Thursday, April 4, 2024

खतरे में हैं

#anilbhattcg  #satshrimusic 

इसने  कहा   धर्म  खतरे  में  हैं 
        उसने कहा  संविधान खतरे में हैं 
                किसी ने कहा लोकतंत्र खतरे में है 
                      पर कोई नही कहता इंसान खतरे में हैं‌

                    
                       - डा. अनिल भतपहरी

Monday, April 1, 2024

मतावर के मजा

#anilbhattcg 

मतावर के मज़ा 

छत्तीसगढ़ म तको मतावार उत्सव मनाए जाथे
बचपन में हमर ममा गांव बुड़ेरा के मतावार म होय एक घटना के रोचक आंखिन देखी वृतांत सुनव-
  गरमी छुट्टी म ममा गांव जाय के रिवाज हवे । गरमी छुट्टी म जब बुन्देली ( पिथौरा ) ल अपन गांव जुनवानी आन त पथरा के घर म हमन ल  बिकट दंदियाय अउ  कुहरय मार चरचर ले घुम्मरी तको उबक जाय। चुहरी चितावर म बुड़े राहन। बिजली तको गांव म न इ लगे रहिस ।  1981 म बिजली आइस  । ओती बुन्देली म बिजली के चिभुक लगे राहय त गाव ह हम  ल इका मन ल झुंझुर -झइंहा  लागय।  

 वैशाख पुन्नी के तस्मई चीला अउ नवा किसिम के डालडा डारे खस्ता /कार्टुन  जोन महासमुन्द के बस स्टेण्ड  के होटल म बेचाय  ले के बिकट खान।  ओसनेहे करायत अउ तिली मिझार मां घर म  बनावय  उहु ल झोला -झोला धर के  ममा गांव बुड़ेरा के माटी अउ पटउहा वाला धर म ससन भर राहन  उहा के बडे बडे तरिया बुड़े राहन ...
  हमन ममा मौरा मन के बेटा बेटी माने अपन भाई -बहिनी मन ल "  मर्रा तरिया म बुड़े रा " या केवल बुड़े रा कहिके अबड़ कुड़कावन । 

     हमर ममा मन के आमा बगिचा  घुघवाडीह ( केंवराडीह )बांधा के खाल्हे म हवे । उहा कुंआ बारी तको रहय अउ एक अकड़ खेत म ककड़ी कलिंदर साग- भाजी बोवय। बांधा के खाल्हे होय ल गरमी म तको पानी पझरय अउ बिकट साग भाजी उपजय । ममा मन के 27 पेड़ आमा  अभी तक हवय। सब पेड़ के नाम तको धराय हे। गरती कोलपद्दा खोलहा लोढ़ा आमा के रुख म चढ़ डंडा पंचरंगा तको खेलन अउ केकरी फूट अउ  नवरंगी  खावन। कलिंदर जादा नई होय।  कुंआ के कंछ बरोबर पानी पीयन बांधा मेड़ के बेल तोरन अउ गुर मिंझार शरबत पीयन 
      हावा बडोरा म आमा मन टूट के झर जाय त सकेल के बैलागाड़ी म खरोरा बजार  ममा/ नाना  संग  बेचे तको जावन। बुड़ेरा म ही सबसे पहिली टेलीबीजन म सनीमा देखेन । उहा स्कूल म लगे राहय अउ हर इतवार फिलिम आवय । दुश्मन फिलिम अउ ओकर गीत आजो ले मन बसे हवय ... देखो देखो बाइसकोप देखो अउ दुश्मन दुश्मन दोस्तों से भी प्यारा हैं।
         त ओ दिन के बात आय जब मै पांचवी पास हो गे रहेव अउ पुरा महासमुन्द शिक्षा जिला म दूसरा आय रहेंव 
पहला मोहित नायक नाव के लड़का आय रहिस । बचपन  ले  उतअइल रहेव फेर थोरिक  हुसियार होय के सेती गांव पारा लेके नता - गोता तको मन मोला बने मान दय । ममा मामी मन तो चरन पखारख अउ मोर भात छोड़े रवा प्रसाद खाय । रोजेच गंज के एक थारी भात परोस देय अउ हेरवाय म हेरय तको नही , मोला भात छोड़े म कन उर लगाय काबर कि बुन्देली के जे घर म राहन उहा बाबु मितान बदे राहय त उहा के सियनहा बसुदेव  बबा कड़क राहय ओहर भात थारी म छोडे ले सख्त नराज हो जय। त  ओकर प्रभाव रहय । मै उपराहा खा डरव तेकरे सेती बचपना ले मोट डाट दोहरी बदन के होगेव लगथे । ममा मामी मन रवा प्रसाद पाय बर जी ओड़हरे ब ईठे राहय।
   का मान गौन आदर सेवा सत्कार गा सिरतोन ममा गांव सरग सरीख लगय अउ मै सिरतोन गुरु अउ देवता बन जाव ! 
हमन ममा के मंडल आन ... पांच ममा रायपुर  के ,तीन ममा घुघवाडीह के  अउ बड़ मयारुक ममा रामनाथ बुड़ेरा ओकर संगे संग गांव भर ममा ।

