Monday, April 15, 2024

तुरते ताही


।।तुरते ताही करय कारवाही ।।

गरब करन कि सरम काही सुझत नइये 
मनीपुर के   धधकत आगी बुझत नइये
नान  चुक राज  के  जबर हवय  बिपत 
दू समुदाय के मांझ खुरखूंद झगरा बिकट  

एकेच भुइंया एकेच नदियां एकेच जंगल पहार   
एकेच गांव म बसेरा सब के एकेच खेत- खार 
बसय तीर -तखार सबो के एकेच डीह -डोंगर 
मीत -मितानी  सगा पहुनाई रहय सांगर- मोंगर

कुकी अउ मैतई मन ल काय होगे हवय 
लगथे उन मन ल कोनो बेमझाय हवय 
धरम- करम   ल राजनीति   म साट के 
दुनो झन  ल   परलोखिया  मन बाट के 
 
राज करत  अप‌न तिजौरी  ल भरत हे 
उचका के एमन ल चाउर कस छरत हे 
माईलोगन के मान मेटा के काय कर लीही 
हाय लगही एकर कतेक ल ओमन तपही 

करतुत छलियन के करम अब जग भर बगरही 
अपनेच ढीले दांवा म भंग-भंग ले ओहूमन जरही 
ज इसन  करही  तइसन फल  तो  पाबेच करही 
बोही  बंबरी के  बीजा त निपोर ले आमा   फरही 

फेर संसो कि ये संकट के अब तक उबार नइहे 
लगथे उहा अब कोनो जवाबदार  सरकार नइहे 
राज शासन सके नही त केन्द्र करवाही  करय 
धधकत  मनीपुर  ल अब  तुरते ताही बचावय 

नइते   जंगल   कस आगी   बबलतेच   जाही 
तीर-तखार के पाना -पतई मन त लेसातेच जाही  
देखे बर हरियाली सबन  आखी हर तरसही 
चारो मुड़ा लेसाय जराय धुंगियाय रंग रही जाही .

जोन समृद्ध खुशहाल राष्ट्र के सपना देखे हन 
राज पा के राज करे के सपना सजाये हन 
अपन कला संस्कृति धर्म -कर्म के गुन गाये हन 
सब बिला जाही जतनो एला ,मुस्कुल से राष्ट्र पाये हन  

         - डा. अनिल भतपहरी / 9617777514

।।सतनाम ।।

भारतीय जनमानस में‌ सतनाम की सात तरह की विशिष्ठ ध्वनि है - सत्थनाम , सच्चनाम , सत्तनाम , सत्यनाम  सतिनाम  सतनाम और शतनाम । ऐसा जान पड़ता है कि   यह शब्द प्राचीन सिन्धु धाटी सभ्यता मे भी व्यवहृत होते रहे होन्गे। श्रमण और कृषि संस्कृति में  सतनाम साधक व सुमरन करने वाले समुदाय बेहद प्राचीन संस्कृति के लोग हैं। बुद्ध पूर्व 26 बुद्ध और हो चूके है । बुद्ध का आशय  बुद्धि या ज्ञान से है। जिन्हे मर्म का सत्य का ज्ञान हो चुका जो सब कुछ को समझ गया वही बुद्ध या ज्ञानी हैं।  राजकुमार सिद्धार्थ को सत्य का  बोध ( ज्ञान) हुआ तो वे ज्ञानी अर्थात् बुद्ध हुआ । 

