Thursday, February 15, 2024

देवारों की लोकगाथा में छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक विश्लेषण

शोध संक्षेप 


देवारों की लोकगाथा में छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक विश्लेषण 
        - डा. अनिल कुमार भतपहरी 

प्राचीन भारत में  राजतंत्र रहा हैं और राजाओं नें अपनी कल्याणकारी योजनाओं के साथ साथ अपने राजवंश की शौर्य पराक्रम की कहानी गाथाओं को प्रचार -प्रसार करने के लिए अनेक तरह के कलावंत समुदाय को आश्रय देते थे। इसमें कुछेक प्रतापी राजाओं एंव  चक्रवर्ती सम्राटों ने तो विभिन्न विद्या में पारंगत " नव रत्न "रखने की परंपरा की नींव डाली  जो विक्रमादित्य से लेकर मुगल सल्तनत के शंहशांह अकबर तक और छत्रपति शिवाजी से लेकर कलचुरि नरेश  कल्याण साय तक मिलता हैं। 
  उन का अनुशरण राजतंत्र के घटक  राजा ,जमींदार , मंत्री, अमात्म सामंत , मालगुजार मंडल गौटिया भी करते थे । इन चारण भाट  ,देवारों को संसाधन व  धन आदि   सुविधाएं देकर पुरे राज्य में यहां तक राज्य के  बाहर भी कीर्ति यश गान करने रखते व भेजते  थे। इनमे  देवार लोग बड़ा  ही  मनोरंजक व रोचक  रुप देकर जनमानस में  नाच- गाकर  राजा के यश मान बड़ाई को प्रचार प्रसार करते थे। उन्हे अपेक्षित मान - सम्मान मिलते थें। देवार शब्द में देव शब्द छुपा हुआ हैं। देवताओं अर्थात् दाताओ  के जो जस, मान गाये वह देवार के नाम से विख्यात हुआ ऐसा प्रतीत होता हैं। 
     वर्तमान छत्तीसगढ़ के रतनपुर राज और रायपुर राज में अनेक देवार कलावंत समकालीन छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक वृतांत को बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुतिकरण करते रहे हैं। इनमें चिंताराम देवार,रेखा देवार  जैसे  साधक साधिकाएं हैं।  यह गाथा गायक कलावंत एक समय राज महलों एंव सामंतों के बेहद करीब थे ।पर वर्तमान में यह तबका बहुत ही उपेक्षित और लगभग अस्पृश्य सदृश होकर रह गये हैं। रोजी रोजगार विहिन और एक जगह टिक न रहना कृषि और शारीरिक परिश्रम से रहित यह समुदाय वर्तमान में बेहद मुफलिसी में जीवन गुजार रहे हैं।

   छत्तीसगढ़ की खानाबदोश जातियों में  शुमार  देवार प्रमुख समुदाय  हैं । अन्य में मित्ता , मंगन -भाट , बसदेवा, नट पारधी ,शिकारी ,किस्बा  आदि आते है। इनका कोई स्थायी घर या गांव नही होते ।ये लोग आजीविका और वस्तुओं के उपलब्धता के दृष्टि से इधर - उधर घुमते रहते है। इनमे मंगन  भाट - बसदेवा लोग अब घर या गांव बसा लिए है। पर मित्ता देवार आदि अब भी खनाबदोश जीवन जीते है। इनके रहने की जगह को डेरा या भसार कहते है ।जो शहर या गांव से दूर रहते हैं।‌ इनके इर्द - गिर्द कुत्ते ,सुअर गधे आदि पशुए भी इनके साथ रहते है। कही कही कुछ बडे ग्रामों , कस्बो मे लंबी अवधि के लिए डेरे लग जाते है ।जहां अनेक घुमंतु जातियां मिलकर रहते हैं। उनके बीच मेल-मिलाप से  सांस्कृतिक व प्रवृत्ति गत एकीकरण होने लगे लगे हैं। प्रेम प्रसंग में शादी -ब्याह होने से इन घुमंतुओं मे एक नवीन सम्मिश्रण संस्कृति का विकास होने लगे हैं। 
  बाहरहाल  इनमे देवारों के साथ- साथ कुछ अन्य समुदाय के भी कार्य गायन वादन एंव नर्तन हैं। राजतंत्र के समय खासकर कलचुरियों एंव हैहयवंशीय राज्य में  देवारों को राजकीय संरक्षण प्राप्त था और ये लोग चारण -भाट की तरह ही राजा एंव राज्य की यशगान करते आजीविका चलाते रहें हैं।  ये कलावंत समाज है जिसकी स्त्रियां भी नृत्य- गान प्रवीण होती है। रानियों/ सामंतों की स्त्रियों  व आम महिलाओ के  लिए सौन्दर्य प्रसाधन की वस्तु जैसे ये बालों के  लिए रीठा ,आंवला ,शिकाकाई अन्य जड़ी - बुटी  बेचती तथा गोदने गोदती और उनके एवज में पैसे व अनाज प्राप्त कर आजीविका चलाती रहीं। फलस्वरुप कृषि जैसे वृत्ति से यह समुदाय कोसों दूर हैं। बल्कि कृषक वर्गों के बीच अब उक्त सामाग्रियों के बेंच कर आजीविका चलाते हैं।  सौन्दर्य और प्रसाधन क्षेत्र में नव आधुनिक वस्तुएं से आने से उनकी अध्य व्यवसाय भी प्रभावित हो गये । अत: अब वे लोग हमारे वेस्ट पदार्थ यानि झिल्ली प्लास्टिक लोहे  टीन,  कांच आदि  शीशी   बोतलें  इत्यादि जो अनुपयोगी वस्तुएं हैं जिसे कबाड़ भंगार आदि कहते है , को एकत्र कर बेजने के कार्य कर जीवकोपार्जन करते हैं।

