Wednesday, March 12, 2025

होरी सें होरा

#anilbhattcg 

होरा से होरी

ख़रीफ फ़सल आई घरद्वार
उससे मिली खुशियाँ आपार
प्रकृति में भी  छाई हैं  बाहर
युवा हृदय मे जगनें लगे प्यार
जगति तल में यही तो हैं  सार
प्रेम -रंग हीन यह जीवन बेकार

-डॉ. अनिल भतपहरी / 9617777514

https://www.facebook.com/share/1Hut3hfvLD/

Saturday, February 22, 2025

लोक नाट्य एवं नाचा गम्मत की दुर्गति

#anilbhattcg 

प्रदेश की समृद्ध नाचा गम्मत और नाट्यकला की दुर्गति 

छत्तीसगढ़ में अभिनय कला की समृद्ध परम्परा रहीं हैं.
संभवतः देश की सबसे प्राचीन नाट्य शाला सीता बेंगरा सरगुजा हमारे प्रदेश में हैं.जिसे कलात्मक ढंग से बनाये गए है. देखा जाय तो प्रत्येक बड़े ग्रामों में बड़ा चौरा होते थे जिस पर चाँदनी लगाकर ओपन थिएटर या opera hause जैसा रात -रात भर मनोरंजक और ज्ञान वर्धक  नृत्य गीत नाट्य अभिनय युक्त नाचा कार्यक्रम होते थे. हमारे खरीखा दाड़ विशाल एंटीबायटिक मैदान हैं जहाँ कबड्डी खोखो और करमा पंथी  सुआ जैसे सामूहिक नृत्य गान होते मड़ाई  जगाते रहस बेड़ा सजाते हैं.इस तरह से देखें तो हर गाँव में नाचा गम्मत के रूप में मनोरंजक और प्रेरक पंडवानी भरथरी आल्हा रसालू, बांस गीतों अहिमन,केवला,कुंवर अछरिया, लोरीकचंदा, बड़ी बड़ी कथानक हैं  रात रात भर चौदस पुन्नी में मंगल भजन साधु अखड़ा चौका आरती थे जिससे लोक जीवन  तमाम आभाव और साधन विहीन हो सुखी एवं समरिद्ध थे .लगभग 50 वर्ष पूर्व सुदूर ग्राम्य अंचल में हमनें ढोला मारु,शीत बसंत,दौना मांजर,चंदैनी से लेकर नाचा गम्मत में गुरु बटवारा,परीक्षा,अनेक प्रेम और सत्यकथा पर आधारित कौमिक कथाओ का मंचन दानी दरुवान, जेठू पकला, हीरा राजू चम्पा बरसन मते लखन कनकी,रायखेड़ा, फुडहर नाचा साज, चंदैनी गोंदा कारी चरणदास चोर,  एवं पिताश्री सतलोकी सुकाल दास भतपहरी के नवरंग नाट्य कला मंच से हाय रे नशा,राह के फूल,गवाईहा,मोला गुरु बनई लेते,चांदी के पहाड़ जैसे देखें और खेलते बड़े हुए हैं.1990 के  बाद TV वीडिओ वीसीआर,CD आने गाँव में नाचा / लोक मंच लगभग महगी बजट और अनेक तरह के झंझट के चलते खत्म हो गए.  छत्तीसगढी गीतों से सजी आर्केस्ट्रा लोक मंच पर चला पर tv ,video ki अश्लीलता  के चलते लोकमंच आर्केस्ट्रा में  द्वी अर्थी गीतों और फुहड़ता चलने लगा इसलिए भी राम -कृष्ण लीला,रामायण,भागवत कथाएँ जो उप बिहार से आयातीत  हैं इन सबका चलन बढ़ गया. सतनामयन कबीर सत्संग प्रवचन  भी चलने लगा. भले धर्म कर्म हो न हो पर इन्ही में अब मनोरंजन,भोग भंडारा आदि होने लगा और उत्सव धर्मी लोग इनमें उन्मत्त भी हो गए.इस तरह यहॉं की इस विशुद्ध लोकरंजन नाट्य गम्मत कलाएं के धार्मिक आयोजन नें जगह लें लिए हैं.आज सुविधाएं और आर्थिक समृद्धि के बाद भी निरुत्साह और व्यक्ति एकान्तिक तनाव ग्रस्त हैं.राजनीति द्वेष भाव और धर्म कर्म की प्रदर्शन में होड़ और प्रतिस्पर्धा नें तनाव ग्रस्त और दुःखी कर दिए हैं.सबकी होठों से निश्छल हसीं गायब हैं चंद शातिरों की कुटील मुस्कान और अट्टहास नें छीन लिए हैं.क्या इसी तरह सुखी एवं समृद्ध समाज और राष्ट्र बना पाएंगे?
.      देखें तो दुःख में कटटल के हसने हसाने का मौका देने वाले नाचा गम्मत और नाटक लगभग बिदा हो गए हैं.केवल शासकीय आयोजन में एक आधा घंटे के लिए प्रस्तुति रह गए और वे भी अनुदान के भरोसे से चल रहें हैं.कोई आयोजक नहीं और न ही कोई दर्शक श्रोता रह गए.मोबाईल नें सार्वजनिक प्रदर्शन कला को बुरी तरह खत्म कर दिए हैं. शासन  प्रशासन के साथ -साथ आयोजको सभा समितियों  और हमारे कलावंत बुद्धिजीवियों,रंगकर्मियों, लोक कलाकारों को प्रदेश की समृद्ध नाचा गम्मत,नाट्य रंगमंच को बचाने सार्थक पहल करना चाहिए.

डॉ अनिल भतपहरी / 9617777514

Saturday, February 15, 2025

जातिवाद संप्रदाय वाद से गुजरता भारतीय समाज

जातिवाद और  साम्प्रदायिक कट्टरपंथ से होकर गुजरता  भारतीय समाज

वर्तमान समय सर्वाधिक संक्रमण काल से गुजर रहा है। भले देश में  डेढ़ दशक से अधिक पूर्ण बहुमत वाली सरकारें हैं लेकिन बहुत तेजी से गैर हिन्दू जानता असुरक्षित महसूस कर रहें हैं। 
आज़ादी के बाद भी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े पार्टी और विचारधारा की सत्ता रही । उस समय विजनरी नेतृत्व थे फलस्वरूप देश के नव निर्माण में आधारभूत औद्योगिक इकाईयों की स्थापना आधुनिक तीर्थ के रुप में हुईं और उन जगहों पर लधु भारत बसते गए जैसे भिलाई,कोरबा, राउरकेला, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई, टाटानगर, भोपाल, बोकारो, गुरुगांव ईत्यादि। यहॉं की कालोनी कल्चर ने मिलीजुली संस्कृति ने राष्ट्रवाद को पोषण किया।  लोगों की जीवनशैली ने समृद्ध भारत की मिशाल पेश भी की।  नगरीकरण में सांस्कृतिक समन्वय भाव था भले वहां ग्रामीण और एक जातिय एक धर्मीय गाँव वाली आत्मीय भाव न रहें हों। 
      
