Wednesday, July 27, 2022

हरेली

#anilbhatpahari  Happy Hareli 

हरेली तिहार के अघादेच बधाई हवय 

हरेली 

हर लेही  दु:ख असो हरेली 
‌नोहय चिटिक गोठ बरपेली 

जामत बोवत बरसिस  बादर 
सम्मत सोला आना ले आगर

जांगर टोर करेन जबर मतासी 
तभे लौहा झरिस रोपा-बियासी 

सइता राखव  अउ  धीर धरव 
देव धामी ल बने सुमरव बदव 

चढ़ावव चीला मचव सब गेड़ी 
हर  लेही  दु:ख  असो  हरेली 
         - डा. अनिल भतपहरी / 9617777514

Sunday, July 3, 2022

देवधर महंत

।‌।चंद्र बिन्दू होकर हलंत् कहलाने का माद्दा महंत में हैं।।

विविधाताओं के सर्जक महंत जी स्वयं के  परिचय देते अपनी एक  कविता में कहते है - " चंद्र बिन्दू होकर हलंत हूं... "अब कोई  दुनियावी लोग उन्हे कितना उठाए या गिराए कोई फ़र्क नहीं पड़ता । क्योंकि वे ऊपर पहुंच कर  चंद्रबिन्दू है और नीचे हलंत से आगे कुछ भी नहीं।इस तरह देखे तो उनकी वह उक्ति उनके लिए कितना सटीक है यह वह स्वयं तय करते है - "अपना शीश काट कै बीर हुआ कबीर " की तरह ।
      निर्विकार निर्लिप्त संत सदृश्य व्यक्तित्व का कवि देवधर महंत का दर्शन लाभ हुआ 2000 में जब पलारी के अमित इंटरप्राइजे़ज स्थित एस टी डी बुथ पर बातें करने पंक्तिबद्ध खड़े थे, तब हुआ।  वे समीप तहसील कार्यालय से आए थे और मै शा महाविद्यालय पलारी से (तब हमारे महाविद्यालय का नामकरण नही हुआ था और प्रक्रिया चल रहे थें। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गौ भक्त  नयनदास महिलांग पूर्व विधायक बलौदाबाजार के निकटस्थ सहयोगी मदन ठेठवार और बृजलाल वर्मा पूर्व केन्द्रिय मंत्री के नाम पर सहमति होना शेष था। अंतत: बृजलाल वर्मा जी नाम महाविद्यालय हुआ) जहां पर 19 वर्षो तक अध्यापन करने का सौभाग्य मिला । आदि कवि वाल्मिकी के कर्मभूमि तुरतुरिया के समीप प्राचीन सिद्धेश्वरनाथ मंदिर के प्रांगण मे बसा छोटा सा पुजारी पाली पलारी हुआ ऐसा जनश्रुति हैं। यहां वे तहसीलदार रहते समन्वय साहित्य परिवार की स्थापना कर अंचल के साहित्यकारो / संस्कृति प्रेमियों को एकत्र करने का नायाब कार्य इस नायब तहसीदार ने किया जिनका स्नेहाशीष आज पर्यन्त अग्रज सदृश्य मिल रहा है । 
    हालांकि देवधर महंत नाम मेरे लिए नया नही बल्कि  सुना और पढ़ा गया था।  अपने अग्र पंक्ति मे ऊंच पुर व्यक्ति को शालीनता से  धैर्य पूर्वक खड़े हुए  देखा और उनकी इस व्यवहार से प्रभावित हुआ। कितनी सादगी मय जीवन शैली है जबकि  समीप  ही उनके कार्यालय और उनके मातहत लोग इर्द -गिर्द हैं .... बहरहाल 
हमलोग अनेक मंच पर साथ रहे और गांव ,शहर जहां जब अवसर मिले कविताएं पढते सुनते रहें। उनके साथ और संस्मरण हम लोगों के लिए पाथेय है जिन्हे ग्रहण कर अभीष्ट की प्राप्ति कर सकते है। आप इस अंचल के रचनाकारों के साथी व  प्रेरक रहे हैं जिनमें  डा आर एस जोशी रामरुप वर्मा ,डा उमाकांत मिश्र ,दत्तात्रेय अग्निहोत्री कृपाल पंजवानी , अनिल जांगड़े गौतरिहा ओम प्रकाश कोशले  सालिकराम सेन ,  बाबूखान मीर अली मीर  रामकुमार साहू पोखन जायसवाल रामनरायण यादव नेहरु यादव दिनेश पटेल  सहित मै स्वयं जिन्हे समन्वय साहित्य परिवार में संधारे और छत्तीसगढ़ राजभाषा साहित्य समिति बनाने प्रेरित किए। 
    कुछेक नामचीन  दंभ दर्शित  तथाकथित वरिष्ठों की प्रवृत्ति को प्रश्नांकित करते कह उठते है -

