समझ लिए जाते हैं। जब हक अधिकार  लिए संघर्ष करते जनसमूह जय सतनाम का उदघोष करते नारा लगाते हैं तो एक बारगी बोलचाल में सतनाम आंदोलन कह बैठते और इस तरह सतनाम का व्यापक समावेशी अर्थ संकुचित और संकीर्ण हो जाते हैं।  
   वर्तमान समय में सतनाम आंदोलन शीर्षक लिए हुए कुछेक पुस्तकों के प्रकाशन और उनके प्रतिष्ठित लेखकों के कारण भी। बड़ी तेजी से अपने और गैर भी सतनाम को आंदोलन समझ रहे हैं हमारे लोगों की दृष्टि में व्यापक अर्थ तो हैं जैसा कि उनके मनो मस्तिष्क में बैठा है परन्तु जो गैर हैं वह उसे। स्वतंत्रता आंदोलन, राम जन्म भूमि आंदोलन, चिपको आंदोलन, किसान आंदोलन, मजदूर आंदोलन, रेल रोको आंदोलन जैसे अर्थों में लेने और समझने लगे हैं। इसलिए विनम्र आव्हान और निवेदन हैं महान युगांतरकारी समानता पर आधारित जाति वर्ण विहीन सतनाम  धर्म ( पंथ)को सतनाम आंदोलन नाम से संबोधित करने लिखने समझने की भूल न करें।

गुरु घासीदास ने तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था को देखते हुए  पुरी यात्रा की वहां संगत से प्रेरित वापसी में चंद्रसेनी की बलि प्रथा देख उद्वेलित हुए। गिरौदपुरी घर न आकर सीधे तप साधना हेतु सोनाखान जंगल चले गए। 
और जब  लौटे तो कुछ सिद्धिया/ सिद्धांत लेकर समाज के समक्ष रखें। उसी क्षण  सतनाम पंथ का प्रवर्तन हो गया। उन्होंने कुछेक नियम नीति बनाए और सतत प्रचार प्रसार करते  उपदेश वाणी दृष्टांत कहते जन जागरण किया। यह भी मानव समुदाय के लिए नवीन जीवन पद्धति यानि आध्यात्मिक मार्ग हैं। जैसे बुद्ध का बौद्ध धम्म, कबीर का कबीर पंथ,रैदास का रैदासी पंथ नानक का सिख खालसा पंथ।  ठीक गुरु घासीदास का सतनाम पंथ हैं न कि आंदोलन।
हा बौद्धों, जैनों ,हिंदुओं, ईसाइयों, कबीर पंथियों का आंदोलन हुआ,थमा, दबा और   फिर होगा। ठीक सतनामियो का आंदोलन हुआ थमा या दबा। फिर हुआ,हो रहा हैं । पर पंथ मत मजहब धम्म आदि सदैव रहेगा। वह आंदोलन नहीं हैं। यह दर्शन,पूजा पद्धति और जीवन निर्वाह का तरीका हैं। या कहे धर्म हैं यह कैसे आंदोलन होगा?
   विगत 25 वर्षों से यह कहते आ रहे हैं कि सतनाम पंथ या धर्म हैं। इनके माध्यम से जनजागरण हुआ और हक अधिकार के लिए समय समय पर अनुयायियों ने आंदोलन किए। यह आंदोलन सतनाम नहीं बल्कि सतनामियों का आंदोलन हैं।
इस महीन और सूक्ष्मतम परंतु आधार भूत अन्तर को समझना चाहिए।
एक 80_90 वर्ष का बुजुर्ग के लिए, अपाहिज  बीमार और कातर दुःखी लोगों के लिए सतनाम सुमरन आध्यात्मिक शांति सुख  और आत्मबल के लिए कामना करना हैं।  न कि हक _अधिकार के लिए आंदोलन। 
   इन सभी बातों को गहराई से समझना चाहिए।
सतनामियों का आंदोलन सतनामियों की क्रांति, सतनामियों का संघर्ष हैं। न कि सतनाम आंदोलन क्रांति या संघर्ष।
इस अन्तर को समझिए और लोगों को समझाये।
अन्यथा अच्छा खासा पंथ/धर्म sect & Relegin को आम लोग केवल आंदोलन या क्रांति movement & revalation मान लेंगे।

जय सतनाम

Tuesday, July 15, 2025

चंदन के सुगंध

चंदन के सुगंध बगरइया चंदन गुरुजी के गीत कविता के महमइ

जइसन नाव तइसन गुन के धनी गाँव गवई  में गुजर बसर करत लोक जीवन के सुघरई अउ महमइ सकेलत गोकुल प्रसाद बंजारे "चंदन "  गुरुजी हर बड़ गुणवंता शिक्षक आय। तेकरे सेती उन ल हमर देश के राष्ट्रपति जी से सम्मान मिले हवय । ये तरा से उन मन समाज अउ के राज के रतन आय।  उनकर रचना हर  संदेश परक श्लोगन सरीख हवे _

लाज सरम ल छोड़ अपन ।
मन के कुंठा ल तोड़ अपन ।।

कहत जनचेतना के संचार करथय। सरल सहज संत सुभाव  वाले गुरुजी हर लोक चितेर कवि अउ गीतकार घलो आय। ओमन साहित्यिक सांस्कृतिक आयोजन में सरलग आवत जावत रहिथे।ते पाय के बदलत जमाना अउ फैशन के हिहाव उकर शब्द चित्र ल थोरकिन देखव- 

निकले हवय जींस पैंट पहिन 
चप्पल अउ पनही
हमर खेती खार काम म
ओ कइसन बनही 

कहत  ओमन प्रकृति अउ प्रवृति के ऊपर  पोठलगहा सवाल उचाथे.

