Tuesday, May 30, 2023

संपादकीय .... सतनाम संदेश जुन 2023

संपादकीय...

विगत अनेक वर्षों से हमारे होनहार युवाओं के लिए शासकीय अवसर के दरवाजे बंद सा हो गये थे। क्योकि आरक्षण का निर्धारण राजकीय और राष्ट्रीय सत्ता की खीचतान से उलझ सा गया था।   
      भीषण कोरोना काल  से असमान्य जीवन से उबरे तनाव ग्रस्त घर परिवार व समाज इन्ही के आशाओं का केन्द्र उनके होनहार संतति आन लाइन परीक्षा से उत्तीर्ण  नव स्नातक / स्नातकोत्तर व डिप्लोमा धारी नव युवक गण  दलीय सत्ता प्रतिद्वंद्विता की विकट  स्थिति से निरुत्साहित होकर आक्रोशित हो चले थे ।उनमें नव उत्साह व कुछ कर पाने की ललक को कायम कर पाना  परिजनों के लिए प्राय: चुनौती बन गया था । 
   तभी न्यायालीन फैसले ने राज्य के नवयुवकों में नव उत्साह का संचार किया । शासन- प्रशासन  विभिन्न विभागों की रिक्तियों के विरुद्ध अनेक पदों की विज्ञापन जारी किया फलस्वरुप  मई की चिलचिलाती धूप में उत्साहित वही नवयुवक गण च्वाइस सेंटरों ,कम्युटर केन्द्रों, रोजगार आफिसो, आवेदन देने जमा करने  में लगे है ।  अनेक पुस्तक  दुकानें  ट्युसन केन्द्र में  आने जाने लगे हैं। जहां विरानी थे वह जगह अब आबाद हो गये हैं।  नवयुवकों का उत्साह दर्शनीय हैं। ऐसा लगता है कि खुशियों सौगात ले आए ...इन लोगों का लक्ष्य दिखाई पड़ने लगा ।  इसके पूर्व किमकर्तव्यविमूढ़म टाइप देश दुनिया से बेखबर हताश -निराश  थे।
    बहरहाल होनहार और योग्य नव युवकों को उनका अपेक्षित लक्ष्य मिले इसके लिए वे विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में  जी जान से जुट जाए क्योकि असवर सदैव एक अनार सौ बीमार टाईप का रहता हैं। इसलिए प्रतिस्पर्धा के लायक बनना ही होगा । चाहे नौकरी- चाकरी हो या  उद्यम ब्यापार या फिर खेती किसानी ही सही इन सभी जगहों पर प्रतिस्पर्धा है । हमारे युवा वर्गो को चाहिए कि अंत्याव्यवसायी योजना के तरह स्वरोजगार , लघु उद्योग के लिए गंभीरतापूर्वक प्रयास करे। क्योकि सबके लिए शा नौकरिया संभव नहीं। हर कार्य उत्कृष्ट रहता है मनोयोग से करने पर प्रत्येक छोटे बडे कार्य कर सफलताओं के शिखर तक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा द्वारा पहुंचा जा सकता हैं। 

