Monday, April 7, 2025

हस्तक्षेप

सड़क उकरेच ददा के 
जेमन उहचे डेरा डारे हे 
नाचत -कूदत रइथे
जुलुस तिहार मनाथे  

हम तो उहि दिन 
जेवनी ले डेरी गयेन
त मोटर म 
रेतावत बाचेन

का कहँव ये दे 
पुलुस धर लिस
रुपया पैसा नोहर हे
तभेच तो बेडागेन

हमन मनसे नोहन 
जिनावर संग राहत
सित्तो जंगल म 
जिनावर होगेन...

सुनब म आथे 
संसद सड़क होगे 
अउ सड़क संसद 
फेर हमन कहुँचों
हबरे नई सकन 

आजकल तो सर्कस 
घलाव नंदागे 
मोगली टार्जन
चेंदरु तको हजागे

येती पंडुम ओती बम 
रिलो बार उजरगे
आँगा कछान
जात्रा मड़ई झरगे

पहाड़ ओदरत हे
जंगल उजरत हे 
अगास म मैना नहीं
लोहा चिरई उड़त हे.


धर्म नहीं पंथ ही उत्कृष्ट और व्यवहारिक हैं.

#anilbhattcg 

धर्म नहीं पंथ ही व्यवहारिक और सर्वोत्कृष्ट है.
आजकल  हिन्दू मुस्लिम बौद्ध ईसाई धर्म के स्थान पर मानव धर्म की बातें की जा रही है. जो कि
किसी के साथ " धर्म " शब्द लगना अव्यवहारिक है. 

.   असल में  भारतवर्ष में  व्यक्ति के लिए "धर्म " कभी रहा ही नहीं वह शैव शाक्त वैष्णव  जैन,बौद्ध  धम्म,मत पंथ ही था जिसे 100-150 वर्ष ही हुए है भारतीयों के लिए  (बौद्ध धर्म को क्योंकि यह देश में जमीदोज हो चूका था इसलिए इसे छोड़कर डॉ अम्बेडकर नें उसे 1956 में पुन:प्रवर्तन किया) सभी मत पंथ आदि जिसमें आदिवासी भी हैं को सामूहिक रुप सें "हिन्दू "कहें गये और उसे ही धर्म मान लिए गये !  जबकि  हिन्दू शब्द स्थान बोधक हैं  यह शब्द किसी भारतीय  भाषा में भी नहीं हैं न ही धर्मशात्र में  हैं. मुस्लिम मजहब हैं,ईसाई रिलीजन हैं.

.  खैर बात  धर्म शब्द की हैं जैसे धर्म किसी वस्तु या व्यक्ति या प्राणी में मिलने वाली  गुण- अवगुण प्रवृत्ति उदा. पानी का शीतल, आग का तपिश, हवा का बहना, धातु का कठोर,शेर का हिंसक मांसाहारी , गाय शाकाहारी, सांप का विषैले होना आदि है जिसे वह अपने में धारित कर रखा है वहीं उनका धर्म हैं . इस तरह यह मनोवृत्ति सूचक धर्म शब्द, पंथ के आगे का हैं या एक धर्म में अनेक मत पंथ की बातें तो और भी अधिक अव्यवहारिक व अप्रसांगिक हैं.तो स्थान बोधक हिन्दू हिन्दूस्तनी भारतीय  या अमेरिकी या पाकिस्तानी धर्म कैसे हो जाएगा? 

असल में समुदाय के मत मजहब पंथ  रिलीजन प्रणाली पद्धति लिखित /अलिखित होते है जिसके अनुरुप जीवन निर्वाह किए जाते है.यह परिवर्तनीय और ऐक्छिक भी है.
नाहक धर्म जो गुण अवगुण आदि को इन के साथ मिलाकर भ्रम फैलाये गये है. धर्म शब्द को व्यक्ति के सामूहिक पहचान के प्रयोग में लाना ही नहीं चाहिए इसे प्रतिबंधित भी कर देना चाहिए.क्या गाय हाथी शेर चींटी मछली चिड़िया जैसे प्राणी और पेड़ फूल टेबल टीवी मोबाईल कार बाइक आदि का कोई  मत पंथ  है? नहीं उनके गुण होते जिसे वह धारित किए होते है.ठीक मनुष्य भी अच्छे बुरे गुण को अन्य प्राणियों की तरह धारित करते है. तो नीरा मनुष्य नामक प्राणी का धर्म हिन्दू मुस्लिम सीख ईसाई आदि क्यों? 
.   हाँ वह समूह में रहता है तो उस समूह समुदाय का मत पंथ मजहब रिलीजन जरुर होते है. उसे ही हम उक्त नाम सें और उनकी कुछेक क्रियाये वेशभूषा आदि सें पहचाने जाते है.बाहरहाल मत पंथ भी गुरु घासीदास जी के कथनानुसार होना चाहिए -

"अवैया ल रोकन नहीं जवाइयां ल टोकन नहीं."

