Sunday, July 23, 2023

हरेली गीत

#anilbhatpahari 

।।हरेली ।।

देंख-ताक कहिले झन कहिबे बरपेली 
हर लेही  दु:ख  हमर  असो के  हरेली 
‌कइसे  बुढादेव  बबा , कस  बुढ़ी दाई ...

खरिखा डाड़ म सबो गरवा सकलाये 
दसमुड़ ,गोंदली संग सब लोंदी खवाये 
देख मेछरावय बछवा मतावय  चाहली 
हांसे शंकर भोला संग म पारबती ...

बोवनिया जमनिया  बादर ह  बरसिस  
सम्मत  देख के  किसान  मन हरसिस 
झुलबोन  झुलना अउ झुलबोन रहचुली 
कैसे भैया किसना कस भौजी रुखमनी ...

जांगर  टोर  करेन ,जबर  मतासी 
तभे लौहा झरिस हे  रोपा-बियासी 
नांगर  धोवागे  अउ  खपागे  गेड़ी 
कइसे कका बिसनु कस काकी लछमी ...

सरधा राखव अउ सइता मन म धरव 
देव धामी  ल बने सुमरव  अउ  बदव 
चीला  चढ़ाके चल , मना बोन  हरेली
कइसे बुध,कबीर साहेब गुरु बबा  घासी ...

   - डा. अनिल भतपहरी / 9617777514

Friday, July 14, 2023

क्या और कब तक

#anilbhatpahari 

 क्या और कब तक ?

तुम्हारा यह बोल 
विरोध नही विद्रोह है 
विरोध बर्दास्त है 
पर विद्रोह नही 
क्योकि विरोध
को समझा लेंगे
या उसे ही सौप देंगे 
सब भार 
ढोने के लिए 
अब रहो तैयार 
जो चला आ रहा है 
निर्वाह करो श्रद्धा से 
वह हो जाएगा अपना 
गर होने दो पुरा 
उनके है कुछ सपना 
वैसे विरोधी तो 
अपने ही होते है 
जरा मनौव्वल से 
मान ही जाते हैं 
पर विद्रोही को समझाना 
और विद्रोह को थामना 
या उन्हें कुचल देना 
आसान नही 
न ही थम जाने 
या कुचल जाने से 
मिले इत्मीनान 
अंदर ही अंदर परेशान 
सांसें कोई चैन की नही 
चाह मीठे बैन की नही 
हरदम लगा रहता है ध्यान 
कि कही कोई हवा चले 
और भड़क न जाये चिंगारी 
जल न जाए 
यह स्वर्ण नगरी 
करना पड़ता  है यत्न 
विकट  प्रयत्न 
हवाएं कही से न चल पड़े 
काटने पड़ते हैं दरख्त 
ढहाने होते हैं पहाड़ 
सुखाने होते है दरियां
उजाड़ने पड़ते हैं वह गांव 
जिसे लोग बे़वजह 
सरग की उपमान देते है 
बजबजाते रहते हैं जात-पात 
अशिक्षा अंधविश्वास की काली रात 
बसकर शहर में
चलकर राजपथ में
सचाई से अनजान रहते है 
वही कोई बैठकर 
लीमचौरा में  
किस्से गढ़ते है  
फिरके तोड़ते है  
सबको साथ लेकर 
पगडंडी पर चलते हैं 
करो उसे बहिष्कृत 
अपने लोक से तिरस्कृत 
लायक नही राजपथ के  
नालायक है 
हमारी रिवायत के 
हमारी शरीयत के 
असल खलनायक है 
सच में !
कि वह विद्रोह के
असल नायक हैं!
तिरस्कार के तीर से 
करो वध 
आबाद रहे अवध 
मुबारक  मगध 
मगर कब तक 

 - डा. अनिल भतपहरी/9617777514

Wednesday, July 12, 2023

क्या और कब तक

#anilbhatpahari 

 क्या और कब तक ?

