Saturday, March 16, 2024

राष्ट्र हेतु नव गीत

#anilbhatpahari 

।।राष्ट्र  हेतु नवगीत ।।

मन में बसा हैं उसे 
चौंक-चौराहें पर बसा रहा 
जहाँ सुकून होते 
वहाँ रोज दंगा करा रहा 

करते खून श्रद्धा का 
हर बार भड़काकर भावना 
मंदिर-मस्जिद का खेला  
बिगाड़ते ये सद्भावना 

जाति धर्म सम्प्रदाय 
में बाटकर 
कर रहे हैं  राज 
तुम्हारे वोट पाकर 

कला संस्कृति तीज त्योहार 
मेले मड़ई हाट बाजार 
कपडे लत्ते चांऊर दार 
इसमें ही उलझाकर 

साध रहे हैं ये  स्वार्थ 
तुम्हे उल्लू बनाकर
तुम्हारा जंगल तुम्हारी जमीन  
तेरे कच्चे माल पर उनकी मशीन 

बैंक तुम्हारा पैसा तुम्हारा 
सत्ता से मिलकर सेंध मारा 
उद्योग धंधे छद्म कारोबार 
से कमाकर लाखों हजार 

देश की अकूत संपदा लेकर फरार 
छोड़ रहे देश ये नव धनाड्य हर बार 
होते जाते  क्यो इन के संग सरकार 
चुनते हो हरदम क्यों ऐसी सरकार 

अब तो जगों देशप्रेमियों 
अपना होश  सम्हालों 
जाति धर्म में बटो नहीं 
बटते देश को सम्हालों 
 
गर मतभेद रहा तो भी
कभी  मनभेद न करो 
छोड़कर पूर्वाग्रह सभी 
राष्ट्र हेतु सब एक रहो

    - डाॅ. अनिल भतपहरी / 9617777514

Friday, March 8, 2024

शिव का शिवगण बुद्ध बहुजन एवं गुरुघासी का संतजन

#anilbhatpahari 

शिवरात्रि पर विशेष -  

यह आलेख २०१४ से  सोशल मीडिया में घुम रहे हैं। 
     
   "महाशिवरात्रि पर तीन महान गुरु , प्रवर्तक  व्यक्तित्व और उनका प्रभाव "

    शिव बाबा का शिवगण   बुद्ध बाबा‌ का बहुज‌न  एंव गुरघासी बाबा का संतज

          
          भारतीय संस्कृति व जनमानस में उक्त  तीनो नाम मंगलमय व कल्याण कारक हैं । शिव शंकर  का शिवगण" बुद्ध  का "बहुजन" एंव गुरुघासी का "संतजन " जंबु द्वीप ,भारत वर्ष आम जन हैं। परन्तु दुर्भाग्यवश वर्तमान में जाने -अनजाने उपेक्षित हैं। शिव का भूत पिशाच पशु है ।बुद्ध का श्रमण  शूद्र है ।और गुरुघासी का  संतजन सत्यान्वेषी सतनामी होकर भी बहिष्कृत व तिरस्कृत ऐसा क्यो हुआ? कैसे हुआ  और ये सभी श्रमण संस्कृति के वाहक मेहनत  जनता  किस षडयंत्र का शिकार हुआ यह विचारणीय हैं। इन तीनों के अनुयाई  उत्पादक है , विराट स्वरुप में  है परन्तु परस्पर बटे हुए एंव भटके हुए हैं। ‌तथा इनके ऊपर चंद लोग इनके ही परिश्रम मे जीते इनके ऊपर ही राज कर रहे है ऐसा क्यो?
   क्या इनके भाग्योदय नही होगा या कहां पर इनके  विकास की धारा रुकी या ठहरी हुई है? इन पर विमर्श होनी चाहिये ।
   वर्तमान में इन सबको एकत्र होकर देश की संप्रभुता ‌को अर्जित करने मिलकर प्रयास करना चाहिए। वैचारिक एंव  सांस्कृतिक /साहित्यिक रुप से भी एकीकरण बौद्धिक जनों को करना चाहिए। ताकि सदियों की दासता से इन्हे मुक्ति मिले।
     
     बहरहाल आज शिवरात्रि के दिन शिव के साथ साथ बुद्ध और गुरुघासीदास के प्रदेय और व्यक्तित्व के संक्षिप्त तथ्यों एंव तत्वों को समझने के निमित्त यह आलेख सुत्रतात्मक स्वरुप में प्रस्तुत हैं - 

