आरक्षण से हुनर वाले और उत्कृष्ट लोग ही जा रहे हैं। इसलिए तो हर तरफ क्वॉलिटी बढ़ रहे हैं। पूरा देश ग्रोथिंग में हैं।
आरक्षण के पूर्व तो ऐसा नहीं था।
भाग्य और भगवान भरोसे रहने वाले लोगो को, विरासत से सुविधाभोगियो को जब कमेरा वर्ग देश सम्हाल रहे हैं तकलीफ हो रहे हैं।
द्रोणाचार्य संस्कृति के संवाहक लोगों का स्कूल कॉलेज में मेरिट कैसे बनते हैं सबको पता हैं।
एक देश एक एजुकेशन क्यों नही।
जबकि एक देश एक इलेक्शन अव्यवहारिक हैं (क्योंकि इस महादेश की भौगोलिक और प्राकृतिक परिस्थितया भिन्न भिन्न हैं।
गर्मी में चुनाव होगा राजस्थान की लू मतदान कैसे होगा और ठंडी में चुनाव हो तो हिमाचल जम्मू कश्मीर उत्तराखंड के बर्फबारी में कैसे मतदान होगा? इसी तरह वर्षाकाल में केरल और चेरापूंजी छत्तीसगढ़ बस्तर के नदी नाले के उफान और मूसलाधार बारिश में कैसे सम्पन्न होगा? ) फिर भी इसके लिए कानून पास कराए जा रहे हैं।
सच तो यह हैं देश में एक समान पाठ्यक्रम हो।
(सारे प्राइवेट स्कूल जो पब्लिक नाम देकर चंद लोगों के लिए चला रहे हैं वह बंद हों।)
जिसमें मंत्रियों अफसरों और रिक्शा चालक मजदूर के बच्चे समान विषय पढ़े इसके लिए संसद मौन हैं।
पूरे देश में समान शिक्षा हो और उनका माध्यम राज्यों की राजभाषाओं में हो।
देश भर में परिचर्चा हो और कड़े कदम उठाए जाएं। जिसमें कितनी प्रतिभा हैं सब सामने आ जाएंगे।
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