Friday, January 15, 2021

छत्तीसगढ़ी के दोहरे शब्द और उनके विशिष्ट अर्थ

छत्तीसगढ़ी में एक शब्द के दोहरे प्रयोग और उनके विशिष्ट अर्थ 

बोटोर बोटोर - आंखें फाड़कर देखना
मुटुर मुटुर- असमंजस से देखना
मटर मटर-आगे आगे आना
छरके छरके-दूरी बनाना
कुटूर कुटूर- कड़ी चीज चबाना
खुटूर खुटूर- धीरे धीरे खखटाना
फुटूर फुटूर-धीरे धीरे गिरना
चुटुर चुटुर-अधिक बोलना
सुटूर सुटूर-खामोशी से(चले जाना)
ढकर ढकर- गटागट पीना
लकर लकर-अधिक मेहनत
धकर धकर-कमजोरी
हकर हकर-कड़ी मेहनत
फसर फसर-गहरी नींद के लिए
फुसुर फुसुर-कानाफूसी
मुसुर मुसुर-छुपाकर(खाना)
हुरहा हुरहा-अचानक  अचानक 
ढोकर ढोकर के- दंडवत
खुड़ खुड़ ले-अच्छी तरह से सूखने का भाव
ढेंक ढेंक के- आर्तनादपूर्ण रुदन,विलाप 
महर महर-खुशबूदार
कोट कोट ले-भरपेट

मिलते जुलते दो शब्दों का प्रयोग
अलवा जलवा-साधारण
जांवर जिंयर -जुड़वा
सांगर मोंगर-हृष्टपुष्ट महिला
किलिर कालर- हल्ला गुल्ला
खिबिड़ खाबड़-झगड़ना
आका तुकी-अनफिट
खदर मसर-मिक्स  कर देना
लकर धकर-जल्दबाजी
छिदिर बिदिर-बिखरा देना
छर्री दर्री-टुकड़े टुकड़े
ओनहा कोनहा-कोना कोना
चितर काबर-रंग बिरंगा
फिसिर फासर- बिमार पड़ना
काँखत पादत-कष्ट से
हेल पेल-पर्याप्त जगह
डटटा खुट्टा-जगह की कमी
पेट अउ पाट-खाने और पहनने
झिलिंग झालंग-ढीला ढाला
चिट के न पोट के-बिल्कुल नही बोलना
मुरहा पोट्टा -लावारिस(बिना मां बाप का)
छकल बकल-खुले हाथ खर्च करना
लदर फदर- मोटे होने का भाव
लंदर फंदर-तिकड़म
लाटा फान्दा-उलझन
हाड़ा हपटा-अत्यधिक कमाना
बांटा खूंटा-बंटवारा
गुड़ गुड़ा-सीधे पहुंचना
बाटे बाट-रास्ते से
चिक्कन चांदो-साफ सुथरा

Thursday, January 14, 2021

बुद्ध कालीन समाज‌

Narendra Bharti छुआछूत तो नहीं पर एक दूसरे जातियों में खान पान और रोटी बेटी प्रायः नहीं था।यह अशिक्षा असुरक्षा व धन आदि के दुरूपयोग को रोकने के निमित्त कबिलाई संस्कृति था। एक दूसरे जाति बड़ा छोटा मानते व समझते थे। 
यहाँ तक एक जाति के फिरके या गोत्र तक में रोटी- बेटी नहीं चलते ।
जैसे  छत्तीसगढ की सम्पन्न कुर्मी में वर्मा और चंद्राकर में अब भी रोटी- बेटी नहीं है।  
    इसी तरह सभी जातियों में थे। 
सतनाम पंथ तो उसी जात -पात फिरके आदि के बंधन से मुक्त नया पंथ था। जहाँ कोई जाति+ पाति भेदभाव का प्रपंच नहीं थे। इसलिए तो इस पंथ के प्रभाव को रोकने सुविधा भोगियों ने घोर त्यज्य धोषित कर छुआछूत जैसे कुप्रथा लाया।
गुरुघासीदास के समय तो अनेक जातियों ने सतनाम पंथ में सम्मलित हुए। यदि पूर्ववत सतनामियों से छुआछूत होते तो कोई कैसे अछूत बनते ? 
     सतनामी अछूत बाद में घोषित जान पड़ते हैं। क्योंकि इस पंथ में तथाकथित भगवान और पंडे पुजारी मंदिर- मूर्ति आदि साकार पूजा का पूर्णतः निषेध था। फलस्वरुप  द्वेषपूर्ण भेदभाव किया गया। ताकि उनके प्रभाव को रोका जा सके।

