Thursday, November 23, 2023

हिमालय‌

#anilbhatpahari 

हिमालय 

संसार का वैभव  त्याग कर लोग हिमालय की ओर प्रस्थान करते रहे  हैं। कहते है कि वहां देव निवास करते है इसलिए तो हिमालय परिक्षेत्र को देवभूमि की संज्ञा दी गई हैं। 
  कुछ संकट आया , वय ढला  ।।।।न‌ब और सर के बाल सफेद हुये  नहीं कि लोग कैला।‌ ।।‌।।।
लञन
‌।।।,मण, मलसम,।ल।।,न‌‍‌मश त्रिशुल नंदादेवी के शिखर दर्शन के लिए उद्दत हो जाते हैं।तो कुछेक अमरनाथ , बद्रीनाथ गंगोत्री, हरिद्वार की ओर प्रस्थान करते है कि गोया वहां" जाने मात्र से मुक्ति मिलेगी या  दर्शन मात्र से मोक्ष या निर्वाण मिल जाएगा ! मानसरोवर को बुद्ध की मानिंद हड़पकर या हस्तगत  चाइना  "बुद्धम शरंणम गच्छामि" का उद्धोष कर रहा है या  उनके आंऊ माऊ चाऊ हम जैसों के भेजे मे समाते नहीं क्या?भले धर्मशाला खोलकर हम मैनपाट तक शरणागतों को आश्रय देकर धर्मप्रिय महादेश के "धर्मात्मा "बने हुये हैं।
 तो भैये कह रहे थे कि वहां तो अनेक साधु ,तपस्वी , संत मठ ,मंदिर ,आश्रम  दिखते भी हैं। जहां मोक्ष निर्वाण का कारोबर चलता हैं जहां  परमानंद -आत्मानंद की अकथ कथा का प्रवाह भी शिलाखंडों व हिमखंडों को‌ चकनाचूर कर आगे प्रयाण करते कल कल निनाद करते  रहे हैं।
   पर सच तो यह है कि  हिमालय की ओर आजकल  युवाओं का ज्यादा आकर्षण बढ रहा  हैं। वहां बड़ी तेजी होटल, रिसार्ट, होम स्टे ,रेस्त्रां ,पब और विविध मौज मस्ती एंव  पर्यटन व मनोरंजन उद्योग  के केन्द्र स्थापित होने लगे हैं। पैराग्लाडिंग, ट्रेकिंग  ,रीवर राफ्टिंग, जीप लेने जैसे साहसिक कारनामें यदि जीवन संघर्ष में काम आये तो किसी  हठयोगी की तप साधना के प्रतिफल से कमतर नही समझना चाहिये। हमें योगी नही सस्टनेबल भोगी चाहिये तो वसुंधरा के वैभव को चक्रवर्ती सम्राट की तरह भोग सके। पारिवारिक कलह या आर्थिक संकट से भयभीत होकर झोला उठाकर कही भाग न जाये बल्कि शुतुरमुर्ग ही सही गर्दन रेत में घुसा कर डटे रहे या कछुए की मांनिंद भीतरी घर में या बीबी के पल्लु तलें ही बैठ कर मुकाबला करे ...
     हिमालय व देवभूमि  दर्शन  वैराग्य भाव को जागृत करते थे अब राग ,रति ,रंग हिमालय ही जगा रहे हैं। राग -वैराग्य का अनुठा समन्वय वहां द्रष्टव्य हैं। हमलोग हिमालयन व्यु पांइट को अब इंडिया का स्वीट्जरलैंड कह महाआनंद में निमग्न हो जाते हैं। सच कहे तो आसपास बार व बार बलाएं हो, तो इंद्रलोक को पछाड़ दे और गर फिरदौंस ... जमी अस्त कहके उस जहांगिर को चुनौति दे कि केवल कश्मीर ही नही रोहतांग से लेकर नाथुला तक जगह -जगह पर ज़न्नत ईज़ाद कर लिए गये हैं। अब बहत्तर ही क्यों पचहत्तर हुरें सुबह ए शाम मौज़ूद हैं।
  जहां  संन्यास  की दीक्षा ली जाती थी अब उसी भूमि व पावन स्थल में सुहागरात मनाकर गृहस्थ की शुभारंभ करने  लगे हैं।  यही बदलाव है भाया-" अब नइ सहिबो बदल के रहिबो ।"  पांडव लोग महाभारत युद्ध जीत कर विजय के प्रमाद मदमस्त स्वर्गरोहण करने या कहे   मरने हिमालय  गये अब भी कथित विजेताओं द्वारा यह किये  जाते है पर अब जीवन की शुरुआत करने जा रहे हैं।उनका तो स्वागत सत्कार होना चाहिये न कि .... 