  बहरहाल बुद्ध के अनेक नाम मे सच्चनाम भी एक नाम हैं।
यह नाम भावनात्मक रुप से है।
क्योकि वे राग द्वेष मोह से रहित होकर उनका चित्त मन हृदय सत मय हो गया था इसलिए  उसे  सच्चनाम कहे गये। आगे  वही क्रमिक विकास मे सत्तनाम हुआ।
सत्तनाम संत मत का लोकप्रिय शब्द है और यह कल्पित या मिथकीय  ईश्वर से अलग यथार्थ व ऐतिहासिक शब्द नाम हैं। सतपुरुष भी इसी तरह संत मत में ईश्वर के समनान्तर शब्द हैं।
     सतनाम पंथ में गुरुघासीदास को सतनाम बाबा  भी कहे जाते है ।इसका मतलब गुरु घासीदास सतनाम हो गया ऐसा नही हैं।
   सच्चनाम ठीक सतनाम बाबा जैसा संतो या अनुयाई द्वारा श्रद्धावश पुकारे गये नाम हैं।
    बहरहाल इतना तो अवश्य है कि  भारत वर्ष मे लगभग सवर्ण समुदाय  त्रिदेव सहित  राम कृष्ण को मानते है ।जबकि अवर्ण या अस्पृश्य धोषित कर दिए गये जनता जो कभी प्राचीन बौद्ध धर्म के महायानी हीनयानी और सहजयानी थे उन्ही वर्गो समुदायों मे संतो गुरुओ का आगमन हुआ और वही लोग सतनाम का अलख जगाए।
वर्तमान मे सिख सतनामी कबीरपंथी रैदासी वगैरह तमाम समुदायों मे केवल " सतनाम  "  के कारण परस्पर सौहार्द्र स्थापित होने लगे है। उपसना और कुछेक मान्यताओं मे अंतर हो सकते है पर सत ज्ञान और परस्पर सहयोग के मामले मे सभी सतनाम के अनुयाई  अपने अपने धर्म गुरुओ और प्रवर्तकों के संदेशों के अनुरुप समान ही हैं।
ढोंग पांखड और चमत्कार आदि के जगह कर्मवादी और पुरुषार्थ से भरा हुआ आदर्श समाज की संरचना गुरुओ के कारण हुआ हैं।
   वे लोग जाने अनजाने में छोटी मोटी संकीर्णताओं व मान्यताओ के आधार पर सतनाम के मार्ग से न भटके और  न  ही परस्पर प्रतिद्वंदिता रखें। क्योकि डिवाइड एंड रुल वाले आपको सदियों से बाट कर राज करते आ रहे है उनकी नीयत को समझिए और उनके षडयंत्र से बच कर रहें। 
    यह कैसी विडंबना है कि ये सतनाम उपासक  उंगली मे गिने जाने वाले ऐतिहासिक  8-10 संत/ गुरु को एक नही मान सकते और वे उधर मिथकीय  तैतीस कोटी को एक कर सबको उसी में बांध छांद कर रखे हुए हैं।

Friday, April 12, 2024

बागी

#anilbhattcg 

सफदर हाशमी के नुक्कड़ नाटक और उनकी प्रभावशाली प्रस्तुतियां मजलुम और जरुरतमंद  व्यक्ति की पीड़ा की अभिव्यक्ति रही हैं।
व्यक्ति स्वतंत्रता और स्वाभिमान की दास्तान राजा गुरुबालकदास और उनके अभिन्न मित्र शहीद वीर नारायण सिंह की दास्तान से जुड़ जाती हैं।जिसे साम्राज्यवादियों ने निर्मम हत्या कर कुचलने का असफल प्रयास किये।
   

श्रद्धांजलि -

कट जाए आन में सर 
तो गम नही 
कहते हैं वो नर 
नर नही 
जो गाहे बगाहे 
सर झुकाता है 
लाल सलाम हाशमी तुम्हे
एक बागी कवि कहता हैं
           
      
         घटनोपरांत  हाशमी के ऊपर  पोष्टर कविताएं भी  लिखा तब कालेज में पढ़ थे ... कुछ पंक्तियां स्मृत होने लगा - आज उनकी जन्मदिन पर उन्हे सादर श्रद्धांजलि
           
                        डा. अनिल भतपहरी

Wednesday, April 10, 2024

कलाकार ,निराकार को साकार करता है

#anilbhattcg 


"कलाकार निराकार को साकार करता हैं।"



साहित्यकार एक तरह से  कलाकार  हैं और इनसें अपूर्व सृजन होते हैं । दोनों मिलकर ऐसा रचते है कि दुनियां सम्मोहित और चमत्कृत हो जाते हैं। इनकी बनिस्पत  तख्तो- ताज व सत्ताएं तक मिलती हैं। अनेक तरह की इबारते लिखी व मिटाई जाती हैं।
    सच कहे तो रचयिताओं ने इतिहास भूगोल सब कुछ बदल कर रख देते हैं। दिखते वह अदना सा पर कमायत लाने की माद्दा रखता हैं। भले जीते जी  उपेक्षित रहे और अपने व परिजनों के लिए कुछ कर न सके पर कलान्तर में यही लोग प्रवर्तक के रुप में जाने - माने जाते हैं। कुछेक तो सौभाग्यशाली होते है कि छप कर ख्याति पाते है और यदा -कदा चहेतों में सम्मानित हो पूज लिए जाते हैं। 
   पर इस महादेश की संस्कृति में दुर्जन  मरकर सज्जन ही क्यो  देवता तक  हो जाते है ।तब यह लोग  जनमानस में अमरत्व भाव पा जाते हैं ।
  एक उक्ति है-" चंद्रगुप्त  विक्रमादित्य सम्राट था और कालिदास  कवि है ।
  
