Friday, October 30, 2020

सतनाम महामंत्र

हंसा अकेला सतनाम- संकीर्तन में  

सतनाम-महामंत्र 

जो नर सुमरै नित सतनाम  
           जीयत पावै पद निरवान 
 जन्म धरै तो करो कर्म अच्छा 
      दु:ख न  पीरा हो जीवन सच्चा
खान-पान बेवहार हो पबरित
    अन खावै जल पीयय अमरित 
हिरदे सफ्फा मन रहे निश्चछल 
    तबहि पावै सुख सुन्दर सुफल 
सद्कर्म देव हिरदे मन धाम
        हिरदे भीतर बसै सतनाम
मान सम्मान सदा अजर-अमर 
       वंश विस्तार हो सेत -हरियर  
हंसा अकेला उड़ै सतलोक
    बहुरि न आवै कबहु मृतलोक 
जो नर सुमरै नित सतनाम 
     जीयत पावै पद निरवान ...

               - डां.अनिल भतपहरी

टीप - सतलोकी पिताश्री सुकालदास कृत पुनर्प्रकाशित सतनाम- संकीर्तन में संकलित स्वरचित  सतनाम महामंत्र जिसे नित्य आरती व  गुरुवंदना  में प्रस्तुत करते है।

Monday, October 26, 2020

कंठी तो फांसी भये ...

कंठी तो फांसी भये ,तिलक  भये  तलवार ।
  सतनाम महुरा भये ,जोत पीये चतुर सुजान‌।।

सतनाम पंथ में बहुप्रचलित  यह साखी उलट बांसी  हैं ।इनके अपने विशिष्ट अर्थ हैं। समय- समय पर साधक साधु संत व आचार्य गण इस संदर्भ में गहन मनन- चिंतन करते ही रहते हैं। सच कहे तो साधारण सा दिखने वाला कंठी तिलक कैसे फांसी और तलवार हो जाएगा और अमृतयमय सतनाम महुरा कैसे हो जाएगा ?यह गुढ़तम बातें उक्त उलटबांसी में अन्तर्ध्वनित हैं।
  सामान्यत:  गुरुमुखी जन साधारण  कनफुक्का गुरु से कान फूकाकर कंठी धारण करना और माथे पर चंदन तिलक लगाना  और नित्य सतनाम जपना इन लोगों के लिए  क्रमश: फांसी तलवार और महुरा यानि जहर की तरह हो जाते  है। सहजतापूर्वक मिथ्या व आडंबर से भरा संसार जीवन निर्वहन कठिन हो जाते हैं। इसलिए ऐसा कथ्य या मंतव्य चल पड़ा हैं।
   आधी -अधुरी जानकारियाँ और प्रतीकों के बिना सही उद्देश्य  जाने समझे  बगैर धारण करना मुस्किल ही नहीं संकट जन्य होते  हैं। 
यह संत और साधु वेष का प्रतीक हैं। इसे जल्दबाजी में या फैशन में  धारण कर लेने से  धारक के लिए फांसी तलवार व जहर की तरह कष्टदायक और हंसी के पात्र बन जाते हैं। जैसे लालची आमिष आहारी देखादेखी जोश में आकर सात्विक होने कंठी पहन लिए तो आमिष चीजों को देख ललचते रहेगा और पावन कंठी को फांसी समझ लेगा। तिलक उनके लिए तलवार सदृश्य हो जाएन्गे । इसी तरह झुठ फरेब से काम लेना वाला सत्यनिष्ठ होने की ढोंग करते ऊपर से ही  सतनाम सतनाम जपेगा उनके लिए वह विष की तरह हो जाएगा।
 
