Friday, October 13, 2023

सत्य सनातन

#anilbhatpahari 

।।सत्य - सनातन ।। 

देख दुनिया 
रीत -नीत 
फैले हुए है 
द्वेष - प्रीत 
अगणित शत्रु
अगणित मीत 
कोई नही 
कबीरा एक 
उठते हृदय में 
भावातिरेक 
राग अनेक 
अनुराग अनेक 
पर विराग से 
आते विवेक 
होते एकाग्र 
चित्त-मन 
जागृत अन्तर्मन 
आहर राग है 
सब राग के
अधिपति शिव है 
बिन आहार 
जीव निर्जीव है 
राग ही  शक्ति  
बिन शक्ति 
शिव शव है 
राग-विराग के
द्वंद्व में पलते  
भ्रम-भव है
विगता गत के 
वही तथागत 
वही अभ्यागत 
वही बुद्ध 
वही संत गुरु 
वही मेधा प्रबुद्ध 
राग त्याग 
वैराग्य लेकर 
प्रणय कैसे 
यह जीवन 
बिन प्रणय 
चलेगा कैसे 
जीर्ण -शीर्ण 
त्यज पुरातन 
जिस से हो 
जन कल्याण 
और इसी से 
स्व कल्याण 
होगा तब  यह 
धरा स्वर्ग 
ढहे द्वेष  मोह  
हो नव विमर्श 
जगति तल का 
हो उद्धार 
प्रिये कांधे पर 
यह विकट भार 
राग विराग युक्त 
कर्म नित्य नूतन 
कल्याणक हो 
हर चिंतन- मनन 
यही तो है शाश्वत 
सत्य सनातन 

- डा. अनिल भतपहरी / 9617777514

Wednesday, October 11, 2023

शाकाहार बनाम मांसाहार

#anilbhatpahari 

शाकाहार बनाम मांसाहार 

शाकाहार संत संस्कृति है और यह जीव दया पर आधारित है।
   संत संस्कृति  एक तरह से वीतरागी साधु संत  समुदाय , बौद्धिक कार्य पर रत और शारीरिक परिश्रम से दूर वे  लोग है ,जिनके लिए  गरीष्ठ या आमिष आहार अपच्य ,अजीर्ण व व्याधि कारक है। इसलिए इनको धृणा मय व त्यज्य धोषित कर दिया हैं।इसमे व्यापारी,जो एक ।पुजारी और प्रवाचक वर्ग  आते है  जो  छोटी सी जगह पर दस दस घंटे बैठे हुये वक्त बिताते है साथ ही करुणा दया आदि भाव  दिखा  या  बताकर  याचना‌ कर  अपना आजीविका चलता है।
   इ‌न सबके पोषक कृषक है और उत्पादक वर्ग है जिन्हे साहस बल और पौरुष चाहिये। जो दूर दूर तक फैलो खेतों मे  गर्मी वर्षा एंव ठंड मे जी तोड़ मेहनत करते है। पसीने बहाते है।  यदि वे लोग खेतो मे व्याप्त  कीट- पतंगें  नही मारेंगे ? चिडीया , चूहे ,चिटरे ,खरगोश ,वानर , हिरण वराह नही मारेन्गे या भगाएन्गे नही तब उनकी फसलें कैसी   सुरक्षित होगी ?
   और जो मरेन्गे वह उनके भोजन का काम  भी आते है जिससे उसमें नीहित   प्रोटिंस, मिनरल  विटामिन्स अक्षय उर्जा मिलता है तभी वह श्रमश्राद्य कार्य कर सकेगा । इसी तरह  खेत सुखते हैं, नाना किस्म की मछलियां जिसमें औषधीय गुण रहते है उनके भोजन के हिस्सा हैं।
  वनवासी तो वनोपज और पशु -पक्षी पर ही निर्भर हैं। समुद्र किनारे का मछुवारा के लिए मछलियां  धान और गेहूं की बालियां है जिसे वे  श्रद्धापूर्वक अपने अराध्य में मैदान की कृषक समुदाय जैसे ही चढाते हैं। और उत्सव मनाते हैं।
   शाकाहार - मांसाहार को नाहक  पुण्य- पाप की श्रेणी मे विभाजित कर रखे है । जो मांस खाया एक झटके मे पापी हो गया और जो साग सब्जी खाये वह तुरंत पुण्यात्मा हो गया ! क्या गज़ब की धारणाएं बनी हुई हैं। 
    असल मे पाप किसी व्यक्ति  की आत्मा को दुखाना झुठ बोलना या  दूसरो पर अन्याय करना है ।जबकि ऐसा तो शाकाहारी भी करता है।
    मांसाहारी जो अनेक  देव- देवियों मे पशुबलि चढाता और मांस को प्रसाद मानकर ग्रहण करता  है उसे फिर धार्मिक क्यो माना गया है ?
  "वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति" क्यो कहा गया ?
      और तथाकथित राक्षसों / असुरों का  वध तो सारे देवी -देवता  गण अस्त्र -शस्त्र लेकर करते है।उन कथाओं को भव्य मंचों पर क्यो सुनाते है ? हमारे महाकाव्य युद्ध और हिंसा  पर ही रचा गया है। उसके नायक का अदम्य साहस का प्रदर्शन ही हमारे संरक्षक होने की पुष्टि करता हैं। फलस्वरुप वे हमारे अराध्य है ,हमारी श्रद्धा उनकी उसी शौर्य प्रदर्शन पर ही टीका हुआ हैं ।
   हमारे ख्याल से शाकाहार- मांसाहार व्यर्थ प्रलाप है और नाहक व्यक्ति के बीच खान- पान को लेकर अभेद्य दीवार खड़ा करने की नापाक इरादे हैं। यह देश काल परिस्थित और स्वरुचि ऊपर केन्द्रित हैं।
   हा स्वरुचि भोजन पर रुचि श्रृंगार जरुर होना चाहिये । यह नीति कथन है और व्यक्ति को सदाचारी व परोपकारी होना चाहिये न कि शाकाहारी या मांसाहारी ।
       - डा. अनिल भतपहरी