इनक गीत व अख्यान  व वृतांत  बोल बडे ही सम्मोहक मनोरंजक व नीति परक होते हैं। समकालीन समय के इतिहास कला संस्कृति आदि चित्रण उनमें समादृत होते हैं।
 वाद्य यंत्रों प्राय: मांदर, रुंझु, सरांगी  , खंजेरी, चुटका आदि लोक वाद्य द्वारा आकर्षक नृत्य गीत पस्तुत करते है -
रामे रामे रामे गा मोर रामे रामे भाई ग 
ज उने समय के बेरा हवे भाई ...
कथा प्रसंग उठाते है और सरांगी कानो मे अमृत घोरते है ।
चिंताराम देवार की गायन आकाशवाणी रायपुर से प्राय: प्रसारण होते ही रहते है। किस्मत बाई , मालाबाई , फिदाबाई , पूनम , पद्मा ,  जयंती , रतन सबिहा ,जीयारानी जैसी अनेक मधुर गायिकाएं व नृत्यांगनाए हैं।

  नाचा के पुरोधा  दाऊ मंदराजी जी ने छत्तीसगढ़ की बेहद लोकप्रिय नाट्य प्रस्तुति  नाचा मे हारमोनियम और महिला देवारिन कलाकार का प्रयोग कर नाचा की लोकप्रियता को शीर्ष पर ले गया ।तब से देवारिनों को  नाच आर्केस्ट्रा में काम मिलने लगी और उनकी कलाओं को चार चांद लगे।इनकी  झुमर नाच , करमा घुच्ची करमा नृत्य व गान में इनके  पुरुष मांदर व रुंझू खजेरी चुटका  बजाते थे।
 झुम के मांदर वाला रे करमा धुन म मय नाच मातेंव...
 उनकी सर्वधर्म सम भाव और सर्व मत संप्रदाय के बीच जाकर उनके मन बोधने व गायन का बेहतरीन स्तर द्रष्ट्व्य है - 

राउर पिंजरा म बइठ सुवा मैना बोलत हे राम राम 
अहा बोलत हे राम 
बैसनो साकत बुद्ध जैन कबीर पंथ सतनाम हरि जी ...
  इनमें रोज कमाओ रोज खाओ और मद्य- मांस आदि के चलते  गरीबी और अनेक बुराई पनपी और निरंतर यह समाज मुख्य धारा से कटते चले गये।
हालांकि इनकी भाषा इनके शब्द आदि एक अलग तरह के सांस्कृतिक तथ्य समेटे हुए है जिनका अपना एक अलग महत्व हैं।
   इतिहास साहित्य के अलावा समाज शास्त्र ,मानव शास्त्र सहित भाषा विज्ञान के लिए यह समाज अन्वेषण का विषय है।

    डा. अनिल कुमार भतपहरी
      मो न 9617777514 
           सचिव 
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग 
सी - 11/ 9077 सेंट जोसेफ टाउन अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़ 492001