   चतुर सुजान तो वह है जो कंठी की फांसी (जैसे कि जन मानस कहते है ) तिलक की तलवार और सतनाम जो अमृत है (जन साधारण सच बोलके मरोगे क्या? कह) को  जहर कह लेते हैं, इसे बड़ी श्रद्धा व सहजता से धारण कर इनके जोत अर्थात् चमक/ तेज को पीकर बडे ही तेजस्वी हो जाते हैं।
जबकि कच्चे और अति साधरण लोग जल्दबाजी देखादेखी  या फैशन में पड़कर कठिनाई में फस जाते है ।उनके लिए कंठी , फांसी  तिलक तलवार,और सतनाम जो अमृत है वह जहर बन  जाते हैं।
     साधना और आचरण गत व्यवहार करके पहले काबिल बनना चाहिए ।संत वृत्ति व समदर्शी भाव जागृत होना चाहिए  तब इन प्रतीकों को धारण करे तभी इनकी महत्ता है । अन्यथा नादान और ना समझ के लिए यह क्रमशः फांसी तलवार और जहर ही है। इसलिए वे इनसे दूर रहते और भागते है।  
   यही इस उलटबासी साखी का असल भावार्थ हैं। 
     सतनाम
                     -डाॅ. अनिल भतपहरी

कंठी तो फांसी

कंठी तो फांसी भये ,तिलक  भये  तलवार ।
  सतनाम महुरा भये ,जोत पीये चतुर सुजान‌।।

सतनाम पंथ में बहुप्रचलित  साखी उलट बांसी  हैं इनके अपने विशिष्ट अर्थ हैं। 
  गुरु से कान फूकाकर कंठी धारण करना और माथे पर चंदन तिलक लगाना  और नित्य सतनाम जपना साधारण लोगों के लिए  क्रमश: फांसी तलवार और महुरा यानि जहर की तरह हो जाते  है। 
   आधी -अधुरी जानकारियाँ और प्रतीकों के बिना सही उद्देश्य  जाने समझे  बगैर धारण करना मुस्किल ही नहीं संकट जन्य होते  हैं। 
यह संत और साधु वेष का प्रतीक हैं। इसे जल्दबाजी में या फैशन में  धारण कर लेने से  धारक के लिए फांसी तलवार व जहर की तरह कष्टदायक और हंसी के पात्र बन जाते हैं। 
   चतुर सुजान तो वह है जो कंठी की फांसी (जैसे कि जन मानस कहते है ) तिलक की तलवार और सतनाम जो अमृत है (जन साधारण सच बोलके मरोगे क्या? कह) को  जहर कह लेते हैं, इसे बड़ी श्रद्धा व सहजता से धारण कर इनके जोत अर्थात् चमक/ तेज को पीकर बडे ही तेजस्वी हो जाते हैं।
जबकि कच्चे और अति साधरण लोग जल्दबाजी देखादेखी  या फैशन में पड़कर कठिनाई में फस जाते है ।उनके लिए कंठी , फांसी  तिलक तलवार,और सतनाम जो अमृत है  जहर बन  जाते हैं।
     साधना और आचरण गत व्यवहार करके पहले काबिल बनना चाहिए ।संत वृत्ति व समदर्शी भाव जागृत होना चाहिए  तब इन प्रतीकों को धारण करे तो महत्ता है । अन्यथा नादान और ना समझ के लिए यह क्रमशः फांसी तलवार और जहर ही है। इसलिए वे इनसे दूर रहते और भागते है।  
   यही इस उलटबासी साखी का असल भावार्थ हैं। 
     सतनाम
                     -डाॅ. अनिल भतपहरी

Saturday, October 24, 2020

तुरतुरिया

"बौद्ध तुरि साधना स्थली तुरतुरियां "