 मा के मायका तीन गांव म हवे।  नाना गौटिया  बिशालदास कहत लागय तोरला नवा रायपुर अउ चटौद दो गांव के किसानी । ओकर पांच बेटा म अकलौती मोर मां। ओमन रायपुर के लेंडी तालाब पार म राहय अउ किसानी कम करय छुटपुट व्यवसाय करय अउ गौटियाई के मंजा उड़ाय। 
बुड़ेरा ह  मा के ममा गांव आय, ओकर तीन ममा म  सबसे बडे ममा के बेटी नही एकेझन बेटा रामनाथ सोनवानी कहत लागय। ओ जमाना म फोर्ड टेक्टर ,  किलोस्कर पानी पंप ,12 ठन साईकिल  किराया चलय अउ सांउड सिस्टम । उहचे तावा म लक्ष्मण मस्तुरिया , लक्ष्मी बंजारे , बैतलराम साहू के गीत सुनन अउ बजावन । नागिन , पाकीजा , शोले क्रांति नदिया के पार , सिलौरी बिन चटनी कैसी बनी जैसे गीत के तको डिमांड रहय । मय कभु कभु छठ्ठी बिहाव म ममा संग माईक फिट करे तीर- तखार के गांव संग म चल देव । मा के लालन पोषण पढाई लिखाई  बर बिहाव सब बुड़ेरा म होइस ते पाय के प्रमुख माइके अउ ममा गांव बुड़ेरा आय।
   तीसरा घुघवाडीह ह नानी के गांव राहय पुरा गांव उकरे राहय अउ गांव भर के हमन तीनो भाई भांचा राहन ।  तीनो जगा एक महिना के गरमी सीज़न काटन । तहा गांव म धान बोनी करवा के बुन्देली चले जान ।
  हर बेर दादी सतवंतीन रोवत बिदा करय ... नान्हे नान्हे छौना धर के तुमन महुरा झन खाव चले जा बुन्देली कथे उहचे जावत हव । बदली काबर न इ करवास कहिके बाबु संग बिकट झगरा तको होवय न दाई के सगा न ददा के उहचे मगन हव का मोहिनी खावाए हे ... बड़ बबकय अउ  दबकारय तको । 

   सिरतोन तो आय बुन्देली म मया मोहिनी खवा के हमन ल जतने रहिन उहो के दादा दादी अउ कका काकी मन ।
  हमर जनम स्थान जुनवानी भले आय फेर गोकुल वृंदाबन तो बुन्देली आय  । बाबु जी ह  सोनवानी परिवार संग मीतान बद के पुरा गांव के लागमानी होगे । मोर  बाल्यावस्था प्रायमरी शिक्षा मोहक वन प्रांतर चारो खुट पहाड़ ले घिरे  रम्य जगा  म होइस । 
  
