Thursday, May 23, 2024

सूत्र वाक्य और सूत्र कथ्य

#anilbhattcg       #satshrisatnam 

बुद्ध पूर्णिमा पर सूत्र वाक्य व सूत्र कथ्य 

1.तथागत बुद्ध के अनेक नामों में से एक प्यारा नाम "सच्चनाम" है।
2यह नाम भाववाचक संज्ञा है। जिसका चित्त हृदय मन पवित्र और परम सतमय हो जाते है उसे सच्चनाम कहते हैं। 

3संतमत में सतनाम ,सत्पुरुष और निर्वाण,सतलोक के ऊपर गहरी आस्था हैं।
4 सतनाम धर्म को आदि धर्म की भी संज्ञा दी जाती है।
5सत्पुरुष और सत्यवती (आद्या देवी, अस्टंगी देवी) के पुत्र ब्रम्हा,विष्णु, महेश माने जाते है।
 5 श्रमण संस्कृति में सतनाम का अतिशय महत्व है 
 6 सतनाम संस्कृति में परिश्रम, जप ,तप त्याग और सादगी पूर्ण जीवन यापन की बाते है।
7 सत्संग,शोभायात्रा, और कृषि जनित पर्व उत्सव मानने महापुरुषों की जयंती मानने की संस्कृति हैं।
सतनाम को विविध भाषा और परिक्षेत्र में निम्नवत समझे जा सकते हैं।

       
1पालि में   "सच्चनाम"     एशिया सहित सभी बौद्ध देश 
2मराठी सहित अन्य भारतीय भाषा में "सत्थनाम" महाराष्ट्र कोकन 
3छत्तीसगढ़ी  कोसली उड़िया में "सतनाम "छत्तीसगढ़ उड़ीसा 
4ब्रज अवधि में "सत्तनाम "उप बिहार नेपाल 
5हिन्दी में सत्यनाम संपूर्ण भारत 
6पंजाबी में "सतिनाम "
7रेखता उर्दू फारसी में "शतनाम "इस्लामिक देशों में 
(सूफी संत इनका प्रयोग करते हैं)

इस तरह सतनाम की 7 विशिष्ट उच्चारण जम्बूद्वीप भारत वर्ष में रहा हैं। जिसपर करोड़ों लोगो की आस्था है।

    डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

Saturday, May 18, 2024

खटाखट

#anilbhattcg 

छकड़ी 

  खटाखट 

बाजत  हे  बाजा  दमादम 
नाचत  हे  जम्मा  छमाछम 
लोगन  तारी  पीटे फटाफट 
गर्मी में  ठंडई  पीते  गटागट
भरोसा के फर फरही लटालट 
नोट  खाता में आही  खटाखट

               -डा अनिल भतपहरी

Tuesday, May 14, 2024

मुक्ति

#anilbhattcg 

आटे में नमक की तरह चुटकी भर दर्शन 

   "मुक्ति" 

मुक्ति मरन ही हैं या कहे मरन ही मुक्ति हैं ।
लख चौरासी योनि  भटकाव और जीवन चक्र से मुक्ति यह व्यक्ति को जीते जी सद्गुणी बनाने की सुंदर अलंकृत उक्ति हैं। ताकि रहस्य समझकर इसी जीवन में सद्गुणी होकर चले लोक कल्याण करे। पर कर्मकांडी लोग बेचारे समझ रहे जीव को परलोक स्वर्ग और मोक्ष की ओर दान दक्षिणा के लोभ में ले जाते हैं।
   देखा जाय तो अनेक संताप,व्याधि आदि से युक्त जीव का तड़फते मरना कष्टमय दु:ख हैं ,जबकि हसते -खेलते मरना सुख हैं। जनमानस में सुखमय मृत्यु की कामनाएं करते वृद्धजनों को बोलते सुने भी जा सकते हैं।
मृत्यु से बढ़कर कोई शांति और आनंद नहीं! ऐसी लोक में विश्वास और धारणा भी देखने -सुनने मिलते हैं।
  सच कहें जीवन एक संघर्ष हैं और व्यक्ति सदैव असंतुष्ट। पल भर की खुशियां फिर ज्ञात -अज्ञात दुख: से आक्रांत!इसलिए कुछ पल के लिए संसार संघर्ष से ध्यान हटाने और शांति तलाशने की क्रिया करते व कराए जाते हैं। जो क्रिया करते हैं वह साधक शिष्य और जो यह कराए वह गुरु। 
  परंतु आजकल यह  व्यवसाय  के बड़ी तेजी से फल फूल भी रहे हैं। मरता न क्या करता सभी सुख और शांति की तलाश में भटकते मिलते हैं। ऐसे में निराला की निरालेपन भी आकर्षित करते हैं _