Sunday, January 28, 2024

खानाबदोश जाति देवार की कलाएं

खानाबदोश जाति देवार की कलाएं 

   छत्तीसगढ़ की खानाबदोश जातियों में   देवार प्रमुख हैं अन्य में मित्ता , मंगन -भाट , बसदेवा, नट पारधी ,शिकारी ,किस्बा  आदि आते है। इनका कोई स्थायी घर या गांव नही होते ।ये लोग आजीविका और वस्तुओं के उपलब्धता के दृष्टि से इधर - उधर घुमते रहते है। इनमे मंगन  भाट - बसदेवा लोग अब घर या गांव बसा लिए है। पर मित्ता देवार आदि अब भी खनाबदोश जीवन जीते है। इनके रहने की जगह को डेरा या भसार कहते है ।जो शहर या गांव से दूर रहते हैं।‌ इनके इर्द - गिर्द कुत्ते ,सुअर गधे आदि पशुए भी इनके साथ रहते है। कही कही कुछ बडे ग्रामों , कस्बो मे लंबी अवधि के लिए डेरे लग जाते है ।जहां अनेक घुमंतु जातियां मिलकर रहते हैं। उनके बीच मेल मिलाप से  सांस्कृतिक व प्रवृत्ति गत एकीकरण होने लगे लगे हैं। प्रेम प्रसंग मे शादी ब्याह होने से इन घुमंतुओं मे एक नवीन सम्मिश्रण संस्कृति का विकास होने लगे हैं। 
  बाहरहाल  इनमे देवारों के साथ साथ कुछ अन्य के भी कार्य गायन वादन एंव नर्तन हैं। राजतंत्र के समय खासकर कलचुरियों एंव हैहयवंशीय राज्य में  देवारों को राजकीय संरक्षण प्राप्त था और ये लोग चारण -भाट की तरह ही राजा एंव राज्य की यशगान करते आजीविका चलाते हैं। ये कलावंत समाज है जिसकी स्त्रियां भी नृत्य- गान प्रवीण होती है। रानियों/ सामंतों की स्त्रियों  व आम महिलाओ के  लिए सौन्दर्य प्रसाधन की वस्तु जैसे ये बालों के  लिए रीठा ,आंवला ,शिकाकाई अन्य जड़ी - बुटी  बेचती तथा गोदने गोदती और उनके एवज में पैसे व अनाज प्राप्त कर आजीविका चलाती रहीं। 
इनके गीत व बोल बडे ही सम्मोहक मनोरंजक व नीति परक होते है ।
मांदर, रुंझु, सरांगी  , खंजेरी, चुटका आदि लोक वाद्य द्वारा आकर्षक नृत्य गीत पस्तुत करते है -
रामे रामे रामे गा मोर रामे रामे भाई ग 
ज उने समय के बेरा हवे भाई ...
कथा प्रसंग उठाते है और सरांगी कानो मे अमृत घोरते है ।
चिंताराम देवार की गायन आकाशवाणी रायपुर से प्राय: प्रसारण होते ही रहते है। किस्मत बाई , मालाबाई , फिदाबाई , पूनम , पद्मा ,  जयंती  रतन सबिहा ,जीयारानी जैसी अनेक मधुर गायिकाएं व नृत्यांगनाए हैं।

  नाचा के पुरोधा  दाऊ मंदराजी जी ने छत्तीसगढ़ की बेहद लोकप्रिय नाट्य प्रस्तुति  नाचा मे हारमोनियम और महिला देवारिन कलाकार का प्रयोग कर नाचा की लोकप्रियता को शीर्ष पर ले गया ।तब से देवारिनों नाच आर्केस्ट्रा में काम मिलने लगी और उनकी कलाओं को चार चांद लगे।इनकी  झुमर नाच , करमा घुच्ची करमा नृत्य व गान में इनके  पुरुष मांदर व रुंझू खजेरी चुटका  बजाते थे।
 झुम के मांदर वाला रे करमा धुन म मय नाच मातेंव...
 उनकी सर्वधर्म सम भाव और सर्व मत संप्रदाय के बीच जाकर उनके मन बोधने व गायन का बेहतरीन स्तर द्रष्ट्व्य है - 

राउर पिंजरा म बइठ सुवा मैना बोलत हे राम राम 
अहा बोलत हे राम 
बैसनो साकत बुद्ध जैन कबीर पंथ सतनाम हरि जी ...
  इनमें रोज कमाओ रोज खाओ और मद्य- मांस आदि के चलते  गरीबी और अनेक बुराई पनपी और निरंतर यह समाज मुख्य धारा से कटते चले गये।
हालांकि इनकी भाषा इनके शब्द आदि एक अलग तरह के सांस्कृतिक तथ्य समेटे हुए है जिनका अपना एक अलग महत्व हैं।
   इतिहास साहित्य के अलावा समाज शास्त्र ,मानव शास्त्र सहित भाषा विज्ञान के लिए यह समाज अन्वेषण का विषय है।
 साठ - सत्तर के दशक में बघेरा निवासी दाऊ रामचंद्र देशमुख जी ने देवार डेरा नामक संस्था बनाकर देवार और देवारिनों की कला को पहली बार मंचीय स्वरुप दिया । अनेक तरह की उनकी लोक गीत और वाद्य यंत्र व कलाकारों द्वारा भव्यतम प्रस्तुति दी जाने लगी।  एक तरह से देवार गीत और उनकी  नृत्य  गान वाद्य कलाएं शिष्टता लिए हुए सामने आई - 
आज जागत हे जनता के भाग रे मैना बोलय 
मैना बोलय सुवा न के साथ रे मैना बोलय ...
देवार एक जगह टीक कर नही रहते बल्कि वे लोग हर  महिने दो महिने में डेरे बदलते रहते है ।उनके पास जरुरी भोजन के पात्र कुछ कपडे और कुछ कथरियों और मुर्गे सुअर के सिवा लोई संपदा भी नही । उन्हे लगभग समाज अस्पृश्य की श्रेणी में रखते भेदभाव करते है। 
   इसकी तीक्ष्ण प्रतिक्रिया इन लोगो द्वारा गाई जाने वाली  लोकगाथा " दशमत कइना" में देखने मिलता हैं। लोक मे यह विश्वास है कि यह सत्य घटना पर आधारित कथानक हैं।
    अत्यंत रुपसी दशमत ओड़न  की प्रेम में एक ब्राह्मण लड़का अपनी जाति वंश त्याग कर दशमत को पाने  उनके बीच आकर रहने लगते है -