उल्होय डोहड़ू ल कतको 
खोटइंया हे 
लोहा ल पारस बन छुवइंयां कतका हे ? 
 छत्तीसगढी सेवक सप्ताहिक पत्रिका ततात्कालीन समय मे छत्तीसगढ़ी अस्मिता को स्वर देती छत्तीसगढी प्रेमियों के लिए एक मंच की तरह भूमिका निभाई और छत्तीसगढ राज्य व छत्तीसगढी के लिए आन्दोलन रत भी रही इनमें हम लोग साथ साथ छपते भी रहे है। अलग छत्तीसगढ़ राज भाव भूमि अउ भाखा आलेख के प्रकाशन से इस नाचीज़ को उनके पाठक और छत्तीसगढ़ी प्रेमी जन पहिचानने लगे मुझे उनके संपादक जागेश्वरप्रसाद जी महंत जी के काव्य और उनमें नीहित भाव के प्रति बताए भी थे । सच मे उनकी छत्तीसगढ़ के प्रति विभिन्न नदियों के माध्यम से व्यक्त  पीड़ा  दर्शनीय है - 
अरपा अकबकावत हे हस्दो हदरय केलो कलपय 
आठों पहर धरर धरर आंसु महानदी ढरकावय ... कितनी भावप्रवण और अनुप्रासिक वर्णन हैं। 
    महंत जी कविता गढे गये नही लगते बल्कि स्वभाविक ढंग से  हृदय से प्रस्फूटित लगते है जैसे अनायस कही से सोता फूट पड़ा हो । उनकी अलंकारिक योजना चमत्कृत करते है और अनुठा दृश्य रचते है - 

ठउका फबे हे जनेऊ असन 
बेलासपुर के देह म अरपा ...
बस या कार के  खिड़की ले  झाकत अरपा के पुल ल नाहकत देखबे त ए डांड के सुरता नइ आही त समझ कि कही न कही  काव्यास्वादन क्षरित तो नही हो चूके हैं। 

   फिर आंखों के सामने विस्तृत अरपा ही ओझल जाएगा जैसे कि  यहां पर हो गये है - 

"वो दिन दू चार झन खोजत रहिन अरपा ल कंडिल घरे 
अरपा पटाय हे 
विधान सभा अउ लोकसभा के तरी म 
अरपा चिपाय हे आफ़िस के 
फाईल म "

   महंत की रचना संसार उनके की कद काठी के अनरुप ऊंच पुर है । और जैसा कि उनकी वृहत्तर क्षेत्र मे सेवाएं है, ठीक उसी तरह  विस्तृत है ... कभी देवभोग से देवधर बोलते है तो कभी बलौदाबाजार से तो कभी बिलासपुर तो कही रायगढ़ ... ऐसा लगता है कि उन्हे हर जगह छत्तीसगढ़ महतारी पहुंचा रहे  है कि जा देवधर जा ओ डेहरी तको दीया मढा दे  जिला कुलुप हवय तोला देवता धामी के ठांव अउ  मंदिर  मं दीया बारे के जरुरत निये ... उनका कबीर उन्हे तार सप्तक सुर देकर उन्हे  उन्मत्त गाने आदेशित कर रहे है ...

