Saturday, September 28, 2024

धर्म

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धर्म 

धृ धातु से व्युत्पन्न धर्म का अर्थ मर्म यानि चित्त या मन में धारण करना । क्या धारण करना,गुण या अवगुण?
गुण धारण करना और उसे व्यवहार में लाना ही धर्म हैं।
इसे बताने समझने वाले ही प्रवर्तक या धर्मगुरु हैं।
   धर्म गुरु या प्रवर्तक अपने समकालीनों को बताते हैं इसलिए उन बातों और तथ्यों को अपना ईजाद न कह किसी अज्ञेय सत्ता/शक्ति से प्रायोजित कह सर्व स्वीकार्य के योग्य बनाते हैं। कलांतर में अनुयाई उसे सर्वोत्कृष्ट और सर्वोत्तम घोषित कर पूजा पाठ इबादत सुमरन प्रार्थना में संलिप्त हो अनेक रम्य स्थलों पर भव्यतम प्रतिष्ठान बना लेते हैं, अकूत संपदा एकत्र हो जाते हैं। फिर अलग अलग मतों पंथों मे होड़ संघर्ष होना शुरु हो जाते हैं। देश दुनियां में जो सत्ता संघर्ष हैं उनपर इन्ही मतों का सर्वाधिक प्रभाव हैं।
   
बहरहाल मानव एक प्रजाति हैं और उनमें भी अन्य प्रजातियों की तरह नर मादा होते हैं,यदा कदा उभय लिंगी किन्नर भी मिलते हैं। ऐसा पशु _पक्षी,जीव _जंतु के प्रजाति में भी हो सकते हैं।
       धर्म स्वभाव या गुण हैं जिसे मानव सहित सभी प्रजाति अपने मर्म मे धारण कर व्यवहार करते हैं। कोई हिंसक कोई अहिंसक कोई विषैले पर मानव प्रजाति सभी प्रजातियों में विरले और अनेक गुणों,इल्मों को सतत साधते /अनुसंधान करते विशिष्ट उपलब्धियां को हासिल करते आ रहें हैं।
    इसी तरह अधर्म अवगुण हैं इसे भी वे मर्म मे धारण किए होते हैं और इसी के अनुरुप जीवन निर्वाह करते कुख्यात भी हो जाते हैं।
पर जिसे आजकल धर्म की संज्ञा दी गईं हैं असल में वह धर्म नहीं बल्कि प्रणालियां या पद्धतियां हैं।जैसे हिंदू मुस्लिम ,सिख ,ईसाई ,जैन, बौद्ध ,सतनाम पंथ कबीरपंथ राधास्वामी , आदि मत मजहब पंथ धम्म संप्रदाय सेक्ट रिलीजन हैं।जिन्हे व्यक्ति विरासत या अपने विवेक से अपनाता हैं और उनके नियम से जीवन निर्वाह करते हैं।
   इसके मतलब वह धार्मिक हो ऐसा नहीं। वे मतावलंबी, अनुयाई,मजहबी सिखी जैनी बौधिष्ट बस होते हैं। वे तीर्थयात्री कर्मकांडी अनेक प्रतिक रंग वस्त्र माला तिलक कंठी जनेऊ मुद्रा धारी हो सकते हैं जिससे उनका पहचान हो। इन सब से वह धार्मिक हो यह ज़रूरी नहीं। अधिकतर अपराधी भी इन सबको धारण कर कानून से बचते हैं या अपनी स्वार्थ सिद्ध करते हैं।

  दरअसल धार्मिक होना मतलब सत्यनिष्ट, दयालु,
परोपकारी, मानवतावादी होना हैं ,वर्ग जाति से ऊपर उठकर नैतिक होना हैं।
     सवाल यह है कि ऐसा कितने हैं जिसे हम धार्मिक कह सकें?

