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संदर्भ : राज्य की पच्चीसवीं वर्षगांठ पर
राज्य में बदलते फिज़ा और उनका दूरगामी परिणाम
25 वर्ष के युवा में अनेक बदलाव आते हैं और उनके मन के न हो तो वह आक्रोशित ,उद्वेलित और आक्रामक तक हो जाते हैं। ऐसा होना ही तो युवा होना हैं। स्वाभाविक युवा है ,तो जोश रहेगा ही। इसलिए हमारे योजनाकारों को चाहिए कि युवा छत्तीसगढ़ में हो रहे नव निर्माण को देख, यहाँ की युवावर्ग में बढ़ रहे उत्साह और जोश को रचनात्मक कार्य की ओर मोड़ कर उनमें सकारात्मक ऊर्जा का संचार करें। परोसे थाली देखकर भूख बढ़ना ही हैं ।यदि इस बीच कोई थाली छीन ले तो वर्ग संघर्ष होना भी लाज़िमी हैं। वर्तमान छत्तीसगढ़ में प्रायः यही हो रहे हैं। निर्माण एजेंसियों, रेत घाटों,खदानों से लेकर उद्योग जगत में बाहरी हस्तक्षेप सर्वाधिक हैं। ऐसी अवस्था में स्थानीय लोगों के लिए अपेक्षित रोजी- रोजगार की व्यवस्था शासन -प्रशासन को करना चाहिए।
वैसे भी छत्तीसगढ़िया बेहद उदार और धैर्यवान
हैं। महत्वकांक्षा से मुक्त संत भाव को गृहित कर सादगी पूर्ण जीवन निर्वाह करते हैं। खेतों में अपनी संपूर्ण पूंजी लगाकर 6 माह तक अच्छी फसल की प्रतीक्षा करते कर्ज़ में डूबकर भी अनेक प्रायोजित वाणिज्यिक तीज त्यौहार मनाकर पर प्रांतिक मूल के सेठ महाजन व्यापारी के तिजौरी भी भरते रहते हैं।
स्थानीय लोगों की यह भलमनसाहत हैं कि बाहरी लोगों को आश्रय देकर उनके नेतृत्व को भी स्वीकारा हैं।
परन्तु दुर्भाग्य से उनकी इस संतत्व वृत्ति का मखौल उड़ाते उन्हें जोजोवा, भोकवा समझते हैं। यहां की लोक मान्यताओं धर्म ,भाषा कला ,रीति -नीति ,संस्कृति को अपेक्षित महत्व और मान सम्मान नहीं करते।
इसके साथ यहां प्रायोजित ढंग से सांप्रदायिक उन्माद फैलाएं जा रहे यह बेहद चिंतनीय हैं।
भाषाई दृष्टि से राज्य गठन हो जाने के बाद भी यहां की भाषा और संस्कृति की उपेक्षा चिंतनीय हैं। फलस्वरूप जनमानस में आक्रोश फैलते जा रहे हैं और बड़ी तेजी से छत्तीसगढ़िया उद्वेलित हो रहे हैं। शासन- प्रशासन को चाहिए कि संत भूमि छत्तीसगढ़ की समरस और सौहार्द्र भाव को कायम करने सार्थक पहल करें।
डॉ अनिल भतपहरी/ 9617777514
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