नव लाख ओडिया नव ओड़निन 
खोदे सगुरिया जाय ।
जुगजुग बरय एक झन नोनी 
नाव जसमतिया ताय ।।

दशमत से प्रणय निवेदन करते कहते है -

मोर घर हवय हंसा परेना , सेज सुपेती अनलेख ।
हीरा मोती रतन पदारथ पाबे अटल  सुख सरेख ।।  

दसमत कहती है -

तोर घर हवे हंसा परेवना त मोर कुकरी अनलेख ।
तोर घर हवय सेज सुपेती त मोर कथरी अनलेख ।।

  इस तरह दोनो के बीच वार्तालाप  और तुलनात्मक बातों से युवक  यह तय करना कठिन होता है श्रेष्ठ जैसा कुछ नही जिसमे जीवन चले और सुख मिले वही उपयोगी  वस्तु ही श्रेष्ठतम है ।

  चिरई म सुघ्घर पतरेंगवा सांप सुघ्घर मनिहार ।
कमा खा हस ले गा ले जात म सुघ्घर देवार ।।

  कह अपनी जातिय संस्कृति को यह लोग किसी से कमतर नही मानते बल्कि सुंदर समझते हैं।

 अंतत: दशमत को पाने के लिए ब्राह्मण युवक देवार की तरह शराब पीते है सुअर मांस खाते है !  जनेऊ तिलक भंग कर साधारण मनुष्य बनकर देवारों जैसा स्वरुप मे आते है ।
दशमत तो उनकी इस बलिदान से प्रभावित हो प्रेम करने लगती है पर पुरुष वर्ग उन्हे वरण नही करने देते और  उनकी जात और कथित उच्च होने की धारणाओं पर खिल्ली उड़ाते जातिय दर्प को कुचल कर गधे में बिठाकर ताल सगुरिया में डुबो देता है ।
उनकी इस  कृत  ब्राह्मण युवक  रुदन करते है-
  माथा धर के बाभन रोवय 
का करम करम डारेव ।
मया म अरझे रहिके मय कुल बंश बोर डारेंव ।।
  
छत्तीसगढ़ में गुरुघासीदास की शिक्षा  " मनखे मनखे एक " हर संवर्ग और लोगो को अभिप्रेरित किया एक देवार गीत मे इस संदेश की बानगी द्रष्ट्व्य है -

मनखे ल मनखे मन अब मनखे  मानत हे 
आज जुरमिल मित्ता मन भजन गावत हे ...
     देवार लोग अपने जन्म से मृत्यु पर्यन्त  रस्मों के गीत के अलावा दान दया धरम के गीतों साथ प्राय: प्रेम प्रसंग के गीत  नगेसर कैना ,  करमा ,  ददरिया ,चंदैनी ,गाकर नाच कर लोगो को रिझाते व मनोरंजन कर के जीवन यापन करते हैं।
   ये लोग बंदर नचाने और कुछ करतब दिखा कर भी रोजी रोजगार करते है।
   देवार -मित्ता लोग अन्य घुमंतु जातियों जैसे  मंगन ,भाट ,बसुदेवा , किस्बा ,  डंगचंगहा , मदारी, नट ,सपेरे पारधी , शिकारी  आदि घुमंतु लोगो के आसपास रहने से उनके जैसे ही जीवन वृत्त अपनाने लगे है । फलस्वरुप उनकी विशेषताएं व लक्षण यदा - कदा इनमे भी दिखते है। ये लोग जड़ी -बुटी मंदरस , बधिया तेल  सुअर मुर्गे आदि पालने व  बेचने  आदि के कार्य भी करते हैं। 
पर राजतंत्र के खात्में और आधुनिक प्रसाधनों की वस्तुओं से बाजार सज जाने से इनकी पारंपरिक कार्य विलुप्त सा हो गये। इनके रोजी - रोटी छिना गया ।
      