      - डॉ. अनिल भतपहरी/ 9617777514

Friday, September 13, 2024

स्नान

।।स्नान।।

    महानदी और उनकी सहायक पतालू नाला के तट पर सिरपुर कालीन प्राचीन ग्राम जुनवानी गिधपुरी बसा हुआ हैं। वहा एक जातिय नहीं बल्कि एक गोत्रीय भट्टप्रहरी परिवार निवास करते हैं । बड़े बुजुर्गों का कथन हैं कि राजदरबार सिरपुर के शस्त्रधारी संरक्षक हमारे पुरखे हैं । आज भी विशिष्ट अवसर मे खास तरह की अनुष्ठान होते हैं जिसमें अन्य गोत्र और महिला बेटी ही क्यों ना हों सम्मलित होना वर्जित हैं।अब तो बेटियाउज बस जाने से अनेक गोत्रिय और एक हजार से अधिक आबादी के गांव  के रुप में परिणीत हों गए हैं। अठ्ठारहवी सदी मे पूर्वज गुरु घासीदास और सतनाम पंथ से प्रभावित हों सतनामी हो गए।  पुरखों का पांच गांव जुनवानी, बरछा, गोटीडीह, उजीतपुर, महानदी जोकनदी के मध्य कोई गांव आबाद हैं। बड़े बुजुर्ग पांव छूते ही असीस देते हैं पांच गांव के गौटिया हो। 
       इसी ऐतिहासिक गांव  के शिक्षक पिता सतलोकी सुकालदास भतपहरी  माता केराबाई के घर  मेरा जन्म 17 जुलाई 1969 को जगदीशपुर अस्पताल महासमुंद में रथयात्रा के दिन हुआ। महानदी मे बाढ़ के कारण प्रथम पुत्र को नाव नही चढ़ाने की मान्यता के चलते रायपुर व्याहा खरोरा भंडारपुरी होते ग्राम जुनवानी आना हुआ। पर नाव चढ़कर या नदिया तैरकर ही आवागमन होते रहें,जीवन चलता रहा।

   इस तरह नदी नाले तालाब स्नान का लहर या चस्का ऐसा लगा कि भारत के तीनो ओर का समुद्र नाप लिए । गंगरेल, माडम सिल्ली, कोडार, गजगिधनी,खरखरा, क्षीरसागर,खुटाघाट, बंगो यहां तक बोधघाट नर्मदा, भाखड़ा नांगल का नहर, बरगी, इलाहाबाद संगम, बनारस, हरिद्वार, मे गंगा स्नान कर आए। नदियों तालाबों की निर्मल जलराशि को देख स्नान और तैरने  की साध बचपन से हैं। गांव के पतालू नाला सोझ्झी घाट, बांधनी घाट,पुलघाट चूहरी और  ऊपर घाट, पत्थर खदान में तैरकर की बड़े हुए। बुंदेली और कोसरंगी तो तालाबों का गांव था जहां प्राथमिक और हाई स्कूल की पढ़ाई हुईं। वहां प्रायः हर रविवार तारिया पार करने की बाज़ी लगता और उसमें कई बार जीतते आया। 