     बहरहाल  आइये हिमालय  दर्शन कीजिए और प्रकृति की प्रेम में निमग्न हो परमानंद में खो जाए ...और स्वामी अनिलानंद की भजन में डूब जाय -

कोई काहु में मगन कोई काहु में मगन 
मिटे सारे भ्रम हो प्रसन्न अन्तर्मन 
कोई गाये भजन कोई करे रमन ...

बाकी अंतरा कभी बाद में ...

"अगर बर्दास्त कर सको  तोम‌‌।।ंम।म।।।म
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हिमालय

#anilbhatpahari 

हिमालय 

संसार का वैभव  त्याग कर लोग हिमालय की ओर प्रस्थान करते रहे  हैं। कहते है कि वहां देव निवास करते है इसलिए तो हिमालय परिक्षेत्र को देवभूमि की संज्ञा दी गई हैं। 
  कुछ संकट आया , वय ढला  और सर के बाल सफेद हुये  नहीं कि लोग कैलाश त्रिशुल नंदादेवी के शिखर दर्शन के लिए उद्दत हो जाते हैं।तो कुछेक अमरनाथ , बद्रीनाथ गंगोत्री, हरिद्वार की ओर प्रस्थान करते है कि गोया वहां जाने मात्र से मुक्ति मिलेगी या  दर्शन मात्र से मोक्ष या निर्वाण मिल जाएगा ! मानसरोवर को बुद्ध की मानिंद हड़पकर या हस्तगत  चाइना  "बुद्धम शरंणम गच्छामि" का उद्धोष कर रहा है या  उनके आंऊ माऊ चाऊ हम जैसों के भेजे मे समाते नहीं क्या?भले धर्मशाला खोलकर हम मैनपाट तक शरणागतों को आश्रय देकर धर्मप्रिय महादेश के "धर्मात्मा "बने हुये हैं।
 तो भैये कह रहे थे कि वहां तो अनेक साधु ,तपस्वी , संत मठ ,मंदिर ,आश्रम  दिखते भी हैं। जहां मोक्ष निर्वाण का कारोबर चलता हैं जहां  परमानंद -आत्मानंद की अकथ कथा का प्रवाह भी शिलाखंडों व हिमखंडों को‌ चकनाचूर कर आगे प्रयाण करते कल कल निनाद करते  रहे हैं।
   पर सच तो यह है कि  हिमालय की ओर आजकल  युवाओं का ज्यादा आकर्षण बढ रहा  हैं। वहां बड़ी तेजी होटल, रिसार्ट, होम स्टे ,रेस्त्रां ,पब और विविध मौज मस्ती एंव  पर्यटन व मनोरंजन उद्योग  के केन्द्र स्थापित होने लगे हैं। पैराग्लाडिंग, ट्रेकिंग  ,रीवर राफ्टिंग, जीप लेने जैसे साहसिक कारनामें यदि जीवन संघर्ष में काम आये तो किसी  हठयोगी की तप साधना के प्रतिफल से कमतर नही समझना चाहिये। हमें योगी नही सस्टनेबल भोगी चाहिये तो वसुंधरा के वैभव को चक्रवर्ती सम्राट की तरह भोग सके। पारिवारिक कलह या आर्थिक संकट से भयभीत होकर झोला उठाकर कही भाग न जाये बल्कि शुतुरमुर्ग ही सही गर्दन रेत में घुसा कर डटे रहे या कछुए की मांनिंद भीतरी घर में या बीबी के पल्लु तलें ही बैठ कर मुकाबला करे ...
     हिमालय व देवभूमि  दर्शन  वैराग्य भाव को जागृत करते थे अब राग ,रति ,रंग हिमालय ही जगा रहे हैं। राग -वैराग्य का अनुठा समन्वय वहां द्रष्टव्य हैं। हमलोग हिमालयन व्यु पांइट को अब इंडिया का स्वीट्जरलैंड कह महाआनंद में निमग्न हो जाते हैं। सच कहे तो आसपास बार व बार बलाएं हो, तो इंद्रलोक को पछाड़ दे और गर फिरदौंस ... जमी अस्त कहके उस जहांगिर को चुनौति दे कि केवल कश्मीर ही नही रोहतांग से लेकर नाथुला तक जगह -जगह पर ज़न्नत ईज़ाद कर लिए गये हैं। अब बहत्तर ही क्यों पचहत्तर हुरें सुबह ए शाम मौज़ूद हैं।
  जहां  संन्यास  की दीक्षा ली जाती थी अब उसी भूमि व पावन स्थल में सुहागरात मनाकर गृहस्थ की शुभारंभ करने  लगे हैं।  यही बदलाव है भाया-" अब नइ सहिबो बदल के रहिबो ।"  पांडव लोग महाभारत युद्ध जीत कर विजय के प्रमाद मदमस्त स्वर्गरोहण करने या कहे   मरने हिमालय  गये अब भी कथित विजेताओं द्वारा यह किये  जाते है पर अब जीवन की शुरुआत करने जा रहे हैं।उनका तो स्वागत सत्कार होना चाहिये न कि .... 