प्रकृति के बात आइस तब उकर 
सुघराई गाँव खेत_ खार  हर जगा बगरे हे कवि देख मोकाय बानी लिखथे- 

लाली गुलाली परसा फुलगे
दुल्हिन संग म करसा खुलगे
अउ आघु 
आमा मउरे कहर महर महके 
कोन हर  कति डहर लहके 


कहत मनसे, जीव जन्तु  के ऊपर परत प्रभाव ल लिखथे.

 ओमन अपन अन्तः करण म उमड़त भाव ल आखर म भर के गीत कविता के पाग म बांध के लोगन के आगु मयारुक  ढंग से सस्वर सुने म बड़ मीठ बिहतरा लाडू  खाय कस मन अघा जथे.अइसन सुग्घर  उनकर छत्तीसगढ़ी  रचना संसार हवे-

राजभाषा बनगे बोली छत्तीसगढ़ी  जी 
इही  म होही  सरकारी लिखा पढ़ी जी 
हमर पुरखा मन के सपना होगे सकार ग
गाँव गली खोर बगरही  मया पीरित  दुलार ग 
चलव बिना डरे झिझके दरबार चढ़ी जी  

    उनकर करु -कसा भाव तको मंदरस कस मीठ हवे. काबर कि गुरु बाबा कहें हे -"मंदरस के सुवाद ल जान डरे त सब ल जान डरे " 
गुरु बाबा के परम् भक्त चंदन जी हर गुरु भाव अउ असीस उत्तराधिकारी हवय तेन पाय के उकर काव्य म सबोझन बर मंगलकामना करत उदगरित होय हवे -

कभु लबारी झन मार बेटा न चुगरी न चारी.
सुख-दुःख म तय हासत रहिबे 
जइसे सुरुज चंदा उजियारी.

शिक्षा अउ साक्षरता संबंधी कतकोन रचना हवे फेर बंजारे चंदन गुरुजी के भाव सबले अलगेच हवे - 
मोर कहु हो जातिस बहिनी आखर संग मितानी.
मुड़ ऊचा के महूँ रेंगतेंव गुनतेंव आनी बानी 

शिक्षा पाए ले कइसे समझ आथे अउ उनकर परभाव कतेक होथे एकर सुग्घर वर्णन हवे.
उनकर गीत कविता हर शिल्प विधान के दृष्टि ले भले कमती हो सकत हे काबर कि उन आखर- मतरा के गुना -भाग मे उलझें नइहे भलुक उकर जाला -बंधना ल हवा कस झकोरत अउ भाव जगत ल नदिया कस धार फिजोवत  ममहावत बोहथे - 

सुख म हो खर्चा त बने दिन पहाथे
नंदिया म ख़ुशी के ग जिनगी ह नहाथे 
सब आजेच उड़ाहु तब काली कइसे आही.
आफत अउ बिपत ले भला कोन बचाही.
जइसे सरल-सुगम फेर प्रभावी डाड़ हर सुरता राखे के लाइक हे.
गाँव खेती बारी तीज त्यौहार धरम  करम मेला मड़ई  शिक्षा, साक्षरता, स्वास्थ्य ग्रामीण प्रशासन जइसे विषय के ऊपर उकर लेखन अउ शब्द चयन मन बड़ सेहरौनिक हवे. सच मे ओकर रचना संसार मे जाय ले,  कवि संग साघरों करें ले चंदन के पावन महमही जनाथे.ते पाय के उनमन मोरे महसूस करें भाव ल लेके अपन कविता गीत संग्रह के नाव चंदन के सुगंध नाव धरे बर झटकुन सहमत होगिन.
   ऐ रचना बर चंदन गुरुजी ल बधाई देवत आस करत हवन कि येला छत्तीसगढ़ी संसार मे एक मन आगर सुवागत करें जाही.अउ पाठक शिक्षक शोधार्थी मन बर उपयोगी होही.

जय जोहार, जय छत्तीसगढ़

प्रो. डॉ.अनिल कुमार भतपहरी ( 9617777514)
प्राध्यापक हिंदी 
उच्च शिक्षा विभाग, छत्तीसगढ़ शासन