 इस  तरह से  देखे  तो मानव जीवन संघर्षमय प्रतिस्पर्धा ही  हैं। सुख शांति व सुकून पाने के लिए भी संघर्ष यानि सद्कर्म आवश्यक हैं। बिना इनके कोई रास्ता नही न ही कोई आसमानी दुवाएं या ईश्वरीय कृपा विद्यमान है  इस महामारी ने साबित भी किया हैं। 
     अन्यथा अबतक यह मान्यताएं रही है - अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम ... इस प्रवृत्ति का दिन  लद चुका है । अब तो कर्मो से ही गुजारा चल पाएगा । इसलिए भाग्यवादी के जगह कर्मवादी बने । यह सद्गुरु घासीदास बाबा के अमृत वाणी  भी है- "तय अपन बर बारा महिना के खर्चा जोर ले तब भक्ति कर  न इते झन कर।"
      इस तरह की विरासत और संस्कृति के संवाहक सतनाम पंथ और उनके अनुयाई जीवन में लक्ष्य प्राप्ति हेतु प्रतिबद्ध ढंग से सतत परिश्रम में लगना चाहिए चाहे पुश्तैनी खेती हो या पढाई लिखाई या उद्यम व व्यापार रुचि अनुसार इन सब कार्यो में नवयुवकों को प्रवृत्त होना चाहिए ।आर्थिक विकास अनेक विकासों के सहचरी है इसलिए आत्म निर्भरता बेहद आवश्यक हैं।
   बहरहाल ज्ञानार्जन और मनोरंजन हेतु अनेक ग्रामों में 1-2-3-5-7 दिवसीय  सतनाम सत -संगत भजन कीर्तन  का प्रचलन तेजी से चल रहा है जो स्वागतेय पहल है । इससे समाज सुसंगठित व सुसंस्कारित होते है और न ई पुरानी पीढ़ी  परस्पर सार्वजनिक जीवन व्यवहार के कदाचार सीखते -सीखाते हैं।
   गुरुघासीदास बाबा जी ने इसलिए रामत रावटी जैसे सांस्कृतिक अनुष्ठानों का प्रवर्तन किया । हमारे पास एक उच्च स्तरीय आध्यात्मिक विरासत और श्रेष्ठतम आयोजन है उनका क्रिन्वायन आयोजन समितियां गठित कर अपने आय से कुछ बचत कर परस्पर  बरार से सहयोग से सार्वजनिक व धार्मिक आयोजन करे और समाज में सांस्कृति सुरभि का प्रसारण करें।
    ऐसी उम्मीद के साथ हमारे नवयुवकों की उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए कृषक समाज को  आने वाला "बीज बौनी बर बतर बेरा "  के  बधाई ।
     जय सतनाम ....

   डा. अनिल कुमार भतपहरी 
           प्रबंध संपादक 
          सतनाम संदेश 
प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज

Sunday, May 28, 2023

तन तिजौरी म ( दो भजन )

[5/24, 09:25] Anilbhatpahari: तन के तिजौरी म रतन भरे हे सब मनखे गुन के खान 
बनना निगड़ना अपन हाथ म  सब  संगत के पहिचान 

खेलत खात रात दिन जिनगी ह पहावय ।
छप्पन भोग करथे तभो ल ये मन नइ अघावय ।/
 मन भंवरा मतवार किंदरय ,कर रुप मदिरा पान ...

मया पीरित बर बिहाव लगिन कराये गौना 
ये जग ब इरी जहर महुरा लागे मीत मतौना 

अब तो अधियागे खिरत हे, सबो आन -बान

जग अंधियार सुझै न कछु ,अब तो का करन गा 
तन डोलत हे मन हे भारी अब तो  गुरु शरन जा 
एक साहारा हवय  संतो ,सुमर ले सतनाम ....
[5/24, 10:16] Anilbhatpahari: तन के तिजौरी म रतन भरे हे, दया मया सद्भाव 
बनना बिगड़ना अपन हाथ म सब संगत के प्रभाव 



जेन बोबे तेन लुबे संगी,खेत हो या हिरदय 
अलकर दु: ख का कहिबे संगी,
सहर पहर बन किंदरय 
मन म  तोर सइता नइये त कछुचों आव जाव ....


बीच गली म  डांग गड़ा के खेलत हे  डंगचघहा 
बीच भंवर म डोंगा फंसगे  तउरत हे डोंगहा
सद्गुरु हवे एक सहारा उही करहि नर न्याव ...

Tuesday, May 16, 2023

रंग महल में बैठा जोगी

सतनाम -संकीर्तन 

रंग महल मे बैठा जोगी 
मन बैरागी होय 
रिमझिम माया के बरसा बरसे  
धधकत आगी होय ...

उलट -पुलट ये दुनिया सारी 
भ्रमित भटकत नवल शिकारी 
सद्गुरु  साखी जोय ...

सरगपरी छन-छन नाचे 
मृग मरीचिका सोय 
साधक साधे सिद्धबानी 
सब मरजी का होय ...

मरना ऐसे देश में 
जहां न परिजन कोय 
पशु पंछी भोजन करे 
यह  तन  मांदी  होय ...