     बहरहाल  आइये हिमालय  दर्शन कीजिए और प्रकृति की प्रेम में निमग्न हो परमानंद में खो जाए ...और स्वामी अनिलानंद की भजन में डूब जाय -

कोई काहु में मगन कोई काहु में मगन 
मिटे सारे भ्रम हो प्रसन्न अन्तर्मन 
कोई गाये भजन कोई करे रमन ...

बाकी अंतरा कभी बाद में ...

"अगर बर्दास्त कर सको  तो"  हमारे नये आकार ले रहे कथेतर संग्रह से

Friday, November 17, 2023

स्त्री

८ मार्च महिला दिवस पर...हमारी  वर्षो पूर्व  लिखी कविता द्रष्टव्य है -  
 
"लड़की"

महुंए की फूल है 
न जाने कब टपक पड़े 
ख़ानाबदोश है 
कब कहां डेरा पड़े
सच कहें तो
शीशी है इत्र की 
ढीली हुई डांट 
कि गंधाती उड़ पड़े 
दहलीज़ फांदते ही 
ऊग आतें हैं 
असंख्य पर 
उड़ना चाहती हैं
वह भी 
स्वच्छंद आकाश पर 
पर ,पर कतर दी जाती हैं
कहकर कि तुम 
घर की इज्जत हो 
तुम्हारे बाहर जाने से
किसी से युं ही
हस बोल लेने से 
या किसी को शक्ल 
दिखा / दिख जाने मात्र से  
वह चली जाएगी 
जिसे पुरखों ने 
वर्षों प्रखर पराक्रम से 
अर्जित किया हैं
भले पुरुष 
और उनके परिवार
उसे भुनाते समृद्ध हो
किसी के इज्ज़त  
से खेलते रहे 
मान मर्दन कर 
अट्टहास करते रहें
पौरुष प्रदर्शन कर
उपहास करते रहे
हास परिहास करते रहे
ऊपर से यह सुक्ति 
गजब की यह युक्ति 
बिन राग रति रंग के 
भव में बुड़े
और संग इनके 
भव से तरें  
पाते पुरुष मुक्ति 
नरक द्वार से 
गूंजते सुदूर कही 
यत्र नार्यस्तु पुज्यंते  
रमन्ते तत्र देवता  !
तब मासूम सा 
एक सवाल 
कि देवी कैसे,
और कहां रमती है? 
तलाशती फिरती
सकल ब्रम्हाण्ड 
जारी है यात्रा
दहलीज़ भीतर  
मुगालते में बाहर 
खाट पर बैठें 
लटकते ताले सदृश्य 
कठोर पुरुष 
भले वे हो लुंज -पूंज
घुत्त नशे में 
या हो अशक्त 
वृद्धा कोई जो 
कोमलांगी तो है 
पर ओढ़े हुए पौरुष
ढ़ोते हुए भार 
कठोर- कुरुप 
बेचारी लड़की
औरत बेचारी 
बेचारी नारी ..!!!!

