Wednesday, May 29, 2024

छकड़ी:वर्णाश्रम संस्कृति/ आबे तय मोर पारा

[5/22, 9:27 AM] Dr. Anil Bhatpahari: हो... आबे तय मोर पारा
 हो आबे तय मोर पारा 
 तरसत     में , हे  देखे बर जी.iवरा  bhn   n।   । ।
हो राजा तरसत हे देखे ब.9. M. .bm';!र जीवरा...

हाय कैसे आवव तोर पारा 
लगे मोर बर पाहरा 
हो रानी        कैसे आवव तुहर पारा...
W
हाय.. आबे तय सझा के बेरा 
आबे तय  सांझा के राजा 
हमर बियारा बीबीबीबी  mr 5  के पीपर ओधा...

हो लाहु तोर बर फूल गजरा 
 ओ रानी लाहू तोर बर फूल गजरा 
अउ आंखी मे आँजे बर कजरा...
[5/23, 7:31 PM] Dr. Anil Bhatpahari: छकड़ी 

वर्णाश्रम संस्कृति की भाषा संस्कृत हैं 
आरंभ से अपने को ही करते उपकृत हैं 
कितने ही एकलव्यों के अंगूठे काटे गए 
छल_ प्रपंच से ही यहां अर्जुन गढ़े गए
कोई सुन ले शब्द तो कान में सीसा डाले गए 
यदि बोल ले तो उनकी जिह्वा तक काटे गए 
देख लो सभी इनकी  प्रत्यक्ष  करस्तानी 
लकर धकर की घानी आधा तेल आधा पानी

Thursday, May 23, 2024

सूत्र वाक्य और सूत्र कथ्य

#anilbhattcg       #satshrisatnam 

बुद्ध पूर्णिमा पर सूत्र वाक्य व सूत्र कथ्य 

1.तथागत बुद्ध के अनेक नामों में से एक प्यारा नाम "सच्चनाम" है।
2यह नाम भाववाचक संज्ञा है। जिसका चित्त हृदय मन पवित्र और परम सतमय हो जाते है उसे सच्चनाम कहते हैं। 

3संतमत में सतनाम ,सत्पुरुष और निर्वाण,सतलोक के ऊपर गहरी आस्था हैं।
4 सतनाम धर्म को आदि धर्म की भी संज्ञा दी जाती है।
5सत्पुरुष और सत्यवती (आद्या देवी, अस्टंगी देवी) के पुत्र ब्रम्हा,विष्णु, महेश माने जाते है।
 5 श्रमण संस्कृति में सतनाम का अतिशय महत्व है 
 6 सतनाम संस्कृति में परिश्रम, जप ,तप त्याग और सादगी पूर्ण जीवन यापन की बाते है।
7 सत्संग,शोभायात्रा, और कृषि जनित पर्व उत्सव मानने महापुरुषों की जयंती मानने की संस्कृति हैं।
सतनाम को विविध भाषा और परिक्षेत्र में निम्नवत समझे जा सकते हैं।

       
1पालि में   "सच्चनाम"     एशिया सहित सभी बौद्ध देश 
2मराठी सहित अन्य भारतीय भाषा में "सत्थनाम" महाराष्ट्र कोकन 
3छत्तीसगढ़ी  कोसली उड़िया में "सतनाम "छत्तीसगढ़ उड़ीसा 
4ब्रज अवधि में "सत्तनाम "उप बिहार नेपाल 
5हिन्दी में सत्यनाम संपूर्ण भारत 
6पंजाबी में "सतिनाम "
7रेखता उर्दू फारसी में "शतनाम "इस्लामिक देशों में 
(सूफी संत इनका प्रयोग करते हैं)

इस तरह सतनाम की 7 विशिष्ट उच्चारण जम्बूद्वीप भारत वर्ष में रहा हैं। जिसपर करोड़ों लोगो की आस्था है।

    डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

Saturday, May 18, 2024

खटाखट

#anilbhattcg 

छकड़ी 

  खटाखट 

बाजत  हे  बाजा  दमादम 
नाचत  हे  जम्मा  छमाछम 
लोगन  तारी  पीटे फटाफट 
गर्मी में  ठंडई  पीते  गटागट
भरोसा के फर फरही लटालट 
नोट  खाता में आही  खटाखट

               -डा अनिल भतपहरी

Tuesday, May 14, 2024

मुक्ति

#anilbhattcg 

आटे में नमक की तरह चुटकी भर दर्शन 

   "मुक्ति" 