आध्यात्मिक साधना एंव योग सिद्धी मे" तुरि" अवस्था को अर्जित करने सुरम्य व एकांत वन प्रांतर अत्यंत उपयुक्त स्थल माने गये है। 
      इसलिए मध्य भारत में बौद्धमहानगरी सिरपुर के समीप तुरतुरिया नामक जगह में बौद्ध साधक तुरि साधना में लीन रहा करते थे। इसके कारण ही तुरतुरिया नाम पड़ा। 
 लोक मान्यता में  कलकल करती निर्झरणी भी प्रवाहित है जो तुर तुर की ध्वनि करती है इसलिए  तुरतुरिया कहते है। शाक्त मत में इन भिछुणियों की प्रतिमाओं को  देवी मानकर पूजने लगे है और मातागढ़ एक शक्तिपीठ के रुप में ख्यातिनाम है। वाल्मिकी आश्रम व लवकुश जन्म स्थल के नाम पर चर्चित पौष पूर्णिमा में यहां भव्य मेला लगता है।  
   बाहरहाल  यह सुखद संजोग है कि सतनाम धर्म संस्कृति में भी साधना और समाधि की संस्कृति प्रचलन में अब भी है।
एक  सतनाम साखी जो पंथी  मंगलभजन के पूर्व गाए जाते है  और वे छत्तीसगढ़ी में है उनमें ध्यान की इस तुरि अवस्था का जिक्र है - 
 लछ्य कोस म  गुरु बसे, सुरता दिहव पठाय।
  ग्यान तुरि असवार है,  छिन आवय पल जाय ।। 
                 विद्जन भावार्थ ग्रहण करे एंव सतनाम पंथ और बौद्ध धम्म में सहजयान की साधना पद्धति की साम्यता को समझे और आत्मसात करे।
 गिरौदपुरी  तुरतुरिया व सिरपुर एक ही परिछेत्र में महज २५-३० कि मी दायरे मे अवस्थित है ।
                    ।‌।सतनाम ।।
 चित्र - तुरतुरिया में स्थित बुद्ध व भिछुणियों की प्रतिमाएं जो यत्र तत्र बिखरे है में से कुछ  झोपड़ियों में शोभायमान‌ है।

Friday, October 16, 2020

जस गीत

मोर घर के अंगना मं फूले , रिगबिग चंदैनी गोंदा चुन चुन हार सिरजातेंव 
मइया के चरण मं सरधा के फूल चढा़तेंव ...
१
बड़ फजर सुत उठके करेंव नंदिया  असनांद 
करेंव नंदिया असनांद हो माया करेंव नंदिया असनांद 
धोवा के धोती सोनहर अलफी  चंदन सारेव माथ 
चंदन सारेंव माथ मं इया चंदन सारेंव 
झुमर झुमर तोर जस पचरा गातेंव ...

२ रतन पिंवरी चंपा चमेली फूल गोंदा छतनार ...
फूल गोंदा छतनार भवानी 

आमा अमली लिंबु माते , लटलट फरे अनार 
लटलट फरे अनार हो माया 
 टोर के फरहार करवातेंव ....
३
तोर नांव ले ले के मंइया, लहु  रकत बोहाथे 
मंद मउहा मं चुर अधरमी तोर अपजस  फैलाथे 
मयारुक ममता के दरसन करावातेंव ....