पिता ,पति- पुत्र 
के अधीन सदा 
नारी तेरी अधीनता 
रही है मर्यादा 
और यही है 
नारी की अस्मिता 
नारी की गौरव गान 
बालबिल कुरान गीता
गाई गयी असीम महिमा 
पर कहीं न कहीं 
है एक घड़ा रीता 
तलाशती स्वयं अपनों में 
अपनी ही अस्मिता 
द्रौपदी रुक्मणी राधा 
सीता अहिल्या सूर्पनखा   
लोई आमिन यशोधरा 
मरियम रजिया सफरा 
बेटी बहु बहन बन कर मां 
हुआ जग में न्यारा ...

- डा. अनिल भतपहरी

चित्र -जीवन संगिनी श्रीमती अनीता भतपहरी (उसे ही समर्पित यह कविता । )

Friday, November 10, 2023

कन्फ्युज्ड

#anilbhatpahari 

।।कन्फ्युज्ड ।।

है भी ना 
भी है ना 
ना भी हैं
है भीना
हैभी ना  
हैंना भी 
भीना है 
भीहैंना 
नाभीहैं
हैंभीना 
हैंभीना के 
नाभी मे हैं भी 
हैना के नाभी में है 
नाभी में हैं न 
नाभी में हैं
इस तरह यहां
बातों -बातों में 
बतडंग करने 
की परिपाटी हैं
लालबुझ्झड़ 
और बतड़ग भैये 
ही बस खाटी है
बाकी दो कौड़ी की 
मिलावटी हैं
नेति-नेति की 
आरती है 
यहां लोगन  
भांति-भांति हैं
जो गूंगे- बहरे है 
जो अंधें- संधे हैं
उसे ही शांति हैं 
जो न सुने 
जो न बोले 
जो न देखें
जो कुछ न सोचें 
जो जिये और मरे 
पर कुछ भी न करे 
ओ निर्मोही 
ओ निर्दोषी 
ओ बैरागी 
ओ तपसी 
ओ मुनि
ओ जति 
उनके भी 
है क्या गति 
कैसी  मति 
है उनकी 
सुध न उन्हें 
तन- मन की 
क्या करे कल्याण 
जन मन की 
जो काम न आवे 
किसी की 
लगता है 
ओ सनकी 
या फिर शिकार 
किसी के हनक की 
क्या मतलब 
ऐसे जिनगी की  
पर उसे क्यों 
ढोते लोग 
बातों में उनके 
खाते गोते लोग ..

     - डा. अनिल भतपहरी/ 9617777514

Sunday, October 29, 2023

मंगल असीस

।।मंगल असीस ।।

उतरिस चंद्रयान चंदा म त,
 देखत मन भाइस 
उन्चालिस बछर पहली लिखे,
 कविता के सुरता आइस 
सोला बछर के रहेंव 
जब देखेंव  पुन्नी के चंदा  
मन में भारी उथल - पुथल
काटेंव रतिहा उसनिंधा 
चित्र भारती म पढ़न  स्पेस स्टार्स 
रोचक विज्ञान कथा 
चकमक ,पराग, सरिता,मुक्ता 
सरस सलिल ,चंदा मामा 
कत्कोन रहस्य रोमांच तिलस्म 
सब मन म भरे रहय 
आनी- बानी के जिनिस ल 
जाने- समझे के सउक रहय 
खाए- पीए जिनिस छोड़ 
पाकेट मनी म पत्रिका बिसावन 
कोर्स के किताब तिरिया के  
सनन भर पढ़त रहन 
बिन्दू मिला के छुपे हुये  ल खोजन 
 दू समान चित्र म चूक ल निकालन 
पढ़त खेलत खात मजा से 
अध्धर साइकिल चलावन 
पूल घाट म मारत छलांग 
नरवा म ससन भर नहावन 
बड़ उछाहित मन हमर 
सिरतोन अगास म किंजरय 
फिटिक चंदेनी देखत रतिहा 
कुटॆला , खटिया सुकुवा मन ल चिन्हन 
नवबज्जी रतिहा  पतालू नरवा के
बंधानी घाट म बइठे 
भैया चरन संग पढई -लिखई 
गोठ मन ल गोठियाते 
ऊपर सरग ले  मोर मुड़ म आइस 
टार्च मारे कस  गोर घेरा अंजोर 
देख दुनो सुकुड़दूम 
भागेन पल्ला छोर 
लीम चौरा ब इठे सियान मन सो 
ये घटना ल सोरियायेन 
कुछु अनहोनी प्रेत बाधा होही 
सुन बहतेच डराएन  
शिक्षक बाबू जी हर हमन ल समझाइन 
उल्का पिंड खगोलीय घटना ल बताइन 
उड़न तश्तरी के तको चिंता मन बियापिन 
कछु अनहोनी झन होय सतपुरुष ल सुमरिन 
तभो ल सियान मन के मन नइ माढिस 
अउ गांव के देवालू -चुकनू बइगा करा झरवाइस 
पता नही अगास म मन बिचरत रहय 
बने बर वैज्ञानिक हमरो मन करय 
फेर गणित कापी म ज्यामिति  के जगा
 कविता लिखा जाय 
गुप्ता सर खिसियावत 
अउ कापी ल प्रिसिपल बाबु ल देखा दय 
स्कूल म सब झन  तीर तो 
अबडेच  खिसियाय 
फेर घर आवय त कविता
 ल देखे पढ़े  बर मंगाय 
कुछ अक्षर ल जोड़य 
अउ कुछ मन  ल सुधारय 
साहित्य संगीत प्रेमी 
पिता श्री के असीस  दुलार मिलय 
बिग्यानिक तो बनेन नही 
फेर बनगेयन  कवि 
बरनन करत रहिथन आनी बानी
 गढ़त रथन छवि 

