Saturday, January 30, 2021

होरी गीत

खंधो लव रे अपन गड़ी 
नाचे बर रिलो बार 
नेवता करमा के झारे झार 
ये दे आवत हे फागुन तिहार ...

गाना गवैया अउ बाजा बजैया 
अनिल सरीख कोनो गीत लिखैया 
खंधो लव रे आवत हे फागुन तिहार ...

आमा म उरे अउ परसा फूलगे 
म उहा कुचियागे सेमर फूलगे 
देह ल सजा लव रे अपन घर दुवार ...

फुल डोहड़ी मन सब  छतरागे 
कहर -महर महके भौरा झुमरे 
मन मतावय रे जवानी के चढे झार...

Thursday, January 28, 2021

इस गणतंत्र में ...

इस गणतंत्र में 

चंद क्रुरतम फैसले अंग्रेज  तानाशाह द्वारा हुए भी हैं। उनकी आलोचना और सजा भी उनके मुल्क में होते रहे हैं। लायन आर्डर  हर सत्ताधारियों  के लिए आत्मरक्षक कम धातक अधिक होते रहे हैं।  
       ओवर आल वे हम पर राज करने आए और हमारे लोग ही उन्हें राज करने अवसर दिए।
      हमें अपनी कमजोरी दूर करना चाहिए न कि सारे दोष उनपर मढकर पुनश्च तथाकथित प्राचीनतम प्रथाएँ जो अमानवीय रहा हैं को परंपरा के नाम पर ढोते रहें।
    यह तो सच है कि गुलामी का सोना आजादी की मिट्टी के समक्ष कुछ भी नहीं । (बावजूद अंग्रेजी सत्ता की प्रशंसा बडे बुजुर्ग आज तक करते हैं कि इससे अच्छा तो वही थे।)
पर आजादी से पुनश्च स्वेच्छाचारी व जिसकी लठ्ठ उनकी भैस न हो जाए।
देश वर्तमान समय में लठ्ठ यानि पूंजीवाद व नीजिकरण की ओर बढ़ रहा हैं। जो आगे चलकर आत्मघाती कदम होगा। क्योंकि यह देश आरंभ से राज -रजवाड़ों की  एक तरह से पूँजीवाद ही रहा है। जहां बहुसंख्यक जनता पशुवत जीवन जीने बेबश थे। शुक्र हैं आजादी के बाद उन रजवाड़ो का उन्मूलन कर संविधान के बनिस्बत कुछ बेहतरीन हो रहे हैं।  पर चंद  सुविधाभोगियो व नव धनाढ्यों  को यह सब अच्छा नहीं लग रहा है। इस तरह की निकृष्ट मानसिकता देश के लिए अच्छा नहीं है। देशप्रेमियों को इनकी ‌चिन्ता कर प्रभावी प्रतिकार करना चाहिए।    
    अंग्रेजों के ऊपर दोष मढकर बला टलना नहीं चाहिए और न ही जो ज्वलंत मुद्दा है उसे डायवर्ट करना चाहिए ।
       इस गणतंत्र में आम नागरिकों को और अधिक सक्षम बनाने की जरुरत हैं ताकि देश सुदृढ़ व सक्षम हो।चंद राज + पाट  व उद्यम करने वालों के लिए यह देश नहीं हैं। वे अपनी अपनी  योग्यता व आवश्यकतानुरुप ही संप्रभुता उपभोग करे न कि देश विदेश में ऐशो आराम करते करोड़ो -अरबो गटरमश्ती करते  फूके ! जिसके कारण   लाखों- करोड़ो  लोगों को फ़ाकामस्ती करते जीवन यापन करना पड़े ।
              आय की इस तरह की बढ़ती विकराल खाई को पाटना  कृषि सुधार व कृषकों का हित साधन को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए क्योंकि अब भी 75%80 जनता इससे सीधे जुड़े हुए हैं।  देश में धर्मनिरपेक्ष स्थिति को कायम रखना युवा पीढ़ी को रोजी -रोजगार उपलब्ध कराना शिक्षा स्वास्थ्य को सुदृढ़ करना ही प्रथम ध्येय होना चाहिए।  