बिलकुल नही बचे है दीए 
किसी देवी -देवता के लिए 


रुढ़ताओ/ मूढ़ताओं के  विद्रोही और कथित मुख्यधारा के  प्रतिरोध का स्वर के साथ महंत जी " निर्गुण बानी भांजते" सुफी संत कस चुपचाप मया के धान बोवत गुरु घासीदास सरीख  (काबर कि ओहर संत हिदरय के खेत म अधर रुपी नागर चला के सतनाम रुपी धान बीज बोवइया आय ) नंगरिहा  लहुट जथे ... ये कविता म उनमन  सतनाम दर्शन के संग एकाकार होय असन लगथे - 
तोर मया हिरदय म धान अस बोवागे ... 
विरोत्तेजक भाव हर तुरते ताही  प्रेमल अउ  सर्वग्राही भाव म बदल जथे ‌ । जो अउ जादा संघातक प्रहार करत केवल कबीर का संगत नही गुरुघासीदास कस अंगत ( बैरी तक मितान बद लेथे) बड़ सिधवा होत उनमन " टेड़ा कस मथिया नवा के "  पियसहा /अइलात बिरवा  मन ल  नव जीवन धार देथे । महंत वह जो अपने मम् अर्थात् अहं भाव को हत अर्थात नष्ट कर ले । अपने नाम सार्थक करते कविवर सर्वहितकारी और अमरत्व भाव से युक्त मधुर गीत गाते हुए मुझे मोहक  और प्रिय लगते हैं.....


    डा. अनिल कुमार भतपहरी 
           सचिव 
 छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग

Sunday, June 26, 2022

सतनाम बनाम सनातन

भारतीय जनमानस में‌ सतनाम की सात तरह की विशिष्ठ ध्वनि है - सत्थनाम , सच्चनाम , सत्तनाम , सत्यनाम  सतिनाम  सतनाम और शतनाम । ऐसा जान पड़ता है कि सतनाम  शब्द प्राचीन सिन्धु घाटी सभ्यता मे भी व्यवहृत होते रहे है।  श्रमण और कृषि संस्कृति में  सतनाम साधक व सुमरन करने वाले समुदाय बेहद प्राचीन संस्कृति के लोग हैं। वयोवृद्ध पुरातत्व वेत्ता पद्म श्री अरुण शर्मा जी ने यह स्थापित किया है कि सिन्धु घाटी मे प्राकृतिक विपदा के उपरान्त वहां से लोग आव्रजन कर इधर ऊधर बिखर गये उनमे कुछेक लोग महानदी घाटी सभ्यता मे आ बसे मातृका पूजा और शव दफनाने की क्रिया तथा सतनाम सुमरन आदि वर्तमान सतनामी करते है यह गौर वर्णी चित्ताकर्षक और सिन्धु घाटी के नस्ल से बहुत समनाताए रखने वाले समुदाय हैं। "

बुद्ध पूर्व 26 बुद्ध और हो चूके है । बुद्ध का आशय  बुद्धि या ज्ञान से है। जिन्हे मर्म का सत्य का ज्ञान हो चुका जो सब कुछ को समझ गया वही बुद्ध या ज्ञानी हैं।  राजकुमार सिद्धार्थ को सत्य का  बोध ( ज्ञान) हुआ तो वे ज्ञानी अर्थात् बुद्ध हुआ । 

  बहरहाल बुद्ध के अनेक नाम मे सच्चनाम भी एक नाम हैं।
यह नाम भावनात्मक रुप से है।
क्योकि वे राग द्वेष मोह से रहित होकर उनका चित्त मन हृदय सत मय हो गया था इसलिए  उसे  सच्चनाम कहे गये। आगे  वही क्रमिक विकास मे सत्तनाम हुआ।
सत्तनाम संत मत का लोकप्रिय शब्द है और यह कल्पित या मिथकीय  ईश्वर से अलग यथार्थ व ऐतिहासिक शब्द नाम हैं। सतपुरुष भी इसी तरह संत मत में ईश्वर के समनान्तर शब्द हैं।
     सतनाम पंथ में गुरुघासीदास को सतनाम बाबा  भी कहे जाते है ।इसका मतलब गुरु घासीदास सतनाम हो गया ऐसा नही हैं।
   सच्चनाम ठीक सतनाम बाबा जैसा संतो या अनुयाई द्वारा श्रद्धावश पुकारे गये नाम हैं।
एक प्राचीन पंथी गीत मे सतनाम का वर्णन इस तरह से मिलता है -

जपो जपो सतनाम मनखे के नोहय एहर नाम 
सत एक रद्दा ये जीव के सहारा ये 
ये ला पकडे ले भवसागर पारा हे 
सोचो समझो गा आज देखो परखो गा आज 
मनखे के नोहय एहर काखरों नाम  ...