तुम्हारा यह बोल 
विरोध नही विद्रोह है 
विरोध बर्दास्त है 
पर विद्रोह नही 
क्योकि विरोध
को समझा लेंगे
या उसे ही सौप देंगे 
सब भार 
ढोने के लिए 
अब रहो तैयार 
जो चला आ रहा है 
निर्वाह करो श्रद्धा से 
वह हो जाएगा अपना 
गर होने दो पुरा 
उनके है कुछ सपना 
वैसे विरोधी तो 
अपने ही होते है 
जरा मनौव्वल से 
मान ही जाते हैं 
पर विद्रोही को समझाना 
और विद्रोह को थामना 
या उन्हें कुचल देना 
आसान नही 
न ही थम जाने 
या कुचल जाने से 
मिले इत्मीनान 
अंदर ही अंदर परेशान 
सांसें कोई चैन की नही 
चाह मीठे बैन की नही 
हरदम लगा रहता है ध्यान 
कि कही कोई हवा चले 
और भड़क न जाये चिंगारी 
जल न जाए 
यह स्वर्ण नगरी 
करना पड़ता  है यत्न 
विकट  प्रयत्न 
हवाएं कही से न चल पड़े 
काटने पड़ते हैं दरख्त 
ढहाने होते हैं पहाड़ 
सुखाने होते है दरियां
उजाड़ने पड़ते हैं वह गांव 
जिसे लोग बे़वजह 
सरग की उपमान देते है 
बजबजाते रहते हैं जात-पात 
अशिक्षा अंधविश्वास की काली रात 
बसकर शहर में
चलकर राजपथ में
सचाई से अनजान रहते है 
वही कोई बैठकर 
लीमचौरा में  
किस्से गढ़ते है  
फिरके तोड़ते है  
सबको साथ लेकर 
पगडंडी पर चलते हैं 
करो उसे बहिष्कृत 
अपने लोक से तिरस्कृत 
लायक नही राजपथ के  
नालायक है 
हमारी रिवायत के 
हमारी शरीयत के 
असल खलनायक है 
सच में !
कि वह विद्रोह के
असल नायक हैं!
तिरस्कार के तीर से 
करो वध 
आबाद रहे अवध 
मुबारक  मगध 
मगर कब तक 

 - डा. अनिल भतपहरी/9617777514

Sunday, July 9, 2023

फ़िक्र

#anilbhatpahari 

फ़िक्र 

सशंकित 
मालिक ने कहा 
देखों ऊपर
क्या हो रहा हैं
तमतमाएं ठेकेदार ने 
इंजीनियर से कहा 
कौन है यार  
जो चढ़ रहा है
परेशान इंजीनियर कहा 
हा सर कोई तो है    
फिर ओवर सियर से कहे 
ऊंचाई  देख कर
नाप-जोख कर
बताओ कैसे 
और कहां तक पहुंचा हैं ।
 वे मुंशी से  कहा  
तीसरी तल  पर 
जो चढ़ रहा है 
उतारों उसे 
मुंशी ने मेट को 
यही कहा 
मेट ने  देखते ही 
चीखा 
अरे तू  है 
जो सर पर ही 
बैठ रहा है   
उतरो तुरंत 
अरे गिराओ 
उसे कोई 
लेवर ने कहां 
साहब वह 
गिरेगा ही नही 
क्योकि वे 
गिरकर ही 
ऊपर चढ़ा हैं
हतप्रभ है चौकीदार 
कैसे ,क्या होगा यार 
चलेगी कैसे कारोबार 

- डा. अनिल भतपहरी / 9617777514

Friday, July 7, 2023

डूब या भीग कर

#anilbhatpahari 

।।डूब या भीग कर ।।

करो तुम कुछ भी 
जो पल छिन बीतता है 
वह आखिर में 
इतिहास  बनता ही हैं 

जो बोवोगे लुओगे वही 
बड़े-बुजुर्गों की उक्ति 
सम या विषम  परिस्थिति 
मिले उपलब्धि या अधोगति 

इसलिए भैया अब 
जहां भी चलो सम्हल कर 
कुछ भी करो पर ज़रा 
ऊंच- नीच देख कर  

कुछ बड़ो की व्यवस्था 
छोटो को नागवर लगती है 
अच्छा हुआ उनके हिस्से 
बुरा हुआ तो इनके गलती है 

शास्त्र सम्मत है यह 
नीति कथन 
क्षमा बड़न को चाहिए 
और उत्पात चाहिए  छोटन  

इस तरह शास्त्र सम्मत 
विकट उत्पातों पर क्षमादान 
कर लो जी चाहे जो उत्पात 
क्या मस्त है यह  प्रावधान 