फलस्वरुप  वर्तमान में अपने आजीविका हेत  हमारे दैनंदिनी में उपयोग की वस्तुओं के बचत या वेस्ट सामाग्री को जिसे हम कुड़ा दानों में फेंक देते है को  एकत्र कर कबाडियों के पास बेचना हैं। और कुछेक धरेलू या खिलौने की सामान के बदले लोगों की वेस्ट चीजें एकत्र करना हैं। 
   बहुत ही निर्धन पर जो संसाधन है उसी पर मस्ती पूर्वक जिंदादिली से यह तबका जीते आ रहा है। शासन - प्रशासन से इन्हे कोई अपेक्षा नही और न कभी अपने हक अधिकार के लिए एकजूट होते है।
ये संख्या में कम भी है और कलावंत समुदाय होने के कारण इनकी युवा महिलाएं और स्त्रियां नाच पेखन लोक कला मंचों से जुड़ी हुई है। वहां की आय से यह समुदाय बिना कोई  कठोर परिश्रम किये जीवन गुजार देते हैं। ये लोग कही स्थिर टिक कर रहते नही फलस्वरुप अनेक कल्याणकारी योजनाओं से दूर रहते हैं।  साथ ही चाह कर भी प्रशासन उन तक पहुंच नही पाते।
    हालांकि अब स्लम एरिया मे चलता - फिरता अस्पताल आदि खुल जाने से इनका लाभ इन समुदायों को मिलने लगा हैं। और सामाजिक चेतना भी यदा - कदा आने लगी हैं। फिर भी इनके बीच मोबाइल अस्पताल जैसे इनके बच्चों के लिए चलता - फिरता स्कूल आदि खोलने से परिणाम सकरात्मक आएन्गे। कुछ कुछ समाज सेवी लोग व संस्थाएं इनकी दशा सुधारने सक्रिय है।
   इनके बच्चों को नि: शुल्क शिक्षा या कंबल फल मिठाई दवाई आदि वितरण करते देखे सुने जाते हैं।
   रायपुर आदि बड़ी जगहों पर शादी / पार्टी/  भंडारा  आदि के बचत खाने भी इन्हे परोस दिये जाते है। कुछ लोग  पुराने कपडे दान करते है।नेकी की दीवार से भी ये लोगों द्वारा छोड़े गये पुराने कपड़े पहन लेते है। इस तरह  जैसे - तैसे इन लोगों का निर्वह‌न हो ही जाते है। कुछ लोग सुअर पालने लगे है और उससे इनका जीवन स्तर सुधरने लगा है ।पर शराब आदि के कारण निर्धनता व्याप्त है । ये लोगों में अपराधिक प्रवृत्तियां भी पाई जाती है।  मद्यपान चोरी  लड़ाई झगडे बलवा  जबकि पुराने समय मे देवार निष्ठावान थे और चोरी आदि से दूर परिश्रमी थे।
   वृद्धावस्था मे ये लोग भिक्षाटन करते हं। इस जाति की पुनर्वास बेहद जरुरी है । शासन - प्रशासन को चाहिये  कि बेहतर कार्ययोजना बनाकर इनके भसार यानि डेरे या मोहल्ले मे चलित क्लीनिक टाइप चलित स्कूल खोले ।उनके बच्चों को उनकी संस्कृति के अनुरुप शिक्षा दे ताकि  इस समाज के हालात में नव प्रवर्तन हो सकें।

    डा. अनिल कुमार भतपहरी
      मो न 9617777514 
           सचिव 
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग 
सी - 11/ 9077 सेंट जोसेफ टाउन अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़ 492001