    बहरहाल इतना तो अवश्य है कि  भारत वर्ष में प्राचीन वैदिक या  सनातन मत भी प्रचलन मे है जो आगे चलकर पौराणिक स्वरुप मे अलग - अलग सम्प्रदाय के रुप में संगठित होकर क्रमश:  शैव ,शाक्त वैष्णव के रुप में विकसित हुए इनमे घोर  प्रतिद्वंद्विता भी रही पर शैन: शैन :  लोकायत व  बौद्ध जैन आदि के अभ्युदय के बाद समन्वित होकर अवतार वाद लाकर सबको समन्यव किए गये । वैदिक व पौराणिक मान्यताओं को स्थापित कर एक अभियान के तरहत प्रतिष्ठापित कर दिए गयें।
 आगे चलकर    त्रिदेव सहित  राम कृष्ण और उनके परिजन आदि  को मानने लगे  है। इन के प्रतिरोधी स्वर को साम दाम दंड भेद जैसे नीति के चलते‌ बहुतों  को शूद्र वर्ण देकर  मिला लिए गये और बहुतों का  बहिष्कृत कर दिए गयें। उन्हे अवर्ण या अस्पृश्य धोषित कर दिए गये।
    यह समुदाय जो कभी प्राचीन बौद्ध धर्म के महायानी हीनयानी और सहजयानी थे उन्ही वर्गो समुदायों मे संतो गुरुओ का आगमन हुआ और वही लोग सतनाम का अलख जगाए।वर्तमान मे सिख सतनामी कबीरपंथी रैदासी वगैरह तमाम समुदायों मे केवल " सतनाम  "  के कारण परस्पर सौहार्द्र स्थापित होने लगे है। उपसना और कुछेक मान्यताओं मे अंतर हो सकते है पर सत ज्ञान और परस्पर सहयोग के मामले मे सभी सतनाम के अनुयाई  अपने अपने धर्म गुरुओ और प्रवर्तकों के संदेशों के अनुरुप समान ही हैं।
ढोंग पांखड और चमत्कार आदि के जगह कर्मवादी और पुरुषार्थ से भरा हुआ आदर्श समाज की संरचना गुरुओं के कारण हुआ हैं।
   वे लोग जाने- अनजाने में छोटी- मोटी संकीर्णताओं व मान्यताओ के आधार पर सतनाम के मार्ग से न भटके और न  ही परस्पर प्रतिद्वंदिता रखें। अन्यथा सदियों से यथास्थितिवादी लोग सतनाम की नव प्रवर्तन स्वरुप को विकसित और प्रतिष्ठित होने ही नही देंगें।
        सतनाम 

Saturday, June 4, 2022

साहित्य और समाज के लिए

#anilbhatpahari 

      शनिवारीय चिंतन : 

  साहित्य और समाज के लिए 

          भारतीय परिप्रेक्ष्य में मार्क्सवादी चेतना खात्में की ओर हैं।हालांकि साहित्य में प्रगतिवाद और प्रयोगवाद के नाम पर वह अब भी पाठ्यक्रम और कथित बौद्धिक जगत में विराजमान हैं। यह ऐसा भी है कि नये चयन प्रकाशन और वितरण की झंझट कौन पाले ? शायद इसलिए भी विगत 40-50 साल से  वही चला रहा है ‌। अध्यापक,विद्यार्थी  और पाठक एकतरह कोरे बुद्धिजीवी टाईप  रुढ -मूढ सा हो गये हैं। एक जड़ता सा यहां नज़र आते हैं।  
          वर्गीय समुदाय के एकीकरण और उनकी अपनी अस्मिता के संरक्षण और प्रतिष्ठापन का समय चल रहा हैं।  यहां जीवंतता है पर वह  साहित्य में अब तक गंभीरतापूर्वक यही बौद्धिक (मध्यम ) वर्ग  क्यो नही ले पा रहें है?  इन प्रश्न का उत्तर तलाशना चाहिए। ऐसा लगता है कि यह बौद्धिक वर्ग अपनी ओढ़ी हुई केचुंल  उतार सरल सहज होना नही चाहते और जो अभिजात्य है उस तरह जटिल बन नही सकते। 
              ‌     - डा. अनिल भतपहरी

Friday, June 3, 2022

ये क्या हो रहा है ?