जबरिया किसी पर  मत पंथ विचार को थोपने और जो है उसे जबरिया उनमें बांध कर रखने की आवश्यकता भी नहीं. क्योंकि यही सब चीजें ही सारी फसाद की जड़ है.
परम सत्य ही इस तरह भ्रम जाल और अज्ञानता रूपी तमम को काट कर  ज्ञान का आलोक फैलाते है.

. इस तरह विचार करें तो मनुष्य के लिए  धर्म सें अधिक  पंथ ही उत्कृष्ट और व्यवहारिक है.जो सतत प्रवाह मान और जीवंत या बुद्ध की वाणी में कहें तो " एतो धम्मों ( पंथ  )  सन्नतनो " है. अर्थात जीवन जीने यह धम्म या मार्ग सनातन हैं.
.    सनातन शब्द यहॉं विशेषण हैं जो धम्म मत पंथ की विशेषता को व्यक्त करते हैं. अतः ज्ञानियों प्रज्ञावानो विचारकों को चाहिए कि देश और समाज  में  पंथ मत और धर्म की वास्तविकता को जनमानस को अवगत करावें और उन्हें अनेक तरह के भ्रम और सड्यंत्र सें सावधान भी करावें. ताकि इस उपमहाद्वीपिय महादेश मे विविधतापूर्ण संस्कृति अक्षुण बनी रहें और परस्पर सदभाव और सौहार्द सें अमन चैन क़ायम रहें.