      -डाॅ अनिल भतपहरी   9617777514

Thursday, January 21, 2021

"सतनाम एक विशिष्ट संस्कृति व जीवन पद्धति हैं"

"सतनाम एक विशिष्ट संस्कृति व 
जीवन पद्धति हैं।"

    सतनाम आध्यात्मिक रुप से अन्तर्यात्रा हैं।  सदाचार अपनाकर जीवन में सुचिता और परस्पर मानव समुदाय में सद व्यवहार करते समानता स्थापित करना ही सतनाम का प्रमुख ध्येय हैं।  
आन्दोलन तो स्वतंत्रता आन्दोलन ,नारी मुक्ति आन्दोलन नशा मुक्ति आन्दोलन, मान सम्मान रक्षार्थ  आन्दोलन जुल्म सितम के विरुद्ध आन्दोलन या  मजदूर  श्रमिको का हक अधिकार हेतु आन्दोलन होते हैं। 
  सतनाम आन्दोलन ये नये गढे गये जुमले है। और इसके द्वारा जनमानस को दिग्भ्रमित भी किए जा रहे हैं।
 सतनाम आत्मबल और भीतर का यात्रा हैं। जिसके द्वारा धर्म -कर्म में व्याप्त रुढिवाद, अंधविश्वास और कर्मकांड व पुरोहिती का विरोध और उनके स्थान पर सहज योग साधना और सद्कर्म करते जीवन निर्वाह  करते खान- पान ,रहन -सहन ,जुआ ,शराब ,मांस ,मदिरा ,नारी सम्मान  कृषि कर्म एंव पशु प्रेम का मार्ग हैं।
 नाहक इस संस्कृति और धम्म को आन्दोलन कहकर इनके व्यापाक और उदात्य भावार्थ को संकुचित और सीमित किए जा रहे हैं। बिना बुद्धि लगाए बस सतनाम आन्दोलन सतनाम आन्दोलन कह रहे हैं।
  क्या सतनामी आन्दोलन कारी है। नारे बाजी करने वाले और अशान्ति फैलाने वाले कौम हैं?
   शब्दों के  वास्तविक अर्थ और भावार्थ को समझ कर  समकालीन समय में किन परिस्थितियों में हमारे गुरुओ संतो महंतो ने इस सतनाम संस्कृति को बचाकर संजोकर यहाँ तक लाए वह प्रणम्य है। 
  वर्तमान समय में सतनाम संस्कृति में चलकर बडी उपलब्धि हासिल करते सरल  जीवन यापन करते  सुकुन व  शांति हासिल एक बेहतर भविष्य आने वाले संतति को देना है। कल्पित स्वर्ग मोछ आदि के जगह अपने आसपास स्वर्ग सम वातावरण बनाकर पद निरवाना या परमपद अर्जित करना है।
  यदि आन्दोलन आदि होते तो गुरुबाबा  के सिद्धान्त और उपदेश तथा पंथी मंगल भजनो में  आन्दोलन करने के तौर तरीके वर्णित होते ।मोर्चा सम्हालने और कथित जुल्मो के लिए जुल्मियो को दंडित करने के तरीके और कुछ सफल आन्दोलन के वृतान्त होते पर दुर्भाग्यवश आन्दोलन आदि के कोई गीत भजन वृतान्त नही है।
  और तो और सतनाम संस्कृति में आन्दोलन कारी नही नजर आते बल्कि साधु संत उपदेशक भजन संकीर्तन पंथी करते संत सदृश्य पंथी हार नजर आते हैं। 
  और अपने जीवन में जो चीजे हैं। या विरासत में या अपने परिश्रम के एवज में जो मिला उससे संतुष्ट और सुखी समाज नजर आते हैं।
  इसलिए इस महान सतनाम संस्कृति में अनेक जातियाँ सम्मलित हुए।कुछ हद तक सतनाम प्रचार के अभियान आन्दोलन सदृश्य जरुर रहे हैं। पर यह सतनाम जागरण का एक अंग मात्र हैं। 
  एक प्राचीन पंथी गीत का स्वर और भावार्थ देखिए- 