Wednesday, July 9, 2025

बलि प्रथा

सम्राट अशोक के बौद्ध अपनाते ही भारत वर्ष सहित उनके आधिपत्य क्षेत्रों के प्रजाओ का धर्म भी बौद्ध धर्म हो गया।  फलस्वरुप उन सभी जगहों पर बौद्ध स्थापत्य के अवशेष विद्यमान है।
   सम्राट अशोक के नाती वृहदत्त की हत्या कर पुष्प मित्र शुंग ने बौद्ध शासन का तख्ता पलट कर  मनुस्मृति लागू किया और उन्हीं के अनुरुप असमानता युक्त वर्ण व्यवस्था जाति प्रथा कठोरता से लागू हुआ। अनेक पुराण शास्त्र रचे गए।  शंकराचार्य आए और मठ मंदिर बने इस तरह  भारत अस्तित्वमान हुआ। भेदभाव जन्य और देशी रियासतों की परस्पर प्रतिद्वंदिता ने विदेशी आक्रांताओं खासकर मुगल पठान आकर सत्तासीन हुए फिर अंग्रेजों की बारी आई। इस हजारों साल की दसता भुगतने विवश हुए। इसके प्रमुख कारण अमानवीय वर्ण/ जाति व्यवस्था ही है। विदेशी शासको के दरबार में ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य प्रभावशाली पदों पर रहे और इस कुप्रथा को यथावत कायम रखें।  जबकि प्राचीन बौद्धों को चौथे वर्ण शूद्र घोषित कर उनके साथ अमानवीय व्यवहार किए गए। इन पर मुस्लिम शासकों और मुगलो ने हस्तक्षेप नहीं किया लेकिन आधुनिक शिक्षा और वेतन भोगी अंग्रेज अधिकारियों ने अनेक आदिम बर्बर प्रथाओ को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसलिए भी अंग्रेजों की हस्तक्षेप से बचने कुछेक राजघराने उच्च वर्गीय लोगो ने विद्रोह किया। कालांतर में  आम जनमानस  शूद्रों के जुड़ने के बाद हिन्दू धर्म का कांसेप्ट लाया गया । हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग कांग्रेस की अगुवाई से वह स्वतंत्रता आंदोलन में बदल गया। अंततः आजादी मिली पर धर्म के कारण दो देश बने परन्तु मानव समुदाय में भेदभाव आज पर्यंत खत्म नहीं हुआ बल्कि वोट बैंक के रुप में लामबंद हो गए।
  बौद्ध धर्म के अनुयाई चौथे वर्ण के शूद्र घोषित कर दिए और उनकी 6हजार जाति उपजाति बनाकर जाति भास्कर रचकर तीन वर्ण के लोग देश की संप्रभुता पर एकाधिकार कर लिए। यह रोचक दास्तान है और उसे जानने समझने के लिए हर जाति वंश लोक में चलने वाली प्रथाएं हैं।
लोक पर्व हैं। आपने जो बलि प्रथा का जिक्र किया वह सामाजिकता और उस समय की सामूहिकता को व्यक्त करते हैं न कि गैर बराबरी बर्बर व्यवस्था को ।
यह महात्मा बुद्ध की मानवता और समानता पर आधारित धम्म का ही प्रभाव है न कि वेद शास्त्र पुराण आधारित वर्ण जाति व्यवस्था। इनका जमींदोज हो जाना ही बेहतर हैं। तभी राष्ट्र समृद्ध और अक्षुण्ण बना रहेगा।

 वैदिक सभ्यता की यज्ञ बलि प्रथा से युक्त थे गोमेघ यज्ञ, अश्व मेघ यज्ञ नरमेघ यज्ञ इत्यादि थे।
इसलिए "वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति" कहकर बलि प्रथा को महिमा मंडित किए गए। राजा से लेकर पुरोहित तक बलि के मांस खाते और मदिरा पान कर उन्मत्त रहते थे। इसलिए भी यज्ञों का प्रतिरोध होने लगा था।
सभी समाज में बलि प्रथा रहा हैं। संतो गुरुओं के कारण बलि प्रथा बंद हुई।

Thursday, July 3, 2025

सेक्युलर यानि धर्म पंथ संप्रदाय निरपेक्ष

#anilbhattcg 

समसामयिक 

सेक्युलर यानि धर्म/ पंथ/संप्रदाय निरपेक्ष 

शासन और प्रशासन किसी भी धर्म,पंथ, संप्रदाय को बढ़ावा नहीं देगा और न ही उनके आधार पर चलेगा । बल्कि संविधान सम्मत चलेगा। संविधान देश के नागरिकों के लिए उपयोगी या अनुपयोगी हैं  के ऊपर संसद में परिचर्चा के उपरांत बहुमत के आधार पर लोक कल्याणार्थ संशोधनीय होगा।
   मनुष्य और समाज का मौलिक अधिकार है कि वह अपनी पसंद या विरासत से धर्म पंथ संप्रदाय चयन कर सकता हैं। परन्तु शासन /प्रशासन का नहीं। यह सामान्य सा अर्थ हैं। 
  धर्म निरपेक्ष या सेक्युलर का यह अर्थ कदापि नहीं कि वह धर्म पंथ संप्रदाय आदि का विरोधी होगा बल्कि वह उनसे निर्लिप्त/ तटस्थ होगा और किसी एक को बढ़ावा नहीं देगा और न किसी दूसरे का प्रतिरोध करेगा। विशाल जनसंख्या,बहु धर्मी/विविधता पूर्ण जीवन शैली वाली इस उपमहाद्वीय महादेश में  निरपेक्ष का आशय तटस्थ भाव हैं। शासन_ प्रशासन धार्मिक मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। व्यक्ति और समुदाय स्वतंत्र हैं उन्हें धार्मिक आज़ादी मिली हुई हैं। 
    पार्टियां शासन _प्रशासन नहीं हैं ,उनकी अपनी धर्म /पंथ /संप्रदाय हो सकते हैं । परन्तु यदि वह सत्तारूढ़ हुई तो कतई सत्ता किसी धर्म पंथ संप्रदाय को बढ़ावा नहीं देगा। बल्कि संविधान के अनुरुप ही अपनी कार्ययोजना बनाकर जनता के कल्याणार्थ काम करेगी। 
     जय संविधान _जय भारत

Monday, June 23, 2025

जात पात

कुछ समय से नहीं बल्कि जब से मनुष्य को वर्ण जाति  गोत्र आदि में बाटी गई और उन्हें शास्त्र सम्मत घोषित किए गए तब से कहते आ रहें हैं।  सर्वाधिक पढ़े सुने जाने वाले मानस में स्पष्ट लिखा है _