. डॉ अनिल भतपहरी / 9617777514

Saturday, April 5, 2025

सतनाम सदग्रन्थ का आयोजन

संपादकीय 

सतनाम सदग्रन्थ का आयोजन और उनका सामाजिक प्रभाव 

 सतनाम धर्म संस्कृति एक तरह सें उत्सव धर्मी संस्कृति हैं.जहाँ वर्ष भर कार्यक्रम चलते रहतें हैं.मानव समुदाय में जो विषमताएं  और अभाव ग्रस्त जीवन हैं उनमें  यही सांस्कृतिक आयोजन की समता और सभाव को भरता हैं फलस्वरूप सुखी और संतोषप्रद जीवन जी पाते हैं.
सोचिये आज सें 50-60 वर्ष पूर्व कितनी असुविधाएं और कष्टमय जीवन रहा फिर भी हमारे परिजन बिना बिजली सड़क स्कूल अस्पताल नदी में नाव के सहारे जीवन व्यतीत किया. इन सबके पीछे गाँव -गाँव में गठित बाल समाज,  तीन तरिया भजन, निर्गुण भजन,  पंथी दल, चौका आरती,पंडवानी,रहस बेड़ा, सतनाम संकीर्तन, गुरु घासीलीला मंडली, आल्हा, भरथरी, गोपीचंद,ढोला मारु जैसे गीत भजन गाथा गायन का अनुष्ठानिक और मनोरंजनिक कार्यक्रम रहा हैं.
 खेतों खलिहानों  के  कठोर श्रम को हरने शारीरिक और मानसिक पीड़ा का शमन करने इस तरह के आयोजन करते थे. तब समाज सुगठित और संत,महंत पंच पटेल न्याय कर लेते थे. पुलिस थाने कोर्ट कचहरी का हस्तक्षेप नग्नय या कम था.  आपराधिक प्रवृत्तियाँ जुआ शारब   नशे पान मांसाहार जैसे व्यसनों सें  समाज कोसो दूर होते थे. और यदि किसी के प्रति जानबा होते तो दण्डित होते थे.अनेक ऐसे महंत गुरु थे जिनका प्रभाव  व्यापक स्तर पर था.नैतिक स्तर बहुत ही उच्च होते.सादा विचार और उच्च जीवन ही जीवन का ध्येय था.परन्तु आज गाँवों में यह सब बुराइयां जड़ जमा चूके हैं. और लोगों का जीवन स्तर रूपये कमाने और पर्याप्त आय के बाद भी निम्नतर होते जा रहें हैं.टीवी वीडियो के आने ख़ासकर मोबाईल आने सें सांस्कृतिक आयोजन लगभग खत्म सा हो गये. गाँवो का सामाजिक उत्सव और आयोजन खात्मे की ओर हैं.अब उँगुली में गिने जाने वाले गाँव बचे हैं जहाँ पंथी दल या कोई कला मंडली होंगे.लगभग सभी चीजें व्यवसायिक हो चले हैं और सेवा समर्पण कम होने लगे हैं. 
 एक समय शहर धोखा धड़ी चोरी उठाई गिरी छल प्रपंच के अड्डे थे वह सुविधाओं और सुकून का जगह बन गये हैं.ऐसा क्यों हुआ? इन पर विचार करने की जरुरत हैं.लोग अपना  एकड़ में खेत बेचकर शहरों में 500/700 फ़ीट का लाखों में घर खरीद कर फ्लेट लेकर ख़ुशी और समृद्धि की मृग मरिचिका तलाशते शहरों,क़स्बों में भटक रहें हैं.शिक्षा स्वास्थ्य के निजीकरण हो जाने और प्रतिस्पर्धा के युग हो जाने सें अंधी दौड़ में सब शामिल हो बिना मंजिल तय किए भाग रहें हैं.
.  ऐसे में विगत कुछ वर्षों सें समाज में सदग्रंथ आयोजन सतसंग प्रवचन का 3-5-7  दिवसीय सुविधाजनक आयोजन समाज को पुनः सामाजिक उत्सव की ओर ले जाने और नई पीढ़ी के लोगों में सामाजिक और धार्मिक भावनाओं का बीजारोपण करने का उपक्रम अत्यंत सराहनीय हैं.
समाज में राजनैतिक चेतना गुरुघासीदास के समय सें ही रहा जब उन्होंने अपने सुपुत्र गुरु बालकदास को राजा बनवाया.अनेक संत -महंत को जमींदारी मिली. कलांन्तर उन्ही महंतों में सें 72 संत महंत गुरुआगमदास और राजमहंत नयनदास महिलाँग के नेतृत्व में 1915 में गोरक्षा आंदोलन चलाकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े. दूसरी ओर मन्त्री नकुल ढीढी एवं महंत नंदूनारायण भतपहरी मिलकर गुरु घासीदास जयंती के माध्यम सें सामाजिक क्रांति की शंखनाद  अनगिनत लोग जेल की यन्त्रणा सहे और आत्म न्योछावर किए.फलस्वरूप देश को आजादी मिली. शिक्षा और रोजी रोजगार मिले शहरों में बसते गये सत्ता में थोड़ी बहुत सहभागिता मिली. पद -प्रतिष्ठा का मोह बढ़ा तो अनेक दलों में बिखराव होने लगे.  फिर  सचेतक समाज नेतृत्व शून्य हो राजनैतिक रुप सें इस्तेमाल होने लगा.  लोगों में राजनैतिक चेतना बढ़ती हुई दीखता तो हैं पर यह दिशाहीन हैं.इसके कारण बड़ी तेजी सें समाजिक ताने- बाने बिखरते जा रहें हैं. सांस्कृतिक चेतना की दिशा में काम नहीं हो पाने सें नैतिक स्तर में गिरावट आना शुरु हुआ. अतः उन्हें रोकने और नई पीढ़ी को दिशाबोध करने कराने हेतु सदग्रंथ समारोह, सांस्कृतिक जागरण और बौद्धिक क्रांति लाने की दिशा में क्रन्तिकारी पहल हैं.
विचारवान लेखक कवि कलाकारों का साझा सम्मेलन और उनके सम्बोधन प्रबोधन काव्य प्रस्तुतियाँ विचार विमर्श इत्यादि आगे चलकर समाज में नई इबारत लिखेगा ऐसी उम्मीद हैं.इसलिए इस तरह के आयोजन सर्वत्र हो इस दिशा पर हमारे आयोजकों, संगठनों और राजनायिको को सार्थक पहल करना चाहिए. 