बहरहाल जब  उच्च शिक्षा लेने रायपुर आया और 1987- 88 शा आयुर्वेदिक कालेज कालोनी  के I type 7 में रहते दुर्गा महाविद्यालय में अध्ययनरत था। तब हमारे वहा के रिश्तेदार कर्मचारी को मकान खाली करने कहा तो एकाएक निर्माणाधीन गुरुघासीदास छात्रावास आमापरा मे बीना बिजली पानी वाश रूम सुविधा के कक्ष क्र 7 मे शिफ्ट हो गए। चौकीदार का लड़का पानी भर देते और टीपी कनेक्शन से एक लाइट और टेबल फैन सिन्नी का चलाने का पल्ग / वायर खरीदकर देर रात्रि तक लगा लिए। और रस्नान आदि के किए विवेकानंद आश्रम के पीछे गली के सुलभ मे मंथली बंधा लिए। पूनम होटल बाद मे आश्रम के वृन्दावन रेस्त्रां से  मासिक भोजन 250 मे बंधवा लिए।
पर हमलोगो को जो महानदी तटवर्ती गांव के थे नदी तालाब में जी भर तैरकर नहाने वाले तो सुलभ मे नहाना नहाना नहीं था बस पानी को तेल की तरह चुपरना मात्र था। इसलिए आसपास आमापारा तालाब , बुढातालाब, खो खो तालाब और रिंग रोड के पास का तालाब जो प्राय साफ रहते वहा तक सायकल से नहाने का कार्यक्रम बनता। इसी अनुक्रम मे सुशील यदु, रामप्रसाद कोसरिया,बद्री प्रसाद यदु परमानंद, डा सीताराम साहू  , सुखदास बंजारे, जैसे तालाब स्नान प्रेमी कवियों गीतकारों के जमात से जा मिला,जो कि मेरे लिए सोने पे सोहगा हुआ।इनकी संगति का लाभ मिला ,छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति से जुड़ा और रायपुर की साहित्यिक प्रतिभावों जिसमें प्रमुखतः आचार्य सरयूकांत झा, हरि ठाकुर केयूर ,भूषण मन्नूलाल यदु, अमरनाथ त्यागी, हमारे प्रो बालचंद कच्छवाहा, डा विभुकुमार खरे, डा हरिशंकर शुक्ल, डा रामदास शर्मा, मेरा शोध निर्देशक डा देवकुमार जैन, बेधड़क रायपुरी, बलिराम पांडे, निकुम जी चेतन भारती, डा सुखदेव साहू जागेश्वर प्रसाद, रामेश्वर शर्मा जी जैसे वरिष्ठ जनों का सानिध्य मिला एवम् सुशील वर्मा, चंद्रशेखर, मयंक, नृपेंद्र शशांक खरे,गिरीश पंकज, राजेश  गनोदवाले, आनन्द निषाद ,  उमाशंकर , आलोक सातपुते जैसे समवयो का प्रेमल साख्य व्यवहार इन सबसे कही न कहीं आयोजनों में मिलते ही रहते हैं।
 तब इन 35 वर्ष पूर्व तब रायपुर के तालाब नहाने योग्य था। शहर छोटा होने और अयोजन मे अपनत्व भाव होने से बिन नेवताए भी जाते तब कोई आयोजको और सहभागियो मे कोई दुराव या अनचिन्हार भाव ही नही था बल्कि सदैव अपनत्व भाव रहता 

    दुर्गा महाविद्यालय के साहित्यिक प्राध्यापको का स्नेह तो मिलता ही ठेठ छत्तीसगढ़ी चेतना के रचनाकारों के साथ भी उठक बैठक होने लगे। तालाबों में घुम घुम कर नहाना अब भी नहीं छूटा हैं।
   कालेज में शिक्षक बन जाने के बाद प्रथम नियुक्ति शास महाविद्यालय पेंड्रारोड के आसपास नर्मदा सोन मलनिया अरपा झरना भैरोसांग लक्ष्मण धारा हों या अमरकंटक जो रिश्तेदार परिचीत जाते तो इनके दर्शन और स्नान जरुर करते। फिर पलारी महाविद्यालय में 16 वर्ष कार्यक्रम अधिकारी के रुप में महाविद्यालयीन रासेयो के कुछेक छात्रों के साथ बड़े ग्रामों के बड़े तालाबों बाल समुंद आल्हाबंद पेंड्रावन छुइहा टैंक आदि में तैरना और उन्हें पछाड़ने का क्रम चल ही रहा था। इसी बीच संचालनालय और प्रतिनियुक्ति सेवा के चलते 2019 से कॉलेज छूट गया पर तालाबों में तैरकर नहाने का शौक़ नहीं। अब भी तीज त्योहार खासकर दीपावली मे गांव जाते हैं तो  बाल बच्चे सहित महानदी मे ही स्नान होते हैं। बच्चे अपना नदी अपना घाट समझ प्रफुल्लित होते हैं। बैट बाल लेकर मज़े भी करते हैं 5 भाई बहन के भरे पुरे परिवार में 11 बच्चे हैं। मां प्राय: कहती रहती हैं मोर केरा के एक दर्जन पर... 1 का आना शेष हैं।
  बहरहाल रायपुर में क्रेडा गार्डन तालाब, सेंध तालाब और किसी किसी रविवार अपने सहपाठी इंजी मित्र शिव जी के साथ May fair lake तो कही सिरपुर महानदी मे बहते पानी से स्नान की चाह अब तक छूटा नहीं हैं।
           अभी अभी हमलोग सुदूर बस्तरांचल रम्य वन प्रांतर मे निर्झरणी स्नान हेतु जाने को सहमत हुए हैं। फिर सावन माह मे जानबूझकर वर्षास्नान होते हैं और प्राकृतिक जलाभिषेक से शिवोहम की अवस्था से होकर गुजरते हैं।
    हमें पता हैं कि एक न एक दिन पूर्वजों के जगह महानदी के जुनवानी सिरपुर घाट में जाना ही हैं तो जब तक सांस हैं नलजल मे नहाना होते ही हैं! समय निकाल स्नान और ध्यान जरुर कर लेते हैं ताकि पुरखा कहें और असीस दे- "बने असनान्द  धी धियान अउ तउर तार के आय हवस।"