 इस बीच ग्रामीण क्षेत्रों में नगरी और कस्बाई संस्कृति पनपी लोगों की जरुरत पूर्ति हेतु महाजनी संस्कृति ने ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को बुरी तरह जकड़ लिऐ। कृषक समुदाय सूदखोर सेठ साहूकार महाजनों के कर्ज तले दब गए उनके उन्मूलन हेतु सहकारिता ग्रामीण बैंक की स्थापना हुई। प्रधानमंत्री इंदिरागंधी ने 20 सूत्रीय कार्यक्रम चलाकर सेठ साहूकार द्वारा चलाए जा रहें देशी बैंकर्स का उन्मूलन किया। फलस्वरूप यहीं तबका अपने अस्तित्व रक्षा हेतु धर्म कर्म के सहारा लेकर नई पार्टी गठित कर अनेक सांस्कृतिक धार्मिक इकाईयां गठित कर संवैधानिक रुप से धर्मनिरपेक्ष देश और समाज को दिग्भ्रमित कर कट्टरवाद और चरमपंथ को बढ़ावा दिया। इन वर्गों के पास देश की अकूत संपदा,शिक्षा व अन्य प्रतिभाएं रही फलस्वरुप असल राष्ट्रवादियों के हाथों से सत्ता फिसलती ,भटकती हुई अंततः इन्ही धार्मिक कट्टरपंथियों के हाथों चली गईं। फलस्वरुप हर तरफ धार्मिक उन्माद और जातिवाद का विकृत रुप दिखाई पड़ने लगी हैं।
ऐसा लगता हैं कि 
भाषण और साहित्य सृजन से जातिवाद कभी खत्म नहीं होगा क्योंकि ऐसा तो बुद्ध से लेकर डा अंबेडकर तक हजारों वर्षो से प्रभावी हस्तक्षेप होते हैं। अंध विश्वास, पाखंड आदि संस्कृति और परंपरा के नाम पर चलाएं जा रहें हैं उनके प्रतिरोध  करने पर राष्ट्र विरोधी घोषित कर दिए जा रहें हैं ।संगठित गिरोहों का आक्रमण और अन्य कार्यवही करने की भय हैं । जातिवाद और वर्णवाद का इनसे पोषण हो रहा हैं। ऐसे में इनके उन्मूलन हेतु कठोर एक्शन लेने वाली राजनैतिक ईच्छा शक्ति वाले कोई दल भी दूर दूर तक दिखाई नही दे रहें हैं। ऐसे में सवाल हैं किस दल और सत्ता पे यह दम हैं कि देश और समाज से जातिवाद और कट्टरपंथ का पूर्णतः उन्मूलन कर सकें? जबकि यह पता हैं कि राष्ट्र रुपी वृक्ष में यही तत्व दीमक हैं। जो भीतर से खोखले करते जा रहें हैं।
     कटु सत्य हैं कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद नगर निगमों और सरकारी आफिसों मे सफाई कर्मी के नाम पर भर्ती ब्राह्मण कर्मी से ओबीसी अधिकारी यहां तक दलित अधिकारी तक काम नहीं करा सकते। उनसे अन्य दफ्तरी काम लेते हैं या वें किसी किसी सफ़ाई कामगार जाति को मजदूरी देकर काम करवा लेते हैं।शासन _प्रशासन में घोर अघोषित जात _पात विद्यमान हैं, तो समझिए आम जन जीवन में क्या हालत होगी? कल ही मान सुप्रीम कोर्ट का कहना हैं कि जाति आधारित कामकाज ऑफिस से मंदिर तक चल रहा हैं ऐसे में जातिय उन्मूलन कैसे हो पाएगा?
 वर्तमान में तो धर्म_ कर्म उफान पर हैं हिंदू _मुस्लिम के खेला मे अब ईसाई उद्वेलित हो रहें हैं। मणिपुर तो जल ही रहें हैं,कुकी मैताई का जातिय संघर्ष की चिंगारी बस्तर और सरगुजा तक फैलती जा रहीं हैं। यहाँ आदिवासी और ब्रिटिश काल में धर्मान्तरित ईसाईयों के बीच गाँव गाँव में साम्प्रदायिक तनाव आसानी से देखें जा सकतें हैं.घर वापसी जैसे कार्यक्रम और ईसाई मिशनरियों के मध्य आए दिन झड़पे की खबर मिलते ही रहतें हैं.

इसी छत्तीसगढ़ में 18 वीं सदी में गुरु घासीदास प्रवर्तित देश का प्रथम जातिविहीन "सतनाम पंथ" अपनी  मनखे मनखे एक वाली समानता भाव नें मध्यकालीन भक्ति या निर्गुणवाद उपासना से आगे सामाजिक क्रांति और अनीश्वरवाद के कारण आरम्भ से ही  बहिष्कृत हैं। कुछ पढ़े _लिखें लोग कुछेक दशकों से समझने लगें हैं पर जो ग्रह्यता आज़ादी के पूर्व थी अब लोग भूले -भटके प्रेम विवाह या जातिय बहिष्कार के कारण जीवन निर्वाह हेतु ही सतनाम पंथ को अंगीकार कर रहें हैं। यह सुखद तों हैं पर न्यूनतम होने से नक्कार खाने में विलीन होती तुती की तरह  हो हैं.इस  मानवता वादी स्वर की संरक्षण बेहद जरुरी हैं.
    इधर जैन ,फारसी, वणिक वृति से अर्जित अकूत संपदा को बड़ी धार्मिक स्थल बनाकर शान समझ जनकल्याण से विमुख जान पड़ते हैं और यथास्थितिवाद के ही पोषक हैं। नव बौद्ध दलित हैं और केवल पेटबिकली से उबर नहीं पाए हैं कुछेक संपन्न वर्ग सवर्ण होने की ओर अग्रसर अपने वर्गों से ही दूरी बनाकर रहने मे भला समझते हैं । सिख भोजन भंडारा मे ही मगन ही नहीं  उन्मत हैं,जबकि हरित क्रांति और 1 रुपए चावल से जनमानस भूख से उबर चुके हैं.उसे भोजन से अधिक मान सम्मान चाहिए.रैदास पंथी  भी परस्पर जात पात,रैगर,जाटव, चमार, महार दुसाध, आदि में बिखरे हैं। अनु जाति और पौनी पसारी से जुड़े श्रमिक जातियां नाई धोबी 
मेहतर गाड़ा घसिया केवट कोस्टा कुम्हार कलार लोहार सोनार आदि अपनी पुश्तैनी पेशा मे मग्न  यथास्थिति के ही पोषक हैं।
   आदिवासी के शिक्षित और युवा वर्ग ईसाई धर्मांतरण के इतर अपनी प्राचीन मान्यताओं के आधार पर गोंडी सरना धर्म की ओर बढ़ रहें हैं । छत्तीसगढ ही नही शैन शैन देश भर में धर्म और जात पात के नाम पर लामबंद हो रहें हैं , कट्टरपंथ बढ़ चूके।बहुसंख्यक  शूद्र (ओबीसी) ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य की युति ही हिंदू हैं जबकि हिन्दू धर्म सूचक शब्द नहीं स्थान बोधक हैं। इसलिए सनातन शब्दों का प्रचलन होने लगे हैं और यह शब्द भी बौद्ध धर्म से आयातित हैं। बहरहाल जैसे तैसे विगत एक दशक देश हिंदू राष्ट्र की ओर राजनैतिक शक्ति अर्जित कर बढ़ रहें हैं वर्तमान सत्तारूढ़ दल और उनके मातृ संस्थान धार्मिक संगठन द्वारा अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण और भव्यतम लोकार्पण हिंदू राष्ट्र के प्रतिकार्थ के जानबूझकर जाने समझें लगने लगे हैं।
 कोरोना काल में धार्मिक स्थलों के पट बंद हो गए थे कथित सर्व शक्तिमान लगभग असहाय हो चूके थे.विज्ञान के अविष्कार टीका  और औषधियों के द्वारा उनपर नियंत्रण पाए गए.पर उसके बाद फिर से ढोंग पाखंड युक्त बड़े बड़े आयोजन,समारोह बेतरतीब होने लगे.भगदड़ में कुचलें गये और उन्हें धर्म प्रेमी मोक्ष अधिकारिणी घोषित कर हास्यास्पद ढंग से सांत्वना प्रकट किए जा रहें हैं.धर्म के प्रति उत्सर्ग और बलिदान माने जा रहें हैं.
अल्पसंख्यकों में भी इसी तरह के अनुशरण होगा आखिर कही न कही सब एक दूसरे के प्रेरक - उत्प्रेरक  हैं. 
एक तरह से धर्म -कर्म में कट्टरपंथ और उन सब में अपनी अपनी लकीर खींचने की मनोवृति  ही तीक्ष्ण मतभेद की जननी हैं. फलस्वरूप  समरसता विखंडित हो रहीं हैं. और संविधान का धर्म (पंथ )निरपेक्ष  पंथ राष्ट्रवाद  तेजी से शक्तिहीन हो रहें हैं। पास -पड़ोस में धर्म आधारित राष्ट्र होने से यहां भी बहुसंख्यक लोग धार्मिक देश बनाने की झांसे में आते जा रहें हैं। उन्हें पता नहीं कि ऐसे में अखंडता कैसी क़ायम रहेगी.
  जब देश दुनियां धर्म कर्म में लामबंद हैं चर्च मस्जिद मौलाना पादरी में उलझे हैं तब  भारत भी मंदिर -मूर्ति, पंडे -पुजारी मे ही उलझा हैं तो कोई भला क्या कर सकता हैं? कुछेक देश नास्तिक या पंथ मत रहित हो मानववादी हो रहें हैं उनसे हम कब प्रेरित होंगे कह नहीं सकतें.
   
 बाहरहाल जातिविहीन समुदाय  होने की अवधारणा आरम्भ से हैं और उसे ही प्रज्ञावान संतों, गुरुओं नें आगे बढ़या पर राजतंत्र और उनके पोषक तत्वों नें जाति वर्ण नें शास्त्र और ईश्वरीय विधान घोषित कर इसे समाज और देश में थोप दिए हैं फकस्वरूप अमानवीय और बर्बर रुप आधुनिक ज्ञान विज्ञान के शिक्षा और समझ के बाद भी जनमानस में प्रायः देखने में मिलते हैं. भारतीय संविधान भी मौलिक अधिकार में धार्मिक स्वतंत्रता देकर और धर्म पंथ निरपेक्ष कह अघोषित रुप में यथास्थितिवाद के ही पोषक जैसा लगते हैं इसलिए इतने वर्षों बाद भी अपेक्षित परिणाम आना तो दूर अब जातिय और धार्मिक संगठन सत्ता प्राप्ति और उनके बाद उसे ही सुदृढ़ करने के कारक होते जा रहें हैं.