असम प्रान्त में मिनीमाता जन्म स्थल चिकनी पथार, दौलगांव में नवनिर्मित मिनीमाता स्मृति भवन के लोकार्पण पर एक वृहत राष्ट्रीय सतनामी सम्मेलन सम्पन्न हुआ.
3 एवं 5 दिवसीय सदग्रंथ आयोजन का सिलसिला भी खरोरा,रहंगी सहित पलारी बलौदाबाजार सहित अनेक क्षेत्रो में हो रहें हैं समाज प्रमुखो और महापुरुषों की जयंती समारोह भी हो रहें हैं.बोडसरा धाम मेला गरिमामय सम्पन्न हुआ.  सतनामी समाज में बलौदाबाजार जिला एक तरह गुरु घासीदास धाम यानि बाबाधाम के नाम विगत कई सालों सें लोगों के जुबान में चढ़ चूका हैं वह नाम शीघ्र शासन प्रशासन के जुबान सें उच्चरित होंगे और इस तरह के रचनात्मक आयोजन  शासन प्रशासन के सहयोग सें समाज को नई दिशा मिलेगी और सुनियोजित ढंग सें  नशा  मांसाहार और साम्प्रदायिक गतिविधियों में हमारे युवजनो की बढ़ती रुझान या इस्तेमाल को यथा संभव रोक पाएंगे इस उम्मीद के साथ यह अंक समाज को सादर सम्पर्पित हैं.

जय सतनाम 

डॉ अनिल कुमार भतपहरी / 9617777514
ऊँजियार सदन अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़

Saturday, March 29, 2025

विनोद कुमार शुक्ल और उनकी रचनाएँ

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विनोद शुक्ल जी और उनकी रचनाएँ 

.     सरल शब्द विन्यास और कविताएं सर्व साधारण के लिए होते हैं जैसे मंचीय कवि एक साथ हजारों तक अपनी बातें पहुंचा कर मनोरंजन और ज्ञानार्जन भी करा देते हैं.हालांकि उन्हें कवि कम स्टेण्डप कामेडियन कहना अधिक न्याय संगत हैं जैसे के.के. नायकर, राजू  श्रीवास्तव,जानी लिवर,शेखर सुमन इत्यादि. 
परन्तु  कवि विनोद शुक्ल जी  की शब्द विन्यास और कविताएं सरल होते हुए भी उनमें विशिष्ट भाव व्यंजित होते हैं, उसे समझने के लिए समझ की जरुरत पड़ती हैं.सर्व साधारण के लिए यें नहीं जान पड़ते. इसलिए उनकी कविताएं मंच के अनुकूल नहीं बल्कि क्लास रुम के लिए हैं.

शुक्ल जी की हस्ताक्षर नुमा  उनकी प्रसिद्ध कविता देखिये क्या इसे किसी गणेश, नवरात्रि  या  मेले- मड़ाई के मंच सें पढ़ी जा सकती हैं? 

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था 
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था। 
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया 
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था

इसलिए उनकी कविताएं सरल होते भी आसानी सें समझ न वाली भाव सें अनुगुंफित हैं उसे वेद उपनिषद की ऋचाओ, कबीर की उलट बासी या केशव की क्लिष्टता या गीतांजलि की रहस्यमी पंक्ति, अज्ञेय,मुक्तिबोध की असाध्य वीणा,अँधेरे मे जैसी कविताओं की तरह टीका या व्याख्या की जरुरत पड़ती हैं.

बहरहाल हम आधुनिक होने की कितना भी दम्भ भर लें पर 
21 वीं सदी मे भी  रंग लिंग जाति भेद भाव  मानव प्रजाति  मे किस तरह भयावह हैं यह  सुदूर बस्तर मे  देखें जा सकते हैं.जहाँ उनके लोगों सें इतर बाहरी आदमी चाहे वह उनके लिए ही व्यापार या  काम के हो कैसे वह शोषण और जुल्मादि को अंजाम देते हैं.
एक अकेली आदिवासी लड़की को
घने जंगल जाते हुए डर नहीं लगता
बाघ-शेर से डर नहीं लगता
पर महुवा लेकर गीदम के बाजार
जाने से डर लगता हैं

क्योंकि बाजार मे तरह तरह के लोग हैं और आज भी आदमी के लिए अजनबी आदमी ही सबसे बड़े दहशत का कारक हैं.चाहे स्त्री हो या पुरुष.