जे वर्णाधम तेली कुम्हारा,स्वपच किरात कोल कलवारा ।
ये जातियां चारों वर्ण से भी अधम हैं यानि अंतिम वर्ण शूद्र से भी नीचे। फिर भी यही समुदाय इसे भजन बनाकर नाच गा रहे हैं उन्हें न अर्थ की समझ न भाव की। ऊपर से अपनी गाढ़ी कमाई दान दक्षिणा चढ़ावे में लूटा रहे हैं 

इस तरह के अनेक उदाहरण ऋचा श्लोक दोहा चौपाई के रुप में कई ग्रंथों में उपलब्ध हैं।फिर भी इन्हीं उत्पीड़ित जातियों को वह अत्यंत प्रिय हैं।  यही तबका सर आंखों में बिठाए हुए हैं।
         हिंदू धर्म में जन्मना जातपात और उनमें अमानवीय उच्च नीच भेदभाव के जनक उनके कथित शास्त्र और धर्मग्रंथ हैं। उसे ही आदर्श बनाकर ढोते आ रहें है। 
यदि देश में समानता और समरसता चाहिए तो इन में लिखी गई आपत्तिजन्य अग्राह्य चीजों को विलोपित करें या प्रतिबंधित। जब संविधान संशोधित हो सकते हैं तब तत्कालीन परिस्थिति को देखते लिखी गई पुस्तकें क्यों नहीं?आखिर किसी भी मानव समुदाय को कोई दूसरा मानव समुदाय केवल उनकी जाति के आधार पर सार्वजनिक रुप से भेदभाव करें और इसके केन्द्र में ऐसे पुस्तक जो धर्मग्रंथ के रुप में जाने समझे जाते हो।  उनका परित्याग आवश्यक हैं। इनके लिए जनांदोलन और व्यापक मांग बहुसंख्यक शूद्र वर्ण के लोगों को करना चाहिए जिसमें 6000से अधिक जातियां हैं और उन्हें गाहे बगाहे उनकी हैसियत बताएं जाते हैं। आखिर चंद लोगों में ऐसा करने का दुस्साहस आते कहा से हैं? आप जैसे विचारक कथाकारों को तो गंभीरतापूर्वक सोचना चाहिए। बल्कि काल्पनिक और मिथकीय चीजों में समय नष्ट करने के बजाय अपनी वॉक कला और प्रभाव को सामाजिक क्रांति में लगानी चाहिए।
मानव मानव एक समान जात पात का मिटे निशान मिशन में काम करना चाहिए। भेदभाव को बढ़ावा देने वाली शक्ति और तत्वों से संघर्ष करना चाहिए।

Friday, June 13, 2025

जाति न पूछो

#anilbhattcg 

सद्गुरु कबीर जयंती पर 

"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।" 

भारतीय समाज वर्ण जाति व्यवस्था से युक्त हैं ।भले यहां साधु यानि सज्जन, ज्ञानी,सिद्ध लोगों की जाति नहीं पूछने की कबीर साहब की नसीहत हैं। परंतु बिना जाति पूछे दो अनजान लोगो के बीच न जान पहचान  होते न ही लोकाचार!  शादी ब्याह और जीवन निर्वाह तक भी नहीं होते। लेकिन इसी जातिप्रथा और वर्ण व्यवस्था के कारण सदियों से दमन शोषण भी जारी हैं। 
   आजादी के 75 वर्ष बीत जाने और प्रभावी संविधान के बाद भी जाति से उत्पीड़ित वर्ग के हितार्थ उन्हें लाभान्वित करने जाति जनगणना हो रहे हैं इससे अपेक्षित बदलाव की संभावना हैं। नि:संदेह साधु से ज्ञान ही पूछिए पर मतदाता और हितग्राहियों से जाति पूछना ही पड़ेगा तभी तो उनके ऊपर न्याय कर पाएंगे क्योंकि अब तक जाति न पूछने के कारण कोई दूसरा उसका लाभ लेते आ रहे हैं। 

तो भैये कबीर साहब से बिना क्षमा याचना किए कि उनकी बातें शत प्रतिशत सत्य हैं ,हम ज्ञानियों से जाति नहीं पूछेंगे बल्कि  जाति विहीन समुदाय की ओर अग्रसर हैं। लेकिन जो जाति के नाम पर छल प्रपंच करके किसी के हक अधिकार को छीन रहे हैं।  कोई जाति के दर्प में तो कोई शर्म से जीते आ रहे हैं। जन्मना जाति गत उच्च नीच की खाई बनी हुई है। भेदभाव परिव्यप्त हैं ऐसे में समानता लाने कुछ दशकों तक प्रयोग करके नवाचार करे और जाति जनगणना कर ले कोई हर्ज नहीं। देर आए दूरस्थ आए टाइप इस कार्य का स्वागत होना चाहिए।
  सद्गुरु कबीर जयंती की हार्दिक बधाई।
            सत कबीर,सतनाम