   वासना की मुक्ति मुक्ता त्याग में त्यागी 
    अब निराकार समझ से परे लगे तो लोग भक्ति की ओर प्रवृत हो अवतारों की कृपा पाने और उनके चरणों में जगह पाने आतुर चरणामृत और देवलोक गामी होने लगे हैं। बकायदा वैतरणी पार होने गोदान में लगे भारत को प्रेमचंद जैसे ही  लोग समझ समझा सकते हैं। पर कोई समझे तब न? 
  जबकि अध्ययन मनन चिंतन और दर्शन से मृत्यु के भय से जो मुक्त हो वही स्थितप्रज्ञ की अवस्था को पाते और कबीर की तरह उन्मनी हो गा उठते हैं _

    जाऊ रे निर्गुण निर्भय...
जस की तस धर दीनी चादरिया गाकर शांत होते लोगों को बिहारी झकझोरते हैं _
  तंत्री नाद, कबित्त रस, सरस राग, रति-रंग। 
     अनबूड़े बूड़े, तरे जे बूड़े सब अंग॥ 

  पाप और पुण्य की तलाश में चित्रलेखा सृजित करते महायोगी को भोगी और भोगी की योगी बनने की यात्रा कितना अल्हादकारी हैं। सत्य प्रेम करुणा को ही ईश्वर कहने वालों ने मानुष को  सत्यनिष्ठ प्रेमी व कारुणिक बनाने नैतिक सीख दी पर क्या वे हुए?
   दुनियां कितनी तंगदिल हो गए हैं प्रेमगली अति साकरी भी तभी तो गा उठे -

निरदईया निरमोहना मन के हिरदे में मया जगाबोन
मया बताबोन  मया सिखोबोन गीत मया के गाबोन 

पर इससे किसे मुक्ति मिलते हैं और कौन मुक्त हुए? यह हम  जैसे अबूझो के लिए प्रश्नातित हैं...यात्रा जारी हैं कुदरत की करिश्मा को समझने ...मंजिल का मिलना या दीदार होना यात्रा का थमना भी एक तरह से मुक्ति ही हैं !
स्वकल्याण की सोच साकार हुवे नहीं तब लोक कल्याण की कामनाएं व्यर्थ ही हैं और यही सर्वत्र चल रहे हैं। 
तो प्यारे  आज इतना ही।
मिलते हैं कभी कभार तब तक के लिए...व्यस्त ,मस्त और स्वस्थ रहे.... जय जय।

Monday, April 29, 2024

बसुन्दरा मन के न उ सियानी

#anilbhattcg
 
  छकड़ी : बसुंदरा मन के नऊ सियानी

इसगा-चारी म बुड़े अपनेच म लड़त कटत मरत हे
मार चिखला  म सनाय  गोल्लर  सरिख भुकरत हे
मंद - मंउहा म चुर कुकरी  बोकरा खा के उछरत हे
तेही पाय के दु कुरिया के मन नऊ सियानी करत हे
घर भीतरी ढे़ढ़ा कस तरी-तरी बरी मुनगा चुचरत हे
तुहरे सेती ये बसुंदरा मन हर  पागा पारे  किंदरत हे