शनिचरी चिंतन 

ये क्या हो रहा है ? 
मिथक का इतिहास या इतिहास का मिथकीय करण !!!
और हा अब तक की सभ्यताओं मे मानव तो मानव बने ही नही ।जाति प्रजाति धर्म वाले जरुर बनते रहे ...
सचमूच आज गुरुघासीदास बाबा स्मृत होने लगे जब वे जगन्नाथपुरी के सागर तट पर  सहजता पूर्वक उद्धोष करते दो टूक कहे थे - " मनखे करिया होय कि गोरिया, ये पार के( सागर पार ) होय या ओ पार के मनखे  मनखे  एकेच आय।" 
  पर कोई उनकी यह बात समझे तब ? 
विभेद ही सारे संधर्ष द्वंद और युद्ध  का मूल है और अब तक यही होते आ रहे है।येन केन प्रकरेण  विजेता श्रेष्ठ ,आर्य व देव  और हारे हुए लोग अश्रेष्ठ ,अनार्य व दानव धोषित होकर  हेय ,दास ,दस्यु, राक्षस  कहलाएं।
और हजारों वर्ष हुए संधर्ष जो मिथकीय भी हो सकते हो को धार्मिक आधार देकर आज तक इन वर्गों के ऊपर संधातिक हमले और अनेक तरह‌ के जुल्मों सितम होते आ रहे हैं। ऐसा लगता है कि किसी से लड़ने और जीत कर अपने अहं भाव को तुष्ट करना ही मानवीय प्रवृत्तियाँ बन चूके हैं। उन्हें अनेक तरह के जाति -उपजाति गोत्र आदि में विभाजित कर भेदभाव छूत -अछूत धोषित कर धार्मिक मुलम्मा चढा दिए गये जो आज भी कथित धार्मिकों के सर चढ़कर बोलते हैं। दुर्भाग्यवश ऐसा करने वाले  ही धर्मनिष्ठ व संस्कारी समझे जाते हैं। फलस्वरुप आम जन जीवन में  होड़ लगी हुई हैं कि कैसे कितने लोगों से अमानवीय जुल्म करे भेदभाव करे तो हमारी भी सनातन या हिन्दू संस्कृति में अच्छी रेटिंग होगी ।हमें धर्मनिष्ठ माने जाएन्गे इस मुगालते में शुद्रों में भी यहाँ तक एक ही जाति संवर्गों में  भी  खान पान रहन सहन में भेदभाव  परिव्याप्त है। प्रभावी कानुन के बावजूद देश भर में यह कुप्रथा विद्यमान हैं। आए दिन लोमहर्षक और दिल दहलाने वाली घटनाएँ घटती हैं।
      यदि वर्गीकरण आवश्यक है तो  गुण व स्वभाव के अनुरुप श्रेणी बद्ध होते  तो देश  व समाज की स्थित आज अलग होता। परन्तु  वह परिक्षेत्र प्रजाति रंग व बनावट के आधार पर भेदभाव जन्य हुआ। यही मानवता के लिए अभिशाप हुआ। फलस्वरुप भारत की छवि शेष विश्व में अच्छी नहीं हैं। और न यहाँ की समाजिक व्यवस्था प्रशंसनीय हैं। भले हम मुगालते में रहे कि हमारी सभ्यता आजतक कायम हैं। पर पशुवत बने हुए होना कीर्तिमान नहीं हैं।
        इकबाल का शेर का सही भावार्थ -"कुछ बात की हस्ती मिटती नहीं हमारी " यह साफ समझ आते हैं कि यह परस्पर सौहार्द नहीं बल्कि जातिवाद ही हैं। जो कभी जाती नहीं ।शायद इसलिए वजूद कायम हैं, इसलिए भी शायद चंद सुविधा भोगी तत्व इन्हे कायम रखने  संस्कृति संरक्षण करते आ रहे हैं। 
      जबकि आरंभ  से जन्मना ऊच नीच भाग्य भगवान के अपेक्षा सद्व्यहार कर्म आदि की बातें भी छिटपुट हुआ भी  परन्तु वह अनसुनी व अग्राह्य रहा। यह प्रवृत्तियाँ यथावत चला आ रहा हैं। इसका कारक केवल असमानताए ही नहीं अपितु आय का असमान वितरण और राजतंत्र व  धार्मिक प्रतिष्ठानों में कैद संपदा के कारण ऊपजी मनोवृत्तियां हैं। 
     यदि इन संपदाओं को  राजसात  कर देश की आधारभूत समस्याओं के निदान हेतु कार्यारंभ करे तो भारतीय संविधान की मूल अवधारणाएं सहज ही साकार होगा। देशवासी सुखी व समृद्ध होंगे साथ ही वैश्विक  कीर्तिमान स्थापित हो सकेगा।  हमारे साधु संतो और राजनेताओं  की आकांक्षा भी  कि विश्वगुरु होन्गे वह भी चरितार्थ होगा। बशर्ते वे लोग कथनी -करनी समान रखे । क्योंकि जनमानस के ऊपर इनका  गहरा  प्रभाव हैं।
     पर यह क्या देश की संपदा का  आम जनता की गाढ़ी कमाई का दुरुपयोग  करने के नये ढंग ( ढोंग ) आरंभ हो गया सभी राज्यों में ऊची प्रतिमा निर्माण की प्रतिस्पर्धा निकल पड़े हैं चाहे वह पटेल शिवाजी डा अम्बेडकर बुद्ध  श्रीराम हनुमान जटायु  आदि जैसे ऐतिहासिक या पौराणिक पात्र हो।  पर्यटन उद्योग के बहाने से बातों ‌को डायवर्ट तक किए जा रहे हैं।
     बहरहाल यह सब  जनमानस के दिलों में है उसे धूल- धक्कड़ खवाने कौव्वे चील गिद्धों के विष्टा गिराने  की जरुरतें ही क्या है। पुल सड़क अस्पताल स्कूल कालेज प्रतिष्ठान बनावे और राष्ट्र को समृद्ध करे।
                डा. अनिल भतपहरी 