Sunday, June 8, 2025

डॉ अनिल भतपहरी सचिव राजभाषा आयोग

डॉ अनिल कुमार भतपहरी सहायक संचालक उच्च शिक्षा विभाग छत्तीसगढ़ शासन को  सचिव,छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग  के पद पर  संस्कृति विभाग में तीन वर्षों की प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ किया गया था।
इन तीन वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने कोरोना काल में लगभग हाशिए पर चले आयोग को पुनर्स्थापित किया। हालांकि इस दौरान राजभाषा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की मनोनयन नहीं हुआ। परन्तु वे राज्य के साहित्यकारों कलाकारों प्राध्यापको ,के साथ और मंत्री जनप्रतिनिधि एवं विभाग के अधिकारी से समन्वय बनाकर जो भाषाई और साहित्यिक क्षेत्र में कार्य किया वह महत्वपूर्ण और रेखांकित करने योग्य हैं।

खासतौर पर आयोग का कार्य को प्रमुखता से तीन भागों में विभाजित कर एक्शन प्लान बनाया और उसे जिला समन्वयकों की उपस्थिति में चरणबद्ध तरीके से  शेड्यूल के अनुसार संस्कृति मंत्री  और संचालक के संज्ञान  में  कार्यालय स्थापना दिवस 14 अगस्त 2022 अनुमोदित करवाकर प्रकाशन प्रशिक्षण और आयोजन का त्रिस्तरीय कार्यक्रम का पूरा ढांचा तैयार किया गया।

1आयोजन: 

 फिर तत्क्षण सुदूर जशपुर से बीजापुर और रायगढ़ से डोंगरगढ़ तक राज्य के सुदूर सीमावर्ती क्षेत्र से लेकर मध्य भाग में खासकर  जशपुर, रायगढ़, बीजापुर, अंबिकापुर बालोद, महासमुंद, जगदलपुर जिला संभाग स्तरीय  साहित्यकार सम्मेलन कराया। गया जिसमें संबंधित जिला/संभाग के अधिकतर साहित्यकारों ने स्वस्फूर्त भाग लिया और उनमें नवीन उत्साह का संचार हुआ। विशिष्ट कार्य किए हुए वरिष्ठ साहित्यकारों को आयोजन में सम्मान करवाकर उन्हे विशिष्ट महत्ता प्रदान किए।

A त्रिदिवसीय राज्यस्तरीय सम्मेलन 
जनजातीय भाषा एवं साहित्य के विविध आयाम शहीद स्मारक भवन रायपुर 2021

B त्रिदिवसीय लोक साहित्य समारोह साइंस कॉलेज रायपुर 20 22

C सातवें प्रांतीय सम्मेलन होटल इंटरनेशनल बेबीलोन रायपुर 2023
   
उक्त तीनो राजकीय सम्मेलन में 1500 साहित्यकारों की गरिमामय उपस्थिति रही हैं। यह तीनो कार्यक्रम अत्यंत सफल और लोकप्रिय रहा। इनके स्मारिका भी प्रकाशित किए गए है।

2प्रकाशन:

   छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास और संवर्धन हेतु उन्होंने राज्य के लगभग 100 से अधिक साहित्यकारों की पुस्तक को संवाद से प्रकाशित करवाकर और उन्हें राज्य के जिला ग्रन्थालय और महाविद्यालय में निःशुल्क भेजकर एक कीर्तिमान स्थापित किया। इस तरह छत्तीसगढ़ी पुस्तक राज्य के प्रायः सभी जिला ग्रंथालयों में उपलब्ध हुआ। इसके साथ ही उन्होंने। राजभाषा आयोग के गतिविधि और राज्य के सभी बोली भाषा को प्रश्रय देने हेतु त्रैमासिक " सुरहुत्ती" नामक संग्रहणीय पत्रिका आरम्भ हुई जो आगे चलकर शोध कार्य के लिए महत्वपूर्ण होगी।

3प्रशिक्षण:
आयोग के उक्त दो महत्वपूर्ण कार्यों के अतिरिक्त छत्तीसगढ़ी को राजकाज में व्यवहृत करने हेतु जिला मुख्यालय के अधिकारी कर्मचारी एवं महानदी भवन मंत्रालय एवं संचालनालय  इंद्रावती भवन में चरण बद्ध तरीके से प्रतिवर्ष प्रशिक्षित किया गया। जिसके अधिकारी कर्मचारी की उपस्थिती एवं उत्साह महत्वपूर्ण रहा। राजनांदगांव , बेमेतरा, बालोद, कोंडागांव, मानपुर मोहला। कांकेर जैसे जिला में अधिकारी कर्मचारी को प्रशिक्षित किया गया।

4   सम्मान: 
राज्य स्तरीय मुख्यमंत्री सम्मान छत्तीसगढ़ी भाषा के साथ अन्य राजकीय भाषा बोली सदरी लरिया कुड़ुख हलबी भतरी गोंडी आदि विकास और साहित्य सृजन हेतु महत्वपूर्ण साहित्यकारों को मान मुख्यमंत्री के हाथों उनके निवास पर सम्मानित किए गए।
राजकीय रामायण समारोह में छत्तीसगढ़ी और राज्य के अन्य भाषा बोली में लिखे गए रामकथा के महाकवियों और साहित्यकारों का राजकीय सम्मान आयोग के सौजन्य से संस्कृति विभाग द्वारा किया गया।