                 - डा. अनिल भतपहरी /9617777514

Thursday, April 25, 2024

खार अउ कछार के उजार

||खार अउ कछार के उजार || 

    हमर गांव  जुनवानी ह सिरपुर  अउ भंडारपुरी के मंझोत महानंदी अउ पतालु  नरवा  म खड़ बसे हे । जेकर चारों खुट मधुवन अउ रम्य जंगल रहिस ।बनसुंघुल अउ कोरिया रवार के कारन कहर- महर महकय। असनेच  कत्कोन गांव के रम्य  जंगल अउ नंदी -नरवा ,के  कछार म उपजे /जनमे बनसपति अउ पशु- पंछी मन खार अउ कछार के उजार होय ले नंदाते गय।
       अब कहां के  पाबोन तेंदू ,चार ,डुमर ,बन सुखड़ी ,  अमुर्री, मोकैया ,बंझोरी  बोईर,दहिंगला  त कसही  बेल , धनबहर , कोसम, घठोल , चिरई जाम , आमा अमली  गंगा , डुमर , गस्ती , कया कोइचला ,हर्रा बहेरा अंवरा  मौहा तेंदू चार जइसन  फलदार और औषधीय पेड़  । 
    कर्रा  सेनहा , सलिहा ,  सेम्हरा ,  चिकनी  ,फरहद  जैसन इमारती उपयोगी जलऊ   पेड़ रहय त  कोलिहा केकरी, चिरपोटी , मुंगेसा तुरते उरर तोड़ के खाय के जिनिस रहय। ,फुटू खेकसी ,लेवना भाजी ,बोहार , उरला , कोइलार जैसन  भाजी  ले भरे रहय।  कोरिया, लता , गोटी फूल  बेला ,  छैबुंदिया , धनबहेर, परसा, मौहा  ,गोंदला, झगराहा अउ आनी -बानी के फूल  ले  बारहो महिना कहर- महर महकत आबोहवा वाले गांव सिरतो सरग सरीख लागय। भले सांप -बिछी के डर रहय फेर जानती म कुछेक नुकसान के ये मन अउ मनखे  सुंतितर हरहिंछा संघरा  रहय।
       अब सब वन विभाग के  करस्तानी कि इन नरवा, नंदिया कछार , दादर अउ  पड़ती खार में प्राकृतिक रुप ले ऊपजे  रम्य जंगल ल  उजार के उहा  सागौन अउ  बांस रोपत जात हवय । दादर  जंगल उजरे ले  जैव विविधता से युक्त पशु -पंछी ,औषधीय गुण केवदसमुड़ कांदा , जंगली गोंदली, बगडोल ,गोमची ,छेरी चुची, कत्कोन रुख के बांदा  , फर - फूल ,लता -कुंज  झांड़ी  पेड़ आदि के उजार हो  गय!   पहली कत्कोन बैदराज मन आयव अउ चरिहा  बोरा म जड़ी बुड़ी खन के लेगय । 
    सरकारी  रोपनी  के खाल्हे  न बंगलसुंघुल मिरगा घास न कांदी  , शंखपुष्पी ,कौआकेनी के घांस जेला चर के अमरित कस गोरस गाय / भंइस मन  देवय।  ऊपर ले ये रोपनी मन म  तार घेरा के लगे ले  चरागन खतम अउ  गाय - भंइस , छेरी -भेड़ी अमरित सरीख   दूध घी ह तको खतम। 
       अब तो गुरेचन वाली गाय कहु देखे सुने म नइ आय । बचपन में  हमारे घर गुरेचन वाली सादा अउ कसाय रंग के गाय रहिस जेला दादी ह "सुरहीन  गाय कहय । बाखा भर पानी म उतर के पानी पियय ते पाय ओहर चिन्हऊ रहिस ओकर दूध हर बड़ मीठ  एक अलग सुंगध रहय।ओकर घी बड़ ममहाय । ओकरे  दूध पी के   बछरु मन संग  ब्यारा- बारी में गाज खेलत  बाढ़े हवन । हमर  गांव ले  लगे  चातर राज वाले  मन के मारे  हमर  खेत -खार  के साजा पेड़ बाचे नही। पहली गांव म रखवार लगय ,अब तो सब नंदा  गय। जलाऊ लकड़ी सेती जम्मा रुख राई मन कटा गय । पहली सीजन म चरौटा ,उलहवा, कोसम , बोहार भाजी ,टोरे घरो -घर सगा उतरय। कत्कोन झीक- पुदक के तको ले जय।
            फेर इकर ले जादा  वन विभाग के मनमानी अउ केवल सागौन बांस उपजाय के सेती अमुल्य जड़ी बुटी अउ प्राकृतिक रुप ले उपजे  रुख राई अउ  इहचें जनमे पशु पंछी जेमा  भठेलिया बनबिलवा  , घुस मुसवा ,  चीटरा , गोइहा  सांप नेवला , कोलिहा, खेखर्री रहय । कभु -कभु महानदी ओ पार सिरपुर बार जंगल ले गाहबर , हुर्रा , बरहा ,  हिरना -मिरगा   अउ कभु -कभु बुंदिया बाघ आ जय । गांव म बेंदरा न इ आत रहिस ।ओमन ल इही जंगल म फर फरहरी खाय मिलय । चिर ई चुरगुन म तीतुर , बटेर , पड़की ,  सोलहई ,  हारिल , खेलवार , फूल चुहकी , मैना , कोयल ,कौवा , टेहर्रा , नाकर , कोआ जल कौवा , त नरवा नंदिया पड़हीना , भुंडा ,बांबर टेगना डेमचुल , सरागी ,खेगदा , मोंगरी , ढेसरा ,कोतरी चिंगरी मन गजगजात रहय जेला खाना थोरिक नंदिया नरवा के सरार म बुड़ अउ टमड़ के साग हो जय।
   ए सब के उजरे ल  बेंदरा , बरहा अउ हाथी मन के आंतक ले वन गांव मन  के उजार होय घर लिस। मनखे मन शहर म रोजी- मजुरी करे बर पलायन करे धरलिस ।
कहे के मतलब एक सइगोना जउन बिरिछ म सोना समझे जाथे ।ओकर उपजाय के जोखा ले ,लोगन के जनजीवन ले जुडे हीरा -मोती, रतन -पदारथ  सरीख अमूल्य प्राकृतिक अउ जैव संपदा के बिनास हो गय। धनी -मानी मन के सेज -सुपेती ,खोरसी -टेबल अउ दरवाजा - खिड़की बनाय के सइगोना बैरी हर अजगर सरीख सब ल लील डरिस । आज तक ये सइगोना हर आम आदमी के पहुंच ले दुरिहा हवे ।
   सच कहे त गरीब ल भुंइया बाटे के योजना  सिलिंग हर दादर अउ चरागन   खार ल खेत बनाय बर जरमुर सहित इहा  रम्य जंगल उजरिस । तेकर पाछु सगौन रोपनी योजना हर पुरा बरबाद कर दिस । अब तो दतवन करे के कोनो रुखेच न इहे । गांव भीतर के बारी बियारा म  मनसे के खुदे लगाय आमा ,अमली  लीम , तरिया अउ खरिखा डाड़ के बर ,पीपर बस बाचे हे बाकी सब खतम । 
    केवल चालिस बछर में ये दुरदसा देख मन बड़ दु:खित  होथे। कोनो तो समझाव कि निस्तारी बर अउ स्वास्थ्य   बर शुद्ध हवा अउ जरी-बुटी मिंझरे  चरागन गांव म होना कतेक जरुरी हवय ,जेन ल चर के गाय / भंइस हर अमरित सरीख दूध देथे। ए डहन हमर शासन -प्रशासन के धियान काबर नइहे? 