प्रात: परिभ्रमण करते नीलगिरी के तले से ...

Sunday, May 29, 2022

सखा को पता

हो कितनें  कष्ट  

या हो जाए ख़ता 

तो सखा को ही

होते हैं बिन कहे पता 
      -डॉ॰ अनिल भतपहरी

Friday, May 27, 2022

हसदेव के रो देव

#anilbhatpahari 

हसदेव के रोदेव 

बरसा म नंगत 
चिखला  सनाय 
जर-जुड़ म 
सनफनाय/सकपकाय 
जाड़ म बड़ कांपत 
ओढे कथरी बिचारा
जेठ जरय भोंभरा 
तभो ले आ जय उघरा
रहय भले लरा- जरा  
देख कठल हस देव 
अब आथे सग 
सगा कभु- कभु 
साजे -संवागा 
आनी- बानी धरे 
खई -खजाना 
मोटर बजावत पो-पो 
देखनी उड़थे गांव म गो 
कत्कोन मोका जथे 
कत्कोन  ओसने लहुटे जथे 
 दया -मया छोड़ होगे नेंग चारी 
सुन्ना खेत खार बारी 
देखते देखत का गत होगे 
मनखे के साध ले सब उजरगे 
नदिया सुखावत 
मरत जीव जन्तु  पियास
कल - कारखाना ले 
धुंआ भरत अगास 
उजरत जंगल खिरत पहाड़ 
सुसकत कलेचुप धरती
बल खियात मनखे  के 
बानी  बिसरात मनखे के
उजरत  सबके रवती  
रकम-रकम के बिमारी 
अउ का-का नइ सचरही 
सिरतो कहें संगी त
 पटन्तर हसदेव 
 देखवउटी मनखे के सान  
 लगथे रो देव 

          -डा. अनिल भतपहरी / 9617777514