याचिका को छत्तीसगढ़ी मे अरजी कहते हैं।

तुरते- ताही 

।।याचिका ल छत्तीसगढ़ी म अरजी कहिथे  ।।

   
छत्तीसगढ़ी माध्यम से शिक्षा पर लगी जनहित याचिका पर सुनवाई के समय  हुई जिरह में छत्तीसगढ़ी की अक्षमता के ऊपर टीप अनुचित हैं।
  याचिका को क्या कहते है ? पर वकील साहब को जवाब नही सुझा । ऐन वक्त भाषा के अनुप्रयोग न करने से उचित शब्द स्मृत भी नही होते यह स्वभाविक हैं।
   असल में याचिका शब्द अंग्रेजी के पीटिशन के विधिक हिन्दी शब्द है , जो याचक से बना है ।  इसके पर्याय प्रार्थना , विनती , अर्ज़ आदि है। देश  मुगलों के शासन से कचहरी ,वकील ,अर्जी, अर्जीनिवेश, मोहर्रिर , दफ्तरी पटवारी तहसीलदार जैसे शब्द लोक भाषाओं में आया। इस तरह याचिका को छत्तीसगढ़ी  "अरजी"  कहते है। 

   हर क्षेत्रिय भाषा  रिजनल लेंगवेंज विस्तारित होकर राजकीय  और सक्षम भाषा बनती  है।उसमे मूल शब्द प्राय,: कम ही रहते हैं । आगत और तस्सम तद्भव शब्दों से वह समृद्ध होती और इनके अनेक वर्ष लगते है।
 छत्तीसगढ़ी के अनेक मूल शब्द न  अंग्रेजी मे है संस्कृत मे है न हिन्दी । इसके मतलब इन भाषा को  अक्षम कहे या माने जाय  ?  क्या यह  सही हैं? नही । 
  सावा ,बदौरी ,करगा ,ओगन , ठुलु  ,गासा ,पखार , जुड़ा सुमेला पंचाली आदि  का कोई पर्याय अंग्रेजी संस्कृत मे हो तो बतावे?
     दर असल शब्द आवश्यकता  प्रयोग और प्रवृत्ति आदि के बनती हैं और व्यवहृत होती है। मनुष्य का दायरा जितना विस्तारित होगा उनकी भाषा उतनी ही विस्तृत और समृद्ध होंगे। 
     पाठ्यक्रम लागू करके देखे महज एक दशक में जो परिणाम आएगा चौकाने वाला होगा। छत्तीसगढ़ी हिन्दी की कृत्रिम व नवीन भाषा नही यह प्राकृतिक रुप से विकसित हजारों वर्षों की यहां तक विक्रम खोल , चितकबरा डोंगरी , सिंघनमाड़ा से प्राप्त आदिम चित्र से प्रमाणित आदिम मानव द्वारा बोली जाने वाली जनभाषा हैं।
     स्कूली शिक्षा के  इतिहास में आरंभ से इसे पढ़ाए जाते तो यहां भी उडिया मराठी बंगाली तमिल‌ तेलगु जैसे परिस्थियां और प्रतिभाएं विकसित होती । पर दुर्भाग्यवश जो समझी और व्यवहृत नही की जाती ऐसी तीनों भाषाएं  हिन्दी संस्कृत और अंग्रेजी पढाये जा रहे हैं।  इस भाषा में छत्तीसगढ़ी दैनंदिनी में उपयोग आने वाली शब्द ही नही हैं। फलस्वरुप लोग अपनी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी को विस्मृत करने की अवस्था में पहुच गये हैं। यह बेहद चिंतनीय हैं। 