  त बुड़ेरा म हमर ममा घर तीर के डबरी म मतावर तिहार मनाय जात रहिस ।गांव भर लोगन उमिहाय रहिन । केवट ढ़ीमर  झन सौखी ,  चोरिया ,पेलना ढुटी धरे राहय।
मार माई पिला बाल बच्चा सहित मछरी झोलत टमड़त राहय । पुरा चिखला माते रहय । तरिया के पानी अट गे रहय अउ लद्दी म सब सनाय रहय अउ सब झन मोला जवारा बिसर्जन के भैंसा सुर असन लगय।
    हमन ममा संग साईकिल म तरिया पार पहुचेन । मै आगु डंडी म बैठे राहव अउ उकर हो हल्ला अउ चिखला म सनाय उडंत घोडंत अपन चिन्हार संगी साथी ल देखत मंजा लेत टिंड़िग टिडिंग घंटी बजाय धर लेंव ।
     ममा ह एक गोड़ म टेकाय खड़े राहय ... ओ दिन मय सफेद बनियान पहिने रहेंव , सब संगी मन मोला बलाय खेले बर चिखला म घोलंडी मारे बर । मोर मन होगे राहय काबर इकर संग बियारा म हमन कब्बडी खेलत दिन पहावन । 
   ममा रोकिस तय इही मेर खडे  राह भांचा मै एक झन से मिलके आत हव ... तुलमुलहा तो रहव दादी के कहे अनुसार बरजे बात नइ मानव...  महु ह  पार ल उतर अउटे पानी तीर जाके  पथरा म खड़ा होगेंव!  तभेच एक झन ह अपन संगी जोन टुकना धरे ओकर फेकत मछरी ल बिनय अय धरय । तेन ल  मछरी टमड़त निहरे कहिस - जबर बाबर धराय ले बने धरबे  कहिके फेकिंस ओकर जोर से चिचियाई ल सुन के मछु सावधान हो देखे लगेंव ... ओकर बेला कमतीआगे अउ ओकर फेके मछरी ह रटाक ले मोर पेट म परिस ..अउ खाल्हे जमीन म गिर गिस । मोर बनियान पुरा सना गे ... अउ लोगन के एती  चिहुर परगे ... सांप सांप भागो -भागो ... उहु ल भीड़ ह सलमलात बांबर समझ  डंडा म पीट डरिस ।
   सिरतोन ओहर जल डोमी राहय कि ढोढिया अब तक पता नही फेर मय सुकुड़दुम हो गेंव। भारी डर लगाय ... ममा ओला बड़ खिसयाइस अउ ओहर दुसर डहर भाग गे।
     थोरिक देर बाद मोला समझा बुझा के जहुरियां टूरा मन मोला लेगे अउ घोंडा तक दिस फेर ओदिन मोला सिरतोन कहत हव मज़ा नइ आइस ।भलुक डरडरावन लगिस,फेर लोगन  बहुत ही आनंदित रहिस । अइसन  सार्वजनिक आन्दोत्सव मतावर के  मज़ा अउ सजा मय ए उमर म अउ कहु नई देखेंव न पाएव ।
   जय जोहार

Sunday, March 31, 2024

तोर सुरता आवे न

रिगबिग चंदैनी उवे 
सुघर ये मन लूभावे 
पुन्नी के चंदा देख
तोर सुरता ह आवे 
रानी तोर सुरता आवे न ..

रिगबिग चांदनी uve
जोत्था झोट्ठा जोगनी बरे 
सुध लम्हे तोर डहर
 मिले बर मन ह हदरे 
राजा तोर सुरता आवे न ...