 खेले बर आए हे खेलाए बर आए हे 
   दुनियां  म सतनाम पंथ ल चलाए हे 
      मनखे  मनखे ल एक गुरु ह बताए हे 
             चारो बरन ल एक करे बर आए हे 
       सन्ना हो नन्ना नन्ना  हो ललना 
                 सन्ना ना रे नन्ना नन्ना हो ललना 
  सना नना नना हो नना हो ललना ..
 ‌     क्या यह आन्दोलन है?या सांस्कृतिक नवजागरण हैं।या उदात्य सतनाम संस्कृति हैं।आन्दोलन कहने समझने वाले  स्वत: निर्णय करे। 
  ‌‌‌      सतनाम 

-डा अनिल भतपहरी

Wednesday, January 20, 2021

सतनाम पंथ के गुरु का प्रथम रियल कैमरा फोटोग्राफ

।।सतनाम पंथ के गुरु का प्रथम कैमरा  फोटो‌ ।।

जर्मन लेखक व फोटोग्राफर जे जे लोहर ने १८वी सदी  पूर्वाध( १८६० के आसपास ) में सी पी एंड बरार में परिभ्रमण कर    समकालीन समय में अपनी फोटोग्राफी व सांस्‍कृतिक तथ्य एकत्र करने में सतनामियो को इतना महत्त्वपूर्ण समझ कर सुदुर देश से आकर यह कार्य किया ।
उनकी प्रसिद्ध फोटोग्राफ युक्त  पुस्तक " A few pictures cp and barar "  १८९९ मे प्रकाशित हुई । उसी पुस्तक मे सतनाम धर्म  के विशिष्ट "चरणामृतप्रथा" का चित्र संकलित हैं। इसमें सतनाम धर्म के गुरु जो सशस्त्र सेनानियो से धिरे श्वेत वस्त्रधारी दाढी मूंछ से युक्त राजसी तेज से युक्त है।  क ई लोग इसे राजा गुरुबालक दास तो कोई इसे राजा गुरु आगरदास कह बता रहे है ।इस रीयल फोटोग्राफ जो कैमरे से उतारी ग ई है से  भी सतनामियो के  वैभव और उनकी विशिष्टता का पता चलता है। 
  अंग्रेज़ अधिकारियों लेखक व बुद्धिजीवियों ने अपने स्तर परचीजे महत्व समाज को दिए वह निसंदेह गर्व करने लायक हैं। उन सबके प्रति सदाशयता समाज की ओर से प्रकट भी क रते है। परन्तु  बाद में  जब आजादी के आन्दोलनों की पृष्ठभूमि बने सवर्ण नेतृत्व सामने आने लगे तब  सतनामियो के प्रति एक गहरी खाई भी निर्मित होने लगी। 
   गुरुबालकदास की  हत्या (१८६०) के बाद समाज नेतृत्‍व विहिन हो गये।  ६०-६५ वर्ष बाद १९२०-२५  के आसपास गुरु अगमदास  रतिराम मालगुजार नयनदास महिलांग  अंजोरदास कोसले सहित ७२ संत महंत गण  समाज के नेतृत्‍व शुन्यता को भेदकर मुख्यधारा में आने समकालीन नेतृत्‍व के साथ समन्वय स्थापित करने में और देश को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए । 
      परन्तु यही नेतृत्व या समझौते आदि के कारण समाज पुनश्च उसी हिन्दूत्व की ओर गतिमान हो गये जिससे बचाकर एक अलग तरह के स्वरुप में गुरुघासीदास व गुरुबालकदास जैसे समर्थ धर्मगुरुओं ने संगठित किया था। आगे जब अस्पृश्य जातियों की अनुसूची में समाज को रख दिए तो यह स्वतंत्र पंथ से जाति बन ग ई यह और यही एक  जातिविहिन वर्गविहिन  उन्नत समाज का अधोपतन आरंभ हुआ।चंद सुविधाओ के लिए हमने अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक तत्वों से दूर भागते गये। राजनैतिक  विचारधारा व प्रतिस्पर्धाओ के कारण समाज में बिखराव होने लगा जो निरंतर जारी हैं।
  जो धार्मिक व आध्यात्मिक चीजे इन बिखराव को  रोक सकती हैं। उसे हमलोग आजतक न ठीक समझ पाए हैं। न उनका सही इस्तेमाल कर पा रहे हैं। इधर कुछ तथाकथित वैज्ञानिक  और स्थापित मान्यताओं के 
विरुद्ध जन भावनाओं  को उद्वेलित करने वाले शक्तियाँ भी एकीकरण होने नहीं देती।भले अन्यत्र कूट कूट कर मिथकीय  अंध विश्वास भरा हो वह वहाँ जाकर गौरवान्वित होंगे, मानने लगेन्गेऔर यहाँ अवहेलनाएं व हिकारत करेन्गे। 
।।सत श्री सतनाम ।।
  डा. अनिल भतपहरी ,रायपुर