5मानक शब्दकोश एवं व्याकरण निर्माण समिति का गठन 

राज्य के विभिन्न लब्ध प्रतिष्ठित 12 सदस्यीय भाषा विंदो और साहित्यकारों की समिति बनाई गई और 13 13 अक्षरों को बताकर वृहत्तर शब्दकोश निर्माण कराए जा रहे है। प्रथम चरण पूर्ण हो चुका है और पांडुलिपि प्राप्त हो गई है जिसका टाइपिंग भी आरम्भ हो चुका है। 
जब मानक शब्दकोश और वृहत्तर व्याकरण बन जाएगा तब नियमानुसार आठवीं अनुसूची में छत्तीसगढ़ी को शामिल करने की दावा भाषा निदेशालय में प्रस्तुत किया जा सकेगा। इन सबके लिए पहली बार गंभीरतापूर्वक कार्य किया गया। और उसके अपेक्षित परिणाम आने लगा भी था।छत्तीसगढ़ी पहले से अधिक शहरी और शैक्षिक संस्थानों और कार्यालयों में व्यवहृत होने लगें हैं। 


इस तरह तीन वर्षों के कार्यकाल उपलब्धि से भरा रहा।

Saturday, June 7, 2025

सत्यदर्शन

रविवारीय चिंतन  

    ।।सत्यदर्शन ।।
        
   प्राण तत्व को आत्मा और उसे परमात्मा का अंश तथा वे  जहाँ से वह आते हैं उसे परलोक स्वर्ग जन्नत हैवन आदि कहे गये हैं। इस हिसाब से जहां आत्मा की बात हुई कि वह आत्मवादी दर्शन में यानि कि ईश्वरवाद के अन्तर्गत हो जाते हैं।
       अनात्मवाद में आत्मा जैसी किसी चीज पर यकीन नहीं करते और वे अनीश्वरवाद में आते हैं।
मनुष्य या प्राणियों में जीवन होते हैं। ये जीव या प्राण हैं ,इसे ही आत्मवादी आत्मा कहकर तमाम मायाजाल फैलाए हुए है। इसी में प्राय: लोग उलझे हुए है जबकि वह ऐसा है नही, यह सब कल्पना मात्र है । यह प्राण या जीव  संयोग से उत्पन्न व क्षय होते हैं। इनका अस्तित्व देह से है ,इनसे परे इनका कोई अस्तित्व नहीं  है। 
      धर्म, मत ,पंथ, दर्शन मान्यताएँ प्राणियों अर्थात् जीव धारी देह के लिए हैं  खासकर मानव  प्रजाति के लिए  ।जिनके मन और मस्तिष्क होते हैं  जो सोचते विचारते है न कि‌ निर्जीव या विदेह के लिए ( इसमें पशु पक्षी को भी रखे जा सकते हैं बावजूद उनमें किंचित मात्र गुण धर्म होते हैं)। न ही जीव या प्राण के लिए, क्योंकि यह तो एक तरह से  ऊर्जा या  अदृश्य यौगिक तत्व है। जो अदृश्य अकर्ता व निरपेक्ष या तटस्थ पदार्थ की तरह है। पर इसी के नाम पर अनेक तरह के भ्रम फैला हुआ। व्यक्ति कितने भ्रमित है देह की जतन चिंता छोड़ प्राण जीव या कथित आत्मा और उनके स्वामी परमात्मा की सिद्धि  के क्या क्या उद्यम नहीं करते और   संग साथ रहने वाले देहधारियों से वैमनष्य पालता हैं। वर्चस्व के युद्ध लड़ता हैं मार-काट हिंसा फैलाते हैं। धर्म के लिए अधर्म करते हैं। सच कहे तो धर्म मत पंथ रिलिजन आदि अपनी अपनी प्रणालियों और पद्धतियों के लिए वचनबद्ध होते हैं। फलस्वरुप किसी दूसरी प्रणाली पद्धति के प्रखर विरोधी और द्वेषी हो जाते हैं।
   और सब होता है ईश्वर के नाम पर जिनका कही वजूद है भी या नहीं आज तक अज्ञेय है । इसलिए बुद्ध से लेकर गुरुघासीदास  जैसे प्रज्ञावान महापुरुषो ने उस कल्पित ईश्वर आत्मा परमात्मा उनके लोक परलोक  आदि के लिए भक्ति, उपासना, पूजा- कर्मकांड में फसे उलझे लोगों को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के प्रति यहाँ तक पशु -पक्षी, वृक्ष आदि जीवधारियों के प्रति  प्रेम, परोपकार सद्भाव, सौहार्द जैसे सद्गुणों के व्यवहार करने की अप्रतिम सीख दी हैं। दोनो का दर्शन वास्तविक और सत्य है इसलिए इनके दर्शन को सत्य दर्शन या सच्चनाम / सतनाम दर्शन कहे जाते हैं।
    बुद्ध को उनके अनुयाई  सचलोचन या सच्चनाम  कहते हैं जबकि गुरुघासीदास को "सतनाम सद्गुरु" कहते हैं। 
    
                 