इसलिए तो हो गया 
सहज उत्पात मूत्राभिषेक 
जहां शास्त्र वचन हो 
वहां कहना क्या शेष 

बड़े वही है और 
वे उनके है  छोटे 
तुम हो पशुवत 
भला क्यों तुम सोचें 

पूर्व जन्म का फल भुगत 
अगले जन्म हेतु पुण्य फल 
क्यो निराश उदास रे बंदे !
होगा तेरा जीवन सफल

डूब या भीग कर श्रद्धावनत 
आकंठ भाव -भक्ति में 
लोग बेफ़िक्र जीये जा रहे हैं 
प्रभु इच्छा मौज मस्ती में 

     - डां. अनिल भतपहरी / 9617777514
         8-7-23   friday 10 Am 

Tuesday, July 4, 2023

धनवंतरी और धनतेरस

#anilbhatpahari  

धनतेरस एंव लक्ष्मी पूजा
            बनाम 
धन्वतरी और लक्ष्मी 
         
    कृषि संस्कृति की महापर्व फसलों की घरों में  आगमन की खुशी में मनाई जाने वाली दीपावली पर्व में धन तेरस और लक्ष्मी का क्या आशय और महत्व है पर विचार करते हैं। क्योंकि आज के दिन हर शहर कस्बा व बडे ग्रामों में लोग जमकर खरीद - फरोख्त कर रहे हैं। त्योहार की खुशी में इस तरह कर्ज लेकर या उसमें डूब कर खुशी मनाने का यह नायाब तरीके का ईजाद वाकिय में अल्हादकारी व रोचक हैं। साथ ही कैसे अर्थ का अनर्थ कर लिए गये है इन पर भी सम्यक् दृष्टिपात समीचीन हैं।
      धन्वतरी स्वास्थ्य देता है और स्वास्थ्य ही धन या  लक्ष्मी  है जिनके द्वारा ऐश्वर्य  (सुख ) का उपभोग किया जा सकता हैं वही ऐश्वर्य वान ही ईश्वर हो जाते हैं। जिनके पास सदैव सकारात्मक चीजें रहते हैं।  परोपकार  और सदाचार से व्यक्ति ही निर्मल यश के प्रतिभागी होते हैं और वे  मृत्यु  के बाद भी अपनी  श्रेष्ठ विचार  से अमर रहते हैं। 
      इस तरह देखें तो व्यक्ति के जीवन में इन  दोनो  का अतिशय महत्व हैं। क्योकि यह आपस में एक दूसरे से जुडे हुए हैं। जो स्वस्थ रहेगा संपदा उनके अधीन रहेगी और जो रोगी होगा उनके पास  संपदा निकल जाएगी । 

   वर्षा काल बीतने और शीत ऋतु के संधिकाल में जब सर्वत्र स्वास्थ्य वर्धक  गुलाबी ठंड हो तब व्यक्ति इसे अर्जित करने उद्यम करते हैं। शरद पूर्णिमा में उसी अमृत की चाह में रतजगा करते कार्तिक माह की अल सुबह सैर और स्नान हमें निरोगी करता हैं। इसे कायम रखने का प्रयत्न सदैव करना चाहिए। 

भारतीय संस्कृति में समुद्र मंथन एक ऐसा रुपक है जिसे अनेक विद्वत जन अनेक तरह से व्याख्यायित करते हैं।
       आर्य और अनार्य  के संघर्ष को देव और दानव या कहे सुर और असुर के बीच हुए संग्राम का हिस्सा तक मानते हैं। देवासुर संग्राम का अंतिम परिणति समुद्र मंथन और वहाँ से प्राप्त अमृत हैं। जिनके पा‌न कर अमरत्व को अर्जित करना हैं।
      ऐसा लगता है कि अमृत एक औषधि हैं जिससे द्वारा कष्ट और जिल्लत की जिन्दगी को सुख एंव  कीर्ति से युक्त जीवन में बदला जा सकता हैं।  पर यह कैसा औषधि हैं ? क्या द्रव है जो घड़ा में भरा हुआ होता हैं ? इन पर विचार आवश्यक हैं। 
           समुद्र मंथन में 14 तरह के रत्न निकले जिसमें विष से लेकर अमृत तक हैं।  कोई कार्य के आरंभ में विष ही निकलते हैं । सतत परिश्रम और निष्ठा से ही  सफलता रुपी अमृत  मिलता हैं। 
       