महकत हवय मोंगरा 
मुड़ म तोर खोचे गजरा
लगथे तय तीर मे आगें
रानी तोर सुरता आवे न 

निकल के घर दुवारी
पहुचेव कुआ बारी 
सुने निक ददरिया गाये न 
मन मयूर झुम्मर नाचे न

अमलीडीह रवि 31-3-24 शाम 7 बजे ।

Thursday, March 28, 2024

बोलोगे तो बचेगी कहावतें

बोलोगे तो बचेगी कहावतें 
       - डा. अनिल कुमार भतपहरी 
कहावतें को लोकोक्ति भी कहें जाते हैं। कहावत के रुप रुढ़ हो चली लोकोत्तियां को उदाहणार्थ भी प्रस्तुत किये जाते हैं। 
 देखा जाय तो लोकोक्ति दो शब्दों के मेल से बना  हैं, लोक + उक्ति = लोकोक्ति। लोक  यानि समुदाय और उक्ति यानि कथन । समुदाय किसी  कथन का  यथावत निरंतर  प्रयोग अपने दैनंदिनी में करते आ रहे हो  और वह एक विशिष्ट अर्थ या भाव को अभिव्यक्त करने के लिए रुढ़ हो चुका हो वह वाक्यांश या सूत्र लोकोक्ति के रुप में जाने जाते हैं और सतत प्रचलन से वे प्रसिद्ध हो जाते हैं।
 यह लोकोक्ति काव्यात्मक स्वरुप लिए अलंकृत और सटीक शब्दों की सुगम्फित संरचना होती हैं। जो कि सहज ही  हृदयंगम और बोध जन्य हो जाते हैं। 
   कृष्णचंद्र शर्मा के अनुसार " लोकोक्ति वह संक्षिप्त चमत्कारपूर्ण वाक्य हैं, जिसमें किसी अनुभूति एवं तथ्य की चिंतनपूर्ण अभिव्यक्ति होती हैं।"1 

    जन समुदाय परस्पर लोकाचार व क्रिया व्यापार में प्राय: अपनी बातों  को प्रभावी ढंग से कहने और मनवाने  के लिए लोकोत्ति एंव  मुहावरें का प्राय: प्रयोग करते  हुए आ रहे हैं।‌इसलिए हमारी लोक भाषाओं में सर्वाधिक लोकोत्तियों का अनुप्रयोग देखने को मिलती हैं। यह इतना सहज और सरल उच्चारणीय हो गये है कि अनायस लोगों के मुंह से प्रसंग व घटना देख बोलचाल में निकल पड़ते  हैं-
जैसे तीन तिकाड़ा काम बिगाड़ा , काम न काज  के दुश्मन अनाज के  
नाच न जाने आंगन टेढ़ा 
चोर -चोर मौसेरे भाई 
हाथ कंगन को आरसी क्या 
या सांच को आंच क्या 
 उक्त शब्द सरंचना काव्यात्मक तो है उनमें विशिष्ट भावार्थ भी समादृत हैं। इसलिए पाश्चात्य विचारक जान एग्रीकोला कहते हैं-
Short sentences in to which ,as in rules ,the ancientas hav compressed life " 2
   यानि वे लघु वाक्य ,जिनमें सूत्रों की तरह पूर्वजों ने अपनी जीवनानुभूतियों को व्यक्त किए हैं।
इस तरह की लोकोक्ति जन सामान्य के बीच बहु प्रचलित हैं। 
इसलिए कहे जा सकते हैं अभी इनका क्षरण या विस्मरण की अवस्था नही हैं। पर बहुत तेजी से हिन्दी और स्थानीय भाषा बोली का यह अलंकृत विशिष्ट शब्दांश के जगह अंग्रेजी के शब्द या कोटेशन का चलन बढ़ोतरी हो रहे हैं। जिससे यह क्षरण की ओर अग्रसर हैं। इनका संरक्षण कोश आदि बनाकर नही अपितु बोलचाल में व्यवहृत करने से होगा। उदय नारायण तिवारी जी   "लोकोत्तियों को अनुभूत ज्ञान की निधि कहें हैं।" 3 इस तरह देखे तो यह  भाषा और साहित्य ही नही मानव समाज के  लिए अमुल्य धरोहर हैं। 
    लोकोक्ति प्राय: पद्यात्मक या लयात्मक होते है और उनमे छंद विधान भी विद्यमान हो जाते हैं।
    मनुष्य की सुख -सुविधा व सूचना व मनोरंजन  हेतु ईजाद पत्र - पत्रिकाएं  ,आकाशवाणी, दूरदर्शन विविध टी वी चैनल्स अब केवल संचार माध्यम या समाचार आदि के लिए  मीडिया  बस नही रहा बल्कि  अब  विलास की सामाग्री के रुप मे विकसित हो चूके हैं। इसमें  मोबाइल  इंटरनेट, ब्लाग, वाट्साप, इंस्टाग्राम रिल्स युट्युब   एंव विविध एप आदि के द्वारा वैश्विक फलक पर प्रसिद्धि व रोजी - रोजगार के मार्ग भी प्रशस्त हो रहे हैं।  इसमें अंग्रेजी का बोल-बाला है । अब तो इतने ट्रांन्सलेटर एप आ चुके है कि भाषानुवाद अब बेहद सरल हो गये फलस्वरुप हिन्दी का चलन और मोबाइल की बोर्ड मे हिन्दी की  देवनागरी लिपि अब अंग्रेजी की रोमन लिपि ने  लेखन स्थान बना लिए हैं। तब इस दौर मे बोल चाल व लेखन से मुहावरा व लोकोक्ति की क्षरण या उपयोग कमतर होते जाने की स्थिति स्पष्ट रुप से परिलक्षित हो रहे हैं। जबकि यह किसी के कथन को सुस्पष्ट व प्रभावी बनाते हैं-

बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद 
 यह अनभिज्ञ और व्यर्थ प्रलाप करने वालों के लिए सटीक बैठते हैं। 
 इसी तरह यदि कोई ढोंग कर रहे है और लोगों को धोखा दे रहे हो उनके लिए यह लोकोक्ति देखिए कैसे प्रभावी हैं-

नौ सौ चुहा खाकर बिल्ली हज को चली 
  और शत्रु को आदर देने से उनका हृदय परिवर्तन होता है तथा उन्हे अपना बना सकते है यह नीति युक्ति कितना संप्रेषणीय हैं। इसे छत्तीसगढ़ी मे गुरुघासीदास की अमृतवाणी के रुप में भी जाने जाते हैं। उनकी अनेक उपदेशनाएं व सूत्र कथन लोकोक्ति के रुप में प्रचलन में हैं-

  "बइरी ल ऊंच पीढ़ा देव ।"

  इसी तरह आत्मबल और मन की शक्ति को हर संभव बनाए रखने हेतु नीति कथन है-
मन के हारे हार है मन के जीते जीत ।‌
  प्रेम प्रसंग पर प्रेमी जोड़े की चाह को समाज में मान्यता देने यह लोकोक्ति दर्शनीय है -
 "लड़का लड़की राजी तो क्या करे काजी "
  कृषि प्रधान देश मे कृषि से संबंधित अनगिनत लोकोक्तियां हैं-
    तिरिया रोवे मरद बिन खेती रोये जलद बिन 
    बाल बियासी रोपा धान 
          तेला पछिने आवै आन 
        
  लोकोक्तियों में  प्राय: शब्द शक्ति  निहित होती हैं। शब्द शक्तियां तीन है - अमिधा ,लक्षणा और व्यंजना ।
अमिधा - अमिधा का कार्य संकेत या बिंब ग्रहण करना है । पंडितराज जगन्नाथ के अनुसार - "शब्द एवं अर्थ के परस्पर संबंध को अमिधा कहते हैं।" 4
 जैसे -सास बिन ससुराल क्या 
    सांच को आंच क्या 