               -डा. अनिल भतपहरी / 9617777514
                       सचिव छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग 
  सेंट जोसेफ टाउन अमलीडीह रायपुर छग

Monday, April 15, 2024

तुरते ताही


।।तुरते ताही करय कारवाही ।।

गरब करन कि सरम काही सुझत नइये 
मनीपुर के   धधकत आगी बुझत नइये
नान  चुक राज  के  जबर हवय  बिपत 
दू समुदाय के मांझ खुरखूंद झगरा बिकट  

एकेच भुइंया एकेच नदियां एकेच जंगल पहार   
एकेच गांव म बसेरा सब के एकेच खेत- खार 
बसय तीर -तखार सबो के एकेच डीह -डोंगर 
मीत -मितानी  सगा पहुनाई रहय सांगर- मोंगर

कुकी अउ मैतई मन ल काय होगे हवय 
लगथे उन मन ल कोनो बेमझाय हवय 
धरम- करम   ल राजनीति   म साट के 
दुनो झन  ल   परलोखिया  मन बाट के 
 
राज करत  अप‌न तिजौरी  ल भरत हे 
उचका के एमन ल चाउर कस छरत हे 
माईलोगन के मान मेटा के काय कर लीही 
हाय लगही एकर कतेक ल ओमन तपही 

करतुत छलियन के करम अब जग भर बगरही 
अपनेच ढीले दांवा म भंग-भंग ले ओहूमन जरही 
ज इसन  करही  तइसन फल  तो  पाबेच करही 
बोही  बंबरी के  बीजा त निपोर ले आमा   फरही 

फेर संसो कि ये संकट के अब तक उबार नइहे 
लगथे उहा अब कोनो जवाबदार  सरकार नइहे 
राज शासन सके नही त केन्द्र करवाही  करय 
धधकत  मनीपुर  ल अब  तुरते ताही बचावय 

नइते   जंगल   कस आगी   बबलतेच   जाही 
तीर-तखार के पाना -पतई मन त लेसातेच जाही  
देखे बर हरियाली सबन  आखी हर तरसही 
चारो मुड़ा लेसाय जराय धुंगियाय रंग रही जाही .