मुक्ति मरन ही हैं या कहे मरन ही मुक्ति हैं ।
लख चौरासी योनि  भटकाव और जीवन चक्र से मुक्ति यह व्यक्ति को जीते जी सद्गुणी बनाने की सुंदर अलंकृत उक्ति हैं। ताकि रहस्य समझकर इसी जीवन में सद्गुणी होकर चले लोक कल्याण करे। पर कर्मकांडी लोग बेचारे समझ रहे जीव को परलोक स्वर्ग और मोक्ष की ओर दान दक्षिणा के लोभ में ले जाते हैं।
   देखा जाय तो अनेक संताप,व्याधि आदि से युक्त जीव का तड़फते मरना कष्टमय दु:ख हैं ,जबकि हसते -खेलते मरना सुख हैं। जनमानस में सुखमय मृत्यु की कामनाएं करते वृद्धजनों को बोलते सुने भी जा सकते हैं।
मृत्यु से बढ़कर कोई शांति और आनंद नहीं! ऐसी लोक में विश्वास और धारणा भी देखने -सुनने मिलते हैं।
  सच कहें जीवन एक संघर्ष हैं और व्यक्ति सदैव असंतुष्ट। पल भर की खुशियां फिर ज्ञात -अज्ञात दुख: से आक्रांत!इसलिए कुछ पल के लिए संसार संघर्ष से ध्यान हटाने और शांति तलाशने की क्रिया करते व कराए जाते हैं। जो क्रिया करते हैं वह साधक शिष्य और जो यह कराए वह गुरु। 
  परंतु आजकल यह  व्यवसाय  के बड़ी तेजी से फल फूल भी रहे हैं। मरता न क्या करता सभी सुख और शांति की तलाश में भटकते मिलते हैं। ऐसे में निराला की निरालेपन भी आकर्षित करते हैं _

   वासना की मुक्ति मुक्ता त्याग में त्यागी 
    अब निराकार समझ से परे लगे तो लोग भक्ति की ओर प्रवृत हो अवतारों की कृपा पाने और उनके चरणों में जगह पाने आतुर चरणामृत और देवलोक गामी होने लगे हैं। बकायदा वैतरणी पार होने गोदान में लगे भारत को प्रेमचंद जैसे ही  लोग समझ समझा सकते हैं। पर कोई समझे तब न? 
  जबकि अध्ययन मनन चिंतन और दर्शन से मृत्यु के भय से जो मुक्त हो वही स्थितप्रज्ञ की अवस्था को पाते और कबीर की तरह उन्मनी हो गा उठते हैं _

    जाऊ रे निर्गुण निर्भय...
जस की तस धर दीनी चादरिया गाकर शांत होते लोगों को बिहारी झकझोरते हैं _
  तंत्री नाद, कबित्त रस, सरस राग, रति-रंग। 
     अनबूड़े बूड़े, तरे जे बूड़े सब अंग॥ 

  पाप और पुण्य की तलाश में चित्रलेखा सृजित करते महायोगी को भोगी और भोगी की योगी बनने की यात्रा कितना अल्हादकारी हैं। सत्य प्रेम करुणा को ही ईश्वर कहने वालों ने मानुष को  सत्यनिष्ठ प्रेमी व कारुणिक बनाने नैतिक सीख दी पर क्या वे हुए?
   दुनियां कितनी तंगदिल हो गए हैं प्रेमगली अति साकरी भी तभी तो गा उठे -

निरदईया निरमोहना मन के हिरदे में मया जगाबोन
मया बताबोन  मया सिखोबोन गीत मया के गाबोन 

पर इससे किसे मुक्ति मिलते हैं और कौन मुक्त हुए? यह हम  जैसे अबूझो के लिए प्रश्नातित हैं...यात्रा जारी हैं कुदरत की करिश्मा को समझने ...मंजिल का मिलना या दीदार होना यात्रा का थमना भी एक तरह से मुक्ति ही हैं !
स्वकल्याण की सोच साकार हुवे नहीं तब लोक कल्याण की कामनाएं व्यर्थ ही हैं और यही सर्वत्र चल रहे हैं। 
तो प्यारे  आज इतना ही।
मिलते हैं कभी कभार तब तक के लिए...व्यस्त ,मस्त और स्वस्थ रहे.... जय जय।