    यदि आधुनिक ज्ञान- विज्ञान के चलते कोई शब्द न भी हो तो अन्य भाषा के शब्द को ज्यों की त्यों तत्सम रुप या ध्वनि प्रवर्तित कर तद्भव रुप में अंगीकृत की जाती है। तो छत्तीसगढ़ी में इस तरह आत्मसात करने की बेहतरीन व्यवस्था हैं। छत्तीसगढ़ सात राज्यों की सीमा से लगा हुआ हैं।  आजादी के पूर्व म प्र  उप बिहार उडीसा महाराष्ट्र मारवाड़ आदि  से साक्षर लोगो को बुलाकर मालगुजारी , रैय्यतवाड़ी  में कर्मचारी नियुक्त किये  वे स्थायी रुप से बसते गये। उस दृष्टि से भॊ  भाषाई वैविध्य है। आजादी के बाद पंजाबी सिंधी बंगलादेशी एंव तिब्बतियों को बसाये गये। भिलाई कोरबा जैसे नवरत्न श्रेणी के उद्योग के चलते पुरा लघु भारत इन जगहों पर बसा हुआ हैं।
   उन सबके शब्द छत्तीसगढ़ी में आत्मसात होते गये अब भी यह जारी है। कहने का तात्पर्य अन्य भाषा के शब्दों को  ग्राह्य करने अपूर्व  क्षमता हैं। इसलिए अधिक या अनावश्यक या कहे " बरपेली संसो न इ करना चाही।"
    राज के  नान्हे नान्हे लरिका बच्चा मन ल अपन दाई- ददा अपन दादा- दादी , नाना - नानी  के भाखा म पढाय- लिखाय अउ समझाय के तुरते बेवस्था होना चाही। नइते ओमन अपन भाषा के संग अपन संस्कृति तको ल भुला जही ।  वैसे भी विगत सवा सौ साल के स्कूली शिक्षा के चलते तथाकथित शिक्षित अउ रोजी - रोजगार पाए  शहर पहर धरे मनखे मन ही प्राय: छत्तीसगढ़ी ल गांव- गली खेत - खार ,मजदूर- श्रमिक‌ की बोली समझ आत्महीनता से ग्रसित कन्नी काट लिये हैं।इनकी संख्या महज कुछ हजार या लाख से अधिक नही‌ है। इनकी बिना परवाह किये आठवी सदी में समृद्ध दक्षिण कोशल ( पुरा वैभव सिरपुर मल्हार तुम्मण आदि )  की वैभव को पुनर्स्थापित करने का अब वक्त आ गया हैं। और वह हमारी प्यारी छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति से ही संभाव्य होगा ।
    उधारी -बाढ़ी के जिनीस ह कतेक ल पुरही अउ काबर फुटानी मारबोन  । अपन ल जतनव अउ उपजाव ।
          ।।जय छत्तीसगढ़ी जय छत्तीसगढ़ ।।