डाॅ. अनिल भतपहरी

मोती महल‌ गुरुद्वारा का निर्माण

#anilbtapahari 

।।सतनाम पंथ का विश्व प्रसिद्ध मोती महल गुरुद्वारा भंडारपुरी ।।

    इस भव्य स्मारक को गुरुघासीदास मंदिर के नाम से भी  जाने जाते हैं। इसे जीर्णोद्धार / नव निर्माण के नाम पर  तीन दशक पूर्व ढहा दिए गये हैं। वहाँ केवल ढाचा मात्र है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि  पुरी एक पीढ़ी इस गौरवशाली दृश्यांकन व दृष्टान्त से वंचित हैं । जब देश भर में महत्वपूर्ण स्मारकों का जीर्णोद्धार व अनेक नव आस्था के नवनिर्माण जारी हैं। तब इसके लिए 
 कुछ भी पहल या हलचल न होना बेहद चिन्तनीय हैं।  
    देश भर के लाखों- करोड़ों लोगों की श्रद्धा का केन्द्र इस ऐतिहासिक ईमारत कब अपनी पूर्व स्वरुप में स्थापित होगा? इसका उत्तर संभवतः किसी के पास नहीं हैं। 
               ज्ञात हो कि इसका निर्माण १८२०-३० के बीच गुरुघासीदास के निर्देशन में राजा गुरुबालकदास ने एक दृष्टान्त के रुप में करवाया था ताकि इनके अवलोकन मात्र से सतनाम धर्म संस्कृति की जानकारी जन साधारण को हो सके।  यहाँ से ही पुरे छत्तीसगढ़ और उनके बाहर सतनाम पंथ का प्रचार -प्रसार हुआ। देश के कोने -कोने से श्रद्धालु यहाँ आते और मत्था टेक कर अपनी धार्मिक भावनाओं का इजहार करते थे ।अनुपम ज्ञान प्राप्त कर कृतार्थ होते थे। दूर से दर्शन मात्र से गुरु उपदेशना का भावबोध होता था।  शिखर के चारों कोने पर तीन बंदर और गरजते हुए शेर का शिल्पांकन से युक्त  चौखंडा महल का नीचे भाग तलघर था। संपूर्ण प्रखंड वास्तु व  काष्ठ कला की अनुपम कारीगरी रही हैं । यह मानव जीवन के चारो अवस्था का शानदार व्याख्या था।पुरातत्त्व की दृष्टिकोण से अतिशय महत्वपूर्ण इस ईमारत का राजनैतिक उठापटक ,शासन -प्रशासन की अनदेखी और उचित  प्रबंधन के अभाव में यह जमींदोज हो गया जो कि  अत्यन्त दयनीय व दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति हैं। 
           छत्तीसगढ़ी संस्कृति की अस्मिता और ‌पुरे विश्व के मानव समाज को मानवता का संदेश देने वाली इस भव्य ऐतिहासिक  ईमारत की हुबहु प्रतिरुप में निर्माण अत्यावश्यक है।   
                इस पावन कार्य हेतु  गुरुदर्शन मेला  मे लाखों दर्शनार्थियों की उपस्थिति में प्रबंधन मंडल की ओर से उचित व सार्थक पहल करते हुए नव निर्माण की घोषणा होनी चाहिए।  खास तौर पर अनेक सामाजिक व धार्मिक संगठन है जो सतनाम धर्म संस्कृति के पैरोकार समझते हैं उन्हे चाहिए कि केवल जनप्रतिनिधी एंव गुरुवंशज ही उनके लिए उत्तरदायी नहीं है बल्कि उनके साथ साथ जन समर्थन व सहयोग  कैसे एकजुट हो ? इन पर गंभीरतापूर्वक चिंतन मनन व सकरात्मक  कार्य करें।
         जय सतनाम 
               
          -डाॅ. अनिल भतपहरी / 9617777514

Thursday, October 15, 2020

मय दानव का मायाजाल

मै की बिमारी फैले है
चारो तरफ चहुं ओर 
मै से हम हम से मै 
का हैं सब तरफ शोर 
आजकल का नहीं ,
यह रोग बहुत पुरानी हैं
मय दानव के मायाजाल से
भरी -पुरी कहानी हैं
मैं के कुनबे मिलकर
आपस में हम हुआ 
फिर जातिय संगठन
का उन्हे अहम हुआ 
मानवता पिसाती गई 
इनकी काली करतुत से 
तुष्ट भले वे हो अपनों में
पर मरते जन दारुण दु:ख से 
मैं के कारण ही सर्वत्र 
छल -छद्म  पलने लगा 
वर्ग संघर्ष शोषण दमन का
चक्र  चलने लगा 
उसी का विस्तार देखों
अब भी फल फूल रहा 
पर उपदेश कुशल बहुतेरे 
प्राय:इन के ही उसुल रहा ...
    -डॉ. अनिल भतपहरी