लक्षणा - मुख्य अर्थ के जगह रुढ़ि   या प्रयोजन से मुख्यार्थ के योग से कोई अन्य अर्थ लक्षित होते है उसे लक्षणा कहते हैं। डा सुधाकर कलवडे के अनुसार - मुख्य अर्थ को छोड़कर जहां रुढ़ियां प्रचलन के कारण अन्य अर्थ ग्रहण किया जाता है वहां रुढ़ा लक्षणा होती हैं। 5 
प्राय: लक्षणा शब्द शक्ति से युक्त अनेक लोकोक्तियां देखने / सुनने मिलती है - 
बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद 
नौ दिन चले अढ़ाई कोस 
होनहार बिरवान के होत चिकने पात 
  जब अमिधा और लक्षणा युक्त लोकोत्तियां शब्द व्यापार या अर्थ प्रतीति मे समर्थ न हो या बेहद साधारण हो तब विशिष्ट अर्थ प्रयोजन हेतु व्यंजना का अनुप्रयोग की जाती हैं। 
जैसे - चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात 
मुख मे राम बगल में छुरी 
   इसके साथ ही लोकोक्ति मे प्रतीक / प्रतिरुप का भी अनुप्रयोग बहुधा होते हैं। डा. भागीरथी मिश्र ने प्रतीक को परिभाषित करते लिखते है - 
" अपने रुप ,गुण ,कार्य ,या विशेषताओं के सादृश्य एवं प्रत्यक्षता के कारण ,जब कोई वस्तु या कार्य किसी किसी अप्रस्तुत वस्तु के भाव विचार, क्रिया- कलाप, देश ,जाति ,संस्कृति आदि का प्रतिनिधित्व करता हुआ प्रकट किया जाता है, तब वह प्रतीक कहलाता हैं।" 6
  डा नगेन्द्र  ने प्रतीक को सरलतम ढंग से अभिव्यक्त करते है -  "प्रतीक एक प्रकार से रुढ़ उपमान का ही दूसरा नाम हैं।जब उपमान स्वतंत्र न रहकर पदार्थ विशेष के लिए रुढ़ हो जाता है तो वह प्रतीक बन जाता है।" 7 

राम तेरी माया कहीं धूप कहीं छाया 
यहा धूप और छाया सुख -दु:ख  का प्रतीक हैं।
गुणी और अवगुणी व्यक्ति के प्रतीक स्वरुप यह लोकोक्ति द्रष्ट्व्य हैं- 
सूप बोले तो बोले चलनी तक बोलें 
बिंब - प्रतीक की तरह लोकोक्ति मे बिंब की प्रभावशाली उपस्थिति होते है और अर्थ की प्रतीति को पुरी तरह उजागर करती हैं।
जैसे जरुरत मंदों के बीच किसी एक वस्तु की उपयोगिता कितनी महत्वपूर्ण होते है यह देखिए -
   एक अनार सौ बीमार 
या ऊट के मुंह मे जीरा 
हाथी के मुंह में सोहारी इत्यादि 
   इसी तरह जहां से लाभ मिल रहा हो वहां के कष्टप्रद स्थिति भी सह्य होते है - 

दुधारी गरुवा की लात मीठ 8 

मुहावरा या लोकोत्ति जीवन निर्वाह  प्राय: हर क्षेत्र में देखे जा सकते हैं। यहां तक कि पशु पक्षी कीट पतंग  मनुष्य के अंग -प्रत्यंग और उनके क्रिया- व्यापार आदि का उल्लेख भी इनमें मिलती हैं। इनके द्वारा भी प्रभावी कथन कहने की परंपरा रही है-
जैसे-  भैंसा के  सींग भैसा ल गरु 
छत्तीसगढ़ी (व्यर्थ का भार )
भैंसा का सींग बुढापे मे उनके लिए भार हो जाते हैं।

 
टीटही के भरोसा सरग नइ रुके (छत्तीसगढ़ी )
टीटही एक पक्षी बादल की गर्जना  सुन वे अपनी घोसलें को बचाने दोनो पैर से आकाश को रोकने का प्रयास करती हैं।
  तो उनके ऐसा करने वर्षा थमती नही ।
इसी तरह मनुष्यों के अंग का उल्लेख निम्न लोकोत्ति में द्रष्ट्व्य हैं- आंखे पथराना  (मृत्यु के ठीक पहले की अवस्था)  
आंखे दिखाना  (गुस्से से देखना)     प्रयोग -शिक्षक ने आखें दिखाई 
या आंखें  नीची करना - लज्जित होना ।
उनकी गलती पकड़ी ग ई तो उनकी आंखें नीची हो गई ।9