    - डा. अनिल भतपहरी / 9617777514

Friday, May 12, 2023

दगर दगर बरत हे चोला

दगर- दगर बरत हे चोला 
देखे हंव ओला ...
जावत डोंगरी डहन, गावत पंथी भजन 
दगर -दगर बरत हे चोला, देखें हंव ओला ...

 चंदन तिलक लगाए ,कंठी जनेऊ पहिने 
धोवा के धोती सुघ्घर ,पांव म खड़ाऊ पहिने ...
सुमरत सतनाम रेंगत हे ओहा ...

निकले भंडार ले मुंदरहा रेंगत होगे   हे दुरिहा 
लगथे जावत हवय  गिरौद गौवतरिहा 
सुमरत सतनाम रेंगत हे ओहा ...

   रचना - 10-5-2023 

Tuesday, May 9, 2023

मया के रंग लाल व पखाले बासी

[4/28, 08:46] Anilbhatpahari: मया के रंग हे लाल रे संगी मया के रंग हे लाल 
दू दिन के जिंनगी हवय , बीत जाही आज काल रे संगी मया के रंग हे लाल ...

अरझे हवस तय कोन जगा म 
बिन पय के तय भोग सजा ल 
मनखे जोनी के बड़ महातम 
कहां गवाये तय एकर मजा ल 
अभी तो तोर ये गति हे आगु कोन हवाल रे संगी मया के रंग हे लाल ...

गांव शहर जंगल पहाड़, नदिया नरवा तरिया
किंदरे बुले मन थिरआले, संगी आऊ जहूरिया
गाले मगन गीत भजन, अउ बजा ले गाल रे संगी मया के रंग हे लाल ...
[4/30, 20:28] Anilbhatpahari: ।। बोरे बासी आमा के अथान ।।

पखाल बोरे बासी ,आमा के अथान 
भरपेट खाले संगी संझा अउ बिहान 
खाले खाले बासी गुन के हवय  खान ...


गोंदली लाली मिरचा लसुन के चटनी 
चटकार खाले झन आवे मुंह ले  पानी 
चिटिक दही - मही ल संग म दे   मिंझार ...

एला खाइस गुरुघासी अउ शहीद बीर नरायन 
 गुंडाधुर सुन्दरलाल खुबचंद पुरखा मन 
खाके  गुन गाके होइन हवे महान...

हीरा कस उज्जर सीथा घाद सुघराई 
गुणकारी जबर नइ सचरय
 रोग -राई 
महिमा एकर कतक करव बखान ...

  -डा. अनिल भतपहरी / 
9617777514

सी- 11 ऊंजियार सदन अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़

Thursday, May 4, 2023

लिम‌ उ

आपके वास्ते छकड़ी हमरी 

           " लिमउ "
गरमी मं लिमउ सक्कर पानी ले मन थिरा जथे 
कत्कोन झोलाये पीते साठ कुहकुही सिरा जथे 
दार-भात संग  ससन  भर खाले  रोजेच अचार 
बिटामिन   सी भरे  हवय  रसा मं  एखर अपार 
तिहि पाय के अंगना  मं लगावव  लिमउ  पौंधा 
ममहई अउ  सुघरई संधरा  पावव  संगी  ठौका 