Sunday, October 8, 2023

खनाबदोश जाति देवार की गायन पद्धति

खानाबदोश जाति देवार की गायन पद्धति 

   छत्तीसगढ़ की खानाबदोश जातियों में   देवार प्रमुख हैं अन्य में मित्ता , मंगन -भाट , बसदेवा, नट पारधी ,शिकारी ,किस्बा  आदि आते है। इनका कोई स्थायी घर या गांव नही होते ।ये लोग आजीविका और वस्तुओं के उपलब्धता के दृष्टि से इधर - उधर घुमते रहते है। इनमे मंगन  भाट - बसदेवा लोग अब घर या गांव बसा लिए है। पर मित्ता देवार आदि अब भी खनाबदोश जीवन जीते है। इनके रहने की जगह को डेरा या भसार कहते है ।जो शहर या गांव से दूर रहते हैं।‌ इनके इर्द - गिर्द कुत्ते ,सुअर गधे आदि पशुए भी इनके साथ रहते है। कही कही कुछ बडे ग्रामों , कस्बो मे लंबी अवधि के लिए डेरे लग जाते है ।जहां अनेक घुमंतु जातियां मिलकर रहते हैं। उनके बीच मेल मिलाप से  सांस्कृतिक व प्रवृत्ति गत एकीकरण होने लगे लगे हैं। प्रेम प्रसंग मे शादी ब्याह होने से इन घुमंतुओं मे एक नवीन सम्मिश्रण संस्कृति का विकास होने लगे हैं। 
  बाहरहाल  इनमे देवारों के साथ साथ कुछ अन्य के भी कार्य गायन वादन एंव नर्तन हैं। राजतंत्र के समय खासकर कलचुरियों एंव हैहयवंशीय राज्य में  देवारों को राजकीय संरक्षण प्राप्त था और ये लोग चारण -भाट की तरह ही राजा एंव राज्य की यशगान करते आजीविका चलाते हैं। ये कलावंत समाज है जिसकी स्त्रियां भी नृत्य- गान प्रवीण होती है। रानियों/ सामंतों की स्त्रियों  व आम महिलाओ के  लिए सौन्दर्य प्रसाधन की वस्तु जैसे ये बालों के  लिए रीठा ,आंवला ,शिकाकाई अन्य जड़ी - बुटी  बेचती तथा गोदने गोदती और उनके एवज में पैसे व अनाज प्राप्त कर आजीविका चलाती रहीं। 
इनके गीत व बोल बडे ही सम्मोहक मनोरंजक व नीति परक होते है ।
मांदर, रुंझु, सरांगी  , खंजेरी, चुटका आदि लोक वाद्य द्वारा आकर्षक नृत्य गीत पस्तुत करते है -
रामे रामे रामे गा मोर रामे रामे भाई ग 
ज उने समय के बेरा हवे भाई ...
कथा प्रसंग उठाते है और सरांगी कानो मे अमृत घोरते है ।
चिंताराम देवार की गायन आकाशवाणी रायपुर से प्राय: प्रसारण होते ही रहते है। किस्मत बाई , मालाबाई , फिदाबाई , पूनम , पद्मा ,  जयंती  रतन सबिहा ,जीयारानी जैसी अनेक मधुर गायिकाएं व नृत्यांगनाए हैं।

  नाचा के पुरोधा  दाऊ मंदराजी जी ने छत्तीसगढ़ की बेहद लोकप्रिय नाट्य प्रस्तुति  नाचा मे हारमोनियम और महिला देवारिन कलाकार का प्रयोग कर नाचा की लोकप्रियता को शीर्ष पर ले गया ।तब से देवारिनों नाच आर्केस्ट्रा में काम मिलने लगी और उनकी कलाओं को चार चांद लगे।इनकी  झुमर नाच , करमा घुच्ची करमा नृत्य व गान में इनके  पुरुष मांदर व रुंझू खजेरी चुटका  बजाते थे।
 झुम के मांदर वाला रे करमा धुन म मय नाच मातेंव...
 उनकी सर्वधर्म सम भाव और सर्व मत संप्रदाय के बीच जाकर उनके मन बोधने व गायन का बेहतरीन स्तर द्रष्ट्व्य है - 