   इस बहाने यदि प्राचीन संस्कृति को पुनरस्थापित करना हैं तब भली भांति उसे ही समझ ले.मज्झिम निकाय के अनुसार तथागत बुद्ध के समय कंबोज यवन क्षेत्र में दो ही वर्ग थे_अमीर और गरीब।यह व्यवस्था नैसर्गिक हैं और सदा रहेगा। कमोबेश मध्य देश दक्षिणापथ में आर्य_अनार्य  से पृथक सत्यवंत लोगों में भी कोई जाति वर्ग व्यव्स्था नहीं थीं और वे लोग सत्य के अनुगामी स्वेत ध्वज वाहक प्रकृति उपासक समुदाय थे।
        पर आर्य अनार्य संघर्ष में सत्यवन्त प्रजाति टीक नहीं पाई और इन दोनों संस्कृति में समाहित हों गई। पर यह बात रेखांकित करने योग्य हैं कि इसी भूमि में हजारों वर्ष के बाद जब जात_ पात, ऊंच _नीच का मकड़ जाल फ़ैला और इंसानियत खतरे में पड़ी तो समानता के लिऐ सतनाम पंथ का उद्भव हुआ।
   यह भारतवर्ष का युगांतरकारी घटना हैं कि " मनखे मनखे एक" जैसे दिव्योक्ति के साथ सतनाम पंथ धर्म होने की ओर अग्रसर हैं।
  भारत में जितने भी धर्म और पंथ हैं वें सभी कहीं न कहीं जाति वर्ग के रुप में विभाजित हैं। आधुनिक शिक्षा और लोकतंत्र गणराज्य हो जानें के बाद हर पांच वर्ष के चुनाव ने लोकतंत्र मजबूत जरुर किया पर वोट बैंक ने धर्म और जात पात को पूर्व के अपेक्षा और अधिक सुदृढ़ की हैं।
कुछेक विचारक मानते हैं कि यह जो दिख रहा हैं वह जातिय नहीं बल्कि वार्गिक चेतना हैं। 6 हजार जातियों में विभक्त विराट हिंदू धर्म के अंतर्गत संविधानिक रुप से समान्य, ओबीसी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के रुप में चिन्हाकित कर इनके ही हितार्थ योजनाएं चलाई जा रहीं हैं। फलस्वरुप यह वर्ग के अंतर्गत आने वाली जातियां अपने अपने समुदाय में वर्चस्व हेतु पहले से अधिक सचेत और सुदृढ़ होने लगे हैं।
    कुछ माह पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि अनुजाति वर्ग में क्रीमी लेयर लाकर अति पिछड़े समुदाय को लाभ दिया जाय जैसे कि ओबीसी वर्ग में हैं। इस पर देश भर में तीखी बहसे हुई और यह बात सामने आई कि यह वर्ग अब भी मुख्यधारा में नहीं हैं न ही समाजिक धार्मिक प्रतिष्ठा में बढ़ोत्तरी हुई तब एक वर्ग के विभिन्न जातियों को ही परस्पर प्रतिद्वंदी बनाना हैं। यह बातें व तथ्य समझी गई और मामला विचाराधीन हुईं हैं पर ख़त्म हुई नहीं।

.   मान न्यायालय की टिप्पणी पर महीन दृष्टि समाजिक सरोकार से लगाई जा रहीं हैं कि इनका दूरगामी परिणाम और प्रभाव क्या होगा? क्या चार वर्ग फिर से जातियों तक चली जाएगी और देश में जातिय गणना की उठती मांग से क्या दशा निर्मित होंगी इन पर विचार और परिचर्चाये की  जा सकती हैं। यह मामला थमी ही नही कि एक ध्यानाकर्षण टिप्पणी अभी- अभी सुप्रीम कोर्ट से आई कि जेल में निरुद्ध अपराधियों के जाति देखकर कार्यों की बटवारा है । यह तो अपराधियों के मामले हैं सोचो जो बाहर विभिन्न शासकीय अशासकीय निगमों मंडलों में  भृत्य ,सफ़ाई कर्मचारी के रुप में उच्च जाति के लोग पदस्थ हैं उन्हें उनके मूल कार्य न लेकर अन्य दफ्तरी कार्य लिऐ जाते हैं। मतलब जन्मना जातिय श्रेष्ठता/ निम्नता बोध का कार्य शासन- प्रशासन में ही चल  रहा हैं।
 ऐसे में  छतीसगढ़ की भूमि सें 18 वीं सदी में समानता पर आधारित जातिविहीन सतनाम पंथ की दर्शन और बातें " मनखे मनखे एक" कितना प्रासंगिक हैं, इसे समझकर दिग्भ्रमित लोगों को समझाये  जा सकते हैं। 
 हालांकि इस महादेश में ऐसी चेतना का प्रचार- प्रसार स्कूल कालेज के पाठ्यक्रमों और प्रज्ञावान  प्रवाचकों और शासन प्रशासन की दृढ़ता से ही संभाव्य हैं पर वोट बैंक और उनसे मिलती सत्ता राष्ट्रवाद और अखंडता का नारा या जुमला भर लगा सकती हैं. यदि ऐसे ही और एक दूसरे से होड़ और श्रेष्ठता निकृष्टता की बातें चलती रहेगी तों आगे चलकर बहुत ही घातक परिणाम भुगतने पड़ सकतें हैं.उनकी अंदेशा  और आहटें सर्वत्र  / सुनाई दिखाई पड़ रहें हैं.

जय भारत 
. 
   
    

  डॉ अनिल कुमार भतपहारी/ 9617777514

ऊँजियार सदन, सेंट जोसफ टाऊन अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़ 492001 

Monday, February 10, 2025

जोग महानदी तट पर आबाद मानव सभ्यता एवं उनके अनुष्ठान

जोंक महानदी के तट पर आबाद मानव सभ्यता एवं संस्कृति का केंद्र 

  नदियां मानव सभ्यता की जननी हैं या फिर हम ऐसा भी कह सकते हैं कि नदियों के तट पर ही मानव प्रजातियों का उद्गम और विकास हुआ हैं। आरम्भ से लेकर अब तक इनकी तट पर ही मानव बस्तियां पाई गई हैं। उनके घर खेती और व्यवसाय  स्थल रहा है और सदियों तक रहेगा। वें नदियों के गोद में ही अनेक उपलब्धियों को अर्जित करते यहां तक की यात्राएं तय कर सका हैं।
    हालांकि मानव निवास स्थल के अवशेष गुफाएं  आदि हमें पर्वत की ऊंचाई में भी मिलती है लेकिन वह सुरक्षागत कारणों से है। असल में जलश्रोत जहां रहा, वहा मानव की बसाहटे हुईं। भले निस्तार हेतु पानी उपर तक ले गए
पर मानव समुदाय  पर्वत के नीचे या समतल जगहों पर स्थित कुंड या प्रवाहित जलधार के पास आए।
  प्रायः पर्वत ही नदियों के जनक हैं पर समतल मैदान में भी पाताल फोड़ कुआं और जल स्त्रोत मिलती हैं ,जिसे छत्तीसगढ़ी मे "चितावर "और "चुहरी "कहते हैं वहा से भी नदियों का उद्गम होते हैं। इन्हें लेकर रचे गए लोकगीत दर्शनीय है  _
 
 चितावर में राम चिरई बोले 
तोला कोन बन में खोजंव 
मैना मंजूर जोही मोला तार लेबे रे दोस ...