महादेव शंकर और महान संत  गुरु घासीदास में व्यक्तित्व में   कुछ समानताएं मिलती हैं या युं कहे शैव पंथ व सतनाम पंथ में कुछ समानताएं है । बाबा और गुरु नाम शैव सम्प्रदाय से भी संदर्भित है इसलिए अनेक विचारक उन दोनों में समाहार करते हैं।उन दोनों में कुछ साम्यता झलकते हैं जिनका उल्लेख निम्नवत हैं:-
1दोनों दाढ़ी मुछ जटा धारी  हैं। 
2खडाऊ कमण्डल युक्त हैं अर्ध विवृत देह ओजस्वी  स्वरुप वान हैं।
3 गंगा एक के जटा में तो दुसरे के चरण में
4 दोनों के अनुयायी मुख्य धारा से वंचितहैं। एक का भुत्त पिशाच तो दुसरे का अछूत दलित ।
5दोनों का दाम्पत्य जीवन। एवम दोनों का सामान वियोग।
6 सती भस्म होना  औरपुनः  जीवनदान सफुरा का भूसमाधि और पुनः जीवन दान।
7 दोनों वन पर्वत प्रकृति प्रेमी एंव सद्गृहस्थ हैं।
8 तपस्या समाधि योग में दोनों प्रवीण एवम अंतर्यामी।
9 दोनों का श्वेत ध्वज।
10 पावन दिन या बार सोमवार।
11 दोनों औघट दानी सदा लोक हितकारी 
12 दोनो नव प्रवर्तक  तपोनिष्ठ व  सत्यनिष्ठ  ‌है।
13दोनों के प्रतीक स्तंभ एवम ध्वज सफेद।
14 एक का शिवलिंग प्रतीक  दूसरे का जैत खाम  प्रतीक  दोनों  तेजस्वी व् उर्ध्गामी।
15 दोनों को कंठी या रुद्राक्ष माला प्रिय 
16 दोनों चन्दन तिलक धारी 
18 दोनों के पास सर्प ।
दोनों तपस्वी व् दिन दुखियों के स्वामी।
19 दोनों सत्यवादी व सतनाम प्रवर्तक  
20 दोनों बाबा व् गुरु पद धारी व् मंत्र द्रष्टा परम सिद्ध हैं।21 दोनों अव्यवस्था व् असत के विरोधी  क्रन्तिकारी।औरइस तरह का यह अप्रतिम संयोग इन दोनों जन अराध्यों में परिलक्षित हैं।

एक पौराणिक पात्र और ऐतिहासिक पात्र है । शैव नाथ सिद्ध बौद्ध सहजयान और सत‌नाम संस्कृति में आरम्भ से ही समन्वय भाव रहा है।  यह सुखद संजोग ही है  इस तरह की साम्यता व जनास्था जनजीवन में परिव्याप्त हैं।

      सत्यंम् शिवम् सुन्दरम 
सत श्री सतनाम। संसार सतनाम मय हो।

डा. अनिल भतपहरी , ९६१७७७७५१४

उक्त लेख में 
"प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद"

इस आलेख को अनेक ग्रुप में लोग शेयर किए हैं। और इनकी मिली जुली प्रतिक्रिया आई हैं। और संभवतः कुछ दिनों तक आते रहेन्गे।
        बहरहाल भारत  और विश्व में सत्य के प्रति जनमानस में अटूट आस्था हैं। और हमारा संपूर्ण वांड्गमय (साहित्य दर्शन आदि ) में उसी परम सत्य की महिमा गाई हैं। सत्य के साधक उपासक के व्यक्तित्व- कृतित्व भले अलग हो पर वे उसी सत्य के कारण लोक में पूजनीय हैं। उनके ऊपर गहरी आस्था हैं। 
  किसी के साथ किसी का  तुलना का अर्थ जहाँ जो चीजें  हैं उसे उन दोनो मतों -पंथो के  साथ कर रहे है।वहाँ  वह चीजें वैसा ही हो या हैं, ऐसा नहीं हैं।और न ऐसा समझना चाहिए। कुछ समानताएं है तो बहुत कुछ असमानताएं भी रहते हैं। इसलिए ही वे एक दूसरे से पृथक व स्वतंत्र रहते हैं। इस तरह सबकी अपनी अस्तित्व व अस्मिता कायम रहते हैं।
      संसार में अनेक मत ,पंथ संप्रदाय, मजहब रिलिजन हैं उन सब के परस्पर तुलनात्मक बातें  होते है किये जा सकते हैं। ताकि समानताओं को जान समझ कर अनुयायियों में  परस्पर सद्भाव व सौहार्द  बनी रहें ।
    बहरहाल सबकी अपनी -अपनी महत्ता हैं। अनुयाईयों में उनके प्रति गहरी आस्था हैं।
       इस तुलनात्मक विवरण को पढ़ - समझ कर लोग अपनी प्रतिक्रिया दिए वह उनकी अपनी समझ और विवेक हैं। 
     आप सभी का धन्यवाद 

।।जय सतनाम ।। नम: शिवाय ।।

[2:12pm, 21/05/2016] डाँ.अनिल कुमार भतपहरी:

  "तथागत बुद्ध बाबा  और गुरु घासी बाबा "