Wednesday, January 24, 2024

गुरु अम्मरदास

।।गुरु अम्मरदास समाधि मेला चटुवा पुरी धाम ।।

 गुरुघासीदास के ज्येष्ठ पुत्र है।वे आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे तथा ध्यान योग समाधि में निष्णान्त थे।
    गुरुघासीदास की  अमृतवाणी उपदेश और सतनाम- दर्शन को जनमानस में पंथी गीत व मंगल भजन के रुप मे लयात्मक रुप देकर जनमानस के कंठाहार बनाए। इस तरह से देखें तो गुरु उपदेश को काव्यात्मक स्वरुप देने का अप्रतिम कार्य किये ।फलस्वरुप हजारों पंथी गीत छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के अनुपम धरोहर हैं।
   जनश्रुति है कि वे सतनाम पंथ के प्रचार हेतु शिवनाथ नदी के उसपार अपने ससुराल प्रतापपुर  परिक्षेत्र  सफेद रंग के  हंसालीली  सफेद घोड़ा से जा रहे थे।सिमगा से आगे चटुआ धाट के समीप इमली पेड़ के झुरमुट के समीप  वे साधनारत हो गये।उनके दर्शनार्थ आसपास से जनसमूह उमड़ने लगे।
      वे अनुआयियों  को साढ़े तीन दिन की "शव समाधि" लेने की इच्छा व्यक्त किए और समाधिस्थ हो गये।  चारों ओर से  बेकाबू भीड़ दर्शनार्थ उमड़ पड़े कि तीसरे दिन कुछ नायाब चीजें लेकर गुरु आयेन्गे।  सतनामियों की एकजुटता और संगठन से घबराकर कुछ सड़यंत्री व द्वेषी जन लोगों में भ्रम फैलाने लगे कि लाश में प्राण नही है और इसमें जीव आ नही सकते ।इसके क्रियाकर्म कर दो । जनमानस भजन- कीर्तन करते रहे । एक दिन बीता, दो दिन बीत गये  शव मे चेतना आई नही ।सतनाम द्वेषी लोग लोग भ्रम फैलाते रहे अंतत: तीसरे दिन शव को दफना दिए गये। पर कुछ भक्त वही बैठे शोकमग्न थे।
 साढ़े तीन दिन बाद शाम को  प्राण ज्योति स्वरुप आई शव की चारो ओर परिक्रमा की और शव में सुरंग सा हो गये जलधारा फूट पड़ी । प्रत्यक्ष दर्शी रोते बिलखते वापस आ गये ।यह घटना १८४० को पौष पुर्णिमा को हुआ। गुरुघासीदास भी अपने तेजस्वी पुत्र के वियोग से विह्वल  व अनमना होकर रह गये । 
    अंतत: एकान्तवास के लिए प्रयाण कर गये। 
    कलान्तर मे हरिनभठ्ठा के मालगुजार आधारदास सोनवानी जी ने उक्त समाधि स्थल मे १९०२ के आसपास भव्य मंदिर बनवाए ।और शिल्पकार समकालीन समय मे अन्यत्र हिन्दू मंदिरों के अनुशरण करते शिव ब्रम्हा के साथ कुछ विवादस्पद शिल्प बनाए .... जो वर्तमान मे  अप्रसांगिक है।‌ उन्हे हटाने की निरन्तर मांग हो रही है।परन्तु प्रबंधक लोग विरासत और प्राचीन कलाकृति के नाम पर अनिर्णय की स्थिति में है।
         बहरहाल यहां प्रतिवर्ष पौष पूर्णिमा को त्रिदीवसीय विशालकाय मेला लगता हैं। यह स्थल रतनपुर राज के अन्तर्गत आते हैं।  उनके साथ रायपुर राज में बाराडेरा धाम में भी विराट मेला लगता हैं।
     चटवा  धाम से कुछही  दूर ग्राम  किरित पुर मे  जैतखाम के शिखर पर सत्यपुरुष व सत्यावती का शिल्पांकन किए गये है।जो और भी सतनाम संस्कृति में अग्राह्य है। इसमें  यथोचित सुधार  होना चाहिये ।

             ।‌सतनाम ।।

         - डा. अनिल भतपहरी / 9617777514

Monday, January 15, 2024

हमर भांचा राम





सुने हन अजोधिया के ,राजा बनगे राम 
हमर भांचा राम, हमर भांचा राम ...

लइकुसहा ले बलखर भारी ओहर  रहिस   
तड़का ल मार  गिराइस  अउ मारीच ल खेदारिस  
साधु -संत के सेवा बर निकले लखन संग  राम ...

जनकपुर म  धनुष टोर के  बिहाइस सीता 
बहिनी कौसिलया बर  होने अड़बड़ सुभीता 
सुख म दिन बितय उंकर,  उच्छल मंगल रात ...


मुड़धुंगी कैकेयी केजबर  करवादिस बनवास 
मुरझा गे फूल डोहड़ी ह टुटगे सबके आस 
बने करिस फेर  आइन बिराजिस हमरो लंग राम ...
 
मनखे ल कोन कहय सब जीव जन्तु ल सरेखिस  
जंगल झाड़ी डोंगरी पहाड़ सब ल सुघ्घर जतनिस 
बारा बछर  ल बिताइस हमरो संग म राम ...

सिव भूमि सिरपुर म  आके भारी मान पाइस 
ये पबरित भुंइया के ओमन महिमा गाइस 
सुग्रीव संग बद मितानी पाइस सेवक हनुमान ...


सुनके मान बड़ाई ओकर  तरमरागे कपटी  रावन
छल कपट करके सीता ल हर लिस बैरी रावन 
सब पुरखा मन  संग दिस त लंका जीतीस राम ...

देवारी कस उच्छल- मंगल अजोधिया म होइन 
चलव हमु मन उकर सेती घरो घर दीया बारिन 
ओती सिंघासन म बिराजे अउ ऐती घट म राम... 
हमर भांचा हमर भांचा राम ...