जोन समृद्ध खुशहाल राष्ट्र के सपना देखे हन 
राज पा के राज करे के सपना सजाये हन 
अपन कला संस्कृति धर्म -कर्म के गुन गाये हन 
सब बिला जाही जतनो एला ,मुस्कुल से राष्ट्र पाये हन  

         - डा. अनिल भतपहरी / 9617777514

।।सतनाम ।।

भारतीय जनमानस में‌ सतनाम की सात तरह की विशिष्ठ ध्वनि है - सत्थनाम , सच्चनाम , सत्तनाम , सत्यनाम  सतिनाम  सतनाम और शतनाम । ऐसा जान पड़ता है कि   यह शब्द प्राचीन सिन्धु धाटी सभ्यता मे भी व्यवहृत होते रहे होन्गे। श्रमण और कृषि संस्कृति में  सतनाम साधक व सुमरन करने वाले समुदाय बेहद प्राचीन संस्कृति के लोग हैं। बुद्ध पूर्व 26 बुद्ध और हो चूके है । बुद्ध का आशय  बुद्धि या ज्ञान से है। जिन्हे मर्म का सत्य का ज्ञान हो चुका जो सब कुछ को समझ गया वही बुद्ध या ज्ञानी हैं।  राजकुमार सिद्धार्थ को सत्य का  बोध ( ज्ञान) हुआ तो वे ज्ञानी अर्थात् बुद्ध हुआ । 

  बहरहाल बुद्ध के अनेक नाम मे सच्चनाम भी एक नाम हैं।
यह नाम भावनात्मक रुप से है।
क्योकि वे राग द्वेष मोह से रहित होकर उनका चित्त मन हृदय सत मय हो गया था इसलिए  उसे  सच्चनाम कहे गये। आगे  वही क्रमिक विकास मे सत्तनाम हुआ।
सत्तनाम संत मत का लोकप्रिय शब्द है और यह कल्पित या मिथकीय  ईश्वर से अलग यथार्थ व ऐतिहासिक शब्द नाम हैं। सतपुरुष भी इसी तरह संत मत में ईश्वर के समनान्तर शब्द हैं।
     सतनाम पंथ में गुरुघासीदास को सतनाम बाबा  भी कहे जाते है ।इसका मतलब गुरु घासीदास सतनाम हो गया ऐसा नही हैं।
   सच्चनाम ठीक सतनाम बाबा जैसा संतो या अनुयाई द्वारा श्रद्धावश पुकारे गये नाम हैं।
    बहरहाल इतना तो अवश्य है कि  भारत वर्ष मे लगभग सवर्ण समुदाय  त्रिदेव सहित  राम कृष्ण को मानते है ।जबकि अवर्ण या अस्पृश्य धोषित कर दिए गये जनता जो कभी प्राचीन बौद्ध धर्म के महायानी हीनयानी और सहजयानी थे उन्ही वर्गो समुदायों मे संतो गुरुओ का आगमन हुआ और वही लोग सतनाम का अलख जगाए।
वर्तमान मे सिख सतनामी कबीरपंथी रैदासी वगैरह तमाम समुदायों मे केवल " सतनाम  "  के कारण परस्पर सौहार्द्र स्थापित होने लगे है। उपसना और कुछेक मान्यताओं मे अंतर हो सकते है पर सत ज्ञान और परस्पर सहयोग के मामले मे सभी सतनाम के अनुयाई  अपने अपने धर्म गुरुओ और प्रवर्तकों के संदेशों के अनुरुप समान ही हैं।
ढोंग पांखड और चमत्कार आदि के जगह कर्मवादी और पुरुषार्थ से भरा हुआ आदर्श समाज की संरचना गुरुओ के कारण हुआ हैं।
   वे लोग जाने अनजाने में छोटी मोटी संकीर्णताओं व मान्यताओ के आधार पर सतनाम के मार्ग से न भटके और  न  ही परस्पर प्रतिद्वंदिता रखें। क्योकि डिवाइड एंड रुल वाले आपको सदियों से बाट कर राज करते आ रहे है उनकी नीयत को समझिए और उनके षडयंत्र से बच कर रहें। 
    यह कैसी विडंबना है कि ये सतनाम उपासक  उंगली मे गिने जाने वाले ऐतिहासिक  8-10 संत/ गुरु को एक नही मान सकते और वे उधर मिथकीय  तैतीस कोटी को एक कर सबको उसी में बांध छांद कर रखे हुए हैं।