तथागत बुद्ध बाबा और गुरु घासी बाबा के जीवन चरित साधना सिद्धि उपदेश व क्रियाकलापों मे एक अनुपम साम्य है।
आज बुद्ध पूर्णिमा के पावन पर्व पर दोनो प्रवर्तकों के परस्पर जुडी समान मानवतावादी  दृष्टिकोण पर विचार करते है हालांकि दोनो के बीच दो हजार वर्ष का अन्तराल हैं। पर दोनो ने तत्कालीन सामाजिक वर्जनाओं के विरुद्ध जन जागरण चलाकर धम्म‌ और पंथ का प्रवर्तन किए जो वास्तविक रुप से धर्म की श्रेणी में आबद्ध है। एक  धर्म के रुप में प्रतिष्ठित हो चुका हैं,जबकि दूसरा प्रतिष्ठित होने के लिए  प्रयारत (लंबित) हैं।
आइए दोनों की साम्यता पर विहंगम दृष्टि डालते हैं-
१ जन्म पूर्व 
 उनकी  माताओं महामाया व अमरौतीन को  गर्भावस्था मे  अद्भुत  मनोहारी स्वपन  व विशिष्ट अनुभव हुये।
एक को हाथी और चमकते सितारे दिखी तो दुसरी आमा चानी और आगन मे (अन्जोर रौशनी )बिखरते देखे।
२. बचपन 
सिद्धार्थ के जन्म के बाद ज्योतिष आये और चक्रवर्ती सम्राट व साधु बन जाने के घोषणा किये। 
घासी के जन्म के बाद साधु आये शिशु को गोद व सर मे रख नाचने लगे।उनके नाम करण कर उनके पाव छु कर आशीष लिये।माता पिता हतप्रभ-सा देखते रहे।
३. बाल्यकाल 
दोनो  आम बच्चो से अलग ध्यान मग्न व शान्त चित्त कुछ खोजने जानने के लिये उद्विग्न।
पशु- पक्षी के उपर दया घायल का उपचार कर उन्हे दोनो द्वारा जीवन दान,महिमा मय व्यक्तित्व ।
४ युवावस्था
 पराक्रमी पुरषार्थी , विवाह 
स्वपसन्द वधु वरण। यशोधरा व सफूरा से।
एक का वैभव शाली विलासपूर्ण जीवन तो दूसरे का मर्यादा पूर्ण सुखमय जीवन।
५श्रेष्ठ गृहस्थ
 पुत्र प्राप्ति, 
६ जीवन मे दुख. का दिग्दर्शन  .
७जन जीवन की पीडा अभाव व तिरस्कार से विचलित मन शान्ति व कुछ सत्य की तलाश मे यात्रा 
८.वन मे  तप कठोर साधाना ६ वर्ष व ६ माह  
७ सिद्धी आत्म ज्ञान व आत्म साक्षात्कार ।
८ समाज मे आकर उन ज्ञान से सिद्धांत व उपदेश का प्रसारण ।
९ वर्तमान धार्मिक रीति -नीति सन्सकृति के समनान्तर सच्चनाम और सतनाम मत का प्रचार -प्रसार।
१० देशाटन प्रवास चातुर्मास रामत रावटी  ।
११ बुद्ध ने अष्टमार्ग पन्चशील २२ प्रतिग्या ३७ पारमिता।सहित अपना सच्च्नाम दर्शन जन भाषा पालि मे लोगो सहज समझ आने वाली सरल शब्द मे व्यक्त किये।
१२ गुरु बाबा ने सप्त सिद्धान्त ९ रावटी २७ मुक्तक ४२ अमृतवाणी व दृष्टान्त बोघ कथाओ द्वारा जन मानस को सरल जन भासा छत्तीसगढ़ी मे सतनाम दर्शन व्यक्त किये।
१३ दोनो सत्य अहिन्सा सादगी व प्रकृतस्थ जीवन को महत्त्व दिये।
१४ दोनो द्रष्टा व उपदेशक ।
१५ भिख्खु सन्ध का निर्माण
१६ सन्त समाज का निर्माण,  महंत साटीदार भंडारी 
१७ ढोन्ग पाखन्ड. मिथ्या भ्रम के जगह  सत्य की स्थापना।
१८ ईश्वर पन्डे पुजारी योग्य हवन
आदी  कर्म कान्ड के स्थान पर
सहज योग ध्यान समाधि का प्रचलन कराये।
१९ तर्क पर आधारित ज्ञान‌ मार्गी जीवन‌
२० निरंतर गतिमान , सत्संग प्रवचन और सात्विक रहन सहन श्वेत/ कषाय  वसन  
२१ जीते जी निर्वाण / परमपद की प्राप्ति !

प्राचीन बौद्ध ,सिद्ध  व पाली साहित्य के अध्ययन से यह भी ज्ञात होता हैं कि भारत बौद्ध मय था  बहुसंख्यक समाज परिश्रमी और सदाचारी थे उनका अस्तित्व आज पर्यन्त ग्रामीण जन जीवन में द्रष्टव्य हैं।  सहज सरल जीवन  दर्शन इन्ही संत गुरु प्रवर्तकों से ही जनमानस में ‌परिव्याप्त हुआ है।
बुद्ध उच्चरित पाली के सच्चनाम ही गुरुघासीबाबा उच्चरित छत्तीसगढी के सतनाम है।
बौद्ध सिद्धो की वाणी प्राचीन पंथी व मंगल भजनो में अन्तरध्वनित हैं।
    प्राचीन सहजयानी ही वर्तमान सतनामी हैं। 