    डा. अनिल भतपहरी/9617777514

Wednesday, September 11, 2024

शास्त्रीय संगीत में छत्तीसगढ़ी का समावेश हों

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शास्त्रीय संगीत में छत्तीसगढ़ी का समावेश हो 

चक्रधर महोत्सव की धूम मची हुई हैं और देश भर से ख्यातिनाम कलाकारों की प्रस्तुति हो रही हैं।
परंतु शास्त्रीय प्रस्तुतियों में छत्तीसगढ़ झलक नहीं रहें हैं ।    रायगढ़ घराने की कत्थक या एशिया की प्रथम संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ की नृत्यादि प्रस्तुतियों में छत्तीसगढ़ी वस्त्राभूषण और गायकी में बोल बंदिश ख्याल ठुमरी आदि का समावेश  होना चाहिए ।
    यहां के घराने और विश्वविद्यालय की प्रस्तुतियों में छत्तीसगढ़ी संस्कृति की झलक परिलक्षित हों ताकि कला जगत यहां की लालित्य और सौंदर्य से परिचित हो सके। जैसा कि अन्य राज्यों की भाषाएं और वस्त्राभूषण वहां की शास्त्रीय प्रस्तुतियों में समाहित होते हैं।
 लोक कलाएं समृद्ध होकर सुगम और शास्त्रीय स्वरुप ग्रहण करती हैं जबकि यहां की कलाएं उन्नत तो हैं, पर ऐसा कब होगा ? 

               _डॉ. अनिल भतपहरी / 9617777514

Saturday, September 7, 2024

समृद्ध भारत

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 समृद्ध भारत 

दो अक्षर क्या पढ़े 
गांव उजाड़ने लगे 
35 साल नौकरी के लिए 
जन्मों की नाता तोड़ने लगे 
कुछ चलाकियां सीखें 
अपने को ज्ञानी समझ लिए 
जो भोले भाले रहें 
उन्हें मूर्ख अज्ञानी समझ लिए 
पाकर अवसर आपने 
चढ़े ऊंचाई पर 
जिन्हें मिला नहीं अवसर 
तंज उनकी सचाई पर 
इस तरह आपने ही 
दीवार खड़ी की 
ऊंच नीच जाति पाती की 
मीनार खड़ी की 
मिलकर हम सबको 
इसे ढहाने होंगे 
विषमता से भरी समाज में 
समता लाने होंगे 
जो पिछड़ा रहा 
पिछड़ते ही गए 
ऊंच नीच भेदभाव की 
खाईयां बढ़ते ही गए 
गांव ही शहर बना 
सुविधाओं से 
करने होंगे विकट उद्यम 
हटाने विकास के बाधाओ से 
तभी गांव रहेगा आबाद 
खुशहाल शहर 
संतुलित विकास का
दिखेंगे सर्वत्र असर
वर्ग जाति विहीन 
समाज का निर्माण 
 से ही होगा समृद्ध 
विकसित भारत का निर्माण

_ डॉ. अनिल भतपहरी/ 9617777514

Saturday, August 31, 2024

छूद्र जीवन विश्वासी हैं?

वाट्सअप फेसबुक सोसल मीडिया 
 माना कि आभासी हैं।
पर क्या रिश्तों नातों से भरा 
यह  छूद्र जीवन विश्वासी हैं ?

कोई मन का मीत मिले
ज्ञानी गुरु सच्चा साथी मिले 
भटकते रहें ताउम्र अकेले 
पर कोई न हमराही मिले 

आना जग में अकेला और 
जाना जग से अकेला हैं 
सच कहें तो यह जग जीवन
 चार दिनों का ही मेला हैं 

तब क्यों न मगन बिताओ 
वक्त आभासी दुनियाँ में 
हर तरफ मृगमरीचिका हैं 
सम्हल कर रहना दुनियां में 

दोखा हम खाते नहीं बल्कि देते हैं 
समझने के लिए कितने ही गेटे हैं 
फिर भी आज तक मनुष्य नहीं चेते है 
बेफिक्र मौज कर रहा पर सच कब्र में लेटे हैं

Friday, August 16, 2024

जागृत सतनाम धर्म सुषुप्त क्यों?