 चितावर/ चुहरी के आसपास जरुर  पहाड़, पर्वत, पठार पाए जाते हैं  जिसके ऊंचाई या तराई भाग में जलकुंड होते हैं ।जहां से जल प्रवाहित हों नदी का स्वरुप ग्रहण कर लेती हैं। यह जल स्रोत सदनीरा या मौसमी भी होते हैं।
   भारत वर्ष में कुंड पोखर सरोवर जलस्रोत वंदनीय हैं तो वहा से प्रवाहित होती नदियां पूज्यनीय हैं। हमारे यहां गंगा, यमुना, नर्मदा चंबल ,बेतवा,गोदावरी, कावेरी महानदी, इंद्रावती ,सतलज, व्यास, रावी, गोमती ,तीस्ता ,सोन भद्र ,ब्रम्हपुत्र  आदि के तट पर ही नगरी और उन्नत सभ्यता का विकास हुआ हैं। देश के दो महत्वपूर्ण प्रदेश उड़ीसा और छत्तीसगढ़ की जीवन रेखा कही जाने वाली महानदी प्राचीन काल में चित्रोत्पला गंगा के नाम से जानी जाती रही हैं और गंगा जैसी ही पावन मोक्षदायनी मानी गई हैं। क्योंकि इनकी उद्गम सिहावा पर्वत छत्तीसगढ़ से होकर बंगाल की खाड़ी में चिल्का झील बनाती ठीक गंगा की तरह हिमालय पर्वत से निकल कर सुंदरवन मे झील बनाती बंगाल की खाड़ी सागर में समाहित हो जाती हैं।
      अपने तट पर अनेक धार्मिक वाणिज्यिक और प्रदेश की राजधानी बनाती हुई लाखों हैक्टर कृषि भूमि को सिंचित करती करोड़ों जन जीवन के लिए अन्नोत्पादन कराती उनके पेयजल की भी आपूर्ति कराती हैं। इसलिए मानव समाज के लिए ये नदियां वरदान हैं।
  महानदी की सहायक नदी जोक नदी भी मानव सभ्यता के केंद्र रहें हैं। उड़ीसा सरकार द्वारा अनेक तरह से अनुसंधान इस संदर्भ में किए गए हैं और कार्य अनवरत जारी है हैं। लगभग 25000 साल पहले इनकी तट पर मानव इतिहास के अवशेष मिलती हैं। 
    उड़ीसा के नुआपाड़ा जिले के सुना बेरा पठार से निकलने वाली और महासमुंद जिले के बागबाहरा के छाती गांव में छत्तीसगढ़ प्रवेश करने वाली नदी के किनारे किए गए अन्वेषण में मानव इतिहास के पहले आरंभिक औजार निर्माता से लेकर आधुनिक काल तक के साक्षी मिलेंगे।  प्रागतिहैसिक औजारों की बड़ी संख्या में खोज से पता चलता है कि इस घाटी में 25000 साल पहले आदिमानव निवास करते थे।
 छत्तीसगढ़ सरकार के संस्कृति और पुरातत्व निदेशालय की टीम द्वारा किए गए सर्वेक्षण का नेतृत्व करने वाले गंगाधर मेहर विश्वविद्यालय संबलपुर के इतिहास स्कूल के प्रमुख डॉक्टर अतुल कुमार प्रधान ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बताया कि जोंक नदी घाटी छत्तीसगढ़ में मानव इतिहास का उद्गम स्थल है। 
प्रागैतिहासिक औजारों में हजारों वर्षों के फ्लैग ब्लैक पॉइंट और कर शामिल है सेंड भट खुरमुरी डूंगरी पाली रीवा नीलेश्वर उधर लाल में परेशानी डूमरपाली बालदी डीह लीलेसर चंदन थरगांव , कुशगढ़ , नितोरा से भी बड़ी संख्या में प्रागैतिहासिक स्थल खोजे गए हैं यह औजार 25000 से लेकर के  6000 साल पुराने जान पड़ते हैं ।अन्वेषण से कसडोल के अमोंदी  ग्राम में एक बड़ी प्रारंभिक ऐतिहासिक बस्ती भी प्राप्त हुई है । कुछ प्रारंभिक ऐतिहासिक स्थल में बर्तनों के टुकड़े, कटोरे ,बेसिन, भंडारण  जार, मोती काठी के बर्तन और भौतिक एवम संस्कृतिक वस्तुएं मिली है।
   जोंक नदी की सहायक नदियों में भंडार, कोलार ,मैच का चिराग बाग भैया भूसा का में लहर जैसे की छोटी बड़ी सहायक नदियां इसमें जाकर मिलती है। यह नदी उत्तर दिशा में बहती है और कल 215 किलोमीटर क्षेत्र को कर करती है छत्तीसगढ़ उड़ीसा के बीच एक अंतर राज्य सीमा बनाती है यह नदी कहानी छोटी बड़ी पर्वत श्रृंखलाओं से होकर गुजरती है  नुआपाडा पहाड़ी श्रृंखला के एक संकीर्ण चट्टानी चैनल से बहने के बाद श्री नारायण के पास महानदी में समागम हो जाती है  गिरौदपुरी सोनाखान रेंज की पहाड़ियों में स्वर्ण भंडारण प्राप्त हुई है। इस क्षेत्र से नदी गुजरती है और मिट्टी और चट्टानों के कटाव के द्वारा अपने साथ सोने के बारीक कारण प्रवाहित करके महानदी की रेत में प्रवाहित करके ले जाती है। इसलिए महानदी की रेत में गिरौदपुरी   शिवरीनारायण से लेकर से लेकर के  हीराकूद बांध तक नदी के दोनों और सोनझरिया जनजाति निवास करती हैं। जो महानदी की रेत से पारंपरिक रुप से सदियों से स्वर्ण कण निकालते आ रहें हैं। सतनाम  संस्कृति में जोंक को  जोगनदी कहीं जाती है क्योंकि इनकी पावन तट पर गुरु घासीदास ने जोग यानि तपस्या किया एवं सतनाम पंथ का प्रवर्तन किया।
   जोग नदी में हाथी पथरा घाट में फागुन पंचमी से सप्तमी स्नान कर पुण्य अर्जित करने की सांस्कृतिक अनुष्ठान है। कहते है कि सोनाखान राजा के मतवाला हाथी को गुरु घासीदास ने अपने तपबल और जोग विद्या से पत्थर के बना दिए यह आकृति जनमानस में श्रद्धा के केंद्र हैं।
सुरम्य तट और स्वच्छ जलराशि श्रद्धालुओं और पर्यटकों के मन को पवित्र और आकर्षित करती है  फलस्वरूप लाखों लोग स्नान हेतु एकत्र होते है और बारहों माह दर्शन स्नान हेतु आते रहते हैं।
महानदी और जोगनदी के मध्य ही सतनामियों की बसाहट है जो कृषक और मेहनती कौम है। कहते है यह परिक्षेत्र प्राचीन सत्यवंतो का स्थल है इतिहास में जो सतवहन वंश और सहज्यानी बौद्ध लोग है वर्तमान सतनामी समाज हैं। जिसमे प्राचीन मान्यताएं और उनकी भाषा व्रत त्यौहार जिसमें प्रकृति पूजन,धनाई माता पूजन, हरेली, पोला,सुरहुत्ति  होली  आदि निर्बाध चला आ रहा : 

छत्तीसगढ महतारी के करधन 
जिसमे भरा हैं अपार स्वर्ण कण 

  यह स्वर्ण कण जोंक  नदी ही प्रवाहित कर महानदी में मिलती है इसलिए इस नदी का ऐतिहासिक आर्थिक सामाजिक धार्मिक रूप से  मध्य भारत में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान हैं । यह उड़ीसा और छत्तीसगढ़ की सीमारेखा और जीवनरेखा भी हैं।

 यदि मानव बसाहट पहाड़ पर्वत पठार पर हो तो भी जल के लिए जलकुंड या  वहा से प्रवाहित जलधार क्षेत्र नदी के तट पर उनको आना ही होता है!  थे विश्वकी विश्व की अनेक बड़ी सभ्यताओं का विकास या बड़ी नगरों का विकास नदियों के तट पर ही हुआ है चाहे वह नील नदी हो अमेजॉन हो या ब्रह्मपुत्र हो गंगा हो गोदावरी हो या महानदी हो इन सभी नदियों में हमें मानव सभ्यता के विकास का चिन्ह दिखाई पड़ता है। 
    छत्तीसगढ़ राज्य के महासमुंद जिले और रायपुर जिले से होकरबहती हुई बहती हुई सोना बेड़ा पत्थर से शुरू होती है और
जोक नदी का प्रवाह क्षेत्र 2480 वर्ग मीटर है जिसमें विविध प्रकार के वनस्पतियां के नदी पर्वत वन पर्वत इत्यादि और विभिन्न पशु पक्षी आबाद है यह नदी दर्शनी और धार्मिक दृष्टिकोण से भी का तीसरा महत्व है गिरोधपुरी के समय यहां इसके तट पर लाखों लोग स्नान कर दर्शन कर पुण्य अर्जित करते है। अन्य नदियों की तरह इनपर भी अनेक काव्य और प्रेरक साहित्य रचे गए हो जो उनकी विशेषताओं को  प्रकट करती हैं।

" जोगनदी पलाशिनी "

जोगनदी पलाशिनी 
अमृत जल वाहिनी
है बहु व्याधि हरिणी 
मन की विकार नाशिनी 
इनकी तट पर पावन तपोभूमि 
गिरौदपुरी सत्घाम है विराजती 
धन्य वन प्रांतर हुआ महिमामय 
घासीगुरु के तपबल से गरिमामय 
 लाखो नर- नारी कर स्नान 
अर्जित करते  पुण्य कर आचमन 
प्रकृति से पल भर होते मिलाप 
 मिटते दु:ख सब क्लेश संताप
जीवन प्रवाह में द्वीप सा कठोर भार 
विगलित करते सत्संग जड़ता विकार 
जल मध्ये प्रकृतस्थ हस्ति प्रतिमा
मन मैगल प्रक्षालित चमके चंद्र पूर्णिमा 
यहां केवल मेल मिलाप नही 
हाट बाजार व्रत उपवास नही 
होते यहां सभी जन सत साधक 
 बनकर आते वे सबके लायक 
 संत सेवक अरु सत्यानुरागी 
संकल्पित मन में बनु सतगामी 
पंगत संगत का अनुठा महा पर्व 
तट पर सम्पन्न अनुष्ठान यह सर्व 
भरते हृदय में उमंग अरु उत्साह 
पावन सतनाम सरित प्रवाह 
गाकर जस प्रफूल्लित हुआ अनिल
सुर मे ताल मिलाकर हर्षित इनकी सलिल ...


 डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
       सहा प्राध्यापक( प्र .श्रे.)
    उच्च शिक्षा विभाग छत्तीसगढ़

Sunday, January 26, 2025

गणतंत्र पर्व में राजपथ पर रामरामी

#anilbhattcg 

||गणतंत्र पर्व में राजपथ पर रामरामी ||

.   रमरमिहा जिसे रामरामी और अब रामनामी कहें जाने जाने लगे हैं इनका अस्तित्व 1890-1900 के आसपास हुआ. एक वैष्णव बैरागी द्वारा बोतलदा पहाड़ रायगढ़ में साधना करते हुए राम नाम का प्रचार करने की ईच्छा सें हुई.साथ ही पुस्तक छपाई की मशीन सें जब "रामचरित मानस " प्रकाशित हुई तब उनके प्रचारक उत्तर प्रदेश सें बांसुरी और गुटका लेकर शिवरीनारायण क्षेत्र में आये.समीप चारपारा,ओड़काकानन के सम्पन्न कृषक परशुराम भतपहरी (भारद्वाज ) और उनके मितान को विश्वास में लेकर उनके मस्तक में रामराम लिख कर सतनाम धर्म में रामरामी पंथ का प्रवर्तन कराया गया.ताकि सतनाम के साथ रामराम का मणीकांचन युति हो सकें.परन्तु संकीर्ण विचारों और साम्प्रदायिक मान्यताओं नें इसें पल्ल्वित - पुष्पित नहीं होने दिया. पूर्वर्जो की देन और जो स्थिति हैं उसी में जीवन वृत्त की चाह नें इन्हें बचाकर रखें हुए हैं.

.      गुरु घासीदास प्रवर्तित सतनाम धर्म के वृहत प्रभाव सें राम चरित मानस के राम "रामराम " होकर निर्गुण स्वरुप में  इन लोगों के आराध्य हो गये.सादगी पूर्ण जीवन शैली और हर कार्य व्यवहार में " रामराम "का सम्बोधन इस मत की विशेषता हैं. इनके धार्मिक अनुष्ठान में गाये जाने वाली भजन ,घूँघरु की मधुर धुन सें विधुन नृत्य सें एक अलग तरह की भाव भक्ति वाली संस्कृति  प्रचलित हुई . पर यह नवाचार रामभक्त हिन्दुओं को पसंद नहीं आई न सतनामियों  को  फलस्वरूप इनके जाति प्रमाण पत्र नहीं बन सकें और शासकीय सुविधाओं सें वंचित भी रहें. मुख्यतः कृषि वृति वाले दो तीन ब्लॉक में रहने वाले अनुयाई सतनामियों के मध्य मानवता वादी दृष्टिकोण के ही कारण न्यूनतम रुप में अस्तित्वमान हैं. भले यह समुदाय दो पाटन के बीच में पीसाते आ रहें हैं.मुझे तो बचपन सें विगत 50 वर्षों सें इनके बीच रहते और इनके जिजीविषा को जानने समझने का अवसर मिला हैं.

वर्तमान में नख -शिख  वाले सर्वांग रामरामी केवल गिनती 250  के आसपास ही बचें हैं.1992 में बाबरी मस्जिद ढहने और राम मंदिर राष्ट्रीय मुद्दा बन जाने तथा भाजपा एवं बसपा के अभ्युदय सें  इस समुदाय को महत्व मिलने लगा.नई पीढ़ी के लोग रामरामी चादर ओढ़कर वर्ष में दो -दो बार भजन मेला और अन्य कार्यक्रम करनें लगे है. पत्रकारों रचनाकारों और शोधार्थियों का ध्यान भी आकृष्ट हुआ और छिटपुट लेखन आरम्भ हुआ.
.     गणतंत्र दिवस समारोह में प्रथम बार सम्मलित होने सें रामरामी पंथ को देश भर में जाने जायेंगे.शासन -प्रशासन भी इनकी सुधि लेंगे और अनेक तरह की समस्याओं सें घिरें समुदाय का भला होगा, ऐसी उम्मीद कर सकतें हैं.

विगत वर्ष रामरामी लोगों के प्रतिनिधि मंडल के साथ कुछ पल व्यतीत किए और उनके संस्मरण फेसबुक में पोष्ट किए अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं.

।। रामनामी ।।

      छत्तीसगढ़ की विविधतापूर्ण संस्कृति में रमरमिहा यानि रामनामी सम्प्रदाय का विशिष्ट योगदान हैं। इनकी उपस्थिति और इनके कर्णप्रिय मधुर नुपुर ध्वनि युक्त भजन की प्रस्तुति अनुपम हैं।
         कलियुग नाम आधारा  सदृश्य सतनाम भजन , रामराम भजन या हरे राम हरे कृष्ण संकीर्तन भजन महानदी तट के इर्द- गिर्द विकसित सुमरिन भक्ति अनुष्ठानिक आयोजन हैं। शिवरीनारायण सांरगढ़ सरसीवा परिक्षेत्र के अनेक ग्रामों में इनके बसाहट हैं। अपनी विशिष्ट उपसना पद्धति व जीवन शैली से यह समुदाय पृथक ढंग से पहचाने जाते हैं।वर्तमान में यह अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत हैं।
       
          "निर्गुण निराकार रामराम का उपासक समुदाय  अपने साकार शरीर को ही मंदिर सदृश्य बनाकर अपने अराध्य रामराम को‌ हृदय में बसाकर शांतिप्रिय जीवन निर्वाह करते आ रहें हैं।"इनकी सादगीपूर्ण जीवन शैली रहन- सहन एंव संस्कृति  पर अनुसंधान व अकादमिक काम करने देश- विदेश से अनुसंधाता आते रहे  हैं। 
        रामनामी  समाज  प्रमुख गुलाराम रामनामी का कहना है कि " देश भर से  अनेक शोधार्थी  एंव लगभग 25 देशों से लोग  मिलने आ चूके हैं।अनेक डाक्युमेंट्री बनाये व  साक्षात्कार  आदि लिए गये हैं।राममय देश में आज पर्यन्त यह लोग मुलभूत समस्याओं से वंचित हैं।  परस्पर चंदा बरार कर यहां तक जमीन आदि बेचकर बड़े भजन मेला व अपना धार्मिक व  सांस्कृतिक आयोजन करते आ रहे हैं। कोई विशिष्ट धार्मिक स्थल सामुदायिक भवन या ईमारत आदि नहीं हैं।"
   वर्तमान में सर्वांग यानि नख शिख रामनामी गिनती‌ के बचे हैं। न ई पीढ़ी सर्वांग रामनामी नही बन रहे हैं।
    इनके उद्गम भूमि चारपारा गांव है जहां के  गौटिया परसराम भारद्वाज जी ने  1900 के आसपास इस सम्प्रदाय का प्रवर्तन किया । ओड़काकानन नामक गांव भी‌ रामनामियों का केन्द्र हैं  इन जगहों का  समुचित विकास कर‌ इस विलुप्त होती संस्कृति का संरक्षण किया जा सकता हैं।

डॉ.अनिल भतपहरी / 9617777514

Sunday, January 12, 2025

मया के मोटरी

असम से छत्तीसगढ़ आया 
 "मया के मोटरी "


वर्ष भर  गाँव- घर, शहर -पहर समाज के बीच रहकर अपने दायित्यों का निर्वहन तो करते ही हैं इसी  बीच कुछ दिन अवकाश लेकर इन चीजों सें दूर देश- दुनियाँ को जानने- समझने की चाह नें गैर अनजान गुमनाम सा  क्षेत्र के लोगों की भाषा,कला संस्कृति,प्रकृति और प्रवृत्ति को करीब सें देखने का सौभाग्य मिलते है जो हम जैसों के लिए अमूल्य निधि हैं. उसी को अर्जित करने की चाह पिता श्री ने बाल्यकाल से  लगाया फलस्वरूप पर्यटन में स्नातकोत्तर उपाधि अर्जित किया और इनके कारण तों अब पर्यटन के  लत ही लग गये है. जब जब अवसर मिलता है सुदूर जगहों पर  जन जीवन को जानने - समझने निकल पड़ते है. 
हालाँकि  अभी अनेक दायित्वों के कारण रमता जोगी बहता पानी जैसी स्थिति नही है और प्लान से जाना होते है.परन्तु 2023 में देश के पूर्वोत्तर राज्यों खासकर  पश्चिम बंगाल और सिक्किम की यात्रा में एक वाक्या हुआ कि गन्गटोक से  दार्जिलिंग जाने के रास्ते जाम हो गया हमें यात्रा रद्दकर वापस कोलकाता था. अब तो हमलोग बिना समय गवाए रमता जोगी बहता पानी जैसे निर्णय ले लिए कि अब सीधा  असम गौहाटी जाना है और वहाँ से सीधा रायपुर  .  सुखद संयोग बना कि दो दिन के समय को असम में निवासरत अपने लोगो के बीच बिताया जाय. श्रीमती जी तो अभी यात्रा में मेरी छाया जैसी ही है भले  घर में...तुरंत हामी भरी..इसी बहाने कामख्या देवी की दर्शन हो जायेगी. और हाथ जोड़ प्रणाम की मुद्रा में आ गई! 