बहरहाल साहित्यकार  अक्षरों व शब्दों को तराशकर जोड़कर वाक्य संरचना कर  निराकार (अमूर्त) भाव को साकार ( मूर्तमान) करता हैं।
    कलाकार शब्द प्राय: चित्रकार,  मूर्तिकार ,कारीगर ,संगीतकार ,नर्तक ,अभिनेता आदि के लिए रुढ़ हो गये हैं।और कवि,गीतकार ,कथाकार नाटककार ,व्यंग्यकार निबंधकार आदि साहित्यकार मान लिए हैं।
 जबकि यह वर्ग भी कलाकार की श्रेणी में ही हैं। तो दोनो कलाकार ही हुये ।
   कबीर ,जायसी ,सूर, तुलसी , रैदास ,रसखान  केशव घनानंद के दोहे ,सवैये कवित्त  में शब्दों को नगीने की तरह जोड़कर कलात्मक रुप में गढ़े गये  प्रतीत होते हैं। एक शब्द भी इधर -उधर कर के देखिए लगता है कि किसी अन्य कारीगर से पूर्व बने  हार या कंगन में हुए टूट - फूट को पुन:  रसवाए या जोड़े गये हैं । इसी तरह मूल रचना में छेड़छाड़ किये गये है यह स्पष्ट: झलकता हैं। अभी भी कुछेक नई रचना में कलात्मक और अपूर्व भाव दिख जाते हैं।
  इस तरह देखे तो "साहित्यकार और कलाकार का काम अव्यक्त को व्यक्त करना हैं। यानि निराकार भाव को शब्दों / रेखाओं -रंगों / सुरों- तालों /अभिनयादि   द्वारा साकार करना हैं।"

उक्त कथ्य  को सुक्तबद्ध करे तो -

 कलाकार निराकार को साकार करता हैं।

Tuesday, April 9, 2024

नववर्ष में नवदर्शन

#anilbhattcg 

नववर्ष मे नवदर्शन 

प्रश्न यक्ष सा
हर बार क्यों
इसका ,उसका 
आपका हमारा  
मेरा - तुम्हरा 
नहीं हो सकता 
चल रहा देश
संविधान से  
कि भगवान से 
यदि एक से 
तब दो की 
जरुरत क्यों

*       *     *
इहलोक को 
सुधारेगा संविधान 
परलोक को 
सुधारेगा भगवान 
यह साधारण सा 
उत्तर नही चाहिये 
क्योकि लोग 
 इहलोक की 
चिन्ता करते कहां है 
उसे तो परलोक की 
चिन्ता खाए जाती है 
इसलिए भाड़़ मे जाए 
इहलोक और संविधान 
कृपा कर सलामत रहे  
परलोक और भगवान 

*          *          *

इसलिए तो 
आजकल के  
असाधारण लोग 
सुधारने में लगे है परलोक 
मनाने में लगे है भगवान 
वाह रे! कद्रदान 
तुने ताक पे रखा है 
देश और संविधान 
पर बताओं तो सही 
ऐसे में  कहां कैसे 
रहेगा इंसान 
कोई जाएगा भाड़ में 
ऐसा कह बच नहीं सकते 
समेट बोड़िया- बिस्तर 
करके तीतर -बीतर 
झाड़कर पल्ला 
उठाकर झोला 
कहीं जा नहीं सकते 
सब कुछ साफ़ साफ़ 
भले हमारा न सही 
यक्ष प्रश्न के उत्तर 
बताना पड़ेगा 
नहीं तो तेरा 
कोई गति नहीं 
सच कोई सद्गति नहीं 
ॐॐ
     - डा. अनिल भतपहरी / 9617777514
      