राउर पिंजरा म बइठ सुवा मैना बोलत हे राम राम 
अहा बोलत हे राम 
बैसनो साकत बुद्ध जैन कबीर पंथ सतनाम हरि जी ...
  इनमें रोज कमाओ रोज खाओ और मद्य- मांस आदि के चलते  गरीबी और अनेक बुराई पनपी और निरंतर यह समाज मुख्य धारा से कटते चले गये।
हालांकि इनकी भाषा इनके शब्द आदि एक अलग तरह के सांस्कृतिक तथ्य समेटे हुए है जिनका अपना एक अलग महत्व हैं।
   इतिहास साहित्य के अलावा समाज शास्त्र ,मानव शास्त्र सहित भाषा विज्ञान के लिए यह समाज अन्वेषण का विषय है।
 साठ - सत्तर के दशक में बघेरा निवासी दाऊ रामचंद्र देशमुख जी ने देवार डेरा नामक संस्था बनाकर देवार और देवारिनों की कला को पहली बार मंचीय स्वरुप दिया । अनेक तरह की उनकी लोक गीत और वाद्य यंत्र व कलाकारों द्वारा भव्यतम प्रस्तुति दी जाने लगी।  एक तरह से देवार गीत और उनकी  नृत्य  गान वाद्य कलाएं शिष्टता लिए हुए सामने आई - 
आज जागत हे जनता के भाग रे मैना बोलय 
मैना बोलय सुवा न के साथ रे मैना बोलय ...
देवार एक जगह टीक कर नही रहते बल्कि वे लोग हर  महिने दो महिने में डेरे बदलते रहते है ।उनके पास जरुरी भोजन के पात्र कुछ कपडे और कुछ कथरियों और मुर्गे सुअर के सिवा लोई संपदा भी नही । उन्हे लगभग समाज अस्पृश्य की श्रेणी में रखते भेदभाव करते है। 
   इसकी तीक्ष्ण प्रतिक्रिया इन लोगो द्वारा गाई जाने वाली  लोकगाथा " दशमत कइना" में देखने मिलता हैं। लोक मे यह विश्वास है कि यह सत्य घटना पर आधारित कथानक हैं।
    अत्यंत रुपसी दशमत ओड़न  की प्रेम में एक ब्राह्मण लड़का अपनी जाति वंश त्याग कर दशमत को पाने  उनके बीच आकर रहने लगते है -

नव लाख ओडिया नव ओड़निन 
खोदे सगुरिया जाय ।
जुगजुग बरय एक झन नोनी 
नाव जसमतिया ताय ।।

दशमत से प्रणय निवेदन करते कहते है -

मोर घर हवय हंसा परेना , सेज सुपेती अनलेख ।
हीरा मोती रतन पदारथ पाबे अटल  सुख सरेख ।।  

दसमत कहती है -

तोर घर हवे हंसा परेवना त मोर कुकरी अनलेख ।
तोर घर हवय सेज सुपेती त मोर कथरी अनलेख ।।

  इस तरह दोनो के बीच वार्तालाप  और तुलनात्मक बातों से युवक  यह तय करना कठिन होता है श्रेष्ठ जैसा कुछ नही जिसमे जीवन चले और सुख मिले वही उपयोगी  वस्तु ही श्रेष्ठतम है ।

  चिरई म सुघ्घर पतरेंगवा सांप सुघ्घर मनिहार ।
कमा खा हस ले गा ले जात म सुघ्घर देवार ।।

  कह अपनी जातिय संस्कृति को यह लोग किसी से कमतर नही मानते बल्कि सुंदर समझते हैं।

 अंतत: दशमत को पाने के लिए ब्राह्मण युवक देवार की तरह शराब पीते है सुअर मांस खाते है !  जनेऊ तिलक भंग कर साधारण मनुष्य बनकर देवारों जैसा स्वरुप मे आते है ।
दशमत तो उनकी इस बलिदान से प्रभावित हो प्रेम करने लगती है पर पुरुष वर्ग उन्हे वरण नही करने देते और  उनकी जात और कथित उच्च होने की धारणाओं पर खिल्ली उड़ाते जातिय दर्प को कुचल कर गधे में बिठाकर ताल सगुरिया में डुबो देता है ।
उनकी इस  कृत  ब्राह्मण युवक  रुदन करते है-
  माथा धर के बाभन रोवय 
का करम करम डारेव ।
मया म अरझे रहिके मय कुल बंश बोर डारेंव ।।
  
छत्तीसगढ़ में गुरुघासीदास की शिक्षा  " मनखे मनखे एक " हर संवर्ग और लोगो को अभिप्रेरित किया एक देवार गीत मे इस संदेश की बानगी द्रष्ट्व्य है -