Sunday, January 17, 2021

सत्थनाम

वैसे तो हिन्दी में सामान्यतः सत, सत्य, सच, सच्च का अर्थ यथार्थ ( true)  होता है.  परंतु छत्तीसगढ़ी, पाली या मागधी मे 
सत - सौ (100) 
सत्त-सात (7) 
सत्थ -बुद्ध, गुरु, शिक्षक
सत्थनाम- बुद्ध
सत्थनामी-बुद्ध के अनुयायी, 
सत्थनाम को बोल चाल उच्चारण मे सतनाम मान लिया जाता है. 

यदि यकीन न हो तो डिक्शनरी देख लिजिए.

Saturday, January 16, 2021

सतनाम -बौद्ध संस्कृति

सिरपुर मेरा गांव है पुरखों की जमीन व घर अब भी विद्यमान है।  प्राकृतिक विपदा के पश्चात  नदी के पार  जुनवानी बरछा गोटी डीह उजित पुर  में भट्टप्रहरी वंश आबाद हैं। हमारे कुल देवता नाग और ठेंघादेव यानि शस्त्र देव  हैं।  जो कि हमारे पूर्वजों के किलानुमा घर के सामने नीम पेड़ पर स्थापित हैं। जिसकी पूजा अर्चना ग्रामवासी करते हैं। हमारे खेतों खलिहानों में प्राचीन महलों घरों के ईट पत्थर बिखरे पड़े हैं। पुरातत्व के अन्वेषक आकर यह सब देख -समझ सकते हैं। सोलहवीं सत्रहवीं शताब्दी में परिक्षेत्र में बौद्ध संस्कृति प्रचलन में रहा है। ऐसा लोग कहते भी है।
  ( भट्टप्रहरी का अर्थ ही है राजवंश का शस्त्र धारक श्रेष्ठ रक्षक । अपभ्रंश में अब भतपहरी लिख रहे हैं। )
     गुरुघासीदास के गुरुद्वारा भंडारपुरी और सिरपुर महज १० कि मी हैं। जिसमें मध्य में हमारा ग्राम तेलासी जुनवानी हैं। यह दोनो ग्राम किलानुमा है ।तेलासी गढ़ तो जल दूर्ग ही हैं। जिसके मध्य में प्रसिद्ध  भव्यतम "सतनाम बाडा़" स्थापित है।  तपोभूमि गिरौदपुरी को सामंती आतंक के चलते  त्यागकर गुरुघासीदास बाबा जी यही आश्रय लिया हमारे पूर्वजों ने उसे बसाए हमारे गांव की पत्थरों व कारीगरों द्वारा ही  भव्यतम   मोती महल गुरुद्वारा बना।
   वहाँ के गुरुगद्दी आसन में पंच नाग फेन शिल्पांकित हैं। यह प्रसिद्ध लक्ष्मणी बुद्ध विहार ( लक्ष्मणदेवाला ) की बुद्ध प्रतिमा से ही प्रेरित है। ‌
क्योंकि पंच  नाग छत्र बुद्ध व सिद्ध महापुरुष जिनके कुंडली जागृत रहते हैं के ऊपर शिरोछत्र‌ होते   हैं।