Monday, December 25, 2023

ईसा

ईसा 

जन्म अस्तबल में और मृत्यु हुआ  सलीब पें 
सत्य और प्रेम के मसीहा का कैसा नसीब थे  
जोड़े वे दोषी  और तोड़े वे बड़ा खुशनसीब हैं
दया का पाठ पढ़ाकर  हुये क्यो  बदनसीब  हैं
यह  दुनियां और  दुनियां  वाले  बड़े अजीब है 
कोई पास रह के दूर तो कोई दूर होके करीब हैं

  ।।क्रिसमस की बधाई सबका मंगल हो ।।
    
              डा. अनिल भतपहरी 
‌                 9617777514

Thursday, November 30, 2023

संभोग - समाधि

।‌।संभोग- समाधि ।।
    
ओशो की नही यह यह हमारी अपनी अवधारणा हैं। हालांकि यह शब्द और सोच विविध धर्म ग्रंथों वहां की अवधारणाओं एंव विभिन्न द्रष्टाओं और विचारकों  से आया उनमे ओशो भी समादृत है।  पर उन सबके बाद निकष में अप‌नी   स्व अनुभव व स्व विवेक से यह जानने -समझने प्रयत्न किया कि इस संघर्ष मय जीवन में कैसे और किस तरह से  सुखी व आनंदित रहें? या रहा जा सकता हैं।  
    ईश्वराश्रित दुनिया और स्वयं भू दुनियां में प्रतिद्वंद्विंता आरंभ से हैं। ज्ञात साहित्य  वेदों में न इति न इति कह उन्हे अनश्वर असमझ अनंत असीम कहे गये और लोकायतों  ने भी कमोबेश उसी के आसपास विचार व्यक्त किये । और उनकी स्थापनाएं व वेदो को नही माना न उन्हे अपौरुषेय कहे ।फलस्वरुप  दो धाराएं प्रस्फूटित हुई  आस्तिक- नास्तिक की ।
उनमें  भी  यह विचार है कि  
 ईश्वर भी एक भ्रम हैं। ओ है या नही पर विवाद है और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि है नही के मध्य में वो है ऐसा  भी प्रवाद हैं। और लोग ऐसे संस्थापनाओं में उन्मत्त हैं।
   अपनी बातों को मनवाने के लिए कुछेक विचारक रचयिताओं ने उस अज्ञेय अजाना के लिए निराकार साकार ,अवतार , प्रकृति कुदरत कह उसे  निर्गुण -सगुण मानकर कथा कहानियों महाकाव्यों वृतांतों का अंबार लगा दिये गये हैं। अनेक धर्म मत पंथ उनको केंद्र में रखकर चल रहा हैं। वे कुछ प्रथाए क्रियाये ईजाद कर रखे है।
   जबकि  सद्गुणों के समुच्चय और उनके व्यवहार ही व्यक्ति  और समुदाय को सुख आनंद की अनुभूति करा सकते पर प्रवर्तक और अनुआई ने कुछेक गुणों को लेकर ऐसी हाय तौबा मचाई है कि उनका निर्वहन भी हास्यास्पद और रुढता जैसे हो ग ई ।
जैसे किसी ने सत्य को पकड़ा बस नारे लग रहे है निर्वहन नही ।किसी प्रेम को पकड़ा उन्हे पता नही कि किसे और कैसे प्रेम करे बस भजन कीर्तन गा और नाच रहे है ।किसी ने परोपकार को पकड़ा बस चंदे उगाही कर दो नंबर से रुपये जोड़कर दान करते कंबल रोटी फल बाट बस रहे है । कोई जरुरत मंद ही न रहे ऐसा कोई उपक्रम नही ।प्याज न खाकर ब्याज खाकर बस ईट पत्थर के ढाचे कर भोग भञडारा कर धार्मिक होने के होड़ करते जुलुस निकाल रहे है।
किसी काम वासनाओ विलासताओ  को त्याग तप तपस्या को अपनाया तो किसी ने वासनाओ को भोगते प्राप्त छणिक सुख को तथाकथित समाधि महासुख मे बदलने उपक्रम खोज निकाला ।  युगनद्ध युगल द्वय हठयोग के पंच मकार के मांस मदिरा मुद्रा मैथुन के लिए कुंठाग्रस्त काम पिपासु लोलुप भ्रमित लोग एकत्र किये गये और अनवरत संभोग घंटों क्रिया चलने वीर्य स्खनल को रोक उसे उर्ध्व साधने की अटपटी क्रिया विकसित कर ली ग ई ।
कहने का अर्थ जिनको जो सुझा सबने अपनी दुकाने खोल मेला में बैठ गये ।
  सभी अपनी समान सामान और मेवा को उत्तम बताने लगे ।
ओ तो बौराया जग को बौराने लगे जिनकी संख्या भारी उनकी ही सत्ताए जिनकी दौलत भारी वही प्रबंधक ।
     यह सब खेला है खेलते रहे और भ्रम को पाने के चक्कर मे भ्रमित रहे ।जिसे हमने ही बनाया और हमने ही उसे नही जाना बल्कि उसे जानबुझकर अनजाना किया दुनिया को दीवाना किया ।