टीप -छत्तीसगढ़ सहित पुरे मध्यदेश  में बुद्ध काल में केवल दो वर्ग थे स्वामी और सेवक ।‌यहां वर्ण जाति आदि था ही नहीं । जो बलवान गुणवान होते वह संपदा के स्वामी होते और जो अपेक्षाकृत कमजोर होते वह सेवक ।स्वामी और सेवक में सौख्या व प्रेम  भाव भी होते ।नफरत धृणा आदि का कही कोई नामो निशान नहीं था।
यह बेहतरीन प्राकृत या सत व्यवस्था था।जो प्राचीन श्रमण व सत संस्कृति के कारण था।
   आर्यों ने वैदिक व्यवस्था लाकर वर्ण और जात पात का प्रपंच बोए ।
देखिए बुद्ध वचन मझ्झिम निकाय।

Wednesday, January 13, 2021

मोती महल गुरुद्वारा भंडारपुरी

#anilbtapahari 

।।सतनाम पंथ का विश्व प्रसिद्ध मोती महल गुरुद्वारा भंडारपुरी ।।

    इस भव्य स्मारक को गुरुघासीदास मंदिर के नाम से भी  जाने जाते हैं। इसे जीर्णोद्धार / नव निर्माण के नाम पर  तीन दशक पूर्व ढहा दिए गये हैं। वहाँ केवल ढाचा मात्र है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि  पुरी एक पीढ़ी इस गौरवशाली दृश्यांकन व दृष्टान्त से वंचित हैं । जब देश भर में महत्वपूर्ण स्मारकों का जीर्णोद्धार व अनेक नव आस्था के नवनिर्माण जारी हैं। तब इसके लिए 
 कुछ भी पहल या हलचल न होना बेहद चिन्तनीय हैं।  
    देश भर के लाखों- करोड़ों लोगों की श्रद्धा का केन्द्र इस ऐतिहासिक ईमारत कब अपनी पूर्व स्वरुप में स्थापित होगा? इसका उत्तर संभवतः किसी के पास नहीं हैं। 
               ज्ञात हो कि इसका निर्माण १८२०-३० के बीच गुरुघासीदास के निर्देशन में राजा गुरुबालकदास ने एक दृष्टान्त के रुप में करवाया था ताकि इनके अवलोकन मात्र से सतनाम धर्म संस्कृति की जानकारी जन साधारण को हो सके।  यहाँ से ही पुरे छत्तीसगढ़ और उनके बाहर सतनाम पंथ का प्रचार -प्रसार हुआ। देश के कोने -कोने से श्रद्धालु यहाँ आते और मत्था टेक कर अपनी धार्मिक भावनाओं का इजहार करते थे ।अनुपम ज्ञान प्राप्त कर कृतार्थ होते थे। दूर से दर्शन मात्र से गुरु उपदेशना का भावबोध होता था।  शिखर के चारों कोने पर तीन बंदर और गरजते हुए शेर का शिल्पांकन से युक्त  चौखंडा महल का नीचे भाग तलघर था। संपूर्ण प्रखंड वास्तु व  काष्ठ कला की अनुपम कारीगरी रही हैं । यह मानव जीवन के चारो अवस्था का शानदार व्याख्या था।पुरातत्त्व की दृष्टिकोण से अतिशय महत्वपूर्ण इस ईमारत का राजनैतिक उठापटक ,शासन -प्रशासन की अनदेखी और उचित  प्रबंधन के अभाव में यह जमींदोज हो गया जो कि  अत्यन्त दयनीय व दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति हैं। 
           छत्तीसगढ़ी संस्कृति की अस्मिता और ‌पुरे विश्व के मानव समाज को मानवता का संदेश देने वाली इस भव्य ऐतिहासिक  ईमारत की हुबहु प्रतिरुप में निर्माण अत्यावश्यक है।   
                इस पावन कार्य हेतु  गुरुदर्शन मेला  मे लाखों दर्शनार्थियों की उपस्थिति में प्रबंधन मंडल की ओर से उचित व सार्थक पहल करते हुए नव निर्माण की घोषणा होनी चाहिए।  खास तौर पर अनेक सामाजिक व धार्मिक संगठन है जो सतनाम धर्म संस्कृति के पैरोकार समझते हैं उन्हे चाहिए कि केवल जनप्रतिनिधी एंव गुरुवंशज ही उनके लिए उत्तरदायी नहीं है बल्कि उनके साथ साथ जन समर्थन व सहयोग  कैसे एकजुट हो ? इन पर गंभीरतापूर्वक चिंतन मनन व सकरात्मक  कार्य करें।
         जय सतनाम 
               