मनखे ल मनखे मन अब मनखे  मानत हे 
आज जुरमिल मित्ता मन भजन गावत हे ...
     देवार लोग अपने जन्म से मृत्यु पर्यन्त  रस्मों के गीत के अलावा दान दया धरम के गीतों साथ प्राय: प्रेम प्रसंग के गीत  नगेसर कैना ,  करमा ,  ददरिया ,चंदैनी ,गाकर नाच कर लोगो को रिझाते व मनोरंजन कर के जीवन यापन करते हैं।
   ये लोग बंदर नचाने और कुछ करतब दिखा कर भी रोजी रोजगार करते है।
   देवार -मित्ता लोग अन्य घुमंतु जातियों जैसे  मंगन ,भाट ,बसुदेवा , किस्बा ,  डंगचंगहा , मदारी, नट ,सपेरे पारधी , शिकारी  आदि घुमंतु लोगो के आसपास रहने से उनके जैसे ही जीवन वृत्त अपनाने लगे है । फलस्वरुप उनकी विशेषताएं व लक्षण यदा - कदा इनमे भी दिखते है। ये लोग जड़ी -बुटी मंदरस , बधिया तेल  सुअर मुर्गे आदि पालने व  बेचने  आदि के कार्य भी करते हैं। 
पर राजतंत्र के खात्में और आधुनिक प्रसाधनों की वस्तुओं से बाजार सज जाने से इनकी पारंपरिक कार्य विलुप्त सा हो गये। इनके रोजी - रोटी छिना गया ।
      
फलस्वरुप  वर्तमान में अपने आजीविका हेत  हमारे दैनंदिनी में उपयोग की वस्तुओं के बचत या वेस्ट सामाग्री को जिसे हम कुड़ा दानों में फेंक देते है को  एकत्र कर कबाडियों के पास बेचना हैं। और कुछेक धरेलू या खिलौने की सामान के बदले लोगों की वेस्ट चीजें एकत्र करना हैं। 
   बहुत ही निर्धन पर जो संसाधन है उसी पर मस्ती पूर्वक जिंदादिली से यह तबका जीते आ रहा है। शासन - प्रशासन से इन्हे कोई अपेक्षा नही और न कभी अपने हक अधिकार के लिए एकजूट होते है।
ये संख्या में कम भी है और कलावंत समुदाय होने के कारण इनकी युवा महिलाएं और स्त्रियां नाच पेखन लोक कला मंचों से जुड़ी हुई है। वहां की आय से यह समुदाय बिना कोई  कठोर परिश्रम किये जीवन गुजार देते हैं। ये लोग कही स्थिर टिक कर रहते नही फलस्वरुप अनेक कल्याणकारी योजनाओं से दूर रहते हैं।  साथ ही चाह कर भी प्रशासन उन तक पहुंच नही पाते।
    हालांकि अब स्लम एरिया मे चलता - फिरता अस्पताल आदि खुल जाने से इनका लाभ इन समुदायों को मिलने लगा हैं। और सामाजिक चेतना भी यदा - कदा आने लगी हैं। फिर भी इनके बीच मोबाइल अस्पताल जैसे इनके बच्चों के लिए चलता - फिरता स्कूल आदि खोलने से परिणाम सकरात्मक आएन्गे। कुछ कुछ समाज सेवी लोग व संस्थाएं इनकी दशा सुधारने सक्रिय है।
   इनके बच्चों को नि: शुल्क शिक्षा या कंबल फल मिठाई दवाई आदि वितरण करते देखे सुने जाते हैं।
   रायपुर आदि बड़ी जगहों पर शादी / पार्टी/  भंडारा  आदि के बचत खाने भी इन्हे परोस दिये जाते है। कुछ लोग  पुराने कपडे दान करते है।नेकी की दीवार से भी ये लोगों द्वारा छोड़े गये पुराने कपड़े पहन लेते है। इस तरह  जैसे - तैसे इन लोगों का निर्वह‌न हो ही जाते है। कुछ लोग सुअर पालने लगे है और उससे इनका जीवन स्तर सुधरने लगा है ।पर शराब आदि के कारण निर्धनता व्याप्त है । ये लोगों में अपराधिक प्रवृत्तियां भी पाई जाती है।  मद्यपान चोरी  लड़ाई झगडे बलवा  जबकि पुराने समय मे देवार निष्ठावान थे और चोरी आदि से दूर परिश्रमी थे।
   वृद्धावस्था मे ये लोग भिक्षाटन करते हं। इस जाति की पुनर्वास बेहद जरुरी है । शासन - प्रशासन को चाहिये  कि बेहतर कार्ययोजना बनाकर इनके भसार यानि डेरे या मोहल्ले मे चलित क्लीनिक टाइप चलित स्कूल खोले ।उनके बच्चों को उनकी संस्कृति के अनुरुप शिक्षा दे ताकि  इस समाज के हालात में नव प्रवर्तन हो सकें।

    डा. अनिल कुमार भतपहरी
      मो न 9617777514 
           सचिव 
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग 
सी - 11/ 9077 सेंट जोसेफ टाउन अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़ 492001