हमारे निर्देशक हज़ारों किमी दूर परवरिम  गोआ  में IIHH पढ़ने गये  मिलिंद बेटे ने गूगल से सर्च करते आसान कर रहे थे. उन्होनें कलकत्ता से रायपुर का टिकट कैसिल करवाकर गौहाटी से रायपुर करवाकर हमलोगों की यात्रा को तनाव मुक्त सुखद कर दिया हालांकि कुछेक हजार अतिरिक्त भार आया पर असम के सुप्रसिद्ध और ऐतिहासिक कौरी पाथर और बसबेरा गाँव के निवासियों के स्नेहिल प्रेम और सितारा होटल से अधिक सुविधायुक्त ठहरने और भोजन की उत्तम व्यवस्था से जो सुखनुभूति हुआ वह वर्णनातीत हैं.

 तो हमलोग वापस सिलीगुड़ी के बस स्टेण्ड में आकर गौहाटी जाने वाले स्लीपर बस के टिकट ले लिये यह काम भी टैक्सी ड्राइवर नें फोन करके करवा दिए और उस बस के टिकट काउंटर के पास लाकर में हमारे बैग रखवाकर निश्चिन्त कर दिए.
रात्रि 8 बजे बस तब तक हमलोग खाना वगैरह खाकर आराम से स्लीपर कोच में सोते सोते अलसुबह 5 बजे बस स्टैंड गोहाटी पहुँच गये..
सुबह सुलभ में निवृत होकर चाय नास्ता लेकर 7 बजे चल पड़े गतंव्य की ओर मन में हजार सपने लेकर उछाहित 150 वर्षों से आव्रजित और हजारों कि मी दूर भाषा,लिपि, संस्कृति और प्रवृत्ति विरुद्ध जनों के बीच या निर्जन वन प्रांतर में कालापानी सदृश्य दुर्गम जगहों पर बसे परिजनों से मिलन भेट रोमांचित और पुलक प्रकट कर रहा था.

मेरे मोबाईल में जो नये सेट था में डॉ जितेन्द्र जांगड़े जी का नंबर था जिसकी बेटी असम निवासी मिलन बंजारे से ब्याही गई हैं का नंबर था और दूसरा मानवशास्त्री श्री युत अशोक तिवारी जी का  जो कि इन प्रवासी जनों के मध्य अनेक वर्षों से काम करते आ रहें हैं. उन्होंने 2018 में असम  निवासी मदन सतनामी जो असम प्रान्त का अध्यक्ष हैं के घर में बैठे मुझसे बात करवाए तब मैं शा महाविद्याल पलारी के बीए भाग तीन में जनपदीप भाषा साहित्य छत्तीसगढ़ी पाठ मुकुंद कौशल साहब के गज़ल "मुड़ उठाये करगा कस... पढ़ा रहा था.
 मदन सतनामी जी का भाव विभोर कर देने वाला अभिवादन ... सतनाम साहेब श्रवण किया और फिर अनुनय आग्रह कि दर्शन देहु गो...आज वह 5 साल बाद हो पा रहा हैं.
इस बीच हमलोग कई बार मिले तिवारी जी के पहल से छत्तीसगढ़ मूल के प्रवासी असमियों का प्रतिनिधि  सम्मेलन संस्कृति विभाग के सभागार में हुआ जहाँ पर मेरा प्रबोधन और एक परम्परिक सतलोकी मंगल भजन जो कि आकाशवाणी रायपुर से मानसिंह टंडन के स्वर में  चिकारा के साथ बजते आ रहें हैं - "अपन करम के भागी हो नरतन " को सुनाया और गला भर आया. उसी कार्यक्रम में मदन जी और संस्कृति विभाग के वित्त अधिकारी साहनी साहब के करमा प्रस्तुति भी समा बाँधा था.आगे चलकर साहनी साहब के साथ उच्च शिक्षा विभाग में साथ काम करने और उनके भांजा फ़िल्म स्टार संतोष सारथी के गुरतूर स्टूडियो से साथ में मेरे गीत -"चलो जुर मिल के अपन गाँव ल सरग बनाई " गाये. उस कार्यक्रम 30 प्रतिनिधि मंडल जिसमें महिलाए भी थी वो सबसे मेल भेंट हुआ और उनके यहाँ भी जाने की बातें हुईं. इस तरह मो न वाट्सअप और ग्रुप बने बनाये गए और छत्तीसगढ़ असम परस्पर जुड़ना आरम्भ हुआ.इन सबका श्रेय आद तिवारी जी के सतत प्रयास और संस्कृति विभाग के सौजन्य से हुआ.तिवारी जी से मेरा परिचय और मुलाक़ात 2015 से था ज़ब उनके सूचना और अनुग्रह में " आध्यात्मिक अनुष्ठान पंथी नृत्य " और सतनामी परंपरा में "रहस बेड़ा " पर सहपीडिया नई दिल्ली के लिये प्रलेखन और फिल्माकन किया. वहीं स्नेहिल संबंध मुझे पुनश्च आदेशित किया कि अनिल भाई तय असम गे हवस तब उहाँ के संस्मरण झटकुन 3-4 दिन में लिख के दे एक आयोजन मे ओमन ल पुस्तक छपवा के विमोचन करवाना हे..बड़े भैय्या के आदेश सर आँखों पर...
मैं रात के बस के खिड़की ल झाँक झाँक के सोनीतपुर देखत जावत हव कि असम के धरती के सुघरई कइसन हावय. तिस्ता नदी के तीरे तीरे ज़ब सिक्किम आयेन गायेन कहु उहि रकम के जंगल पहाड़ नदी नाला उच्च नीच सर्पिल सड़क तो नहीं...?