          -डाॅ. अनिल भतपहरी / 9617777514

एक -दो कविताएँ

एक-दो कविताएँ 

सीधी-सपाट कथन 
सहज -सरल जीवन 
की नही होती  चर्चा 
जिनकी हो न चर्चा 
समझो हो गये मुर्दा 
इसलिये  ज़िन्दा होने 
लोग हो रहे हैं बे़पर्दा 

×        ×            ×
ज़माना देखने-दिखानें का हैं
एक- दूसरे  को रिझानें का हैं
सीधाई में नहीं रहा अब रिझाई 
इसलिए तो  कह रहे हैं भाई 
रहो टे़ढ़े -मेढ़े ,करो आड़े-तिरछे
हर तरफ लगे हैं सी सी कैमरे 
जो होगा सीधा वही पकड़ा  जाएगा 
क्योंकि सीधाई को चोहल समझा जाएगा 

  - डॉ. अनिल भतपहरी 9617777514
सत श्री ऊंजियार सदन अमलीडीह रायपुर छग

चित्र- डाब के संग मजे में मैसूर की खूबसूरत गली

Tuesday, January 12, 2021

सतनामी समाज की अवस्था



छत्तीसगढ़ की ढाई करोड़ आबादी में  सतनामी महज‌ १५-१६% ही हैं। और मजे की बात  सबसे अलग- थलग हैं। हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई आदिवासी किसी में सहज समाहित नहीं न सार्वजनिक रुप से आमंत्रित व सम्मानित हैं। भले सतनामी सबको सम्मान दे यह अलग बात हैं। 
वैसे सतनामियों में भी  क ई सांस्कृतिक विभेद है मोटे तौर पर सतनामी रामनामी सूर्यवंशी आदि। परिक्षेत्र गत विभाजन भी हैं। इनमें रोटी बेटी साधारणतः प्रचलन में नहीं हैं। एकीकरण के सारे प्रयास विफल हैं। या सही ढंग से होते नहीं ।

 पार्टी गत विभाजन अलग हैं। ऐसे में केवल सतनामी वोट से सत्ता केवल दीवा स्वप्न मात्र हैं।
   गुरुवंशज का विरोध व्यर्थ व अनुचित हैं। उन्हे  गुरु घासीदास जैसा नहीं समझना चाहिए। वे उनके वंशज है इसलिए सम्मानीय है और बने रहेन्गे भले कोई माने या न‌ माने । क्योंकि वंशानुगत परंपरा भारतीय संस्कृति में प्रत्यक्ष रुप में प्रचलन में हैं। इसे बदलने में वक्त लगेगा।
   हां सतनामियों में बेहतर नेतृत्व पैदा करने होन्गे यह नेतृत्व कही से भी हो सकते हैं। गुरुओं में से  ही  होगा यह जरुरी नही है।
   जो भी नेतृत्व होगा उसे सर्व समाज में विश्वसनीयता व स्वीकार्य करना होगा तब कही जाकर सतनामी मुख्यमंत्री की बात साकार हो सकता है। यह असंभव भी नही है। भविष्य में सबकूछ संभाव्य हैं।
    बहुमत वाली पार्टी से  समाज की विधायकों की संख्या के आधार पर सतनामी मुख्यमंत्री की मांग जरुर किया जा सकता है।
  छत्तीसगढ़ की  ९० मे से ५० सीटों पर हार जीत तय करने वाले सतनामी  समाज से मुख्यमंत्री की मांग से  शीर्ष नेतृत्व को अवगत कराना चाहिए। 
     इस आधार पर सहजता से मुख्यमंत्री बन सकते हैं।
  वर्तमान में सबसे अधिक सतनामी विधायक है। पहला हक बनता तो हैं। लेकिन इस तथ्य को कौन और कैसे  ऊपर तक पहुंचाए ?
   इसके लिए समाज एकजुट होकर पहल करें।न कि गुरु विरोध नेता विरोध पार्टी विरोध में समय शक्ति व संसाधन नष्ट करते रहे ।हमारे‌ अधि कर्मचारी व  युवा वर्ग जो  एन्ड्रायड धारी है वे अपनी गाढी कमाई से मोबाईल व नेट डाटा खरीदते हैं। वे केवल परस्पर लड़ने झगड़ने एक दूसरे के टांग खिचने में ही वक्त व संशाधन नष्ट करते आ रहे हैं ।
  दिशाहीन समाज को दिशा देने सार्थक पहल की आवश्यकता हैं। बिना राजनैतिक हस्तक्षेप के सामाजिक रुप से एकीकरण व सुदृढ़ होना बेहद आवश्यक हैं। इनके लिए केवल गुरु वंशज का  ही उत्तरदायित्व हैं। यह समझना या मानना सही नहीं है। हम सबका नैतिक दायित्व हैं।  
 