जबकि धर्म कर्म साधना समाधि सुख आनंद व ईश भक्ति भगवद्प्राप्ति  आदि के उद्यम का  सार यह  है कि  स्वयं को सुधारो स्वयं को चेताओ न कि दूसरों  को सुधारने और कही कोई ग्रंथ जगह स्थल पर भगवान है को बताने या कुछ को लेकर या एकांत में ढूढने निकल पड़ो। 
   सच तो यह है कि कुछ ऐसा करो कि आपके वजह से कोई  परिजन और अन्य  हो ,को कोई भी तकलीफ न हो । वे प्रतिकार या प्रतिरोध कर आपके शांति व सुकून में बाधा न पहुचाएं। 
कबीर की तरह - जस की तस धर दिनी चदरिया रखो न कि कोई मत पंथ आदि बखेड़ा खड़ा कर यश नाम आदि कमाने उद्यम करो ।यह न मिला तो दु: ख और फिर उनके निदान के लिए प्रयत्न फिर चक्र मे जुत गये कोल्हू की तरह ।
     अर्थ ,धर्म  ,काम , मोक्ष तो सांसरिकता है  इन सबसे ऊपर उठोगे तो जानोगे कि जीवन और आनंद क्या है ? पर लोग इन्ही चक्र मे मरण और पुनर्जन्म लोक परलोक के चक्र में भ्रमित भटक रहे हैं।
     स्वयं का भोग ही संभोग है न कि पराई स्त्री या स्वयं की स्त्री का भोग को संभोग कहे ।वह सहवास है काम कलाए है ।सामर्थ्य है तो सहवास होगा अशक्त नि: शक्त या नंपुसक या किन्नर भला क्या और कैसे संभोग करेगा ? और उन्हे फिर कैसा सुख कैसा आनंद कैसा समाधि ?
       आपको जो मिला है चाहे संपदा या विचार या समझ उसे स्वयं के हितार्थ कैसे भोगते हो कि किसी दूसरे को फर्क न पडे उसे कष्ट न हो यही संभोग है ।और फिर उस से सुख पाओ या आनंद या उन्मनी रहो समाधिस्थ रहो या जो चाहे नाम दो उससे क्या ? कुछ लेना न देना मगन रहना ।

Friday, November 24, 2023

सामान्य सी बात

#anilbhatpahari 

।।सामान्य सी बात ।‌।

बहुत सहज 
सामान्य कथ्य है
पर बहुत से
असामान्य लोगों को 
असहज लगेंगें
कि आज देवता जगेंगें 
तो सब कुछ 
सुमंगल होगा
गंवाई गई 
सत्ता आ जायेगी 
या फिसलती हुई 
सत्ता ठहर जाएगी 
जल रहे है धूप-दीप 
घंटे और अज़ान भी 
गूंज रहे फ़िजा़ में 
हो रहे हैं यज्ञ हवन भी 
सुदूर  संकीर्तन भी 
इर्द गिर्द मंगल भजन भी 
इधर कुछ तांत्रिक 
कर रहे तंत्र साधना 
और उस तरफ  यांत्रिक 
कर रहे यंत्र साधना 
मांत्रिक लोग फूंक रहे मंत्र 
शंकालू प्रश्नालू भी 
कमर कस लिए है 
कि ईवीएम होगा हैंक 
जब चंद्रयान नियंत्रित होते यहां से 
तब क्या दस कदम दूर 
संत्रियों के साये में रखे मशीन 
मंत्रियों के ईशारे पर 
यंत्र साधकों द्वारा 
छेड़ा नही जा सकेगा ?
जबकि कुछेक संत्रियों ने 
कई मुजरिमों छोड़ दिया 
कुछेक ले दे कर 
इधर कुछेक सोनोग्राफर 
जो कैमरा माईक पकड़ 
टी वी स्क्रीन में 
भ्रूण परीक्षण में 
लगे हुये हैं-  
किसान होगा या व्यापारी 
नट होगा या मदारी 
माटी पुत्र कि पार्टी पुत्र 
पर यह एहतियात
 ज़रुरी है कि 
इतनी साधारण बात को 
कैसे बतड़ग किया जाय 
जीत की उम्मीदे हो  
तो हार के ठीकरे भी 
कही पर भी फोड़ दिया जाय 
सारे विकल्प खुले रखें
कि मौके पर 
वक्त जरुरत पर 
कहने के लिए 
कुछ कहे तो थे 
हालांकि 
इस साधरण सा कथ्य 
बहुत सा असाधारण लोगों को 
असहज लगेंगें
कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है 
तुम कुछ कह दोगे ?
जबकि कहना हमारा 
जन्म सिद्ध अधिकार है 
और केवल तुम्हरा सुनना 
एकाधिकार ही नही सर्वाधिकार है 
भले तुम जनता हो मतदाता हो 
पर तुम्हारे पास माईक नही हैं
लेने के लिए कोई बाईट नहीं हैं
क्यो चिल्ल पो और  हाहाकार 
अरे हो गया मतदान खतम बाजार 

- डा. अनिल भतपहरी ./ ९६१७७७७५१४