 उनकी कविता  'जंगल के उजाड़ में जरुरतमंद के घर जरुरत की चीजें आना कितना दुश्वार हैं बल्कि प्यासा कुआँ के पास जाना चाहिए जैसे नियम शर्त हैं और उसी आधार पर  जटिल कठिन जीवन जिसे सदियों सें लोग ढ़ोते आ रहें  हैं.चाहे गाँव हो या शहर.
कांदा खोदते खोदते 
भूख से बेहोश पड़े 
आदिवासी के लिए 
कौन डॉक्टर को बताएगा? 

इसका जवाब देते वे उपस्थित हैं-
जो मेरे घर कभी नहीं आएंगे' की कुछ पंक्तियां देखिए: 

जो मेरे घर कभी नहीं आएंगे
मैं उनसे मिलने उनके पास चला जाऊंगा
एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी
मेरे घर नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊंगा
कुछ तैरूंगा और डूब जाऊंगा

उफनती नदी का बिम्ब और प्रतिमान को समझे बिना क्या कोई उक्त पंक्ति का सहज अर्थ कर सकते हैं? और फिर क्या वे उफनती नदी देखें भी हैं? 

कविता की तरह ही हाथी पर बैठेंगे क्या? मे उनकी रम्य गद्य रचना देखिये - 
    
   
    रघुवर प्रसाद ऑटो का रास्ता देख रहे थे। दूर से रघुवर प्रसाद ने हाथी को आते देखा। रघुवर प्रसाद को लगा यहां खड़े होने से जैसे चार ताड़ के पेड़ दिखाई देते हैं। उसी तरह यहां खड़े होने से हाथी भी दिखाई देता है। फर्क इतना था कि ताड़ के पेड़ वहीं खड़े होते जबकि हाथी आता दिखाई देता था। आता हुआ हाथी सामने रुक गया। साधु हाथी की पीठ पर बंधी रस्सी के सहारे उतरा। रघुवर प्रसाद को लगा कि साधु पान की दुकान से तंबाकू-चूना लेने आया हो या चाय की दुकान पर चाय पीने। वह साइकिल की दुकान नहीं जाएगा। ऐसा नहीं था कि हाथों के पैर की हवा निकल गई हो। हवा भरवाने की उसको मंशा नहीं होगी। साधु तंबाकू मलता हुआ रघुवर प्रसाद के पास खड़ा हो गया।
.   कोई कह भी सकता हैं कि हाथ पैर की हवा निकल गई बाल सुलभ सा वर्णय क्यों? 
और अंत मे क्या सचमुच कवि और हम सब आदमी या मनुष्य को जान समझ पाए हैं?

जो कुछ अपरिचित हैं
वे भी मेरे आत्मीय हैं
सब अत्मीय हैं
सब जान लिए जाएँगे मनुष्यों से
मैं मनुष्य को जानता हूँ।

तब एक ही रास्ता बचता हैं संतो की तरह पारस सम समदर्शी हो जाना. वो बधिक के लोहे के कटार और मंदिर के लोहे की घंटे को भी सोना बनादे. सबसे प्रेम  करो भले आपसे कोई करें न करें. सबको आत्मीय समझो पर आजकल कौन  हैं जो सबको ऐसा समझ रहें  हो?

.     भले सर्व साधारण की बातें उनकी रचनाओं में शामिल होते हैं.पर बिम्ब और प्रतिमान उन्हें असाधारण कर देते हैं.जैसे चेंदरु जंगल का लड़का हैं वन्य पशु पक्षी के सहचर हैं पर यही फिल्मांकित होकर असाधरण हो गये.या वन कन्याये महुये की टोकरी उठाई किसी पेंटिंग में बेशकीमती हो जाती हैं.

बहरहाल  शुक्ल जी मुक्तिबोध परम्परा के कवि हैं और उन्ही की तरह नये बिम्ब,प्रतिमान सें युक्त उनकी कविताएं प्रेरक, उदात्य और अकादमिक स्तर का हैं इसलिए उन्हें ज्ञानपीठ मिला हैं. हम जैसों का सौभाग्य हैं कि उन्हें छात्र जीवन सें अब तक उन्हें देखने,सुनने और समझने का अवसर मिलते रहा हैं.