   ।। सच्चनाम -सतनाम ।।

बुद्ध जंयती  की हार्दिक बधाई व मंगलकामनाएं 

  इस तरह से उक्त इक्कीस बिन्दुओं पर सामान्यतः विश्लेषण करे तो जो साम्यता दिग्दर्शन होते हैं।वह केवल संयोग ही नहीं अपितु दोनो के समान विचार धाराएँ है जो लोक कल्याण के मार्ग प्रशस्त करते हैं ।
      
                           डा. अनिल भतपहरी ‌
                              ९६१७७७७५१४ 
                           ऊंजियार - सदन अमलीडीह ,रायपुर

       -डा. अनिल भतपहरी/ 9617777514

Tuesday, March 5, 2024

गिरौदपुरी मेला को प्रभावित करने का षडयंत्र

।। गिरौदपुरी मेला को प्रभावित करने का षडयंत्र ।।
छत्तीसगढ़ के सरजमीं पर मानव मानव एक कह विश्व के प्रथम जातिविहिन वर्ग विहिन समानता और मानवता पर केन्द्रित विश्व प्रसिद्ध सतनाम पंथ (धर्म ) का प्रवर्तन गुरु घासीदास ने गिरौदपुरी में  औंरा -धौंरा तेदू वृक्ष के समीप विशाल मैदान में एकत्र हजारों जनसमूह के समक्ष  अपने सुदीर्ध साधना एंव देशाटन से प्राप्त सद्ज्ञान के द्वारा लोक कल्याण के निमित्त  फागुन शुक्ल सप्तमीं 1795 को  किया । उसी की याद मे प्रतिवर्ष लाखों लोगों का आगमन होते हैं। और सद्गुरु की कृपा और सत्संग से उनकी दिव्य वाणी का श्रवण कर तीन दिनो तक प्रकृतस्थ जीवन जीते आत्म शोधन करते हैं। यह संसार का अनुठा मेला है जहां पर कोई खेल- तमाशे य नाच -पेखन झूले  सर्कस  फिल्म प्रदर्शन आदि नही होते ।बल्कि पंथी मंगल भजन चौका आरती सत्संग प्रवचन सतनाम संस्कृति पर व्याख्यान मसला शोध संगोष्ठी व कवि सम्मेलन जैसे साहित्यिक व बौद्धिक परिचर्चाएं होते हैं।  यहा सात्विक आहार विहार ही होते है ।मांस -मदिरा नशीले पदार्थों तंबाकू गुड़ाखू बीड़ी सिगरेट शराब गांजे गुटखा इत्यादि प्रतिबंधित रहते हैं यह  सब चीज इसे अन्य मेले से अलग करते हैं। इसलिए इसे दुनियां के पवित्रम जगहों पर प्रमुख स्थान  प्राप्त हैं। इसलिए इनकी वैश्विक ख्याति हैं।
परन्तु इस तरह की छवि को धूमिल करने का प्रयास कुछेक वर्षों से कुछेक असामाजिक व शरारती तत्व करते आ रहे हैं। 
 यहां एक बार अफवाह फैलाकर दंगे कराए गये जिसमें हिंसक वारदातें हुई ।तब से मेला की भरावट में लगातार कमियां आई हैं। यह विशुद्ध धार्मिक व सामाजिक मेला है पर विराट समुदाय को वोट में बदलने कयावदों से यह प्रभावित भी होने लगा है । इन सबसे कैसे मूल स्वरुप को बचाकर रखा जाय और बाह्य हस्तक्षेप से मुक्त रखे इन पर भी विचार करने का समय  हैं। स्वभाविक है मनुष्य है और लोकतंत्र देश के नागरिक है तो राष्ट्रीय कर्तव्य है और सभी वोटर है तो वोट किस विचार धारा को दे इनके लिए सबकी अपनी अपनी मनोदशा व अवस्था हैं। पर अपनी इस राजनैतिक चेतना को गिरौदपुरी की पावन धार्मिक आस्था से नही जोड़ना चाहिये । विविध राजनैतिक विचार धारा में बटे अनुयाईयों को सतनाम के मार्ग पर एक साथ  चलने और लोक कल्याण हेतु समवेत स्वर में  मुखरित होने  संकल्पित होने की आवश्यकता हैं।  