वीरेंद्र ढीढ़ी एवम् डॉ. अनिल भतपहरी के संयुक्त विचार/ परिचर्चा 
     ।।जागृत और सुषुप्त सतनाम धर्म की दशा।।

(8/15, 11:00 PM) +91 94252 01225: जागता हुआ सतनाम धर्म।
         संगठित होता हुआ सामाजिक संगठन। 
         संगठन में शामिल होता हुआ व्यक्ति ।
         और अंगड़ाई लेता हुआ नवयुवक।
         सिर्फ मेरा व्याख्या है । विचारणीय आप सब सभी प्रबुद्ध जनों के लिए है, उपरोक्त चार बातें आज सतनामी समाज के लिए ज्वलंत है जिस पर विचार करना आवश्यक है।
        सतनाम और उनका धर्म , प्रकृति की तरह काल के बंधन से मुक्त, साफ ,स्वक्छ, निर्मल , पवित्र , अहिंसक ,सम्यक और अनंत है। हम सतनाम धर्म को अपने अपने ढंग से व्याख्या कर कर के सीमित दायरा में बांधने का काम किया है। सतनाम धर्म को इतना सीमित कर दिया गया की मनुष्य अपने मन के विचार और इतिहास को भुला दिया है और अब हम हिन्दू धर्म के अनुयाई हो गए है क्योंकि उस तथाकथित हिंदूवादी परंपरा को मानने के कारण सतनाम धर्म की व्याख्या भूल चुके है और लगभग सभी सतनामी हिन्दू लिखने लगे। हमे हिंदू धर्म के अनुयाई के रूप में सरकारी रिकार्ड में जरूर गिनते है परंतु वास्तव में हमे हिन्दू नही मानते थे  क्योंकि सतनामी पारा और हिन्दू पारा का स्पष्ट विभाजन गांव और शहर में दिखाता था और अब भी मानते है। कई बार मैने अपने लेख में लिखा हूं की सतनामी को नाई नही मिला हमारे लोग नाई बन गए , हमे हमारे संस्कार के प्रयोजन हेतु पंडित नही मिला , हमारे लोग पंडित बन गए। हम उन तमाम समस्याओं का सामना किए है जो हमारे तथाकथित हिन्दू भाइयों ने हमे सामाजिक प्रताड़ना दिया है और आज हम एक जागता हुआ सतनाम धर्म की ओर बढ़ रहे है। यह एक पक्ष है जो बीत गया और बीत रहा है , हमने दूसरा पक्ष का अवलोकन नही किया है ।
         सतनाम धर्म आज बढ़ रहा है । इसको जानने के पहले हमे हमारी मान्यता और संस्कार पर विचार करेंगे तभी तो हमे पता चलेगा कि हम सतनाम धर्म के तरफ क्यों आकर्षित हुए है और किस प्रचलित विचार और धर्म का हम पर प्रभाव पड़ा है जिससे सतनाम धर्म आज हमारे मन मस्तिष्क पर प्रभाव डाला है और हम आज उसे स्थापित करने का प्रण ले रहे है। चलो विचार करे।