आज अगास के चंदा म उतरिस चंद्रयान 
देख मन मगन हमर बाढिस देश के मान 
उछाहित मन म सिरतोन  नव उमंग भरगिस 
चौवन साल के ये तन म मन  सोला साल होगिस 
बधाई सब झन ल अउ हवय मंगल कामना 
मिलते रहय उपलब्धि बढ़वार सदा शुभकामना

          - डां . अनिल भतपहरी / 9617777514

चंद्रयान ,चांद पर  उतरने की खुशी में 23- 24 8-1923 रात्रि 11 से 1 बजे के मध्य ।

Sunday, October 22, 2023

तुरते ताही ( छत्तीसगढ़ी मे याचिका को अरजी कहते है )

तुरते- ताही 

।।याचिका ल छत्तीसगढ़ी म अरजी कहिथे  ।।

   
छत्तीसगढ़ी माध्यम से शिक्षा पर लगी जनहित याचिका पर सुनवाई के समय  हुई जिरह में छत्तीसगढ़ी की अक्षमता के ऊपर टीप अनुचित हैं।
  याचिका को क्या कहते है ? पर वकील साहब को जवाब नही सुझा । ऐन वक्त भाषा के अनुप्रयोग न करने से उचित शब्द स्मृत भी नही होते यह स्वभाविक हैं।
   असल में याचिका शब्द अंग्रेजी के पीटिशन के विधिक हिन्दी शब्द है , जो याचक से बना है ।  इसके पर्याय प्रार्थना , विनती , अर्ज़ आदि है। देश  मुगलों के शासन से कचहरी ,वकील ,अर्जी, अर्जीनिवेश, मोहर्रिर , दफ्तरी पटवारी तहसीलदार जैसे शब्द लोक भाषाओं में आया। इस तरह याचिका को छत्तीसगढ़ी  "अरजी"  कहते है। 