      गिरौदपुरी मेला तिथि फागुन शुक्ल पंचमी छटमी व सप्तमी को ही आजकल गांव- गांव  में सप्तमी को पालो चढाने और रंगारंग  आयोजन होने लगे हैं। मुझे एक जगह से आमंत्रण भी मिला यह जानकर मुझे असहज  लगा कि कैसे वैश्विक स्तर पर चर्चित मेला को जाने-अनजाने हमारे लोग उसी दिन कार्यक्रम आयोजित  प्रभावित करने लगे हैं। ऐसा क्यो  किसलिए और किसके सलाह से कर रहे हैं इन पर विचार किये जा सकते हैं। जनमानस मे एकाएक यह विचार कैसे आ‌ने लगा कि सप्तमी तिथि को अपने गांव घर पर ही रहेन्गे और आयोजन करेंगे ।एक दूसरे के देखा देखी अनेक ग्राम व संगठन ऐसा करने लगे हैं। क्या अन्यत्र ऐसा होते है?
  अन्य धर्म के मेले पर्व जैसे कुंभ , मांघी पून्नी /कार्तिक पुन्नी संक्रांति मेला ,दीक्षा भूमि मेला ,  कल्प कुंभ मेला   के तिथियो मे क्या गांव -गांव मे आयोजन की प्रथा है? नही तब सतनाम पंथ के मेला के तिथी पर ही गांव गांव में आयोजन किस प्रयोजन से ?  
कही गिरौदपुरी मेला की आपार  सफलता और जनास्था के सैलाब को बाधित करने का षडयंत्र तो नही है? 
   इसी तरह गिरौदपुरी के चारों ओर 50 कि मी के दायरे मे भोजन भंडारा समिति‌ तीन दिनों तक भजन कीर्तन सत्संग रात्रि में करने लगे हैं। इस तरह लोगों का गिरौदपुरी मेले मे  आना- जाना  प्रभावित हो रहे हैं। रायपुर से निकलते ही श्रद्धालुओं के लिए  भोजन भंडारा दोंदे , सारागांव , खरोरा , भैंसा , संडी ,पलारी , वटगन , लवन , कसडोल ,कटगी इस सड़क किनारे अनेक बडे ग्रामों मे उपलब्ध होते है साथ ही रात्रि भजन कीर्तन ।लाखों लोग तो रायपुर से गिरौदपुरी के मध्य ही फसे रह जाते हैं। इसी तरह चारो ओर  बिलासपुर से रायगढ़ महासमुन्द , सारंगढ़  बलौदाबाजार की ओर से आने वालों और उस मार्ग पर जगह जगह  यही महौल रहता है ।आयोजक भी मेला मे नही आते बल्कि व्यस्तता के कारण  आगे - पीछे आते हैं। फलस्वरुप मेले में रौनक कम होने लगे हैं। लोग अलग अलग जगहों पर थम सा जा रहे हैं। )
     दो दशक पहले  मेला में  12-15 लाख लोगों को जमवाड़ा होते थे अब वह आधा हो गये हैं ! दिनो दिन मेले का रौनक खत्म हो रहे हैं। ऐसा क्यो रहे हैं क्या बारहों  माह आम दरफ्त के कारण ? यही एक मात्र बड़ा कारण हो ऐसा  भी नहीं हैं। या फिर नई पीढ़ी को इन धार्मिक व सांस्कृतिक आयोजनों मे सहभागी होने रुची नही ? या है तो वहां अपेक्षित सुविधाएं नही‌ं। खासतौर पर प्रसाधन आदि का तो कोई व्यवस्थित साधन भी नही हैं । 
  नि:संदेह मेला स्थल का विकास पहले के अपेक्षा हुआ हैं। विराट जैतखाम यात्री सेड और जरुरत की चीजे व भोजन सामाग्री के लिए होटल रेस्त्रां भी खुल गये हैं ।इन सब सुविधाएं से तो तीर्थ यात्रियों / श्रद्धालुओं का  रेला उमड़ पड़ता पर ऐसा नही हो रहा हैं क्यो ?क्या कारण है ?
     यह  सब यक्ष प्रश्न व  विचारणीय बातें  है कि उक्त तिथि को कोई आयोजन न कर सभी मेले पहुचें और अपनी धार्मिक निष्ठा के साथ- साथ सामाजिक संगठन को भी प्रदर्शित करें।  कम से कम गिरौदपुरी , भंडारपुरी , चटुवा - बाराडेरा व बोड़सरा मेले में सबकी सहभागिता हो ताकि इन सतनाम धामों का रौनक और  महत्व कायम रहें। 