पर ऐसा कुछ नहीं बिलकुल सपाट मैदान बिना हिचकोले खाये बस चली जा रही हैं पर हसरते भरी मन में और आँखों में नींद नहीं... अचानक डीजल पेट्रोल का गंध बस में भर गये सोचा कहीं लीकेज तो नहीं...थोड़ी देर के लिये बस रुकी तो सांसे अटकी सी कहीं कुछ अनहोनी तो नहीं...झटके से उठा क्या क्या हुआ...कंडेक्टर बोले कुछ नहीं किसी यात्री को लघुशंका के उतरना हुआ...बाहर  बाहर पेट्रोलियम रिफाइनरी हैं उसी गंध भरा हुआ हैं...मैं भी मत चूको चौहान टाइप इस धरती को प्रणाम करनें उतरा..थोड़ी देर बाद बस चल पड़ी...
रास्ते में मिलन सतनामी जी नें दीपचंद जी का मो न दे दिए थे वे लोग सोनीतपुर बसबेरा जाने के मार्ग पर थैलामारा बस स्टेण्ड  आकर प्रतीक्षा कर रहें थे.नें बस कंडक्टर से मेरे मोबाईल पर बात किया कि सर इन लोंगो को तेजपुर मोड़ पर उतार दीजये..हमलोग निश्चिन्त हुए और रायपुर से हजारों कि मी दूर वहाँ उतरे जँहा पूर्व परिचित शिक्षक दीपचंद सतनामी जी एवं उनके मित्र सड़क किनारे बस के दरवाजे के समक्ष ही फुलान गमक्षा लिये स्वागतार्थ खड़े हुए मिले.
जैसे ही बस से उतरे स्वागत किया.कंडेक्टर एयर बैग निकाले और हमलोग वाहन में बैठकर महाकवि मनोहरदास नृसिंह जी के जन्म स्थान बसबेरा की ओर चल पड़े.बिलकुल मैदानी सड़क और आसपास का महौल मुझे कोसरंगी के बंगाली पारा जैसे लग रहें थे.पता नहीं क्यों अजनबी अनजाना पन लगा ही नहीं.महज 15 मिनट में हमलोग बसबेरा के भारती होटल पहुचे वहाँ भी हमारा स्वागत भौंन सतनामी,खैमराज दिगंतो भारती नें किया और स्वल्पाहार परोसे . पता चला कि होटल संचालक हमारा गोत्रज  भाई हैं और विगत अनेक वर्षों से इस व्यवसाय में लगे हैं.वहां की प्रसिद्ध मिठाई लौंग लता और कलाकंद लिये पैसा नहीं ले रहा था पर जबरदस्ती दिया वे केवल 200 रूपये लिये और 300 वापस कर दिए. मिठाई उस घर के लिए ले गए जहाँ हमें ठहरना था.
  होटल से महज एक कि मी दूर शानदार आधुनिकतम घर जहाँ अनेक पुष्प केला,पपीता आम और सुपाड़ी के पेड़ लगे हुए थे.खुला आँगन और मध्य में अलंकृत जैतखाम जो 18 दिसंबर को पालो चढ़े थे नाड़ियल और गेंन्दे के फूल से सजे मनमोहक लग रहें थे.सामने से प्रणाम किया और वहीं खड़े रहें तभी साध्वी सी माथे पर तिलक चंदन लगाए गृह स्वामिनी लोटा में जल लेकर आई और हमारे परक्षन की...हमलोग ऐसा अभ्यस्त नहीं थे  पहली किसी नें ऐसा स्वागत की कि हमारी श्रीमती जी बेहद गहराई से प्रभावित हुईं और तत्क्षण कहीं - ऐसा मैं पहली बार देख रही हूँ.वो हर्षित और चकित रह गई.
हालांकि मैं  जानता था और सरगुजा अंचल में ऐसा स्वागत सत्कार पा चुका था.उन्हें और सभी को कहाँ कि यह हमारी छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति हैं जिसे आपलोग सम्हाल कर रखे हैं. क्या हमारे आगमन के कारण ही ऐसा हैं कि कोई पहुना आते हैं उन सबका ऐसे ही सहज भाव से पाव पखांरते हैं.वो बोली जी इहाँ अभी चलतेच हवे नंदाय नइहे.आवव सुवागत हे...लम्बी यात्रा से हुईं थकावट यहाँ की मनभावन हरियाली स्वागत सत्कार और अपना पन के स्नेह से कपूर की मानिंद उड़ गए और मन में उत्साह उमंग भर आया...स्नान भोजनपरान्त दोपहर विश्राम कर दोपहर 3 बजे पहुनाई में पूरा पारा किंजरने निकले प्रायः 7 घर गए बातचीत चाहा पानी और पान सुपाड़ी से हमलोगों का अभिनव स्वागत सत्कार हुआ..

 शाम 7 बजे  1875 के आसपास स्थापित सतनामघर में आरती पूजा और भजन कीर्तन हुआ.जहाँ गाँव भर से प्रमुख गण महिला बच्चे उपस्थित रहें.वहाँ पर हमदोनो का खोराई, झापी खुमरी टोपी और फुलान गमछा से स्वागत सत्कार हुआ..फिर सोसल मीडिया से युवा लोगो को पता था तो वे लोग मेरे सम्बोधन के समय आग्रह किए कि पंथी भजन गाइये.मैंने पंथी और मंगल भजन गाया मेरे साथ भजन मण्डली गाये और युवा उत्साही गण पंथी नर्तन किए...कार्यक्रम में केशव सतनामी,दीपक,खैमराज,सुनहर,ओमप्रकाश चंड्रा बिशाखा,प्रमिला,मोहर लीलावती, पार्वती,बेनु रत्नसेर,धन सतनामी,दीपांकर चौधरी,भोलाराम रौटियां.लखन रोहित बिशाल,अज़ला,सुमन,जैसे युवा महाविद्यालियन छात्र छात्राएं भी सम्मलित रही और प्रश्नोत्तर क्रम भी चला.
रात्रि भोजन समीप नाम घर समीप महाकवि मनोहर दास नृसिंह परिवार के प्रतिष्ठित शिक्षक तुलेश्वर सतनामी के घर हुआ. जहाँ राजधानी रायपुर,बेलासपुर के विकास और गिरोदपुरी, सिरपुर राजिम शिवरीनारायण तीर्थं की बातें बस्तर की चर्चाएं होती रही...इस बीच लोरीक चंदा, नाचा, भरथरी जस जवारा भोजली की भी बातें चली लोग कौतुक वश पूछ रहें थे और मैं आधे -अधूरे ही सही इनसाईकलोपीडिया टाइप युवाओं बुजुगों के उत्तर देते छतीसगढ़ की महानतम संस्कृति का आस्वादन कर भी रहा था...
रात्रि विश्राम दीपचंद भैया के घर हुआ जहाँ पर सतनाम साधिका नर्मदा भाभी से आध्यात्मिक चर्चाएं हुईं.वे गुरु घासीदास आसन परिवार से जुड़ी हुईं अपने घर गुरुगद्दी स्थापित की हैं और नित्य सुबह शाम आरती ध्यान करती हैं.समय समय पर सत्संग प्रवचन भी.वे वहाँ समाजिक रुप से चर्चित और प्रतिष्ठित हैं उनकी बेटी डॉ पनीता एवं पुत्र विप्लव सतनामी भारतीय नौसेना में कार्यरत हैं.मायका वाले बलौदाबाजार के आसपास के गाँव हैं तो एक तरह से और भी आत्मीय बड़ी दीदी जैसी लगी क्योंकि मैं भी बालौदिया  हूँ जबकि ससुराल पक्ष रायगढ़िया हैं.
. सुबह चीला और मिर्च पाताल चटनी की नास्ता से मन तृप्त सा हुआ पान सुपाड़ी खाकर जैसे ही निकले की एडवोकेट लिखेश्वर सतनामी जी अपनी मारुती डिजायर लेकर हाजिर हों गये.काजीरंगा नेशनल पार्क से लगा सतनामी बाहुल्य गाँव कौरी पाथर जाने के लिये जँहा मिनीमता स्मृति भवन बन रहें हैं.. रास्ते में हरी- भरी वादियों से गुजरते जा रहें थे और  मेरे मोबाईल से ब्लूटुथ से मेरे ही छत्तीसगढ़ी गीत भजन सुनते हुए बीच बीच में सतनाम संस्कृति और असम में सामाजिक/ धार्मिक गतिविधियों पर बातचीत करते रोमांचक यात्रा ...यहाँ करीब 13 लाख से ऊपर छत्तीसगढ़ मूल के लोग निवासरत हैं.रामेश्वर तेली सांसद और राज्य मंत्री हैं अनेक जिला जनपद और निगम मंडल के सदस्य हैं.बगनियाँ लोग के नाम से चिन्हित और जाने वाले प्रवासी छत्तीसगढियों में सामाजिक सौहार्द हैं और परस्पर रोटी- बेटी भी हैं. ये लोग छत्तीसगढ़ी के कारण आत्मीय भाव से जुड़े हुए है परन्तु तेजी से युवाओं में छत्तीसगढ़ी विलुप्ति की ओर हैं यह दुःखद हैं इसके लिये छत्तीसगढ़ सहित असम प्रान्त में भी काम करने की अत्यंत आवश्यकता हैं अन्यथा पुरी संस्कृति समाप्ति की ओर चली जाएगी क्योंकि भाषा ही संस्कृति की संवाहिका हैं. मैंने कहाँ कि छत्तीसगढ़ के शहरों में सिंधी गुजरती मारवाड़ी पंजाबी व्यापारी हैं और विगत100-150 वर्षों से बसें हुए पर वे लोग अपनी भाषा संस्कृति खान- पान,रहन -सहन को यथावत रखे हुए हैं. हमलोगों को भी चाहिए कि उन लोगों का अनुशरण कर अपनी भाषा -संस्कृति को सहेज रखें...पर हमारे ही पढ़े -लिखे लोग उदासीन ही नहीं विरोधी नज़र आते हैं यह विडंबना हैं.
.   असम और पूर्वोत्तर की लाइफ लाईन ब्रम्हपुत्र नदी का दर्शन हुआ.पुल पार करते हुए मैंने रुकने और फोटो खींचने का आग्रह किया. प्रतिबंध के बाद भी सुबह ट्रेफिक कम होने से एक मिनट दो -तीन पोज के लिये किनारे कार रोके...सदानीरा ब्रम्हपुत्र का दर्शन से मन हृदय पुलकित और रोमांचित हुआ.
.   सतनाम धर्म के गुरुमाता और छत्तीसगढ़ की प्रथम महिला सांसद मिनीमता जी के जन्म स्थान  जहाँ पर भव्यतम स्मारक हैं जो कि काजीरंगा नेशनल पार्क से लगा खोखन जूरी के पास ही मनोरम ग्राम "चिकनी पाथर "के बारे में चर्चा करते हुए पहुंचा .हमलोगों की आगमन स्वागत की सूचना और वीडियो फोटोग्राफ असम ग्रुप में डाले जा चूके थे फस्वरूप हमलोग को राजकीय अतिथि और गुरुगोसाई जैसा अकल्पनीय सम्मान मिला...हमारी श्रीमती जी तो बहुत ही गौरवान्वित और आल्हादित हुईं जा रहीं थी क्योंकि यह सब वो पहिली बार देख और महसूस कर रही थी.मुझे तो दो चार बार का अनुभव भी था. बहरहाल हमलोग 12 बजे पहुँचे ब्रिटिश जमाने का स्कूल परिसर से लगा कोलियाबार के चिकनी पथार गाँव में छत्तीसगढ़ की सांसद छाया वर्मा जी द्वारा प्रदत्त 20 लाख राशि और सामाजिक सहयोग से अत्यंत सुंदर  मिनी सतनाम भवन निर्मित हैं उसी के प्रांगण में हमारी कार रुकी...महिलाए बच्चे बड़े बुजुर्ग आरती थाली नाड़ीयल और फूल मलाए लिये स्वागत में खड़े थे...हमलोगों को परघाकर और पाँव पखार कर सभागार में ले गये जहाँ माता जी की छायाचित्र लगे हुए थे.हालांकि भवन पूर्ण हों चुका था पर उद्घाटन नहीं हुआ था...एक तरह से स्वागतार्थ पहला कार्यकम उस भवन में हुआ जो हमारे लिये सौभाग्य ही है.
.  वहां स्वागत सत्कार उपरांत एक कार्यक्रम सा ही हुआ.सुदूर छत्तीसगढ़ की कथा कहिनी जैसे मधुर यादें और यहाँ की जीवन संघर्ष के बारे में बातें की गई मिनीमाता और आगमदास गोसाई की संस्मरण भी सुनाये गये.मैंने सचिव छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग की हैसियत से आग्रह किया कि अपनी संस्मरण को छत्तीसगढ़ी हिंदी में या कोई रचनाकार लेखक कवि हों तो उनकी रचनाओं का पाण्डुलिपि जो छत्तीसगढ़ और असम केंद्रित हो को आयोग भेजिएगा निःशुल्क प्रकाशित कराएँगे और राज्य की जिलों में भेजेंगे लेखक साहित्यकार का सम्मान भी करेंगे...इसका प्रचार -प्रसार भी करें.ऐसा आव्हान भी किया.कार्यक्रम में दाऊराम,नामदास,बिमल सतनामी ,संजय ठाकुर, अमरदास पनिका,भोलाराम रौटिया, दुर्गा दहरिया,प्रियंका,गुणवान्ति,जुगत,इंदल मानदास,कृष्णा कुर्रे सहित अनेक महिलाए बच्चे उपस्थित रहें.