स्वच्छंद

।।स्वच्छंद ।।

हमें स्वच्छंद वातावरण  
उनमें विचरते पक्षी  
झुमती मदमस्त  डालियां  
पत्तियाँ और  फूल 
क्रीड़ा करते 
भ्रमर वृंद पसंद हैं
लहराती बलखाती झरनें
कुलाचें भरतें 
मृग झुंड पसंद हैं।
सच कहें तो
हँसते- खिलखिलातें 
पुरुष और महिलाएँ 
संग बाल वृंद पसंद हैं  
यहाँ तक स्वच्छंद 
विचारधाराएँ और कविताएँ 
तक पसंद हैं
क्योंकि स्वच्छंदता ही 
मुक्ति के पट खोलते हैं

-डाॅ. अनिल भतपहरी

Saturday, January 9, 2021

शांत छत्तीसगढ़ में अशांति का बीजारोपण

#anilbhatphari 

।शांत छत्तीसगढ़ में अशांति का बीजारोपण ।।

छत्तीसगढ़ शांति व सौख्य की भूमि हैं। अनादिकाल से  जनजीवन श्रमण व सत संस्कृति का संवाहक हैं। लोग कर्मवादी है और" अपन भरोसा तीन परोसा खाकर " कृषि व  वनोत्पाद से संतुष्ट संतों- गुरुओं की सीख से सुखमय जीवन -निर्वाह करते आ रहे हैं। गाँवों में अनेक जातियाँ निवास करती हैं पर उनमें एक आत्मीय भाव भरे हुए होते हैं। परस्पर मीत- मितानी  आदि से भाई ,दीदी  कका- ममा आदि स्नेहिल रिश्तों से बंधे हुए होते हैं। क्योंकि उन्हें पता हैं संबंधों   की‌ शक्ति  ही सहयोग करते हैं। कोई ऊपरी या बाहरी शक्ति नहीं जो प्रत्यक्ष लाभ दे सकें। इस बात को बहुत ही सहज -सरल ढंग  हमारे गुरुओं संतों ने समझा दिए हैं।
     आजादी के आसपास पर प्रांतिकों के पलायन कर आगमन  और उनकी अपनी अपनी मान्यताए तथा अपने प्रभाव आदि के लिए अनेक सडयंत्रों से यहां जातिय दुराव और सांस्कृतिक विभेद की नींव पड़ी। इन सबके  बावजूद  ग्राम्य अंचल में तीज -त्यौहार में सभी उत्साह पूर्वक भाग लेते आ रहे हैं। और किसी पेड़ की टहनियों में अनेक घोसलें बनाकर जैसे पंछी बसेरा करते हैं। ठीक गांव ऐसे ही आबाद रहा है।  यहाँ बहुसंख्यक ७५-८०%  जनता सगुण परंपरा के  बहुदेव वाद ,प्रतीक -मूर्ति पूजा के साथ- साथ करीब २०-२५%  जनता निर्गुण पंरपरा के संवाहक है महात्मा कबीर व गुरुघासीदास का बेहद प्रभाव जनजीवन में विद्यमान हैं। इस तरह देखे तो छत्तीसगढ़ की आम जन जीवन सगुण- निर्गुण धारा में आबद्ध  साकार व निराकारोपसक हैं।  सगुण- निगुण नही कछु भेदा कह कर बेहतरीन समवन्य भी हमारे संतो ने किया हैं। 
    और एक- दूसरे की मान्यताओं आस्थाओं पर कोई हस्तक्षेप नहीं बल्कि सम्मान प्रकट करते आ रहे हैं।परन्तु  विगत कुछ वर्षों से प्रायोजित ढंग से निर्गुणोंपासक सतनाम पंथ  के धार्मिक स्थलों पर अतिक्रमण आदि आरोपित कर किताबों ,पत्र -पत्रिकाओं, व्याख्यानों में तथ्य हीन बातें लिख- बोलकर शांत छत्तीसगढ़ को उद्वेलित करने की नापाक  कोशिशें जारी हैं।यह घटना सामाजिक कम राजनैतिक अधिक  नजर आते हैं। 