वस्तु या सामाग्री को लेकर भी रोचक लोकोत्तियों का प्रयोग देखने मिलती हैं। कुछ तो आरंभ से है या पुराने है कुछेक न ई वस्तु के प्रचलन के बाद उनकी प्रवृत्ति के अनुरुप प्रचलन मे आये जान पड़ते है - 

किताबी कीड़ा होना =  पढाकू होना 
प्रयोग -केवल कीताबी कीड़ा होने से नही चलेगा कुछ तो व्यवहारिक   ज्ञान होना चाहिये ।
सुपा बोले तो बोले चलनी भी बोले - जिसमे दोष नही वह बोले तो समझ आते है पर जिसमे छिद्र ही छिद्र याने दोष ही दोष हो वह बोले तो बात असह्य हो जाते हैं।

तूफान खड़ा करना = बवाल करना ।
प्रयोग - पदाधिकारी ने उसे अकमर्ण्यता के लिए डांटा तो उसने तूफान खड़ा कर दिया। 10
   
    आजकल युवा पीढ़ी  टीन  एजर के वार्तालाप में से  लोकोक्ति या मुहावरा  नही सुनाई देती । तब यह चिंता स्वभाविक है कि इन सुक्त मय सुंदर शब्वालियों को कैसे संरक्षित  किया जाय। किताबे छापकर या उनके संग्रहण  कोश बनाकर ही नही बल्कि इसे फ्लुयेंट यानि  सहज उच्चारण में लाकर टीन एजर या न ई पीढ़ी में कैसे आरोपित करें ? हमें इस यक्ष प्रश्न का उत्तर तलाशने होन्गें। 
       इन प्रश्नों के उत्तर हेतु चिंतन मनन करने से एक ही प्रभावी उत्तर सामने आते है और वह है बोलने से ही बचेगी कहावतें अन्यथा यह विलुप्ति हो जाएन्गे ।आजकल हिन्दी के साथ -साथ स्थानीय लोक भाषाओं का भी व्यवहार पढ़े -लिखे वर्गों में सीमित हो रहे हैं। आधुनिक संचार माध्यम  नेट मोबाइल आदि ने वैसे भी जन साधारण को अनबोलना कर रहे है ऐसे में लोकोक्ति , मुहावरे , पहेलियों से उक्त मोहक व मजेदार वार्तालाप क्षरण की ओर हैं। यह सब पहले नाट्य मंचों फिल्मों आदि में बहुतायत प्रयोग होते थे अब वहां भी इनका प्रयोग कमतर होते जा रहे हैं। 
   अत: लोगों मे इनका प्रचलन बढे इस हेतु सार्थक प्रयास करने होन्गें।
 क्योकि बोलोगे तो बचेगी कहावते 
इसके सिवा कुछ और नही हैं राहें 


संदर्भ - 
1  डा. गीतेश अमरोहित , छत्तीसगढ़ी कहावत कोश  पृ 13 वैभव प्रकाशन रायपुर 2016 

2 डा गीतेश अमरोहित , छत्तीसगढ़ी कहावत कोश पृ 14 , वैभव प्रकाशन रायपुर 

3 वही पृ 12
4 आचार्य मम्मट काव्य प्रकाश 2/6
5 साहित्य शास्त्र परिचय पृ 45
6 डा भागीरथी मिश्र काव्यशास्त्र पृ 255
7 डा नगेन्द्र काव्य बिम्ब पृ 7 
8 डा गीतेश अमरोहित छत्तीसगढ़ी कहावत कोश पृ 161  वैभव प्रकाशन रायपुर 2016 