Tuesday, September 19, 2023

सत्य सनातन

#anilbhatpahari 

।।सत्य - सनातन ।। 

देख दुनिया 
रीत -नीत 
फैले हुए है 
द्वेष - प्रीत 
अगणित शत्रु
अगणित मीत 
कोई नही 
कबीरा एक 
उठते हृदय में 
भावातिरेक 
राग अनेक 
अनुराग अनेक 
पर विराग से 
आते विवेक 
होते एकाग्र 
चित्त-मन 
जागृत अन्तर्मन 
आहर राग है 
सब राग के
अधिपति शिव है 
बिन आहार 
जीव निर्जीव है 
राग ही  शक्ति  
बिन शक्ति 
शिव शव है 
राग-विराग के
द्वंद्व में पलते  
भ्रम-भव है
वही तथागत 
वही बुद्ध 
वही संत गुरु 
वही मेधा प्रबुद्ध 
राग त्याग 
वैराग्य लेकर 
प्रणय कैसे v.  
यह जीवन 
बिन प्रणय   
चलेगा कैसे 
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जन कल्याण 
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- डा. अनिल भतपहरी / 9617777514

Monday, September 11, 2023

संधिकाल के चश्मदीद गवाहों का यह दौर

#anilbhatpahari 

   " संधिकाल के चश्मदीद गवाहों का यह दौर "

          50 + के लोगों को आधुनिक और पारंपरिक जीवन शैली के संक्रमण काल के आखिरी पीढ़ी के लोग कहे जा सकते हैं। ये लोग  एक पैसे( कुछेक टिकली भोंगटी वाले किस्मत जानी बचे हुए हैं ) के  साथ रहे हैं। ढेकी -जाता के चावल- आटे खाकर बड़े हुए और दौरी-बेलन में धान मींजे हैं। नाव मे बैठ नदी और गले तक हाथ मे बस्ता उठाए नाले पार कर स्कूल गये हैं। यहाँ तक पेड़ के नीचे क ख ग सीखते शास्त्रों में वर्णित गुरुकुल का दृश्य  तक यदा -कदा देखे गये हैं। 
         बैलगाड़ी, साईकल, रेडियो से लेकर बस ,ट्रेन, कार और किस्मत वालें  जहाज तक चढ़ रहे हैं। चिठ्ठी से लेकर ईमेल, एस एम एस , वाट्साप तक प्रयोग कर रहे हैं। सब्जी/ सामान  बेचते फेरीवाले के हांका  से लेकर सुपर स्टार्स का  सामान बेचने वाली( ब्रांड एम्बेसडरों) विज्ञापन और बाजारवाद से कुछ- कुछ  परीचित हो रहे हैं। खड़खड़िया, ताश काट पत्ती से लेकर लाटरी  शेयर मार्केट जैसे जुएं में भाग्य अजमा भी रहे हैं।
        सप्ताह में बुधवार को रेडियो में बिनाका गीत माला और सुर-श्रंगार के मनमोहक गीतों के लिए प्रतिक्षारत लोगों  को एसियाड 1982 में एंटीना टी वी और  में इसी टी वी की आरती उतार कर  रामानंद सागर के रामायण देखते लोग हैं। साथ ही बीच -बीच में बिना रिमोट के पुरा  विज्ञापन देखकर जबरिया जरुरत पैदा कर पाकेट ही नहीं  कोठी के धान बिकवा कर शौक पूरा करने की भूख पैदा कर दिए को पुरा करते परिजन  को देखे हैं । 
    चंद अग्रज  भैयों को शौक के लिए भूखा पेट रह कर सिनेमा देखने लड़ कट  जाय  लेकिन फस्ट शो देखने और फिल्म का कहानी सुनाते दोस्तों में क्रेज जमाते ऐसे लोगों में गिनती वालों में रहे हैं। गड़वा बाजा से लेकर बैञड बाजा मे नागिन डांस करते  बारात और जुलुस के   मंजर से  भी  रुबरु  हुए हैं। भले नई पीढ़ी को यह  कथा- कहानी लगे पर उनके असल नायक हमी लोग हैं। जो रात. रात भर नाच पेख‌न देखते परी को टार्च से बुलाकर फरमाइशी गीत सुन सीटी बजाते  मौज मस्ती के शिखर स्पर्श किए हुए लोग रहे हैं। 
      धान- चावल बेच कर  तवा  केसेट क्रय करने वाले   और खेत बेचकर टी वी ,  मोटर साइकिल, खरीदने का उपक्रम  हुआ उनका और  ग्रामीण अंचल में   शराब- बीड़ी - सिगरेट  और चाय -पानी में ही धनहा बेचते लोगों का यह दौर  चल ही  रहा है। 
        औद्योगिकरण/ नगरीकरण के चलते  फैक्ट्री या कालोनी  (नया रायपुर भी )बसाहट ग्रामीण  इलाके में "फोकट ल पाय मरत ल खाय" जैसे कहावत को साकार करते हुए  शराब और स्पीड बाइकर्स कार चलाते असमय काल कवलित लोगो की बस्ती जिसे हमारी कहानी "विडोस एरिया" बनते देखने का हम जैसे चश्मदीद  गवाहों का दौर भी कह सकते हैं। जिसे तेजी से बदलते दुनिया में यह अंचल उसी तेजी से संघरते  हुए देखा जा सकता हैं ...
                   - डा. अनिल भतपहरी / 9617777514