                                          -डाॅ. अनिल भतपहरी

Thursday, May 15, 2025

शास्त्रीय संगीत छत्तीसगढ़ी महक

#anilbhattcg 

।।शास्त्रीय संगीत में छत्तीसगढ़ी सुरभि।।

    छत्तीसगढ लोक संगीत  में समृद्ध हैं पर शास्त्रीय संगीत  प्रायः नगण्य है,हैं भी तो छत्तीसगढ़ी पन से कोसों दूर हैं।यह एक विडंबना ही हैं कि भारतवर्ष  या कहें एशिया महाद्वीप में इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़  छत्तीसगढ में प्रथम हैं। परंतु शास्त्रीय गायन, वादन, नृत्यादि में छत्तीसगढ बंदिश, गीत, वाद्ययंत्र और वेश भूषा आदि का कोई प्रचलन नहीं  और न ही छत्तीसगढ़ी से कोई रिश्ता नाता है । गांव, कस्बा शहरों में लोक कलाकारो की अगणित संख्या होने और रायगढ़ घराना होने के बावजूद भी लोक में शास्त्रीय संगीत लोकप्रिय नहीं हो सका हैं। इस दिशा में कोई गंभीरतापूर्वक  प्रयास  भी आजतक नहीं हों सका ना ही कलाकर, जनप्रतिनिधि, इच्छुक हैं फलस्वरूप शासन प्रशासन का ध्यान भी आकृष्ट नही हो सका हैं।
      जहा जहा घराने हैं उनकी शैली में उस राज्य की भाषा,वेशभूषा लोक संगीत भी उनमें घुलामिला हैं।
बनारस, किरना, जयपुर, ग्वालियर, कर्नाटक, रविन्द्र संगीत , वाद्य मे घटम, नाद स्वरम , सारंगी आदि नृत्य में कत्थक, ओडीसी, भरतनाट्यम, कुचीपुड़ी, मोहिनीअट्टम आदि के वेशभूषा में उस राज्य की पहनावे ही उन्हें विशिष्ट बनाई है।तो छत्तीसगढ मे गायन में छत्तीसगढ़ी गीत बंदिश ख्याल ठुमरी क्यों नहीं? कत्थक की रायगढ़ घराने में छत्तीसगढ़ी वस्त्राभूषण क्यों नहीं और कुछेक लोक वाद्य को सहायक वाद्य के रुप में सम्मिलित कर छत्तीसगढ की शास्त्रीय संगीत को छत्तीसगढ़ी सुरभि से सुवासित क्यों नहीं किया जा सकता? 
     हालाकि कमलादेवी महाविद्यालय में डा अरुणसेन डा अनीता सेन स्वरचित छत्तीसगढ़ी  गीतों को अध्ययन के समय हम विद्यार्थियों के साथ रागों के साथ गाते भी थे। दुर्गा महा मे हमारे गुरुदेव गुणवंत व्यास ने गुरतुर गाले राग द्वारा चुनिंदे रचनाकारों की छत्तीसगढ़ी  रचनाओं को विविध रागों में आबद्ध कराए। वर्तमान में कृष्ण कुमार पाटिल जी गायन कर रहें हैं। पर यह चंद  शौकिया शुरुआत मात्र हैं इसे प्रोत्साहित करने की नितांत आवश्यकता हैं। अब छत्तीसगढ़ी जनता भी शिक्षित और शिष्ट रुचि के होने लगें हैं और क्लासिक संगीत हिंदी में सुनने के लिए बेताब भी रहते हैं तो क्या उन्हे उनकी अपनी मातृ भाषा छत्तीसगढ़ी और वेषभूषा वातावरण में उपलब्ध करा सकते हैं,उन्हें कब तक वंचित रखें ?

   इन्हीं प्रश्नों और मुद्दों पर पद्मश्री डॉ ममता चंद्राकर कुलपति इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़, पूर्णश्री राउत सुप्रसिद्ध ओडीसी नृत्यांगना, एवम् डेविड निराला लोक संगीत शिक्षक के साथ गंभीरतापूर्क सफल खुशनुमा उत्साहित चर्चा हुई कि ऐसा किया जा सकता हैं।

Sunday, May 11, 2025

नसीहत

#anilbhattcg 

नसीहत 

धर्म मज़हब जाति पर 
कत्लेआम मानवता का 
दंभ के प्रमाद पाले हुए 
कृत्य  दानवता का 
भड़कते धार्मिक भावना
उकसाते रहे सदा 
कट्टरपंथियों की सत्ता मोह का 
यह कैसी विकट दुर्दशा 
होम करते जलाए हाथ
ये अपढ़_ कुपढ लोग 
उस्तरा बंदरों के हाथ में 
खून से लथपथ लोग 
क्या पता इनकी ढिठाई 
से कुछ बड़ा हो जाते 
रखें हुए दोनों के 
अणु बम खड़ा हो जाते  
    *       *       *
कायरों की कायराना हरकत 
पहलगाम की चोटिल चोट 
पता हैं उनकी फितरत 
फिर मच गई अनायास होड़ 
करते हवाले हमारे 
उन आतंकी को 
यूं शत्रु नहीं मानते किसी 
आम पाकी को 
पर ऐसी कुछ बात नहीं 
एक दूसरे पर विश्वास नहीं 
साबित करने अपने को 
असली मर्द का बच्चा 
छीनते एक दूसरे की 
अस्मत का कच्छा 
सदा बाली सुग्रीव सा द्वंद्व 
इनके जड़ में वहीं धर्म तत्व 
*             *                    *
समझ कर बिगडै़ल बच्चा 
नाराज़ हो गए बड़े अब्बा 
कान उमेठ कर दोनों के 
कर दिए गोल डब्बा 
करो सेवा पीड़ित मानवता की 
सक्षम राष्ट्र गढ़ों 
यूं ही धर्म मज़हब के नाम
व्यर्थ न लड़ कट मरो 
जन न हो तो निर्जन स्थान 
कोई राष्ट्र नहीं 
जन सेवा ही राष्ट्र सेवा है 
इनसे बढ़कर कोई धर्म नहीं
भले समझो उसे तुम 
नीरा मांस की मंडी 
पर वहीं से बुझी आग 
लपटें हुई ठंडी