                   बिंदास कहें -डां. अनिल भतपहरी

Thursday, April 27, 2023

छायावाद और पं. मुकुटधर पांडेय

छायावाद और पं. मुकुटधर पांडेय 

    हिन्दी साहित्य में छायावाद का कालखंड अतिशय महत्वपूर्ण हैं। बिन इनके साहित्य का अध्ययन अध्यापन या विचार विमर्श संभव नही है।  सच कहे तो इस  कालखंड मे हिन्दी जिसे खड़ी बोली कहे जाते है और काव्य के लिए अनुपयुक्त वह धारणा बदली और हिन्दी भाषा प्रांजल और   काव्यमय हुई।   
        हालांकि कोमल कांत पदावलि और बढते संस्कृत निष्टता के चलते भाषा दुरुह जटिल हुई तथा कविता रहस्यमय होकर गुंफित भी हुई पर यह जटिलता ही भाषाई संरचना और भाव विन्यास को गहराई से समझने की व्यापाक दृष्टि भी प्रदान की।
    छायावाद मे जो पश्चिम की  मिस्टीसिज्म या रुमानियत और इस्लामिक सूफियाना फलसफा दिखता है उससे यह बेहद प्रभावी और वैश्विक स्तर पर चिन्हाकित भी की गई  ।
    इस छायावाद के प्रवर्तक कवियों मे छत्तीसगढ के रायगढ़ जिला के महानदी तटवर्ती बालपुर ग्रामवासी कविवर पं. मुकुटधर पांडे अग्रणी है। कुर्री के प्रति  काव्यांश का यह भाव देखिए जिसमें  छायावाद के विशेषताएं समाहित है-

 शून्य गगन में कौन सुनेगा तेरा विपुल विलाप ?
बता कौन सी व्यथा तुझे है , है किसका परिताप ?  ( 1 ) 
    यह प्रश्न वियोगी कवि  का प्रश्न है जिनकी उत्तर खोजा जाना शेष है।
   कविवर पंत जो छायावाद के बड़ा नाम है वो तो स्पष्ट कहा है -

वियोगी होगा पहला कवि आह से ऊपजी होगी गान ।
नैनो से उमड़ कर चुपचाप बही होगी कविता अनजान ।।   (2) 

हालांकि छायावाद और उनके प्रवर्तक के नाम पर काफी प्रवाद है ।यह नाम साहित्य जगत  चल पड़ा पर किसने सबसे पहले उपयोग किया इन पर भी बहसे आज तक की जाती  हैं, फलस्वरुओ लोगों मतैक्य नहीं है।
    सन १९२० में ' श्री शारदा ' पत्रिका जबलपुर से निकलती थी उसमें ' हिन्दी कविता में छायावाद शीर्षक से एक लेख माला पंं. मुकुटधर पांडेय की छपी। उसके माध्यम से पहली बार " छायावाद " शब्द और छायावादी काव्यान्दोलन को लेकर प्रमाणिक तौर पर विस्तृत रुप से सामाग्री सामने आई। " इसी तरह हितकारिणी पत्रिका मे -"हिन्दी कविता में छायावाद " निकली। (3)
   इस आधार पर उन्हे छायावाद नाम देने वाले कहे जा सकते है।इस संदर्भ में डाॅ. बल्देव जी का यह व्यक्तव्य महत्वपूर्ण हैं -" पंडित मुकुटधर पांडेय संक्रमण - काल के सबसे अधिक सामर्थ्यवान कवि हैं। वे द्विवेदी युग और छायावाद के बीच की ऐसी महत्वपूर्ण कड़ी हैं, जिनकी काव्ययात्रा को समझे बिना खड़ी बोली काव्य के दूसरे - तीसरे दशक तक के विकास को सही रुप से समझा नहीं जा सकता । उन्होंने द्विवेदी युग के शुष्क उद्यान में नूतन सुर भरा तथा नव बसंत की अगवानी  कर के युग प्रवर्तन का ऐतिहासिक कार्य किया ।" (4)
     भक्तिकाल में ज्ञान मार्गी निर्गुण पंथी संतो एंव  सूफी - संतो  की रहस्यमय साधना रही हैं। कुछ कुछ उसी तरह की बातें काव्यात्मक जगत में छायावादी दृष्टिकोण ने प्रस्तुत की-
छायावाद एक ऐसी मायामय सूक्ष्म वस्तु हैं कि शब्दों द्वारा उसका ठीक - ठीक वर्णन करना असंभव है। उसका एक मोटा लक्षण यह है कि उसमें शब्द और अर्थ का सामंजस्य बहुत कम रहा है। कहीं कहीं तो इन दोनों का परस्पर कुछ भी संबंध नहीं रहता । लिखा कुछ और ही गया हैं, पर मतलब उसका कुछ और ही निकलता है, किन्तु पाठक इस शब्द -अर्थ के विरोध को देख अलंकारशास्त्र के रुपक अथवा व्यंग्य का विभ्रम न होने दे। इसमें ऐसा कुछ जादू भरा है कि प्रत्येक पाठक अपनी रुचि और समझ के अनुसार इसमें भिन्न -भिन्न  अर्थ निकाल सकता है और भिन्न- भिन्न रीति से ,परन्तु समान भाव से , उसका आनंद - अनुभव कर सकता है। कवि का अभिप्राय उसके लिखने से चाहे जो रहा हो , इससे पाठकों का संबंध कुछ भी नहीं ।" आगे  कविन्द्र रवीन्द्र की पंक्ति का उद्हरण देते हैं - " मर्त्यलोक से उसका बहुत कम संबंध  रहता हैं। वह बुद्धि और ज्ञान की सामर्थ्य - सीमा को अतिक्रम करके मन - प्राण के अतीत लोक में ही विचरण करती रहती है, क्योंकि वहाँ उसे अपनी रुचि तथा इच्छा - पूर्ति का यथेष्ट अवसर मिला करता हैं। (5)