 अपने -अपने ग्रामों में आयोजन करने के अनेक  सुविधाजनक तिथियां  हैं कृपया स्थानीय स्तर पर बारहों माह आयोजन किये जा सकते हैं। परन्तु  किसी  निर्धारित स्थल व तिथि पर लगने वाले मेले के दिन जरुर मेले में शामिल हो और अपनी धार्मिक निष्ठा व सामाजिक संगठन को प्रदर्शित करें।
          हमारे उत्साही आयोजक एंव  संस्थाओं के पदाधिकारी गण इनकी  तह में जाकर उचित निदान करे और बढ़ते संगठन व सामाजिक एकीकरण के विरुद्ध  हो रहे षडयंत्र का पर्दाफाश करें।
              जय सतनाम

गिरौदपुरी में ट्रस्ट का गठन और महोत्सव का आयोजन होना चाहिये ।

संपादकीय ...

     गिरौदपुरी मेला के  विकास हेतु ट्रस्ट का गठन  और गिरौदपुरी  महोत्सव  आयोजन होना चाहिये  

  प्राचीन भारत के दक्षिणापथ के नाम से चर्चित दक्षिण कोशल छत्तीसगढ़ को  "संत भूमि "की संज्ञा दी जा सकती हैं क्योंकि यहां अनेक ज्ञानी -ध्यानी  , साधु ,संत ,महात्मा, तपस्वी  ऋषि- मुनि की धरती हैं। जैसे हिमालयीन परिक्षेत्र के दो प्रांत हिमाचल और उतराखंड को देवभूमि कहे जाते है तो संतों गुरुओं की भूमि छत्तीसगढ़ संत भूमि के रुप में चिन्हाकित हैं।

भारतीय संस्कृति में  संत मत का प्रवर्तन सिंधु घाटी से लेकर महानदी घाटी तक आबाद रहा हैं। इन्ही संतों गुरुओं की परिपाटी में गुरु घासीदास का अभ्युदय और उनके द्वारा सतनाम पंथ का युगान्तरकारी  प्रवर्तन अत्यंत रोचक दास्तान हैं। इसके माध्यम से भारत वर्ष में नव जागरण इससे  तात्कालीन समाज के  प्रत्येक क्षेत्र  चाहे वह सामाजिक हो धार्मिक आर्थिक राजनैतिक हो  यहां तक कि स्त्री पुरुष दोनो के की जीवन  अभूतपूर्व क्रांति हुईं।
   मानव के  जीवन संघर्ष में श्रमण यानि परिश्रम और सत्य निष्ठा पर जीवन यापन करते सदाचारी जीवन शैली का जो उदाहरण यहां मिलते हैं वह अयन्त्र दुर्लभ हैं। संभवत: इसलिए भी छत्तीसगढ़ के वाशिंदों की प्रशंसा अंग्रजों से लेकर वर्तमान समय में पर प्रांतिक कलावंत लेखक -विचारक भी अक्सर "छत्तीसगढ़िया सब ले बढिया" के विशेषण से संबोधित करते आ रहे हैं। 
      तपोभूमि गिरौदपुरी सतधाम  मेला जोगनदी और महानदी के तटवर्ती कछारी भू-भाग में प्रतिवर्ष त्रिदिवसीय  फागुन शुक्ल पंचमी से सप्तमी तक विशालकाय मेला भरता हैं। जहां पर 12-15 लाख समुदाय देश - विदेश से  एकत्र होते हैं। और यहां पावन वातावरण और वन प्रातंर में प्रकृतितस्थ आत्मशोधन कर वर्ष भर के दैनंदिनी में अक्षुण ऊर्जा का संचरण करने की दिशा में प्रयास करते हैं।
    मेला स्थल में स्थित धुनि मंदिर ,  मुख्य मंदिर ,जोड़ा जैतखाम औरा- धौरा एंव तेंदू का वृक्ष अत्यंत पवित्र माने गये हमजहां के शीतल छांव में बैठकर पल भर के लिए ध्यान व आत्म चिंतन कर श्रद्धालू अपना जीवन धन्य करते हैं।
   मुख्य मंदिर के अतिरिक्त जन्म स्थली , सफुरा माता समाधि तलाब , बहरा डोली , मरार बाड़ी , शेर पंजा मंदिर , चरणकुंड अमृतकुंड छाता पहाड़ ,पचकुंडी , सुंदरबन जैसे रम्य स्थल है जिनके दर्शन मात्र से  हृदय एंव मन मस्तिष्क में पवित्र भाव का संचरण होता संतत्व भाव जागृत होते हैं।
    आपार श्रद्धा भक्ति के कारण विराट समुदाय स्वनियंत्रित होते हैं।  स्वयं के गृहग्राम से लेकर गुरुघासीदास बाबा जन्म स्थान , या जोगनदी तट से लेकर मुख्य मंदिर तक लाखों की संख्या में जमीन नापते श्रद्धालुओं का ताता लगा रहता हैं। उनके पृथक कारीडोर या मार्ग की व्यवस्था अत्यंत जरुरी हैं।  
   मुख्य मंच प्रतिवर्षानुसार छोटा पड़ता जा रहा हैं। सजावटी समान , लाईट ,माइक टेंट कनात और श्रद्धालुओं के जमघट से सदैव प्राब्लम होते आ रहे हैं। 
   अत: मुख्य मंच  को अन्यत्र शिफ्ट करना नितांत जरुरी है।अन्यथा यही पर सर्वाधिक जमघट लगता हैं श्रद्घालुओं और दर्शकों को बहुत ही कठिनाई होते हैं। निरंतर 72 घंटों तक चलने वाली भजन कीर्तन सत्संग प्रस्तुति के अतिरिक्त हमारे लोक कलाकार ,कवि ,साहित्यकार बुद्धिजीवियों / योग साधकों के लिए भी एक पृथक मंच का होना आवश्यक हैं ताकि उन्हे भी अपनी प्रतिभा प्रदर्शन करने का अवसर प्राप्त हो सकें। जैसे मेले में उनके नाम से महोत्सव होते हैं ठीक  उसी तरह "तपोभूमि गिरौदपुरी महोत्सव"  का आयोजन होना चाहिये जहां पर सतनाम धर्म संस्कृति के अनुरुप कार्यक्रम हो। 
   मेला की विशालता और बारहों माह आम दरफ्त होने से अनेक तरह की सुविधाओं का होना जरुरी है ।जैसे- सत्संग भवन , चौका भजन भवन, सांस्कृतिक कार्यक्रम व सत्संग प्रवचन  हेतु स्टेडियम या प्रेक्षागृह का होना नितांत आवश्यक हैं।  नाड़ियल प्रसाद व दैनंदिनी की समाग्री हेतु जो स्थाई  दुकानें / झोफड़ियां बेतरतीब है उन्हे व्यवस्थित किया जाय ताकि मेला प्रांगण की सौन्दर्य में अभिवृद्धि हो। मंदिर परिसर से कम से कम 500 मीटर की दूरी पर ही ये दुकानें संचालित होना चाहिये।
 इसके साथ धाम के रुप मे प्रतिष्ठित हो जाने पर  गुरु निवास साधु -संत के लिए  आवास ,भोजन ,  परिवहन   स्वच्छ जल वाहित आधुनिक शुलभ होना नितांत आवश्यक हैं। ताकि मंदिर प्रांगण और मेला परिसर की स्वच्छता व पवित्रता बनी रहें। वहां पर रम्य उद्यान का भी विकास हो।
   इन सबके लिए मेला प्रबंधक कमेटी के साथ -साथ ट्रस्ट का गठन बहुत ही आवश्यक हैं। देश - विदेश में  में चर्चित और प्रदेश का एक मात्र विशालकाय मेला के उचित प्रबंधन और विकास हेतु शासन भी सार्थक पहल कर सकती हैं।
    गिरौदपुरी मेला पर्व की हार्दिक बधाई सहित यह अंक सादर समर्पित हैं।
     - डा. अनिल कुमार भतपहरी        ( 9617777514)
                   सचिव 
        सतनाम  साहित्य प्रकोष्ठ 
प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज

Sunday, March 3, 2024

सनातन

सनातन शब्द का प्रयोग  बुद्ध ने अपने धम्म की विशेषता और महत्ता को इंगित करते हुए कहे।
     "एतो धम्मों  सन्नतनों " 
   यह धम्म सनातन हैं न कि सनातन धर्म है ।
सनातन शब्द विशेषण के रुप में प्रयुक्त न कि संज्ञा । धम्म संज्ञा है और उनकी विशेषण सनातन हैं। पर लोग है कि सनातन को संज्ञा बनाने पर तुले है हैं।

यह धम्म या  मार्ग या जीवन पद्धति है जो सदा के लिए  शास्वत हैं क्योकि इन्हे बहुत ही गहराई से सोच -विचार कर  मानव कल्याण के लिए प्रवर्तन किया गया हैं। 
चातुवर्ण्य या वैदिक पुराण काल मे विकसित पद्धतियां या मत पंथ आदि तो कुछेक  वर्गो के  हितार्थ ही हैं। वहां तो वर्ग संघर्ष और जरा सी बातो खासकर जर जोरु जमीन जैसे नश्वर वस्तुएं यहा तक झुठी शान मर्यादा आदि के लिए भी रक्त रंजित खूनी दास्तान हैं।
   बहुज‌न हिताय बहुजन सुखाय के निमित्त  बौद्ध धम्म ही सनातन धम्म है न कि चंद लोगो के निमित्त ईजाद की गई धर्म। 
धर्म और धम्म दोनो अलग शब्द है और दोनो के अर्थ भी अलग -अलग है।