Wednesday, May 7, 2025

रक्त सिंदूर

मित्रों सुनिए हमरी छकड़ी 

रक्त सिंदूर 

भारत मां की चरणों में चढ़ाकर के सिंदूर 
संकल्प लिए है शत्रु को करने  चकनाचूर
करने चकनाचुर दुश्मन को  हमने ठाना है 
एक के बदले में सौ मुंड  काट कर  लाना है 
निभाते रहे दस्तुर और चले प्रेम भरी वचनों में‌
परअब रक्त सिंदूर चढेगा भारत मां की चरणों में‌

बिंदास कहे  डा.अनिल भतपहरी / 7-5-2024

Wednesday, April 30, 2025

सामयिक विमर्श

#anilbhattcg 

         ।।सामयिक  विमर्श  ।।

निजीकरण और ठेका प्रणाली से  देश की अकूत संपदा को राजतंत्र की तरह लूटा जा रहा हैं। पहले राजा -प्रजा था अब मालिक -नौकर. ऐसा लगता है कि इन नये नवेलों मालिकों के इशारे पर तीनों पालिकाएं‌  चल रही हैं।  
   दूर -दूर तक इनके उन्मूलन का कोई सोच नही ।उल्टा सार्वजनिक उपक्रमों में बड़े पदो पर बैठे उच्च वर्गीय लोग कमीशन खोरी कर बीमारु उद्योग बना रहे है !फिर बहाना- बाजी कर उसे निजीकरण कर दिये जा रहे हैं।‌यह खेल विगत दो तीन दशकों से जारी है ।इसलिए भी सकल जनसंख्या की बमुश्किल  20% आबादी नियमित आय वर्ग मे आज तक सम्मलित नही हैं। कोई  भूखे से न  मर जाय  इसलिए  मुफ्त राशन बाटने की योजनाए चला रहे हैं। जो कि अव्यवहारिक हैं। क्या ऐसे ही आत्मनिर्भर भारत बनेगा ? आय का स्तर में जमीन आसमान का अंतर आ चुका है जो इस महादेश के लिए उचित नही हैं।
  निम्न मध्यम वर्ग के युवाओं की बेरोजगारी और  ऊपर से खाली दिमाग शैतान घर टाईप  इनकी  फौज खड़ी हो गई ।उसे कह रहे है  "रोजगार मत मांगो , बल्कि  रोजगार  दो।"पर किसे दे ,क्या दे यही उसे पता नही। स्वरोजगार के महकमे और बाजार में चंद लोगों की कब्जा है वहां आसानी से प्रवेश नही है । इन्ही लोगो की हाथ में देश की  आर्थिक तंत्र है । 
     फलस्वरुप दिशाहीन युवा वर्ग और बेरोजगारों को धार्मिक रैली शोभायात्रा पर लगा दिये गये हैं‌। कथावाचकों की बाढ़ सी आ गई है ।  जहां -तहां देखो भोग -भंडारा ब्लेक मनी का वारा न्यारा। भीड़ का नेतृत्व कर आयोजक लोक नेतृत्व की ओर आ रहे हैं।  

  एक समय महाविद्यालय की छात्रसंघ नेतृत्व की नर्सरी थे अब कथा आयोजन , व्रत त्योहार शोभायात्रा जुलुस आदि के  आयोजन नर्सरी  में बदल गये हैं।जहां से छुटभैये नेता आ  रहे हैं। और वही लोग एक -दूसरे के आयोजन को सही- गलत ठहराकर गला -काट प्रतिस्पर्धा कराते आम जनता को आस्था -श्रद्धा के नाम पर लामबंद कराते वोट बैंक भी बना रहे हैं। जिससे देश मे रह रहे अनेक धर्म  मत मजहब पंथ रिलिजन के लोग परस्पर द्वेषी होते जा रहे हैं।यह राष्ट्र ‌के लिए घातक हैं। 

  सबसे बुरी बात तो नव धनाड्यो द्वारा शहरों में कालोनी कल्चर है जहां अपने अपने समुदाय , खान -पान की स्तर देख प्लाट और फ्लेट्स बेचे जा रहे हैं ।जो आदिम बर्बर जाति वाद का ही नव वर्जन हैं। इस सब पर प्रभावी नियंत्रण आवश्यक है।
                जब किसी एक धर्म की बातें ज्यादा की जाएगी किसी जाति को अधिक महत्व व बढावा मिलेगा तो स्वभाविक है दूसरे धर्म जाति के लोगों में वैमष्यता आकर ही रहेगी ।पशु पंछी , कीट पतंगों को छेड़ते है तो वे प्रतिकार करते है तब किसी मनुष्य को छेड़ेगें को बवाल छिड़ेगा ही। धीरे धीरे देश के अनेक भागों से वर्ग संघर्ष साम्प्रदायिक तनाव की आये दिन खबरें बेचैन करने वाली हैं । 
        ऊपर से  मासुम सैलानियों  के ऊपर  धर्म आदि पूछ कर कायराना आतंकी हमला और उनका कनेक्शन सीमा पार से होना बहुत ही निन्दनीय है। इसका तो मुंह तोड़ जवाब हमारी सेना देगी .परन्तु  ऐसे गमगीन महौल में देशवासियों के मध्य ही साम्प्रदायिक तनाव का फैलना और एक -दूसरे को शक- सुबहा से देखना ! उसके लिए मिडिया जगत के माध्यम से प्रायोजित महौल बनाना क्या सही है? ऐसे मे कैसे  मिडिया को चतुर्थ स्तंभ कहां जाय भला ?