      समय रहते इनका निदान आवश्यक हैं। अन्यथा इस तरह की  चिंगारी दावानल में कब  तब्दील हो  जाय ?कह नहीं सकते क्योंकि यह आस्था का मामला हैं।  लोग बड़ा- छोटा दिखाने प्रतिभा और विकास की ओर न जाकर शार्टकट धर्म- जाति पंथ की मान्यता रीति- नीति  पर आ जाते हैं।  और गाहे -बगाहे इन्हे छेड़कर महौल को अशांत व उद्वेलित करते हैं ,ताकि आगे चलकर मौके का फायदा उठाया जा सके । यही निकृष्ट मानसिकता के चलते ऐसे धटनाएं जानबूझकर किए जाते हैं। इनकी सुक्ष्म व निष्पक्ष  जांच कर इनके तह में कौन सी छद्म शक्ति काम करती हैं। उनका पर्दाफा़श व उन्मूलन  शासन- प्रशासन को करना चाहिए । घटना छोटी हैं ऐसा समझकर नजर अंदाज नहीं करना चाहिए क्योंकि घटनाएँ तो घटनाएं ही होते हैं। प्रचार तंत्र और मीडिया उन्हें जरुर छोटे बडे रुप देते हैं यह अलग बात है।
        वैसे  इस तरह की घटना के दोषी लोग  सहज ही चिन्हाकित भी होते हैं ,चंद मोहरे व गुर्गों की गिरफ्तारियां भी होती हैं।पर  जो  इनके असल मास्टर माइंड है उस तह तक  अनन्यान कारणों नहीं पहुँच पाते। इसके  चलते दोषियों को  कठोर सजा नहीं  होते फलस्वरुप  क्षतिपूर्ति  या कई छद्म सलाह व मौकापरस्त समझौते आदि  के कारण माफीनामा  आदि से मामले जरुर कुछेक माह या वर्ष के लिए दब सा जाते हैं। पर वह कहीं न कहीं पर  पुनश्च प्रकट हो जाते हैं। ऐसा करके विराट जन समुदाय मनोबल गिराने का  अप्रत्याशित कार्य और वोट या मत ध्रुवीकरण की राजनैतिक सडयंत्र भी प्रायः किए जाते हैं। प्रयोगवादी संस्थान इस तरह के नये नये हथकंडे अपना समाज का रुख जानने का प्रयोग करते हैं। देश या सामाज सेवा के नाम पर गठित दलें व संस्थान  इस तरह लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर इन  "आस्था की  स्थल को प्रयोगशाला बना रहे हैं"  जो कि बेहद  निन्दनीय है और चिन्तनीय है। इनसे न समाज का भला होगा न देश का । बल्कि कुछ दलों के लोगों को आक्रोशित और उन्मादित  लोगों का समर्थन जरुर मिल सकता हैं। पर ऐसे समर्थन से सत्ता हासिल  नही होगी अगर खुदा न खास्ता हो भी ग ई तो   ऐसी सत्ता से जनकल्याण  हो ही नहीं सकता। शांत छत्तीसगढ़ में अशांति का बीजारोपण कर नफरत -द्वेष का  फसल उगाने की नापाक कोशिशे हो रही हैं।  इन पर त्वरित प्रभावी नियंत्रण होना चाहिए। 
    बस्तर की नीरिह व साधनहीन  आदिवासी समुदाय जल जमीन जंगल के नाम पर आंदोलित ‌भटकने लगे हैं। कही वही परिस्थितियाँ यहां न पनप जाय इन पर बहुत ही गंभीरतापूर्वक विचार करते निर्णय लेना होगा। 
     बहरहाल चिंगारियां  आपस में सटे एक ही प्रजाति के वृक्षों की टहनियों के परस्पर रगड़ से भी निकलती हैं उन चिंगारी से जंगल जल कर खाक हो जाते  हैं। इसलिए चाहिए कि उनका  तत्क्षण उचित ढंग से शमन कर दिया जाय ... अन्यथा सिवाय पश्चाताप के कुछ नहीं बचा रहेगा ?

-डाॅ. अनिल भतपहरी