   हर क्षेत्रिय भाषा  रिजनल लेंगवेंज विस्तारित होकर राजकीय  और सक्षम भाषा बनती  है।उसमे मूल शब्द प्राय,: कम ही रहते हैं । आगत और तस्सम तद्भव शब्दों से वह समृद्ध होती और इनके अनेक वर्ष लगते है।
 छत्तीसगढ़ी के अनेक मूल शब्द न  अंग्रेजी मे है संस्कृत मे है न हिन्दी । इसके मतलब इन भाषा को  अक्षम कहे या माने जाय  ?  क्या यह  सही हैं? नही । 
  सावा ,बदौरी ,करगा ,ओगन , ठुलु  ,गासा ,पखार , जुड़ा सुमेला पंचाली आदि  का कोई पर्याय अंग्रेजी संस्कृत मे हो तो बतावे?
     दर असल शब्द आवश्यकता  प्रयोग और प्रवृत्ति आदि के बनती हैं और व्यवहृत होती है। मनुष्य का दायरा जितना विस्तारित होगा उनकी भाषा उतनी ही विस्तृत और समृद्ध होंगे। 
     पाठ्यक्रम लागू करके देखे महज एक दशक में जो परिणाम आएगा चौकाने वाला होगा। छत्तीसगढ़ी हिन्दी की कृत्रिम व नवीन भाषा नही यह प्राकृतिक रुप से विकसित हजारों वर्षों की यहां तक विक्रम खोल , चितकबरा डोंगरी , सिंघनमाड़ा से प्राप्त आदिम चित्र से प्रमाणित आदिम मानव द्वारा बोली जाने वाली जनभाषा हैं।
     स्कूली शिक्षा के  इतिहास में आरंभ से इसे पढ़ाए जाते तो यहां भी उडिया मराठी बंगाली तमिल‌ तेलगु जैसे परिस्थियां और प्रतिभाएं विकसित होती । पर दुर्भाग्यवश जो समझी और व्यवहृत नही की जाती ऐसी तीनों भाषाएं  हिन्दी संस्कृत और अंग्रेजी पढाये जा रहे हैं।  इस भाषा में छत्तीसगढ़ी दैनंदिनी में उपयोग आने वाली शब्द ही नही हैं। फलस्वरुप लोग अपनी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी को विस्मृत करने की अवस्था में पहुच गये हैं। यह बेहद चिंतनीय हैं। 
    यदि आधुनिक ज्ञान- विज्ञान के चलते कोई शब्द न भी हो तो अन्य भाषा के शब्द को ज्यों की त्यों तत्सम रुप या ध्वनि प्रवर्तित कर तद्भव रुप में अंगीकृत की जाती है। तो छत्तीसगढ़ी में इस तरह आत्मसात करने की बेहतरीन व्यवस्था हैं। छत्तीसगढ़ सात राज्यों की सीमा से लगा हुआ हैं।  आजादी के पूर्व म प्र  उप बिहार उडीसा महाराष्ट्र मारवाड़ आदि  से साक्षर लोगो को बुलाकर मालगुजारी , रैय्यतवाड़ी  में कर्मचारी नियुक्त किये  वे स्थायी रुप से बसते गये। उस दृष्टि से भॊ  भाषाई वैविध्य है। आजादी के बाद पंजाबी सिंधी बंगलादेशी एंव तिब्बतियों को बसाये गये। भिलाई कोरबा जैसे नवरत्न श्रेणी के उद्योग के चलते पुरा लघु भारत इन जगहों पर बसा हुआ हैं।
   उन सबके शब्द छत्तीसगढ़ी में आत्मसात होते गये अब भी यह जारी है। कहने का तात्पर्य अन्य भाषा के शब्दों को  ग्राह्य करने अपूर्व  क्षमता हैं। इसलिए अधिक या अनावश्यक या कहे " बरपेली संसो न इ करना चाही।"
    राज के  नान्हे नान्हे लरिका बच्चा मन ल अपन दाई- ददा अपन दादा- दादी , नाना - नानी  के भाखा म पढाय- लिखाय अउ समझाय के तुरते बेवस्था होना चाही। नइते ओमन अपन भाषा के संग अपन संस्कृति तको ल भुला जही ।  वैसे भी विगत सवा सौ साल के स्कूली शिक्षा के चलते तथाकथित शिक्षित अउ रोजी - रोजगार पाए  शहर पहर धरे मनखे मन ही प्राय: छत्तीसगढ़ी ल गांव- गली खेत - खार ,मजदूर- श्रमिक‌ की बोली समझ आत्महीनता से ग्रसित कन्नी काट लिये हैं।इनकी संख्या महज कुछ हजार या लाख से अधिक नही‌ है। इनकी बिना परवाह किये आठवी सदी में समृद्ध दक्षिण कोशल ( पुरा वैभव सिरपुर मल्हार तुम्मण आदि )  की वैभव को पुनर्स्थापित करने का अब वक्त आ गया हैं। और वह हमारी प्यारी छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति से ही संभाव्य होगा ।
    उधारी -बाढ़ी के जिनीस ह कतेक ल पुरही अउ काबर फुटानी मारबोन  । अपन ल जतनव अउ उपजाव ।
          ।।जय छत्तीसगढ़ी जय छत्तीसगढ़ ।।
     - डा. अनिल भतपहरी / 9617777514