    दरअसल विष एक तरह  शंका - कुशंका ,मत- मातान्तर ,संघर्ष, नफरत, द्वेष ,भाई -भतीजावाद  जात पात ,खेमेबाजी ,और परस्पर संघर्ष हैं। इन सबसे निजात पाकर व्यक्ति सतत संघर्ष करते ज्ञान और चेतना से ऐसी सफलताएँ अर्जित करता है कि वे  साधन- सक्षम हो जाते है। फिर वे परोपकार और सबके लिए मंगलभाव रखते हैं। तब वह विमल यश को प्राप्त करते हैं।
 कलांतर में  लोग  उनके सद्कार्यो को सदैव स्मृत करते हैं। यही उनका अमृत पान कर अमर हो जाना हैं। 
  नश्वर देह की  जगह उनकी विचार अमर हो जाते हैं।
     
          आजकल धन्वतरी विचित्र ढंग से  धन का देवता हो गये और कर्ज करके इस दिन सोने चांदी के जेवर बर्तन और भौतिक सुख - सुविधाओं की वस्तुएँ  यथा कार ,बाईक,  टी वी  ,एसी, कुलर आदि  उत्पाद कर्ज या चञद बचत  से  लेकर तनावग्रस्त होकर  बीमार  व कलह में पड़े  रहते है । वणिक गणों और उत्पादक वर्ग ऐसे लोक लुभावन विज्ञापन व  स्कीम लाते हैं कि अमीर -गरीब सभी अपने हैसियत से बढकर खरीददारी करते हैं।  धनतेरस को लक्ष्मी खरीदने का बाजार बना लिए हैं। इससे सबसे अधिक  मध्यमवर्गीय कृषक समुदाय सर्वाधिक प्रभावित होते हैं।

    कृषकों के फसल खेतों में है उनके पास कुछ नहीं हैं। फिर भी वे दुनी या डेढ़ी ब्याज से महज महिना दिन के लिए आकंठ कर्ज में डूब जाते हैं। उसे उतारने पूरे वर्ष भर अनुक्रम चलता हैं।  सच कहे तो दीवाली में दीवाला निकल जाते हैं।  एक किसान कर्ज में जन्मता है और कर्ज मे डूब कर जाता हैं। कृषि संस्कृति का यह महापर्व दीवाली कृषकों का ही बलि लेने का पर्व के रुप में ‌बदल सा गये हैं। 
   इस तरह  पुष्प नक्षत्र एंव धनतेरस  आम जनता को महाजनों के  ऋणी (गुलाम ) बनाने  का महापर्व हैं। 
 
        बहरहाल खुशियाँ  खरीद फरोख्त में नहीं बल्कि तनाव रहित अपने आय के दायरे में संतुष्ट भाव से जीने में हैं। और जब नगद हो तब आवश्यक वस्तुएँ की  खरीददारी हो इनके लिए कोई तिथि पर्व का निर्धारण बिल्कुल अनुचित व षडयंत्र जनित हैं। इन सबका ध्यान रखते हुए स्वास्थ्य व संपदा पाने की मंगलकामनाएं व  दीपावली पर्व की हार्दिक बधाई ।

https://youtu.be/m-6VTP2TABo
                -डाॅ. अनिल भतपहरी/9617777514

Saturday, July 1, 2023

मंहगाई गीत

#anilbhatpahari 

मंहगई गीत 

दू सौ किलो राहेर दार ,डेड़ सौ म  पताल 
का बतावव संगी तोला ,हमरों  हाल-चाल 
ये मंहगाई के मारे होगे, जीव के जंजाल ...

बिहने  ले बिस्कुट  बर रोवत  हे टूरा 
नवा लुगरा बर लुगाई  फोरत हे चूरा 
कत्कोन कमाथन ,फेर होथे बाराहाल ...

खेती हर अपन  सेती ,नौकरी  न चाकरी 
मांगे न मिलय उधारी ,बता अब का करी 
ओरमा के गर मं फासी, ये झंझट ल टाल ...

गोंदली सरकार बदलथे अइसन तो देस 
तभो ले कोनो  चेतय  नही  भारी कलेस 
पाच साल म टेकाथे बंगला,जे होथे सरकार ...

     - डा. अनिल भतपहरी / ९६१७७७७५१४