 कविवर को बधाई एवं स्वस्थ, सुखी रहने हेतु मंगलकामनाएं

डॉ अनिल भतपहरी / 9617777514

Thursday, March 20, 2025

धर्म नहीं मत पंथ महत्वपूर्ण हैं

मानव के साथ हिन्दू बौद्ध जैन मुस्लिम ईसाई धर्म लगना भी अव्यवहारिक है.
असल में इस नाम सें कोई धर्म रहा नहीं न ही रहना चाहिए..हाँ यह सब मत धम्म पंथ मजहब रिलीजन मात्र हैं जिसे धर्म का पर्याय मान लिए गये हैं या माना जा रहा हैं जोकि गलत हैं.
धर्म किसी वस्तु या व्यक्ति या प्राणी में मिलने वाली गुण- अवगुण प्रवृत्ति है जिसे वह धारित कर रखा है.
असल में मानव समुदाय के मत मजहब पंथ  रिलीजन प्रणाली पद्धति लिखित /अलिखित होते है जिसके अनुरुप जीवन निर्वाह किए जाते है.यह परिवर्तनीय और ऐक्छिक भी है.नाहक धर्म जो गुण अवगुण आदि को इन के साथ मिलाकर भ्रम फैलाये गये है. धर्म शब्द को व्यक्ति के सामूहिक पहचान के प्रयोग में लाना ही नहीं चाहिए इसे प्रतिबंधित भी कर देना चाहिए.क्या गाय हाथी शेर चींटी मछली चिड़िया जैसे प्राणी और पेड़ फूल टेबल टीवी मोबाईल कार बाइक आदि का कोई धर्म है? तो नीरा मनुष्य नामक प्राणी का धर्म क्यों? हाँ वह समूह में रहता है तो उस समूह समुदाय का मत पंथ मजहब रिलीजन जरुर होते है.
मत पंथ भी गुरु घासीदास जी के कथननुसार होना चाहिए -
अवैया ल रोकन नहीं जवाइयां ल टोकन नहीं. जबरिया किसी पर थोपने और जो है उसे जबरिया बांध कर रखने की आवश्यकता भी नहीं.

Wednesday, March 19, 2025

सतनाम रावटी दर्शन यात्रा

#anilbhattcg 

सतनाम रावटी दर्शन यात्रा 

सतनाम रावटी नौ धामों का हुआ दर्शन ।
कृपा सद्गुरु की पाकर मन हुआ पावन।।
इन रमणीय जगहों पर किया गुरु ने रमन ।
जन को‌ नाम-पान देने इनका किया चयन ।।
करे सभी नर-नारी इन पावन धामों का दर्शन।
मिले सुख शांति उन्हे अरु हो धन्य यह जीवन ।।

                  ।।सतनाम ।।
          डा. अनिल भतपहरी
नौ सतनाम रावटी धाम निम्नवत है - 
१ चिरईपदर २ दंतेवाड़ा ३ कांकेर ४ पानाबरस ५ डोंगरगढ़ ६ भंवरदाह गंडई ७ भोरमदेव ८ रतनपुर ९ दल्हापहाड़ अकलतरा ।
      इ‌न जगहों पर परिजन व इष्टमित्र सहित चारो धाम या हज यात्रा सदृश्य परिभ्रमण करना चाहिए ताकि सतनाम धर्म संस्कृति का सर्वत्र व्यापक प्रचार प्रसार हो सकें नई पीढ़ी इन ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों के बारे में वास्तविक रुप सें जान - समझ सकें।

Monday, March 17, 2025

सहोदरा जस पचरा

माता सहोदरा झांपी दर्शन मेला के पावन अवसर मं 

माता सहोदरा पचरा 

पिता गुरुघासीदास माता तोर हे सफरा 

जोर जस गावन सुघ्घर माता सहोदरा 

दाई ददा के दुलौरिन बेटी तहु सतधारी 
दुनो कुल के नाव रोशन करे शक्ति नारी 
दु मन आगर गावन तोरेच जस पचरा ...

ससुरार सुकली गांव बुधु देवान घर 
बसाए कुट कुट के कुटेला गाँव जबर 
हांका परगे दसकोसी मनखे बड़ अचरा ...

जुलुम रोके सेती नारी जागरन चलाये 
होरी जराई बंद कराके मंगल भजन कराये 
अड़ताफ होवन लागे तोर अबड़ चरचा ...

बोड़सरा बाड़ा सिरजे अठगंवा सुख धाम 
जिहां चले तोर हुकुम शोर उड़े सतनाम 
 तोर महिमा अपरंपार माता सहोदरा 

भागवंती दाई सहोदरा तोर  महिमा हे अपार 
राखे जतन के झांपी गुरु खड़ाऊ अउ कंठ हार 
काचा कलश बारे करे जग म ऊजियारा ...

      -डा. अनिल भतपहरी