9  आचार्य डा. हरिवंश तरुण मानक हिन्दी मुहावरा -लोकोत्ति कोश पृ 15 
प्रकाशन संस्थान नयी दिल्ली 
10 आचार्य डा. हरिवंश तरुण मानक  हिन्दी मुहावरा - लोकोक्ति कोश  पृ 141
प्रकाशन संस्थान नयी दिल्ली 
        - डा. अनिल कुमार भतपहरी ( 9617777514 ) 
    सचिव 
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग 
 सेक्टर 27 छत्तीसगढ़ गृह निर्माण भवन द्वितीय तल अटल नगर नवा रायपुर छत्तीसगढ़

सजाएं हैं गुलिस्तां

#anilbhattcg 

सजाएं हैं गुलिस्ता 

कतारबद्ध चलती हुई 
बचींटियों की पंक्ति को 
छेड़ना तक नागवार हैं
जो जहां पनपा उसे 
वहां से हटाना दुश्वार हैं
कोई हक नही तुम्हें 
किसी को बेवजह 
प्रताड़ित करो 
या उन्हें दिग्भ्रमित कर 
अन्यत्र विस्थापित करो 
अनावश्यक हस्तक्षेप कर 
उन्हे शासित करो 
चलिये विवश है अभी वे 
बेचारें बिखर जायेगें 
अट्टाहास तुम्हारा 
यूं मसल कर रख देंगें‌ 
पर यह मत भूलों 
कि चींटी हाथी को भी 
मार डालती  हैं
वक्त बलवान सदा 
सबको मौका देती हैं
तुम तो कुछ भी नहीं 
फिर भी इतराते हो 
बस्तियां उजाड़ते हो 
शोषण दमन विस्थापन को  
विकास समझ कर 
सत्ता की रौब झाड़ते हो 
मूल्यों और आस्थाओं की 
बातें कर लच्छेदार 
बन बैठे हो सूबेदार 
रहना खबरदार 
अबकी बार 
बिखरी हुई पंक्तियां 
तलाशते अपनी अस्मिता 
एकत्र हो सजाएं हैं गुलिस्तां 
पहरेदार ये चींटियां 
तिलमिलाकर काट खाएगें 
ढो ले जाएंगी तेरी बोटियां 
चढ़ेगी नहीं चूल्हें पर
बार-बार काठ की हड़ियां
झंहिउञ
      - डांअनिल भतपहरी 9617777514

28 मार्च 24 ऊर्जा पार्क प्रात: 9 बजे चींटियोंर।।इ।ल।के कतार देखते हुये ।

Wednesday, March 27, 2024

प्रीत किया मन मीत बनाया

प्रीत किया मन मीत बनाया 
गीत लिखा संगीत सजाया 
धन दौलत भी सब जोड़ लिया 
जीने के भ्रम से मरने लगा रोज 
पर एक दिन जीना छोड़ दिया 
सतनाम सुरना छोड़ दिया ....
 

नौकर चाकर मोटर गाड़ी 
जीवन तेरा  वैभवशाली 
रहा सफर हरदम प्यारे, पैदल चलना छोड़ दिया ...

तेरी बातों  मे है  जादू 
बेकाबु भीड़ करता काबु 
जीवन भर कहते रहे पर  मौन रहना छोड़ दिया ...

उड़ते आकाश फिरते विदेश 
सम्मानीय सदा देश- विदेश 
सोना सा जीवन तेरा पर ढ़लना छोड़ दिया

भरता रहा सब रीते गागर 
उपलब्धियों का रखा सागर 
बुझा न प्यास तेरा प्यारे,जल रखना छोड़ दिया

सेक्टर 27 नवा रायपुर ,  27-3-2024 बुधवार 3.55 बजे

Tuesday, March 26, 2024

तोर नयना म

तोर नयना म का जादू भरे हवय 
ओ मन देखे देखे करथे ।
तोर बयना म का जादू भरे हवय ग 
मन सुने सुने करथे ।

देखे हव  जब ले मय हर तोला 
चिटिक चैन नही नही तरसत हे चोला...

जस तोर हाल संगी तस मोर हाल 
तही मोर उत्तर अउ तही मोर सवाल ...

कका बबा संग म चल देव धामी मनाबोन 
अक्ती बिहाब बर चल मनौती मनाबोन  ...