Wednesday, February 28, 2024

मांघ पूर्णिमा मेला महात्मय

#anilbhatpahari 

।।मांघी पुन्नी मेला महात्म्य ‌।।

जलाशयों व नदियों के किनारे ही सभ्यताएँ पनपी क्योंकि जल ही जीवन हैं।हमारे यहाँ नदियाँ दैवी स्वरुपा पूज्यनीया हैं फलस्वरुप इनकी तट पर अपने अपने आराध्यों की मंदिर मठ आश्रम आदि बने ।
इन स्थलों  पर अनेक तरह की सामाजिक / धार्मिक   गतिविधियां व कर्मकांड आदि होने लगे । राज तंत्र में  जो राजा  जिनका उपासक रहा वह लोक धर्म हो गया। धीरे- धीरे उन सबमें वर्चस्व के लिए संघर्ष और समन्वय भी हुआ।
   छत्तीसगढ़ की प्रमुख नदी महानदी है जहाँ दो  स्थलों पर संगम हैं। राजिम  व शिवरीनारायण यह दोनो  प्रयागराज  ( इलाहाबाद ) जैसे ही महत्ता रखते हैं । मध्य में दक्षिण कोशल की  राजधानी सिरपुर रहा है। यहाँ की ख्याति वैश्विक हैं।अनेक शोधार्थियों  के लिए सिरपुर जीवंत दस्तावेज़ हैं। इन तीनों जगहों पर मांघी पुन्नी से   महाशिवरात्रि तक  १५ दिनों तक मेला सदियों से भरते आ रहे हैं। यहाँ से वाणिज्य व्यापार आदि प्राचीन काल से ही चला आ रहा हैं।  तीनो नगरी जलमार्ग का प्रमुख केन्द्र थे । सिरपुर के निकट मालपुरी बड़ा बंदरगाह हैं जो हमारे गांव जुनवानी से लगा हुआ है। कृषि कार्य निपटने के बाद कृषक वर्ग इन पंद्रह दिनो की मेले में जरुरत की चीजे खरीदने परस्पर रिश्तेदारी आदि करने भी इकत्रित होते हैं। इस तरह  मेला की संस्कृति पनपा। बाद में स्नान पूजा भेंट दान दक्षिणा आदि  की प्रथा जुड़ते गये ।
    राजिम नाम वहाँ की तेल व्यवसायी भद्र महिला राजिम तेलीन के कारण हुआ ऐसा जनश्रुति /किंवदंती हैं। 
    राजिम  को  राजीव समझ कमल क्षेत्र कहने‌ की परंपरा आजकल आरम्भ हो गये  हैं। चांपाझर का चपेश्वर महादेव मंदिर स्थल आजकल चंपारण्य के नाम से महाप्रभु वल्लभाचार्य के जन्म स्थली के रुप में चर्चित हैं। जो कि सुदूर गुजरात का प्रमुख राधा कृष्ण सम्प्रदाय के संत हैं।  वहाँ गुजराती समाज द्वारा भव्यतम निर्माण दर्शनीय हैं। दर असल राजिम को राजीव का अपभ्रंश मानते हैं। 
       राजीव लोचन कहकर विष्णु या राम मंदिर होने की बातें वैष्णव सम्प्रदाय की हैं। और भोसले शासक वैष्णव पंथी होने के कारण वहाँ मंदिर बनवाए गये जबकि राजिम लोचन नाम का आशय श्रमण महिला राजिम और श्रमणों के अराध्य लोचन यानि बुद्ध का नाम हैं। 
   बुद्ध की प्राचीन मूर्तियाँ सर्वत्र मिलते हैं। संभवतः जिस मूर्ति में राजिम अपना तेल पात्र रखती वह बुद्ध का ही प्रस्तर प्रतिमा रहा है। इस तरह राजिम लोचन नाम जनमानस में प्रसिद्ध हुआ। राजीव लोचन भगवान राम या विष्णु को भी कहे जाते हैं। यहां संगम के समीप कुलेश्वर महादेव भी स्थापित हैं।  राजिम कुंभ कल्प के नाम से विराट मेला लगते है ।
 मांघी पूर्णिमा को उत्तर भारत के महान संत रैदास  जी का जन्म हुआ। उनकी जयंती भी देश भर में उनके करोड़ो अनुयाई मनाते हैं। वे मानवतावादी  प्रज्ञावान संत थे और सबके कल्याण की कामना करते अनेक ज्ञानवर्धक पदों की रचनाएँ की जो कि गुरुग्रंथ साहिब में संकलित हैं । गुरुनानक  जैसा ही उनका  सम्मान सिख एंव हिन्दू  धर्म  में हैं। 
     बहरहाल मनोरम तीर्थ सबके होते  है फलस्वरूप सभी मत -मतान्तरों की स्थापनाएं होते गये।शैव पंथ  यहाँ प्राचीनतम हैं और शिव मंदिर  अधिकांश गांवों की तालाब नदी किनारे स्थापित हैं। शैव है वहाँ शाक्त उपसना भी होन्गे। अत एव जन जीवन में देव - देवी  मानने की प्रथाएँ विकसित हुई । उनकी अनेक मूर्तियाँ बनने  व स्थापित होने लगी । हालांकि बहुत बाद में इन मूर्तियों या साकार स्वरुप  के स्थान पर निराकार या प्रतीक पूजा का भी विधान प्रचलन में आया।
   इस तरह हिन्दुओं की तीनो पंथ और बौद्ध धम्म आधुनिक में कबीर व सतनाम पंथ  (जो कि अधिकतर प्राचीन बौद्ध मतावलंबी थे जिन्हे उपेक्षित रखा गया उन्हे संतो गुरुओ ने पुनश्च संगठित किए )का मठ मंदिर गुरुद्वारा व  जैतखाम आदि छत्तीसगढ़ के सभी प्रमुख जगहों पर हैं। क्योंकि यहाँ हिन्दू सतनामी कबीर पंथी परस्पर सद्भाव व सौहार्दपूर्ण स्थिति में गांव गांव मेंं संग  साथ निवास करते आ रहे हैं। उनमें संघर्ष, द्वंद व समन्वय भाव भी यदा-कदा द्रष्ट्व्य है ,क्योंकि भिन्न  भिन्न मत  पद्धति  व विचार धारा में टकराहट संभाव्य हैं।  परन्तु हमारे संतो ,गुरुओं और बुजुर्गों की सीख के चलते एंव  इन मेले उत्सव आदि के कारण  हमारी साझा व समन्वयवादी संस्कृति विश्व विख्यात हैं। छत्तीसगढ़ का यह सौख्य व सौहार्द भाव अभिनंदनीय हैं।

    - डॉ. अनिल भतपहरी /9617777514

Friday, February 16, 2024

सुवागत गीत

परिस 

परिस चरन तुहर हमर अंगना 
दुमन आगर  सुवागत हे पहुना ..

आये ल तुहरेच ये मन हरियागे 
संसो फिकर के चिरई ह उड़ियागे 
कुलकत गावत मगन नाचे मन हा ...

पाबो असीस तुहर बोली बचन के 
उजराही कजराहु ह  अंतर मन के 
बनही बनौकी कट जाही अल्हन गा ...