           बाबा गुरु घासीदास जी का जन्म 18 दिसम्बर 1756 को हुआ। तब छत्तीसगढ़ में सतनाम धर्म या पंथ का नामोनिशान नहीं था क्योंकि हम मानते है की सतनाम पंथ या धर्म गुरु बाबा घासीदास जी का देन है। जैसे की थोड़ा बहुत ऐतिहासिक लेख कहता है की  बाबा गुरु घासीदास 6 माह के विलुप्त होने या तपस्या करने के बाद लोगो के बीच आए तब उसमे एक अद्भुत आभा चमक रहा था जो की प्रकाशित अर्थात जो होश पूर्वक जागा  हुआ व्यक्ति पर ही दिखाता है। बाबा जी लोगो के बीच आकर लोगो को शिक्षा दिए जिसमे मुख्य रूप से मूर्ति पूजा का विरोध करना था ,समानता की पाठ पढ़ाया , अंध भक्ति के प्रति लोगो को जागरूक किए । लोग उनके इस विचारधारा से जुड़ते गए जो सतनाम पंथ बाद में सतनाम धर्म के नाम से जाना गया और उनके अनुयायियों को सतनामी कहा जाने लगा। इसी विचार धारा को उनके सुपुत्र बाबा बालक दास जी ने संगठनात्मक रूप देकर भंडारी और छडीदार के रूप में आगे बढ़ाया जो की आज भी विद्यमान है। इस पर मैं ज्यादा विवेचना नही करूंगा क्योंकि भंडारी और छडीदार के व्याख्या पूर्व के लेख में कर चुका हूं।
          बाबा गुरु घासीदास जी , बालकदास जी और अमरदास जी की सतनाम धर्म 20 वी सदी के आते आते तक लगभग हिंदूवादी परम्परा में विलीन हो चुका था। कुछ मान्यता के लिए बाकी था तो वह घर में निशाना था अर्थात छोटा जैतखाम ,चौका आरती कबीर दास जी के पूजन पद्धति पर आधारित था और साधु अखाड़ा संगीत कार्यक्रम होता था जो आत्मा और परमात्मा , जन्म मरण 84 लाख योनि पर जीवन की जन्म लेने की बाते करते थे। यह प्रक्रिया चलता रहा। 
       दिनांक 18 दिसंबर 1938 को मंत्री नकुल ढीढी जी के द्वारा अपने गृह ग्राम भोरिंग में जयंती मानने और जयंती के प्रचार होने के बाद  सतनाम पंथ या धर्म अपने चरमोत्कर्ष की ओर बढ़ने लगा। इस सतनाम विचार के उन्नयन में कोई भी गुरु और स्थापित सतनामी नेता का हाथ नहीं है , केवल मंत्री नकुल ढीढी जी का संघर्ष का परिणाम है की आज सतनाम का मार्ग फल फूल रहा है।
         गुरु बाबा जी की जयंती का मानने का परिणाम यह हुआ कि सामाजिक संगठन बनाकर समाज संगठित होने है। संगठन में समाज के व्यक्ति शामिल हो कर  समाज के विकास के लिए नए नए आयाम खोज रहे है। नवयुवक गण अपना शौर्य का प्रदर्शन कर रहे है।
          इन सबके बावजूद समाज को शिक्षा के प्रति जागरूक होकर उच्च से उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहिए क्योंकि जो समाज जितना शिक्षित होगा उनका शोषण न ही धर्म के लोग करेंगे न ही समाज के तथाकथित गणमान्य लोग करेंगे न ही शासन और प्रशासन के लोग करेंगे । यही मंत्री दादा नकुल ढीढी जी का अंतिम संदेश है  अतः इस संदेश के साथ  दिनांक 16 अगस्त 2024 को उनके पुण्यतिथि पर मंत्री नकुल ढीढी जी को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। 