फलस्वरुप  कविवर पांडे जी  उस अज्ञात सत्ता और शहर का श्रोता बनकर हमारे समक्ष सुनाने आ जाते है - 
    सुना , स्वर्णमय भूमि वहां की मणिमय है आकाश ।
वहां न तम का नाम कहीं है, रहता  सदा प्रकाश ।।   ( 6)

    बालपुर ग्राम मे निर्भय और निसंक निवासरत थे । भौतिक  अभावों के बीच प्राकृतिक संशाधनों और आत्मीय संपदा के वे मालगुजार थे फलस्वरुप ग्राम वैभव उनकी कविता द्रष्ट्व्य है - 

शांति पूर्ण लघु ग्राम बड़ा ही सुखमय होता भाई। 
देखों नगरों से भी बढ़कर इनकी शोभा अधिकाई ।। ( 7 )
      मुकट धर पांडे जी की मूल्याकंन बच्चू जांजगिरी ने की फलस्वरुप उनकी  ख्याति चतुर्दिक फैली अन्यथा उनकी अवदान सुदूर छत्तीसगढ़ के होने के कारण विस्मृत कर दिए गये होते । बहरहाल यहां के साहित्यिकों का यह नैतिक दायित्व है कि यशस्वी रचनाकारों की ओर भी नजर इनायत कर लिया करें। पता नही हमारे बौद्धिकों / अध्येताओं, रचना धर्मियो  यहां तक आध्यापकों को भी यह लगता है कि बड़ा फलक और रचनाकार केवल  गंगा हिमालय के भूभाग मे गोया कि वही सौन्दर्य बिखरा हुआ है और कही नही फलस्वरुप वहां बडे और प्रवर्तक रचनाकार होन्गे। पं . मुकुटधर जी इस मिथक को तोड़ते है। और छोटे से ग्राम मे रहकर वे वैश्विक साहित्य रचते है - 
दीन - हीन के अश्रु नीर में 
पतितों की परिताप पीर में
संध्या के चंचल समीर में 
करता था तू गान 
देखा मैने यही मुक्ति थी 
यही भोग था यही मुक्ति थी 
घर मे ही सब योग - युक्ति थी 
घर ही था निर्वाण । ( 8)
    इस तरह देखे तो उनकी रचनाएं  भाव प्रवण और भाषा बहुत ही उत्कृष्ट हैं।  उनकी रचनाओं  छायावाद और स्वच्छंदता स्पष्ट दृष्टिगोचर होते है 
।    
    उनकी रचनाओं छत्तीसगढ़ी शब्द और यहां की साञस्कृतिक तत्व अनायस देखने मिल जाते है। उनकी चर्चित व प्रतिनिधी कविता कुर्री के प्रति एक तरह से प्रवासी पक्षी का समूह है जो दूर देश आते है। उनकी उच्चरित  ध्वनि के कारण यहां उसे कुर्री कहते है को लक्ष्य कर उन्होने अप्रतिम काव्य रचना की और वह छायावाद की कविता के रुप में स्वीकृत की गई ।कुर्री कहने मात्र से ही छत्तीसगढ प्रदर्शित हो जाते है। महाकवि कालिदास कृत मेघदूत का छत्तीसगढ़ी अनुवाद दर्शनीय है। उनकी अनुवाद कला और छत्तीसगढ़ी शब्द संयोजन बेहद सटीक है। इस अनुवाद से सहज पता चलता है कि छत्तीसगढ़ी अनन्य भावों अभिव्यक्त कर सकने असीम क्षमता संस्कृत सदृश्य रखती है। 
श्रंगार और प्रेम प्रधान वर्णन , सौन्दर्य भावना की अतिशयता छायावाद की विशेषता रही हैं। इस संदर्भ पर पांडेय जी का विचार रखे तो विषयान्तर नहीं कहा जाएगा ।वे लिखते हैं- " मेरी नई उम्र थी ।सौन्दर्य के प्रति मन में एक आकर्षण था ।मैंने ' रुप का जादू' लिखा, जिसे सरस्वती के प्रथम पृष्ठ में स्थान मिला । शायद 1918 की बात है। ठीक- ठीक स्मरण नहीं ।उस समय की एक रचना की दो पंक्तियाँ याद हैं -