Friday, October 20, 2023

बाबू खान

जनाब बाबू खान साहब 
 
     बालसमुंद स्थित गुरु घासीदास मंदिर के समीप पुष्पवाटिका के पास अपने धुन में बिधुन  एक लंबा पतला सा अघेड़ पुरुष  कुर्ता पैजामा और सलुखा पहिने राजपुरुष सा छवि वाले एक शख्स से मूलाकात हुई।
दुआ -सलाम के बाद , बात  आगे बढ़ी । उनसे मिलने के  पूर्व उनके नाम से परीचित था। क्योकि उनकी एक छोटी सी पुस्तिका गुरुघासीदास चरित की चर्चा से भी वाकिफ़ रहे हैं। पता चला कि यही जनाब " बाबू खान " हैं जो पलारी क्षेत्र की विभिन्न सूचनाओं  एंव समस्याओं को नवभारत समाचार पत्र के माध्यम से उठाते रहे हैं।
  शा कन्या महाविद्यालय पेड्रारोड  से स्थानांतरण के बाद 10 जून 2000 को शा महाविद्यालय पलारी में  कार्यभार ग्रहण कर  हीरा सेठ व्यवसायी के घर किराये पर रहता था। और प्राय: आदतन शाम को भ्रमण हेतु नगर के सुप्रसिद्ध जलाशय जिसमें 8 वी सदी के  प्राचीन सिद्धेश्वरनाथ मंदिर  , राधा कृष्ण, सीता- राम एंव गुरुघासीदास मंदिर तथा द्वीप मे नव निर्मित शारदा मंदिर स्थापित हैं, जाया करता क्योकि यहां के महौल हमें प्रेरित करते और सृजन के कुछ सूत्र मिलते।
     कमल पुष्प से अच्छादित अत्यंत मनोरम बालसमुंद पूरे प्रदेश भर में चर्चित हैं। यहां कार्तिक पूर्णिमा के दिन और गुरुघासीदास जयंती दिसबंर माह में मेले लगते हैं।  आस-पास के हजारों श्रद्धालू एकत्र होते हैं। मेले के बाद  रासेयो पलारी के छात्रों द्वारा मंदिर व मेला परिसर की साफ -सफाई नियमित गतिविधी कार्यक्रम में करते रहे हैं। एक तरह से  बालसमुंद पलारी कालेज के  रासेयो ईकाई  का स्थाई परियोजना स्थल हैं । जहां पर 2003 से 2019 तक हमें कार्यक्रम अधिकारी होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। साफ- सफाई , पौधारोपण , रोपित पौधे मे पानी तराई इत्यादि गतिविधियां हेतु महाविद्यालय के स्वयंसेवक जाते ही रहते थे‌। 
    बहरहाल बाबू खान साहब के आकर्षक व्यक्तित्व व सधे हुए धीर-गंभीर आवाज के हम कायल हो गये और उनकी शेरो- शायरी, गीत -ग़ज़ल के दीवाने भी। खान साहब एक तरह से सच्चे मानवतावादी इंसान थे। शा महाविद्यालय में प्राय: सभी साहित्यिक / सांस्कृतिक आयोजन में सहभागी होते और महाविद्यालयीन कार्यक्रमों के  फोटोग्राफर /रिपोर्टर भी। हमारे सभी दस व सप्त दिवसीय  रासेयो कैम्प  पलारी के लगभग सभी बडे ग्रामों में उनकी  कवि और रिसोर्स परसन के रुप मे दो तीन दिनों तक आम दरफ्त होते । वे इस तरह महाविद्यालयीन बच्चों के साथ धुल-मिल जाते। उनका स्नेह  सदैव मिलते रहा हैं। वे महाविद्यालय मे आयोजित कार्यक्रमों में सहज ही उपलब्ध होते थें।
          साहित्यिक मनीषी और प्रशासनिक अधिकारी डा देवधर महंत जी तब पलारी में तहसीलदार थे और उनसे हमारी मित्रता महाविद्यालय के ग्रंथपाल भट्ट जी माध्यम   हुई ही थी कि  समन्यय परिवार  पलारी का गठन हुआ। उसमें बाबू खान , रामकुमार साहू , टेसूलाल धुरंधर , रामनारायण यादव , पोखनलाल ,पुरनलाल , नेहरुलाल , बाबुलाल गेंड्रे , रविशंकर चंद्राकर  जैसे नवांकुर लोग सम्मलित रहें। प्राय: प्रत्येक गोष्ठी जो गायत्री मंदिर प्रांगण , मेरे निवास या रामकुमार साहू के निवास में होते और परिक्षेत्र मे साहित्यिक कारवां आगे बढ़ती गई । 