 सेवनिवृति की ओर अग्रसर शिक्षक दादूराम सतनामी की वयोंवृद्ध माता जी नें मिनीमाता की संस्मरण सुनाई बहुत गोरी चिट्टी और रानी जैसी थी.वो यहाँ आती थी हमलोग बचपन में देखी हैं मैं भी वैसी थी तो मुझे प्यार दुलार भी की...बुजुर्ग माता जी सचमुच में गौरवर्णी और मधुर भाषिणी थी. वो बताई कि सामने जो पेड़ दिखाई दे रहा हैं वहां गुरु अगमदास जी का हाथी बंधया था.जिसपे वो लोग चढ़ कर आते थे.यहाँ बहुत जंगल और रास्ता नहीं था पैडगरी था.मोर ददा बड़का महंत रहिस.वो आग्रह कर अपने घर ले गई  खुलाआँगन ढेकी,जाता जैतखाम और छत्तीसगढ़ के किसी महंत गौटिया के घर जैसा ही लगा... मैं तो ढेकी कूटा और अनीता जाता दर कर देखी.उनकी बहुये और बाल गोपाल हमलोगों की हर्ष से स्वागत  स्नेह पूर्वक भोजन कराई...पान सुपाड़ी जो प्रायः हर घर उगाई -खाई जाती हैं यहाँ की संस्कृति बन गई हैं,खिला कर विदाई की.
.       बहुत सी ऐतिहासिक बातें जंगल साफ कर गाँव बसाने और  खेत बनानें की दास्तां सुनते गये इधर परिश्रमी और साहसी लोग धनाढ्य भी होते गये अनेक बड़े हैसियतदार भी हों चूके हैं.कुछ लोगों की बड़े बड़े चाय बगान भी हैं...
हमारी कार दौलगांव की ओर तेजी से बढ़ती जा रही थी क्योंकि वहाँ मिनीमाता स्मारक का दर्शन करना था.बार -बार लोंगो का आग्रह रहा कि कुछ दिन रुकिए आराम से जाइएगा.मदन सतनामी शंकर साहू जी का भी आग्रह था पर छुट्टी नही था.कैसे वक़्त पल में बीतते गया पता ही नहीं चला...शाम 6 बजे तक गौहाटी पहुंच कर निलांचल पर्वत में स्थापित सुप्रसिद्ध कामाख्या दर्शन भी करना था क्योंकि प्रातः ही रायपुर के लिये प्लेन था.
.  रास्ते में एक संपन्न सतनामी कृषक ट्रेक्टर से धान मिसाई कर रहा था सड़क से लगा ब्यारा का राचर था.कार रुकी... साहेब सतनाम हुआ.हवेली नुमा घर देख अच्छा लगा उससे पता चला चाबीदार वहीं स्मारक में प्रतीक्षा कर रहा हैं...कार चालक मित्र बताये यंहा भी सतनामी बाहुल्य पढ़ा लिखा सम्पन्न लोग हैं और बरार कार माता जी की स्मारक बनवाये हैं..वहाँ पंहुचा और भव्य सुंदर अस्मिस वस्तुशिल्प के अनुरुप स्मारक बने हैं सामने जैतखाम भी  जहाँ कुछ दिन पूर्व ही भव्यतम रुप से गुरु घासीदास जयंती पर रंग रोगन और पालो चढ़ाये गये हैं.दर्शन कर कृत्य कृत्य हुआ. कलांतर में यह स्थल  सतनाम धर्म के पुर्वोत्तर भारत में स्थापित यह प्रमुख तीर्थ के रुप में जाने जायेंगे...इस मंगलकामनाओ के साथ  हमलोग थैलामारा बस स्टेण्ड की ओर चल पड़े थोड़ी देर बाद बस स्टेण्ड पहुँचे सामने से आधी भरी खाली बस आई... आराम से सीट मिल गये!  दोनों जोड़कर अभिवादन में खड़े हाथ हिलाते और आइयेगा के आग्रह भाव और फुलान गमछा गोल टोपी खुरई,सुपाड़ी,चाय की ताजी पत्ती सहित अगाध प्रेम भाव से पगी हुईं "मया के मोटरी " बांधे हर्षित हृदय,पुलकित मन  में यह विचार करते बस में बैठे गंतव्य की ओर बढ चले...
ज़ब सोसल मीडिया और पर्यटन प्रेम के चलते 2000 कि मी सुदूर छत्तीसगढ़ी जनता  से जोड़ने क्यों दोनों राज्य की महत्वपूर्ण कड़ी मिनीमाता जी के नाम से दुर्ग या रायपुर से डिब्रुगढ़ या गोहाटी तक सीधा रेल सेवा आरम्भ हों. ताकि सुगमतापूर्वक परिजन आ जा सकें सगे -संबंधी जुड़ सकें. सांस्कृतिक धार्मिक व्यापारिक संबंध भी बेहतर हों सकें इनके लिये केंद्र और दोनों राज्य के प्रतिनिधि गण मिलकर सार्थक पहल कर सकतें हैं. 
. इस तरह अविस्मरणीय रोमांचक, ज्ञानवर्धक, सुखद और प्रेमल यात्रा सम्पन्न हुआ.


जय छत्तीसगढ़ जय असम जय भारत 

.  डॉ. अनिल कुमार भतपहरी / 9617777514
 सत श्री ऊँजियार सदन 
सेंट जोसेफ टाउन अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़

Wednesday, January 8, 2025

सहर म चुनई

छकड़ी 

सहर म चुनई बाजारूँजी बाजही 
नेता गाही परचारक मन  नाचही 
फेर भासन ले रोजी-रासन नंदा गे 
धरम-करम अउ जात-पात गंजा गे 
भीथिया म नेतन के नाव  लिखाही
फेर का  चपके  बटन ह चपकाही?

डॉ.अनिल भतपहरी / 9617777514