कुटिल केश चुम्बित कष उनके मुख मंडल का हास ।
मेरे मलिन लोचनों को फिर देगा दिव्य प्रकाश ।।9
 यह छत्तीसगढ़ के लिए गौरव की बात हैं कि साहित्य जगत में मुकटघर पांडेय जैसे व्यक्तित्व का पदार्पण हिन्दी काव्य जगत के उत्कर्ष काल में हुआ। प्रदेश के ख्यातिलब्ध समीक्षक डाॅ. बल्देव जी अपनी पुस्तक छायावाद और मुकुटधर पांडेय में लिखते हैं- " पंडित मुकुटधर पांडेय हिन्दी के उन शीर्षस्थ यशस्वी साहित्यकारों में से एक हैं, जिन्हें उनकी एक - दो रचनाओं से ही यथेष्ट ख्याति मिल गई । उनकी कविता ' कुर्री के प्रति' तथा ' छयावाद ' लेखमाला गुलेरी जी की कहानी ' उसने कहा था ' की तरह अमर रचनाएँ हैं। पांडेय जी ने गद्य में भी काफी लिखा हैं, जो राष्ट्रभाषा आंदोलन का ही एक हिस्सा हैं। (10)
भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मनित पांडेय जी प्रदेश के गौरव है । वे आने  वाली नई पीढी के मार्ग दर्शक हैं।

संदर्भ - 
1 मुकुटधर पांडेय व्यक्ति व रचना पृ 410 संपादक - अग्रवाल महावीर , श्री प्रकाशन दुर्ग 2001
2 सुमित्रानंदन पंत की सुप्रसिद्ध कविता 
3   मुकुटधर पांडे व्यक्ति एंव रचना पृ 438 संपा अग्रवाल महावीर श्री प्रकाशन दुर्ग 2001 
4 छायावाद और पं.मुकुटधर पांडेय  पृ 20 डाॅ. बल्देव 
5 छायावाद और पंं. मुकुटधर पांडेय पृ 149 डाॅ बल्देव 
6 मुकुटधर पांडेय व्यक्ति एंव रचना पृ 411 संपा . अग्रवाल महावीर श्री प्रकाशन दुर्ग 2001
7 मुकुटधर पांडेय  व्यक्ति एंव रचना पृ 419 संपा अग्रवाल महावीर श्री प्रकाशन दुर्ग 2001 

8 मुकुटधर पांडेय व्यक्ति एंव रचना पृ 414 संपाद अग्रवाल महावीर श्री प्रकाशन दुर्ग 2001 

9 मुकुटधर पंडेय की काव्ययात्रा - डाॅ. देवीप्रसाद वर्मा पृ 94 साहित्यवाणी इलाहाबाद 2006

10 छायावाद और पं. मुकुटधर पांडेय पृ 183 डाॅ बल्देव वैभव प्रकाशन रायपुर 2003 
       
    डाॅ. अनिल कुमार भतपहरी 
          ( 9617777514)
              सी - 11/ 9077 ऊंजियार - सदन सेंट जोसेंफ Serv अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़  4920001