2004 में हमारे संपादन में पलारी क्षेत्र के होनहार कवियों की साझा संग्रह  - "परसन "  नामक स्मारिका प्रकाशित हुई। परिणाम स्वरुप बलौदाबाजार , महासमुन्द , भाटापारा नेवरा तिल्दा आरंग , खरोरा,  सारागांव क्षेत्र के साहित्यकारों के बीच हमारे अंचल के साहित्यकारों का आव्रजन होने लगा। इसमे प्रमुखत: मीर अली मीर  रामरुप वर्मा , संदीप पांडे , सुरेन्द्र शर्मा , हितेन्द्र ठाकुर ,  ताराचंद अग्रवाल , द्वारिका मंडल , डा आर एस जोशी , नरेन्द्र वर्मा , सुमन बाजपेई , सरिता तिवारी , दत्तात्रेय अग्निहोत्री , सालिकराम सेन , अनिल जांगड़े गौतरिहा , कृपाल पंजवाणी  नेहरुलाल यादव ,डां. उमाकांत मिश्र , डां  अनिल भतपहरी जैसे साहित्य प्रेमी साधक गणों ने साहित्य सुमन ,  समन्वय साहित्य परिवार व छत्तीसगढ़ी राजभाषा साहित्य समिति गठित कर विगत 20-25 वर्षों से इस ट्रांस महानदी परिक्षेत्र साहित्य की लौ  जलाई जिससे नव पीढी आलोकित हैं। 
         उनमें खान साहब की गरिमामय उपस्थिति उनकी  मां सरस्वती की वंदना, फिर उनके लोकप्रिय गीत  जिसमे हमर गांव बलावत हवय.. और अनेक शेरो.- शायरी नज्म ग़ज़लो से महफिल में शमा बंध जाते। उनकी  घोष स्वर के हम सभी दीवाने थे। 
   खान साहब सामाजिक सौहार्द्र के मिशाल थे वे जन्मजात कांग्रेसी थे लेकिन भाजपा के गढ़ और कर्णधार समझे जाने वाले बृजलाल वर्मा पूर्व केबिनेट मंत्री के गांव में  हर वर्गों के बीच बेहद लोकप्रिय थें। सोसल मीडिया से पता चला कि  खान साहब नही रहें। मन एकदम सा उदास हो गया और उनके साथ बिताये बेहतरीन  लम्हों की याद में खो गये।
     खान साहब का जाना परिक्षेत्र के अपूर्णीय क्षति हैं। साथ ही सामाजिक सौहार्द्र व गंगा जमुनी तहजीब के एक अध्याय का पटाक्षेप हैं। खान साहब के व्यक्तित्व व कृतित्व के ऊपर " स्मारिका " आदि का प्रकाशन अब वहां के साहित्यिक जनों की नैतिक दायित्व हैं। उक्त कार्य में जो भी सहयोग की अपेक्षा होगी करने सदैव तत्पर हैं।
    पलारी - बलौदाबाजार  अंचल के  साहित्यिक बिरादरी द्वारा यह कार्य यदि भविष्य में संपादित होता है  तो नि:संदेह खान साहब के लिए  सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उनकी मातमपुर्सी होगी। आजीवन क्वारे खान साहब सामाजिक साहित्यिक व अपनी पार्टीगत गतिविधियों सदैव सक्रिय थे। वे साफ- सुथरे छवि के मालिक और सादगी पूर्ण जीवन शैली के संवाहक थे।
     इंशा अल्लाह ! खुदा उन्हे जन्नत बक्खे!  और उनके कुनबा आबाद रखें।
     
       - डां. अनिल भतपहरी / 9617777514