             #anilbhatpahari #satshrimusic

Friday, April 5, 2024

करमा माता

श्रम की देवी करमसेनी संत  करमा माता जयंती की लख लख बधाई ।

श्रम की देवी करमसेनी करमा माता जयंती पर विशेष 

             श्रमण संस्कृति यानि परिश्रम से जीवन यापन करने वाले समुदाय का‌ धार्मिक / आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले संत महात्मा अपनी विशिष्ट धार्मिक  यात्रा हेतु  प्रायः जगन्नाथपुरी आते रहे हैं। इनका प्रमुख कारण हैं यहाँ भेदभाव से रहित सदाचार व्यवहार शायद इसलिए यह प्रसिद्ध कथन हैं - जगन्नाथ के भात को सबै पसारे हाथ ... 
सतनाम पंथ के जगजीवन साहेब , दूलनदास साहेब ,गुरुघासीदास साहेब ,कबीर पंथ के धरमदास साहेब , संत माता कर्मा आदि श्रमिक कृषक  लघु व्यवसायी समुदाय के संत महात्मा दर्शनार्थ व संत समागम करने गये और समुद्र तट पर आध्यात्मिक चिंतन मनन कर अपने -अपने मतो‌ ,सिद्धान्तो को सुदृढ़ व व्यवस्थित कर समाज में बेहतरीन कार्य किए। जबकि समकालीन समय में उन्हें अपने परिक्षेत्र के समुदाय में सामाजिक वर्जनाओं को  गहराई से सहन करना पड़ा था । वे लोग यहाँ की यात्रा कर के  ही युगान्तरकारी कार्य निष्पादन कर महान प्रवर्तन किया।
     टीप - बुद्ध का एक नाम जगन्नाथ भी हैं। यहाँ तीन प्रतीकात्मक प्रतिमाएँ  यक्ष स्वरुप में करुणा (कृष्ण भद्र ) प्रज्ञा (बलभद्र )व शील (सुभद्र ) का हैं। तीनो का एक साथ उपस्थिति से ही जगत का कल्याण संभव होता है। 
    इस गुढार्थ भाव को संत महात्मा भंलिभांति समझकर जग कल्याण के मार्ग पर प्रवृत्त होते हैं।
    बौद्ध धम्म में जगन्नाथ मंदिर को‌ प्राचीन बौद्ध विहार ही माना गया हैं।   अशोक के कलिंग विजय के बाद समस्त कलिंग या उत्कल प्रदेश बौद्ध एंव श्रमण संस्कृति का प्रमुख केन्द्र के रुप में विकसित हुआ ।
      श्रमण संस्कृति, संत मत और जगन्नाथ पर सम्यक् दृष्टिपात कर " सत संधान " की दिशा में गुणी जन विचार कर सकते हैं।

       कृष्ण भद्र (करुणा ) बलभद्र (प्रज्ञा ) सुभद्र ( शील‌)
    भवतु सब्ब मंगलम्

करमसेनी एंव करमा माता जयंती

श्रम की देवी करमसेनी संत  करमा माता जयंती की लख लख बधाई ।

श्रम की देवी करमसेनी करमा माता जयंती पर विशेष 

             श्रमण संस्कृति यानि परिश्रम से जीवन यापन करने वाले समुदाय का‌ धार्मिक / आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले संत महात्मा अपनी विशिष्ट धार्मिक  यात्रा हेतु  प्रायः जगन्नाथपुरी आते रहे हैं। इनका प्रमुख कारण हैं यहाँ भेदभाव से रहित सदाचार व्यवहार शायद इसलिए यह प्रसिद्ध कथन हैं - जगन्नाथ के भात को सबै पसारे हाथ ... 
सतनाम पंथ के जगजीवन साहेब , दूलनदास साहेब ,गुरुघासीदास साहेब ,कबीर पंथ के धरमदास साहेब , संत माता कर्मा आदि श्रमिक कृषक  लघु व्यवसायी समुदाय के संत महात्मा दर्शनार्थ व संत समागम करने गये और समुद्र तट पर आध्यात्मिक चिंतन मनन कर अपने -अपने मतो‌ ,सिद्धान्तो को सुदृढ़ व व्यवस्थित कर समाज में बेहतरीन कार्य किए। जबकि समकालीन समय में उन्हें अपने परिक्षेत्र के समुदाय में सामाजिक वर्जनाओं को  गहराई से सहन करना पड़ा था । वे लोग यहाँ की यात्रा कर के  ही युगान्तरकारी कार्य निष्पादन कर महान प्रवर्तन किया।
     टीप - बुद्ध का एक नाम जगन्नाथ भी हैं। यहाँ तीन प्रतीकात्मक प्रतिमाएँ  यक्ष स्वरुप में करुणा (कृष्ण भद्र ) प्रज्ञा (बलभद्र )व शील (सुभद्र ) का हैं। तीनो का एक साथ उपस्थिति से ही जगत का कल्याण संभव होता है। 
    इस गुढार्थ भाव को संत महात्मा भंलिभांति समझकर जग कल्याण के मार्ग पर प्रवृत्त होते हैं।
    बौद्ध धम्म में जगन्नाथ मंदिर को‌ प्राचीन बौद्ध विहार ही माना गया हैं।   अशोक के कलिंग विजय के बाद समस्त कलिंग या उत्कल प्रदेश बौद्ध एंव श्रमण संस्कृति का प्रमुख केन्द्र के रुप में विकसित हुआ ।
      श्रमण संस्कृति, संत मत और जगन्नाथ पर सम्यक् दृष्टिपात कर " सत संधान " की दिशा में गुणी जन विचार कर सकते हैं।

       कृष्ण भद्र (करुणा ) बलभद्र (प्रज्ञा ) सुभद्र ( शील‌)
    भवतु सब्ब मंगलम्