बहरहाल  नीचे प्राचीन तथ्य पर ध्यान आकृष्ट कर 
वर्तमान सतनाम पंथ और प्राचीन श्रमण सत संस्कृति व बौद्ध धम्म पर अन्तर्संबंध स्थापित कर अध्ययन मनन चिंतन करे।
आर्यों और बुद्ध  पूर्व श्रमण सत  संस्कृति  में दो ही वर्ग थे ।  स्वामी और सेवक ।
   यह कोई भी हो सकता था। बुद्ध ने मझ्झिम निकाय में अस्लायन को संबोधित करते लिखा भी हैं।
    ऐतरेय में भी उल्लेख मिलता हैं सत्वंत प्रजाति जो न आर्य थे न द्रविड़ मध्यदेश के वासी प्रकृति पूजन श्वेत ध्वज वाहक हैं। 
    अत: सदवहन या सतवहन या सत्वंत लोग अरावली से सतपुड़ा तक सिन्धु से महानदी तक आबाद रहे हैं। यही मध्यदेश है जिनका जिक्र बुद्ध ने किया था जहां कोई जाति भेद नहीं था। और लोग सत्य विश्वास और परस्पर सहयोग से जीवन निर्वहन करते थे।
जो गुणवान व  बलवान होते थे वह सेवक और जो प्रमादी व कमजोर होते वह सेवक ।
  स्वामी और सेवक में भी सौहार्द भाव मिलते हैं।
 आज भी छत्तीसगढ़ के  गांवो में गौटिया मंडल सौजिया बनिहार में प्रेम विश्वास व सौहार्द भाव मिलते हैं। 
   जनजीवन में श्रमण सत संस्कृति का अवशेष दर्शनीय हैं। भेदभाव जात पात ऊच नीच यह आर्यन संस्कृति के सम्मिश्रण व प्रभाव से ही आया।
   छत्तीसगढ़ में यह माराठो भोसलों और उप बिहार मारवाड आदि   शरणार्थियों के कारण हुआ।

Friday, January 15, 2021

आव्रजन

"आव्रजन "

इन लोगों का काम है साहब 
चोरी और सीनाजोरी
चाहे वह संपदा चुराए या विचार
इधर वे लोग
जो संपदा या विचार ऊगाते है 
मुफलिसी में जीते 
रहते बेफिक्र निर्विकार
दु:ख तो तब है जब शातिर लोग
 उन्हें विचार विहिन कह 
उड़ाते है उपहास
बनाकर रखते आयें हैं 
जाहिल कृपण  दास 
शस्त्र,शास्त्र और आस्था से
अब निहत्थे -निरक्षर लोग 
विचार विहिन भेड़ सदृश 
समानता की पंगडडी 
चलते-चलते ही की  ईज़ाद  
तब मिटाकर कर उसे  बना रहे हैं 
ये लोग समरसता की राजपथ 
ताकि चल सके उपनिवेश की 
भारी वाहन  
सत्ता  की मद में होते रहे 
भव्यतम आव्रजन 
             - डां अनिल भतपहरी 
            रायपुर १६-१-२०१८