       आपका बीरेंद्र ढीढी भोरिंग और रायपुर।

 Dr. Anil Bhatpahari: सुंदर विचार भैय्या जी 

      कोई नया धर्म तब जन स्वीकार्य होता हैं जब आडंबर विहीन, सरल सहज हृदयंगम हों। सतनाम पंथ आरंभ में ऐसा ही था फलस्वरूप अनेक जातियों के लोग खींचे चले आएं और 20% जनता सतनामी बन गए। गुरु बालकदास की हत्या और उतराधिकारी वंशजो के परस्पर कलह से अनेक लोग घर वापसी और ईसाई बन गए। सतनाम धर्म केवल सिद्धान्त मे ही रहा व्यवहारिक धरातल मे उतर नहीं पाया।
     सतनामी को शासकीय दस्तावेज हिंदू तब लिखें गए जब गुरु अगमदास, महंत नयनदास महिलांग, अंजोरदास, आदि ने कांग्रेस से जुड़कर सतनामी हिन्दू महासभा गठित कर 1921 में सतनामी आश्रम संचालित किए गए। तब से पौनी पसारी सेवा के लिए समकालीन युवा वर्ग नकुल ढीढ़ी नंदूनारायण जैसे नव साक्षर लोगों ने अभियान चलाया गुरु घासीदास जयंती इसके माध्यम बना।  यह वर्ग डा अंबेडकर से जुड़े हुए थे और उनका संघर्ष और आंदोलन ही एक मात्र रास्ता था। उनके संघर्ष आज पर्यंत जारी हैं ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक और धार्मिक आयोजनों में पौनी पसारी सेवा अघोषित प्रतिबंधित हैं। हमारे  शासकीय सेवकों को किराए का मकान और घरेलू कार्य हेतु बईया ग्रामीण/ कस्बाई जगहों पर आज भी नहीं मिलती। यह अत्यंत विडंबना पूर्ण परिस्थिति हैं। कुछेक राजनेता या उच्चाधिकारियों को केवल शासकीय आयोजनों में, राजनैतिक सभा सोसायटी में या कभी कभी छठी, गृहप्रवेश या शादी विवाह में बफे स्टाइल खाने या नाश्ता कर लेने मात्र को सामाजिक स्वीकार्य या मुख्यधारा में शामिल होने का भ्रम ना समझें।
    सच तो यह हैं कि आज़ादी के बाद कांग्रेस सत्ता में आई इससे जुड़े लोग प्रभाव शाली हुए। जबकि डा अंबेडकर और आरपीआई से जुड़े लोग कभी सत्ता या प्रभावशाली पदों तक पहुंचे ही नहीं। इसलिए समाज दो राजनैतिक विचार धारा में बट कर रह गईं।
तीसरी विचारधारा आरएसएस की रही। जब दोनों विचारधारा में कुछ  महत्वाकांक्षी लोगों को महत्व नहीं मिला या नोटिस नहीं किए गए तब वे लोग जनसंघ और भाजपा की दामन थाम कर लिए।
इस तरह समाज धर्म और पंथ की अध्यात्मिक और सामाजिक संगठन से हटकर केवल राजनैतिक संगठन में जुड़ते गए पद प्रतिष्ठा की चाह लिए।
शासकीय अधिकारी/कर्मचारी जो सामाजिक सोच रखते हैं और कुछेक साधु संत लोग ही धार्मिक सामाजिक कार्यों में संलग्न हैं।
    इस तरह समाज शासकीय/ अशासकीय नौकरी वाले और राजनैतिक पार्टी वाले के रुप में चिन्हाकित हो गए हैं।
   हमारे गुरु साधु सन्त महंत भंडारी सतीदार आदि धार्मिक पदाधिकारी केवल गांवों तक सिमट कर रह गए और विविध धार्मिक कार्यों में चढ़ावे दान दक्षिणा आदि में उलझ गए हैं।
क्योंकि आज तक एक व्यवस्थित और सुसंगठित संगठन नहीं बना सकें जो पार्टियों को योग्य नेतृत्व प्रदान कर सकें।
यहां तो जो पार्टी सत्ता में आए और जी व्यक्ति मंत्री विधायक बने वहीं नेतृत्व करने लग जाते हैं।
बुद्धिजीवियों शिक्षाविदों विचारकों योजनाकारों का यहां कोई पुछ परख नहीं हैं। इसलिए अनेक उपलब्धियों के बाद भी समाज निरीह और विवश नजर आते हैं।
      जागृत सतनाम धर्म कैसे और क्यों "सुषुप्तावस्था"में हैं ।इन पर विचारक अपना विचार दे ताकि नई संभावनाओं के सूत्र तलाशा जा सके। क्योंकि मजबूत धार्मिक और सामाजिक संगठन ही वर्तमान में सत्ता के कारक  हैं। जिसमें लोक कल्याण की अनंत संभावनाएं विद्यमान हैं।

     डॉ. अनिल भतपहरी , जुनवानी रायपुर 9617777514

टीप: 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस की रात्रि 12 बजे जब देश और समाज सो गया।तब सतनाम धर्म की जागरण के लिए समाज सेवा से जुड़े दो घराने मंत्री नकुल ढीढ़ी, और महंत नंदू नारायण भतपहरी के तीसरी पीढ़ी के वीरेंद्र ढीढ़ी और अनिल भतपहरी  की रोचक बातें और परिचर्चा जरुर श्रवण कीजिए।