देश का नामकरण

सामयिक विमर्श : देश का नामकरण 
    
     भारत और इंडिया नाम पर देश भर मे हो रहे परिचर्चा के संदर्भ में यह तथ्य रखना समीचीन व प्रासंगिक हैं।

        पूर्व पश्चिम दक्षिण तीनो दिशाओं में  समुद्र और उत्तर मे हिमालय पर्वत श्रृंखला के मध्य ,विशालकाय द्वीप नुमा भूखंड हैं। जहां  सघन वन एंव बहुतायत रुप मे विशालकाय जीव "जम्बू" यानि "हाथी"  मिलने के कारण "जम्बूद्वीप" नामकरण हुआ। इस भूखंड को भौगोलिक व सामाजिक सांस्कृतिक दृष्टि से  "गोडवाना भूमि "( लैंड) भी कहे जाते हैं। दो एशिया  दूसारा भाग "अंगारा भूमि‌ "(लैंड ) मध्य " टैथिस सागर" जो वर्तमान हिमालय है। दोनो ओर से ये दोनो महाभूखंड सरक रहे है उनके दबाव से हिमालय  की प्रति वर्ष बढ़ भी रहे हैं।
     बाहरहाल इस जंबूद्वीप या  गोडवाना भूमि में आर्यों के आव्रजन व विस्तार होने से विराट भूभाग "आर्यावर्त" के नाम से जाने जाने लगे। जहां आर्य नही पहुंचे वह "दक्षिणापथ "और  "द्रविड़ देश"  कहलाए। इस तरह आर्य- अनार्य और द्रविड़ देश के नाम से भी जाने जाते रहे हैं।
   कलान्तर मे चक्रवर्ती सम्राट  भरत  ( भरत नाम अनेक प्रसिद्ध पात्र है ) के अभ्युदय के बाद इस महादेश का नाम  "भारत "पड़ा । यह तीनो  नाम अत्यंत प्राचीन  और इसी देश व निवासियों द्वारा प्रयुक्त देशज नाम  हैं। महाभारत नामक महाकाव्य यहां जन जीवन में बेहद लोकप्रिय हैं।
   ग्रीक सभ्यता के युनानी- फारसी लोग" इंडस वेली" के पार इस महादेश को  ई पू से  ही "इंडिया" कहें। यह नाम भी दो हजार वर्ष पूर्व से प्रचलन में हैं। यवन हुण शक  सिकंदर  के अभियान व मेगास्थनीज और ह्वेंग सांग के लेखों व यात्रा वृतांतों में इंडिया शब्द का उल्लेख हैं। इस नाम को अंग्रेंजों ने नही दिया बल्कि भारत के पर्याय प्रयुक्त किया। कोलंबस भी इंडिया की तलाश करते अमेरिका पहुच गया वहां के मूल निवासियों को उन्होने रेड इंडियन कहा।  
   जबकि हिन्दुस्तान नाम मुगलों ने दिया । यह नाम अर्वाचीन हैं। ज्ञात हो कि अंग्रेज भारतीयों को इंडियन और हिन्दूस्तानी कहकर  संबोधित करते थे।
            हजारों वर्षो से जो नाम प्रचलन में हो और हमारी संस्कृति व प्रवृत्ति में रच- बस गया हो उन पर अनावश्यक हस्तक्षेप  राष्ट्रहित में  नही होना चाहिये।
       ।।  जय भारत  जय इंडिया  ।।